अध्याय 38 (68 में से)

15. इस काम के लिए परमेश्वर की ओर से बुलाए जाने के कारण, अपनी बुलाहट को अपना निरन्तर तर्क बनाइए

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15. इस काम के लिए परमेश्वर की ओर से बुलाए जाने के कारण, उन सब बातों के लिए जिनकी आपको इस काम को पूरा करने में आवश्यकता है, अपनी बुलाहट को परमेश्वर के सामने अपना निरन्तर तर्क बनाइए।

16. परिश्रमी और मेहनती बनिए, “समय और असमय।”

17. अपने सब प्रकार के सुननेवालों से उनके उद्धार के प्रश्न पर बहुत बातचीत कीजिए, ताकि आप उनके विचारों, भूलों और आवश्यकताओं को समझ सकें। उनके पूर्वाग्रहों, अज्ञानता, स्वभाव, आदतों का, और जो कुछ भी आपको जानना आवश्यक है ताकि आप अपनी शिक्षा को उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप ढाल सकें, उस सबका पता लगाइए।

18. ध्यान रखिए कि आपकी अपनी आदतें हर प्रकार से ठीक हों; कि आप सब बातों में संयमी हों—तम्बाकू, शराब, नशीली वस्तुओं, या किसी भी ऐसी चीज़ के दाग़ या गन्ध से मुक्त हों जिसके कारण आपके पास लज्जित होने का कारण हो, और जो दूसरों के लिए ठोकर का कारण बन सकती हो।

19. “चंचल” न बनिए, बल्कि “प्रभु को सदा अपने सम्मुख रखिए।”

20. अपनी जीभ पर लगाम रखिए, और व्यर्थ तथा निष्फल बातचीत में न लगे रहिए।

21. अपने लोगों को सदा यह दिखाई दे कि आप उनके प्रति गम्भीर रूप से सच्चे और तत्पर हैं, मंच पर भी और उसके बाहर भी; और उनके साथ आपका दैनिक मेल-जोल सब्त के दिन दी गई आपकी गम्भीर शिक्षा को निष्फल न कर दे।

22. ठान लीजिए कि अपने लोगों के बीच “यीशु मसीह, वरन् क्रूस पर चढ़ाए हुए मसीह को छोड़” “और किसी बात को न जानेंगे”; और उन्हें यह समझने दीजिए कि मसीह के राजदूत होने के नाते, उनके साथ आपका काम पूरी तरह उनके प्राणों के उद्धार से सम्बन्ध रखता है।

23. निश्चय कीजिए कि आप उन्हें उपदेश से भी और उदाहरण से भी सिखाएँ। जो आप प्रचार करते हैं, उसका स्वयं पालन कीजिए।

24. स्त्रियों के साथ अपने मेल-जोल में विशेष रूप से सावधान रहिए, ताकि आपके भीतर लेशमात्र भी अशुद्धता का कोई विचार या सन्देह उत्पन्न न हो।

25. अपनी कमज़ोरियों की चौकसी कीजिए। यदि स्वभाव से आपका झुकाव मौज-मस्ती और हल्केपन की ओर है, तो इस दिशा में गिरने के अवसरों से सावधान रहिए।

26. यदि आप स्वभाव से उदास और अमिलनसार हैं, तो चिड़चिड़ेपन और रूखेपन से सावधान रहिए।

27. सब बातों में हर प्रकार के दिखावे और ढोंग से बचिए। जो होने का आप दावा करते हैं, वही बनिए, तब आपको “बनावटी रूप धरने” की कोई परीक्षा न होगी।

28. सरलता, सच्चाई और मसीही शिष्टता आपके सम्पूर्ण जीवन पर छाप लगाएँ।

29. हर दिन और हर रात बहुत-सा समय प्रार्थना में और परमेश्वर के साथ सीधी संगति में बिताइए।

यह आपको उद्धार के लिए एक सामर्थ बना देगा। कितनी भी विद्या और अध्ययन इस संगति की हानि की भरपाई नहीं कर सकते। यदि आप परमेश्वर के साथ संगति बनाए रखने में चूक जाते हैं, तो आप “और मनुष्यों के समान निर्बल” हैं।

30. इस भूल से सावधान रहिए कि नए जन्म के कोई साधन नहीं हैं, और परिणामस्वरूप, आत्माओं के नए जन्म में साधनों और लक्ष्यों का कोई सम्बन्ध नहीं है।

31. यह समझ लीजिए कि नया जन्म एक नैतिक, और इसलिए एक स्वैच्छिक परिवर्तन है।

32. यह समझ लीजिए कि सुसमाचार मनुष्यों के हृदयों को बदलने के योग्य बनाया गया है, और उसे बुद्धिमानी से प्रस्तुत करने पर आप पवित्र आत्मा के प्रभावशाली सहयोग की आशा कर सकते हैं।

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