अध्याय 38

छत्तीसवाँ उपदेश, पाँचवें अध्याय पर चौथा - इफिसियों 5: 11-14

Sermons on Ephesians (Modernized) · John Calvin

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छत्तीसवाँ उपदेश, पाँचवें अध्याय पर चौथा - इफिसियों 5: 11-14

"और अन्धकार के निष्फल कामों में सहभागी न हो, वरन् उन पर उलाहना दो। क्योंकि उनके गुप्त कामों की चर्चा भी लज्जा की बात है। पर जितने कामों पर उलाहना दिया जाता है वे सब ज्योति से प्रगट होते हैं, क्योंकि जो कुछ प्रगट करता है वह ज्योति है। इस कारण वह कहता है, हे सोनेवाले, जाग और मरे हुओं में से जी उठ, तो मसीह तुझे ज्योति देगा।" - इफिसियों 5: 11-14

आज सुबह हमने देखा कि संसार में परमेश्वर की सेवा से हमें भटका देनेवाली अनेक परीक्षाएँ हैं, फिर भी हमें उन्हें बहाना नहीं बनाना चाहिए। ठोकर खिलानेवाली बातें संसार में सदा से रही हैं, परन्तु उपाय स्पष्ट है: परमेश्वर की सन्तानों को उसी के प्रति समर्पित रहना चाहिए और अविश्वासियों की संगति करके अपने आप को भ्रष्ट नहीं करना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें अलग होने के लिए बुलाया है।

हमारे लिए इतना ही पर्याप्त नहीं कि हम केवल पियक्कड़, व्यभिचारी, चोर या हत्यारे होने से बचे रहें। हमें हर प्रकार की बुराई से, जहाँ कहीं भी वह पाई जाए, दूर रहना चाहिए। वास्तव में हमें सदा पहले अपने आप को जाँचना और अपने भीतर के दोषों को दोषी ठहराना चाहिए। कपटी लोग प्रायः दूसरों के दोष बताते हैं और अपने भीतर के बड़े-बड़े दोषों की ओर से आँखें मूँदे रहते हैं। सच्चे और निष्पक्ष न्यायी बनने के लिए हम में से हर एक को आत्म-चिन्तन करना और अपनी कमियों को स्वीकार करना चाहिए। हमें अपने भीतर की बुराई से सचमुच घृणा करनी चाहिए। इसके अतिरिक्त हमें यह दिखाना चाहिए कि हम परमेश्वर से संसार की अपेक्षा अधिक प्रेम रखते हैं, और दुष्टों के दोषों की ओर से आँखें मूँदकर और उनकी चापलूसी करके उनके साथ मित्रता बनाए नहीं रखनी चाहिए।

इसी बात के लिए सन्त पौलुस हमें एक तीसरा कारण स्मरण दिलाता है: हमें अन्धकार के कामों पर उलाहना केवल परमेश्वर का आदर करने की अपनी धुन दिखाने के लिए ही नहीं, वरन् मूढ़ प्राणों को विनाश के मार्ग से बचाने और उन्हें उद्धार की ओर ले चलने के लिए भी देना चाहिए। बुराई पर उलाहना देने के ये दो मुख्य कारण हैं। पहला, परमेश्वर को ठेस पहुँचते देखकर और लोगों को उसके ठहराए हुए क्रम को बिगाड़कर उसके क्रोध को भड़काते देखकर हमें व्याकुल होना चाहिए। परमेश्वर के वचन की अवहेलना और उसके नाम का रौंदा जाना देखकर हमें गहरा शोक होना चाहिए। दूसरा, जो लोग हमारे प्रभु यीशु मसीह के लहू से मोल लिए गए हैं, उनकी चिन्ता करना हमारा कर्तव्य है। यदि हम प्राणों को उनके छुटकारे की भारी कीमत को पहचाने बिना नाश की ओर जाते देखें, तो यह हमारे प्रभु यीशु मसीह के बहुमूल्य लहू का तिरस्कार है।

सन्त पौलुस इस बात पर बल देता है कि जैसे हम परमेश्वर को तुच्छ जाननेवालों के साथी बनने से बचने के लिए बुराई से अलग होते हैं, वैसे ही हमें उनके कामों के प्रति अपनी अस्वीकृति को सक्रिय रूप से प्रकट भी करना चाहिए। इससे वे अपनी दुष्टता पर लज्जित होकर मन फिराने को प्रेरित हो सकते हैं। यदि हम एक ही प्राण को भी विनाश के मार्ग से बचा लें, तो यह बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।

इसी प्रकार सन्त याकूब भी हमें बुराई पर उलाहना देने को उभारता है, और दिखाता है कि ऐसा करके हम एक प्राण को नष्ट होने से बचा सकते हैं। इसलिए हमारे लिए आवश्यक है कि हम परमेश्वर का आदर करने और उसके वचन की शुद्धता को बनाए रखने की अपनी धुन प्रकट करें। यदि हम उन लोगों के विरुद्ध नहीं बोलते जो उसकी महिमा की निन्दा करते और उसकी धार्मिकता को चुनौती देते हैं, तो यह हमारी ओर से लापरवाही गिनी जा सकती है। जैसे कोई स्वामिभक्त प्रजा अपने राजकुमार की रक्षा करती है और कोई विश्वासयोग्य सन्तान अपने पिता के सम्मान की रक्षा करती है, वैसे ही हमें परमेश्वर के सम्मान और उसकी धार्मिकता की रक्षा करनी चाहिए। यद्यपि हम पृथ्वी के तुच्छ निवासी ही हैं, फिर भी परमेश्वर ने अनुग्रह करके हमें अपनी सन्तान के रूप में अपना लिया है। इसलिए यदि दुष्ट लोग उसकी महिमा को कलंकित करने और उसके अधिकार को निर्बल करने का प्रयत्न करें और हम चुप रहें, तो यह ऐसा अपमान है जो सहन नहीं किया जाना चाहिए।

इसलिए आओ, जो कुछ उसने यहाँ हमसे कहा है उस पर भली-भाँति ध्यान दें। यह दोष इतिहास में सदा से प्रबल रहा है कि लोग न्यूनाधिक चापलूसी की ओर झुके रहते हैं, और इसलिए दूसरों के दोषों को सहना उन्हें अधिक सरल लगता है। यह सहना वैसा नहीं है जैसा निर्बलों पर तरस खाना और उनके साथ धीरज रखना, जिसकी चर्चा हम अब तक देख चुके हैं। इसके विपरीत, यह तो बुराई को बनाए रखने में सन्तुष्ट रहना और अपने दोषों की जाँच से बचने के लिए स्वेच्छा से गठबन्धन करना है। हम हर एक को अपने लिए कोई न कोई स्वतन्त्रता जता लेने देते हैं। यही प्रचलित मनोवृत्ति है, जिसके कारण आज संसार में अव्यवस्था फैली है।

इसके अतिरिक्त, हम किसी की अप्रसन्नता मोल लेने से प्रायः इतना हिचकिचाते हैं कि परमेश्वर के आत्मा द्वारा दी गई स्वतन्त्रता का प्रयोग करने से बचने के लिए हम परमेश्वर और अपने संगी मनुष्यों दोनों को, देह और प्राण समेत, धोखा दे देते हैं। जब हम किसी अभागे मनुष्य को मूर्खता में डूबा देखते हैं, तो कहते हैं, "उसे अपने मार्ग पर चलने दो; इससे हमें क्या।" इसी प्रकार जब हम दूसरों को न्याय को बिगाड़ते और समाज को भ्रष्ट करते देखते हैं, तो यह सोचकर निष्क्रिय भाव से अनदेखी कर देते हैं, "मैं किसी अधिकारी का कोप नहीं लेना चाहता। दूसरे आगे चलें, मैं उनके पीछे हो लूँगा। यदि कोई परिणाम निकला तो मैं अनजान बन जाऊँगा।" इस बीच हम निठल्ले बैठे रहकर परमेश्वर से दया की विनती करते रहते हैं। हम किसी भी बात के लिए अपने आप को जोखिम में नहीं डालते।

आज के दिनों में हमारे दोष इसी प्रकार सहे जाते हैं। तथापि परमेश्वर अपना अधिकार नहीं छोड़ेगा। उसका निर्णय अटल रहेगा। इसलिए यदि हम अन्धे और बहरे पशुओं के समान व्यवहार करें, और अपनी सामर्थ्य भर दुष्टता के विरुद्ध खड़े होकर उसे रोकने में चूकें, तो हम दुष्टों के सहभागी ठहराकर दोषी ठहराए जा सकते हैं। यदि हम परमेश्वर के आदर को अपवित्र होने दें और सारी शालीनता को बिना विरोध त्यागे जाने दें, तो हमसे लेखा लिया जाएगा।

इसलिए हमें बुराई को झिड़कने के विषय में इस चेतावनी पर पूरा ध्यान देना चाहिए। हमें अपनी प्रतिबद्धता दिखाने का हर प्रयत्न करना चाहिए, और जितना हमसे बन पड़े उसका सामना करने में परिश्रमी होना चाहिए। यदि हर एक व्यक्ति इसी रीति पर चलता, तो संसार निश्चय ही अधिक अच्छा होता। परमेश्वर के नाम की इतनी बार निन्दा होने का कारण यह है कि निन्दाएँ छिपाई जाती हैं, और लोग दूसरों की दुष्टता से अपने आप को मैला करना अधिक पसन्द करते हैं, बनिस्बत इसके कि अस्वीकृति या अप्रियता का जोखिम उठाएँ। यही बात पियक्कड़पन, चोरी, जबरन वसूली और अन्य अनैतिक कामों के विषय में भी सच है। यदि हम में वह धुन होती जिसकी आज्ञा सन्त पौलुस ने दी है, तो ऐसे आचरण में लगे लोगों को उलाहना देने में हम कहीं अधिक दृढ़ होते।

इसके विपरीत, यदि हम भले लोगों को रौंदे जाने और उनके साथ दुर्व्यवहार होने देते हैं, तो हम प्रकट करते हैं कि हमारे बीच प्रेम और करुणा की कमी है। हमें उनकी सहायता के लिए अपना हाथ बढ़ाना चाहिए।

फिर, प्राण विनाश की ओर जा रहे हैं और हम कुछ नहीं करते, जबकि परमेश्वर ने हमें यह अनुग्रह दिया है कि हम उसके स्थान पर खड़े हों, और जो खो जाने और नष्ट होने के मार्ग पर था उसे बचाएँ। अब सन्त पौलुस इस विषय की चर्चा कर चुकने के बाद उसी शिक्षा को और दृढ़ करना और हमारे भीतर की सुस्ती को जगाना चाहता है। वह समझाता है कि अविश्वासी ऐसे घृणित काम, जिनकी चर्चा करने में भी उन्हें लज्जा आनी चाहिए, इसलिए करते हैं कि वे समझते हैं कि वे मनुष्यों की दृष्टि से छिपे रह सकते हैं। क्यों? क्योंकि उनमें परमेश्वर का भय नहीं है, और इसलिए वे अपने आप को भली-भाँति छिपा हुआ मानते हैं।

उदाहरण के लिए, जब चोर देखता है कि आस-पास कोई नहीं है, तो वह अलमारियाँ खँगालता है, द्वार तोड़ता है, जो कुछ पाता है चुरा लेता है, और यह सब इसलिए कि उसे आशा नहीं कि कोई उसे पकड़ेगा और उसका न्याय करेगा। वह अपने आप को यह भुलावा देता है कि वह बिना कोई चिह्न छोड़े निकल गया। इसी प्रकार डाकू या हत्यारा, जो किसी छिपे स्थान में घुसता है, अपने आप को भली-भाँति छिपा हुआ समझता है। जब उसे कोई भटका हुआ व्यक्ति मिलता है, तो वह उस पर टूट पड़ता है, उसे लूटता है, उसे घायल करता है, और यदि किसी और रीति से उसे वश में न कर सके तो उसका गला तक काट डालता है। और इस सारे समय वह मानता है कि वह बिना पकड़े निकल गया, क्योंकि किसी ने उसके कामों को नहीं देखा। यही रीति और भी अनेक कामों में चलती है। हम परमेश्वर से डरने की अपेक्षा अपने संगी मनुष्यों के सामने अधिक लज्जित होते हैं। पवित्रशास्त्र घोषणा करता है कि हमारे सब विचारों का लेखा लिया जाएगा, केवल हमारे बुरे कामों का ही नहीं, वरन् हमारे गुप्त विचारों का भी। क्योंकि अन्तिम दिन पुस्तकें खोली जाएँगी, जिसका अर्थ है कि कुछ भी भुलाया नहीं जाएगा, जब तक कि हम भजन संहिता में कहे गए उस प्रतिज्ञात अनुग्रह को प्राप्त न करें, अर्थात् यह कि परमेश्वर हमारे पापों को क्षमा करता है। परन्तु यह क्षमा मन फिराव के बिना नहीं दी जाती। जो लोग सब बुराई के प्रति हठीले हो चुके हैं, वे इस बात का केवल उपहास करते हैं। उन्हें इसकी चिन्ता नहीं कि परमेश्वर क्या कर सकता है, क्योंकि वे ऐसे पशु-समान हो गए हैं कि इस बात की भयंकरता पर विचार ही नहीं करते कि वे परमेश्वर की सर्वोच्च महिमा के विरुद्ध अपने हृदयों को कठोर कर रहे हैं।

इसलिए जब अविश्वासी और परमेश्वर को तुच्छ जाननेवाले लोग ऐसे छिपे स्थानों में शरण और आड़ लेते हैं, तब उनके बीच नीच स्वच्छन्दता प्रबल हो जाती है, और उनके कामों और बातों पर विचार करना भी लज्जाजनक होगा। परन्तु जैसा पौलुस समझाता है, जब उन्हें झिड़का जाता है तो उनकी बुराई प्रकट हो जाती है और उनकी स्वतन्त्रता पर अंकुश लगता है, क्योंकि झिड़की लगाम का काम करती है। यह केवल इस कारण नहीं कि दूसरे उन्हें धिक्कारते हैं, वरन् इस कारण भी कि वे अनुभव करते हैं कि उन्हें स्वर्गीय न्यायी को लेखा देना है, और वे पहचानते हैं कि उसके हाथों में पड़ने के परिणाम कितने भयानक हैं। संक्षेप में, पौलुस यह दिखाना चाहता था कि जब झिड़की का सही रीति से और सच्ची प्रेमपूर्ण धुन के साथ प्रयोग किया जाए, तो वह किस उद्देश्य की पूर्ति कर सकती है। वह पहले ही बल दे चुका है कि हमें कपट से काम नहीं लेना चाहिए, न दूसरों को दोषी ठहराकर अपने आप को निर्दोष ठहराने का प्रयत्न करना चाहिए। इसके बजाय हम में से हर एक को अपने जीवन की पूरी जाँच करनी, उन दोषों से घृणा करनी जिनकी ओर हम झुकते हैं, और अपने आप को परमेश्वर के मार्गदर्शन के अधीन लाने का प्रयत्न करना चाहिए। हमें उसकी पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से उससे शक्ति माँगनी चाहिए, कि हम अपने आप को उसकी इच्छा और धार्मिकता के अनुसार ढाल सकें। ऐसा करते हुए हमें भूल करनेवालों की चापलूसी नहीं करनी चाहिए, वरन् उन्हीं के भले के लिए उनसे खरी बात कहनी चाहिए।

पौलुस की सम्मति पर चलने से जो लाभ होगा वह यह है कि परमेश्वर को उतनी गहरी ठेस नहीं पहुँचेगी जितनी हम देखते हैं कि अब पहुँच रही है। इसके अतिरिक्त जो लज्जा से परे हो चुके थे, वे इसी साधन से ईमानदारी की ओर लाए जा सकते हैं। उन्हें लगता था कि हर प्रकार की दुष्टता करने की उन्हें छूट है, परन्तु वे पश्चाताप करेंगे और दूसरों को भी वैसा करने को प्रोत्साहित करेंगे। फिर भी, जो बात हमें और भी अधिक उभारनी चाहिए वह यह समझ है कि हम इस संसार में रहते हैं और परमेश्वर की ओर से हम पर उँडेली गई अनगिनत आशीषों का आनन्द लेते हैं। तथापि हम उसके अधिकार को निर्बल होने देते हैं, तब भी जब ऐसा प्रतीत होता है कि लोग उसके पवित्र नाम की निन्दा करके उसे उसके सिंहासन से उतारने का प्रयत्न कर रहे हैं। जब लोग उसे क्रोध दिलाते हैं और हम कुछ नहीं करते, तो हमें पूरे नीच और विश्वासघाती माना जाना चाहिए। कल्पना करो कि कोई मनुष्य अपने ही घर में अपमानित किया जाए, उसकी हत्या का षड्यन्त्र रचा जाए, उसे लूटा जाए, उसकी पत्नी को अशुद्ध किया जाए, या उसकी सन्तान को बिगाड़ा जाए, और हम वहाँ उसका आतिथ्य भोग रहे हों, उसका भोजन खा रहे हों, उसकी दाखमधु पी रहे हों, और संक्षेप में उसी के व्यय पर पाले-पोसे जा रहे हों, और फिर भी चुप रहें। क्या हम इस योग्य न ठहरेंगे कि हम पर पत्थर बरसाए जाएँ और लोग हमारे मुँह पर थूकें? निश्चय ही, क्योंकि कृतघ्नता और नीचता की निन्दा तो मनुष्यों में भी सदा होती रहेगी।

अब यदि हम किसी नश्वर मनुष्य के घर में अतिथि होकर उसके सम्मान और खरेपन की रक्षा करने को इतने बाध्य हैं, तो अपने प्रभु के लिए हमें क्या करना चाहिए? क्या जब तक हम इस संसार में जीते हैं, हम उसके घर में नहीं हैं? क्या जल की एक-एक बूँद हमें उसकी कृपा और उदारता से नहीं मिलती? इस पर विचार करो: परमेश्वर हमारी देखभाल एक पिता के समान करता है। फिर भी इस सब के होते हुए हम उसके नाम की निन्दा होने देते हैं, उसकी महिमा का अनादर होने देते हैं, उसके वचन को चीरा-फाड़ा जाने देते हैं, उसके ठहराए हुए सब विधानों को तुच्छ जाना जाने देते हैं, उसकी कलीसिया को, जो उसकी वधू है, भ्रष्ट और प्रताड़ित होने देते हैं, और उसकी सन्तान को बुराई में फुसलाए जाने देते हैं। इस बीच हम चुप रहते हैं। क्या तुम में से कोई इससे इनकार कर सकता है कि ऐसी चुप्पी इस बात का प्रमाण है कि हम रोटी का एक कौर खाने के भी, या कीड़े-मकोड़ों जैसे अति तुच्छ प्राणियों में गिने जाने के भी योग्य नहीं?

इसलिए आओ, इस पर ध्यान से विचार करें। हम परमेश्वर की महिमा को तुच्छ जानने के लिए लेखा देंगे, जैसा कि हम होते हुए देख सकते हैं, क्योंकि हम उन बुराइयों को नहीं झिड़कते जो दुष्टों और अन्यजातियों के दुस्साहस के कारण फल-फूल रही हैं, जो और भी निडर हो जाते हैं और मानते हैं कि वे संसार को अपनी इच्छा से चला सकते हैं, और परमेश्वर के प्रति अपनी घृणा में मगन होते हैं। इसका एक भाग हमारी चुप्पी से आता है, और सन्त पौलुस यहाँ यही कहना चाहता था। इसके अतिरिक्त इसका अर्थ यह भी है कि वे अभागे प्राण, जिनके लिए हमारे प्रभु यीशु मसीह ने इतनी भारी कीमत चुकाई कि उन्हें बचाने के लिए उसने अपने आप को भी नहीं छोड़ा, हमारी उदासीनता के कारण नाश हो रहे हैं और शैतान की पकड़ में गिर रहे हैं। इस बीच हम इसकी ओर कुछ भी ध्यान नहीं देते।

अब क्या हम इस बात की गवाही नहीं देते कि हम में दया की एक बूँद भी नहीं है? हाँ, और इसीलिए मैंने कहा कि ऐसा करके हम परमेश्वर और अपने पड़ोसियों के प्रति विश्वासघाती ठहरते हैं। जब हम में परमेश्वर के नाम के लिए धुन नहीं, और हम अपने पड़ोसियों की भलाई की उपेक्षा करते हैं, तो क्या संसार नहीं देखता कि हम निर्दयता और कठोरता से भरे हैं? निर्दयता से मेरा अर्थ यह है कि हम लोगों को जानते और देखते हुए भी नाश होने देते हैं, और परमेश्वर के प्रति कठोरता इसलिए कि हम उसे वह आदर नहीं देते जिसका वह अधिकारी है, जब हम में इतना साहस भी नहीं कि कम से कम यह तो दिखाएँ कि मनुष्यों द्वारा परमेश्वर के अधिकार और उसके प्रति सम्मान को घटाया जाना हमें स्वीकार नहीं।

इसलिए हम चाहे कोई भी हों, हमें मनुष्यों की अप्रसन्नता या अकृपा मोल लेने से नहीं डरना चाहिए, जब बात अपनी सामर्थ्य भर यह दिखाने की हो कि हम ऐसी बातों से सचमुच घृणा करते हैं। मैं कहता हूँ, जहाँ तक हम से हो सके, क्योंकि कभी-कभी हमारे मुँह बन्द कर दिए जाएँगे, और जब लोग छूटे हुए दुष्टात्माओं के समान परमेश्वर के विरुद्ध अपनी ढिठाई निकालते हैं, तो ऐसी घोर अव्यवस्था पर आहें भरने के सिवा हम और कुछ नहीं कर सकते। जो तलवार धारण करते हैं वे सब भलाई को भुलाकर गड़बड़ी मचाने पर तुले दिखाई देते हैं। ऐसी परिस्थितियों में, जैसा मैंने पहले कहा, हमारे पास इसके लिए शोक करने के सिवा और कोई उपाय नहीं, जैसा लूत के विषय में कहा गया है कि सदोम की दुष्टता से उसका हृदय दुःखी हुआ। इसलिए आओ, हम पीछे न हटें। जब हम ऐसी अव्यवस्था देखें तो हम में से हर एक अपने आप को शोक और दुःख के लिए उभारे, और उसके विरुद्ध इतनी गवाही दे कि उससे कुछ भला हो सके।

इसके अतिरिक्त, यदि उन लोगों को जो ऐसे उद्दण्ड हैं, फिराने की कोई आशा हो, तो आओ, उन्हें मन फिराव तक लाने के लिए निरन्तर यत्न करें। वास्तव में हम इसे पाने के लिए अपने आप को लगा दें। बहुत से लोग इस कहावत को बहुत सरलता से दोहरा देते हैं कि सूअरों के आगे मोती नहीं डालने चाहिए, और वे लोगों को समझने का प्रयत्न करने से पहले ही उन्हें सूअर मान बैठते हैं। चाहे उन्होंने बुरा व्यवहार किया हो, भटक गए हों, या अधर्मी हो गए हों, और चाहे शैतान ने उन्हें फँसा लिया हो, तो भी हमें उन्हें फिर पाने के लिए परिश्रम करना और आशा रखनी चाहिए, जैसा सन्त पौलुस कहता है, "प्रेम सब बातों की आशा रखता है।"

इसलिए जब तक मनुष्य अपने आप को पूरी तरह बुराई की ओर झुका हुआ प्रकट न करें, और उनके रोग असाध्य न दिखाई दें, तब तक आओ, उस सम्मति के द्वारा जो परमेश्वर हमें सुझाएगा, उनके लिए अच्छे वैद्य बनने का यत्न करें। तुम देख सकते हो कि सन्त पौलुस का क्या अर्थ था जब उसने कहा कि अविश्वासी अपने आप को छिपा हुआ समझते हैं जब न उन पर दृष्टि पड़ती है और न उन्हें झिड़का जाता है। जब उन्हें बिना सुधारे भटकने के लिए छोड़ दिया जाता है, तो वे अन्धकार में ही बने रहते हैं, और बुरे काम करने के लिए अपने आप को निडर बनाते हैं। तथापि इसका एक भाग हमारे ऊपर भी है, और हम अपने आप को इससे बरी नहीं कर सकते, क्योंकि परमेश्वर ने इस विषय में अपना अधिकार हमें सौंपा है और हमें अपना वचन दिया है, जिसे बुराई को दोषी ठहराने का अधिकार है। फिर भी वह प्रायः दबा दिया जाता और उसकी अनदेखी की जाती है।

इस पर विचार करो: जब अत्यन्त दुष्ट लोगों को झिड़का जाता है, तब वे अन्ततः अपनी लज्जा को पहचानते हैं। पहले वे भले और बुरे में भेद नहीं कर पाते थे। यह उस मनुष्य के समान है जो अँधेरे में लड़खड़ाता फिरता है और अपने आस-पास से अनजान है, चाहे वह ठोकर खाकर गिर ही क्यों न पड़े। इसलिए जब लोगों के सामने परमेश्वर का वचन रखा जाता है, और हम निडर होकर अपराधियों को उनके दोष दिखाते हैं, तो मानो हम उनके सामने दर्पण रखकर कहते हैं, "अपने आप को देखो; तुम जितने हो सकते हैं उतने मैले हो। क्या तुम्हें लज्जा नहीं आती? जाओ और अपने आप को शुद्ध करो।" इसलिए चेतावनियाँ इतना तो सदा पूरा करेंगी, यद्यपि सब के साथ नहीं। बहुत से लोग कठोर हो गए हैं, और शैतान ने उन्हें पकड़ लिया है। परमेश्वर ने उन्हें ऐसा हठीला और स्वेच्छाचारी स्वभाव रखने दिया है कि उन्हें कोई लज्जा नहीं आती। फिर भी जब कोई विश्वासी जन अपना कर्तव्य करता है, तो उससे सदा कुछ भला होगा, और उसमें से कुछ लाभ निकलेगा। जैसे वे जो जंगली पशुओं या अड़ियल बैलों के समान भटक गए थे, लौट आएँ और धार्मिकता का कुछ बोध पा लें। इसलिए आओ, हम इसके लिए यत्न करें, यदि हो सके, या कम से कम इसे पाने का हर प्रयत्न करें।

अब "उलाहना देने" शब्द के विषय में, इसका मुख्य अर्थ छिपी हुई बात को प्रकट करना है। पौलुस प्रचार के इस कार्य की ओर तब संकेत करता है जब वह कुरिन्थ की कलीसिया में फैले घमण्ड की बात करता है। वे प्रशंसा और सराहना पाने के लिए अनोखी भाषाएँ बोलते थे। लोग कहते, "यह मनुष्य बड़ा विद्वान है; यह सब भाषाओं में बोल सकता है।" परन्तु इससे उन्नति नहीं होती थी। आज हम कलीसियाओं में प्रायः वैसे ही ध्यान भटकानेवाले दृश्य देखते हैं, एक ओर बाजे बजते हैं और दूसरी ओर तरह-तरह के प्रदर्शन होते हैं। इतना तमाशा होता है कि सीधे-सादे लोग मोहित हो जाते हैं, परन्तु उन्नति नहीं होती। इसके विपरीत, जब हम परमेश्वर के नाम से इकट्ठे होते हैं, तो हमारा उद्देश्य विश्वास और भक्ति में एक-दूसरे को उभारना होना चाहिए। यह कैसे हो सकता है? यह तब होता है जब भले और परमेश्वर का भय माननेवाले लोग उसके वचन से उन्नति पाते हैं। इसके अतिरिक्त, यदि कोई अविश्वासी, जो पहले ठट्ठा करनेवाला था और जिसने कभी पछतावा नहीं किया, भीतर आए और परमेश्वर के नाम से जो घोषणा की जाती है उसे सुने कि हम परमेश्वर के न्याय से बच नहीं सकते और अपने प्रभु यीशु मसीह के न्याय-आसन के सामने खड़े होंगे, और कि मसीह ने हमें कैसे छुड़ाया, और उसके मृत्यु-बलिदान और दुःखभोग को व्यर्थ ठहराना हमारे लिए कितनी कृतघ्नता है – जब अविश्वासी यह सब सुनता है और देखता है कि हमारे प्रति उसके असीम अनुग्रह के कारण हमें परमेश्वर का भय मानने और उससे प्रेम रखने के लिए कैसे उभारा जाता है...

यद्यपि वह मनुष्य की तुलना पशु से करता है, जैसा पौलुस कहता है, तो भी वह मनुष्य अपने आप पर विचार करेगा और उसे उलाहना दिया जाएगा। वह यहाँ भी वही शब्द प्रयोग करता है, और अर्थ स्पष्ट है। चाहे किसी का विवेक मरा हुआ-सा और वह स्वयं लगभग पशु-समान हो गया हो, तो भी वह अपने आप को जाँचने और लज्जित होने को विवश होगा, और परमेश्वर की महिमा करेगा। यह सब के साथ समान रीति से नहीं होता, परन्तु हम देख सकते हैं कि बहुत से लोग जो भटक गए थे, परमेश्वर को भूल गए थे, और अपने प्राण के कल्याण की कुछ चिन्ता नहीं रखते थे, एक ही उपदेश से इतने गहरे प्रभावित हो सकते हैं कि वे अपने शेष जीवन के लिए बदले हुए दिखाई देते हैं। जो कुछ सामूहिक सभा में किया जाता है, उसका अभ्यास व्यक्तिगत रूप से भी होना चाहिए। हम यहाँ केवल अपनी ही उन्नति के लिए नहीं, वरन् परस्पर शिक्षा के द्वारा एक-दूसरे को सिखाने के लिए भी हैं। इसी रीति से हमें अपराधियों को उलाहना देना चाहिए, कि वे परमेश्वर का इस प्रकार उपहास करने, उसका जूआ उतार फेंकने, और दुष्टता में लिप्त होने की और अधिक छूट न लें। पौलुस मूलतः हमें यही बताना चाहता है।

इस शिक्षा को और दृढ़ करने के लिए वह एक और कारण जोड़ता है। यह कहना उचित है कि ज्योति सब वस्तुओं को प्रकट करती है। इससे पहले उसने हमें बताया था कि जब परमेश्वर के आत्मा और सुसमाचार से हम प्रकाशित हो जाएँ, तो हमें दीपकों के समान होना चाहिए, जो संसार को ज्योति दें। हमारे पास जीवन का वचन है, जो हमारा मार्गदर्शन ही नहीं करता, वरन् भटके हुओं को भी सही मार्ग पर ले आता है। इसी विषय को आगे बढ़ाते हुए वह समझाता है कि प्रकट करना ज्योति का स्वभाव और कार्य है। इसलिए जब हम दुष्टता को जड़ पकड़ने और गहरी से गहरी होकर बढ़ने देते हैं, तो हम स्पष्ट दिखाते हैं कि हम न ज्योति हैं, न ज्योति की सन्तान। दूसरे शब्दों में, हम तनिक भी परमेश्वर या यीशु मसीह के नहीं हैं। संक्षेप में, पौलुस का अर्थ यह है कि जब तक हम बुराई का सक्रिय रूप से विरोध और प्रतिरोध न करें, जितना हो सके, और उसे पूरा अधिकार और प्रभुत्व पाने से न रोकें, तब तक हम अपने मसीही होने या विश्वास का कोई प्रमाण नहीं दे सकते।

अब आओ, एक बार फिर अपने आप पर विचार करें। जैसा मैंने पहले कहा, हम में से कोई भी इस दोष से मुक्त नहीं कि हम परमेश्वर से अधिक मनुष्यों से डरते हैं, दूसरों के अपराधों की ओर से आँखें इसलिए मूँद लेते हैं कि वे भी हमारे लिए वैसा ही करें, और अपनी चुप्पी से एक-दूसरे को धोखा देते हैं। परन्तु एक और, इससे भी बुरा दोष है जो समस्या को और बढ़ाता है। हम अपनी चुप्पी के साथ-साथ बुराई के फैलाव में सक्रिय रूप से योगदान भी देते हैं। फलस्वरूप अनैतिकता और आगे बढ़ती है, क्योंकि लगभग सब लोग, अर्थात् आज के अधिकांश लोग, हर प्रकार की दुष्टता और अव्यवस्था की ओर से आँखें मूँद लेते हैं, और जिन बातों का उन्हें सामना करना चाहिए उनके लिए अपने कान बन्द कर लेते हैं।

हर व्यक्ति अपने साथियों की दुष्टता को छिपाने का यत्न करता है, पुरुष पुरुषों के लिए और स्त्रियाँ स्त्रियों के लिए। जो अनेक घोर अपराध किए जाते हैं उन्हें वे सुधार सकते थे, परन्तु इसके बजाय वे अपने दोषों को दूसरों के गोबर और मैल से दबा देते हैं और अपने अवगुणों को ऐसे छिपाते हैं मानो वे कोई धन हों। लगभग सब लोग परस्पर छिपाने का यह खेल खेलते हैं, जिसमें वे अपने पड़ोसी के अवगुणों पर इस आशा से मौन रहते हैं कि उसके बदले उनके साथ भी वैसा ही होगा। यही बात अन्य सब पापों के विषय में भी सच है। फिर भी, जैसा मैंने पहले कहा, परमेश्वर ने व्यर्थ नहीं कहा है। एक दिन हम उस दण्डाज्ञा का निष्पादन अनुभव करेंगे जो यहाँ उसके प्रेरित के द्वारा कही गई है। जब वह समय आएगा, तब उन बातों के लिए पछताने में बहुत देर हो चुकी होगी जिन्हें हमें पहले स्वीकार कर लेना चाहिए था। जो डरते हैं वे जाकर सीखें और स्मरण रखें कि यहाँ क्या कहा गया है: परमेश्वर हमें प्रकाशित करता है कि हर एक जन अपने आप को जाँचे। हमें अँधेरे में टटोलते हुए अन्धे धनवानों के समान नहीं होना चाहिए, जो एक ओर ठोकर खाते और दूसरी ओर चीजों से टकराते हैं। इसके बजाय हमें उद्धार का मार्ग जानना चाहिए, और इसके अतिरिक्त छिपी हुई बुराई को प्रकट करके दूसरों को भी सिखाना चाहिए। जिन्होंने परमेश्वर की ओर पीठ फेर ली है, यद्यपि वे लम्बे समय से अन्धकार में प्रतीत होते थे, वे समझ जाएँगे कि उन्हें चाहे जो परिणाम हो, ज्योति के पास आना ही होगा।

इसलिए हमारे लिए यह दिखाने का सच्चा मार्ग कि हम सचमुच परमेश्वर के हैं और उसकी पवित्र आत्मा और उसके वचन से प्रकाशित हैं, उन बातों को प्रकट करना है जो अन्यथा छिपी रहतीं, क्योंकि जैसा सुलैमान ने कहा, प्रेम अनेक पापों को ढाँप देता है। हमें धीरज रखना और बहुत सी कमियों को सहना चाहिए। हमारे लिए एक-दूसरे पर दोष लगाना उचित नहीं, जैसा कुछ लोग करते हैं, जो अपराध करते हुए देखे गए लोगों को चेताने के बजाय ऐसी बातें फैलाते हैं कि गलियाँ और बाजार उनसे भर जाते हैं। वे छोटे-छोटे अपराधों को बढ़ा-चढ़ाकर घोर पापों के स्तर तक पहुँचा देते हैं। इसलिए जब हम में से कुछ लोग किसी को प्रकट करते हैं, तो वह इस रीति से एक-दूसरे पर दोष लगाने के लिए नहीं, वरन् उस दुःखी व्यक्ति की सहायता के लिए होता है, जिसे शैतान ने अन्धा कर दिया है, और जिसे अपनी दुर्दशा और दुष्टता को पहचानना आवश्यक है कि वह लज्जित हो। इसी प्रकार जिस स्त्री ने अपने आप को पूर्ण अशुद्धता के हवाले कर दिया है, वह अपने दोषों और अवगुणों का सामना कराए जाने से कुछ शालीनता पा सकती और सही मार्ग पर लौट सकती है।

अपराध को प्रकट करने की रीति यह नहीं कि हम एक-दूसरे की निन्दा करें, ढोंग से एक-दूसरे को डाँटें, या कपटी बनकर मच्छर को छानें और बैल या भेड़ को कौर में निगल जाएँ। अर्थात् कुछ लोग अत्यन्त छोटी बातों में तो बहुत विवेकशील होते हैं, परन्तु अपनी नाक के नीचे के अनेक बड़े अपराधों की ओर से आँखें मूँद लेते हैं, और तनिक भी ठेस नहीं खाते। हमें ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए। जब हम देखें कि हमारी अविश्वासयोग्यता के कारण पाप बढ़ और फैल रहा है, तो हमें उसका सामना करना चाहिए। हर एक को सुधार के उद्देश्य से अपने आप पर और अपने दोषों पर विचार करने को विवश किया जाना चाहिए। यही वह यत्न है जिसका आग्रह सन्त पौलुस हमसे यहाँ करता है। यही उन महामारियों को दूर करने का साधन है जिन्हें शैतान चुप्पी और छल के द्वारा अन्यथा बनाए रखता। इसलिए जब कभी हम भीतर कोई संक्रमण देखें, तो उसे तब तक सड़ने न दें जब तक रोग असाध्य न हो जाए। इसके बजाय हमें उसे तुरन्त शुद्ध करना चाहिए, चेतावनियों को नश्तरों के समान और उस संक्रमित पदार्थ को निकालने की विधियों के समान प्रयोग करना चाहिए जो पूरे शरीर को बिगाड़ और संक्रमित कर सकता है। सो सार यह है कि हमें इस शिक्षा को उसी पर लागू करना चाहिए जो सन्त पौलुस यहाँ सिखाता है।

इसलिए हमारा प्रभु यीशु मसीह सुसमाचार की सारी शिक्षाओं में उनसे बात करता है जो अपने पापों में सो गए हैं, जो मरे हुओं के समान हैं, कि वे जागें और उठ खड़े हों, और इस प्रकार हम उसके द्वारा प्रकाशित किए जाएँ। पहले हमें स्मरण रखना चाहिए कि यीशु मसीह सचमुच हमें मरे हुओं में से जिलाता है जब वह हमें विश्वास के लिए बुलाता और उद्धार की आशा में ले जाता है। यह इसलिए कि हम अपनी दशा को और अच्छी तरह समझ सकें। हम देखते हैं कि लोग प्रायः डींग मारते और अपनी बड़ाई करते हैं, यद्यपि वे पूरी तरह उलझन में हैं और घमण्ड करने को उनके पास कुछ नहीं। पवित्रशास्त्र हमें बताता है कि हम मरे हुए हैं, और यीशु मसीह के विश्वास में फिरने से पहले हमारे पास जीवन का कोई आभास हो सकता है। परन्तु वह जीवन परमेश्वर के सामने मृत्यु ही है। इसीलिए सन्त यूहन्ना में कहा गया है, "वह घड़ी आती है कि जितने मनुष्य के पुत्र का शब्द सुनेंगे, वे जीएँगे, चाहे वे मरे हुए हों, और मृत्यु से पार होकर जीवन में प्रवेश करेंगे।" यीशु मसीह शारीरिक मृत्यु की, या उस पुनरुत्थान की बात नहीं करता जिसकी हम अन्तिम दिन आशा रखते हैं। इसके बजाय वह प्रकट करता है कि जब परमेश्वर हमें नया करता और आत्मिक जीवन देता है, तब हमें दूसरे पुनरुत्थान का पूर्वस्वाद पहले से मिल चुका होता है। क्योंकि जैसा पहले समझाया जा चुका है, हम बुराई के सिवा और कुछ करने में समर्थ नहीं। पौलुस भी यही अभिव्यक्ति प्रयोग करता है, और कहता है कि हम भीतर से मरे हुए हैं। इसी पर आगे बढ़ते हुए वह बल देता है कि सुसमाचार का पूरा सन्देश यही है कि हम मरे हुओं में से जी उठें। जब तक हम जीवन के स्रोत परमेश्वर से दूर हैं, हम एक कालकोठरी में हैं, और हमारे लिए अच्छा होता कि हम कभी जन्मे ही न होते। हमें जागना ही चाहिए, क्योंकि हमारी मृत्यु का एक भाग हमारी सुस्ती है, जैसा मैंने पहले कहा। हम जन्म से ही ऐसे भ्रष्ट हैं कि केवल भले कामों से उद्धार नहीं पा सकते। हम अटके हुए, अन्धे, दुष्ट और खोए हुए हैं, और शैतान हमें हाँकता और आगे धकेलता है, ताकि जब तक परमेश्वर हमें लगाम ढीली रखने देता है, हम रसातल में और गहरे डूबने के सिवा कुछ नहीं कर सकते।

अब जब हम उस दशा तक पहुँच चुके हैं, तब कोई जड़ता और नहीं बचती, जैसा सन्त पौलुस पहले कह चुका है। केवल हठ ही बचता है, मानो परमेश्वर हमारे लिए कुछ भी न हो, और हमने अपने पापों का सारा बोध और चेतना खो दी हो। इसीलिए वह यहाँ बल देता है कि हमें जागना चाहिए, क्योंकि जब तक परमेश्वर हमें हिलाकर हमारी दुर्दशा का बोध न कराए, कि हम अपने पापों से घृणा करें और उसकी ओर लौटें, तब तक हम आत्मिक अचेतनता की अवस्था में हैं। इसलिए जीवन और उद्धार का आरम्भ तब होता है जब परमेश्वर हम पर अनुग्रह के साथ दृष्टि करता है, जबकि हम आत्मिक रूप से मरे हुए अभागों के समान, पूरी तरह भ्रष्ट थे। इसे पहली बात के रूप में ध्यान में रखो।

दूसरे, यह भी देखें कि हमारे भीतर की दुष्टता के साथ-साथ इतनी बड़ी कठोरता और हठ है कि परमेश्वर को हमें बलपूर्वक जगाना पड़ता है, कि हम अपने दोषों का थोड़ा-सा भी बोध कर सकें। इसीलिए परमेश्वर को यह मुख्यतः तब करना पड़ता है जब वह हमें बुलाता और उस उलझन से बाहर खींचता है जिसमें हम थे। तथापि हर मसीही को अपने सारे जीवन इसी अवस्था में रहना पड़ता है। हम कभी इतने पूर्ण रूप से जागे हुए नहीं होंगे कि हमें परमेश्वर के निरन्तर जगाते रहने की आवश्यकता न रहे। तुमने कुछ ऐसे लोग देखे होंगे जो इतनी गहरी नींद में होते हैं कि वस्त्र पहने और पाँवों पर खड़े होने पर भी लड़खड़ाते और अधसोए-से लगते हैं, जब तक कि वे अपने आप को जगाकर किसी काम में न लग जाएँ। वे इतने सुस्त और ऊँघते हैं कि जागते हुए भी अधसोए-से दिखाई देते हैं। हमारा हाल भी ऐसा ही है। यद्यपि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमें यह अनुग्रह दिया है कि हमें आत्मिक मृत्यु से छुड़ाए और अपनी पवित्र आत्मा और अपने वचन के द्वारा जिलाए, तो भी हम अपनी सुस्ती और काहिली को अनुभव करते हैं। इसलिए परमेश्वर को हमें लगातार जगाना पड़ता है। अतः हमें प्रतिदिन उभारा जाना चाहिए, और हमारे कान निरन्तर खुले रहने चाहिए, मानो यीशु मसीह हमें ऊँचे स्वर से पुकार रहा हो, "तुम अब भी इस दुर्दशा में क्यों हो?" यदि हम ऐसी चेतावनियाँ बिना रुके भी सुनते रहें, तो भी हम उतने पूरे जागे हुए न होंगे जितना हमें होना चाहिए। अब हम देख सकते हैं कि सन्त पौलुस इस अंश में क्या कहना चाहता था: कि जो कुछ हम परमेश्वर के अनुग्रह से अपने भीतर अनुभव करते हैं, उसे हमें अपने पड़ोसियों पर भी लागू करना चाहिए। हमारे प्रभु यीशु मसीह ने सचमुच हमें आत्मिक मृत्यु से जिलाया है और प्रतिदिन हमें हमारी आत्मिक नींद से जगाता है, क्योंकि हम प्रायः इतने सुस्त होते हैं। यह इसलिए कि हम भी अपनी बारी में दूसरों को उनकी आत्मिक नींद से जगाएँ और जो आत्मिक रूप से निर्जीव हैं उन्हें जीवन में लौटा लाने का यत्न करें।

फिर, जब वह कहता है, "और यीशु मसीह मुझे प्रकाश देगा," तो इसका यह अर्थ नहीं कि हम अपनी ही सामर्थ्य से उठ और जाग सकते हैं, और यीशु मसीह बाद में अपना अनुग्रह जोड़ देता है। उसका आशय भिन्न है। उसका अर्थ यह है कि यीशु मसीह के द्वारा हम प्रकाशित किए जाएँगे, परन्तु इस अर्थ में नहीं कि हम केवल किसी अँधेरे स्थान में हैं जहाँ रात के समय के समान दीपक की आवश्यकता है। चाहे किसी मनुष्य की दृष्टि चन्द्रमा, तारों या किसी और वस्तु के कारण कुछ धुँधली हो, तो भी वह वस्तुओं में भेद कर सकता है। इसलिए अँधेरे में चलते समय मनुष्य की आँखें, चाहे वह कितना ही मद्धम क्यों न हो, पूरी तरह निकम्मी नहीं होतीं। परन्तु हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें कहीं अधिक अद्भुत रीति से प्रकाशित करता है। हम केवल अन्धकार में ही नहीं, वरन् पूरी तरह अन्धे हैं। इसलिए सुसमाचार की शिक्षा के द्वारा परमेश्वर का पुत्र जो उपाय हमारे लिए लाता है वह यह है कि वह हमारी दृष्टि लौटा देता है। हमारी आँखें हमारे प्रथम पुरखे आदम के पाप से अन्धी हो गईं, जिसे घमण्ड ने भटका दिया, और जो भले और बुरे में भेद करना चाहता था, उससे परे जितना उसके लिए उचित था। परन्तु अधिक अन्तर्दृष्टि पाने के बजाय वह पशु-समान हो गया, और हम भी उसके साथ आत्मिक अन्धेपन की दशा में छोड़ दिए गए। इसलिए हमें अपनी दृष्टि लौटाए जाने की आवश्यकता है, और यह कि परमेश्वर का आत्मा हमारे आत्मिक अन्धेपन के स्थान पर हमारी आँखें बने। इसे ध्यान में रखो।

इसके अतिरिक्त, इस संसार में अन्धकार के सिवा कुछ नहीं, और वह इतना घना है कि हम एक कदम भी बिना ठोकर खाए या मार्ग भूले नहीं चल सकते। इसलिए हमें मार्गदर्शन की आवश्यकता है, और हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें मार्ग दिखाता है। हमारा प्रभु यीशु हमें केवल यह करके प्रकाशित नहीं करता कि हमारी सहायता करे या हमारी कमियों की पूर्ति करे, वरन् इसलिए कि हम पूरी तरह अन्धे हैं, मरे हुए भी, और अन्ततः हम अधोलोक की गहराइयों में हैं, कब्र में पड़ी लाश के समान। लोग कब्र पर दीपक और मशालें ला सकते हैं, परन्तु वे लाश को देखने में सहायता नहीं करेंगे। इसलिए हमारा प्रभु यीशु हमें अपनी ज्योति इसलिए नहीं देता कि हम पहले से अधिक स्पष्ट देखें, वरन् इसलिए कि हमारी दृष्टि पूरी तरह लौटा दे, क्योंकि हम अन्धे हैं। इसलिए, जब यीशु मसीह इस रीति से बोलता है और निरन्तर हमें जगाता और हमें और स्पष्ट देखने में सहायता करता है, तो क्या हमें उसके उदाहरण पर नहीं चलना चाहिए, और जब हम अपने पड़ोसियों को विनाश की ओर भटकते देखें तो उनकी सहायता करने में अपनी पूरी शक्ति नहीं लगानी चाहिए? यहाँ जो सन्देश दिया जा रहा है उसका सार यही है।

यह पहचानते हुए कि हमारा प्रभु यीशु अपने आप को उदाहरण और आदर्श के रूप में रखता है, यदि हम अप्रभावित बने रहें तो हम बर्बर और निर्मम ठहरेंगे। परमेश्वर का पुत्र न केवल हमें प्रकाशित करने, हमें उद्धार का मार्ग दिखाने, और उस आत्मिक नींद से जगाने का अपना कार्य अपने ऊपर लेता है जिसने हमें घेर रखा था, वरन् हमें प्रकाशित करने के बाद वह हमसे आशा रखता है कि हम दूसरों के लिए मार्ग दिखाते हुए ज्योति-स्तम्भ बनें जिनके पीछे वे चलें। इस रीति से वह हमसे अपने कार्य का आधा भाग पूरा करने की आशा रखता है। इसलिए, चूँकि परमेश्वर के पुत्र ने हमें ऐसा सम्मान दिया है, उसकी ज्योति को टोकरी के नीचे छिपाना और उसे केवल अपने लाभ के लिए, दूसरों के लाभ के लिए नहीं, काम में लाना विश्वासघात होगा। इसके अतिरिक्त, यदि हम यह सोचें कि हमने केवल स्वयं बुराई से दूर रहकर अपना कर्तव्य पूरा कर लिया, जबकि दूसरों को विनाश की ओर जाने दें, उनकी चिन्ता किए बिना या स्थिति को सुधारने की इच्छा किए बिना, जब हम देखते हैं कि शैतान उन्हें अनन्त दण्ड की ओर ले जा रहा है, तो हम निःसन्देह परमेश्वर के प्रति बड़ा अन्याय कर रहे हैं। उसकी ज्योति को इस प्रकार दबाकर हम अपने पड़ोसियों के साथ विश्वासघात करते हैं और उन्हें उस लाभ से वंचित करते हैं जो उनके प्राणों के अनन्त उद्धार की ओर ले जाना चाहिए। इसलिए हम परमेश्वर और मनुष्यों दोनों के सामने लेखा देंगे, जब तक कि हम उस पर ध्यान न दें जो हमारा प्रभु यीशु मसीह हमसे कह रहा है, और इस शिक्षा को सदा अपने हृदयों में न रखें।

मसीही कहलानेवाले होने के नाते हमें अपने आप को तुरही बजानेवाले समझना चाहिए, जो सोए हुओं को जगाते हैं, और भटके हुओं को मार्ग दिखानेवाले मार्गदर्शक, जो उन्हें उस सही मार्ग पर लौटा लाते हैं जिससे वे भटक गए थे। हम सब को इसी रीति से कार्य करना और तब तक करते रहना चाहिए जब तक हम उस आनन्दमय मिलन तक न पहुँचें जब हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें अपने पास बुलाएगा, और वह मीरास हमें देगा जो उसने हमारे लिए प्राप्त की है। अब आओ, हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने दीन हों, अपने दोषों को मानें और प्रार्थना करें कि वह हमें उनका और अधिक बोध कराए। वह हमें अभागे अविश्वासियों के समान गहरी नींद में पड़ने न दे। इसके बजाय, जैसा उसकी इच्छा है कि हमारा जीवन एक निरन्तर दिन के समान हो, कि वह केवल सूर्य को कुछ समय के लिए हमें प्रकाशित करने को न दे और फिर रात हो जाए, वरन् दिन और रात दोनों में स्वयं हम पर शासन करे, कि हम स्थायी लाभ पाएँ और उसके हमें प्रकाशित कर देने के बाद अन्धकार में न लौटें। वह हमें उस पवित्र मार्ग पर दृढ़ बनाए रखे जिस पर उसने हमें बुलाया है, और जब हम दूसरों को अपने पीछे आने के लिए बुलाएँ तो हमारी अगुवाई करे, जब तक कि हम सब मिलकर उसकी उपस्थिति में एक न हो जाएँ। वह यह अनुग्रह केवल हमें ही नहीं, वरन् पृथ्वी के सब लोगों और जातियों को दे, इत्यादि।

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