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सांसारिक सुख का उतनी तीव्रता से आनन्द लेते होंगे जितना मैं अपने मन-परिवर्तन से पहले लेता था; पर मेरे मन-परिवर्तन ने, और उस आत्मिक बपतिस्मा ने जो उसके तुरन्त बाद हुआ, सांसारिक खेलों और मनोरंजनों की सारी इच्छा को पूरी तरह बुझा दिया। मैं एकाएक जीवन के एक बिल्कुल ही दूसरे स्तर पर और एक दूसरे ही प्रकार के आनन्द में उठा लिया गया। उस घड़ी से लेकर आज तक, जीवन के जिस ढंग, जिन मन-बहलावों, खेलों, मनोरंजनों और सांसारिक तौर-तरीकों से मुझे पहले इतना आनन्द मिलता था, वे न केवल मुझमें रुचि जगाने में असफल रहे हैं, बल्कि मुझे उनसे निश्चित अरुचि रही है। मैंने उन्हें सचमुच विवेकपूर्ण आनन्द के लिए कभी आवश्यक, या उसके अनुकूल भी, अनुभव नहीं किया। मैं घमण्ड से नहीं कहता; पर मसीह और उसके धर्म के आदर के लिए मुझे यह कहना ही होगा कि मेरा मसीही जीवन एक सुखी जीवन रहा है। इस जीवन में मनुष्यों के लिए जितना आनन्द पाना शायद सबसे अच्छा है, उतना आनन्द मुझे मिला है, और एक घड़ी के लिए भी मुझमें यह इच्छा नहीं हुई कि मैं पीछे लौटकर किसी ऐसी वस्तु में आनन्द खोजूँ जो संसार दे सकता है। पर कुछ लोग पूछ सकते हैं: “मान लीजिए कि हमें धर्म में पर्याप्त आनन्द नहीं मिलता, और हम सचमुच सांसारिक मनोरंजनों के पीछे जाना चाहते हैं। यदि हमारा ऐसा झुकाव है, तो क्या उसे तृप्त कर लेना भी उतना ही ठीक नहीं?” “क्या मनोरंजनों की लालसा मन में रखने की अपेक्षा उन्हें खोजने में कोई अधिक पाप है?” मैं उत्तर देता हूँ कि उनकी लालसा मन में कभी रखनी ही नहीं चाहिए। अनुग्रह के द्वारा मिस्र की मांस की हाँडियों, सांसारिक मन-बहलावों और समय नष्ट करनेवाले मनोरंजनों की भूख और प्यास से ऊपर उठना हर एक का सौभाग्य है, और इसलिए कर्तव्य भी। ऐसी लालसाओं में लिप्त होना निर्दोष नहीं है। किसी को यह नहीं पूछना चाहिए कि उस लालसा को तृप्त किया जाए या नहीं, बल्कि यह कि क्या उसे हटाकर उसकी जगह परमेश्वर और उसके राज्य की महिमा की लालसा को न बैठाया जाए।
मसीही होने का अंगीकार करनेवाले इस बात के लिए बाध्य हैं कि वे अपने अंगीकार के अनुरूप जीवन बनाए रखें। धर्म के आदर के लिए उन्हें सांसारिक अभिलाषाओं का इन्कार करना चाहिए; और उन्हें तृप्त करने का प्रयत्न करके संसार को यह ठट्ठा करने और कहने का अवसर नहीं देना चाहिए कि मसीही भी उन्हीं के समान संसार से प्रेम रखते हैं।
यदि धर्म का अंगीकार करनेवाले हृदय में पीछे हट गए हैं, और सांसारिक खेलों और मनोरंजनों की लालसा मन में रखते हैं, तो कर्तव्य और शालीनता का हर विचार उन्हें इस बात के लिए बाध्य करता है कि वे ऐसी भीतरी अभिलाषाओं के हर बाहरी प्रदर्शन से दूर रहें। कुछ लोगों का यह मत रहा है कि हमें कुछ हद तक संसार के तौर-तरीकों के अनुरूप चलना चाहिए—कम से कम इतना कि यह दिखाई दे कि हम संसार का और धर्म का, दोनों का आनन्द ले सकते हैं; और यह कि जिन्हें वे अपने निर्दोष मनोरंजन कहते हैं, उनसे मुँह मोड़कर हम उन प्राणों की दृष्टि में, जिनका मन-परिवर्तन नहीं हुआ, धर्म को घृणित बना देते हैं। पर हमें धर्म को वैसा ही प्रस्तुत करना चाहिए जैसा वह वास्तव में है—संसार से ऊपर उठकर जीने के रूप में, स्वर्गीय मन में निहित किसी बात के रूप में, ऐसी बात के रूप में जो इतना आत्मिक और स्वर्गीय आनन्द देती है कि सांसारिक मनुष्यों के नीच धन्धे और सुख अप्रिय और घृणित लगने लगते हैं। जिनका मन-परिवर्तन नहीं हुआ, उनके लिए यह एक दुःखद ठोकर का कारण है कि वे मसीही होने का अंगीकार करनेवालों को इस संसार से सुख या प्रसन्नता खोजते देखें। ऐसी खोज यीशु के धर्म का ग़लत चित्रण है। यह ध्यान से देखनेवाले बाहरी व्यक्ति को भटकाती, उलझाती और घबरा देती है। यदि वह कभी अपनी बाइबल पढ़ता है, तो उसे आश्चर्य हुए बिना नहीं रह सकता कि जो प्राण परमेश्वर से जन्मे हैं और उसके साथ संगति रखते हैं, उन्हें सांसारिक तौर-तरीकों और सुखों में कोई रुचि क्यों होनी चाहिए। तथ्य यह है कि विचारशील लोग, जिनका मन-परिवर्तन नहीं हुआ, मसीही होने का अंगीकार करनेवालों के उस वर्ग पर, जो इस संसार से आनन्द खोजता है, बहुत कम भरोसा रखते हैं या बिल्कुल नहीं रखते। वे भरोसा रखने का दावा कर सकते हैं, और ऐसे लोगों को यों ही उदार और अच्छे मसीही समझ सकते हैं। वे उनकी चापलूसी कर सकते हैं,
