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इफिसियों 2:4-6 पर दूसरे अध्याय का दूसरा, अर्थात् दसवाँ उपदेश
"जिनमें तुम पहले इस संसार की रीति पर, और आकाश के अधिकार के हाकिम अर्थात् उस आत्मा के अनुसार चलते थे, जो अब भी आज्ञा न माननेवालों में कार्य करता है। इनमें हम भी सब के सब पहले अपने शरीर की लालसाओं में दिन बिताते थे, और शरीर और मन की इच्छाएँ पूरी करते थे, और अन्य लोगों के समान स्वभाव ही से क्रोध की सन्तान थे। परन्तु परमेश्वर ने जो दया का धनी है, अपने उस बड़े प्रेम के कारण जिससे उसने हम से प्रेम किया, जब हम अपने अपराधों के कारण मरे हुए थे, तो हमें मसीह के साथ जिलाया (अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है), और मसीह यीशु में उसके साथ उठाया, और स्वर्गीय स्थानों में उसके साथ बैठाया।" - इफिसियों 2:2-6
आज सुबह मैंने आपको समझाना आरम्भ किया था कि पौलुस किस प्रकार परमेश्वर की भलाई को सब मनुष्यों तक फैलाना चाहता था, ताकि किसी को अपने विषय में घमण्ड करने का कारण न रहे, मानो उसमें अपनी कोई व्यक्तिगत योग्यता हो। सचमुच, यदि संसार की कोई जाति कभी दूसरों से श्रेष्ठ दिखाई दी, तो वह यहूदी थे, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें अपनी निज प्रजा चुना था, और उन्हें पवित्र वंश और अपना भाग कहा था। इस दृष्टि से यहूदी दूसरों से बढ़कर आदर के योग्य दिखाई देते थे। परन्तु इसलिए कि कोई भी हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह को घटाने न पाए, पौलुस घोषणा करता है कि वे भी कभी क्रोध की सन्तान थे, और इस पर बल देता है कि उन्हें भी भ्रम के गड्ढे से छुड़ाया जाना आवश्यक था, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ। संक्षेप में, पौलुस यहाँ स्पष्ट कर देता है कि जो लोग सबसे उत्तम गिने जा सकते हैं, उनके पास भी परमेश्वर के सामने घमण्ड करने या अपने लिए आदर कमाने का कोई आधार नहीं है। वरन् वे सब अनुग्रह के पात्र हैं, और हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा अनन्त जीवन के वारिस बनते हैं।
अब यह प्रश्न उठ सकता है कि पौलुस अन्यजातियों को यहूदियों के बराबर क्यों ठहराता है, जबकि परमेश्वर ने उनके बीच भेद ठहराया था। ऐसा लग सकता है कि परमेश्वर की सारी प्रतिज्ञाएँ व्यर्थ कर दी गईं, और अन्याय केवल मनुष्यों के साथ ही नहीं वरन् परमेश्वर के साथ भी हुआ। यदि हम यह स्वीकार करें, जैसा हमें करना ही चाहिए, कि परमेश्वर का अब्राहम के वंशजों को चुनना व्यर्थ नहीं था, और उन्हें अपनी प्रजा और कलीसिया घोषित करना कोई छल नहीं था, तो उन्हें परमेश्वर के अधिक निकट और अधिक घनिष्ठ होना चाहिए। उनमें कोई ऐसा विशेष चिह्न होना चाहिए जिसके द्वारा वे उसकी ओर खिंचे हुए हों। ऐसा प्रतीत हो सकता है कि पौलुस इस प्रकार यहूदियों को नीचा दिखा रहा है। परन्तु दूसरे स्थान पर वह स्पष्ट करता है कि यह व्यवस्था पूर्णतः उचित है, जब हम एक ओर यहूदियों को परमेश्वर की चुनी हुई और विशेष प्रजा मानते हैं, और दूसरी ओर परमेश्वर के सामने उनकी अपनी दशा और उनके आचरण पर विचार करते हैं। रोमियों की पत्री में, सारे संसार पर दण्ड की आज्ञा सुना देने के बाद, यह प्रकट करके कि कोई ऐसा नहीं जो दोषी ठहराया हुआ और नष्ट न हो, पौलुस एक प्रश्न उठाता है। यह देखते हुए कि परमेश्वर ने अब्राहम के वंशजों को चुनकर पूरी तरह अपने लिए अलग कर लिया था, वह उनकी पवित्रता के विषय में पूछता है। क्या इसका अर्थ यह है कि उनमें कोई पवित्रता नहीं है? ऐसा प्रतीत होगा कि पवित्रशास्त्र में परमेश्वर के वे वचन, कि उसने किसी और जाति के साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया, निकम्मे थे। परन्तु पौलुस दृढ़ता से कहता है कि लोगों को उस अनुग्रह को मानना चाहिए जो परमेश्वर ने अपनी प्रजा पर कृपा करके दिया, और इसलिए उस सीमा तक वे सारे संसार से बढ़कर माने जाने चाहिए। फिर भी वह तुरन्त जोड़ देता है कि चूँकि वे आदम की जाति से उत्पन्न हुए हैं, इसलिए वे अन्य सब मनुष्यों के समान पापी हैं। उनके स्वभाव में भ्रष्टता और दुर्बलता के सिवा कुछ नहीं है।
सब मनुष्यों को दीन होना चाहिए, और हम सब को मानना चाहिए कि हम में से कोई भी दूसरे से अलग नहीं ठहराया जा सकता, जैसा हम गलातियों के दूसरे अध्याय में पहले देख चुके हैं। वहाँ सन्त पौलुस ने पतरस से कहा, "हाँ, हम तो स्वभाव से यहूदी हैं, और ऐसा लगता है कि हमें अपने आप को अलग रखना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर हमारा राजा है, और उसने हमें पवित्र ठहराया और चुनकर अपने बीच बसाया है। सो पहली दृष्टि में ऐसा प्रतीत हो सकता है कि हमें अन्यजातियों को अशुद्ध और परमेश्वर से अपरिचित जानकर ठुकरा देना चाहिए। परन्तु स्मरण रखें कि हम में से कोई ऐसा नहीं जो परमेश्वर के सामने उत्तरदायी न हो और अपने आप को अभागा पापी न जाने। इसलिए परमेश्वर को सब मनुष्यों का न्यायी होना होगा, और हम सब को उसकी महिमा के सामने झुकना होगा, और अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा उससे मेल-मिलाप खोजना होगा।"
संक्षेप में, इस स्थल में पौलुस का अभिप्राय परमेश्वर के अनुग्रह को घटाना नहीं, वरन् इस बात पर बल देना है कि यहूदियों के पास उद्धार और स्वर्गीय मीरास पाने का कोई और उपाय न था, सिवा इसके कि वे हमारे प्रभु यीशु मसीह के अंग बनें। उन्हें सब से पहले अपनी अन्तर्निहित अयोग्यता के कारण अपने आप को शापित और दोषी ठहराया हुआ समझना चाहिए। उनकी धार्मिकता मानो अचानक मिली हुई वस्तु है, और वे अन्य सब लोगों के समान पाप में जन्मे हैं। तौभी परमेश्वर ने अपनी दया से उन्हें भी चुन लिया है।
इसी प्रसंग में हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि "स्वभाव" शब्द के द्वारा पौलुस केवल यही संकेत नहीं दे रहा कि हम आदत से पापी हैं, भलाई की अपेक्षा बुराई पर चलने की ओर अधिक झुके हुए हैं और प्रायः एक दूसरे को धकेलते रहते हैं, परन्तु इसमें एक और गहरी बात भी है। हम में से हर एक जन्म ही से पाप को लिए हुए है; खाना-पीना हमारे साथ चलता है, परन्तु पाप इस जीवन की सब वस्तुओं से अधिक गहराई से हम में जमा हुआ है। अन्यजातियों को यह अनोखा लग सकता है कि छोटे शिशु, जो भले और बुरे में भेद नहीं कर सकते और जिनमें न विवेक है न इच्छा, परमेश्वर के सामने पापी और दोषी माने जाएँ, जैसा कि पौलुस उन्हें "क्रोध की सन्तान" कहकर बताता है। तौभी हमें, चाहे अच्छा लगे या न लगे, अपना दोषी ठहराया जाना स्वीकार करना होगा। जैसे ही शिशु कोई संकेत देने के योग्य होते हैं, वे निःसन्देह यह दिखा देते हैं, बल्कि आवश्यकता से अधिक दिखा देते हैं, कि वे छली और दुष्ट हैं, और उनके भीतर गुप्त विष है। यद्यपि वे उसे तुरन्त प्रकट नहीं करते, तौभी वे विषैले साँपों के समान हैं। इसलिए हमें समझना चाहिए कि पौलुस हमें "क्रोध की सन्तान" कहकर कोई अन्याय नहीं करता, जैसे वह यहूदियों को कहता है, और उनमें शिशुओं तक को सम्मिलित करता है। न्याय की बात यह है कि हमें अपनी राय पर या जो हमारी आँखों के सामने दिखाई देता है उस पर भरोसा नहीं करना चाहिए। वरन् हमें परमेश्वर की महिमा करनी चाहिए, जो यथार्थ न्यायी है, चाहे हम उसे समझ न पाएँ।
संसार हमें चाहे जैसा देखे, हमें सदा उस बात की ओर लौटना चाहिए जो भजन संहिता 51 में कही गई है, अर्थात् यह कि हम न केवल प्रतिदिन अनेक प्रकार से परमेश्वर को अप्रसन्न करते हैं वरन् आरम्भ ही से, इससे पहले कि हमने कुछ किया या सोचा हो, उसके लिए घृणित हैं, क्योंकि हम पाप और भ्रष्टता में गर्भ में आए हैं। "क्रोध की सन्तान" कहने से सन्त पौलुस का अर्थ यह है कि हम मृत्यु के वारिस हैं, और गर्भ में आते ही परमेश्वर को हमारा शत्रु होना पड़ता है। फिर भी परमेश्वर क्रूर नहीं है, और न वह अपनी ही सृष्टि से बैर रखता है। यदि हम में हमारे आदि पिता आदम की पवित्रता होती, जैसा उस वचन में कहा गया है कि परमेश्वर की बनाई हुई सब वस्तुएँ अच्छी थीं, तो परमेश्वर हम में अपनी ही कारीगरी से बैर न रखता। परन्तु हमें यह निष्कर्ष निकालना होगा कि हमने परमेश्वर का बैर कमाया है, चाहे पाप को मानो शरीर में उँगली रखकर दिखाया न जा सके, तौभी परमेश्वर उसे भली भाँति जानता है, और हमें अपना दोष स्वीकार करना चाहिए।
सार रूप में, यही मुख्य सन्देश है जो हम इस पाठ से ले सकते हैं और सन्त पौलुस के अभिप्राय पर लागू कर सकते हैं। यदि यहूदी, जिन्हें कोई विशेष अधिकार प्राप्त जान पड़ता था, फिर भी मनुष्यजाति की सामान्य दशा में सम्मिलित हैं, तो हम अन्यजाति लोग क्या दावा कर सकते हैं? यदि हम परमेश्वर के सामने किसी भी प्रकार का घमण्ड दिखाने का साहस करें, तो हमारे पास लज्जित होने के बहुत से कारण हैं, विशेषकर इसलिए कि यहूदी भी, जिनकी तुलना में हम कुछ भी नहीं हैं, परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं पा सकते, सिवा परमेश्वर की सेंतमेंत की दया और हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा मेल-मिलाप के।
परन्तु एक और प्रश्न या सन्देह बचा रहता है: यहूदी शत्रु कैसे गिने जा सकते थे, जब परमेश्वर पहले ही अपने आप को उनका पिता घोषित कर चुका था? कुछ लोग कह सकते हैं कि इसका कारण यह है कि प्रतिरूपों की पूर्ति और उनका सत्य और सार अभी पूरा नहीं हुआ था। तौभी हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि यद्यपि परमेश्वर ने यहूदियों को अब्राहम के द्वारा गोद लिया था, वे यीशु मसीह में ग्रहण किए गए थे, और यह अनुग्रह उन पर उसी में स्थापित किया गया था, जैसा इस प्रतिज्ञा से संकेत मिलता है कि "तेरे वंश में पृथ्वी की सारी जातियाँ आशीष पाएँगी।" हम गलातियों की पत्री में देख चुके हैं कि यह वंश हमारे प्रभु यीशु मसीह को बताता है, क्योंकि उसके बिना कोई एकता नहीं, केवल बिखराव है। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि यहाँ सन्त पौलुस यहूदियों के कलीसिया में सम्मिलित होने को, अन्यजातियों के सम्मिलित होने के समान, केवल परमेश्वर की सेंतमेंत और उदार भलाई का फल ठहराता है।
एक और बात है जिसे भूलना नहीं चाहिए, और वह यह कि यद्यपि यहूदियों ने ऐसा अनुग्रह पाया, तौभी उन्हें छुड़ानेवाले के आने की प्रतीक्षा करनी पड़ी। हम जानते हैं कि लहू बहाए बिना परमेश्वर के साथ कोई प्रायश्चित नहीं हो सकता। व्यवस्था की बलियाँ पाप को दूर नहीं कर सकती थीं, न परमेश्वर के क्रोध और शाप को शान्त कर सकती थीं। बैल या मेमने का लहू चढ़ाने में परमेश्वर के साथ प्रायश्चित करने की कोई सामर्थ्य न थी; इन पशुओं में ऐसी शक्ति नहीं थी, क्योंकि वे नाशवान हैं और प्राण तक नहीं पहुँच सकते। इसलिए यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यहूदी आशा में परमेश्वर की सन्तान थे, परन्तु जब तक छुड़ानेवाले के द्वारा प्रायश्चित न हुआ, तब तक वे उससे अलग ही थे। इस प्रकार परमेश्वर ने उन पर वैसी ही कृपा दिखाई जैसी शेष संसार पर। इसी कारण पौलुस जोड़ता है कि परमेश्वर ने, जो दया का धनी है, उन्हें भी अन्यजातियों के समान, उस बड़े प्रेम के अनुसार जो उसे उनसे था, जिलाया।
जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, जो मुख्य बात सन्त पौलुस यहाँ कह रहा है वह यह है कि हम अपनी उत्पत्ति पर विचार करके, और उस दशा को पहचानकर जिसमें परमेश्वर ने हमें पाया और किस कारागार से उसने हमें छुड़ाया, अपनी ही दुर्दशा से लज्जित होना और उससे घृणा करना सीखें। दूसरी बात यह है कि हम परमेश्वर की भलाई को और भी बढ़ाकर मानें, क्योंकि यह अविश्वसनीय है कि उसने जीवन की शिक्षा को हमारी दीन दशा तक उतार लाना और हमें जीवन देना स्वीकार किया। हम ऐसी गहराई तक डूब चुके थे कि हमें इन वचनों पर पूरा ध्यान देना चाहिए: "परमेश्वर ने जो दया का धनी है, अपने उस बड़े प्रेम के कारण जो उसने हम से किया, जब हम मरे हुए थे, तो हमें जिलाया।" निश्चय ही यह उपाधि परमेश्वर पर सदा शोभा देती है, क्योंकि उसके धन और भलाई कम नहीं होते, और वह सदा दया में और भी धनी बना रहता है। फिर भी हमें यहाँ के विशेष प्रसंग और विषय-वस्तु को ध्यान में रखना चाहिए, अर्थात् यह कि परमेश्वर ने अपनी दया के असीम भण्डार हमारी दुर्दशा की गम्भीरता के अनुपात में हम पर उण्डेल दिए हैं। इसी कारण पौलुस जोड़ता है, "उस बड़े प्रेम के अनुसार जिससे उसने हम से प्रेम किया।" परमेश्वर में अवश्य ऐसी भलाई होनी चाहिए जो हमें मोह ले, और हमारी समझने की सारी सामर्थ्य से परे हो। यदि हम अपने आप को पूरी तरह उसी में लगा भी दें, तौभी उसके एक अंश का ही स्वाद चख पाएँगे।
परन्तु पौलुस यह क्यों कहता है कि परमेश्वर ने हम से प्रेम किया? वह विशेष रूप से अपने और उस जाति में से चुने हुए अन्य लोगों के विषय में कह रहा है, यद्यपि उनमें से अधिकांश काट डाले गए हैं। यद्यपि यहूदियों को पहिलौठे होने का विशेषाधिकार था और वे उचित वारिसों के नाते हम पर प्रधानता रखते थे, और हम मानो असमय जन्मे बच्चे के समान थे, फिर भी पौलुस अपने और यहूदियों में से चुने हुए अन्य लोगों के विषय में कहता है। हम देखते हैं कि वे अब परमेश्वर के राज्य से निकाल दिए गए हैं, और ऐसा उदाहरण बन गए हैं जिससे हमें काँप उठना चाहिए जब हम उन पर परमेश्वर का क्रोध और दण्ड देखते हैं। इसलिए सन्त पौलुस, यहूदियों में से चुने हुए थोड़े से अन्य लोगों के साथ, इसका श्रेय केवल परमेश्वर के प्रेम को दे सकता है, जो उन पर अधिक प्रत्यक्ष रूप से प्रकट हुआ। इसी प्रकार आज भी, यदि सुसमाचार सारे संसार में शुद्ध रूप से सुनाया जाता, और विश्वास सब को निष्पक्ष रूप से दिया जाता, ऐसा कि किसी को पवित्र आत्मा का तत्काल स्पर्श न चूकता, और हम सब बराबर होते, तो यह स्वाभाविक और साधारण बात लगती। ऐसा जान पड़ता कि हमारे पास यह अपने स्वाभाविक प्रयत्नों से है, और यह परमेश्वर की ओर से कोई विशेष अनुग्रह नहीं है। परन्तु जब हम देखते हैं कि अनेक देश आत्मिक अकाल से पीड़ित हैं, और उन्हें पोषण देने के लिए भली शिक्षा की एक बूँद भी नहीं, वरन् उन अभागे लोगों को शैतान के झूठ और भ्रम खिलाए जाते हैं, और दूसरी ओर परमेश्वर ने हमें यहाँ ज्योति दी है और अपने वचन से सींचा है, तो हम इसी निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि यह उसके बड़े प्रेम का प्रभाव है। फिर पौलुस कहता है कि बहुतों ने सुसमाचार सुना है, परन्तु प्रत्यक्ष है कि वे उसके द्वारा कठोर हो गए हैं और समय के साथ और बिगड़ गए हैं। क्योंकि पोपतन्त्र में पाए जानेवाले जैसे भयानक राक्षस और कहीं नहीं मिलेंगे। वरन् हम उन्हें वहाँ देख सकते हैं जहाँ सुसमाचार का प्रचार और अंगीकार किया जाता है, क्योंकि ये लोग अपने आप को सुधरे हुए बताते हैं परन्तु देहधारी शैतान जान पड़ते हैं। ऐसे उदाहरण देखने के लिए हमें दूर जाने की आवश्यकता नहीं। इसलिए हमें ध्यान रखना चाहिए कि हम यह न मान बैठें कि हम में से किसी के पास अपने संगी मनुष्यों से कुछ अधिक है, और न अपने आप को ऊँचा उठाने का साहस करें। हमें सदा परमेश्वर के अनुग्रह के उस अनन्त सोते को स्वीकार करना चाहिए, न कि उन गड्ढों की ओर मुड़ना जो छेदों से भरे हैं और पानी नहीं रोक सकते, वरन् इससे भी बुरा, जिनमें बाहरी रूप-रंग और ठाठ-बाट के होते हुए भी कीचड़ और गन्दगी के सिवा कुछ नहीं है। मनुष्य की सारी महिमा और शोभा इससे अधिक अच्छी नहीं; वह भी परमेश्वर के प्रेम के उसी सोते से जल भरती है। हमें मानना चाहिए कि परमेश्वर दूसरों के कामों से प्रभावित या विचलित नहीं होता, परन्तु हम से सेंतमेंत प्रेम करता है, हमें अपने पंखों की छाया में ग्रहण करता है और सुसमाचार पर विश्वास के द्वारा अपने पवित्र आत्मा से हमें प्रकाशित करता है। यही सन्त पौलुस यहाँ कहना चाहता था।
अब दूसरी ओर, ताकि वे लोग, जो बहाने और दोष से बचने के उपाय ढूँढ़ने में सदा चतुर रहते हैं, यह कहकर अपने आप को निर्दोष न ठहराएँ कि वे शैतान के अत्याचार के अधीन हैं, और यह तर्क न दें कि इसके लिए उनसे लेखा नहीं लिया जाना चाहिए, पौलुस दिखाता है कि यह दासत्व स्वेच्छा का नहीं है। मैंने आज ही पहले यह समझाया था: स्वतंत्र इच्छा और बुद्धि होते हुए भी हम शैतान की सेवा की ओर झुके हुए हैं, और स्वभाव से ही बुराई की ओर प्रवृत्त हैं। हम स्वभाव से कुछ भी अच्छे नहीं हैं। इसलिए संसार में सचमुच के चोर हैं। यदि परमेश्वर ने हम पर दया न की होती, जैसा सन्त पौलुस ने समझाया, तो हम भी उन्हीं के समान होते जो परमेश्वर के अनुग्रह से बाहर हैं और शैतान के द्वारा हर प्रकार की दुष्टता करने को हाँके जाते हैं। इससे प्रकट होता है कि यदि परमेश्वर हम पर दयालु न हुआ होता तो हम उन्हीं के समान होते।
परन्तु बहुत से लोग परमेश्वर पर कुढ़ते हैं, और अपने दण्ड का कारण उसी को ठहराने तक का दोष लगाते हैं। परन्तु ऐसे दोषारोपणों का उत्तर देने के लिए पौलुस कहता है कि जो शैतान और पाप के दासत्व में हैं, वे फिर भी परमेश्वर की ओर से उचित रीति से दोषी ठहराए जाते हैं। वे बाहरी बल से विवश नहीं किए जाते, वरन् अपनी ही इच्छा के अधीन हैं। इसीलिए वह कहता है कि जो लोग हमारे प्रभु यीशु मसीह की ओर लौटा लाए गए हैं, वे भी पहले शरीर की लालसाओं के अनुसार जीते थे। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के उन्हें बदलने और अपने पवित्र आत्मा के द्वारा अपनी आज्ञाकारिता में लाने से पहले, वे अपनी ही बुरी अभिलाषाओं के पीछे चलते थे।
यह सच है कि लोग अपने पापी स्वभाव को मानते हैं, तौभी वे तर्क करते हैं कि वे भिन्न हो सकते हैं। सब इस पर सहमत हैं कि इच्छा ही पाप और पुण्य में भेद करती है। परन्तु जब दार्शनिक इस रीति से बोलते थे, तो वे मानते थे कि हमारी इच्छा स्वतंत्र और बेरोक है, और यही बात उन्हें धोखे में डालती थी, क्योंकि वे नहीं समझते थे कि हम आदम के पतन से भ्रष्ट हो गए हैं। फिर भी, अपनी भ्रष्टता के होते हुए भी हम परमेश्वर की ओर से उचित रीति से शापित हैं, क्योंकि हम अपनी इच्छा से पाप करते हैं। इसलिए वह जोड़ता है कि हम शरीर और विचारों की इच्छाएँ पूरी करते थे, अर्थात् जो शैतान की पकड़ में हैं और पाप के दास हैं, वे विवशता को बहाना नहीं बना सकते, क्योंकि उन्हें उनकी अपनी ही इच्छा चलाती है।
सो आप देख सकते हैं कि पौलुस उन सब का मुँह बन्द करना चाहता था जो झूठ बोलते और उत्तरदायित्व से बचते हैं, ताकि वे यह न कह सकें कि अपनी दुष्टता के लिए वे दोषी नहीं हैं, क्योंकि वे स्वभाव से उसकी ओर झुके हुए हैं। परन्तु आइए ध्यान दें कि पौलुस विचारों को शरीर के साथ कैसे जोड़ता है, ताकि हम समझें कि पाप हमारे सम्पूर्ण अस्तित्व में व्याप्त है, और हम में कुछ भी शुद्ध या निर्मल नहीं है। हमारा संक्रमण सीमित नहीं है, और पाप किसी एक ही सीमा में बँधा नहीं है। कुछ लोग मान लेते हैं कि वे आदम के कारण भ्रष्ट हैं, परन्तु तर्क करते हैं कि परीक्षा में पड़ने पर भी वे सदा भलाई की ओर झुक सकते हैं। वे समझते हैं कि यदि वे विवेक की सुनें और अपनी अभिलाषाओं को वश में रखें, तो भला करने की अपनी सामर्थ्य दिखा सकते हैं। पोपतन्त्र की यह मान्यता है कि मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा, यद्यपि घायल और दुर्बल हो गई है, फिर भी कुछ सद्गुण बनाए रखती है। परन्तु जैसा मैंने पहले समझाया, पवित्र आत्मा का स्पष्ट कथन इससे व्यापक है: हम केवल रोगी नहीं वरन् मरे हुए हैं, जब तक यीशु मसीह के द्वारा जिलाए न जाएँ। सन्त पौलुस यह कहकर इसकी पुष्टि करता है कि हमारी बुरी अभिलाषाएँ और भावनाएँ, जिन्हें मूल भूख कहा जाता है, ही हम पर प्रभुत्व नहीं करतीं; यह बात इससे कहीं गहरी जाती है। हमारे सारे विचार, निर्णय, और मनुष्य में जो कुछ भी सद्गुण माना जाता है, वह सब दुष्टता कहा गया है। यदि परमेश्वर हमें अपने ही विचारों के पीछे चलने देता, तो ऐसा अकल्पनीय उपद्रव होता। इसलिए हमें पहचानना चाहिए कि हम केवल अपनी दुर्बलता और परमेश्वर की सहायता की आवश्यकता को ही स्वीकार नहीं कर रहे, वरन् यह भी मान रहे हैं कि हम उसके सामने पूरी तरह दोषी ठहरे हुए हैं। हमारे विचार दुष्ट और भ्रष्ट कहे गए हैं, और हम में कुछ भी ऐसा नहीं जो परमेश्वर के क्रोध को न भड़काए। इसलिए हमें एक ओर यह मानना चाहिए कि हम आदम में परमेश्वर के सारे अनुग्रहों से उचित रीति से वंचित हुए हैं, और दूसरी ओर इसे बहाना बनाकर उत्तरदायित्व से बचना नहीं चाहिए, यह कहकर कि हम पाप के दास नहीं हैं, या कि हम दोषी नहीं हैं क्योंकि हम जन्म से ही फँसे और उलझे हुए हैं। वरन् हमें सदा यह विचार करना चाहिए कि हम में से हर एक अपने रोग का मूल अपने ही विवेक के भीतर पाएगा। लोग जितना चाहें तर्क कर लें, परन्तु जब वे भीतर की ओर मुड़कर अपने विवेक से पूछते हैं, तो अपने आप को दोषी और व्याकुल पाएँगे, और उनके पास तर्क करने की कोई गुंजाइश नहीं रहेगी। इसलिए जो कहते हैं कि उनमें स्वतंत्र इच्छा नहीं और परमेश्वर का विरोध करने की सामर्थ्य नहीं, उनके लिए एक ही बात काफी होनी चाहिए: वे बुराई की ओर अपने झुकाव का कारण क्या समझते हैं? कुछ कहेंगे कि शैतान है, परन्तु उन्हें विचार करना चाहिए कि क्या इससे वे पूरी तरह निर्दोष ठहरते हैं।
तो अब परमेश्वर का वचन हमारी अपनी पापमय प्रवृत्तियों से प्रेरित हमारे सामने आ खड़ा होता है। क्या हम नहीं समझते कि हमारी दुष्टता का स्रोत और मूल हमारे ही भीतर है? जब हम परमेश्वर के विरुद्ध इस सीमा तक विद्रोह करते हैं कि हमारे विचार झूठ और अविश्वास से भर जाते हैं, और वे परमेश्वर और उसकी धार्मिकता के पूरी तरह विरुद्ध हो जाते हैं, यहाँ तक कि उससे युद्ध ठान लेते हैं, तो हमें यह पहचानना चाहिए। हमें बहाने नहीं ढूँढ़ने चाहिए, क्योंकि हम अपने साथ पहले ही एक भीतरी न्यायी लिए फिरते हैं, अर्थात् अपना विवेक। इस स्थल में यही मुख्य बात बताई गई है। यह इस बात की चेतावनी भी है कि हम अपने आप पर अत्यधिक भरोसा न करें, वरन् अपनी इन्द्रियों, कल्पनाओं, और अपनी बुद्धि तक को, जिसे हम प्रायः अपनी ही मान लेते हैं, रोककर रखें। जब तक हम इस प्रकार अपने आप का इन्कार नहीं करते, तब तक हम अपने आप को पूरी तरह परमेश्वर की सेवा में नहीं लगा सकते।
पौलुस स्पष्ट कहता है कि जिन्हें परमेश्वर ने जिलाया है वे हमारे प्रभु यीशु मसीह के सहभागी बन गए हैं। उसी में उन्हें अपना जीवन मिलता है। परन्तु क्योंकि परमेश्वर के सार को समझना हमारी पहुँच से बाहर है, और हम उसे ग्रहण नहीं कर सकते, इसलिए यीशु मसीह को मार्ग कहा गया है। वह अपने आप को हमें देता है और हम से छिपता नहीं, वरन् हमें अपनी ओर खींचने के लिए अपनी बाँहें फैलाता है। अपने सुसमाचार में वह हमें यह कहकर बुलाता है, "यदि कोई प्यासा हो तो मेरे पास आकर पीए।" यह निमन्त्रण उसके अपने व्यक्तित्व में पूरा होता है।
इसलिए सन्त पौलुस के वचनों पर ध्यान दें जब वह कहता है कि जो मरे हुए थे वे यीशु मसीह के द्वारा फिर जिलाए गए। इससे वह बात उभरती है जिसकी ओर मैंने आज सुबह संक्षेप में संकेत किया था, अर्थात् यह कि हमारी मृत्यु ऐसी नहीं जो दिखाई दे और बाहरी रूप से परखी जा सके। वह तो हमारे प्राणों के भीतर की भ्रष्टता से सम्बन्ध रखती है, क्योंकि हम सब इस दोष में सहभागी हैं। तब हम स्वर्गीय जीवन तक कैसे पहुँच सकते हैं? हम कैसे जी उठें और फिर जिलाए जाएँ कि प्रतिज्ञा की हुई मीरास पाएँ? उलटे, हम तो असंख्य दुःखों के अधीन हैं।
यह समझना आवश्यक है कि यह नया जीवन, जिसकी वह बात करता है, अभी हम में सिद्ध नहीं है; यह केवल एक छोटा सा पूर्वस्वाद है जो हमें हमारे अन्तिम गन्तव्य की ओर ले चलता है। यह सिद्धता तब पूरी होगी जब हम उस पूर्ण महिमा को पाएँगे जिसकी यहाँ चर्चा है। सन्त पौलुस अपने आप को उदाहरण बनाकर कहता है कि उसने हमारे प्रभु यीशु मसीह के लिए सब कुछ त्याग दिया, यहाँ तक कि अपनी धार्मिकता पर अपना पहला भरोसा भी। यद्यपि दूसरे उसे लगभग स्वर्गदूत के समान मानते थे, वह जानता था कि उसका उद्धार केवल यीशु मसीह में परमेश्वर के अनुग्रह से है। अनेक आदर और निन्दाएँ, यातनाएँ, मार और कारावास सहने पर भी वह यह दावा नहीं करता कि वह अपने लक्ष्य तक पहुँच गया है। वह मानता है कि वह पीछे की बातों को भूलकर आगे बढ़ता जाता है।
यदि वह अपनी बीती उपलब्धियों पर ठहरा रहता, और कहता, "मैंने इतनी कठिनाइयों पर जय पाई है, मैंने बिना थके सुसमाचार का प्रचार किया है, मैंने बहुत फल उत्पन्न किया है, मैंने समुद्र पार किए और उन असभ्य जातियों में प्रचार किया जहाँ परमेश्वर का सन्देश पहले कभी सुना नहीं गया था, मैंने अनेक बाधाओं का सामना किया और विजयी हुआ," तो वह सन्तुष्ट होकर ढीला पड़ जाता। जब हम सोचते हैं कि हमने अपने भाग का काफी कर लिया है और शेष दूसरों पर छोड़ देते हैं, तब हमारे लिए ढीला पड़ जाना सरल है। इसलिए हम में से हर एक को सन्तुष्टि के विरुद्ध चेतावनी पर ध्यान देना चाहिए, यह पहचानते हुए कि हमारी अन्तिम महिमा अन्त तक पूरी तरह प्रकट नहीं होगी। इसलिए हमें निरन्तर अपनी दुर्दशा को स्वीकार करना, परमेश्वर के सामने शोक करना, और मानना चाहिए कि हम सब कुछ के लिए उसकी भलाई के ऋणी हैं।
अब, हमारी वर्तमान दशा चाहे जैसी हो, हम देख सकते हैं कि परमेश्वर का पवित्र आत्मा हमें एक नए जीवन-मार्ग में नया कर रहा है। यद्यपि हम अविश्वासियों के बीच रहते हैं और अनेक परीक्षाओं का सामना करते हैं, और यद्यपि पाप अब भी हम में बसा है, तौभी हम में से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि परमेश्वर ने अपने पवित्र आत्मा के द्वारा जो वरदान हमें दिए हैं वे व्यर्थ या निष्फल नहीं हैं। जब कोई यह तर्क करता है कि यीशु मसीह के हम में कार्य करने से पहले हम पाप कर चुके थे, जैसा हम देख सकते हैं, तो हमारा उत्तर स्पष्ट है: जो कुछ मनुष्यों में स्वभाव से है वह उन्हें परमेश्वर तक नहीं पहुँचा सकता; वरन् उन्हें इस संसार पर भरोसा करने की ओर झुकाता है। इसलिए यदि लोग चारों ओर से हमारा उपहास भी करें, तौभी हम मरे हुए हैं, क्योंकि जब परमेश्वर हमें रोक लेता है और हमें अपनी ही अभिलाषाओं और झुकावों के पीछे चलने देता है, तो हम भटक जाते हैं। मनुष्य में बुद्धि हो सकती है, परन्तु जब तक वह अपने पापी स्वभाव में जड़ पकड़े हुए है, वह क्या कर सकती है? वह सदा परमेश्वर और सत्य से लड़ती रहेगी। इसलिए हम निडर होकर निष्कर्ष निकालते हैं कि जब तक हम अपने प्रभु यीशु मसीह के जीवन के सहभागी न हों और उतना आत्मा न पाएँ जितना वह ठहराता है, तब तक हम आत्मिक रीति से मरे हुए हैं। जैसे परमेश्वर का आत्मा उस पर ठहरा और उसे भरपूरी से दिया गया, वैसे ही अब वह उसे अपने हर विश्वासी अनुयायी को बाँटता है। इसलिए जैसे हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें अपने पवित्र आत्मा का स्वाद चखने देता है और उसके द्वारा बल देता है, वैसे ही हम उसमें और उसके साथ जिलाए जाते हैं।
इसके अतिरिक्त, पौलुस जोड़ता है कि परमेश्वर ने हमें अपने प्रभु यीशु मसीह के साथ स्वर्गीय स्थानों में बैठाया है, ताकि जिस अनुग्रह की हम चर्चा कर रहे हैं उस पर बल दिया जाए। यह एक स्मरण दिलाता है, विशेषकर इसलिए कि हम ठण्डे और आलसी होने की ओर प्रवृत्त हैं, कि एक ओर हम मरे हुए थे और शैतान के अधिकार में दास थे। ये सचमुच भयानक दशाएँ हैं। दूसरी ओर, परमेश्वर ने न केवल हम से प्रेम किया वरन् हमें उसमें महिमा भी दी है। उसने हमें गहराइयों से उठाकर स्वर्ग की ऊँचाइयों तक पहुँचाया है, जहाँ उसने हमें अपने स्वर्गदूतों के साथ बैठाया है। इसे देखते हुए हम अपने परमेश्वर की असीम भलाई की महिमा करने में चूक न जाएँ। हमें पहचानना चाहिए कि हम उसके कितने ऋणी और उससे कितने बँधे हुए हैं। यदि हम अपना सारा जीवन उस अनुग्रह का प्रचार करने में बिता दें जो हमने उसके हाथ से पाया है, तौभी वह काफी न होगा।
अन्त में, सन्त पौलुस जानबूझकर कहता है कि हम यीशु मसीह के साथ पहले ही स्वर्ग तक उठाए जा चुके हैं। यद्यपि यह हमारी आँखों को प्रत्यक्ष नहीं है, तौभी हमें अपनी आशा और विश्वास को मार्ग दिखाने देना चाहिए। हमें स्मरण रखना चाहिए कि हमारा जीवन छिपा हुआ है, और हमें धीरज से अपने प्रभु यीशु मसीह के आने की बाट जोहनी चाहिए।
इस प्रकार हमें परमेश्वर की सन्तान की उन विभिन्न दशाओं को समझना चाहिए जो सुसमाचार के विश्वास में बुलाए जाने के बाद उनकी होती हैं। परन्तु हमें इस संसार में किसी पार्थिव स्वर्ग की आशा नहीं करनी चाहिए जहाँ हमें कोई कष्ट या शोक न होगा। वरन् हमें विश्वास के लिए स्थान बनाना चाहिए, जैसा पहले कहा गया। जब पवित्र आत्मा सन्त पौलुस के द्वारा हमें बताता है कि हम ऊँचाई पर उठाए जाएँगे, तब हमें परीक्षाओं को, शत्रुओं के अत्याचार को, और यहाँ तक कि उनसे दीनता के साथ परास्त किए जाने को भी सहने के लिए तैयार रहना चाहिए। तौभी हमें पूरी तरह निश्चित और दृढ़ रहना चाहिए कि इन कठिनाइयों के होते हुए भी हम अन्त में स्वर्ग के राज्य के वारिस होंगे। सिर शरीर से अलग नहीं किया जा सकता, और हमारा प्रभु यीशु मसीह केवल अपने लिए स्वर्ग पर नहीं चढ़ा। हमें सदा उस मूल सत्य की ओर लौटना चाहिए कि यीशु मसीह मरे हुओं में से जी उठा और स्वर्ग पर चढ़ गया, और यह अंगीकार न केवल उसकी महिमा करता है वरन् हर घुटने के उसके सामने झुकने, और स्वर्ग और पृथ्वी की हर सृष्टि के उसे आदर देने का पूर्वसंकेत भी है।
परन्तु जिस एकता की हमने चर्चा की वह इस रीति से पूरी होती है: यीशु मसीह ने हमें अपनी देह में इकट्ठा करके वह आरम्भ कर दिया है जो वह उचित समय पर हम में पूरा करना चाहता है। इस प्रकार यीशु मसीह स्वर्ग पर चढ़ गया कि इन दिनों में हमारे लिए वे द्वार खोल दे जो आदम के पाप के कारण हमारे लिए बन्द हो गए थे। हमारा अभी उसके साथ बैठाया जाना यही है। सरल शब्दों में, इसका सार एक ही शब्द में कहा जा सकता है: हमारा उद्धार अनुग्रह से हुआ है, और कोई अपना कुछ दावा नहीं कर सकता।
तौभी केवल एक शब्द में यह मान लेना कि हमारा उद्धार परमेश्वर की सेंतमेंत कृपा से है और इसे अपने भीतर अनुभव करना काफी नहीं है। हमें इस अनुग्रह की असीम महानता से गहराई तक प्रभावित भी होना चाहिए। हमें अपनी पापमय दशा पर विचार करना और यह समझना चाहिए कि हम पूरी तरह दोषी हैं।
हमारे अनेक दोष हमें दोषी ठहराते हैं, यहाँ तक कि यदि परमेश्वर हम से अपने व्यवहार से सौ गुना अधिक कठोरता से भी व्यवहार करता, तो हम उससे न तर्क कर सकते, न विवाद। हमारा विवेक सदा गवाही देता कि हम मृत्यु के योग्य हैं और यह हमारा उचित दण्ड है।
इसलिए आइए हम इस शिक्षा को दृढ़ता से थामे रहें। यह हमारे जीवन को बहुत लाभ पहुँचाएगी। जब हम समझ लेते हैं कि हम में केवल एक दोष नहीं वरन् असंख्य बुराइयाँ हैं, तब हम दीन होना, और अपने पापी स्वभाव से घृणा और अरुचि करना सीख सकते हैं। फिर, जब हम उस अनुग्रह पर विचार करते हैं जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हम पर हुआ, तो हम जान लेते हैं कि उसके बिना शैतान का हम पर पूरा अधिकार होता, जैसा पहले था। हमें यह भी पहचानना चाहिए कि हम इस अनुग्रह से धनी किए गए हैं, जिससे हम अपनी पुरानी चाल छोड़ सकें। निश्चिन्त रहें कि न केवल हमारे दुःख हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा आशीषों में बदल जाएँगे, वरन् वह हमें अपनी दशा में महिमा करने की सामर्थ्य भी देगा। यद्यपि हमें अनेक परीक्षाओं से जूझना है और हम अपने आप में दुर्बल हैं, तौभी हम उन पर जय पाएँगे। हमारे पास अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद करने का कारण होगा, क्योंकि उससे जुड़े रहकर हम सब भली वस्तुओं की पूर्ण सिद्धता पाने से चूक नहीं सकते।
अब आइए हम अपने अनुग्रहकारी परमेश्वर की महिमा के सामने दीन हों, अपने दोष मानें, और प्रार्थना करें कि वह हमें उनका पूरा बोध कराए। हम केवल कुछ ही नहीं मानें, वरन् अपने जन्म तक लौटकर यह स्वीकार करें कि पाप हम में सर्वत्र व्याप्त है। हमें समझना चाहिए कि परमेश्वर से मेल करने का एकमात्र मार्ग हमारे प्रभु यीशु मसीह का लहू, मृत्यु और दुःखभोग है। जब कभी हम अपने आप को दोषी ठहराया हुआ पाएँ या परमेश्वर के अनुग्रह से दूर खिंचा हुआ अनुभव करें, तो हमारा और कोई शरण न हो सिवा हमारे प्रभु यीशु मसीह के किए हुए बलिदान के। अपनी दुर्बलता में भी हम पवित्र आत्मा की अभिलाषा करें कि वह हमें दृढ़ करे, जो परमेश्वर का ठहराया हुआ साधन है कि हम उसके अनुग्रहपूर्ण वरदानों के सहभागी हों। हम इसी रीति से आगे बढ़ते रहें और दूसरों के लिए उदाहरण बनें, उन्हें अपनी शिक्षा में विश्वास और एकता तक खींच लाने का परिश्रम करते हुए। अपने जीवन और अच्छे आचरण से हम दिखाएँ कि हमने व्यर्थ नहीं पढ़ा, वरन् परमेश्वर के पुत्र की उत्तम पाठशाला में सीखा है। वह प्रसन्न हो कि यह अनुग्रह न केवल हम पर वरन् सब मनुष्यों पर करे, इत्यादि।
