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तेरहवाँ उपदेश, दूसरे अध्याय पर पाँचवाँ - - इफिसियों 2:13-15
"पर अब तुम जो पहिले दूर थे, मसीह यीशु में मसीह के लहू के द्वारा निकट हो गए हो। क्योंकि वही हमारा मेल है, जिस ने दोनों को एक कर लिया, और अलगाव की दीवार को जो बीच में थी ढा दिया; और अपने शरीर में बैर अर्थात् विधियों की आज्ञाओं वाली व्यवस्था को मिटा दिया, कि दोनों से अपने में एक नया मनुष्य उत्पन्न करके मेल करा दे।" - इफिसियों 2:13-15
हमने यह भी सीखा है कि अपने स्वभाव से ही हम परमेश्वर के विरोधी हैं, क्योंकि आदम के पाप के कारण हम धार्मिकता के मार्ग से बहुत दूर भटक गए हैं। इसलिये हमारा सारा सार-तत्व दुष्टता और अवज्ञा से बिगड़ा हुआ है। मनुष्य चाहे अपने आप को कितना ही बहलाए और सराहे, फिर भी यह निर्विवाद सत्य है कि हम सर्वशक्तिमान के सामने ऐसी कोई वस्तु नहीं ला सकते जो उसके धर्ममय क्रोध को न भड़काए। इसलिये परमेश्वर उचित रीति से हमें अपनी सृष्टि मानने से भी इनकार कर सकता है। इस वास्तविकता को देखते हुए हमें अपने प्रभु यीशु मसीह की ओर फिरना चाहिए, क्योंकि केवल उसी के द्वारा हम परमेश्वर के निकट जा सकते हैं।
प्राचीन काल में यहूदी लोगों को परमेश्वर के चुनाव के कारण उसकी एक विशेष निकटता प्राप्त थी। ऐसा नहीं था कि वे स्वभाव से शेष संसार से अधिक गुणवान थे, परन्तु परमेश्वर की भलाई ने उन्हें अलग कर लिया था। इसलिये हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने से पहले एक भेद था: एक दल परमेश्वर के निकट था, और दूसरा दूर दिखाई देता था। फिर भी इस भेद का यह अर्थ नहीं लगाना चाहिए कि यहूदी स्वभाव से अन्यजातियों से श्रेष्ठ थे। जैसा पहले कहा जा चुका है, यहूदियों का परमेश्वर के घराने का अंग गिना जाना केवल उसके अनुग्रहपूर्ण चुनाव के कारण था।
अब अन्यजातियों की ओर देखें, तो सन्त पौलुस एक गहरे परिवर्तन पर बल देता है। जो पहले परमेश्वर से दूर थे, वे अब यीशु मसीह के क्रूस पर किए गए बलिदान के कार्य के द्वारा निकट लाए गए हैं। इससे परमेश्वर के अनुग्रह की महिमा प्रकट होती है। जैसा पहले कहा गया, परमेश्वर के हस्तक्षेप से पहले अपनी दुर्दशा की गहराई को समझना अत्यावश्यक है। इसे समझे बिना हम न तो उसके प्रति अपने ऋण के भार को और न ही उसकी दया की व्यापकता को पूरी रीति से सराह सकते हैं। जब हम अपनी दशा को पहचानते हैं, कि हम जन्म से शापित, शत्रु के अधिकार में, पाप के दास और मानो परमेश्वर के कठोर न्याय के सामने खड़े थे, तब हम उस दया को सचमुच समझ सकते हैं जिसने हमें अनन्त निराशा के कगार से बचाकर स्वर्ग के राज्य में पहुँचाया है। यीशु मसीह के द्वारा इस स्वर्गीय राज्य में हमारा उत्तराधिकार निश्चित है। परमेश्वर की असीम भलाई हमारी समझ से परे है, इसलिये यह विषय बार-बार दोहराने योग्य है। दोहराव से डरने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वह हमें परमेश्वर का उचित आदर करने और अटल विश्वास रखने की स्मृति दिलाता है, ताकि हम उसे अपना पिता जानकर निडर होकर उसके निकट जाएँ, और निश्चय रखें कि वह हमें ग्रहण करेगा, बशर्ते सुसमाचार पर विश्वास के द्वारा हम उसके एकलौते पुत्र से जुड़े हों।
इसके अतिरिक्त यह पहचानना आवश्यक है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा ही, जिसने अपनी बलिदानी मृत्यु से हमें पिता परमेश्वर से मिलाया, हम अब स्वर्गीय राज्य के निकट आए हैं। हम कभी उससे बहुत दूर थे, और उसमें प्रवेश या पहुँच की कोई आशा नहीं थी। यद्यपि पौलुस के पहले श्रोता एक विशेष जाति के लोग थे, तौभी सन्देश सार्वभौमिक है। आज पवित्र आत्मा वही शिक्षा हमें इसलिये देता है कि हम अपनी दुर्दशा को स्वीकार करें, दीन बनें, और मसीह में सुसमाचार के द्वारा दिए गए अपार आशीर्वादों को ग्रहण करें। साथ ही पौलुस इस बात पर बल देता है कि मसीह हमारा मेल है, जो यहूदियों और अन्यजातियों को, अर्थात् दूर वालों और निकट वालों को, एक करता है। जैसे उसने पहले अन्यजातियों को दीन करना और परमेश्वर के प्रति उनका ऋण दिखाना चाहा था, वैसे ही यहाँ वह यहूदियों को चेतावनी देता है कि वे अपने घमण्ड पर अंकुश रखें। वे केवल इसलिये अपने आप को श्रेष्ठ न समझें कि परमेश्वर ने उनके वंश को चुना। मनुष्य में अपने आप को बड़ा ठहराने की प्रवृत्ति होती है, और यहूदियों में से कुछ ने, जिन्होंने परमेश्वर के अनुग्रह का दुरुपयोग किया, यह मान लिया कि अब्राहम से चला आता उनका वंश उन्हें परमेश्वर की दृष्टि में ऊँचे आसन पर बैठाता है। जब उन्हें बताया गया कि कलीसिया में बिना किसी भेद के यहूदी और अन्यजाति दोनों होंगे, तो उन्होंने इसे अन्याय समझा। उन्हें बार-बार स्मरण दिलाने की आवश्यकता थी कि परमेश्वर ने उन्हें अपने किसी गुण, कुलीनता या व्यक्तिगत विशेषता के कारण नहीं, परन्तु केवल उनके पूर्वजों के प्रति अपने प्रेम के कारण चुना था, जो उनकी योग्यता पर निर्भर नहीं था।
मूसा और भविष्यद्वक्ताओं ने बार-बार लोगों को चिताया कि वे अपने लिये किसी योग्यता का दावा न करें, परन्तु पूरी रीति से परमेश्वर की असीम भलाई पर भरोसा रखें। वे यह मानें कि दूसरों पर उनकी जो भी श्रेष्ठता है, वह न उनकी अपनी बनाई हुई है और न उनके अपने कारण से है, परन्तु केवल इसलिये कि परमेश्वर को यही अच्छा लगा कि उन्हें अपने निज भाग के लिये अलग करे।
तौभी परमेश्वर के इतने निकट होने और उसकी सन्तान गिने जाने के आश्वासन के होते हुए भी यहूदी अपनी उद्धार की भारी आवश्यकता को नकार नहीं सकते थे। जब वे अपने आप को सच्चाई से जाँचते, तो उन्हें मानना पड़ता कि परमेश्वर उनसे उचित रीति से अप्रसन्न था। उनके विचार, उनकी अभिलाषाएँ, उनके प्राण और उनके शरीर भ्रष्टता से दूषित थे। यह गम्भीर वास्तविकता हमें अपनी दशा पर विचार करते समय भय से भर देनी चाहिए।
यहूदियों के पास व्यवस्था की विधियाँ और प्रतीक थे, जो उन पर परमेश्वर के अनुग्रह के प्रत्यक्ष स्मरण थे। परन्तु ये बाहरी रीतियाँ पर्याप्त नहीं थीं; पशुओं का लहू उनके पापों को शुद्ध नहीं कर सकता था, और न परमेश्वर की कृपा प्राप्त करा सकता था। इसलिये उनके लिये यीशु मसीह की ओर फिरना अनिवार्य था। सन्त पौलुस इस बात पर बल देता है कि यहूदी घमण्ड से अन्यजातियों को कलीसिया से यह कहकर बाहर न रखें कि वे अयोग्य हैं। इसके विपरीत, यीशु मसीह दोनों के लिये मध्यस्थ है और दोनों को पिता परमेश्वर तक पहुँचाता है। उसके बिना हम में से प्रत्येक, चाहे किसी भी पद का हो, उद्धार की आशा से कटा हुआ होता। इस दृष्टि से किसी को भी अपने पड़ोसी को तुच्छ नहीं जानना चाहिए; वरन् विश्वास और प्रेम की एकता में एक दूसरे को गले लगाना चाहिए, यह समझते हुए कि यदि उसका अनुग्रह न होता, तो हम सब, बड़े से लेकर छोटे तक, परमेश्वर की कलीसिया से उचित रीति से बाहर किए जाते।
इसी प्रकार याकूब इस संसार के बड़े लोगों से आग्रह करता है कि वे दीनता में अपनी महिमा मानें, यह जानकर कि परमेश्वर ने उनकी आँखों से वे परदे हटा दिए हैं जिन्होंने उन्हें अपनी दुर्दशा के प्रति अन्धा कर रखा था। प्रायः जो ऊँचे पदों पर होते हैं, वे अपने पद का दुरुपयोग करते हैं और अपने आप को विशेष समझते हैं, जब तक कि परमेश्वर के सत्य के सामने न आ जाएँ। इसलिये संसार के बड़े लोगों की दृष्टि धुंधली हो जाती है; वे भटक जाते हैं और बेरोक-टोक मनमानी करते हैं। याकूब उन्हें सलाह देता है कि वे अपनी दीनता पर गर्व करें, क्योंकि प्रभु उन पर प्रकट करता है कि वे अपने आप में सर्वथा असहाय हैं, फिर भी वह उन पर अपनी असीम दया करता है।
इसलिये जिस एकता की हमें आवश्यकता है, उसे बनाने की कुंजी यह है कि हम में से प्रत्येक अपने-अपने ढंग से अपनी दीन और दयनीय दशा को स्वीकार करे। जब हम अपने आप को परमेश्वर की दया और अनुग्रह के हाथ में सौंपते हैं, तो हमें समझना चाहिए कि उसकी दया सर्वव्यापी है और हमारी सीमाओं या प्रतिबन्धों के अधीन नहीं है। वरन् जब उसने हमें चुन लिया है, तो हमारा कर्तव्य है कि जिन्हें उसने हमारे साथ एक ही संगति में इकट्ठा किया है, उन्हें हम अपनाएँ। इससे यह बात दृढ़ होती है कि हमारा प्रभु यीशु मसीह सब लोगों का मेल कराने वाला है, चाहे वे जो कभी निकट थे या जो कभी दूर थे। फिर भी, जैसा पहले कहा गया, यह उन यहूदियों के अत्यधिक घमण्ड का प्रतिकार करने की चेतावनी है, जो अन्यजातियों को परमेश्वर के राज्य से बाहर रखना चाहते थे। यह इस विचार को पुष्ट करता है कि यदि हम चाहते हैं कि यीशु मसीह हमारा मध्यस्थ हो, जो हमें पिता परमेश्वर तक पहुँचाए और हमारी अगुवाई करे, तो यह सब परमेश्वर की केवल दया पर ही टिका होना चाहिए। हमें मूर्खता से दूसरों पर श्रेष्ठता या अधिमान का दावा नहीं करना चाहिए, और यह पहचानना चाहिए कि हम सब परमेश्वर की असीम दया पर निर्भर हैं, क्योंकि जैसा सन्त पौलुस कहीं और कहता है, हम सब पाप में फँसे हुए थे।
अब हमें इन शिक्षाओं को अपने जीवन में लागू करना चाहिए। कभी-कभी लोग अपने आप को परमेश्वर की दृष्टि में अधिक आदरणीय समझ लेते हैं क्योंकि कुछ लोगों ने आदरणीय और सद्गुणी जीवन बिताया है, जबकि दूसरे दीन परिस्थितियों में जन्मे थे। कुछ में उत्कृष्ट गुण या प्रतिभाएँ हो सकती हैं, और प्रत्येक जन कुछ ऐसा दिखाना चाहता है जिसके कारण वह समझता है कि परमेश्वर उस में अपने पड़ोसी से अधिक प्रसन्न होगा।
परन्तु हम समझ लें कि यद्यपि हम बाहर से परमेश्वर के निकट दिखाई दें, तौभी उसकी सच्ची कृपा पाने, आशा के साथ उसे पुकारने, और यह भरोसा रखने का कि वह हमें अपने पितृवत् प्रेम में ग्रहण करेगा, एकमात्र मार्ग यह है कि यीशु मसीह हमारा सिर हो। यह कैसे हो? निश्चय ही वह खोए हुओं को बचाने आया। जैसा कहीं और कहा गया है, यह निर्विवाद सत्य है कि हमारा प्रभु यीशु मसीह दण्ड के योग्य ठहरे हुओं को उद्धार के लिये बुलाने आया। इसलिये हम सच्ची नम्रता के साथ दीन बनना सीखें, केवल ऊपरी पीछे हटना नहीं, परन्तु अपने आप को पूरी रीति से नीचा और छोटा करना, ताकि परमेश्वर को वह महिमा मिले जिसका वह अधिकारी है। हम में से कोई भी अपने आप को दूसरे से ऊँचा न ठहराए, वरन् हम एक देह बन जाएँ, क्योंकि इसी शर्त पर हम बुलाए गए हैं।
फिर, हम अपने प्रभु यीशु मसीह को दिए गए इस नाम पर विचार करें कि वह हमारा मेल है। उसके बिना हम सदा तिनके या लकड़ी के कुन्दों के समान बने रहते, क्योंकि जिन्हें अपने पापों का कुछ भी बोध है, वे भीतर गहरी व्याकुलता के बिना शान्ति नहीं पा सकते। वे इतने बेचैन होते हैं कि उनके लिये भूमि के नीचे गाड़ा जाना इससे अच्छा होता कि वे परमेश्वर के न्याय-आसन के सामने सदा उघड़े हुए, इस प्रकार तड़पते रहें। इसलिये यदि यीशु मसीह हमारा मेल नहीं है, तो या तो विवेक का जाग उठना हमें अवश्य व्याकुल करेगा, और हमें ऐसा लगेगा कि परमेश्वर शत्रु बनकर हमारे विरुद्ध खड़ा है; या वह हमारी इन्द्रियों को बिलकुल सुन्न कर देगा और हम पशुओं के समान हो जाएँगे। तब हम न केवल पाप की नींद में पड़ेंगे, वरन् शैतान के फन्दे में भी फँसेंगे, और अपने पापों के लिये न शोक अनुभव करेंगे और न पछतावा।
यह पहचानना कि यीशु मसीह हमारा मेल है, कितना महत्त्वपूर्ण है, इसे बढ़ाकर नहीं कहा जा सकता। पहले तो यह हमें गहराई से झकझोरे, हमें अपने पापों के प्रति सजग करे और उन पर शोक की ओर ले जाए, जब हम सोचते हैं कि परमेश्वर का न्याय हमारी बाट जोह रहा है। इसीलिये वह केवल उन्हीं को अपने पास बुलाता है जो थके और बोझ से दबे हैं। फिर हम यह समझते हैं कि हम सब सन्देह और अविश्वास दूर कर सकते हैं, क्योंकि यद्यपि हमने परमेश्वर का क्रोध भड़काया, वह हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा शान्त हो गया है। जहाँ हम पहले परमेश्वर से निरन्तर युद्ध कर रहे थे, वहाँ यीशु मसीह ने हमारा मेल करा दिया। जहाँ परमेश्वर ने पहले हमारे पापों और हमारे दुष्ट, भ्रष्ट स्वभाव के कारण हमें त्याग दिया था, वहाँ यीशु मसीह ने ऐसी सब रुकावटें हटा दीं, ताकि परमेश्वर हमें न केवल अपनी छवि में रचे हुए प्राणी जानकर, परन्तु अपनी प्रिय सन्तान जानकर ग्रहण करे, जिन्हें उसने अपने राज्य का वारिस होने के लिये गोद लिया है।
जब हम इस सत्य को पूरी रीति से समझ लेंगे, तब बेचैन संसार आज बहुतों के समान एक छोर से दूसरे छोर तक डगमगाता और लड़खड़ाता न रहेगा। उनके काम प्रायः उनके घमण्ड के आसपास घूमते हैं, जो उन्हें सीधे परमेश्वर के पास आने से रोकता है। वे अपनी स्वतन्त्र इच्छा और योग्यताओं पर भरोसा रखते हैं और यीशु मसीह के अनुग्रह से अनजान रहते हैं। वे उससे जितना हो सके दूर रहते हैं, और इस बीच परमेश्वर उनके साथ उनके कर्मों के अनुसार व्यवहार करता है। जो अपनी धार्मिकता पर इतने मोहित हैं कि मानते हैं कि वे ऐसा जीवन बिता सकते हैं जो परमेश्वर के निकट जाने और उससे कुछ कमाने के योग्य हो, वे देखेंगे कि जब उन्हें अपनी योग्यताओं और प्रायश्चित्तों की सबसे अधिक आवश्यकता होगी, तब वे हवा के समान उड़ जाएँगी। वे दूसरे छोर पर जा गिरते हैं, और सोचते हैं कि बिना बिचवइयों और वकीलों के परमेश्वर के पास कैसे आएँ। वे इतने मध्यस्थ गढ़ लेते हैं कि आश्चर्य होता है। इस प्रक्रिया में वे यीशु मसीह को लगातार अनदेखा करते हैं और उसकी ओर फिरने के बदले, जो सच्चा मार्ग है, अपने ही मार्ग बना लेते हैं। इस कारण, जब वे उस सही मार्ग को छोड़ देते हैं जो उन्हें भटका नहीं सकता, तो वे भिन्न-भिन्न दिशाओं में भटकते फिरते हैं। बहुत परिश्रम के बाद वे अपने हाथ-पैर दोनों तोड़ बैठते हैं, और यही पाते हैं कि जितना वे आगे बढ़ते हैं, उतना ही परमेश्वर से दूर होते जाते हैं।
इसलिये हमारे लिये पौलुस के इन वचनों का महत्त्व समझना और भी आवश्यक हो जाता है। इनमें हमें यह आश्वासन मिलता है कि यदि यीशु मसीह हमारा मेल और शरण हो, तो हमारा अनुग्रहकारी परमेश्वर प्रेम से हमारा स्वागत करेगा। इसलिये उस पाठ के शेष भाग पर भी विचार करें जिसका मैंने पहले उल्लेख किया: "तुम अपने मन में विश्राम पाओगे।" इन वचनों के द्वारा हमारा प्रभु यीशु मसीह चाहता है कि हम समझें कि जो कोई अपने आप को उससे अलग करता है, और मध्यस्थ जानकर उसमें सन्तोष नहीं पाता, वह निरन्तर बेचैनी की दशा में रहेगा। चाहे वह भाँति-भाँति के आश्वासनों से अपने आप को तसल्ली देने और अपने मन को धोखा देने का प्रयत्न करे, तौभी चिन्ता उसे सताती रहेगी और उसे खड़े होने के लिये ठोस भूमि न मिलेगी। उसके पास कोई सुरक्षित बन्दरगाह न होगा जो उसे जीवन के तूफानों से बचाए। इसलिये यदि हम स्वतन्त्रता से और बिना झिझक परमेश्वर के निकट जाना चाहते हैं, तो हमारा कर्तव्य है कि अपने प्रभु यीशु मसीह की ओर फिरें और दृढ़ निश्चय करें कि वही अकेला हमारा मेल है।
सारांश यह कि प्रत्येक जन, बिना किसी अपवाद के, चाहे वह परमेश्वर के निकट हो या दूर, एकता में एक साथ आए। यदि कोई समझता है कि उसमें अपना कोई मूल्य या योग्यता है, तो वह जब तक ऐसे विचारों को न छोड़े, कभी हमारे प्रभु यीशु मसीह की ओर नहीं फिरेगा। इसके विपरीत, यदि हम संसार की दृष्टि में आशा से परे भी हों, तौभी हम निश्चय रख सकते हैं कि हमारा प्रभु यीशु मसीह हमारे सब अधर्मों की स्मृति को मिटाने में पूर्णतः समर्थ है। ऐसा करने से परमेश्वर हमें अपनी कृपा में ग्रहण करेगा। सन्त पौलुस, यह पुष्टि करके कि यीशु मसीह अभागे पापियों को बचाने आया, स्वयं एक उदाहरण है। यद्यपि वह पहले कलीसिया का सतानेवाला और सत्य का शत्रु था, और उसने निर्दोष लहू भी बहाया, तौभी वह न केवल मण्डली में ग्रहण किया गया, परन्तु सारे संसार में उद्धार का सन्देश फैलाने के लिये प्रेरित भी चुना गया। परमेश्वर ने अपनी भलाई का धन उस पर उँडेल दिया। इसलिये यदि हम अपने प्रभु यीशु मसीह पर भरोसा रखें और उसकी बलिदानी मृत्यु के द्वारा पिता परमेश्वर से मेल-मिलाप चाहें, तो चाहे हम निराशा की गहराई में भी हों, यीशु मसीह हमें वहाँ से निकाल लाएगा। वह स्पष्ट दिखा देगा कि उसे दिया गया नाम कोई कल्पना मात्र नहीं है।
इसके अतिरिक्त पौलुस इस बात पर बल देता है कि यीशु मसीह ने वह दीवार ढा दी जो उन्हें पहले अलग करती थी। वह इस उपमा का प्रयोग यह समझाने के लिये करता है कि व्यवस्था की विधियाँ और प्रतीक मिटा दिए गए हैं। अब हमारी शान्ति और भाईचारे के प्रेम में एकता के मार्ग में कोई रुकावट नहीं है। थोड़ा आगे वह व्यवस्था की विधियों को बीच की दीवार के समान बताता है। जैसे आज हमारे पास अन्यजातियों से भेद करने वाला चिह्न बपतिस्मा है, वैसे ही जब परमेश्वर ने यहूदियों को चुना, तब उसने उनके लिये खतना ठहराया। जब हम बपतिस्मा पाते हैं, तो हम वह चिह्न धारण करते हैं जो हमें उसकी कलीसिया और उसके पुत्र यीशु मसीह की भेड़-बकरियों का अंग ठहराता है। इसी प्रकार व्यवस्था के समय में खतना यही प्रयोजन पूरा करता था, और बलिदान इस बात के साक्षी थे कि परमेश्वर ने उनके पाप क्षमा किए। इसलिये, यह विशेषाधिकार केवल अब्राहम के वंशजों को दिया गया था, अतः यह बीच की दीवार के समान था, पशुओं के बाड़े या घेरे की नाईं। मूसा के गीत में प्रकट होता है कि परमेश्वर ने अब्राहम के वंश को अपनी ईश्वरीय सुरक्षा दी और उन्हें शेष संसार से अलग किया। वे परमेश्वर की निज सम्पत्ति थे, और विधियाँ इस विशेष सम्बन्ध को बनाए रखने के लिये दीवारों या सीमाओं का काम करती थीं, और परमेश्वर की देखरेख और रखवाली में इस जाति की रक्षा करती थीं।
अन्यजातियों के विषय में, उन्हें उनके अपने मार्गों पर, यहाँ तक कि उनकी अपनी हानि के लिये भी छोड़ दिया गया था। परमेश्वर ने उन पर अपनी धार्मिकता प्रकट करने का विशेषाधिकार नहीं दिया। सन्त पौलुस स्पष्ट बताता है कि परमेश्वर ने उन्हें अपनी भूलों में बने रहने दिया, और इस बात में वे अभागे पशुओं के समान थे। इस प्रसंग में सन्त पौलुस की यह बात स्पष्ट हो जाती है कि विधियाँ यहूदियों को अन्यजातियों से अलग करने वाली दीवार का काम करती थीं। परन्तु ये सब रुकावटें गिरा दी गई हैं, क्योंकि यीशु मसीह, जो सत्य और सार-स्वरूप है, इन छायाओं को मिटाने आ गया है। रीति-विधि की व्यवस्था इसलिये नहीं दी गई थी कि लोगों को अपने ही में भस्म कर दे, जैसा कपटी प्रायः करते हैं, और परमेश्वर के अभिप्राय को बिगाड़ देते हैं। वह इसलिये दी गई थी कि जब तक हमारा प्रभु यीशु मसीह संसार में प्रकट न हो, तब तक आशापूर्ण प्रतीक्षा में उन्हें थामे रखे।
उसके आगमन से इन सब का मिटा दिया जाना अकारण नहीं था। क्योंकि मसीह ने धार्मिकता के सूर्य के रूप में हमें प्रकाशित किया है। इसलिये अब हमें अन्धकारमय छायाओं में फँसे रहने की कोई आवश्यकता नहीं। उसके द्वारा बैर मिट गया है, क्योंकि अब हम उस वंश से जुड़ गए हैं जिसे परमेश्वर ने अपने लिये पवित्र ठहराया था। अब कोई विभाजन नहीं रहा, क्योंकि हम विश्वास के द्वारा अब्राहम की सन्तान बनकर एक आत्मिक परिवार बन गए हैं। पुरानी व्यवस्था की विधियों के विपरीत, बपतिस्मा और प्रभु-भोज, जो मसीह के ठहराए हुए संस्कार हैं, विभाजन उत्पन्न नहीं करते। यद्यपि हम अविश्वासियों से और उनसे जो परमेश्वर की कलीसिया में नहीं आए, अलग रहते हैं, तौभी परमेश्वर किसी एक जाति को अपनी अकेली निज जाति मानकर उसका पक्ष नहीं लेता। उसका अनुग्रह सब पर बढ़ाया गया है। वे भेद जो पहले थे, कि हम अब्राहम की सन्तान हैं और दूसरे बाहर हैं, मिटा दिए गए हैं। जैसा पवित्रशास्त्र के अनेक स्थलों में प्रमाणित है, अब न यहूदी रहा न यूनानी। इसलिये जो कोई परमेश्वर का नाम लेता है, चाहे वह किसी भी जाति का हो, वह उसे समान रूप से प्रिय है और उसके द्वारा ग्रहण किया जाता है, जैसा सन्त पतरस ने प्रेरितों के काम 16 में और अपनी पहली पत्री में देखा।
बपतिस्मा और प्रभु-भोज अब सारे संसार को एक करने का काम करते हैं। अत्यन्त असभ्य जातियाँ भी परमेश्वर के पास आ सकती हैं, और बपतिस्मा दिए जाने पर वे ग्रहण की जाएँगी, क्योंकि वह उन सब का है जो परमेश्वर के एकलौते पुत्र की देह में सम्मिलित किए गए हैं। आइए हम इस पाठ को अपनी आत्मिक उन्नति के लिये लागू करें। सबसे पहले हम यह पहचानें कि विधियों का मिटाया जाना, विशेषकर उनका पूरा होना, हमारे लिये स्वर्ग के फाटक खोलने की कुंजी था। इन विधियों की पूर्ति पूरी रीति से हमारे प्रभु यीशु मसीह में प्रकट हुई। वे तुच्छ या निष्फल नहीं थीं। तौभी हमें उन्हें ऐसे बरतने से बचना चाहिए मानो यीशु मसीह में हमें उनकी पूरी सिद्धता प्राप्त है। इसके बदले हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि परमेश्वर ने उन पर, जिन्हें उसने कभी बाहर रखा था, अपनी भलाई कैसे उँडेल दी है। इसी प्रकार हम आज उसके हैं, और इसी कारण सुसमाचार सारे संसार में सुनाया जाता है। चाहे संसार घोर अन्धकार और उजाड़ में डूबा रहा हो, तौभी परमेश्वर वह पूरा करता है जो उसकी व्यवस्था में घोषित है: वह हजार पीढ़ियों तक अपनी दया बनाए रखता है। यही वह पहली शिक्षा है जो हमें अपने हृदयों पर अंकित करनी चाहिए।
फिर, यद्यपि बपतिस्मा किसी विशेष जाति, नगर या देश के लिये नहीं है, तौभी जब परमेश्वर हमें अपने संस्कारों का विशेषाधिकार देता है, तब वह हमें अपना निज ठहराता है। वह हमारे गोद लिये जाने की मुहर है और उस आशा को पोषित करता है जो सुसमाचार के द्वारा हमारे भीतर डाली गई है। यह सच है कि जो बाद में हमारे प्रभु यीशु मसीह से फिर जाते हैं, वे अपने बपतिस्मा को निष्फल कर देते हैं। परन्तु इस खोने की भारी कीमत चुकानी पड़ती है, क्योंकि यीशु मसीह के साथ हमारे मेल को सूचित करने के लिये परमेश्वर की दी हुई प्रतिज्ञा और गारंटी इतनी मूल्यवान है कि उसका दुरुपयोग नहीं किया जा सकता। जो कलीसिया का नाम धारण करते हैं, परन्तु अव्यवस्था और विलासिता का जीवन बिताते हैं, वे अन्त में अपने बपतिस्मा को, जो परमेश्वर ने उनके उद्धार के लिये ठहराया था, अशुद्ध करने के परिणाम भुगतेंगे।
हम अपनी ओर से सावधान रहें और अपने आप को संसार की मलिनता से अलग किए गए लोगों के समान चलाएँ। जैसा सन्त पतरस कहता है, यीशु मसीह ने हमें अपने लिये इसी उद्देश्य से इकट्ठा किया है कि हम उसकी महिमा करें, और यह स्वीकार करें कि उसने हमें इस संसार के अन्धकार और शैतान की पकड़ से निकालकर अपनी अद्भुत ज्योति में पहुँचाया। जैसा गलातियों की पत्री में दिखता है, यीशु मसीह की बलिदानी मृत्यु का उद्देश्य हमें संसार की सब अशुद्धता और नैतिक मलिनता से खींच लेना है। इसी प्रकार थिस्सलुनीकियों की पहली पत्री में सन्त पौलुस बल देता है कि हम अशुद्धता के लिये नहीं, परन्तु पवित्रता के लिये बुलाए गए हैं। हम पवित्रता में अपने आप को परमेश्वर के लिये समर्पित करें, और इस प्रकार उसकी दी हुई सब वस्तुओं के द्वारा सचमुच उसका आदर करें।
सन्त पौलुस के इन वचनों से जो महत्त्वपूर्ण शिक्षा हमें लेनी चाहिए, वह यह है कि हम अनियन्त्रित और निर्बुद्धि पशुओं के समान भटकते न फिरें, और न परमेश्वर के जूए का विरोध करें। इसके बदले हम उसे सच्ची आज्ञाकारिता के साथ उठाएँ, अपनी पापमय अभिलाषाओं से दूर रहें, और परमेश्वर की प्रिय निज सम्पत्ति के रूप में पूरी रीति से उसी को समर्पित पवित्र जन होकर चलने का मन से प्रयत्न करें। आज हमें इस पाठ की शिक्षाओं को इसी प्रकार अपने जीवन में उतारना चाहिए।
फिर, सन्त पौलुस बल देता है कि यीशु मसीह ने ये ईश्वरीय कार्य शरीर में पूरे किए, जिससे हमारी मानव-प्रकृति के साथ उसका सम्बन्ध प्रकट होता है। इससे हमें यह आश्वासन मिलता है कि उसमें हम परमेश्वर की प्रिय सन्तान गिने जाते हैं। जैसे हम सब आदम के पतन में फँसे थे, वैसे ही अब अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा, जिसे प्रायः दूसरा आदम कहा जाता है, हम उद्धार की आशा में बहाल किए गए हैं। हम निश्चय से भरोसा रख सकते हैं कि मसीह के कारण परमेश्वर सदा हमारा पिता रहेगा। विशेष बात यह है कि यीशु मसीह ने स्वर्गदूतों का स्वभाव नहीं लिया; वरन् वह अब्राहम का वंशज बना। जहाँ मत्ती यीशु मसीह की वंशावली अब्राहम से आरम्भ करता है, और पीढ़ियों तक चली आती प्रतिज्ञाओं की पूर्ति को रेखांकित करता है, वहाँ लूका हमें और भी पीछे ले जाता है, और दिखाता है कि यीशु मसीह आदम से भी पहले विद्यमान था। यह सच है कि वह अपनी माता के गर्भ में पवित्र आत्मा के द्वारा आश्चर्यजनक रीति से गर्भ में आया। तौभी वह अब्राहम, दाऊद और आदम का सच्चा वंशज है। उसमें हम अपने आप को सच्चे भाई-बहन पाते हैं, जो उसकी मनुष्यता में उसके साथ एक हैं, जैसा हम पाँचवें अध्याय में और आगे देखेंगे। इसलिये हम निश्चित हो सकते हैं कि उसके द्वारा परमेश्वर ने हमें अपनी प्रिय सन्तान के रूप में गोद लिया है, और हमें दूर खोजने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि हम उसके सार-तत्व से ही घनिष्ठ रूप से जुड़े हैं।
सारांश यह कि सन्त पौलुस का यह कहना कि यीशु मसीह ने ये सब ईश्वरीय कार्य शरीर में पूरे किए, यह बताता है कि अपनी स्वर्गीय महिमा और ईश्वरीय प्रताप के होते हुए भी उसने पाप को छोड़ सब बातों में स्वेच्छा से हमारी मानव-प्रकृति धारण की। उसने हमारे दुःख, हमारी आवश्यकताएँ और हमारी दुर्दशा उठाई, और हमारी मनुष्यता को पूरी रीति से अपनाया, ताकि हम पर अपनी असीम करुणा बढ़ा सके। हम निश्चय रख सकते हैं कि जब हम परमेश्वर के सामने उपस्थित होते हैं, तब उसके एकलौते पुत्र के द्वारा हम उसके साथ एक हो जाते हैं। यीशु मसीह, जो सच्चा परमेश्वर है और देहधारण के द्वारा हमारा सगा बना, उसने स्वेच्छा से अपने आप को दीन किया और अपने आप को पूरी रीति से खाली कर दिया। वैसे ही वह हमें भी ऊँचा उठाकर अपनी स्वर्गीय महिमा में सहभागी बनाएगा। इसीलिये वह हमारा भाई कहलाता है, और यही एक सत्य सब सन्देहों को दूर कर देता है। जब हम पूछते हैं कि क्या परमेश्वर हमें ग्रहण करेगा, तब इस पुष्टि से आगे देखने की आवश्यकता नहीं कि यीशु मसीह हमारा भाई है। मलिनता से इस विशाल अलगाव और परमेश्वर के किए हुए इस महान उद्धार को, जो उसके पितृवत् प्रेम की पुष्टि है और जिस पर हमारा उद्धार दृढ़ता से टिका है, समझने के लिये, यह सब यीशु मसीह के व्यक्तित्व के द्वारा है, इससे गहरी और कौन सी बात हमें चाहिए?
परन्तु यह सचमुच दुःख की बात है कि पोप-मतवादियों में कुछ भटके हुए लोग, मार्गदर्शन और बुद्धि के अभाव में, निरन्तर अनिश्चितता की दशा में पड़े रहते हैं। वे अपनी अन्धविश्वासी रुचि के अनुसार कुँवारी मरियम, सन्त माइकल, सन्त पतरस और अनगिनत अन्य सन्तों की आराधना करना चाहते हैं। फिर भी उनकी भक्ति बेचैनी से बिगड़ी हुई है, क्योंकि उनके पास परमेश्वर के वचन की दृढ़ नींव नहीं है। जब वे उलझन में पड़ते हैं, तो वे खोए हुए बन्दियों के समान, सर्वथा भौचक्के होकर, चाहे जितना करवटें बदलें, कोई चैन नहीं पाते।
इसके ठीक विपरीत, हमें यह अटल निश्चय प्राप्त है कि हमारा प्रभु यीशु मसीह हमारे मेल का स्रोत है, जो हमें पिता परमेश्वर से मिलाता है। यह ऐसा अमूल्य आशीर्वाद है जिसके लिये आवश्यकता पड़ने पर हमें दस हजार मृत्युएँ भी सहर्ष सह लेनी चाहिए। सन्त पौलुस समझाता है कि व्यवस्था विधियों और आज्ञाओं की थी, जिसका अर्थ है कि अन्यजातियों को उद्धार देते समय परमेश्वर ने धर्ममय जीवन की व्यवस्था को रद्द नहीं किया। इसके बदले उसने केवल उन रीतियों को मिटाया जो एक विशेष समय के लिये और अब्राहम के वंश के लिये ठहराई गई थीं।
तो तुम देख सकते हो कि वास्तव में क्या मिटाया गया। इसलिये आइए, हम व्यवस्था के रीति-सम्बन्धी अंशों को अलग रख दें, जैसे खतना, बलिदान की रीतियाँ, पर्वों के दिनों का उस रीति से पालन जैसा वे पहले किए जाते थे, भोजन-सम्बन्धी प्रतिबन्ध, रीति की ज्योतियाँ, धूप, और वह सब जो मूसा के द्वारा लिखित रूप में ठहराया गया था। ये सब रीतियाँ मसीह के आने के साथ मिट गईं। परन्तु उस व्यवस्था को जो परमेश्वर ने हमें सौंपी है और जो अपरिवर्तित बनी है, हमें दृढ़ता से थामे रहना चाहिए। यह ईश्वरीय व्यवस्था माँग करती है कि हम पवित्रता से उसकी आराधना करें, उसके नाम को पुकारें, उस पर अपना अटल भरोसा रखें, उसकी दी हुई प्रचुर आशीषों के लिये उसे अपनी श्रद्धा अर्पित करें, और उसके पवित्र नाम को पवित्र ठहराएँ। इसके अतिरिक्त मेरी सलाह है कि हम नैतिक शुद्धता का जीवन बिताएँ, अपने संगी मनुष्यों के प्रति सद्भाव और शुद्ध विवेक रखें, और किसी को हानि न पहुँचाएँ। अन्त में, हम संसार की अशुद्धताओं और भ्रष्टताओं से अपने आप को दूर रखें।
इस अंश में यह स्पष्ट होता है कि वह ईश्वरीय व्यवस्था, जो परमेश्वर ने हमारे जीवन के लिये मार्गदर्शक ज्योति के रूप में हमें दी है, अपरिवर्तित बनी है। वह रद्द नहीं की गई; उसके केवल वे अंश हटाए गए हैं जो परम्पराओं और रीतियों के थे, जो मूसा और भविष्यद्वक्ताओं के समय अपना प्रयोजन पूरा करते थे और यीशु मसीह में पूरे होने को ठहराए गए थे। इसलिये यह प्रकट है कि जब हमें इन छायाओं को छोड़ना पड़ा, जिनका मूसा और भविष्यद्वक्ताओं के काल में पूरा अर्थ था, तब मसीही कलीसिया के लिये और भी उचित है कि वह अपने आप को मनुष्यों की गढ़ी हुई बातों के बोझ से न लादे।
सन्त पौलुस की शिक्षाओं के प्रकाश में हमें परमेश्वर की उस व्यवस्था से सन्तुष्ट रहना चाहिए जो हमें विश्वासयोग्य जीवन के मार्ग सिखाती है। इसमें धार्मिकता, न्याय, विश्वासयोग्यता और दया की खोज सम्मिलित है, और विशेषकर प्रार्थना के द्वारा परमेश्वर के साथ सच्ची और आत्मिक संगति पर बल है। इस निर्णायक बात पर ध्यान दो। इसके अतिरिक्त वह कहता है कि इन दिनों में व्यवस्था की छायाएँ न केवल अनावश्यक हैं, वरन् एक परदे का काम करती हैं जो हमें अन्धकार में ढक देता है, और हमारे प्रभु यीशु मसीह को वैसा देखने में बाधा डालता है जैसा हमें उसे देखना चाहिए, जो सुसमाचार में प्रतिबिम्बित है। इसलिये हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि हमसे जिस धार्मिकता की माँग की जाती है, वह पोप-मतवादियों की भ्रान्त धारणाओं से भिन्न है। वे जिन क्रियाओं को ईश्वर-सेवा ठहराते हैं, वे खोखली रीतियाँ मात्र हैं, जो केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के गहन कार्य को ढकने का काम करती हैं। ये अभागे जन ऐसी रीतियों में फँसे हैं और अपना पूरा भरोसा उन्हीं पर रखते हैं।
जब मैं भटके हुए लोगों की बात करता हूँ, तो उनमें उन्हें भी गिनता हूँ जो अपने आप को बहुत ज्ञानी मानते हैं, क्योंकि वे भी खोए हुए पशुओं के समान जाल में फँसे हैं। इसलिये आइए, हम सुसमाचार की सादगी को दृढ़ता से थामे रहना सीखें और उसके पवित्र पृष्ठों में अपने प्रभु यीशु मसीह को निहारें। वह हमारे निकट आ गया है, ताकि हम उसके द्वारा उठाए जाएँ, और हमें परमेश्वर को अपना पिता कहकर पुकारने का साहस मिले, और जब हम सच्चे मन से उसके पास आएँ, तो बिना झिझक उसकी शरण लें। अब आइए हम अपने भले परमेश्वर के प्रताप के सामने दीन होकर अपनी कमियाँ मान लें। हम सच्चे मन से प्रार्थना करते हैं कि जैसे वह हमें अपने पापों का अधिक से अधिक बोध कराता है, वह हमें सच्चे पश्चाताप, धर्ममय जीवन और पवित्र चाल-चलन की ओर ले जाए। अपनी दुर्बलता और अपने भीतर के अनेक दोषों को पहचानते हुए, वह कृपा करके हमें तब तक सम्भाले रखे जब तक वह हमें इस संसार से न बुला ले और हमारे स्वरूप का वह रूपान्तरण पूरा न कर दे, उसे अपने ही स्वरूप के अनुरूप बनाकर, उस ईश्वरीय कार्य के अनुसार जो उसने हमारे भीतर आरम्भ किया है। आइए, हम सब कहें, "सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता, इत्यादि।"
