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है। यदि सार्वजनिक समाचार-पत्रों में नैतिक विवेचन की कमी है, तो प्रचार-मंच इसके लिए उत्तरदायी है। यदि कलीसिया पतित और सांसारिक है, तो प्रचार-मंच इसके लिए उत्तरदायी है। यदि संसार धर्म में अपनी रुचि खो देता है, तो प्रचार-मंच इसके लिए उत्तरदायी है। यदि हमारे विधान-भवनों में शैतान राज्य करता है, तो प्रचार-मंच इसके लिए उत्तरदायी है। यदि हमारी राजनीति इतनी भ्रष्ट हो जाती है कि हमारी शासन-व्यवस्था की नींव ही ढहने को तैयार है, तो प्रचार-मंच इसके लिए उत्तरदायी है। मेरे प्रिय भाइयो, आइए, हम इस तथ्य की अनदेखी न करें; वरन् इसे मन में रखें, और इस राष्ट्र की नैतिकता के सम्बन्ध में अपने उत्तरदायित्व के प्रति पूरी तरह जागरूक हो जाएँ।
