अध्याय 43 (68 में से)

पिएँ क्योंकि हमें इसकी आवश्यकता है। परमेश्वर की व्यवस्था यह नहीं कहती, “जिस किसी वस्तु की तुम्हें आवश्यकता हो

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पिएँ क्योंकि हमें इसकी आवश्यकता है। परमेश्वर की व्यवस्था यह नहीं कहती, “जिस किसी वस्तु की तुम्हें आवश्यकता हो, उसे इसलिए खोजो कि तुम्हें उसकी आवश्यकता है”; बल्कि यह कहती है, “सब कुछ परमेश्वर और मनुष्य के प्रति प्रेम से करो।” एक दुष्ट मनुष्य स्वार्थ से खा-पी सकता है—अर्थात् अपनी देह को बलवन्त बनाने के लिए ताकि वह अपनी स्वार्थी योजनाओं को पूरा कर सके—पर यह खाना-पीना पाप होगा, भले ही उसे भोजन और पेय की आवश्यकता थी।

कुछ भी तब तक निर्दोष नहीं है जब तक वह परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च प्रेम और मनुष्य के प्रति समान प्रेम से उत्पन्न न हो, जब तक सर्वोच्च और अन्तिम प्रेरक-भाव परमेश्वर को प्रसन्न करना और उसका आदर करना न हो। दूसरे शब्दों में, निर्दोष होने के लिए, किसी भी मनोरंजन में इसलिए लगना आवश्यक है कि यह विश्वास हो कि उस समय वही परमेश्वर को सबसे अधिक प्रसन्न करनेवाला है, और उसका उद्देश्य परमेश्वर की सेवा करना हो, एक ऐसी बात के रूप में जो, सब बातों को ध्यान में रखते हुए, उस समय हमारे द्वारा किए जा सकनेवाले किसी भी अन्य काम से बढ़कर उसका आदर करेगी।

इसे मैं स्वयंसिद्ध मानता हूँ। तो फिर क्या? इससे यह निष्कर्ष निकलता है:

1. कि परोपकारी मनोरंजनों को छोड़ और कोई मनोरंजन निर्दोष नहीं हो सकता। मनोरंजन के लिए मछली पकड़ना और शिकार करना निर्दोष नहीं है। हम उसी कारण से मछली पकड़ सकते हैं और शिकार कर सकते हैं जिस कारण से हमें खाने-पीने की अनुमति है—अर्थात् शरीर को आहार पहुँचाने के लिए, ताकि हम परमेश्वर की सेवा में बलवन्त रहें। हम परमेश्वर की महिमा और उसके राज्य के हितों के लिए हानिकारक पशुओं को नष्ट करने के लिए शिकार कर सकते हैं। पर इन खेलों के प्रति किसी लालसा को तृप्त करने के लिए मछली पकड़ना और शिकार करना निर्दोष नहीं है। फिर, कोई भी ऐसा मनोरंजन निर्दोष नहीं हो सकता जिसमें उस बहुमूल्य समय को उड़ा दिया जाता है जिसे परमेश्वर की महिमा और मनुष्य की भलाई के लिए बेहतर ढंग से लगाया जा सकता था। जीवन छोटा है। समय बहुमूल्य है।

हमें जीने के लिए केवल एक ही जीवन मिला है। बहुत कुछ करना बाक़ी है। संसार अन्धकार में है। पापियों के एक पूरे संसार को ज्योति पहुँचानी है, और यदि सम्भव हो, तो उनका उद्धार करना है। हमसे यह माँग की गई है कि जब तक दिन है, हम काम करें।

हमारा आदेश और हमारा काम शीघ्रता की माँग करते हैं। कोई समय गँवाना नहीं है। यदि हमारे हृदय ठीक हैं, तो हमारा काम सुखद है। यदि वह ठीक रीति से किया जाए, तो वह सबसे ऊँचा आनन्द देता है और स्वयं सबसे ऊँचा मनोरंजन है। मनोरंजन के लिए ऐसा कोई भी भटकाव निर्दोष नहीं हो सकता जिसमें समय की अनावश्यक हानि हो। कोई भी मनुष्य, जो उस काम की महानता को समझता है जो किया जाना है, और उसे करने से प्रेम रखता है, ऐसे किसी भी मनोरंजन के लिए इधर-उधर नहीं भटक सकता जिसमें समय का अनावश्यक व्यय हो।

फिर, ऐसा कोई भी मनोरंजन निर्दोष नहीं हो सकता जिसमें प्रभु के धन का अनावश्यक व्यय हो। हमारा सारा समय और हमारा सारा धन प्रभु का है। हम प्रभु के हैं। हम समय और धन दोनों का उपयोग प्रभु के हितों और मनुष्य के सर्वोच्च हितों को बढ़ाने के लिए निर्दोषता से कर सकते हैं, जो प्रभु के ही हित हैं। पर हम इनमें से किसी का भी उपयोग अपने सुख और अपनी तृप्ति के लिए निर्दोषता से नहीं कर सकते। अपने सुख और मनोरंजन के लिए की गई महँगी यात्राएँ, जो केवल परमेश्वर की महिमा पर दृष्टि रखकर नहीं की जातीं, निर्दोष मनोरंजन नहीं, बल्कि पापपूर्ण हैं। फिर, न्याय के उपर्युक्त नियम के प्रकाश में, हम देखते हैं कि किसी ऐसे पापी के लिए, जिसका मन-परिवर्तन नहीं हुआ है, मनोरंजन का कोई भी रूप उचित नहीं है। उसमें कुछ भी निर्दोष नहीं है। जब तक वह पश्चाताप-रहित और अविश्वासी बना रहता है, और परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार परमेश्वर से और अपने पड़ोसी से प्रेम नहीं रखता, तब तक उसके लिए कोई भी काम-धन्धा या मनोरंजन निर्दोष नहीं है; सब कुछ पाप है।

और ठीक यहीं मुझे डर है कि बहुत-से लोग एक बड़े भ्रम में पड़कर काम कर रहे हैं। धर्म का अंगीकार करनेवाले बहुत-से लोग, और पादरी तक, जिस ढीले-ढाले ढंग से इस विषय को देखते हैं, वह आश्चर्यजनक और चिन्ताजनक है। कुछ समय पहले, एक उपदेश में, मैंने कहा था कि पापियों के लिए कोई भी उचित काम-धन्धा या निर्दोष मनोरंजन नहीं है। वहाँ उपस्थित एक वृद्ध पादरी ने

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