अध्याय 15 (68 में से)

दूसरी बड़ी आवश्यकता यह जीवन्त दृढ़ विश्वास है कि सामर्थ का यह वरदान

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दूसरी बड़ी आवश्यकता यह जीवन्त दृढ़ विश्वास है कि सामर्थ का यह वरदान हर एक प्राण के लिए आवश्यक है। धर्म का अंगीकार करनेवाले बहुत से लोग समझते हैं कि यह विशेष रूप से और केवल उन्हीं के लिए है जो जीवन के काम के रूप में सुसमाचार का प्रचार करने के लिए बुलाए गए हैं। वे यह नहीं समझ पाते कि सब लोग सुसमाचार का प्रचार करने के लिए बुलाए गए हैं, कि हर मसीही का सारा जीवन उस शुभ समाचार की घोषणा होना चाहिए। तीसरी आवश्यकता इस वरदान की प्रतिज्ञा पर सच्चा और उत्कट विश्वास है। धर्म का अंगीकार करनेवाले बहुत-से लोग, और पादरी भी, इस बात पर सन्देह करते दिखाई देते हैं कि यह प्रतिज्ञा पूरी कलीसिया के लिए और हर मसीही के लिए है। इसलिए उनमें इसे पकड़ने के लिए विश्वास नहीं होता। यदि यह सबके लिए नहीं है, तो वे नहीं जानते कि यह किसके लिए है। निस्सन्देह वे विश्वास से प्रतिज्ञा को पकड़ नहीं सकते। चौथी आवश्यकता इसके लिए परमेश्वर की बाट जोहने में वह दृढ़ता है जिसकी आज्ञा पवित्रशास्त्र में दी गई है। वे प्रबल होने से पहले ही हियाव छोड़ देते हैं, और इसलिए उन्हें वरदान नहीं मिलता। बहुत-से लोग अपने लिए अनन्त जीवन की आशा से ही सन्तुष्ट दिखाई देते हैं। वे कभी इस बात के लिए तैयार नहीं होते कि अपने उद्धार के प्रश्न को, तय हुआ मानकर, मसीह के हाथ छोड़कर उससे निश्चिन्त हो जाएँ। वे दूसरों के उद्धार के लिए काम करने की महान आज्ञा को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते, क्योंकि उनका विश्वास इतना निर्बल है कि वे अपने उद्धार के प्रश्न को स्थिरता से मसीह के हाथों में नहीं छोड़ते; और मैं पाता हूँ कि सुसमाचार के कुछ सेवक भी इसी दशा में हैं, और इसी रीति से डगमगा रहे हैं, दूसरों को बचाने के काम में अपने आप को पूरी तरह लगाने में असमर्थ हैं, क्योंकि वे अपने उद्धार के विषय में कुछ हद तक अस्थिर हैं। यह देखकर आश्चर्य होता है कि कलीसिया ने सामर्थ के इस वरदान की आवश्यकता को व्यवहार में किस हद तक आँखों से ओझल कर दिया है। लगभग हर कोई पवित्र आत्मा पर हमारी निर्भरता के विषय में बहुत कुछ कहता है; परन्तु इस निर्भरता का वास्तविक अनुभव कितना कम किया जाता है। मसीही, और पादरी भी, इसके बिना ही काम में लग जाते हैं। मुझे यह कहते हुए दुःख होता है कि सेवकाई की पंक्तियाँ ऐसे लोगों से भरती जा रही हैं जिनके पास यह नहीं है। प्रभु हम पर दया करे! क्या इस अन्तिम बात को प्रेमहीन समझा जाएगा? यदि हाँ, तो उदाहरण के लिए, इस विषय पर होम

मिशनरी सोसाइटी की रिपोर्ट सुनी जाए। निश्चय ही, कुछ गड़बड़ है।

उस सोसाइटी के हर मिशनरी द्वारा एक वर्ष के परिश्रम में औसतन पाँच प्राणों का मसीह के लिए जीता जाना निश्चय ही सेवकाई में अत्यन्त चिन्ताजनक निर्बलता का संकेत है। क्या इन सब पादरियों को, या इनमें से अधिकांश को भी, वह सामर्थ मिली है जिसकी प्रतिज्ञा मसीह ने की थी? यदि नहीं, तो क्यों नहीं?

परन्तु यदि मिली है, तो क्या मसीह का अपनी प्रतिज्ञा से बस इतना ही अभिप्राय था? एक पिछले लेख में मैंने कहा है कि सामर्थ के इस वरदान की प्राप्ति क्षण भर में होती है। मेरा यह दावा करने का अभिप्राय नहीं है कि हर उदाहरण में पानेवाले को उस ठीक समय का पता था जब वह सामर्थ उसके भीतर प्रबलता से काम करने लगी। हो सकता है कि वह ओस के समान आरम्भ हुई हो और बढ़कर वर्षा की बौछार बन गई हो। मैंने होम मिशनरी सोसाइटी की रिपोर्ट का उल्लेख किया है। इसका यह अर्थ नहीं कि मैं समझता हूँ कि उस सोसाइटी में काम करनेवाले भाई परमेश्वर के लिए परिश्रम करनेवालों के रूप में विश्वास और सामर्थ में औरों से अधिक निर्बल हैं। इसके विपरीत, उनमें से कुछ के साथ अपने परिचय के आधार पर मैं उन्हें परमेश्वर के काम में हमारे सबसे अधिक समर्पित और आत्म-त्यागी परिश्रमियों में गिनता हूँ। यह तथ्य उस चिन्ताजनक निर्बलता को स्पष्ट करता है जो कलीसिया की हर शाखा में, पादरियों और साधारण सदस्यों दोनों में, फैली हुई है। क्या हम निर्बल नहीं हैं? क्या हम अपराधपूर्ण रूप से निर्बल नहीं हैं? यह सुझाव दिया गया है कि इस प्रकार लिखकर मैं सेवकाई और कलीसिया को ठेस पहुँचाऊँगा। मैं विश्वास नहीं कर सकता कि इतने

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