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पूरा करना है।” परन्तु क्या हम संकल्प के द्वारा प्रेम उत्पन्न करते हैं? क्या हम संकल्प के द्वारा स्वार्थ को जड़ से मिटा देते हैं?
कदापि नहीं। हम यह या वह काम न करने का संकल्प करके, और उसके विरुद्ध प्रार्थना और संघर्ष करके, स्वार्थ की इस या उस अभिव्यक्ति या प्रकटीकरण को दबा तो सकते हैं। हम बाहरी आज्ञाकारिता का संकल्प कर सकते हैं, और परिश्रम करके परमेश्वर की आज्ञाओं के अक्षर के अनुसार आज्ञाकारिता तक स्वयं को पहुँचा सकते हैं। परन्तु संकल्प के द्वारा हृदय में से स्वार्थ को जड़ से मिटा देना एक बेतुकी बात है। इसी प्रकार परमेश्वर की आज्ञाओं को आत्मा में मानने का प्रयत्न — दूसरे शब्दों में, संकल्प के बल से वैसा प्रेम करने का प्रयास जैसा परमेश्वर की व्यवस्था माँगती है — एक बेतुकी बात है। बहुत से लोग ऐसे हैं जो मानते हैं कि पाप इच्छाओं (अभिलाषाओं) में है। ऐसा ही सही। क्या हम संकल्प के बल से अपनी इच्छाओं को वश में रखते हैं? संकल्प के बल से हम किसी विशेष इच्छा की पूर्ति से अपने को रोक सकते हैं।
हम इससे आगे बढ़कर बाहरी जीवन में सामान्य रूप से भी इच्छाओं की पूर्ति से अपने को रोक सकते हैं। परन्तु इससे परमेश्वर का वह प्रेम प्राप्त नहीं होता, जिसमें आज्ञाकारिता है। यदि हम संसार-त्यागी वैरागी बन जाएँ, अपने को किसी कोठरी में बन्द कर लें, और जहाँ तक उनकी पूर्ति का सम्बन्ध है, अपनी सारी इच्छाओं और भूखों को क्रूस पर चढ़ा दें, तो भी हमने केवल पाप के कुछ रूपों से ही बचाव किया है; परन्तु वह जड़, जो वास्तव में पाप है, छुई तक नहीं गई। हमारे संकल्प ने वह प्रेम प्राप्त नहीं किया, जो परमेश्वर के प्रति एकमात्र सच्ची आज्ञाकारिता है। संकल्प के बल से बाहरी जीवन में पाप के साथ हमारी सारी लड़ाई का अन्त केवल यह होता है कि हम चूना फिरी हुई कब्रें बन जाते हैं। संकल्प के बल से इच्छा के साथ हमारी सारी लड़ाई किसी काम की नहीं; क्योंकि इस सब में, चाहे बाहरी जीवन में हो या भीतरी इच्छा में, पाप को दबाने का प्रयत्न कितना ही सफल क्यों न हो, उसका अन्त केवल धोखे में होगा, क्योंकि संकल्प के बल से हम प्रेम नहीं कर सकते।
पाप पर जय पाने के ऐसे सारे प्रयत्न पूरी तरह निष्फल हैं, और जितने निष्फल हैं उतने ही पवित्रशास्त्र के विपरीत भी हैं।
बाइबल स्पष्ट रूप से सिखाती है कि पाप पर जय मसीह में विश्वास के द्वारा पाई जाती है। “वह हमारे लिये ज्ञान ठहरा, अर्थात् धर्म, और पवित्रता, और छुटकारा।” “वही मार्ग और सच्चाई और जीवन है।” मसीहियों के विषय में कहा गया है कि वे “विश्वास के द्वारा अपने मन शुद्ध करते हैं” (प्रेरितों के काम 15:9)। और प्रेरितों के काम 26:18 में यह दृढ़ता से कहा गया है कि पवित्र लोग मसीह में विश्वास के द्वारा पवित्र किए जाते हैं। रोमियों 9:31,32 में कहा गया है कि यहूदी धार्मिकता तक नहीं पहुँचे, “क्योंकि वे विश्वास से नहीं, परन्तु मानो व्यवस्था के कर्मों से उसकी खोज करते थे।” बाइबल का सिद्धान्त यह है कि मसीह विश्वास के द्वारा अपने लोगों को पाप से बचाता है; कि मसीह का आत्मा विश्वास के द्वारा हृदय में वास करने के लिए ग्रहण किया जाता है। विश्वास ही है जो प्रेम के द्वारा कार्य करता है। प्रेम विश्वास के द्वारा उत्पन्न होता और बना रहता है। विश्वास के द्वारा मसीही “संसार, शरीर और शैतान पर जय पाते हैं।” विश्वास ही के द्वारा वे “उस दुष्ट के जलते हुए तीरों को बुझाते हैं।”
विश्वास ही के द्वारा वे “प्रभु यीशु मसीह को पहिन लेते हैं और पुराने मनुष्यत्व को उसके कामों समेत उतार डालते हैं।”
विश्वास ही के द्वारा हम “अच्छी कुश्ती” लड़ते हैं, संकल्प के द्वारा नहीं। विश्वास ही के द्वारा हम “स्थिर बने रहते हैं,” संकल्प के द्वारा हम गिर पड़ते हैं। वह विजय जिससे संसार पर जय प्राप्त होती है, हमारा विश्वास है। विश्वास ही के द्वारा शरीर को वश में रखा जाता है और शारीरिक अभिलाषाएँ दबाई जाती हैं। सच तो यह है कि केवल विश्वास ही के द्वारा हम मसीह के आत्मा को ग्रहण करते हैं, कि वह अपनी सुइच्छा के अनुसार हम में इच्छा और काम, दोनों बातों को उत्पन्न करे। वह अपना ही प्रेम हमारे हृदयों में उण्डेलता है, और इस प्रकार हमारे प्रेम को प्रज्वलित करता है।
पाप पर हर विजय मसीह में विश्वास के द्वारा होती है; और जब कभी संकल्प करने और पाप के विरुद्ध लड़ने के कारण मन मसीह से हट जाता है, तो चाहे हमें इसका पता हो या न हो, हम अपनी ही शक्ति में कार्य कर रहे होते हैं, मसीह की सहायता को ठुकरा रहे होते हैं, और एक दिखावटी धोखे में पड़े होते हैं। केवल
