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आत्माओं को जीतने में सफल होंगे, यदि हम माँगें, और प्रबल प्रार्थना की स्पष्ट रूप से प्रकट की हुई शर्तों को पूरा करें। ध्यान दीजिए, प्रभु के दिन मैंने जो कहा वह उसी विषय पर था, और जो मैं पहले कह चुका था उसके अतिरिक्त था। जिस गलतफ़हमी की ओर संकेत किया गया है वह यह थी: यदि हम पहले पाप के इन सब रूपों से छुटकारा पा लें, जो हमें यह वरदान पाने से रोकते हैं, तो क्या हमें वह आशीष पहले ही नहीं मिल चुकी? हमें और किस बात की आवश्यकता है?
उत्तर। प्राण में पवित्र आत्मा की शान्ति और पवित्र आत्मा की सामर्थ में बड़ा अन्तर है। चेले पिन्तेकुस्त के दिन से पहले ही मसीही थे, और मसीही होने के नाते उनमें पवित्र आत्मा का कुछ अंश था। उन्हें पापों की क्षमा की, और धर्मी ठहराए जाने की अवस्था की शान्ति अवश्य मिली होगी, फिर भी उनके पास सामर्थ का वह वरदान नहीं था जो उन्हें सौंपे गए काम को पूरा करने के लिए आवश्यक था। उनके पास वह शान्ति थी जो मसीह ने उन्हें दी थी, परन्तु वह सामर्थ नहीं थी जिसकी उसने प्रतिज्ञा की थी। यह बात सब मसीहियों के विषय में सच हो सकती है, और मेरे विचार में ठीक यहीं कलीसिया की, और सेवकाई की बड़ी भूल है। वे मन-परिवर्तन पर ही ठहर जाते हैं, और ऊपर से सामर्थ के इस वरदान को तब तक नहीं खोजते जब तक वह उन्हें मिल न जाए। इसी कारण धर्म का अंगीकार करनेवाले इतने सारे लोगों के पास न परमेश्वर के साथ सामर्थ है, न मनुष्य के साथ। वे न इसके साथ प्रबल होते हैं, न उसके साथ। वे मसीह में एक आशा को पकड़े रहते हैं, और सेवकाई में भी प्रवेश कर लेते हैं, पर उस चेतावनी को अनदेखा कर देते हैं कि जब तक ऊपर से सामर्थ न पाएँ तब तक ठहरे रहें। परन्तु यदि कोई सारे दशमांश और भेंटें परमेश्वर के भण्डार में ले आए, और सब कुछ वेदी पर रख दे, और इस बात में परमेश्वर को परखे, तो वह पाएगा कि परमेश्वर “आकाश के झरोखे खोलकर उस पर अपरम्पार आशीष की वर्षा करेगा, यहाँ तक कि उसे रखने की जगह न रहेगी।”
