अध्याय 4 (68 में से)

प्रेरितों और भाइयों ने पिन्तेकुस्त के दिन इसे पाया। उन्होंने क्या पाया?

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अध्याय 2 - यह क्या है?

अध्याय 2 — यह क्या है?

प्रेरितों और भाइयों ने पिन्तेकुस्त के दिन इसे पाया। उन्होंने क्या पाया?

उस घटना के बाद उन्होंने कौन-सी सामर्थ का प्रयोग किया?

उन्होंने पवित्र आत्मा का एक सामर्थी बपतिस्मा पाया, ईश्वरीय प्रकाश में एक विशाल वृद्धि पाई। इस बपतिस्मे ने उन्हें अनेक प्रकार के वरदान दिए, जिनका उपयोग उनके काम को पूरा करने के लिए किया गया। इसमें स्पष्ट रूप से ये बातें सम्मिलित थीं: पवित्र जीवन की सामर्थ। आत्म-बलिदान के जीवन की सामर्थ। (इन बातों के प्रकट होने का उन लोगों पर बड़ा प्रभाव पड़ा होगा जिन्हें वे सुसमाचार सुनाते थे।) क्रूस उठानेवाले जीवन की सामर्थ। बड़ी नम्रता की सामर्थ, जिसे यह बपतिस्मा उन्हें हर जगह दिखाने के योग्य बनाता था। सुसमाचार के प्रचार में प्रेमपूर्ण उत्साह की सामर्थ। सिखाने की सामर्थ। प्रेमपूर्ण और जीवित विश्वास की सामर्थ। अन्य भाषाओं का वरदान। आश्चर्यकर्म करने की सामर्थ में वृद्धि। प्रेरणा का वरदान, अर्थात् बहुत-सी ऐसी सच्चाइयों का प्रकाशन जिन्हें वे पहले नहीं पहचानते थे। सुसमाचार का प्रचार करने और मसीह की आज्ञा पूरी करने के लिए नैतिक साहस की सामर्थ, चाहे इसका उन्हें कुछ भी मूल्य चुकाना पड़े।

उनकी परिस्थितियों में ये सब वरदान उनकी सफलता के लिए आवश्यक थे; परन्तु न तो अलग-अलग और न सब मिलकर ये वह ऊपर से सामर्थ थे जिसकी प्रतिज्ञा मसीह ने की थी, और जिसे उन्होंने स्पष्ट रूप से पाया। जो कुछ उन्होंने सफलता के सर्वोच्च, सर्वश्रेष्ठ और सबसे महत्वपूर्ण साधन के रूप में स्पष्ट रूप से पाया, वह था परमेश्वर और मनुष्य दोनों के

साथ प्रबल होने की सामर्थ, मनुष्यों के मनों पर उद्धार देनेवाली छाप जमा देने की सामर्थ। निस्सन्देह यही अन्तिम बात वह थी जिसकी प्रतिज्ञा, उनकी समझ में, मसीह ने की थी। उसने कलीसिया को संसार का मन-परिवर्तन कराकर उसे अपनी ओर लाने की आज्ञा दी थी। जिन बातों का मैंने ऊपर उल्लेख किया है वे सब केवल साधन थीं, जो उस उद्देश्य को कभी पूरा नहीं कर सकती थीं जब तक परमेश्वर की सामर्थ के द्वारा उनमें जीवन न डाला जाए और उन्हें प्रभावशाली न बनाया जाए। निस्सन्देह प्रेरित इस बात को समझते थे; और अपने आप को और अपना सब कुछ वेदी पर रखकर, उन्होंने अपने काम के प्रति पूर्ण समर्पण की आत्मा में अनुग्रह के सिंहासन को घेर लिया।

उन्होंने सचमुच पहले बताए गए वरदान पाए; परन्तु सर्वोपरि और मुख्य रूप से मनुष्यों पर उद्धार देनेवाली छाप डालने की यह सामर्थ पाई। यह उसी स्थान पर तुरन्त प्रकट हो गई। उन्होंने भीड़ से बात करना आरम्भ किया; और कहने में भी आश्चर्य लगता है, उसी घड़ी तीन हज़ार लोगों का मन-परिवर्तन हुआ। परन्तु ध्यान दीजिए, इस अवसर पर उनके द्वारा अन्य भाषाओं के वरदान को छोड़ कोई नई सामर्थ प्रकट नहीं हुई।

उस समय उन्होंने कोई आश्चर्यकर्म नहीं किया, और इन भाषाओं का उपयोग केवल अपनी बात समझाने के साधन के रूप में किया। यह ध्यान रहे कि आत्मा के जिन दूसरे वरदानों का ऊपर उल्लेख हुआ है, उन्हें प्रकट करने का समय उन्हें अभी मिला ही नहीं था। उस समय उन्हें पवित्र जीवन, या आत्मा के किसी सामर्थी अनुग्रह और वरदान को दिखाने का लाभ प्राप्त नहीं था। उस अवसर पर जो कुछ कहा गया, जैसा सुसमाचार में लिखा है, वह वैसी छाप कभी नहीं डाल सकता था जैसी उसने डाली, यदि उन्होंने उसे लोगों पर उद्धार देनेवाली छाप डालने की एक नई सामर्थ के साथ न कहा होता। यह सामर्थ प्रेरणा की सामर्थ नहीं थी, क्योंकि उन्होंने तो केवल कुछ ऐसी बातें बताईं जो उन्हें

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