अध्याय 49

अड़तालीसवाँ उपदेश, छठवें अध्याय पर छठा - इफिसियों 6:20-24

Sermons on Ephesians (Modernized) · John Calvin

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अड़तालीसवाँ उपदेश, छठवें अध्याय पर छठा - इफिसियों 6:20-24

"जिसके लिये मैं जंजीरों में बँधा हुआ राजदूत हूँ, कि मैं उसके विषय में जैसा मुझे चाहिए वैसा हियाव से बोलूँ। पर इसलिये कि तुम भी मेरी दशा जानो कि मैं कैसा रहता हूँ, प्रिय भाई और प्रभु में विश्वासयोग्य सेवक तुखिकुस तुम्हें सब बातें बताएगा; जिसे मैंने इसी लिये तुम्हारे पास भेजा है कि तुम हमारी दशा जानो, और वह तुम्हारे हृदयों को शान्ति दे। परमेश्वर पिता और प्रभु यीशु मसीह की ओर से भाइयों को शान्ति और विश्वास सहित प्रेम मिले। जो हमारे प्रभु यीशु मसीह से सच्चा प्रेम रखते हैं, उन सब पर अनुग्रह होता रहे। आमीन।" - इफिसियों 6:20-24

आज सुबह हमने एक-दूसरे के लिये प्रार्थना करने के महत्त्व पर विचार किया, और उससे मिलने वाले लाभ पर भी, अर्थात् यह कि कलीसिया का प्रत्येक सदस्य, जो मसीह की देह का अंग है, इस बात से निश्चिन्त रह सकता है कि सारी कलीसिया उसके लिये प्रार्थना कर रही है। यह सामूहिक प्रयास है, और इसका अर्थ है कि यीशु मसीह और उसके सब अनुयायी प्रार्थना में एक हैं, इस समझ के साथ कि वे सब पूरी तरह परमेश्वर पर निर्भर हैं।

परन्तु हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि जब पौलुस कलीसिया से प्रार्थना माँगता है, तो उसकी चिन्ता मुख्यतः अपनी शारीरिक भलाई की नहीं, वरन् एक कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण बात की है। उसे इस बात की अधिक चिन्ता है कि जो उत्तरदायित्व और कर्तव्य उसे सौंपे गए हैं, उन्हें वह पूरा करे। जब कोई बीमार होता है या संसार में कठिनाइयों का सामना करता है, तो सहायता के लिये पुकारना और दूसरों से सहारा माँगना स्वाभाविक है। ऐसी परिस्थितियों में हम आशा करते हैं कि सब हमारी सहायता को आएँ, क्योंकि हमें अपनी देह की भलाई की स्वाभाविक चिन्ता रहती है।

फिर भी जब परमेश्वर की सेवा की बात आती है, तब लोग प्रायः यह समझ लेते हैं कि वे दूसरों की सहायता के बिना निभा सकते हैं। परन्तु यहाँ पौलुस का उदाहरण दिखाता है कि वह अपने आप को इतना समर्थ नहीं समझता कि ईश्वरीय सहायता के बिना सुसमाचार प्रचार का अपना कर्तव्य पूरा कर सके। इसलिये वह कलीसिया की प्रार्थनाएँ माँगता है। इसके अतिरिक्त, वह यह भी दिखाता है कि वह परमेश्वर के वचन की उन्नति और पूर्ति को अपने प्राण से भी अधिक मूल्यवान समझता है, यद्यपि वह बन्दीगृह में है और निरन्तर मृत्यु के संकट में पड़ा हुआ है।

इस पद में सन्त पौलुस बन्दीगृह में है, भयावह परिस्थितियों का सामना कर रहा है और प्रतिदिन मृत्यु की प्रतीक्षा में है। फिर भी उसकी मुख्य चिन्ता उसका अपना प्राण नहीं, वरन् परमेश्वर के वचन की उन्नति और पूर्ति है। वह मर जाना स्वीकार करेगा, परन्तु अपने सौंपे हुए कार्य को पूरा करने में ढील नहीं करेगा। इस पद से हमें मुख्य शिक्षा यही लेनी चाहिए।

थिस्सलुनीकियों की पत्री में वह इस विषय में और अधिक प्रकाश डालता है कि वह क्यों चाहता है कि वह उन दुष्ट और विश्वासघाती लोगों से छुड़ाया जाए जो निरन्तर उसके विरुद्ध षड्यन्त्र रचते रहते हैं, और वह अपने प्राण को क्यों मूल्यवान समझता है। तो भी वह अपने हित को उस कर्तव्य से आगे कभी नहीं रखता जो उस पर परमेश्वर के प्रति है, विशेषकर विश्वासयोग्यता से सुसमाचार का प्रचार करके कलीसिया की सेवा करने का।

इसलिये यदि प्रभु हमें कोई कार्य सौंपे, चाहे वह कुछ भी हो, तो हमें पहले अपनी सीमाओं को पहचानना और परमेश्वर के सहारे की अपनी आवश्यकता को स्वीकार करना चाहिए। हमें अपने बल या बुद्धि पर भरोसा नहीं करना चाहिए, वरन् यह जानना चाहिए कि परमेश्वर को ही हमें सम्भालना है। जैसे सन्त पौलुस ने अपने आप को मसीह की देह के सब अंगों की प्रार्थनाओं को सौंपा, वैसे ही उचित है कि हम भी एक-दूसरे के लिये प्रार्थना करें।

अन्त में, यद्यपि बीमारी या विपत्ति के समय दूसरों से प्रार्थना माँगना उचित है, तो भी हमें इस संसार और अपने क्षणभंगुर जीवन से इतना नहीं जुड़ जाना चाहिए कि आवश्यकता के समय तो सहायता के लिये पुकारें, परन्तु जो बात इससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है, अर्थात् परमेश्वर के राज्य की उन्नति और उसके नाम की महिमा, उसकी उपेक्षा करें।

इसलिये आओ, हम अपने जीवन-व्यवहार पर ध्यान देना सीखें, और सबसे बढ़कर यह देखें कि हमारे कामों के द्वारा, चाहे जीवन में हो या मृत्यु में, परमेश्वर की महिमा हो। प्रेरित पौलुस फिलिप्पियों को लिखी अपनी पत्री में हमारे लिये उदाहरण ठहराता है। तुम देख सकते हो कि सबसे पहले हमें क्या स्मरण रखना चाहिए। वह स्पष्ट कहता है कि वह चाहता है कि उसे मुँह खोलने की सामर्थ्य दी जाए, अर्थात् परमेश्वर उसे सुसमाचार को स्वतन्त्रता और खुलेपन से सुनाने का साहस और दृढ़ विश्वास दे। वह पीछे न हटे, वरन् हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह और उन अनगिनत भलाइयों की जो वह हमारे लिये लाया है, निडर होकर घोषणा करे। "मुँह खोलने" का यही अर्थ है।

अनुभव ने दिखाया है कि "खुले मुँह" की यह प्रार्थना बिना कारण की नहीं थी। बहुत से लोग जो सुसमाचार का प्रचार करने का दावा करते हैं, प्रायः उसके विषय में खुलकर या निडरता से बोलने से बचते हैं। वे कुछ शब्द कह देते हैं, परन्तु सत्य को छिपा लेते हैं, और इतने डरते-डरते बोलते हैं कि उनका सन्देश अस्पष्ट हो जाता है। हमारा प्रभु यीशु मसीह कौन है, सच्चा धर्म कैसा है, और विश्वास तथा मन-फिराव क्या हैं, इन बातों की साहसपूर्वक घोषणा करने के बदले वे इन विषयों को बस संक्षेप में छू भर देते हैं। वे इनकी गहराई में जाकर पूरी रीति से इन्हें खोलने में हिचकिचाते हैं।

परमेश्वर के सच्चे सेवकों को तीमुथियुस के प्रति सन्त पौलुस की सलाह माननी चाहिए, कि उनमें डरपोक और भयभीत आत्मा न हो, वरन् वे साहस से अपनी बुलाहट का पीछा करें। उन्हें संसार की चिन्ताओं से ऊपर उठना और अटल भरोसा बनाए रखना चाहिए, चाहे कठिन युद्धों का सामना हो और बहुतों का वैर हो जो उनका विरोध करते हैं। उन्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह की स्वतन्त्रता और निडरता से घोषणा करनी चाहिए। परन्तु हम स्वभाव से डरपोक और निर्बल हैं, इसलिये हमें आवश्यकता है कि परमेश्वर हम में कार्य करे और हमें वह साहस दे कि हम जैसा चाहिए वैसा बोलें। केवल अपना कर्तव्य जान लेना पर्याप्त नहीं है; हमें अपनी कमियों को भी स्वीकार करना और परमेश्वर की ओर फिरकर उसी से सहायता माँगनी चाहिए।

सामान्य रूप से हम यह समझ लें कि सुसमाचार प्रचार का कार्य हमारे अकेले सम्भालने के लिये बहुत भारी और गम्भीर है। हमें परमेश्वर के आत्मा के मार्गदर्शन की आवश्यकता है, जैसा कि सन्त पौलुस ने कुरिन्थियों को लिखी अपनी दूसरी पत्री में कहा: "कौन इन बातों के योग्य है?" वह उस प्रचार की बात कर रहा था जो मनुष्यों को परमेश्वर से मिलाता है, उन्हें उनके उद्धार का निश्चय दिलाता है, स्वर्ग के द्वार खोलता है, पापों की क्षमा का प्रमाण देता है, और हमारे प्रभु यीशु मसीह का लहू हमें हमारे सब दागों से शुद्ध करने के लिये प्रस्तुत करता है। परमेश्वर की सामर्थ्य के बिना ऐसे कार्य के योग्य कौन है? परमेश्वर के दान के बिना हम एक अच्छा विचार तक नहीं सोच सकते। हम इतने असहाय हैं कि जब तक परमेश्वर हमें सामर्थ्य न दे, हम कुछ भी भला नहीं कर सकते।

इसलिये जो लोग परमेश्वर की कलीसिया में शिक्षा देने के पद पर बुलाए गए हैं, उन्हें अपनी निर्बलता को पहचानना और अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करने के लिये पूरी रीति से परमेश्वर के मार्गदर्शन पर निर्भर रहना चाहिए। उन्हें समझना चाहिए कि ऊपर से ईश्वरीय सहायता के बिना वे अपने कर्तव्यों का एक अंश भी कभी पूरा नहीं कर सकते। इसलिये हर एक को उनके लिये प्रार्थना करनी चाहिए जो शिक्षक और वचन के सेवक ठहराए गए हैं, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें यह वरदान दिया है कि वे हमारे प्राणों की भली-भाँति चरवाही करें। कलीसिया को स्वस्थ और सुदृढ़ दशा में बनाए रखना अत्यन्त आवश्यक है। इसलिये क्या बड़े क्या छोटे, सब यह जान लें कि जो सिखाते और अगुवाई करते हैं उन्हें परमेश्वर ही सामर्थ्य दे सकता है, और उनके लिये प्रार्थना करना सब का उत्तरदायित्व है। ऐसा करने से हर एक अपनी ही भलाई और उद्धार को सुरक्षित करता है। इस कर्तव्य की उपेक्षा करना इस बात का चिह्न है कि मनुष्य अपने आत्मिक जीवन या कलीसिया के सामूहिक कल्याण को कुछ मूल्य नहीं देता।

और यहाँ हम देखते हैं कि उनके विषय में हमें क्या सोचना चाहिए जो आज परमेश्वर के वचन का प्रचार करने का दावा करते हैं, परन्तु इतने डरपोक हैं कि तब तक नहीं बोलते जब तक यह भली-भाँति न सोच लें कि जो वे कहना चाहते हैं वह श्रोताओं के कानों को बुरा लगेगा या अच्छा। वे उन व्यापारियों के समान हैं जो शुद्ध दिखना चाहते हैं, फिर भी जिस शिक्षा की घोषणा करते हैं उसे दूषित कर देते हैं, जैसा कि पौलुस उन लोगों के विषय में यही उपमा देता है जो संसार की कृपा पाने और उसे बनाए रखने के लिये परमेश्वर के वचन का दुरुपयोग करते हैं। ये लोग तर्क देते हैं कि हमें सावधान रहना चाहिए, ठोकर का कारण नहीं बनना चाहिए, और धारा के विरुद्ध नहीं बहना चाहिए, मानो वे परमेश्वर से अधिक बुद्धिमान हों। परन्तु सन्त पौलुस हमें बताता है कि यीशु मसीह का प्रचार पूरी रीति से और बिना किसी छल-कपट के होना चाहिए, चाहे तलवार या आग से कोई उत्पीड़न न भी हो। आजकल कुछ प्रचारक जो अपने आप को सुसमाचार के सेवक कहते हैं, कृपा पाने की इतनी लालसा रखते हैं कि सत्य से समझौता कर लेते हैं, और हमारे प्रभु यीशु मसीह को झुकने और अपनी रुचि के अनुसार ढलने पर विवश करते हैं।

जब ये प्रचारक देखते हैं कि लोगों को हमारे प्रभु यीशु मसीह के जूए के नीचे लाना अप्रिय है, तो कहते हैं, "क्या हम बड़े और शक्तिशाली लोगों को ठेस पहुँचाएँ? क्या हमें उन्हें नम्रता से अपनी ओर नहीं खींचना चाहिए?" फिर भी वे जंगली पशुओं के समान हमारे प्रभु यीशु मसीह का विरोध करते और कलीसिया के अनुशासन का सामना करते हैं, तो भी माँग करते हैं कि सुसमाचार उनकी रुचि के अनुसार सुनाया जाए। ऐसा कपट प्रत्यक्ष है, और इन अस्थिर प्रचारकों को, जो दूसरों को प्रसन्न करने के लिये अपनी स्थिति बदल लेते हैं, खोजने के लिये दूर देखने की आवश्यकता नहीं।

इस पद पर ध्यान से मन लगाना अत्यन्त आवश्यक है, जिसमें पौलुस इस बात पर बल देता है कि सुसमाचार का सच्चा प्रचार तब तक नहीं होता जब तक वह पूरी रीति से, खुलकर और स्पष्ट वाणी से न सुनाया जाए। वह सुसमाचार के भेद की बात इस शिक्षा के महत्त्व को दिखाने के लिये करता है, जिसे अन्यथा वे लोग तुच्छ जानते हैं जो चतुर और परिष्कृत दिखना चाहते हैं। कुछ अहंकारी लोग अपने आप को इतना बुद्धिमान समझते हैं कि मानते हैं सुसमाचार उनके लिये नहीं है, क्योंकि वह सरल दिखता है। वे बादलों के ऊपर उड़ने और जटिल अटकलों में पड़ने का प्रयत्न करते हैं जिससे वे और दूसरे भी घबरा जाते हैं, क्योंकि वे सुसमाचार की सरलता को पहली दृष्टि में समझ नहीं पाते। परमेश्वर उसे इसी रीति से हमारे सामने रखता है कि हमारी सरलता के अनुकूल हो, क्योंकि वह जानता है कि हम छोटे बच्चों के समान हैं। परन्तु ऊपरी सतह के नीचे यह शिक्षा गहरी और गम्भीर है, मानवीय बुद्धि की पहुँच से परे। स्वर्गदूत भी इस पर आश्चर्य करते और इसका आदर करने को विवश होते हैं, जैसा कि अन्यत्र कहा गया है।

हम यह समझ लें कि सुसमाचार में जो सरलता दिखाई देती है, उसी में ऐसी ईश्वरीय बुद्धि है जो हमारी समझ से परे है, जब तक परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा के द्वारा उसे हम पर प्रकट न करे। यदि हम संसार के सबसे विद्वान पण्डित भी होते, तो भी उसे न समझ पाते जब तक परमेश्वर हमारी समझ को प्रकाशित न करे, जैसा कि कुरिन्थियों की पहली पत्री के पहले दो अध्यायों में कहा गया है। सन्त पौलुस हमें बताता है कि सुसमाचार में गहरे भेद हैं जो हमारी समझ से परे हैं, जिन्हें परमेश्वर हम में कार्यान्वित करता है, और कोई मानवीय जीभ उन्हें व्यक्त नहीं कर सकती जब तक परमेश्वर बोलने वाले और सुनने वाले दोनों का मार्गदर्शन न करे। इसलिये सबके लिये आवश्यक है कि वे उसके पवित्र आत्मा के शासन में रहें। जैसा सन्त पौलुस कहता है, केवल शब्दों का उच्चारण पर्याप्त नहीं; परमेश्वर के वचन को लोगों के हृदयों में पैठना और उन्हें आज्ञाकारिता तक ले जाना चाहिए। स्वर्ग का राज्य वाक्पटु भाषण पर नहीं, वरन् परमेश्वर की सामर्थ्य पर आधारित है।

कि प्रचारक परमेश्वर की सेवा में प्रभावशाली साधन बनें, इसके लिये सन्त पौलुस चाहता है कि लोग उसके लिये प्रार्थना करें। इसलिये हम समझें कि किसी पवित्रशास्त्र-पद की व्याख्या करने के लिये मंच पर खड़े हो जाना ही सारा कर्तव्य नहीं है। एक विशेष अनुग्रह होना चाहिए, जो परमेश्वर की असाधारण भलाई से उत्पन्न होता है, मनुष्य के प्रयास से नहीं। जैसा सन्त पौलुस अन्यत्र बल देकर कहता है, कोई भी भला और विश्वासयोग्य शिक्षक का कार्य नहीं निभा सकता जब तक परमेश्वर उसे न भेजे। परमेश्वर से विनती करना आवश्यक है कि वह उनकी भूमिका पूरी करने के लिये जो कुछ आवश्यक है वह दे, क्योंकि वह उनके पास अपने आप से नहीं है। इसके अतिरिक्त, सन्त पौलुस सुसमाचार का राजदूत होने पर गर्व करता है, चाहे वह जंजीरों में एक दीन बन्दी ही क्यों न हो। वह "राजदूत" शब्द इसलिये प्रयोग करता है कि उसका कारावास परमेश्वर के सन्देश के महत्त्व को घटा न दे। वह कहता है, "यदि तुम्हें उसके राजदूत के रूप में मुझसे कोई आपत्ति है, तो स्मरण रखो कि मेरा दुःख उठाना और बन्दी होना उस पद को हानि नहीं पहुँचाता जो मुझे सौंपा गया है, अर्थात् उसके नाम से सुसमाचार का प्रचार करना।" सन्त पौलुस अपने कार्य की आदरणीय गरिमा पर केवल इसी पद में बल नहीं देता, वरन् यह भी प्रकट करता है कि कोई वस्तु उसे घटा नहीं सकती। इतना ही नहीं, वह लोहे की जंजीरों में जकड़े जाने और बन्दीगृह में रोके जाने की बड़ी महिमा करता है। यह इस बात का प्रमाण है कि उसने उत्साह से प्रचार किया था, और लोगों को उसकी शिक्षा बिना विरोध के ग्रहण करनी चाहिए।

निःसन्देह यह सच है कि जब हम स्वतन्त्र मन से परमेश्वर का कार्य करते और परीक्षाएँ सहते हैं, तो हम उसके सेवक ठहरते हैं। तो भी हमारी निष्ठा का सबसे उत्तम प्रमाण तब होता है जब परमेश्वर हमारी परीक्षा लेता है, जैसे जब हम बन्दीगृह में डाले जाते, एक स्थान से दूसरे स्थान को खदेड़े जाते, या नाना प्रकार के कष्टों और सताहटों के अधीन होते हैं। जब हम पर अन्याय से दोष लगाया जाता और हमें फाड़ा जाता है, फिर भी हम किसी ओर झुके बिना दृढ़ बने रहते हैं, तो यह हमारी बुलाहट को प्रमाणित और पक्का करता है। यह दिखाता है कि परमेश्वर ने हमें अपना सेवक ठहराया है।

अब देखो, सन्त पौलुस बन्दीगृह में था और अपने आप का इन्कार करने को तैयार था; यदि वह चाहता तो सुसमाचार के सत्य को त्यागकर जा सकता था। परन्तु वह दृढ़ बना रहा, और यह दिखाया कि उसके लिये उसका प्राण कुछ नहीं। उसका निरन्तर लक्ष्य हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम को बड़ा करना था। जब सन्त पौलुस में ऐसी अटल निष्ठा प्रत्यक्ष थी, तो यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वह पहले कभी नकली नहीं रहा। क्योंकि जब कोई मनुष्य केवल प्रचार करता है और फिर जब दबाव आता है तो पीछे हटने और अपनी स्थिति से हट जाने लगता है, तो प्रत्यक्ष है कि वे केवल ढोंगी थे। वे उस मनुष्य के समान हैं जो खेल खेलते समय अपना सिक्का दाँव पर से वापस छीनने का प्रयत्न करता है। क्या संसार नहीं देखता कि वे केवल अभिनेता और विदूषक हैं? यदि कोई मनुष्य बड़ा वक्ता और उत्तम शिक्षक हो, परन्तु जब परमेश्वर उसे बुलाए तो थोड़ा सा भी त्याग करने से इन्कार करे, और इस प्रकार प्रकट करे कि जो शिक्षा वह लिये फिरता है वह सचमुच उसकी अपनी नहीं है, तो स्पष्ट है कि वे ठट्ठा करने वालों के सिवा कुछ नहीं, जो अज्ञानी पशु से भी बढ़कर तुच्छ जाने जाने और निन्दा के योग्य हैं।

इसलिये सन्त पौलुस अपनी जंजीरों पर गर्व करता है, और घोषणा करता है कि यद्यपि संसार उसे तुच्छ और घृणित जानता था, फिर भी परमेश्वर ने उसे अपना राजदूत ठहराया था। इससे हम सीखें कि जब हम परमेश्वर के सेवकों को बन्दीगृह में देखें तो उन्हें तिरस्कार और अवज्ञा की दृष्टि से न देखें। हम समझें कि परमेश्वर प्रायः उन्हें उनसे कहीं ऊँचे पद और सम्मान तक उठाता है जो ऊँचे मंचों पर खड़े होते हैं। जो मनुष्य बन्दीगृह में रहकर भी सुसमाचार के अपने शुद्ध अंगीकार में दृढ़ रहता है, वह उन सब से कहीं अधिक आदरणीय स्थान रखता है जो मंचों से स्वतन्त्रता से प्रचार करते हैं। इस बात को स्मरण रखो।

शान्ति और अवकाश के समय में हम साहस और स्थिरता के साथ अपने आप को तैयार करें, ताकि जब उसे अच्छा लगे हम परमेश्वर के राजदूत हो सकें, चाहे बन्दीगृह में हों, या शत्रुओं की धमकियों के बीच, या मृत्यु के प्रकोप के सामने। इस अंश से हमें यही शिक्षा लेनी चाहिए। इसलिये हम निरुत्साहित न हों, जैसे बहुत से चंचल लोग हो जाते हैं, जब वे सुनते हैं कि एक स्थान पर किसी को बन्दी बनाया गया और दूसरे स्थान पर किसी को जला दिया गया। ये अस्थिर लोग हिम्मत हार बैठते हैं, और सुसमाचार उनके लिये महत्त्वहीन हो जाता है। जो अपने लिये ऐसी ठोकरें खड़ी करते हैं, वे दिखाते हैं कि उनका विश्वास कभी गहरी जड़ वाला नहीं था।

इसके विपरीत, जब हम देखते हैं कि हमारा प्रभु यीशु मसीह उनके द्वारा अपने आप को दृढ़ करता है जिन्हें उसने परीक्षाओं के लिये चुना है, उन्हें अत्याचारियों और अपने सत्य के शत्रुओं के हाथ में रखकर भी उन्हें अजेय स्थिरता देता है, तो इससे हमारा विश्वास दृढ़ होता है। हमें इससे प्रेरणा लेनी चाहिए, क्योंकि निश्चय है कि ऐसा बल किसी में तब तक सम्भव नहीं जब तक परमेश्वर उसमें कार्य न कर रहा हो।

इसलिये हमें परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि जब आवश्यकता हो तब वह हमें दृढ़ करे, और हमें यह भी दिखाए कि उसके सुसमाचार की शिक्षा, जो अपने आप में पर्याप्त अधिकार रखती है, किसी विशेष प्रकार की व्यवस्था के द्वारा और भी पुष्ट की जानी चाहिए। परन्तु शहीदों का लहू और वे लोग जिन्हें परमेश्वर ने अपनी महिमा के लिये पवित्र ठहराया है, इसी उद्देश्य को पूरा करते हैं, क्योंकि वे हमारे सामने उसके प्रतिनिधि का काम करते हैं। पौलुस आगे कहता है कि उसने तुखिकुस को इफिसुस भेजा है कि इफिसियों को उसकी दशा की सूचना मिले। यह भी कलीसिया की सामूहिक उन्नति के लिये कहा गया है। जब सन्त पौलुस अपनी दशा और कार्यों के विषय में कहता है, तो वह अपने शारीरिक स्वास्थ्य या इस वर्तमान जीवन से सम्बन्धित बातों की चर्चा नहीं करता। इसके बदले वह विशेष रूप से इसे विश्वास-अंगीकार और सुसमाचार के प्रति अपने अटल समर्थन से जोड़ता है।

हम जानते हैं कि जब कोई मनुष्य बन्दीगृह में होता है, विशेषकर कोई प्रसिद्ध व्यक्ति, तो लोग उसके विषय में चिन्तित रहते हैं, कि कहीं परमेश्वर उसे दृढ़ता न दे। इसके अतिरिक्त, ऐसे समयों में शैतान भी चैन से नहीं बैठता। जब कभी कोई प्रभावशाली व्यक्ति, जिसने परमेश्वर की कलीसिया को उन्नत किया हो, बन्दी बनाया या दोषी ठहराया जाता है, तो उसे लज्जित करने और बुरे रूप में दिखाने के लिये निन्दा-भरी कहानियाँ फैलाई जाती हैं। यह सब इसलिये किया जाता है कि जो कुछ परमेश्वर ने उसके परिश्रम से पूरा किया है उसे मिटा दिया जाए और उसके काम को निर्बल किया जाए। यह शैतान की चालों में से एक है। इसलिये सन्त पौलुस, यह जानते हुए कि बहुत से निर्बल प्राण उसकी दशा से प्रभावित होकर घबरा सकते हैं, और दूसरे सुसमाचार को ग्रहण करने से हतोत्साहित हो सकते हैं, चाहता है कि उसकी परिस्थिति ज्ञात हो। शैतान के निन्दा-भरे आरोपों का खण्डन होना चाहिए, और सब चुगलखोरों के मुँह बन्द किए जाने चाहिए।

यह विशेष रूप से उनके विषय में महत्त्वपूर्ण है जो केवल कलीसिया में उपद्रव मचाना चाहते हैं, जैसे बखेड़ा करने वाले और निन्दक। सन्त पौलुस तुखिकुस को भेजकर इन सब चिन्ताओं का समाधान करना चाहता है।

इस पद से हम देख सकते हैं कि सन्त पौलुस को कलीसियाओं की निरन्तर भलाई की कितनी चिन्ता थी। वह कह सकता था कि मेरे पास अपने ही निपटाने को बहुत है, मैं शत्रुओं से दबा हुआ हूँ, और दूसरों के विषय में सोचने का मुझे अवकाश नहीं। वह तर्क दे सकता था कि मेरी स्थिति में मृत्यु तक न डगमगाना ही पर्याप्त है। परन्तु वह केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह का विश्वासयोग्य साक्षी और शहीद होने से सन्तुष्ट न रहा। उसने माना कि सुसमाचार को बदनाम करने के लिये शैतान जो भी ठोकरें खड़ी करे उन्हें दूर करना उसका कर्तव्य है। उसने अपने आप को इस कार्य में लगा दिया, जैसा कि हम इस उदाहरण से देख सकते हैं।

इसलिये आओ, हम परमेश्वर की सेवा इस प्रकार करना सीखें कि अपने पड़ोसियों की चिन्ता करें और अपनी पूरी सामर्थ्य भर उनकी भलाई चाहें, जैसा परमेश्वर ने हमें बाँधा है। आओ, हम सन्त पौलुस के उदाहरण पर चलते हुए अपनी अन्तिम साँस तक विश्वासयोग्यता से परमेश्वर की सेवा करें। उसने तुखिकुस को अपना भाई और मसीह में विश्वासयोग्य सेवक कहा, और उसे वह श्रेय दिया जिसका वह अधिकारी था। हमें भी उन्हें ऊँचा उठाने का प्रयत्न करना चाहिए जो कलीसिया की सेवा कर सकते हैं, उनके गुणों को स्वीकार करना और उन्हें वह अधिकार देना चाहिए जिसकी उन्हें आवश्यकता है। सन्त पौलुस का उदाहरण हमें यह सिखाता है, क्योंकि उसने महिमा या कृपा नहीं चाही, वरन् यह चाहा कि मसीह का विश्वासयोग्य सेवक दूसरों की भलाई के लिये जाना और स्वीकार किया जाए।

अपनी पत्री का समापन करते हुए सन्त पौलुस प्रार्थना करता है कि भाइयों को परमेश्वर और हमारे प्रभु यीशु मसीह की ओर से शान्ति, प्रेम और विश्वास मिले। "शान्ति" शब्द सन्त पौलुस प्रायः सामान्य कल्याण और समृद्धि के अर्थ में प्रयोग करता है, केवल मेल-मिलाप के अर्थ में नहीं। इसका अर्थ है परमेश्वर की कृपा, उसकी दया, और सब भलाई की उसके द्वारा वृद्धि। यह पद हमें स्मरण दिलाता है कि भक्तों के बीच सारी समृद्धि केवल परमेश्वर की भलाई से आती है। सन्त पौलुस विश्वास और प्रेम को जोड़ता है, यह दिखाते हुए कि ये आत्मिक वरदान केवल परमेश्वर ही के दान हैं, यद्यपि बहुत से लोग समझते हैं कि उनमें परमेश्वर के हस्तक्षेप के बिना ही सुसमाचार पर विश्वास करने और भले-बुरे में भेद करने की सामर्थ्य है । हमें स्वीकार करना चाहिए कि विश्वास और प्रेम परमेश्वर के अनूठे दान हैं, और उसके पवित्र आत्मा के द्वारा उसके प्रकाश के बिना हम अन्धे और अन्धकार में हैं। हमें आवश्यकता है कि परमेश्वर हमारे हृदयों को कोमल करे और हमें आज्ञाकारिता दे। उसके कार्य के बिना, चाहे हम जीवन भर अच्छी शिक्षा सुनते रहें, वह व्यर्थ होगी।

ऐसा केवल इसी पद में नहीं कहा गया, वरन् पवित्र शास्त्र में शायद ही कोई ऐसा अंश मिले जहाँ परमेश्वर विश्वास देने का काम अपने ही लिये सुरक्षित न रखता हो। सच कहें तो हम अपने आप देख सकते हैं कि जब हम अपनी तुलना विश्वास और उससे मिलने वाली आशीषों से करते हैं, तो हम परमेश्वर के आत्मा से कितने रिक्त हैं। इसीलिये हमारे पास इतने बड़े और उत्तम दान के लिये परमेश्वर की स्तुति करने का उचित कारण है। पवित्र शास्त्र हमें बताता है कि जब परमेश्वर ने मानवजाति पर दृष्टि की, तो उसने सब को बुराई के वश में और मलिनता में डूबा हुआ पाया, और कोई भलाई का खोजने वाला न था।

इसके अतिरिक्त, जहाँ तक हमारी बुद्धि और समझ का सम्बन्ध है, उसे अज्ञानता गिना जाता है, और हमें पूरी तरह पशु-समान कहा गया है। यदि हम परमेश्वर की बुद्धि में उन्नति करना चाहते हैं तो हमें अपनी ही दृष्टि में मूर्ख बनना होगा। हमारे हृदयों के विषय में, वे बचपन ही से दुष्टता और हठ से भरे हैं, जैसा कि पवित्र शास्त्र बार-बार बताता है। चूँकि हम अपनी समझ में अन्धे और अपनी इच्छा में विद्रोही हैं, अब आओ विचार करें कि विश्वास क्या है।

विश्वास परमेश्वर के भेदों की समझ है, जिससे हम अपने प्रति उसके पितृवत् प्रेम को जान सकें, उसका निश्चय कर सकें, और उस स्वर्गीय जीवन को थाम सकें जो फिर भी मानवीय समझ की पहुँच से परे है। संक्षेप में, वह हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह से परिचित कराता है, जो ऊँचा, नीचा, गहरा और चौड़ा फैला हुआ है। इसलिये यदि हम एक ओर यह विचार करें कि विश्वास क्या है, और दूसरी ओर ईमानदारी से अपने आप को जाँचें, अपनी भलाई की पूरी कमी को स्वीकार करें, तो यही उचित है कि हम मान लें कि परमेश्वर के विश्वास-रूपी दान के बिना हम में विश्वास बिल्कुल नहीं है। इस पद से यही शिक्षा लेनी चाहिए।

प्रेम के विषय में भी यही कहा जा सकता है। प्रत्यक्ष है कि हर मनुष्य आत्म-प्रेम की ओर झुका हुआ है, और हमारी अभिलाषाएँ प्रायः हमें दूसरों की हानि पर अपना लाभ खोजने की ओर ले जाती हैं। लोभ और लालच प्रायः हमारे हृदयों पर हावी रहते हैं और हमें अपने पड़ोसियों से सच्चा प्रेम करने से रोकते हैं। इसलिये हमें प्रेम बाहर से प्राप्त करना होगा। परमेश्वर को हमारे भीतर की उस शापित प्रवृत्ति को, अर्थात् अपने आप से अत्यधिक प्रेम को, तोड़ना होगा।

इसके अतिरिक्त, जब हम अपने आप का इन्कार कर चुके हैं, तब हमें समझना चाहिए कि हम अपने पड़ोसियों के ऋणी हैं, और उनके प्रति अपने कर्तव्य पूरे करने का प्रयत्न करना चाहिए। इसीलिये विश्वास और प्रेम को परमेश्वर के विशेष दान कहना ठीक है। यह इस पद में स्पष्ट कहा गया है जब वह कहता है, "हमारे पिता परमेश्वर की ओर से तुम्हें प्रेम और विश्वास मिले।" निश्चय है कि यह कामना यों ही नहीं की गई, वरन् हमें स्मरण दिलाने के लिये कि हमें ये दान परमेश्वर के हाथ से पाने हैं।

इसलिये आओ, हम किसी भी मूर्खतापूर्ण अति-आत्मविश्वास को त्याग दें और जान लें कि जितनी आत्मिक आशीषें हमारे पास हैं वे सब परमेश्वर ने हम पर अपनी उदारता दिखाने के लिये सेंतमेंत दी हैं। मसीहियों की सिद्धता विश्वास और प्रेम में है। इसलिये हमें स्वीकार करना चाहिए कि हमारे प्राणों के उद्धार से जुड़ी हर बात, या जो कुछ भी आदर और प्रशंसा के योग्य है, वह हमारी अपनी बनाई हुई नहीं, वरन् ऊपर से आती है।

हमारे विश्वास के अंगीकार के विषय में कहा गया है कि यह मांस और लहू हम पर प्रकट नहीं करते कि यीशु मसीह परमेश्वर का पुत्र है, वरन् पिता इसे हम पर प्रकट करता है। हमारा प्रभु यीशु मसीह भी पिता का धन्यवाद करता है कि उसने अपने सत्य बुद्धिमानों पर नहीं, वरन् दीनों पर प्रकट किए। इसलिये हमें परमेश्वर की बुद्धि के पाने वाले होने के लिये दीन और अपनी ही दृष्टि में मूर्ख बनना चाहिए। हमें परमेश्वर से पाए हुए दानों के माप के अनुसार उसे आदर देना चाहिए, और इतने दुष्ट न हों कि वह प्रशंसा अपने लिये माँगें जो उसी की है।

जैसे सन्त पौलुस हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह और पिता परमेश्वर से एक करता है, कि हम समझें कि हम उसके बिना कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकते जिसने हमें परमेश्वर से मिलाया। हमारे भ्रष्ट स्वभाव का, हमारी भलाई की कमी का, और हमारे दोषों से भरे होने का, जिससे हम पूरी तरह घृणित बन गए हैं, कारण यह है कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह से दूर हो गए हैं, जो सारी भलाई का सोता है। वह सचमुच उस अनुग्रह की परिपूर्णता से भरा है जो पिता ने उसे दी है। सीमित अंश में नहीं, वरन् इस रीति से कि हम सब उसमें से बिना कभी सूखे खींच सकें। वह कभी न सूखने वाला सोता है।

हम आत्मिक वरदानों की एक बूँद भी नहीं पा सकते जब तक वे हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा, जो एकमात्र प्रणाली है, हम तक न बहें। हमारे प्रभु यीशु मसीह का कर्तव्य केवल यही नहीं कि मध्यस्थ के रूप में हमारे कल्याण के लिये जो आवश्यक है वह हमें दे, जैसा कि चौथे अध्याय में चर्चा की गई, वरन् सन्त पौलुस इस पर और बल देता है कि वह अपने ही अधिकार और सामर्थ्य से हमें विश्वास और प्रेम देता है। इस प्रकार वह अपने पिता के बराबर अधिकार में खड़ा है।

अब हम समझें कि हमें विश्वास से प्रकाशित करने और हमारे हृदयों को सुधारने में हमारे प्रभु यीशु मसीह की भूमिका केवल हमारे मध्यस्थ और परमेश्वर के सेवक के नाते उसकी नहीं, वरन् उसकी अपनी भी है। अन्यथा यहाँ सन्त पौलुस के शब्दों का चुनाव अर्थपूर्ण न होता।

कोई सन्त पौलुस से प्रश्न कर सकता है, कि वह परमेश्वर से प्रार्थना करता है कि अविश्वासियों को विश्वास और सांसारिक लोगों को प्रेम दे, परन्तु भाइयों को नहीं, अर्थात् कलीसिया के सदस्यों को नहीं। यदि वे कलीसिया के हैं, तो वे पहले से परमेश्वर की सन्तान हैं, पवित्र आत्मा से नया जन्म पाए हुए हैं, और इसलिये उनमें विश्वास और प्रेम दोनों हैं। परन्तु सन्त पौलुस प्रकट करता है कि इतना ही पर्याप्त नहीं कि परमेश्वर हम में विश्वास का आरम्भ करे; उसे उसका निरन्तर पोषण भी करना होगा। जैसे हम विश्वास को परमेश्वर का दान कहते हैं, वैसे ही उसे प्रतिदिन उसे बढ़ाना और विकसित करना होगा। इस कथन का सार यही है कि हमें न केवल यीशु मसीह पर विश्वास करने का, वरन् उसके लिये दुःख उठाने का भी अनुग्रह दिया गया है।

जब परमेश्वर हमें विश्वास देता है, तो वह केवल इसलिये नहीं कि हमें तैयार करे कि यदि चाहें तो सुसमाचार पर विश्वास कर लें और फिर अपनी ही सामर्थ्य पर भरोसा करके आगे बढ़ें। नहीं, एक बार जब परमेश्वर ने हमें विश्वास करने की ओर झुका दिया, तो उसे हम में गहरी प्रतीति भी भरनी होगी जो हमें कर्म के लिये उभारे, आगे बढ़ाए, और टिके रहने के योग्य बनाए। इससे हम उन्नति करने, दृढ़ होने, और अन्त तक स्थिर रहने के योग्य होते हैं। इसीलिये सन्त पौलुस बल देता है कि विश्वासियों में भी, जो पहले ही सही मार्ग पर चल पड़े हैं और परमेश्वर के अनुग्रह का अनुभव कर चुके हैं, परमेश्वर उनमें कार्य करता रहता है, कि उनका विश्वास और प्रेम बढ़े और फले-फूले।

इसीलिये हमें परमेश्वर से विश्वास की वृद्धि और प्रेम की तीव्रता के लिये प्रार्थना करनी चाहिए। हमें उससे यह भी माँगना चाहिए कि वह हमें हमारी अपूर्णताओं का बोध कराए, ताकि हम अभिमानी या सन्तुष्ट न हो जाएँ, यह समझकर कि हम ने पूरा विश्वास पा लिया है और दूसरों ने नहीं।

इसलिये हम निश्चित रहें कि जब तक हम इस संसार में हैं, तब तक हम अब भी यात्रा में हैं। इसलिये हमें और आगे बढ़ने का प्रयत्न करना चाहिए। विश्वास या प्रेम में हम चाहे जितने आगे बढ़े हों, निश्चय है कि हम अनेक बातों में कम पड़ते हैं। हम वास्तव में कितनी दूर आए हैं? प्रेम में हम चाहे जितना बढ़े हों, हम में से ऐसा कोई मुश्किल से मिलेगा जिसने लोभ, महत्त्वाकांक्षा और उन अन्य प्रवृत्तियों को पूरी तरह वश में कर लिया हो जो हमें अपने पड़ोसी की भलाई चाहने और उसकी सेवा करने से भटका सकती हैं। यह जानकर हमें अपनी अपूर्णताओं को इस रीति से स्वीकार करना चाहिए कि हम अपने आप से सन्तुष्ट न हों, वरन् सुधरने को प्रेरित हों। चाहे दूसरे हमारी प्रशंसा और सराहना करें, तो भी हमें दीनता और नम्रता से स्वीकार करना चाहिए कि हम अपने लक्ष्य तक पहुँचने से अब भी दूर हैं।

अब इस बात पर लौटें: सन्त पौलुस उनसे बात करता है जो हमारे प्रभु यीशु मसीह से सच्चा प्रेम रखते हैं। पहले जब उसने "भाइयों" का उल्लेख किया, तो उसका आशय उन सब से नहीं था जो सुसमाचार के अनुयायी होने का दावा करते हैं, वरन् विशेष रूप से उनसे जो हमारे प्रभु यीशु मसीह से सच्चाई से प्रेम रखते हैं। इसका अर्थ है कि उसके प्रति उनका स्नेह निर्मल और स्थायी है, कोई क्षणिक भावना नहीं। यहाँ सन्त पौलुस के शब्दों का चुनाव सोच-समझकर किया गया है, क्योंकि प्रत्यक्ष है कि जो सचमुच यीशु मसीह से प्रेम रखते हैं वे बहुत थोड़े हैं। यद्यपि सुसमाचार को अपनाने का अंगीकार करने वाले बहुत हैं, मसीह से सचमुच प्रेम रखने वाले थोड़े हैं। बहुत से, अपने शब्दों से उसका अंगीकार करने के बाद, अपने कामों से उसका इन्कार करते हैं। निकट से जाँचने पर वे भी, जो आरम्भ में आशाजनक दिखते और भला जीवन जीते हैं, परीक्षा या सताहट के सामने डगमगा सकते और भटक सकते हैं।

और इसका कारण यह है कि शैतान प्रायः उनके मार्ग में नई ठोकरें रखता है ताकि उन्हें सही मार्ग से भटका दे। जब सब कुछ ध्यान से तौला जाए, तो तुम बहुत थोड़े ही पाओगे जो सचमुच यीशु मसीह से सच्चाई से प्रेम रखते हैं, अर्थात् जिनके अन्तःकरण में अटल दृढ़ता है। ये लोग, जब मृत्यु या निर्धनता के भय जैसी परीक्षाओं का सामना करते हैं, तो अपने विश्वास में अडिग रहते और अपनी बुलाहट में बने रहते हैं, और यह दिखाते हैं कि पवित्र आत्मा उनमें, उनके हृदयों की गहराई में, राज्य करता है, जब तक वे अपने शरीर की अपूर्णताओं से पूरी रीति से छूट न जाएँ। निस्सन्देह, जो सिद्ध माने जाते हैं, उनमें भी अपूर्णताओं का अंश है। जैसे कोई वृक्ष अपनी डालियों से बाहर देखने में पूरी तरह सूखा दिखे, पर यदि जड़ सशक्त रहे, तो वृक्ष जीवित रहेगा। वह कुछ अनावश्यक डालियाँ झाड़ देगा, पर फिर उगेगा, और स्पष्ट दिखाएगा कि जीवन अब भी उसमें बसा है। इसी प्रकार हम दिन-दिन अपने शरीर की भ्रष्टताओं को काटते जाते हैं जो अब भी हम में बसी हैं, जब तक हम अपनी उस अगम्य सिद्धता की परिपूर्णता को न पहुँचें, जिस लक्ष्य को पाने का प्रयत्न हम प्रतिदिन करते हैं।

अब आओ, हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सम्मुख दीन हों, अपने दोषों को स्वीकार करें, और प्रार्थना करें कि वह हमारी आँखें और अधिक खोले ताकि हम अपने भीतर की निर्बलताओं और दोषों को पहचान सकें। हमें उन दोषों को भी स्वीकार करना चाहिए जिनसे परमेश्वर ने हमें छुड़ाया है और जिनसे वह प्रतिदिन हमें दूर ले जाता रहता है। हमें उसके सम्मुख शोक करना चाहिए, अपने आप को अभागे पापी मानते हुए जो दण्ड के पूरे योग्य होते यदि वह हम पर दया न करता। जब हम उसके वचन का अध्ययन करें, तो वह हमें उन बातों को सुधारने की ओर ले जाए जो हम में अब भी ठीक नहीं हैं। पवित्रता की अपनी खोज में हम उसके पवित्र आत्मा के अनुग्रह को पुकारें, यह जानते हुए कि हमारी असावधानी, या कहें हमारे विद्रोही स्वभाव को देखते हुए, वह हमारे लिये कितना आवश्यक है। फिर भी, इसके बावजूद, हम स्वर्गीय सिद्धता की खोज न छोड़ें, उसकी अगुवाई चाहते हुए कि हम उसे न केवल अपने लिये, वरन् पृथ्वी के सब लोगों और जातियों के लिये भी पाएँ। आमीन।

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मोनर्जिज़्म बुक्स

जॉन कैल्विन द्वारा इफिसियों पर उपदेश, कॉपीराइट © 2023

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विषय-सूची

अभिवादन और सारांश

इफिसियों के नाम सन्त पौलुस की पत्री का सारांश

पहले अध्याय पर पहला उपदेश - इफिसियों 1:1-3

पहले अध्याय पर दूसरा उपदेश - इफिसियों 1:3-4

पहले अध्याय पर तीसरा उपदेश - इफिसियों 1:4-6

पहले अध्याय पर चौथा उपदेश - इफिसियों 1:7-10

पहले अध्याय पर पाँचवाँ उपदेश - इफिसियों 1:13-14

पहले अध्याय पर छठा उपदेश - इफिसियों 1:15-18

पहले अध्याय पर सातवाँ उपदेश - इफिसियों 1:17-18

पहले अध्याय पर आठवाँ उपदेश - इफिसियों 1:19-23

नौवाँ उपदेश, दूसरे अध्याय पर पहला - इफिसियों 2: 1-5

दसवाँ उपदेश, दूसरे अध्याय पर दूसरा – इफिसियों 2:4-6

ग्यारहवाँ उपदेश, दूसरे अध्याय पर तीसरा - इफिसियों 2:8-10

बारहवाँ उपदेश, दूसरे अध्याय पर चौथा - इफिसियों 2:11-13

तेरहवाँ उपदेश, दूसरे अध्याय पर पाँचवाँ - - इफिसियों 2:13-

चौदहवाँ उपदेश, दूसरे अध्याय पर छठा - इफिसियों 2:16-

पन्द्रहवाँ उपदेश, दूसरे अध्याय पर सातवाँ - इफिसियों 2:19-22

सोलहवाँ उपदेश, तीसरे अध्याय पर पहला - इफिसियों 3: 1-6 सत्रहवाँ उपदेश, तीसरे अध्याय पर दूसरा - इफिसियों 3:7-

अठारहवाँ उपदेश, तीसरे अध्याय पर तीसरा - इफिसियों 3:9-12

उन्नीसवाँ उपदेश, तीसरे अध्याय पर चौथा - इफिसियों 3:14-

बीसवाँ उपदेश, तीसरे अध्याय पर पाँचवाँ - इफिसियों 3:14-19

इक्कीसवाँ उपदेश, तीसरे अध्याय पर छठा, और चौथे पर पहला - इफिसियों 3:20-4:2

बाईसवाँ उपदेश, चौथे अध्याय पर दूसरा - इफिसियों 4:1-5

तेईसवाँ उपदेश, चौथे अध्याय पर तीसरा - इफिसियों 4:6-8

चौबीसवाँ उपदेश, चौथे अध्याय पर चौथा - इफिसियों 4:7-10

पच्चीसवाँ उपदेश, चौथे अध्याय पर पाँचवाँ - इफिसियों 4:11-

छब्बीसवाँ उपदेश, चौथे अध्याय पर छठा - इफिसियों 4:11-14

सत्ताईसवाँ उपदेश, चौथे अध्याय पर सातवाँ - इफिसियों 4:15-16

अट्ठाईसवाँ उपदेश, चौथे अध्याय पर आठवाँ - इफिसियों 4: 17-19

उन्तीसवाँ उपदेश, चौथे अध्याय पर नौवाँ - इफिसियों 4:20-24

तीसवाँ उपदेश, चौथे अध्याय पर दसवाँ - इफिसियों 4: 23-26

इकतीसवाँ उपदेश, चौथे अध्याय पर ग्यारहवाँ - इफिसियों 4: 26-28

बत्तीसवाँ उपदेश, चौथे अध्याय पर बारहवाँ - इफिसियों 4:29-30

तैंतीसवाँ उपदेश, चौथे अध्याय पर तेरहवाँ और पाँचवें अध्याय पर पहला

चौंतीसवाँ उपदेश, पाँचवें अध्याय पर दूसरा

पैंतीसवाँ उपदेश, पाँचवें अध्याय पर तीसरा - इफिसियों 5:8-11

छत्तीसवाँ उपदेश, पाँचवें अध्याय पर चौथा - इफिसियों 5: 11-

सैंतीसवाँ उपदेश, पाँचवें अध्याय पर पाँचवाँ - इफिसियों 5

सैंतीसवाँ उपदेश, पाँचवें अध्याय पर पाँचवाँ - इफिसियों 5: 15-18

अड़तीसवाँ उपदेश, पाँचवें अध्याय पर छठा - इफिसियों 5: 18:21

उनतालीसवाँ उपदेश, पाँचवें अध्याय पर सातवाँ - इफिसियों 5:22-26

चालीसवाँ उपदेश, पाँचवें अध्याय पर सातवाँ - इफिसियों 5:25-26 इकतालीसवाँ उपदेश, पाँचवें अध्याय पर आठवाँ - इफिसियों 5:28-

तैंतालीसवाँ उपदेश, छठवें अध्याय पर पहला - इफिसियों 6:1-4

चौवालीसवाँ उपदेश, छठवें अध्याय पर दूसरा - इफिसियों 6:5-

पैंतालीसवाँ उपदेश, छठवें अध्याय पर तीसरा - इफिसियों 6: 10-

छियालीसवाँ उपदेश, छठवें अध्याय पर चौथा - इफिसियों 6:11-

सैंतालीसवाँ उपदेश, छठवें अध्याय पर पाँचवाँ - इफिसियों 6:18-

अड़तालीसवाँ उपदेश, छठवें अध्याय पर छठा - इफिसियों 6:20-

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