अध्याय 6 (68 में से)

स्वयं ज्ञात थीं। यह मानवीय विद्या और संस्कृति की सामर्थ नहीं थी, क्योंकि उनके पास

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स्वयं ज्ञात थीं। यह मानवीय विद्या और संस्कृति की सामर्थ नहीं थी, क्योंकि उनके पास वह बहुत थोड़ी थी। यह मानवीय वाक्पटुता की सामर्थ नहीं थी, क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि उनमें वह भी बहुत थोड़ी थी। यह परमेश्वर था जो उनमें और उनके द्वारा बोल रहा था। यह ऊपर से सामर्थ थी — परमेश्वर उनमें रहकर उन लोगों पर उद्धार देनेवाली छाप डाल रहा था जिनसे वे बात करते थे। उद्धार देनेवाली छाप डालने की यह सामर्थ उनके साथ और उन पर बनी रही। निस्सन्देह यही वह बड़ी और मुख्य बात थी जिसकी प्रतिज्ञा मसीह ने की थी, और जिसे प्रेरितों और आरम्भिक मसीहियों ने पाया। तब से कलीसिया में यह कम या अधिक मात्रा में बनी रही है। यह एक रहस्यमय तथ्य है जो प्रायः अत्यन्त आश्चर्यजनक रीति से प्रकट होता है।

कभी-कभी एक अकेला वाक्य, एक शब्द, एक संकेत, या केवल एक दृष्टि भी इस सामर्थ को ऐसी रीति से पहुँचा देती है कि लोग उसके आगे हार मान लेते हैं।

केवल परमेश्वर की महिमा के लिए मैं इस विषय में अपने अनुभव की थोड़ी-सी बात कहूँगा। 10 अक्टूबर की सुबह मेरा सामर्थी रीति से मन-परिवर्तन हुआ। उसी दिन शाम को, और अगले दिन सुबह, मैंने पवित्र आत्मा के ऐसे प्रबल बपतिस्मे पाए जो, जैसा मुझे लगा, मेरी देह और प्राण के आर-पार निकल गए। मैंने तुरन्त अपने आप को ऊपर से ऐसी सामर्थ से भरा हुआ पाया कि इधर-उधर लोगों से कहे गए थोड़े-से शब्द उनके तुरन्त मन-परिवर्तन का साधन बन जाते थे। मेरे शब्द मनुष्यों के प्राणों में काँटेदार तीरों के समान गड़ जाते प्रतीत होते थे। वे तलवार के समान काटते थे। वे हथौड़े के समान हृदय को तोड़ देते थे।

बहुत से लोग इसकी गवाही दे सकते हैं। प्रायः ऐसा होता था कि मेरा कहा हुआ कोई शब्द, जो मुझे याद भी न रहता, पाप का बोध जमा देता, और प्रायः लगभग तुरन्त मन-परिवर्तन का कारण बन जाता। कभी-कभी मैं अपने आप को इस सामर्थ से बहुत हद तक खाली पाता था। मैं बाहर जाकर लोगों से भेंट करता, और पाता कि मैं उद्धार देनेवाली कोई छाप नहीं डाल पा रहा हूँ। मैं उपदेश देता और प्रार्थना करता, और परिणाम वही रहता। तब मैं यह डर मानकर कि यह सामर्थ मुझसे चली गई है, निजी उपवास और प्रार्थना के लिए एक दिन अलग कर लेता, और इस प्रत्यक्ष खालीपन का कारण बड़ी व्याकुलता से खोजता। अपने आप को दीन करने और सहायता के लिए पुकारने के बाद वह सामर्थ अपनी पूरी ताज़गी के साथ मुझ पर लौट आती थी। यही मेरे जीवन का अनुभव रहा है।

ऊपर से मिलनेवाली इस सामर्थ के विषय में अपने अनुभव और अवलोकन के इतिहास से मैं एक पूरी पुस्तक भर सकता हूँ। यह चेतना और अवलोकन का एक तथ्य है, परन्तु एक बड़ा रहस्य है। मैंने कहा है कि कभी-कभी एक दृष्टि में भी परमेश्वर की सामर्थ होती है। मैंने बहुत बार यह देखा है। निम्नलिखित घटना इसे स्पष्ट करे। एक बार मैंने पहली बार एक कारखानोंवाले गाँव में प्रचार किया। अगली सुबह मैं वहाँ के काम-काज को देखने के लिए एक कारखाने में गया।

जब मैं बुनाई विभाग में पहुँचा तो मैंने युवतियों का एक बड़ा समूह देखा, जिनमें से कुछ, मैंने ध्यान दिया, मेरी ओर और फिर एक-दूसरे की ओर इस ढंग से देख रही थीं जिससे हँसी-ठट्ठे की भावना झलकती थी, और यह भी कि वे मुझे पहचानती थीं। परन्तु मैं उनमें से किसी को नहीं जानता था। जैसे-जैसे मैं उनके निकट पहुँचा जिन्होंने मुझे पहचान लिया था, उनके ओछेपन का प्रदर्शन और बढ़ता हुआ दिखाई दिया। उनकी चंचलता ने मुझ पर एक विचित्र छाप डाली; मैंने उसे अपने हृदय की गहराई तक अनुभव किया। मैं एकाएक रुक गया और उनकी ओर देखने लगा — न जाने किस प्रकार, क्योंकि मेरा सारा मन उनके दोष और उनके संकट के बोध में डूबा हुआ था। जब मैंने अपनी दृष्टि उन पर टिकाई, तो मैंने देखा कि उनमें से एक बहुत व्याकुल हो गई। एक धागा टूट गया। उसने उसे जोड़ने का प्रयत्न किया; परन्तु उसके हाथ ऐसे काँप रहे थे कि वह उसे जोड़ न सकी। मैंने तुरन्त देखा

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