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इफिसियों 2:19-22 पर दूसरे अध्याय का सातवाँ, अर्थात् पन्द्रहवाँ उपदेश
"इसलिये अब तुम विदेशी और परदेशी नहीं रहे, परन्तु पवित्र लोगों के संगी स्वदेशी और परमेश्वर के घराने के हो गए; और प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं की नींव पर, जिसके कोने का पत्थर स्वयं मसीह यीशु है, बनाए गए हो; जिसमें सारी रचना एक साथ मिलकर प्रभु में एक पवित्र मन्दिर बनती जाती है; जिसमें तुम भी आत्मा के द्वारा परमेश्वर का निवासस्थान होने के लिये एक साथ बनाए जाते हो।" - इफिसियों 2:19-22
हम पहले देख चुके हैं कि पवित्र आत्मा सन्त पौलुस के वचनों के द्वारा हमारे सामने एक दर्पण रखता है, जिसमें हम परमेश्वर की असीम भलाई को देख सकते हैं। वह हमें मृत्यु के अन्धकारमय कारागारों से खींचकर अपनी सन्तान और स्वर्गीय जीवन के वारिस बनाता है। इसीलिये कहा गया है कि जब हम कलीसिया में ग्रहण किए जाते हैं, तो मानो हम किसी सांसारिक नगर के नहीं, वरन् स्वयं स्वर्ग के नागरिक बनाए जाते हैं। हम सब कुलपतियों, परमेश्वर के विश्वासयोग्य सेवकों, और स्वर्ग के सब स्वर्गदूतों के भी संगी बन जाते हैं। क्योंकि कलीसिया को केवल परमेश्वर का नगर ही नहीं, वरन् उसका घर भी कहा गया है, इसलिये हम उसके घराने के गिने जाते हैं। इससे वह अनुग्रह और कृपा प्रकट होती है जो परमेश्वर ने हम पर की है। परमेश्वर के घर में इकट्ठा किया जाना, उसे अपने निकट पाना, और उस तक निरन्तर पहुँच रखना हमारे लिये उससे कहीं अधिक महत्त्व रखता है कि हम केवल किसी नगर के नागरिक होते।
कभी-कभी लोग उन आत्मिक आशीषों का समुचित मूल्य नहीं समझते जो हमें अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा मिलती हैं। सन्त पौलुस यह दिखाना चाहता है कि हमें उस गोद लिए जाने को बहुत मूल्यवान समझना चाहिए, जिसके द्वारा परमेश्वर ने हमें अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा एकत्र किया है। यह गोद लिया जाना हमें आशा के द्वारा परमेश्वर के साथ घनिष्ठ संगति रखने देता है, जो सारे संसार से कहीं अधिक मूल्यवान है। वह एक और उपमा, अर्थात् मन्दिर की उपमा देता है। यद्यपि पवित्र शास्त्र कभी-कभी हर विश्वासी को परमेश्वर का मन्दिर कहता है, क्योंकि वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हम में वास करता है, फिर भी जब सारी कलीसिया के विषय में सामान्य रूप से कहा जाता है, तो हम जीवित पत्थरों के समान ठहराए जाते हैं। भवन भली-भाँति जुड़ा हुआ है, और हम में से हर एक उसकी सिद्धता में अपना योगदान देता है। ये बातें परस्पर विरोधी नहीं हैं। हर विश्वासी परमेश्वर का मन्दिर है, जो पवित्र आत्मा के कार्य से पवित्रता का जीवन जीता है। परन्तु हमें विश्वास में एक भी होना चाहिए, जैसे पत्थर मिलकर भवन बनाते हैं। यह एकता हमें सुसमाचार पर विश्वास के द्वारा अपने प्रभु यीशु मसीह से जुड़ने देती है, और परमेश्वर को हम में वास करने तथा शुद्ध रीति से पूजे जाने का अवसर देती है। हमें पूरा निश्चय है कि जब-जब हम उसे पुकारेंगे, वह हमारी सुनने को तैयार रहेगा, और जब हम उसके नाम से इकट्ठे होंगे, वह सदा हमारे बीच में रहेगा।
सन्त पौलुस यही बताता है जब वह उन लोगों के विषय में कहता है जो कभी अन्यजाति थे, उद्धार की सब आशा से कटे हुए थे, और अब सुसमाचार के द्वारा परमेश्वर के लिये एक मन्दिर होने को बनाए जा रहे हैं। अब यह स्पष्ट है कि परमेश्वर हमें अपने घराने का अंग मानता है। यह समझ सुसमाचार की शुद्ध शिक्षा से उत्पन्न होती है, जो हमें दिखाती है कि परमेश्वर हम में अपने मन्दिर रखना चाहता है और हमारी उपासना से प्रसन्न होता है। जब तक सुसमाचार की शिक्षा हमें इस अमूल्य लाभ तक पहुँच न दे, तब तक हम स्वर्ग के नागरिक, परमेश्वर की सन्तान या उसके घराने के सदस्य नहीं कहला सकते। इसके अतिरिक्त यह जान लेना आवश्यक है कि उसे खोजने के लिये हमें कठिन यात्राओं पर निकलने की आवश्यकता नहीं। परमेश्वर हमें अपने घर में प्रवेश करने का सौभाग्य देता है, और द्वार हमारे लिये खुला है, कम से कम तब, जब हम उन प्रतिज्ञाओं को ग्रहण करें जो वह हमें देता है।
हमें स्वर्ग या पृथ्वी में इधर-उधर भटकने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि परमेश्वर हमें बताता और निश्चय दिलाता है कि उसने हमें गोद लिया है, ताकि हम पूरी रीति से उसी से लिपटे रहें। इसलिये हम उससे घनिष्ठता रख सकते हैं, और वह हमसे जुड़ जाएगा। परन्तु इस सब के साथ हमें यह भी जानना चाहिए कि उसका वचन कहाँ खोजें। अविश्वासी लोग प्रायः इतने द्वेषी होते हैं कि परमेश्वर से दूर होने के लिये तरह-तरह के बहाने ढूँढ़ते हैं। वास्तव में हम देखते हैं कि बहुत से लोग ऐसे दिखाते हैं मानो वे परमेश्वर की सेवा करने को तैयार हों, फिर भी वे इस पर सन्देह उठाते हैं कि व्यवस्था उसी की ओर से आई या नहीं, और सुसमाचार उसका सत्य है या नहीं। देखो, लोग कैसे अपनी पूरी शक्ति से परमेश्वर का जूआ उतार फेंकने का यत्न करते हैं, इधर-उधर खिसकते, बहाने बनाते और उत्तरदायित्व से बचते हैं। वे ऊँचे स्वर में कहते हैं कि वे उसके सामने दीन होना चाहते हैं, परन्तु वास्तव में न वे परमेश्वर के वचन को जानते हैं और न उसे पहचान सकते हैं। क्यों? यह उनकी दुष्टता और कृतघ्नता के कारण है।
इसलिये सन्त पौलुस ऐसे सब तुच्छ बहानों को दूर करने के लिये हमसे कहता है कि जब परमेश्वर ने मूसा और अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा, और अन्त में अपने प्रेरितों के द्वारा बातें की हैं, तो हमें निश्चित होना चाहिए कि व्यवस्था और सुसमाचार में जो कुछ है वह स्वयं सत्य है। हमें भटकाए जाने या धोखा खाने का भय नहीं होना चाहिए। हम बहुत सी आपत्तियाँ सुन सकते हैं, क्योंकि हर मनुष्य वही कल्पना करता है जो उसके मन को भाए, परन्तु जब परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था प्रकट की, तब उसने अपने वचनों को पर्याप्त रीति से प्रमाणित कर दिया। फिर उसने अपने भविष्यद्वक्ताओं को भरपूर अधिकार दिया, और उसके सुसमाचार की पुष्टि और मुहर आवश्यकता से भी अधिक चमत्कारों से की गई। इसलिये हमें यह नहीं कहना चाहिए, "हम नहीं जानते कि यह परमेश्वर का वचन है या नहीं," क्योंकि वह हमारे मुँह में, हमारे हाथ के पास है, और परमेश्वर ने उचित समझा कि हमें उसी से पोषित करे, और नश्वर मनुष्यों को भेजा कि वे उसे सीधे हम से कहें।
इसलिये आइए हम सबसे पहले यह सीखें कि परमेश्वर का वचन ग्रहण करने में अत्यधिक सन्देही न हों। हमें यह जानकर सन्तुष्ट होना चाहिए कि उसने अपने भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों के द्वारा अपनी इच्छा का पर्याप्त प्रमाण दे दिया है। ऐसा करने से हम उसे वह आज्ञाकारिता दे सकते हैं जो उसे भाती है, अर्थात् उसके पवित्र आत्मा से चलाए गए इन मानवीय साधनों का उपयोग स्वीकार करके। हमारे विश्वास में दीनता की कमी नहीं होनी चाहिए, और परमेश्वर ने नश्वर मनुष्यों को वह माध्यम चुनकर अपनी बुद्धि दिखाई है जिनके द्वारा वह अपने आप को हम पर प्रकट करता है। हमारे लिये यह मूल सिद्धान्त हो कि व्यवस्था, भविष्यद्वक्ताओं और सुसमाचार के बीच मेल की कमी नहीं है। हमने सचमुच देखा है कि रीति-विधियों का प्रयोग समाप्त हो गया है, परन्तु उनका सार बना हुआ है। जब परमेश्वर ने सुसमाचार को संसार में खुले रूप से प्रचारित कराया, तो यह उसकी अस्थिरता के कारण या लोगों को किसी नई और अनजानी रीति से सिखाने के उद्देश्य से नहीं था। व्यवस्था और भविष्यद्वक्ता निरन्तर हमारे प्रभु यीशु मसीह की गवाही देते हैं।
इसलिये हमें स्मरण दिलाया जाता है कि मूसा और अन्य भविष्यद्वक्ताओं में जो कुछ है उससे हम अपना लाभ उठाएँ। आजकल कुछ सनकी लोग हैं जो मानते हैं कि सारी शिक्षा के लिये हमें केवल नया नियम चाहिए, और शेष को अनावश्यक समझते हैं। यह सच है कि ज्ञान की परिपूर्णता सुसमाचार में पूरी रीति से समाई है, परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि हमें व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं से उन्नति नहीं पानी चाहिए। हम देख सकते हैं कि स्वयं प्रेरितों ने भी अपनी शिक्षा की पुष्टि उनकी गवाहियों से की।
और यहाँ जब सन्त पौलुस कहता है कि हमें नींव पर बनाया जाना है, तो वह भली-भाँति दिखाता है कि व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं में जो कुछ सिखाया गया है, चाहे बीते समय में या आज, वह हमारे लिये लाभदायक है। हमें उसे वैसे ही व्यवहार में लाना और लागू करना चाहिए। पतरस भी कहता है कि ये शिक्षाएँ केवल उनके समय के लिये ही नहीं, वरन् हमारे समय के लिये भी हैं। वे हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह और उसके द्वारा हमें दी गई भली वस्तुओं का स्वाद देती हैं। हम समय की परिपूर्णता में आ पहुँचे हैं, जैसा सन्त पौलुस अन्यत्र कहता है। इससे सन्त पतरस की बात की पुष्टि होती है कि भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षा हमारी ओर संकेत करती थी, और जिन्होंने उसे बोलते सुना था, उनकी अपेक्षा हमें उसकी अधिक पूर्ण और भरपूर समझ है। यीशु मसीह में हमारे पास अधिक बड़ी ज्योति है, जिससे वे बातें जो पहले अन्धकारमय थीं, अब हमारे लिये खुली और ज्ञात हैं।
इसलिये आइए हम व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं का अध्ययन करें, यह भली-भाँति जानकर कि वे हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह तक पहुँचाते हैं। वही हमारे विश्वास का केन्द्र-बिन्दु है, जैसा कहा गया है कि यीशु मसीह व्यवस्था का अन्त है, और वही नमूना भी है जो मूसा ने पहाड़ पर देखा था। व्यवस्था और भविष्यद्वक्ता उसकी गवाही देते हैं। हमारे प्रभु यीशु मसीह ने स्वयं यहूदियों को व्यवस्था पर उनके घमण्ड के लिये डाँटा, और उनके अपराध को और गम्भीर ठहराया, क्योंकि उन्होंने उसे अस्वीकार किया जिसकी ओर व्यवस्था संकेत करती थी, और जिसके द्वारा व्यवस्था हमें रोकना चाहती थी।
पवित्र शास्त्र से भली-भाँति लाभ उठाने के लिये हमें सदा अपने प्रभु यीशु मसीह की ओर देखना और उसी पर दृष्टि टिकानी चाहिए। खेद है कि बहुत से लोग पवित्र शास्त्र पढ़ने में बड़ा परिश्रम करते हैं, परन्तु केवल ऊपर-ऊपर से देखते हैं। बहुत वर्षों के बाद भी वे ऐसे अनजान रहते हैं मानो उन्होंने एक पंक्ति भी न पढ़ी हो। ऐसा इसलिये होता है कि वे बिना किसी निश्चित लक्ष्य के इधर-उधर भटकते हैं। इसी प्रकार सांसारिक विद्या में भी तुम प्रायः परिश्रमी विद्वानों को देखते हो जो अपने प्रयास के बावजूद थोड़ा ही पाते हैं, क्योंकि उनमें क्रम, माप और उद्देश्य नहीं होता। वे असम्बद्ध वाक्यों का एक संग्रह इकट्ठा कर लेते हैं, परन्तु कोई सच्ची समझ नहीं पाते। उन लोगों का भी यही हाल है जो पवित्र शास्त्र को श्रम से पढ़ते हैं परन्तु यह नहीं समझते कि केन्द्र-बिन्दु सदा हमारे प्रभु यीशु मसीह को होना चाहिए।
क्योंकि जैसे कहा गया है कि हमारी सारी सिद्धता सुसमाचार में है, वैसे ही हमारे प्रभु यीशु मसीह को भी अपने पिता परमेश्वर की बुद्धि घोषित किया गया है। जैसे व्यवस्था को चलने का मार्ग कहा गया है, वैसे ही हमारा प्रभु यीशु मसीह घोषणा करता है, "मार्ग मैं हूँ।" इसी प्रकार, जैसे प्रभु के वचन को हमारे पैरों के मार्गदर्शन के लिये दीपक कहा गया है, वैसे ही हमारा प्रभु यीशु मसीह कहता है, "जगत की ज्योति मैं हूँ।" इस प्रकार पवित्र शास्त्र में जो कुछ मिलता है, वह सब हमारे प्रभु यीशु मसीह की ओर संकेत करता है, और वही हमारी सब इन्द्रियों और मनों का एकमात्र लंगर है। उसे अपने पिता परमेश्वर का जीवित प्रतिरूप कहा जाना निराधार नहीं, क्योंकि यद्यपि परमेश्वर शुद्ध ज्योति है, फिर भी हम उस ज्योति तक कभी न पहुँचते, जब तक हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें ऊपर उठाने और उस स्थान तक पहुँच देने के लिये नीचे न उतरा, जो कभी हमारे लिये बन्द था।
संक्षेप में, सन्त पौलुस के वचनों से हमें यह समझना चाहिए कि भविष्यद्वक्ता और प्रेरित इसलिये चुने और ठहराए गए कि हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर तक पहुँचाएँ, जो उसका ही प्रतिरूप है। इसलिये पवित्र शास्त्र के द्वारा अपनी उन्नति के लिये हमें अपनी सब इन्द्रियाँ और मन उसी पर लगाने चाहिए। इसके विपरीत, जो लोग व्यर्थ जिज्ञासाओं में लिप्त होते हैं और परमेश्वर की अनुमति से अधिक बुद्धिमान बनना चाहते हैं, वे उलझन में ही रहेंगे। वे आगे बढ़ने के बदले पीछे हटेंगे, जैसा इतिहास भर के बहुत से उदाहरणों में प्रकट है। हमें इन उदाहरणों से सीखना चाहिए, क्योंकि संसार में जो बिगाड़, भूलें, अधर्म और अन्धविश्वास हैं, वे इसलिये हैं कि लोग अपनी मूर्खतापूर्ण अभिलाषाओं और शारीरिक झुकावों में फँस जाते हैं, और सुसमाचार में प्रस्तुत यीशु मसीह की सरलता से कभी सन्तुष्ट नहीं होते।
इसलिये जो बात यहाँ हमें बताई गई है, उसे हमें और भी अधिक स्मरण रखना चाहिए: यदि हम पवित्र शास्त्र में अचूक नींव रखना और उसमें उन्नति करना चाहते हैं, तो हमें अपने प्रभु यीशु मसीह को सदा अपनी आँखों के सामने और दृष्टि में रखना चाहिए। हम यह भी देखते हैं कि परमेश्वर के वचन को यहाँ-वहाँ खोजने की हमें आवश्यकता नहीं। हमारे पास भविष्यद्वक्ता और प्रेरित हमारी सीमाओं के रूप में हैं, जिनके भीतर हमें रहना है। हमारा विश्वास न बाएँ भटके न दाएँ, वरन् पवित्र शास्त्र में समाए परमेश्वर के वचन के आज्ञाकारी बना रहे।
यदि इस खण्ड को भली-भाँति समझा गया होता, तो संसार में ऐसा अव्यवस्था न होती जैसी आज हम देखते हैं। मनुष्यों ने उद्धार के अनगिनत मार्ग गढ़ लिये हैं, क्योंकि उन्होंने हमारे प्रभु यीशु मसीह की सामर्थ्य को वैसा नहीं जाना जैसा यहाँ दिखाया गया है। अन्धविश्वासी मान्यताओं और रीतियों का कोई अन्त नहीं दिखता, और इन सब के बीच उन्होंने यीशु मसीह को प्रायः भुला दिया है। यह परमेश्वर के सत्य का बिगाड़ और विकृति है, क्योंकि वे उसका उद्देश्य नहीं जानते थे: कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के प्रति समर्पित रहें, ताकि उससे लिपटे रहें और अपने प्राणों के लिये विश्राम पाएँ।
दूसरी ओर, पोपतन्त्र अपने आप को महासभाओं, आज्ञप्तियों और मनुष्यों के अपने मन की गढ़न्तों पर टिकाता है, और दावा करता है कि सारी सिद्धता वहीं पाई जा सकती है, जबकि यीशु मसीह और उसके प्रेरितों की सिखाई बातों को वह मात्र प्रारम्भिक बातें समझता है। वे पवित्र शास्त्र को बच्चों का धर्मशिक्षा-ग्रन्थ मानते हैं, और सिद्धता पाने के लिये अपनी महासभाओं की आवश्यकता का तर्क देते हैं। वे इतने मोहित और अन्धे हो गए हैं कि उन्होंने परमेश्वर के वचन को निर्बल करना चाहा, और लोगों को उचित मार्गदर्शन के बिना भटकाया।
इसलिये हमें इस खण्ड का महत्त्व स्मरण रखना चाहिए, जो हमें कहता है कि पवित्र शास्त्र में जोड़ी गई हर बात को ठुकरा दें, और यह विश्वास करें कि परमेश्वर ने हमारे उद्धार के लिये जो कुछ लाभदायक और आवश्यक था, वह सब अपने भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों को सौंप दिया। हमें अपने कोई टुकड़े या खण्ड नहीं जोड़ने चाहिए, और न शुद्ध शिक्षा के विपरीत बातें उधार लेनी चाहिए। हमें ऐसी सब प्रथाओं को ठुकराना चाहिए और किसी भी प्रकार की जोड़-तोड़ या समझौते से बचना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर उस सब को ढा सकता है जो मनुष्य व्यवस्था और सुसमाचार में जोड़ने का यत्न करते हैं, जिनसे हमें नहीं फिरना चाहिए। जैसा कहा गया है, "मार्ग यही है, इसी पर चलो।" जब यीशु मसीह अपने आप को मार्ग और जगत की ज्योति कहता है, तो यह इसलिये है कि हम उसमें दृढ़ बने रहें और दाएँ-बाएँ न डिगें।
इस खण्ड का एक और महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि हमें उनसे शिक्षा पाने को सहमत नहीं होना चाहिए जिन्हें परमेश्वर ने अपनी इच्छा का भेदी नहीं बनाया, और जिन्हें वह अस्वीकार करता है जब वे उस बात में एक अक्षर भी जोड़ने का यत्न करते हैं जिसे बिना विवाद के थामे रखना चाहिए। जबकि कलीसिया भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों की शिक्षा के प्रतिदिन के प्रचार पर निर्भर है, और जो सिखाने के लिये ठहराए गए हैं वे परमेश्वर के घर के निर्माता कहलाते हैं, हमें समझना चाहिए कि वे सार रूप में कलीसिया के निर्माता हैं, और इस अर्थ में वे भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों के साथ एक हैं।
परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि वे व्यवस्था में से जो चाहें ले लें या अपनी गढ़न्तों का प्रचार करें। उन्हें अपनी प्रेरणा उस शुद्ध स्रोत से लेनी चाहिए जो पवित्र शास्त्र में हमें दिया गया है। हमें सदा व्यवस्था और सुसमाचार की सरलता में थामे रखा जाना चाहिए, किसी भी भटकती हुई राय में न उलझें जो हमें विश्वास की आज्ञाकारिता से दूर करे, और उन साधनों से सन्तुष्ट रहें जो परमेश्वर ने ठहराए हैं।
जब सन्त पौलुस कहता है कि यीशु मसीह स्रोत और मुख्य कोने का पत्थर है, तो उसका यह अर्थ नहीं कि यीशु मसीह के साथ कुछ भी मिलाना उचित है, मानो वह भवन का केवल एक भाग बनाता हो, और शेष औरों से पूरा किया जाए। इसका अभिप्राय यह बल देना है कि हमें उसी पर बनना चाहिए। सन्त पौलुस ने कुरिन्थियों के नाम पहली पत्री के तीसरे अध्याय में हमें यही करने को उत्साहित किया, जब उसने घोषणा की कि जो नींव डाली जा चुकी है, अर्थात् यीशु मसीह, उसे छोड़ कोई और नींव नहीं डाल सकता।
सन्त पौलुस चाहता है कि हम समझें कि कोई उद्धार की कोई और नींव नहीं डाल सकता। यीशु मसीह के अतिरिक्त कोई सुरक्षा नहीं है, जिसका प्रभुत्व सब जगह फैला है। हम सब, बड़े से छोटे तक, उसके अधीन हों, और उन असंख्य लाभों को न त्यागें जो वह हमें देता है और जो उसके द्वारा हमारे पास हैं। यह समझने के लिये कि यीशु मसीह हमारी एकमात्र नींव कैसे है, हमें जानना चाहिए कि वह क्यों भेजा गया। उल्लिखित चारों वचनों में शास्त्र कहता है कि वह हमें हमारी बुद्धि, धार्मिकता, छुटकारा, और पवित्रता होने के लिये दिया गया। दूसरे शब्दों में, यीशु मसीह हमारे सारे कल्याण का स्रोत है और उसमें वह सब समाया है जो हमारे उद्धार के लिये आवश्यक है।
यह समझने के लिये कि यीशु मसीह कलीसिया की नींव क्यों है और हमें उसी पर क्यों स्थापित होना चाहिए, हमें पहचानना चाहिए कि परमेश्वर ने अपने एकलौते पुत्र के द्वारा अपने आप को हम पर पूरी रीति से प्रकट किया है। हमारे उद्धार के लिये जो कुछ आवश्यक है या जो हमारी लालसा के योग्य है, वह सब उसने उसी के हाथों में रख दिया है। इससे हम उसकी परिपूर्णता में से ले सकते हैं, जैसा सन्त यूहन्ना के सुसमाचार के पहले अध्याय में कहा गया है। इस प्रकार यीशु मसीह उस कोने के पत्थर के समान है जो पूरे भवन को थामता है, जैसे कोने का पत्थर संरचना का सबसे अधिक भार उठाता है।
फिर भी यह ध्यान देने योग्य है कि सन्त पौलुस का आशय मसीह को अलग श्रेणी में अकेला रखना, और उसके साथ ऐसे अन्य पत्थरों को जोड़ना नहीं था जिनका अधिकार और प्रभुत्व बराबर हो। उसका आशय यह दर्शाना था कि सार के विषय में व्यवस्था और सुसमाचार के बीच कोई मूलभूत अन्तर नहीं है। यद्यपि यीशु मसीह सब बातों की पराकाष्ठा है और हम सब को उसके द्वारा एक और जुड़ा हुआ होना चाहिए, परमेश्वर का मन्दिर बनते हुए और उस आत्मिक भवन के अंग होते हुए जिसमें परमेश्वर हमारे बीच वास करना चाहता है।
परन्तु यदि हमारा विश्वास पूरी रीति से हमारे प्रभु यीशु मसीह पर न टिके, तो हम इस नींव पर नहीं बन सकते। पोपतन्त्र ने, अनुग्रह पाने के लिये संरक्षकों और वकीलों की गढ़न्त करके और पुण्य कमाने के बहुत से साधन स्थापित करके, वस्तुतः अपने आप को यीशु मसीह से अलग कर लिया है। जो लोग उससे उँगली भर भी फिर जाते हैं, वे अवश्य संकट में गिरेंगे, क्योंकि नींव का काम पूरे ढाँचे को थामना है। यदि भवन अपनी नींव से बहुत आगे बढ़ जाए, तो वह अवश्य गिर जाएगा। इसी प्रकार यदि हम अपना विश्वास यीशु मसीह पर नहीं बनाते, उसे उसके अनुकूल बैठाते और उससे जकड़ते नहीं, और बिना कुछ और जोड़े उसी से चिपके नहीं रहते, तो वह हमें त्याग देगा और निकाल फेंकेगा।
पोपतन्त्र और उसके समान विचार वाली संस्थाएँ अपनी इच्छा के अनुसार नए साधन चलाकर हमारे प्रभु यीशु मसीह के साथ घोर अन्याय और अपमान करती हैं। वे इसी योग्य हैं कि ढा दी जाएँ और परमेश्वर की कलीसिया से हटा दी जाएँ। इसलिये यदि हम यहाँ वर्णित लाभों का आनन्द उठाना चाहते हैं, तो हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारा विश्वास व्यवस्था और सुसमाचार से ऐसा ढले कि मनुष्यों की गढ़ी हर बात को हम ठुकरा दें। हमें निश्चित होना चाहिए कि विनाश से बचने का यही सबसे निश्चित मार्ग है, और हम तभी यीशु मसीह में दृढ़ता से स्थापित हो सकते हैं और सदा उस पर दृढ़ खड़े रह सकते हैं, यदि हम व्यवस्था और सुसमाचार में उसके विषय में कही और प्रमाणित की गई सब बातों को स्वीकार करें, और मनुष्यों को उसमें कुछ जोड़ने न दें।
सार रूप में, सन्त पौलुस इन वचनों में यह बताता है कि जब तक हम व्यवस्था और सुसमाचार की शुद्ध शिक्षा से नहीं जुड़ते, और उस सारी अशुद्धता और घृणित बातों को नहीं त्यागते जो लोगों ने अपनी कल्पनाओं और गढ़न्तों से रची हैं, चाहे वे कितनी ही आकर्षक क्यों न दिखें, तब तक हम सचमुच अपने प्रभु यीशु मसीह या परमेश्वर की कलीसिया के नहीं हैं। यदि हम यीशु मसीह से जुड़ना चाहते हैं, तो हमें और सब को छोड़कर उसी में बने रहना चाहिए। इसके अतिरिक्त हम यह भी सीखते हैं कि परमेश्वर की सन्तान ठहरने के लिये हमें सच्चा मेल बढ़ाना चाहिए। जैसा पहले कहा गया, परमेश्वर के वचन की शुद्ध शिक्षा मसीहियों को इस ओर ले जाए कि वे उसे एक हृदय और एक मन से ग्रहण करें, और भाईचारे की एकता बनाए रखें, एक स्वर से बोलें और एक ही शुद्ध अंगीकार करें।
इसलिये, जैसे हमने देखा कि हमें अपनी नींव केवल परमेश्वर के शुद्ध वचन पर ही बनानी चाहिए, वैसे ही यहाँ यह भी प्रकट है कि हम में से हर एक को अपनी ही राय से जुड़ा नहीं रहना चाहिए, वरन् विश्वास की एकता के अनुरूप चलना चाहिए। सन्त पौलुस इसकी चर्चा फिलिप्पियों 3 में करता है, और एकता की आवश्यकता पर बल देते हुए कहता है, "यदि तुम सिद्ध होना चाहते हो, तो एक ही लक्ष्य रखो, और सचमुच एक में मिले रहो।" हम सब महत्त्वाकांक्षा के प्रति असुरक्षित हैं, और हर व्यक्ति अपनी पदवी ऊँची करना चाहता है। वस्तुतः सब पाखण्डों की जड़ यही घमण्ड है, जो मनुष्य के हृदय में गहरा जमा है, और जिसके कारण लोग सदा उससे अधिक जानना चाहते हैं जितना उचित है। परिणामस्वरूप वे अनुचित व्यवहार करते हैं, क्योंकि हर कोई शिक्षक बनना चाहता है। परन्तु यहाँ हमें स्मरण दिलाया गया है कि ऐसे आचरण के बदले हमें आपस में घनिष्ठ रूप से जुड़ा होना चाहिए, मानो एक स्वर से बोलते हुए और यह अंगीकार करते हुए कि हमारा एक ही परमेश्वर और एक ही पिता है, यह दिखाते हुए कि हम यीशु मसीह के अतिरिक्त किसी और को स्वामी नहीं मानते।
तो भी यह सच है कि केवल ऐसा मेल पर्याप्त नहीं होगा। मैं प्रारम्भ-बिन्दु पहले ही समझा चुका हूँ, अर्थात् वह शुद्ध शिक्षा जो हमें भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों से मिलती है। पोपवादी अपनी एकता पर बहुत डींग मारते हैं, और सचमुच उनमें एकता दिख भी सकती है, क्योंकि शैतान उन्हें इस प्रकार वश में रखता है कि वे पूरी तरह उलझे हुए हैं। निश्चय ही उनके बीच फूट और झगड़े पर्याप्त हैं, अपने ही आराधनालयों के भीतर भौंकते कुत्तों के समान। फिर भी वे हर प्रकार के अधर्म को बढ़ावा देने में एक साथ चिपके रहते हैं। उनका शैतानी उन्माद और जानबूझकर की गई हठ तब प्रकट होती है जब वे परमेश्वर के सत्य के विरुद्ध अपने झूठ को बचाए रखने के लिये तर्क देते हैं।
परन्तु वे हमें दिखाते हैं कि हमें एकता वास्तव में कैसे पानी चाहिए: स्वप्नों और कल्पनाओं में नहीं, न मनुष्यों की गढ़ी बातों में, वरन् भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों की शिक्षा में। चूँकि पोपवादियों ने पवित्र शास्त्र को निकाल बाहर किया है, और जब वे उसे स्वीकार करने का दावा भी करते हैं तब भी अपनी गढ़न्तों से उसे बिगाड़ते और भ्रष्ट करते हैं, इसलिये वे उस एकता से कोसों दूर हैं जिसकी वे घोषणा करते हैं। भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों की शिक्षा के बिना उनके पास सच्ची कलीसिया का कोई भी चिह्न नहीं।
यदि लोग पवित्र शास्त्र की सब बातों को बिना आपत्ति के मानने को तैयार भी हों, पर फिर उसमें अपनी कल्पनाएँ मिला दें, तो वे सारी मसीहियत को बिगाड़ते और उलझा देते हैं। पोपवादी परमेश्वर के सत्य को अपनी गढ़न्तों से उलझाते ही नहीं, वरन् उसे पूरी तरह उलट भी देते हैं। फलस्वरूप उनके द्वारा परमेश्वर की सेवा बिगड़ जाती है, और बेचारी आत्माएँ इधर-उधर उछाली जाती हैं। हमारे प्रभु यीशु मसीह का स्वरूप इतना विकृत किया जाता है कि वह मात्र कल्पना बन जाता है, और उसके पद लूट के माल के समान अलग-अलग व्यक्तियों को सौंप दिए जाते हैं। इसलिये जब हम देखते हैं कि पोपवादी इस बेतुके ढंग से परमेश्वर के वचन को उलट-पुलट करते हैं, तो हम इस निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि सच्ची कलीसिया होने के उनके दावों के बावजूद परमेश्वर उन्हें अस्वीकार करता और ठुकराता है। यदि कोई इस डाकुओं की खोह से न भागे, तो हमारे प्रभु यीशु मसीह से जुड़ना असम्भव है।
यहाँ मुख्य शिक्षा यह है कि उसके एकलौते पुत्र के द्वारा परमेश्वर से जुड़ने, स्वर्ग के स्वर्गदूतों में गिने जाने, और कुलपतियों, पवित्र राजाओं और भविष्यद्वक्ताओं के भाई ठहरने के लिये मनुष्य को पोपतन्त्र में उपस्थित नारकीय आराधनालयों से अलग होना होगा। यह स्पष्ट है कि वहाँ मसीह-विरोधी राज्य करता है, और यीशु मसीह अपनी उचित प्रभुता से पूरी तरह वंचित है। उनका यह साहसपूर्ण दावा कि रोम का पीठ कलीसिया की नींव है, मत्ती 16:18 में मसीह के वचनों का घोर दुरुपयोग है, "तू पतरस है, और मैं इस चट्टान पर अपनी कलीसिया बनाऊँगा।" वास्तव में यीशु मसीह का अर्थ यह था कि पतरस उसी पर बनाया जाएगा, यह नहीं कि पतरस अपना पद किसी और को सौंपे। इससे पोपवादियों में पवित्र शास्त्र के प्रति श्रद्धा की पूरी कमी और हमारे प्रभु यीशु मसीह के राज्य को दबाने के लिये अत्याचार स्थापित करने की उनकी इच्छा प्रकट होती है।
उनके बीच पवित्र शास्त्र की चौंकाने वाली उपेक्षा, प्रत्यक्ष निन्दा और नैतिक पतन है। जो बड़े-बड़े घृणित कर्म प्रचलित रहे हैं, उन्हें देखकर बच्चे भी घिन करें। यद्यपि पवित्र शास्त्र उनका आहार हुआ करता था, वह गाड़ दिया गया, बिगाड़ दिया गया, और शैतान के राज्य के अन्धकार में संसार कुछ समय के लिये उजाड़ छोड़ दिया गया। इसलिये हमें इन सब निन्दाओं को ठुकरा देना चाहिए, यह जानते हुए कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह को छोड़ और कहीं दृढ़ता से स्थापित नहीं हो सकते। जब हम उसमें विश्वासयोग्यता से शिक्षित हो जाएँ, तब हमें कहीं और सहायता खोजने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि उसने हमारे उद्धार के लिये आवश्यक सब कुछ दे दिया है। उसका अनादर करके अन्य स्रोत खोजना उचित नहीं; वरन् हमें अपने आप को पूरी रीति से उसी को सौंप देना चाहिए।
इसलिये पौलुस यहाँ जो कह रहा है उसका आशय यह है कि हम सब एक आत्मिक भवन के रूप में रचे और बढ़ाए जाएँ, और आत्मा में परमेश्वर की ओर बढ़ें। पहले, जब वह कहता है कि हमें "बनाया" जाना है, तो उसका उद्देश्य हमें विश्वास में निरन्तर बढ़ने को उत्साहित करना है। वह "बढ़ना" शब्द भी प्रयोग करता है, जो दो महत्त्वपूर्ण बातें दर्शाता है। पहली, हमें अपने आप को इतना सिद्ध न समझना चाहिए कि हम उन घमण्डी लोगों के समान हो जाएँ जो अभिमान से इतने फूले हुए हैं कि समझते हैं वे पहले ही पर्याप्त बुद्धिमान हैं और परमेश्वर के वचन से जुड़ने या उससे सीखने के लिये बहुत बड़े हैं। ऐसा घमण्ड अनुचित है, क्योंकि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के चेले तभी हो सकते हैं जब हम समझें कि हमारे लिये उसमें दृढ़ता से स्थापित होना और जीवन भर उसके अनुयायी बने रहना आवश्यक है।
परमेश्वर के वचन में इतनी विशाल गहराई, चौड़ाई और लम्बाई है कि यदि कोई मनुष्य बिना खाए, पीए या सोए अपना सारा जीवन उसके अध्ययन में लगा दे, तो भी वह उसकी सम्पूर्णता को समाप्त न कर पाएगा। इसलिये हमें जीवन भर उसमें लगे रहना चाहिए, यह पहचानते हुए कि परमेश्वर ने उसे हमारी यात्रा में हमारा मार्गदर्शन करने के लिये ठहराया है। हमें धीरे-धीरे आगे बढ़ना है, दीन और नम्र बने रहकर, क्योंकि परमेश्वर का वचन ही हमारी बढ़ोतरी और सीखने का मार्ग है।
सन्त पौलुस फिर बल देता है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह में दृढ़ता से स्थापित होने और उसकी दी हुई आशीषों में आगे बढ़ने के लिये उसका वचन हमारी नींव होना चाहिए। हमें उस पर बनते जाना, स्थिर रूप से बढ़ते रहना, और यह पहचानना चाहिए कि हमारा विश्वास इस संसार में कभी सिद्ध नहीं होगा, जैसा हम अपने अनुभवों से स्पष्ट देख सकते हैं। इसलिये इस आत्मिक भवन में हमारी बढ़ोतरी और उन्नति के विषय में पौलुस जो कहता है, वह समझने की एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात है।
परन्तु यह स्मरण रखना आवश्यक है कि बात केवल प्रभावशाली प्रदर्शन करने की नहीं है। मुख्य ध्यान प्रभु को प्रसन्न करने और अपने आप को पूरी तरह उसे समर्पित करने पर होना चाहिए, कि वह हम में अपने मन्दिर की नाईं वास करे। पोपवादी एक ओर बड़ा दिखावा कर सकते हैं, अपनी बड़ी संख्या और सांसारिक ठाठ-बाट पर घमण्ड करते हुए, परन्तु वे अपने शैतानी घमण्ड और अहंकार से अन्धे हैं। वे हमें तुच्छ जानते हैं क्योंकि तुलना में हमारा दल छोटा है। वे दावा करते हैं कि मसीहीजगत यूरोप, यूनान और अफ्रीका में फैला है। फिर भी उनका घमण्ड और आडम्बर वह नहीं है जो परमेश्वर की दृष्टि में सचमुच मायने रखता है। उनके सब बाहरी प्रदर्शन ऊपरी हैं, और यद्यपि वे अनजान आत्माओं को प्रभावित कर सकते हैं, परमेश्वर के सामने वे घृणित हैं।
इसलिये हमें पोपवादियों की संख्या या बाहरी रूप से डगमगाना नहीं चाहिए, क्योंकि उनकी कलीसिया में सच्चा सिर नहीं है, चूँकि उसमें यीशु मसीह को प्रधानता प्राप्त नहीं। पौलुस हमें स्मरण दिलाता है कि हमें उनसे डाह नहीं करनी या उन्हें तुच्छ नहीं जानना चाहिए, वरन् उनके दावों के झूठ को पहचानना चाहिए। उनकी तथाकथित कलीसिया एक विकराल प्राणी है जिसका कोई सच्चा सिर नहीं।
यह समझने के लिये कि हमें कैसे बढ़ना चाहिए, कहा गया है कि हमें प्रभु की ओर और आत्मा में बढ़ना है, जैसा सन्त पौलुस कहता है। वह हमें सांसारिक अन्धविश्वासों से दूर करता है और बल देता है कि वे परमेश्वर के सामने व्यर्थ हैं। हमें आत्मा में बढ़ना है, क्योंकि हमारे प्रभु यीशु मसीह में पूर्णता और सार के आ जाने से व्यवस्था की छायाएँ समाप्त हो गई हैं। पुराने प्रतीकों से चिपके रहने के बदले हमें उन्हें छोड़ देना और मसीह में आत्मिक रीति से अपने आप को बनाने पर ध्यान देना चाहिए।
मसीह की यह शिक्षा हमें बहुमूल्य और प्रिय होनी चाहिए, और हम में उसके प्रति प्रेम जगाए। वह हमें इस ओर ले जाए कि हम स्वेच्छा से संसार को त्यागें और पूरे मन से अपने प्रभु यीशु मसीह को समर्पित हो जाएँ। इसके विपरीत हमें यह भी सावधान रहना चाहिए कि हम दण्ड के भागी न बनें, जैसी चेतावनी मसीह ने उनके लिये दी जो इस बहुमूल्य पत्थर को ठुकराते हैं। यीशु मसीह पर बनने से हमारे उद्धार की सुरक्षित नींव है, और हम निश्चित हो सकते हैं कि वह हमें थामने में पूरी तरह समर्थ है, और यह भी कि हम त्यागे नहीं जाएँगे।
यदि हम उचित रूप से उस पत्थर से ठोकर खाएँ, तो निश्चित है कि हम उसके सामने टिक न सकेंगे, वरन् उसके नीचे दब जाएँगे। अन्त में वह हमें कुचलकर टुकड़े-टुकड़े कर देगा। इसलिये हमें ध्यान रखना चाहिए कि हमारा प्रभु यीशु मसीह हमारे लिये ठोकर का पत्थर न बने, जैसा आज संसार का हाल है, जो उसकी निन्दा इस हद तक करता है कि हर कोई घमण्ड से अपने विद्रोही रोएँ खड़े करके उस पर टूट पड़ता है। इसके बदले आइए हम अपने आप पर विचार करें और नम्रता से उसकी सेवा करने को तत्पर हों, कि वह अन्त तक हमें सम्भाले रखे।
यद्यपि हम देखते हैं कि यीशु मसीह संसार से ठुकराया जाता है, और यह अजीब लग सकता है कि लोग उससे लड़ें और उसे निशाना बनाएँ, फिर भी हमें उसे बहुमूल्य पत्थर मानना कभी न छोड़ना चाहिए। पतरस अपनी पहली पत्री के दूसरे अध्याय में हमें सलाह देता है कि यीशु मसीह को इसी रूप में देखें।
इसलिये जब हम उन प्रतिज्ञाओं को सुनें जिनकी चर्चा सन्त पौलुस करता है, तो हम अपने प्रभु यीशु मसीह की ओर खिंचें, अपने आप को पूरी तरह उसे दे दें, और उस सब को छोड़ दें जिसे संसार उत्तम समझे। हमें यह भी सावधान रहना चाहिए कि कृतघ्न होकर उसे बहुमूल्य पत्थर के रूप में न ठुकराएँ, क्योंकि परमेश्वर हमसे कहता है कि हमारा सारा कल्याण इसी में है कि वह हमारा मन्दिर हो और हम उसे पुकारें। इसलिये आइए हम इस महान और अमूल्य वरदान से लाभ उठाएँ, उसमें निरन्तर बढ़ते और उन्नति करते रहें, जब तक हम अपनी स्वर्गीय मीरास तक न पहुँचें, जहाँ हम वे सब भली वस्तुएँ पूरी रीति से अनुभव करेंगे जिन्हें अभी हम केवल विश्वास से देखते हैं।
अब आइए हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने दीन हों, अपने पापों को मानें और उसकी क्षमा के लिये प्रार्थना करें, कि वे हम पर गिने न जाएँ। वह हमें इस प्रकार सुधारे कि हम उसी के प्रति समर्पित रहें और हम अयोग्य होते हुए भी सदा उसके पास स्वतन्त्रता से आ सकें। आइए हम सब कहें, "सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता, इत्यादि।"
