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इफिसियों 1:7-10 पर पहले अध्याय का चौथा उपदेश
"जिस में हमें उसके लहू के द्वारा छुटकारा, अर्थात् पापों की क्षमा, उसके उस अनुग्रह के धन के अनुसार मिली है; जिसे उसने सारे ज्ञान और समझ सहित हम पर बहुतायत से किया ; और अपनी इच्छा का भेद हमें बता दिया, जो उसकी उस सुमति के अनुसार है जिसे उसने अपने में ठहरा लिया था: कि समयों के पूरे होने का ऐसा प्रबन्ध हो कि जो कुछ स्वर्ग में है और जो कुछ पृथ्वी पर है, सब कुछ वह मसीह में एकत्र करे; हाँ, उसी में।" - इफिसियों 1:7-10
मैं पहले समझा चुका हूँ कि परमेश्वर के प्रेम को हमारा ग्रहण करना पूर्णतः उसके एकलौते पुत्र पर टिका है। स्वर्ग के स्वर्गदूत भी बिना किसी सिर और मध्यस्थ के परमेश्वर की सन्तानों के योग्य नहीं ठहरते। तब हमारी क्या दशा होगी, जो अपने नित्य के अधर्म के कामों से परमेश्वर के क्रोध को निरन्तर भड़काते रहते हैं (यशायाह 59:2)? वास्तव में हम तो सीधे उसके विरोध में खड़े हैं! इसलिए परमेश्वर को अवश्य ही हमें उसके एकलौते पुत्र के माध्यम से देखना होगा, नहीं तो उसे विवश होकर हम से बैर और घृणा रखनी पड़ेगी। संक्षेप में, हमारे पाप परमेश्वर और हमारे बीच ऐसी अलंघ्य खाई बना देते हैं कि उसके पास जाना और उसके प्रतापी क्रोध को अपने ऊपर तुरन्त अनुभव न करना असम्भव होगा, मानो वह हमें पूरी तरह नष्ट करने को तैयार खड़ा हो।
अब हमें इस पर विचार करना चाहिए कि परमेश्वर हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमें अनुग्रहपूर्वक अपनी कृपा में कैसे ग्रहण करता है। सन्त पौलुस यही बात यह जोड़कर कहता है कि "उसमें हमें उसके लहू के द्वारा छुटकारा, अर्थात् हमारे पापों की क्षमा, परमेश्वर के अनुग्रह के धन के अनुसार मिली है" (इफिसियों 1:7)। सबसे पहले हमें यह समझना चाहिए कि हमारे प्रति परमेश्वर की शत्रुता हमारे स्वभाव से नहीं, वरन् हमारी भ्रष्टता से उत्पन्न होती है। मैं कहता हूँ कि यह हमारे स्वभाव का प्रश्न नहीं है, क्योंकि जब परमेश्वर ने हमें रचा है, तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह हमारे अस्तित्व से ही घृणा नहीं कर सकता। परन्तु मनुष्य बुरी तरह कलुषित हो गया है और सब प्रकार की दुष्टता में फँसा हुआ है, इसलिए परमेश्वर को विवश होकर हमारा प्रचण्ड विरोधी बनना और तब तक हमारे विरुद्ध खड़ा रहना पड़ता है जब तक हमारे पापों का स्मरण उसकी दृष्टि से मिटा न दिया जाए। क्योंकि जब तक हम पुनःस्थापित नहीं किए जाते, हम अनन्त दण्ड के योग्य ही बने रहते हैं, इसलिए कि परमेश्वर, जो सारे न्याय और धार्मिकता का स्रोत है, उस बुराई से स्वभावतः घृणा करने को बाध्य है जो वह हम में देखता है। अतः जब तक हमारे पाप मिटाए नहीं जाते, तब तक हमारे लिए यह आशा रखना असम्भव है कि परमेश्वर हम पर अपनी कृपा या स्नेह प्रकट करेगा।
परन्तु ध्यान से देखें कि सन्त पौलुस परमेश्वर के साथ हमारे मेल-मिलाप को समझाने के लिए दो प्रमुख शब्द कैसे काम में लाता है। पहले वह फिरौती या छुटकारे की धारणा रखता है, जो मूलतः एक ही अर्थ रखती है। फिर वह पापों की क्षमा को प्रस्तुत करता है। तो परमेश्वर के क्रोध का शान्त होना, हमारे और उसके बीच मेल-मिलाप होना, और उसका हमें अनुग्रहपूर्वक अपनाना और अपनी सन्तान के रूप में स्वीकार करना कैसे होता है? सन्त पौलुस के अनुसार, हमारे पापों की क्षमा के द्वारा। फिर, क्योंकि क्षमा में छुटकारा स्वभावतः निहित है, इसलिए वह बुद्धिमानी से इन दोनों बातों को आपस में जोड़ देता है।
सच तो यह है कि परमेश्वर ने अपनी ही असीम दयालुता से हमारे पाप मिटा दिए और अपनी प्रचुर उदारता प्रकट की, और हम से किसी प्रतिफल की माँग नहीं की। भला कौन मरणहार मनुष्य अपने किए हुए छोटे-से-छोटे अपराध की भी भरपाई कर सकता है? चाहे हम में से हर एक अपना पूरा जीवन एक ही अपराध को सुधारने में लगा दे, और ऐसे प्रयासों से परमेश्वर का अनुग्रह पाना चाहे, तो भी यह स्पष्ट है कि यह कार्य हमारी सामर्थ्य से कहीं परे है। इसलिए परमेश्वर को हम पर बिना क्षतिपूर्ति या सन्तुष्टि माँगे दया करनी पड़ी। फिर भी यह क्षमा, जो हमें मुफ़्त दी गई, परमेश्वर के पुत्र को बड़े मूल्य पर पड़ी (1 पतरस 1:19)। उसे अपना ही लहू बहाने के सिवा और कोई मुद्रा न मिली; उसने देह और आत्मा दोनों से हमारा जमानती बनकर अपने आपको अर्पित किया, और हमारी मुक्ति दिलाने के लिए परमेश्वर के न्याय के सामने हमारा प्रतिनिधित्व किया। हमारे प्रभु यीशु मसीह ने इस कार्य को पूरे मन से अपनाया, और केवल बाहर से ही नहीं, अर्थात् मनुष्यों की दृष्टि में क्रूर और अपमानजनक मृत्यु के द्वारा, वरन् भीतर से भी, मानो स्वयं परमेश्वर ही उसका न्यायी हो, अपार पीड़ा सही। उसने पापियों की ओर से अपने आपको प्रस्तुत किया ताकि पूरा प्रायश्चित हो जाए। इसी कारण सन्त पौलुस ने इस स्थान पर इन दोनों शब्दों को जोड़ दिया है।
इसलिए हमें पहले यह पहचानना चाहिए कि जब तक हमारे पाप मिटाए न जाएँ और उनका स्मरण पूरी तरह लुप्त न कर दिया जाए, तब तक हम परमेश्वर से कोई अनुग्रह नहीं पा सकते और न वह हमें ग्रहण करेगा। जैसा पहले कहा जा चुका है, परमेश्वर पाप से जहाँ-कहीं वह रहता है घृणा करता है। अतः जब तक वह हमें पापी देखता है, तब तक उसे स्वभावतः हम से घृणा करनी ही होगी, क्योंकि हम में और हमारे स्वभाव में नाना प्रकार की बुराई और उथल-पुथल के सिवा कुछ नहीं है।
फलस्वरूप हम उसके विरोधी बने रहते हैं और वह हमारे विरुद्ध खड़ा रहता है, जब तक हम उस उपाय की ओर न फिरें जो सन्त पौलुस यहाँ प्रस्तुत करता है, अर्थात् हमारे पापों की क्षमा। इससे हम यह सीखते हैं कि कोई भी मनुष्य अपनी किसी अन्तर्निहित योग्यता के आधार पर परमेश्वर का प्रेम नहीं कमा सकता। जैसा पहले समझाया गया, परमेश्वर को हम पर नहीं, वरन् हमारे प्रभु यीशु मसीह पर दृष्टि जमाने की ओर झुकना होगा। और यह भी स्पष्ट है कि जब तक वह हमारे ऋण क्षमा करके हमें गोद न ले ले, तब तक हम उसके ग्रहण के योग्य नहीं, यद्यपि हम उसके सम्मुख मृत्यु के योग्य ठहरे हुए हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि उद्धार के विषय में हमारी समझ, जैसा जकर्याह का गीत हमें बताता है, परमेश्वर की दया और हमारे पापों की क्षमा में जड़ पकड़े हुए है, वे पाप जो हमें उसके विरोधी बनाते हैं (लूका 1:77)।
फिर भी हमें स्मरण रखना चाहिए कि परमेश्वर की मुफ़्त भलाई के द्वारा हमारे पापों की पूरी क्षमा हमारे प्रभु यीशु मसीह द्वारा चुकाई गई फिरौती के बिना नहीं दी जाती। यह फिरौती सोने या चाँदी की नहीं है, जैसा सन्त पतरस अपनी पहली पत्री (1:18) में कहता है, परन्तु इसी के लिए निष्कलंक मेमने का अपने आपको अर्पित करना अनिवार्य था। इसलिए जब कभी हम परमेश्वर की कृपा और दया चाहें, तो अपना पूरा ध्यान हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग पर लगाएँ, जहाँ हमें परमेश्वर के क्रोध को शान्त करने का उपाय मिलता है। इसके अतिरिक्त, जब हमारे पाप ऐसे मूल्य और प्रायश्चित के द्वारा मिटाए जाते हैं, तो हमें समझना चाहिए कि परमेश्वर से अपना मेल कराने के लिए हम अपनी ओर से कुछ भी योगदान नहीं दे सकते। इसमें हम देखते हैं कि शत्रु ने चतुराई से जगत में उद्धार की सारी आशा को यह मत फैलाकर कैसे कमज़ोर कर दिया है कि हर व्यक्ति को अपना छुटकारा आप करना और परमेश्वर से अपना मेल आप कराना है। पोप-मत की शिक्षाओं में इसी को लोग भले कर्म, पुण्य और सद्गुण कहते हैं। तो फिर उन सारे जटिल आविष्कारों का प्रयोजन क्या है जो उन्होंने गढ़ लिए हैं? वे निरन्तर आत्म-दमन क्यों करते हैं, और बिना थके नाना प्रकार के कार्य और अनुष्ठान क्यों करते रहते हैं? इन सब प्रयत्नों का उद्देश्य परमेश्वर को मनाना है। इसलिए पोप-मत की शिक्षा में जितने सद्गुणों के काम माने जाते हैं, वे पापों का प्रायश्चित करने की विधियों के सिवा और कुछ नहीं हैं।
परन्तु ऐसी मनोवृत्ति उसी छुटकारे को व्यर्थ कर देती है जिसकी चर्चा सन्त पौलुस यहाँ करता है। ये दो बातें, अर्थात् परमेश्वर का हमारे पापों को अपनी स्मृति से मिटा देना और समुद्र की गहराइयों में फेंक देना, और उसके एकलौते पुत्र की देह में चुकाए गए मूल्य को स्वीकार करना, आपस में घनिष्ठ रूप से गुँथी हुई हैं। हम एक को दूसरे के बिना नहीं पा सकते। इसलिए यदि हम परमेश्वर की कृपा चाहते हैं, तो हमें स्वीकार करना होगा कि हम उसके विरोधी हैं, जब तक कि वह अपनी असीम दया से हमारे सब ऋण क्षमा न कर दे। इसके अतिरिक्त हमें उस प्रमुख भूमिका को भी पहचानना चाहिए जो हमारे प्रभु यीशु मसीह अपने और हमारे बीच मध्यस्थ के रूप में निभाता है। अपनी बलिदानी मृत्यु के द्वारा वह हमारे लिए सनातन प्रायश्चित सुनिश्चित करता है, और इसी प्रायश्चित में हमें सदा शरण लेनी चाहिए।
वास्तव में हमारे प्रभु यीशु मसीह का सारा जीवन हमारी फिरौती है, क्योंकि जो आज्ञाकारिता उसने इस जगत में परमेश्वर अपने पिता के प्रति दिखाई, उसने आदम के अपराध की और उन सब अधर्मों की भरपाई कर दी जिनके हम ऋणी ठहरे हैं। फिर भी सन्त पौलुस यहाँ विशेष रूप से उसके लहू का उल्लेख करता है, क्योंकि हमें उसकी मृत्यु और दुःखभोग की ओर ध्यान लगाना है, जो वह साधन है जिससे हमारे सब पाप धोए जाते हैं। इसी कारण परमेश्वर ने व्यवस्था की विधियों में यह ठहराया कि उसके साथ मेल-मिलाप इसी मार्ग से हो सकता है।
यह सच है कि यीशु मसीह ने अपनी मृत्यु में केवल अपना लहू ही नहीं बहाया, वरन् उन भयों और आतंकों को भी सहा जो उचित रूप से हमारे थे। फिर भी सन्त पौलुस इस सारी बात को एक ही शीर्षक के अन्तर्गत समेट लेता है, जैसा पवित्र शास्त्र में रीति है। सारांश यह कि हमें अपनी धार्मिकता केवल परमेश्वर के उस दया-प्रदर्शन में खोजना सीखना चाहिए, जो उसकी अपनी भलाई से हमें मुफ़्त मिलती है। हमें यह दुस्साहस नहीं करना चाहिए कि अपना कोई सद्गुण उसके सम्मुख रखकर उस पर ऋण का दावा करें। हमारे लिए यही पर्याप्त हो कि वह हमें अपने प्रेम में ग्रहण करता है, हमारी अपनी योग्यता के कारण नहीं, परन्तु इसलिए कि हमारे पापों का स्मरण उसकी उपस्थिति से सदा के लिए हटा दिया गया है। हमें जानना चाहिए कि यह केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग के द्वारा ही हो सकता है, और इसी नींव पर हमें पूरी तरह भरोसा रखना चाहिए।
इसके अतिरिक्त सन्त पौलुस इस बात पर बल देता है कि "सब कुछ परमेश्वर के अनुग्रह के धन के अनुसार हुआ है।" परमेश्वर की उस दया को जिससे वह हमें कृपापूर्वक ग्रहण करता है, उभारने का उसके पास ठोस कारण है। एक ओर हम देखते हैं कि लोग अपने मूर्खतापूर्ण आत्म-विश्वास से कैसे अपने आपको धोखा देते हैं। अधिकांश लोग सदा से यह मानते आए हैं कि वे अपने पापों की भरपाई अपने सन्तुष्टि-कर्मों और अन्य अनेक उपायों से कर सकते हैं। मनुष्य की आत्म-प्रवंचना की इसी प्रवृत्ति के उत्तर में सन्त पौलुस इन भ्रान्तियों को दूर करने के लिए कहता है कि हमें परमेश्वर के अनुग्रह की असीम सम्पदा से अभिभूत हो जाना चाहिए। वह सीधे इतना कह सकता था कि परमेश्वर सब कुछ अपने अनुग्रह से करता है, परन्तु बड़े भण्डारों का उल्लेख करके वह लोगों को इस भ्रम से रोकना चाहता है कि जब उनकी आवश्यकता लाखों की है, तब वे कौड़ियाँ लाकर चुका सकते हैं। सच तो यह है कि जब पोप-मत के अनुयायी अपने सन्तुष्टि-कर्मों की बात करते हैं, तो वे यह दावा नहीं करते कि वे हर रूप में पूर्ण हैं। वे तो यह भ्रमपूर्ण विश्वास रखते हैं कि हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग के अतिरिक्त वे अपने योगदान भी उसमें जोड़ सकते हैं। वे भ्रम से मानते हैं कि परमेश्वर को सन्तुष्ट और प्रसन्न करने के लिए वे थोड़ा-थोड़ा करके नाना कर्म कर सकते हैं। इस प्रकार हम पोप-मत की शिक्षाओं में यही छलपूर्ण दृष्टिकोण फैला हुआ देखते हैं, जहाँ वे मिस्सों पर भरोसा करते हैं, अनेक प्रार्थनाएँ दोहराते हैं, तीर्थयात्राओं पर निकलते हैं, नाना पर्व मनाते हैं, भाँति-भाँति की भक्ति-क्रियाओं में लगते हैं, और टाट के बाल-वस्त्र तक पहनते हैं, और यह सब इस भ्रान्त आशय से कि हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग को पूरा करें, मानो वह अपर्याप्त हो।
फिर भी सन्त पौलुस हमें स्मरण दिलाता है कि परमेश्वर की भलाई, जैसी यीशु मसीह में प्रकट हुई, एक अथाह निधि है जो और सब कुछ को फीका कर देती है। जब हम उस असीम कृपा पर विचार करते हैं जो परमेश्वर हम पर करता है, तब यह सोचना दुस्साहस है कि हमारे तुच्छ कर्म, जैसे तीर्थयात्राएँ और अन्य भक्ति-क्रियाएँ, कोई मूल्य या पुण्य रखते हैं। क्या यीशु मसीह का लहू हमारे उद्धार का मूल्य और फिरौती होने के लिए अपर्याप्त है? एक ओर सन्त पौलुस उन व्यर्थ धारणाओं को मिटाना चाहता था जिनमें लोग मानते हैं कि वे सन्तुष्टि-कर्मों और भुगतानों से परमेश्वर के क्रोध को शान्त कर सकते हैं। दूसरी ओर वह हमारी दुर्बलता की सहायता करना चाहता था। यद्यपि हम अपने सद्गुणों के विषय में बड़ी-बड़ी धारणाएँ रखने और अपने आपको यह समझाने की ओर झुके रहते हैं कि परमेश्वर हमारा बहुत ऋणी है, फिर भी सच्ची प्रार्थना और परमेश्वर पर भरोसे के क्षणों में शैतान हमें निराशा में डालने की परीक्षा दे सकता है। हम पर ऐसी परीक्षाएँ और क्लेश आ सकते हैं जो हमें इतना हतोत्साह कर दें कि पवित्र शास्त्र की सारी प्रतिज्ञाएँ और हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग के विषय में हमें जो कुछ सुनाया जाता है, वह हमें आशा देने में विफल हो जाए। इसलिए सन्त पौलुस अविश्वास के इस गहरे जमे हुए दोष का सामना करने के लिए परमेश्वर की भलाई की विशाल निधियाँ प्रस्तुत करता है, ताकि हमारा आत्म-अभिमान पूरी तरह डूब जाए। परमेश्वर हम पर ऐसी असीम कृपा प्रकट करने को झुक आता है।
आगे वह जोड़ता है कि "उसने उसी अनुग्रह को सारे ज्ञान और समझ सहित हम पर बहुतायत से किया है।" इन शब्दों के द्वारा वह उस साधन को प्रकट करता है जिससे हम वह पा सकते हैं जिसकी चर्चा उसने पहले की। हमारा परम सुख और कल्याण परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप पर निर्भर है, ताकि वह हमें अपनी सन्तान के रूप में पहचाने और हम पूरी स्वतन्त्रता से उसे अपना पिता कह सकें। परन्तु जब हम इससे इतनी दूर हैं, तो इसे कैसे पा सकते हैं? यद्यपि हम सर्वथा अयोग्य हैं और कुछ भी कर पाने में असमर्थ हैं, फिर भी कहा गया है कि यीशु मसीह में हमें वह सब कुछ मिलेगा जो हम में घटता है। उसकी मृत्यु और दुःखभोग हमारे सब अपराधों की स्मृति मिटाने के लिए बलिदान के रूप में पर्याप्त होगा।
परन्तु क्या इससे यह निकलता है कि सब मनुष्य उस लाभ में सहभागी हैं जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमारे लिए प्राप्त किया? नहीं, क्योंकि अविश्वासियों का उसमें कोई भाग नहीं। यह उन्हीं का विशेष अधिकार है जिन्हें परमेश्वर अपने पास इकट्ठा करता है। सन्त पौलुस विश्वास की अनिवार्य भूमिका पर भी बल देता है, जिसके बिना मसीह का बलिदान हमारे लिए कुछ भी लाभकारी न होगा [गलातियों 5:4]। अतः जब हम समझ लें कि मसीह हमारे लिए कौन-सी आशीषें लाया है और अपने सुसमाचार के द्वारा प्रतिदिन हमें अर्पित करता है, तो हमें विश्वास के द्वारा उससे जुड़ जाना चाहिए। क्योंकि यहूदी, तुर्क, पोप-मत के अनुयायी और इन जैसे अन्य लोग मसीह से कटे हुए हैं और अपनी ही भ्रष्टता में पड़े सड़ रहे हैं, क्योंकि वे समझते हैं कि आश्चर्यकर्म वे स्वयं कर लेंगे। पोप-मत के अनुयायियों, यहूदियों, तुर्कों और सब प्रकार के अन्यजातियों में यह सामान्य सिद्धान्त है कि उन्हें परमेश्वर के क्रोध को शान्त करना है। और वे यह कैसे करना चाहते हैं? अपने ही गढ़े हुए अनेक उपायों से, हर कोई अपनी ही कल्पनाएँ गढ़ता हुआ। ऐसे लोगों का मसीह में कोई भाग नहीं। इसलिए यदि विश्वास वह कुंजी है जो उस निधि तक पहुँचने का द्वार खोलती है जिसका वर्णन सन्त पौलुस ने अभी किया है, तो विश्वास के द्वारा हम अपने उद्धार के लिए पर्याप्त रूप से धनी किए जाएँगे और क्योंकि मसीह से जुड़े होने पर हमें किसी बात की घटी न होगी।
तो भी सन्त पौलुस ने ये दो शब्द, "ज्ञान" और "समझ", जो प्रयोग किए हैं, उसका एक बड़ा कारण है। वे दर्शाते हैं कि सुसमाचार की शिक्षा हमारी पूरी उन्नति के लिए पर्याप्त है, और उसमें जो कुछ जोड़ा जाए वह केवल कूड़ा, गन्दगी और सड़न है। सार यह कि सन्त पौलुस का सुसमाचार को ऐसे आदरणीय शब्दों से सम्बोधित करना यह सूचित करता है कि हर एक को नम्रता से वह सुनना चाहिए जो परमेश्वर अपने एकलौते पुत्र के द्वारा प्रदान करता है। हमें इतना ग्रहणशील होना चाहिए कि जो उसके मुख से निकलता है उससे आगे कोई ज्ञान होने का दावा न करें। पूरी सरलता से, जो कुछ वह सिखाए उसे हमें मान लेना चाहिए, चाहे सारा संसार हमें ठुकराए और हमारा विरोध करे। हमें संसारी ज्ञान को अत्यधिक आदर नहीं देना चाहिए, जैसा बहुत लोग करते हैं, जिनके कान खुजलाते रहते हैं और जो सदा नई बात की खोज में रहते हैं। इसलिए ऐसा न हो कि हम हल्के बनें या अत्यधिक ज्ञान की अनुचित लालसा रखें, तो ध्यान से देखें कि सन्त पौलुस यहाँ कैसे दृढ़ता से कहता है कि यदि हमने सुसमाचार से लाभ उठाया है, तो हमें अपनी आवश्यकता का सारा ज्ञान उसी में मिलेगा। फलस्वरूप हमें अन्य सब शिक्षाओं को ठुकरा देना चाहिए, केवल अनावश्यक मानकर ही नहीं, वरन् हानिकारक मानकर, क्योंकि वे हमें उस शुद्ध शिक्षा से दूर ले जा सकती हैं जिसके द्वारा परमेश्वर हमें अपने साथ जोड़ना चाहता है। संक्षेप में, सन्त पौलुस दिखाना चाहता है कि जब परमेश्वर हमें अपने एकलौते पुत्र यीशु मसीह के ज्ञान में बुलाता है, तब वह हम पर असीम कृपा करता है। जब वह हमें मिल गया, तो हमें और सब कुछ की ओर से आँखें मूँद लेनी चाहिए और अधिक जानने की मूर्खतापूर्ण इच्छा में नहीं खो जाना चाहिए, क्योंकि हमारे ज्ञान की पूर्णता हमारे प्रभु यीशु मसीह को जानने में है।
अब विचार करें कि सन्त पौलुस ने कुलुस्सियों के सामने अपने आपको विश्वासयोग्य शिक्षक क्यों घोषित किया, ताकि उन्हें ज्ञान की पूर्णता तक पहुँचाए। यद्यपि उसने स्वीकार किया कि उसकी बोली अनगढ़ और सादी है [2 कुरिन्थियों 11:6], उसमें वह संसारी ज्ञान और वाक्पटुता नहीं जिसकी समाज में प्रशंसा होती है, फिर भी उसने कहा कि यदि उसकी शिक्षाएँ ग्रहण की जाएँ, तो वे पाएँगे कि उनकी आत्माओं के पूरे पोषण के लिए उसमें भरपूर सामग्री है, और उसमें कुछ जोड़ने की आवश्यकता नहीं। आज जब हम ये वचन सुनते हैं, तो हमें चेतावनी माननी चाहिए कि अपनी उस अतृप्त और मूर्खतापूर्ण जिज्ञासा पर लगाम लगाएँ जो हमारे भीतर गहरी जमी हुई है। इसके बदले हमें शुद्ध सुसमाचार की शिक्षा से लिपटे रहना और पूरी तरह उसी पर टिके रहना चाहिए। इस स्थल से यही मूल शिक्षा लेनी है।
इसके अतिरिक्त, जिस बात की चर्चा मैं पहले कर चुका हूँ उसे पहचानें: जब-जब सुसमाचार का प्रचार होता है, तब-तब परमेश्वर का अनुग्रह हमें दिया जाता है। यदि हम उसकी दयालुता और उदारता को मानते हैं, जैसा इससे प्रकट है कि वह वर्षा देकर पृथ्वी को हमारे शारीरिक पोषण के लिए उपजाऊ बनाता है, तो हमें समझना चाहिए कि जब परमेश्वर हमारे पास उद्धार का सन्देश भेजता है, तब वह न केवल हमारी आत्माओं के कल्याण के लिए हमें तरोताज़ा करता है, वरन् हमें इतना गहरा पीने भी देता है कि हम पूरी तरह तृप्त हो जाएँ। सन्त पौलुस केवल यह नहीं कहता कि जब हम बंजर हों तब सुसमाचार हमें कुछ राहत देता है; वह उसकी तुलना इस बात से करता है कि परमेश्वर हम पर जल की बहुतायत बरसाता है। इसके द्वारा हम केवल तरोताज़ा ही नहीं किए जाते, वरन् पोषित भी होते हैं और अन्त तक टिके रहने की शक्ति पाते हैं। इसलिए जब परमेश्वर सुसमाचार के द्वारा हमें अपनी ओर खींचता है, तब हमें उसकी भलाई को अत्यन्त मूल्यवान समझना चाहिए, और जानना चाहिए कि इसी साधन से हम उन लाभों के अधिकारी हो जाते हैं जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमारे लिए प्राप्त किए। वह उन्हें अपने वचन के द्वारा हमें अर्पित करता है, और चाहता है कि हम उन्हें विश्वास के द्वारा ग्रहण करें।
इस विषय के और विस्तार के लिए सन्त पौलुस तुरन्त जोड़ता है कि परमेश्वर के कार्य उसकी इच्छा के भेद के प्रकटीकरण से, उसकी अपनी सुमति के अनुसार और अपने ही भीतर पहले से ठहराए हुए संकल्प के अनुसार चलते हैं। इससे सुसमाचार का मूल्य और बढ़ना चाहिए, क्योंकि उसमें परमेश्वर के वे भेद हैं जो पहले छिपे थे। सन्त पौलुस यह विषय निरन्तर बताता है, केवल इस पत्री में ही नहीं, वरन् अपने सब लेखों में, और बल देता है कि जब सुसमाचार सुनाया जाता है तब हमें गहराई से प्रभावित होना चाहिए। सुसमाचार में परमेश्वर वह प्रकट करता है जो पहले सारी मानवजाति के लिए अगम्य था, जिसे कोई न मान सकता था न कल्पना कर सकता था। आरम्भ में ऐसा दिखता था कि परमेश्वर ने केवल इब्राहीम के वंश को ही चुना है और शेष संसार को ठुकरा दिया है। इसलिए यह अद्भुत घटना थी जब उसका अनुग्रह बिना भेदभाव के सब लोगों पर उण्डेला गया। हम जानते हैं कि जब यीशु मसीह जगत में आया, तब वही लोग पतित हो चुके थे और यहूदियों के बीच परमेश्वर की शिक्षाएँ अन्धविश्वास से भ्रष्ट हो चुकी थीं। उस समय सब कुछ निराशाजनक लगता था, परन्तु अचानक उद्धार सब जातियों को दिया गया। मसीह, जो गहन अन्धकार में छिपा था, धार्मिकता के सूर्य के रूप में जगत को प्रकाशित करने उदित हुआ।
इसी कारण सन्त पौलुस कहता है कि सुसमाचार में हम परमेश्वर की इच्छा का भेद समझते हैं। पहली दृष्टि में सुसमाचार सरल प्रतीत हो सकता है, और कुछ ठट्ठा करनेवाले मानते हैं कि उसकी शिक्षाएँ केवल अनपढ़ों के योग्य हैं। वे इस पर गर्व करते हैं कि अपने स्वप्नों में वे यीशु मसीह की शिक्षा में जो है उससे अधिक परिष्कृत विचार गढ़ लेते हैं। परन्तु ऐसे लोग यहाँ प्रकट की गई बातों की गहराई को समझने के योग्य नहीं, क्योंकि उनका अभिमान उन्हें अन्धा और मूर्ख बना देता है। फिर भी विश्वासी सुसमाचार की शिक्षाओं में ईश्वरीय महिमा को साफ़ पहचान लेते हैं। सन्त पौलुस चाहता है कि हम समझें कि जब हम सुसमाचार के पास आते हैं, तब हम कोई साधारण बात सीखने नहीं आते, वरन् संसारी दृष्टिकोण से ऊपर उठने आते हैं। जब तक हम संसार से ऊपर न उठें और स्वयं परमेश्वर के कहे वचनों के प्रति श्रद्धा न दिखाएँ, तब तक हम उसकी शिक्षा के प्रति ग्रहणशील नहीं हो सकते और न उसकी पाठशाला से सच्चा लाभ उठा सकते हैं। संक्षेप में, हमारे विश्वास की नींव और द्वार नम्रता है। परन्तु सच्ची नम्रता तब तक नहीं हो सकती जब तक हम यह न मानें कि परमेश्वर जो कुछ बताता है वह हमारी अपनी समझ और क्षमता से कहीं ऊँचा है। सन्त पौलुस का उद्देश्य है कि हम सुसमाचार का आदर करें और दृढ़ता से विश्वास करें कि यह निर्णय करना हमारा काम नहीं कि परमेश्वर ने बुद्धिमानी से कहा या नहीं। हमें पूरी तरह निश्चित होना चाहिए कि जो कुछ उससे निकलता है वह असीम बुद्धि से भरा और सब दोष से रहित है। इसलिए सन्त पौलुस जानबूझकर यह बात इसीलिए रखता है कि सब अपनी बड़ाई को दबाया जाए, ताकि हम परमेश्वर के नाम से हमें दी गई शिक्षा का नम्रता और विनीत भाव से आदर करना सीखें।
परमेश्वर के प्रति हमारे ऋण पर बल देने के लिए सन्त पौलुस "उसकी सुमति के अनुसार" वाक्यांश को, जिसका उसने पहले उल्लेख किया था, दोहराता है। यह दोहराव मनुष्य की योग्यता की हर धारणा को दूर करने के काम आता है। परमेश्वर की सुमति तभी प्रभावी हो सकती है जब हम उसके पास बिलकुल खाली हाथ आएँ। जब हम परमेश्वर को कुछ भेंट करने का साहस करते हैं, तो वह उसके अनुग्रह को ढाँप देता है, और उसे उस सुन्दरता और प्रमुखता से वंचित कर देता है जो उसकी होनी चाहिए थी। इसलिए सब व्यर्थ भरोसे को रोकने के लिए सन्त पौलुस हमें परमेश्वर की सुमति की ओर लौटाता है, यह जताते हुए कि सुसमाचार संसार को केवल परमेश्वर की उदार और मुफ़्त भलाई के कारण सुनाया जाता है। मनुष्य के दुस्साहस को दबाने के लिए वह आगे कहता है कि "परमेश्वर ने उक्त आज्ञा और अपनी इच्छा की उस उच्च अगम्य युक्ति को पहले से अपने ही में ठहरा लिया था।" बहुत-से लोग परमेश्वर से प्रश्न करने, उससे वाद-विवाद करने और उसे चुनौती देने में इतनी स्वतन्त्रता क्यों लेते हैं? इसलिए कि वे समझते हैं कि वे ऐसी बातों से निपट रहे हैं जो खुली और भली-भाँति समझने योग्य होनी चाहिए। परमेश्वर की युक्ति की छानबीन करने के साहस में अपनी मूर्खता और उतावलेपन को पहचानकर सन्त पौलुस उसकी तुलना मुहरबन्द पत्र से करता है, जिसमें परमेश्वर की युक्ति उसी के भीतर रहती है, सृजे हुओं की पहुँच से परे। और ऊँचे उठने का प्रयत्न करना आत्म-विनाश और सर्वनाश का निश्चित मार्ग है।
यह सच है कि हमें परमेश्वर की इच्छा को समझने का गम्भीरता से यत्न करना चाहिए, परन्तु उसके वचन में जो प्रकट किया गया है उससे आगे हमें नहीं जाना चाहिए, क्योंकि उसका वचन हमारा मार्गदर्शक प्रकाश है। जहाँ परमेश्वर मौन रहना चुनता है, वहाँ वह चाहता है कि हम अपने आपको रोकें, मानो बन्दी हों, और आगे न बढ़ें। जितना हमें दिया गया है उससे अधिक जानने का प्रयत्न करना, जो हमें जानना चाहिए उससे बढ़ जाना, या उसके वचन जो बताते हैं उससे आगे निकल जाना, हमें भूलभुलैया में, या यों कहें कि नरक की गहराइयों में ले जाता है। इसलिए इस स्थल में सन्त पौलुस के आशय को समझें: जब-जब परमेश्वर अपने संकल्प को अपने ही पास रखे, तब-तब हमें सिर झुका लेना और अपनी अनभिज्ञता से सन्तुष्ट रहना चाहिए। यह श्रापित ज्ञान है, और हमें नरक के मार्ग पर ले जाता है, जब हम वह जानने का साहस करते हैं जो परमेश्वर ने हमें नहीं सिखाया। इसके विपरीत, हमारी अनभिज्ञता संसार के सारे ज्ञान से अधिक बुद्धिमान है, जब हम परमेश्वर के वचन के मार्गदर्शन से परे कुछ भी जानने का यत्न नहीं करते।
वास्तव में परमेश्वर में केवल एक ही सरल इच्छा है। फिर भी वह उसे हमारी क्षमता के अनुसार और ऐसी रीति से हम पर प्रकट करता है जो हमारे लिए उचित और लाभकारी है। जैसा हम समझ चुके हैं, पापों की क्षमा ऐसी बात है जिसे हम अनदेखा नहीं कर सकते, इसीलिए जकर्याह उसे उद्धार का ज्ञान कहता है। यह जानना भी उतना ही आवश्यक है कि हमारे पापों की क्षमा कहाँ मिल सकती है। यीशु मसीह के बिना हम परमेश्वर के शत्रु हैं, हमारे पास न प्रायश्चित है न भीतरी शान्ति, और परमेश्वर का न्याय हमारे ऊपर मँडराता है। परन्तु यीशु मसीह हमारी शान्ति का स्रोत है। जब हम उन सत्यों को समझ लें जो परमेश्वर के वचन के द्वारा हमें बताए गए हैं, तब हमें उन भेदों का भी आदर करना चाहिए जो हम से छिपे रहते हैं, जैसा पहले बल दिया जा चुका है और परमेश्वर के चुनाव की चर्चा के समय फिर दोहराया जाएगा। सन्त पौलुस यहाँ फिर "पहले से ठहराने" शब्द का प्रयोग इस बात पर बल देने के लिए करता है कि परमेश्वर ने हमें जगत की सृष्टि से पहले ही पूर्वनियत किया, यद्यपि यह अब तक छिपा रहा। संक्षेप में, हमें स्मरण रखना चाहिए कि हम सुसमाचार को अपनी क्षमताओं से, अपनी बड़ाई से, या सद्गुण के द्वारा परमेश्वर को अपना ऋणी बनाकर समझने के लिए नहीं बुलाए गए। वरन् परमेश्वर ने अपनी असीम भलाई में हमें प्रकाशित करना चुना है। यह उसकी कोई अचानक सनक नहीं थी, जैसे मनुष्य प्रायः उतावले निर्णय करते हैं, वरन् उसकी अपनी युक्ति में समय के आरम्भ से भी पहले ठहराया हुआ संकल्प था।
यदि हमारी बेचैन आत्माएँ हमें यह पूछने को उकसाएँ कि परमेश्वर ने हमें पहले से क्यों चुना और इसे पहले क्यों नहीं प्रकट किया, और यह अब तक क्यों छिपा रहा, तो सन्त पौलुस स्पष्ट करता है कि यह संकल्प, मानो, परमेश्वर के भीतर तब तक छिपा रहा जब तक वह हम पर प्रकट न किया गया। संक्षेप में, हमें इससे अधिक जानने की अनुमति नहीं जो सुसमाचार हमें सुनाता है, और हमें उसका आदर करना चाहिए। इसी कारण कहा गया है कि यह प्रकटीकरण समयों की पूर्णता में सत्य के प्रबन्ध के अनुसार हुआ।
सन्त पौलुस दिखाता है कि मनुष्य अपने आपको कितना ही सताएँ, वे अपने लक्ष्य तक न पहुँचेंगे, और यदि वे उससे अधिक जानने का यत्न करते रहें जितना परमेश्वर ने अनुमति दी है, तो उनके सारे विचार और अटकलें विफल होंगी। यदि कोई यह माँग करे कि परमेश्वर ने इस विषय में शीघ्रता क्यों न की, तो वह परमेश्वर से अधिक बुद्धिमान होने का दम भरता है, और शैतानी अभिमान प्रदर्शित करता है। क्या सृजा हुआ प्राणी पृथ्वी के सहारे के योग्य है जब वह अपने आपको इतना ऊँचा उठाता है? इसलिए सन्त पौलुस कहता है कि कार्यों का प्रबन्ध परमेश्वर का है। जब कोई मनुष्य अपने ही घर में यह निर्धारित कर सकता है कि उसके लोगों का पालन कैसे हो, वे क्या पीएँ, क्या खाएँ और कैसे सोएँ, तो हमें परमेश्वर को यह अधिकार देना कितना अधिक उचित है? उसके पास तुच्छ केंचुओं से भी कम अधिकार क्यों हो? इसलिए हम परमेश्वर को अधिकार दें कि वह अपनी कलीसिया का शासन और अपने चुने हुओं का उद्धार जैसा उचित समझे वैसा करे। क्योंकि हम इस विषय में न्यायी या पंच होने के लिए नहीं हैं कि समयों, वर्षों, महीनों या दिनों को नापें। हमारे लिए यही पर्याप्त हो कि परमेश्वर चाहता है कि ऐसा ही हो।
कोई तर्क करके पूछ सकता है, "आदम के पतन और मसीह के आगमन के बीच परमेश्वर ने चार हज़ार वर्ष प्रतीक्षा क्यों की? क्या वह छुड़ानेवाले को पहले नहीं भेज सकता था? इस बीच असंख्य लोग अन्धकार में भटकते रहे, और जलप्रलय ने संसार को निगल लिया, फिर भी यीशु मसीह छिपा रहा। इसके अतिरिक्त, केवल थोड़े-से लोगों ने ही उसे प्रतीकों और छायाओं के द्वारा अनुभव किया। केवल यहूदियों ने, जो छुड़ानेवाले की बाट जोहते थे, उसके द्वारा उद्धार पाया, और उन्हें भी अपने पापों की क्षमा और परमेश्वर की कृपा पाने के लिए बछड़े, भेड़ें और अन्य पशु चढ़ाने पड़ते थे।"
इसे समझने के लिए यहाँ एक ही शब्द में जो कहा गया है उसकी ओर मुड़ें: समय अभी पूरा नहीं हुआ था। क्यों? क्योंकि परमेश्वर ने ऐसा ही ठहराया था। यह उसी के अनुरूप है जो हम गलातियों की पत्री में पहले सीख चुके हैं, जहाँ सन्त पौलुस ने उन लोगों की भ्रमित अटकलों का खण्डन किया जो अपने आपको उस सीमा से परे ऊँचा उठाना चाहते थे जो अनुमत है। इसलिए हम पहचानें कि समयों और ऋतुओं को ठहराना परमेश्वर की विशेष भूमिका है, और हमें उस समय के अतिरिक्त जो वह ठहराए, किसी और समय को ठहराया हुआ नहीं मानना चाहिए। यद्यपि हम हर वर्ष ऋतुओं को बदलते देखते हैं, फिर भी यदि ग्रीष्म देर से आए तो हमें परमेश्वर के विरुद्ध कुड़कुड़ाने से अपने आपको रोकना चाहिए। हम कह सकते हैं, "यदि परमेश्वर को भाए कि हमें गर्मी भेजे, तो हम उसका प्रसन्नता से स्वागत करेंगे।" परन्तु हमें दृढ़ता से विश्वास करना चाहिए कि परमेश्वर ही शासन करता है, और सारी प्रभुता और अधिकार उसी का है।
यदि प्राकृतिक व्यवस्था के विषय में, जो हमारे परिचित है और जिसमें परमेश्वर अपने आपको प्रकट करता है, हमसे ऐसी नम्रता से काम लेने की अपेक्षा की जाती है, तो स्वर्गीय राज्य के भेदों, हमारी आत्माओं के अनन्त उद्धार, और खोए हुए तथा नाश होते हुए को पुनःस्थापित करने के लिए परमेश्वर के पुत्र के आने के गहन रहस्य के विषय में हमें कितना अधिक अपने आपको दीन करना चाहिए? क्या इस विषय में हमें अपने आपको नीचा नहीं करना चाहिए, और जो कुछ परमेश्वर प्रदान करे उसे नम्रता से ग्रहण करके उसकी इच्छा के अनुरूप नहीं हो जाना चाहिए? इसी कारण सन्त पौलुस ने स्पष्ट रूप से "समयों की पूर्णता" का उल्लेख किया। इसका अर्थ है कि हम सुसमाचार से तभी लाभ उठा सकते हैं जब हम परमेश्वर का इतना आदर करें कि केवल उसकी इच्छा से सन्तुष्ट रहें, उसे चुनौती न दें और उससे वाद-विवाद न करें, वरन् उसकी युक्ति को ज्ञान, धार्मिकता और न्याय का परम स्रोत मानकर उसकी महिमा करें।
इसे और स्पष्ट करने के लिए सन्त पौलुस तुरन्त जोड़ता है कि परमेश्वर का संकल्प था "कि स्वर्ग और पृथ्वी की सब वस्तुओं को यीशु मसीह के द्वारा अपने में एकत्र करे।" यहाँ "एकत्र करना" शब्द का प्रयोग हमें स्मरण दिलाता है कि जब तक हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें पुनःस्थापित न करे, तब तक हम सब गहरी अव्यवस्था की दशा में हैं। यह पुनःस्थापना केवल हमारे लिए ही नहीं, वरन् सारी सृष्टि के लिए है।
सार यह कि मानो वह हमें बता रहा है कि सारी प्राकृतिक व्यवस्था बिगड़ गई है और सब वस्तुओं ने आदम के पाप के कारण क्षय और अव्यवस्था सही है, जब तक कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह में पुनःस्थापना न पा लें। यद्यपि हम परमेश्वर की अद्भुत बुद्धि, सामर्थ्य, भलाई, न्याय और धार्मिकता को उसकी सब रचनाओं में देख सकते हैं, फिर भी पाप के चिह्न भिन्न-भिन्न स्तरों पर बने हुए हैं, और हमारी पतित दशा के कारण सब प्राणी भ्रष्टता और अव्यवस्था के अधीन हैं, जिससे परमेश्वर हमसे दूर हो जाता है [रोमियों 8:22]।
इसलिए यह पुनःस्थापना यीशु मसीह को ही करनी है, जैसा सन्त पौलुस के यहाँ उल्लिखित "एकत्र करने" से सूचित होता है। इस प्रकार हम केवल अपनी ही अव्यवस्था की दशा को पहचानने के लिए नहीं बुलाए गए, वरन् यह भी मानने के लिए कि हमने सारे संसार को उसी दशा में पहुँचा दिया है और प्रतिदिन उसे अपने पापों के द्वारा बनाए रखते हैं। एकमात्र उपाय यह है कि यीशु मसीह सब कुछ सुधारे, और ऐसा एकत्रीकरण और एकता लाए जो हमें हमारे परमेश्वर से फिर मिला दे।
इस स्थल से यही मुख्य शिक्षा लेनी है। यद्यपि यह संक्षेप में कहा गया है, फिर भी यह गहन मनन के योग्य है। यह ऐसी बात है जो निरन्तर हमारे विचारों में रहनी चाहिए। जब हम अपने विषय में सोचें, तो हमें नम्रता से अपनी दयनीय दशा को स्वीकार करना चाहिए, यह जानते हुए कि हम जन्म से ही अपने परमेश्वर से अलग हैं। हम देखते हैं कि हम उसके शत्रु हैं, उसके क्रोध के योग्य हैं, और हमारा स्वाभाविक स्वभाव बुराई और विकृति की ओर झुका हुआ है। परन्तु केवल अपने ही भीतर इस अव्यवस्था को पहचानना पर्याप्त नहीं; हमें यह भी समझना चाहिए कि हमारी विकृति ने सारे संसार को अव्यवस्था में डाल दिया है।
इसलिए हम अपने आपको दीन करें और गहरी लज्जा अनुभव करें। साथ ही, हम उस अपार ऋण को खुलकर स्वीकार करें जो हम परमेश्वर के प्रति रखते हैं, क्योंकि उसने अनुग्रहपूर्वक हमें अपने एकलौते पुत्र में एकत्र किया, हमें जिन्होंने अपने पापमय कर्मों से उस व्यवस्था को जिसे उसने इतनी उत्तमता से स्थापित किया था, छिन्न-भिन्न कर दिया।
यह ध्यान देना आवश्यक है कि जब सन्त पौलुस "स्वर्ग और पृथ्वी की सब वस्तुओं" का उल्लेख करता है, तब वह इस एकत्रीकरण में स्वर्गदूतों को भी सम्मिलित करता है [कुलुस्सियों 1:20]। यद्यपि स्वर्गदूत परमेश्वर से कभी दूर नहीं हुए और अपनी मूल दशा से कभी नहीं गिरे, फिर भी उन्हें भी हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा इस एकत्रीकरण की आवश्यकता थी, और इसके दो महत्त्वपूर्ण कारण हैं।
पहला, जब तक वे स्थिर रहे और कभी भटके नहीं, परमेश्वर की धार्मिकता सदा उनके द्वारा चमकती रही। वे उसकी धार्मिकता के दर्पण और आदर्श थे। फिर भी यदि परमेश्वर उन्हें कठोरता से जाँचना चुनता, तो वे उसकी सिद्ध धार्मिकता से कम ठहरते, जैसा अय्यूब की पुस्तक में कहा गया है [अय्यूब 4:18]। दूसरा, यह समझना आवश्यक है कि स्वर्गदूतों को यीशु मसीह के द्वारा इस प्रकार स्थापित किए जाने की आवश्यकता थी कि उनकी अटल दृढ़ता और स्थिरता सुनिश्चित रहे। उसके हस्तक्षेप के बिना उनमें आवश्यक दृढ़ता का अभाव हो सकता था। यह उनके एकत्रीकरण के एक पक्ष को रेखांकित करता है। परन्तु जिस एकत्रीकरण की चर्चा सन्त पौलुस यहाँ करता है, वह हमारे साथ उनके पुनर्मिलन से भी सम्बन्ध रखता है।
हम जानते हैं कि परमेश्वर के राज्य से अपने निष्कासन के बाद हम उद्धार की सारी आशा से कट गए थे। फलस्वरूप स्वर्गदूतों को तुरन्त हमारा विरोधी बनना पड़ा, और वे अब भी वैसे ही रहते यदि उस साझे सिर के द्वारा, जो यीशु मसीह है, उनके साथ हमारा सम्बन्ध न होता।
उदाहरण के लिए, याकूब की सीढ़ी के प्रतीक पर विचार करें, जैसा बाइबल में वर्णित है, जहाँ कहा गया है कि परमेश्वर उसकी चोटी पर खड़ा था, स्वर्ग और पृथ्वी दोनों को छूता हुआ, और स्वर्गदूत उस पर चढ़ते-उतरते थे [उत्पत्ति 28:12]। हमारे प्रभु यीशु मसीह में, जो सच्चा, जीवित और अनन्त परमेश्वर है, स्वर्ग और पृथ्वी एक हुए हैं। परमेश्वर ने अपने व्यक्तित्व में अपने ईश्वरीय सार को मानव स्वभाव के साथ जोड़ दिया है। इस प्रकार स्वर्ग का मार्ग फिर खुल गया है, जिससे स्वर्गदूत हम से परिचित हो सकें, यहाँ तक कि हमारे सेवक भी बनें, जैसा इब्रानियों की पत्री में कहा गया है [इब्रानियों 1:14]। उन्हें हमारी आत्माओं की देखभाल सौंपी गई है, और जैसा चौंतीसवाँ भजन कहता है, वे हमारे चारों ओर छावनी डालते हैं, हमारी रखवाली करते और हमारे अभिभावक होकर सेवा करते हैं।
स्वर्ग के स्वर्गदूतों के साथ यह मेल हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा ही सम्भव हुआ है। इसी कारण उसने कहा, "अब से तुम स्वर्ग को खुला हुआ और मनुष्य के पुत्र को अपने स्वर्गदूतों के साथ अपनी महिमा में उतरते देखोगे" [यूहन्ना 1:51]। इस कथन के द्वारा वह सूचित करता है कि स्वर्ग पहले हमारे लिए बन्द था और हम परमेश्वर की कृपा के योग्य न थे। परन्तु अब वह हमारे सिर के रूप में आया है, उसने हमें अपने पिता से मेल कराया है, मध्यस्थ की भूमिका ली है, और केवल विश्वासियों का ही नहीं, वरन् स्वर्गदूतों का भी सिर बन गया है। उसने सबको इस प्रकार एकत्र किया है कि जब शैतान हमसे युद्ध करते हैं और निरन्तर हमारे विनाश की योजनाएँ रचते हैं, तब स्वर्गदूत हमारी सहायता के लिए असीम सामर्थ्य से सुसज्जित हैं [कुलुस्सियों 2:10]। यद्यपि हम उन्हें अपनी आँखों से नहीं देखते, फिर भी हमें निस्सन्देह विश्वास करना चाहिए कि वे हमारे उद्धार पर दृष्टि रखते हैं।
इसके विपरीत पर विचार करें। शैतान को गरजते हुए सिंह के समान कहा गया है जो हमें फाड़ खाने को ढूँढ़ता फिरता है [1 पतरस 5:8], और वह हमें फँसाने के लिए अनेक युक्तियाँ काम में लाता है। इसलिए स्वर्गदूतों को हमारी रक्षा के लिए असीम सामर्थ्य की आवश्यकता है। यह भी अनिवार्य है कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह की सुरक्षा में बने रहें, जो हमारा और स्वर्गदूतों का, दोनों का सिर है।
सार यह कि इस स्थल में सन्त पौलुस जो कहता है वह यह है कि हम पहले बिखरे हुए और पराए थे। हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग के द्वारा हम न केवल परमेश्वर से मेल-मिलाप पा चुके हैं, वरन् स्वर्गदूतों से भी फिर मिला दिए गए हैं। वे हमारे भाई और साथी बन गए हैं, जिन्हें परमेश्वर ने हमारा मार्गदर्शन करने, हमें सँभालने और हम पर दृष्टि रखने का काम सौंपा है। वे हमारे सब विरोधियों के विरुद्ध निरन्तर युद्ध करते रहते हैं, जब तक कि हम स्वर्गीय विश्राम में इकट्ठे न किए जाएँ [भजन संहिता 91:13]।
अब हम अपने दयालु परमेश्वर की महिमा के सामने नम्रता से दण्डवत् करें, अपने दोषों को स्वीकार करें और प्रार्थना करें कि वह हमें सच्चे पश्चाताप की ओर ले जाए, जिसे हम जीवन भर बनाए रखें। ऐसा करते हुए हम उस पर अटल भरोसा रखें और उसकी सेवा के लिए साहस से अपने आपको अर्पित करें, यह जानते हुए कि मसीह के बहाए हुए लहू से हमारे पाप क्षमा हो गए हैं। हम इस शिक्षा के अनुरूप बनें और मानें कि इतने बड़े मूल्य पर मोल लिए जाने के कारण हमें अपने आपको पूरी तरह उसकी सेवा में समर्पित करना चाहिए। क्योंकि उसने अपने आपको दयालु छुड़ानेवाला प्रमाणित किया है, इसलिए हमें कोई सन्देह नहीं होना चाहिए कि उसकी भलाई सब परीक्षाओं में हमें थामे रखेगी, जब तक वह हमें शैतान और उसके सब साथियों के पंजों से न छुड़ा ले, और अन्त में उस आशीष में न पहुँचा दे जिसके लिए वह हमें बुलाता है।
वह यह अनुग्रह केवल हम पर ही नहीं, वरन् सब जातियों के लोगों पर भी बढ़ाए।
