अध्याय 48 (68 में से)

पर कोई यह न सोचे कि वह किसी दूसरे पर सचमुच मसीही प्रभाव प्राप्त कर लेगा, यदि वह प्रकट करे

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पर कोई यह न सोचे कि वह किसी दूसरे की सांसारिक आकांक्षाओं के प्रति सहानुभूति प्रकट करके उस पर सचमुच मसीही प्रभाव प्राप्त कर लेगा।

अब, क्या यह नियम दासत्व का जूआ है? मुझे आश्चर्य नहीं कि इसने कुछ लोगों के मन में कम हलचल उत्पन्न नहीं की। कलीसिया के सुख-प्रेमी और सुख की खोज में रहनेवाले सदस्य इस नियम को अव्यावहारिक, एक जकड़-बन्द (स्ट्रेट-जैकेट), एक दासत्व समझते हैं। पर यह किसके लिए जकड़-बन्द और दासत्व है? किसके लिए यह अव्यावहारिक है? निश्चय ही यह उन लोगों के लिए नहीं है और नहीं हो सकता जो परमेश्वर से अपने सारे मन से और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखते हैं। एक सच्चा मसीही इसे निश्चय ही ऐसा नहीं समझ सकता, क्योंकि सब सच्चे मसीही परमेश्वर से सर्वोपरि प्रेम रखते हैं। परमेश्वर के हितों और उसकी सुइच्छा की तुलना में वे अपने हितों और अपने सुख को कुछ भी नहीं समझते। इसलिए वे मनोरंजनों की खोज तब तक नहीं कर सकते जब तक वे यह विश्वास न करें कि परमेश्वर ने उन्हें ऐसा करने के लिए बुलाया है। हमारे स्वभाव के एक नियम के अनुसार हम उन्हें प्रसन्न करना चाहते हैं जिनसे हम सर्वोपरि प्रेम रखते हैं। और हमारे स्वभाव के एक नियम के अनुसार ही, हम अपनी सबसे ऊँची प्रसन्नता उन्हें प्रसन्न करने में पाते हैं जिनसे हम सर्वोपरि प्रेम रखते हैं; और हम स्वयं को सबसे अधिक तब प्रसन्न करते हैं जब हम अपने आप को प्रसन्न करने का बिल्कुल प्रयत्न नहीं करते, बल्कि अपने सर्वोच्च स्नेह के पात्र को प्रसन्न करने का प्रयत्न करते हैं। इसलिए मसीही अपना सबसे ऊँचा आनन्द और अपना सबसे सच्चा सुख परमेश्वर को प्रसन्न करने में और अपने संगी मनुष्यों की भलाई की खोज में पाते हैं; और वे इस सेवा का और भी अधिक आनन्द लेते हैं, क्योंकि आनन्द वह नहीं जिसे वे खोजते हैं, बल्कि वह है जिसका अनुभव वे अपने स्वभाव के एक नियम के अनुसार अनिवार्य रूप से करते हैं।

यह मसीही चेतना का एक तथ्य है। सब मनोरंजनों में सबसे ऊँचा और सबसे शुद्ध मनोरंजन परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में पाया जाता है। निरे सांसारिक मनोरंजन ठण्डे और फीके हैं, और परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में जो आनन्द हम पाते हैं, उसकी तुलना में उनका नाम लेना भी योग्य नहीं। जो परमेश्वर से सर्वोपरि प्रेम रखता है, उसके लिए यह स्वाभाविक है कि वह मनोरंजनों को, और हर उस दूसरी वस्तु को जिसे हम खोजते हैं, परमेश्वर की महिमा को सर्वोपरि ध्यान में रखकर खोजे। तो फिर इस नियम को बहुत कठोर, मापदण्ड को बहुत ऊँचा रखनेवाला, और एक जकड़-बन्द और दासत्व क्यों समझा जाए?

तो फिर हम उन लोगों को कैसे समझें जो सांसारिक मनोरंजनों के पक्ष में इतनी अधिक वकालत करते हैं?

पिछले कुछ वर्षों में इस विषय पर मैंने जो कुछ सुना और पढ़ा है, उससे मैंने यह निष्कर्ष निकाला है कि मनोरंजनों की वकालत करनेवाले इन लोगों ने यह सोचा है कि परमेश्वर की सेवा की अपेक्षा इन मनोरंजनों से अधिक आनन्द मिल सकता है। वे मुझे एक वाक्य की याद दिलाते हैं जो बचपन में स्कूल में मुझे सुलेख के अभ्यास के लिए नमूने के रूप में मिलता था: “केवल काम और खेल बिल्कुल नहीं, जैक को बना दे सुस्त लड़का वहीं।” वे यह मानकर चलते प्रतीत होते हैं कि परमेश्वर की सेवा इस अर्थ में काम है कि वह एक बेगार और बोझ है; कि आत्माओं को मसीह के लिए जीतने के लिए परिश्रम करना, प्रार्थना करना और प्रचार करना, परमेश्वर के साथ संगति करना और धर्म के कर्तव्यों को पूरा करना इतना थका देनेवाला है—उबाऊ कहने की तो बात ही क्या—कि हमें बहुत-से छुट्टी के दिनों की आवश्यकता है; कि मसीह का प्रेम सन्तोषजनक नहीं है; कि जीवन को सहने योग्य बनाने के लिए हमें बार-बार सांसारिक मनोरंजनों का सहारा लेना पड़ता है। एक अवसर पर मसीह ने अपने चेलों से कहा: “अलग आकर थोड़ा विश्राम करो।” यह कोई आश्चर्य की बात नहीं जब हम सोचते हैं कि उनके चारों ओर अक्सर इतनी भीड़ रहती थी कि उन्हें अपना साधारण भोजन करने तक का समय नहीं मिलता था। पर वे मनोरंजन नहीं खोज रहे थे; केवल अपने प्रेम के परिश्रमों से विश्राम, और उन परिश्रमों में उन्हें निश्चय ही सबसे बड़ा आनन्द मिलता रहा होगा।

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