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आपने उसके विषय में मुझसे जो कुछ कहा है, उसके एक-एक शब्द पर मैं विश्वास करता हूँ।” यदि मैं यहीं रुक जाता, तो निस्सन्देह मैं अपना प्राण खो बैठता। उसकी इच्छा और सामर्थ के विषय में इस दृढ़ बौद्धिक धारणा के अतिरिक्त, यह आवश्यक होता कि मैं उससे विनती करूँ, उसके पास आऊँ, उसके व्यक्तित्व पर भरोसा रखूँ, और उसका उपचार स्वीकार करूँ।
जब मैं बौद्धिक रूप से उसके विषय में दी गई गवाही को अडिग विश्वास के साथ स्वीकार कर चुका होता, तो उसके बाद की और अनिवार्य बात यह होती कि मैं अपनी इच्छा से उसके व्यक्तित्व पर भरोसा या निर्भरता का कार्य करूँ, अर्थात् अपना प्राण उसके और अपने रोग के इलाज के लिए उसके सर्वाधिकारपूर्ण उपचार के हाथ में सौंप दूँ।
अब यह उदाहरण विश्वास के सच्चे स्वरूप या मनोविज्ञान को स्पष्ट करता है, जैसा वह वास्तव में चेतना में विद्यमान होता है। वह किसी भी मात्रा के बौद्धिक ज्ञान में, या बाइबल के सिद्धान्तों को स्वीकार करने में नहीं है। यह अधिक से अधिक दृढ़ निश्चय भी कि बाइबल में परमेश्वर और मसीह के विषय में कहा गया हर शब्द सत्य है, विश्वास नहीं है। ये सत्य और सिद्धान्त मसीह में परमेश्वर को केवल वहीं तक प्रकट करते हैं जहाँ तक वे मसीह में परमेश्वर की ओर संकेत करते हैं, और प्राण को सिखाते हैं कि उसके व्यक्तित्व पर भरोसे के कार्य के द्वारा उसे कैसे पाया जाए।
जब हम उसके व्यक्तित्व पर दृढ़ता से भरोसा रखते हैं, और बाइबल में जो कुछ वह हमारे लिए बताया गया है, उस सब के लिए उस पर अडिग निर्भरता के कार्य के द्वारा अपने प्राण उसे सौंप देते हैं, तो यही विश्वास है। हम परमेश्वर की गवाही के आधार पर उस पर भरोसा रखते हैं। बाइबल के सिद्धान्त और तथ्य उसे हमारे लिए जो कुछ घोषित करते हैं, उस सब के लिए हम उस पर भरोसा रखते हैं। भरोसे का यह कार्य हमारी आत्मा को उसके साथ इतनी घनिष्ठ एकता में जोड़ देता है कि हम सीधे उससे अनन्त जीवन की एक धारा ग्रहण करते हैं। चेतना में विश्वास मानो ईश्वरीय गैल्वेनिक परिपथ (विद्युत-चक्र) को पूरा कर देता है, और परमेश्वर का जीवन तुरन्त हमारे प्राणों में प्रदान किया जाता है।
परमेश्वर का जीवन, और ज्योति, और प्रेम, और शान्ति, और आनन्द हमारी ओर ऐसे स्वाभाविक और सहज रूप से बहते प्रतीत होते हैं जैसे बैटरी से गैल्वेनिक (विद्युत) धारा बहती है। तब हम पहली बार समझते हैं कि मसीह का क्या अर्थ था जब उसने कहा कि हम विश्वास के द्वारा उससे वैसे ही जुड़े हैं जैसे डाली दाखलता से जुड़ी होती है।
तब और इसी रीति से मसीह हम पर परमेश्वर के रूप में प्रकट होता है। हम उसके साथ सीधी संगति के प्रति सचेत होते हैं, और हम उसे वैसे ही जानते हैं जैसे हम अपने आप को जानते हैं, अर्थात् अपने भीतर उसकी सीधी सक्रियता के द्वारा। तब हम सीधे, चेतना में, जान लेते हैं कि वही हमारा जीवन है, और कि हम उससे, मानो क्षण-प्रतिक्षण, अनन्त जीवन का दान प्राप्त करते हैं।
कुछ लोगों में मन अपेक्षाकृत अंधकारमय होता है, और इसलिए आरम्भ में उनका विश्वास अपेक्षाकृत दुर्बल होता है। वे बहुत व्यापक मत रख सकते हैं, और फिर भी बौद्धिक रूप से वास्तविकता का अनुभव करानेवाली धारणा के साथ बहुत थोड़ी बातों पर विश्वास करते हैं। इसलिए उस पर उनका भरोसा उतना ही संकीर्ण होगा जितनी उनकी अनुभवसिद्ध धारणाएँ संकीर्ण हैं। जब विश्वास दुर्बल होता है, तो ईश्वरीय जीवन की धारा इतनी मन्द गति से बहती है कि हमें उसका पता भी मुश्किल से चलता है। परन्तु जब विश्वास दृढ़ और सब कुछ समेटनेवाला होता है, तो वह हमारे प्राणों में प्रेम के ईश्वरीय जीवन की इतनी प्रबल धारा आने देता है कि वह प्राण और देह दोनों में व्याप्त होती प्रतीत होती है। तब हम चेतना में जान लेते हैं कि मसीह के आत्मा का हमारे भीतर एक ऐसी सामर्थ के रूप में होना क्या है जो हमें पाप से बचाती है और प्रेमपूर्ण आज्ञाकारिता के मार्ग में हमारे पाँवों को सँभाले रखती है।
सैकड़ों — बल्कि मैं कह सकता हूँ हज़ारों — मसीही लोगों के साथ व्यक्तिगत बातचीत से मैं इस बात से चकित हुआ हूँ कि यूहन्ना के पाँचवें
अध्याय में लिखे मसीह के शब्द उनके अनुभव पर कितने लागू होते हैं। मसीह ने यहूदियों से कहा: “तुम पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ते हो [क्योंकि इसका अनुवाद ऐसा ही होना चाहिए]1; क्योंकि समझते हो कि उसमें अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है, और यह वही है
1 कोष्ठक मूल में ही हैं।
