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हम पर, सारी कलीसिया पर, हर एक मसीही पर कैसी भयानक ज़िम्मेदारी है! कोई पूछ सकता है, ऐसी परिस्थितियों में उदासीनता कैसे सम्भव है, आलस्य कैसे सम्भव है, वह आम और घातक उपेक्षा कैसे सम्भव है? यदि वे आरम्भिक मसीही, जिन्हें यह आज्ञा दी गई थी, यह सामर्थ पाने से चूक जाते, तो क्या हम उन्हें बहुत दोषी न समझते? यदि ऐसी चूक उनके लिये पाप होती, तो हमारे लिये वह कितना अधिक पाप है, जिन पर इतिहास और तथ्यों का वह सारा प्रकाश जगमगा रहा है जो उन्हें प्राप्त नहीं हुआ था? कुछ पादरी और बहुत से मसीही इस विषय को ऐसे बरतते हैं मानो इसे परमेश्वर की प्रभुता पर छोड़ देना चाहिए, और इस सामर्थ के वरदान को पाने के लिये कोई निरन्तर प्रयत्न नहीं करते। क्या आरम्भिक मसीहियों ने इसे ऐसा ही समझा और बरता? कदापि नहीं।
जब तक सामर्थ का यह बपतिस्मा उन पर न उतरा, उन्होंने अपने आप को चैन न लेने दिया। मैंने एक बार एक पादरी को पवित्र आत्मा के बपतिस्मा के विषय पर प्रचार करते सुना। उन्होंने इसे एक वास्तविकता के रूप में प्रस्तुत किया; और जब वे इस प्रश्न पर आए कि इसे कैसे प्राप्त किया जाए, तो उन्होंने ठीक ही कहा कि इसे उसी प्रकार प्राप्त करना है जैसे प्रेरितों ने पिन्तेकुस्त के दिन इसे प्राप्त किया था। मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई, और मैं उत्सुकता से सुनता रहा कि वे अपने श्रोताओं पर यह दायित्व डालेंगे कि जब तक वे इसे प्राप्त न कर लें, तब तक चैन न लें। परन्तु इसमें मुझे निराशा हुई: क्योंकि बैठने से पहले वे श्रोताओं को मानो इस बपतिस्मा को प्राप्त करने के दायित्व-बोध से मुक्त करते हुए दिखाई दिए, और यह प्रभाव छोड़ गए कि यह विषय परमेश्वर की इच्छा पर छोड़ दिया जाना चाहिए, और उन्होंने कुछ ऐसा कहा जिससे उन लोगों की निन्दा झलकती थी जो बड़े आग्रह और लगन से परमेश्वर से प्रतिज्ञा के पूरे होने की विनती करते हैं। न ही उन्होंने उनके सामने यह निश्चय रखा कि यदि वे शर्तें पूरी करें तो यह आशीष उन्हें अवश्य मिलेगी। वह उपदेश अधिकांश बातों में अच्छा था; परन्तु मेरे विचार में श्रोता इस बपतिस्मा को सच्चे मन से खोजने के लिये न कोई प्रोत्साहन और न कोई दायित्व-बोध लेकर लौटे। जो उपदेश मैं सुनता हूँ उनमें यह एक आम दोष है। उनमें शिक्षा की बहुत सी बातें होती हैं; परन्तु वे साधनों के उपयोग के विषय में मंडली पर न तो दायित्व का बोध छोड़ते हैं और न बड़े प्रोत्साहन की भावना। उनका समापन बहुत दोषपूर्ण होता है। वे न तो विवेक को दबाव में छोड़ते हैं और न सारे मन को आशा की प्रेरणा में। सिद्धान्त प्रायः अच्छा होता है, परन्तु “तो फिर क्या?” प्रायः छूट जाता है। बहुत से पादरी और धर्म का अंगीकार करनेवाले लोग इस उपलब्धि की उपेक्षा के विषय में सिद्धान्त गढ़ते, आलोचना करते और अपनी उपेक्षा को उचित ठहराने का प्रयत्न करते दिखाई देते हैं। प्रेरितों और दूसरे मसीहियों ने ऐसा नहीं किया।
यह ऐसा प्रश्न नहीं था जिसे वे अपने हृदय से ग्रहण करने से पहले अपनी बुद्धि से समझ लेने का प्रयत्न करते। उनके लिये, जैसा हमारे लिये भी होना चाहिए, यह एक प्रतिज्ञा पर विश्वास करने का प्रश्न था। मैं देखता हूँ कि बहुत से लोग शुद्ध अनुभव के प्रश्नों को अपनी बुद्धि से पकड़ने और एक सिद्धान्त के रूप में सुलझाने का प्रयत्न कर रहे हैं। वे उस बात को बुद्धि से समझने के प्रयत्नों में स्वयं को उलझा रहे हैं जिसे विश्वास के द्वारा एक सचेत अनुभव के रूप में ग्रहण किया जाना है।
इस विशेष बात के विषय में कलीसिया में एक बड़े सुधार की आवश्यकता है। कलीसियाओं को इस विषय के तथ्यों के प्रति जाग उठना चाहिए, और पादरियों तथा कलीसिया के अधिकारियों की योग्यताओं के सम्बन्ध में एक नया रुख, एक दृढ़ स्थान अपनाना चाहिए। उन्हें किसी ऐसे व्यक्ति को पास्टर के रूप में नियुक्त करने से इन्कार कर देना चाहिए जिसकी इस पद के लिये इस विषय में योग्यता से वे भली-भाँति सन्तुष्ट न हों।
उसकी सिफ़ारिश में और चाहे जो कुछ भी हो, यदि उसका पिछला लेखा यह नहीं दिखाता कि उसके पास आत्माओं को मसीह के लिये जीतने का यह सामर्थ का वरदान है, तो उन्हें उसे अयोग्य समझना चाहिए। पहले
