अध्याय 45 (68 में से)

पर्याप्त नहीं कि उनमें उस समय परमेश्वर का आदर करने और उसे प्रसन्न करने के सबसे अच्छे ढंग के रूप में लगा जा सकता हो

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पर्याप्त नहीं कि उनमें उस समय परमेश्वर का आदर करने और उसे प्रसन्न करने के सबसे अच्छे ढंग के रूप में लगा जा सकता हो; बल्कि उनमें वास्तव में परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च प्रेम से, उसकी महिमा करने के अन्तिम अभिप्राय के साथ लगा जाना चाहिए। तो यदि निर्दोष मनोरंजनों के विषय में सच्चा सिद्धान्त यही है, तो कोई भी पश्चाताप न करनेवाला पापी और कोई भी पीछे हटा हुआ मसीही एक क्षण के लिए भी यह न समझे कि उसके लिए किसी निर्दोष मनोरंजन में लगना सम्भव है। यदि यह सच होता, जैसा कि वह वृद्ध पादरी, जिसका

मैंने उल्लेख किया है, और बहुत-से अन्य लोग मानते प्रतीत होते हैं, कि पश्चाताप न करनेवाले पापी या पीछे हटनेवाले निर्दोष मनोरंजनों में लग सकते हैं और लगते हैं, तो ऐसे मनोरंजनों में लगना ही, उनमें उचित रूप से सही और निर्दोष होने के कारण, उस व्यक्ति में जिसका मन-परिवर्तन नहीं हुआ, हृदय के परिवर्तन को, और पीछे हटनेवाले में परमेश्वर की ओर लौटने को सम्मिलित करता। क्योंकि कोई भी मनोरंजन तब तक उचित नहीं है जब तक उसमें परमेश्वर के प्रति की गई प्रेम-सेवा के रूप में, और उसे प्रसन्न करने तथा उसकी महिमा करने के अभिप्राय से न लगा जाए। वह केवल प्रेम-सेवा ही न हो, बल्कि उसे करनेवाले के निर्णय में, वह उस समय परमेश्वर की सबसे अच्छी सेवा हो जो वह कर सकता है—ऐसी सेवा जो उस समय की जा सकनेवाली किसी भी अन्य सेवा से बढ़कर परमेश्वर को अधिक प्रसन्न करनेवाली और उसके राज्य के लिए अधिक उपयोगी हो।

जब मनोरंजनों में लगने का प्रश्न निर्णय के लिए सामने आए, तब इन तथ्यों को ध्यान में रखा जाए। और स्मरण रखिए, ऐसे सब मामलों में प्रश्न यह नहीं है, “इस प्रस्तावित मनोरंजन में क्या हानि है?” बल्कि यह है, “इससे क्या भलाई हो सकती है?” “क्या यह वह सबसे अच्छा ढंग है जिसमें मैं अपना समय बिता सकता हूँ?” “क्या यह परमेश्वर को, इस समय मेरे लिए सम्भव किसी भी अन्य बात से अधिक प्रसन्न करनेवाला और उसके राज्य के हित में अधिक होगा?” “यदि नहीं, तो यह निर्दोष मनोरंजन नहीं है, और मैं पाप किए बिना इसमें नहीं लग सकता।” अक्सर यह प्रश्न उठता है: “क्या हमें ऐसे मनोरंजनों की खोज कभी करनी ही नहीं चाहिए?” मैं उत्तर देता हूँ: ऐसी बातों की इच्छा से ऊपर उठकर जीना हमारा सौभाग्य भी है और हमारा कर्तव्य भी।

इस प्रकार की सब इच्छाएँ परमेश्वर की ज्योति में इतना अधिक जीने, और उसके साथ इतनी गहरी संगति रखने के द्वारा इतनी वश में हो जानी चाहिए कि ऐसे मनोरंजनों के लिए कोई रुचि ही न रहे।

निश्चय ही परमेश्वर की हर सन्तान का यह सौभाग्य है कि वह उसके साथ इतनी निकटता से चले, और उसके साथ इतनी दिव्य संगति बनाए रखे, कि उसे अपने आनन्द को सन्तोषजनक बनाने के लिए सांसारिक उत्तेजनाओं, खेलों, मन-बहलावों और मनोरंजक कार्यक्रमों की आवश्यकता ही अनुभव न हो। यदि कोई मसीही परमेश्वर के साथ संगति के अपने सौभाग्य का लाभ उठाता है, तो वह स्वाभाविक रूप से, और अपने नए स्वभाव की एक सहज प्रवृत्ति से, सांसारिक मनोरंजनों के पीछे जाने के आग्रहों को ठुकरा देगा। उसे ऐसे मन-बहलाव नीच, असन्तोषजनक, और यहाँ तक कि घृणित प्रतीत होंगे। यदि वह स्वर्गीय मन का है, जैसा उसे होना चाहिए, तो उसे ऐसा लगेगा कि वह नीचे उतरकर सांसारिक मनोरंजनों में आनन्द खोजने का जोखिम नहीं उठा सकता।

निश्चय ही, इससे पहले कि कोई मसीही सांसारिक खेलों और मन-बहलावों में आनन्द खोजने की आवश्यकता अनुभव करे या उसकी इच्छा रखे, उसका अपने पहले प्रेम से गिर जाना, और संसार की ओर लौट जाना अवश्य है। आत्मिक मन सांसारिक संगति में आनन्द नहीं खोज सकता। ऐसे मन को वह संगति अनिवार्य रूप से घृणित लगती है। सांसारिक संगति निष्कपट नहीं होती, वह खोखली है, और बहुत हद तक एक ढोंग है। सुख-विलास के लिए इकट्ठा हुए किसी सांसारिक जमावड़े की गपशप में आत्मिक मन को क्या रुचि हो सकती है? बिल्कुल नहीं। परमेश्वर के साथ संगति में रहनेवाले मन को उनकी सांसारिक आत्मा और उनके तौर-तरीके, उनकी बातचीत और मूर्खता घृणित और पीड़ादायक लगती है, क्योंकि वह इतनी प्रबलता से उनके प्राणों के नीचे की ओर जाने के झुकाव का, और उस अन्त का जो उनकी बाट जोह रहा है, स्मरण कराती है। इस प्रश्न के दोनों पक्षों का मुझे इतना स्पष्ट अनुभव हुआ है कि मैं समझता हूँ कि मुझसे भूल नहीं हो सकती। शायद बहुत कम लोग

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