अध्याय 49 (68 में से)

मैं अक्सर अपने आप से पूछता हूँ: “इसका क्या अर्थ हो सकता है कि हमारे इतने सारे ख़ूब पले-पोसे और अत्यन्त लोकप्रिय

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मैं अक्सर अपने आप से पूछता हूँ: “इसका क्या अर्थ हो सकता है कि हमारे इतने सारे ख़ूब पले-पोसे और अत्यन्त लोकप्रिय प्रचारक मनोरंजनों के पक्ष में इतनी अधिक वकालत कर रहे हैं?” वे कलीसिया को एक ऐसी दिशा में ले जाते प्रतीत होते हैं जिसमें वह सबसे अधिक संकट में है। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि साधारण पुरुष और स्त्रियाँ सहज ही उस दिशा में बहक जाते हैं, क्योंकि ऐसी शिक्षा उन असंख्य सांसारिक प्रलोभनों से ठीक मेल खाती है जो चारों ओर से कलीसिया के सामने आते रहते हैं। बाइबल इस विषय पर ऐसी शिक्षा से भरी है जो सांसारिक मनोरंजनों के पक्ष में दी जानेवाली इन दलीलों के बिल्कुल विपरीत है। ये शिक्षक हँसी-ठट्ठे, मौज-मस्ती, मज़ाक़, नाटकों और खेलों की, और ऐसी बातों की वकालत करते हैं जिनसे सांसारिक मन प्रेम रखते हैं और जिनका आनन्द लेते हैं; पर बाइबल संयम, स्वर्गीय मन, निरन्तर प्रार्थना, और परमेश्वर के साथ घनिष्ठ और सतत चाल का उपदेश देती है। बाइबल हर जगह यह मानकर चलती है कि सारा वास्तविक आनन्द जीवन के इसी मार्ग में पाया जाता है, कि मन की सारी सच्ची शान्ति परमेश्वर के साथ संगति में, और जीवन के निरन्तर और सर्वोच्च लक्ष्य के रूप में उसकी महिमा की खोज में अपने आप को सौंप देने में पाई जाती है। वह हमें जागते रहने का उपदेश देती है, और हमें बताती है कि हमें न्याय के दिन हर एक निकम्मी बात का लेखा देना होगा। वह कहीं भी हमें यह नहीं बताती कि हँसी-ठट्ठा और मौज-मस्ती विवेकपूर्ण आनन्द का स्रोत हैं; वह कहीं भी हमें यह आशा रखने के लिए प्रोत्साहित नहीं करती कि यदि हम मनोरंजनों की खोज में इधर-उधर भटकते फिरें, तो भी हम परमेश्वर के साथ घनिष्ठ चाल बनाए रख सकेंगे, और मन की शान्ति और पवित्र आत्मा में आनन्द पा सकेंगे। और क्या इस विषय पर बाइबल की शिक्षा मानवीय अनुभव से ठीक मेल नहीं खाती? क्या हमें इस बात की आवश्यकता है कि मंच (पल्पिट) सांसारिक मनोरंजनों का वकील बन जाए?

क्या मनुष्य की भ्रष्टता उस दिशा में प्रचारक की आवाज़ से उकसाए बिना ही पर्याप्त प्रबल नहीं है? क्या कलीसिया ने परमेश्वर और आत्माओं के लिए इतना कठिन परिश्रम किया है, क्या मसीही पापियों को आग में से खींच निकालने के अपने थका देनेवाले प्रयासों से इतने चूर हो गए हैं कि वे धार्मिक उत्साह के कारण पागल हो जाने के संकट में हैं, और उन्हें इस बात की आवश्यकता है कि मंच और छापाखाना मिलकर उनसे आग्रह करें कि वे एक ओर हटकर मनोरंजन खोजें और थोड़ी मौज-मस्ती करें?

इसका क्या अर्थ हो सकता है? अरे, क्या यह सच नहीं कि हमारे लगभग सारे संकट इसी ओर हैं? क्या अपनी वर्तमान दशा में मानव-स्वभाव इन दिशाओं की ओर इतनी प्रबलता से नहीं झुकता कि हमें सावधान रहने की, और कलीसिया को निरन्तर यह उपदेश देने की आवश्यकता है कि वह मनोरंजनों और मौज-मस्ती के पीछे बहककर अपने प्राणों का नाश न करे? पर प्रश्न पर लौटें: किसके लिए यह दासत्व है कि हमसे यह माँग की जाए कि हम जो कुछ करें, उस सब में परमेश्वर की सुइच्छा और महिमा पर ही एकमात्र दृष्टि रखें? किसे ऐसा करना कठिन लगता है? मसीह कहता है कि उसका जूआ सहज और उसका बोझ हलका है।

सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिए करने की माँग निश्चय ही मसीह के जूए के सिवा और कुछ नहीं है।

यह उसकी प्रकट की हुई इच्छा है। किसे यह जूआ कठिन और यह बोझ भारी लगता है? एक इच्छुक, प्रेम करनेवाले मन के लिए यह कठिन या भारी नहीं है।

यहाँ जिस बात की माँग की गई है, वह हर उस व्यक्ति के लिए स्वाभाविक और अनिवार्य है जो सचमुच परमेश्वर से प्रेम रखता है और सचमुच उद्धारकर्ता के प्रति समर्पित है। यीशु के प्रति भक्ति इसके सिवा और क्या है कि हृदय इस बात पर लगा हो कि

सब बातों में उसकी प्रेमपूर्ण आज्ञाकारिता करे? मसीही स्वतंत्रता इसके सिवा और क्या है कि मसीहियों को वह करने का सौभाग्य मिले जो करना उन्हें सबसे अधिक प्रिय है—अर्थात् सब बातों में अपने धन्य प्रभु की सुइच्छा को पूरा करना? आत्माओं को बचाने का काम छोड़कर मनोरंजन खोजने के लिए एक ओर हट जाना! मानो आत्माओं के उद्धार के लिए परिश्रम करने में जो सुख मिलता है, उससे बढ़कर कोई ऊँचा और दिव्य सुख हो सकता है। ऐसा नहीं हो सकता। इस संसार में उससे बढ़कर कोई ऊँचा आनन्द नहीं पाया जा सकता जो आत्माओं को

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