अध्याय 23 (68 में से)

प्रबल प्रार्थना वह है जो उत्तर प्राप्त कर लेती है। प्रार्थनाएँ बोल देना प्रबल

यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

अध्याय 6 — प्रबल प्रार्थना — प्रबल प्रार्थना वह है जो उत्तर प्राप्त कर लेती है। प्रार्थनाएँ बोल देना प्रबल प्रार्थना करना नहीं है। प्रार्थना की प्रबलता उसकी मात्रा पर उतनी निर्भर नहीं करती जितनी उसके गुण पर। मैं नहीं जानता कि इस विषय तक पहुँचने का इससे अच्छा कोई मार्ग है कि मैं अपने मन-परिवर्तन से पहले के अपने अनुभव की एक घटना सुनाऊँ। मैं इसे इसलिये सुनाता हूँ क्योंकि मुझे डर है कि ऐसे अनुभव उन लोगों में, जिनका मन-परिवर्तन नहीं हुआ है, बहुत ही आम हैं।

मुझे स्मरण नहीं कि वकालत का अध्ययन आरम्भ करने से पहले मैं कभी किसी प्रार्थना-सभा में गया होऊँ। तब पहली बार मैं ऐसे पड़ोस में रहा जहाँ हर सप्ताह एक प्रार्थना-सभा होती थी। मैंने धर्म के विषय में न बहुत कुछ जाना था, न सुना था, न देखा था; इसलिये उसके विषय में मेरी कोई स्थिर राय नहीं थी। कुछ तो जिज्ञासा से, और कुछ इस विषय पर मन की एक बेचैनी के कारण, जिसे मैं ठीक-ठीक परिभाषित नहीं कर सकता था, मैंने उस प्रार्थना-सभा में जाना आरम्भ किया। लगभग उसी समय मैंने अपने जीवन की पहली बाइबल खरीदी, और उसे पढ़ना आरम्भ किया। उन प्रार्थना-सभाओं में जो प्रार्थनाएँ मैंने होते सुनीं, उन्हें मैंने उतने ध्यान से सुना जितना ऐसी ठंडी और औपचारिक प्रार्थनाओं को दिया जा सकता था। हर प्रार्थना में वे पवित्र आत्मा के दान और उसके उण्डेले जाने के लिये प्रार्थना करते थे। अपनी प्रार्थनाओं में भी और अपनी उन टिप्पणियों में भी, जो बीच-बीच में की जाती थीं, वे मान लेते थे कि वे परमेश्वर के साथ प्रबल नहीं होते। यह बात बिलकुल स्पष्ट थी, और इसने मुझे लगभग सन्देहवादी बना दिया था।

मुझे अपनी प्रार्थना-सभा में इतनी बार आते देखकर, एक अवसर पर अगुवे ने मुझसे पूछा कि क्या मैं नहीं चाहता कि वे मेरे लिये प्रार्थना करें। मैंने उत्तर दिया: “नहीं।” मैंने कहा: “मैं मानता हूँ कि मेरे लिये प्रार्थना की आवश्यकता है, परन्तु आपकी प्रार्थनाओं का उत्तर नहीं मिलता। आप स्वयं इसे स्वीकार करते हैं।” फिर मैंने प्रार्थना की प्रबलता के विषय में बाइबल जो कहती है, उसे देखते हुए इस तथ्य पर अपना आश्चर्य प्रकट किया।

सच तो यह है कि कुछ समय तक, प्रार्थना के विषय में मसीह की शिक्षा और इस प्रार्थना-सभा में सप्ताह-प्रति-सप्ताह मेरे सामने आनेवाले प्रत्यक्ष तथ्यों को देखते हुए, मेरा मन बहुत उलझन और सन्देह में रहा। क्या मसीह एक ईश्वरीय शिक्षक था? क्या उसने वास्तव में वह सिखाया जो सुसमाचार उसके नाम से बताते हैं? क्या उसका वही अर्थ था जो उसने कहा? क्या प्रार्थना सचमुच परमेश्वर से आशीषें प्राप्त करने में प्रभावी होती है? यदि हाँ, तो उस प्रार्थना-सभा में सप्ताह-प्रति-सप्ताह और महीने-प्रति-महीने जो मैं देखता था, उसका मैं क्या अर्थ लगाऊँ? क्या वे सच्चे मसीही थे? जो मैं सुनता था, क्या वह बाइबल के अर्थ में सच्ची प्रार्थना थी? क्या वह ऐसी प्रार्थना थी जिसका उत्तर देने की प्रतिज्ञा मसीह ने की थी? यहीं मुझे समाधान मिला।

मुझे निश्चय हो गया कि वे एक भ्रम में थे; कि वे प्रबल इसलिये नहीं होते थे क्योंकि उन्हें प्रबल होने का कोई अधिकार नहीं था। वे उन शर्तों को पूरा नहीं करते थे जिन पर परमेश्वर ने प्रार्थना सुनने की प्रतिज्ञा की थी। उनकी प्रार्थनाएँ ठीक वैसी ही थीं जिनका उत्तर न देने की परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की थी।

स्पष्ट था कि वे इस तथ्य को अनदेखा कर रहे थे कि वे प्रार्थना करते-करते स्वयं प्रार्थना के मूल्य के विषय में सन्देहवाद में जा पड़ने के खतरे में थे।

अपनी बाइबल पढ़ते हुए मैंने इस प्रकार की प्रकट की गई शर्तों पर ध्यान दिया:

↑