अध्याय 41

उनतालीसवाँ उपदेश, पाँचवें अध्याय पर सातवाँ - इफिसियों 5:22-26

Sermons on Ephesians (Modernized) · John Calvin

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उनतालीसवाँ उपदेश, पाँचवें अध्याय पर सातवाँ - इफिसियों 5:22-26

"हे पत्नियो, अपने-अपने पति के ऐसे आधीन रहो, जैसे प्रभु के। क्योंकि पति पत्नी का सिर है, जैसे कि मसीह कलीसिया का सिर है; और आप ही देह का उद्धारकर्ता है। पर जैसे कलीसिया मसीह के आधीन है, वैसे ही पत्नियाँ भी हर बात में अपने-अपने पति के आधीन रहें। हे पतियो, अपनी-अपनी पत्नी से प्रेम रखो, जैसा मसीह ने भी कलीसिया से प्रेम करके अपने आप को उसके लिये दे दिया; कि उसको वचन के द्वारा जल के स्नान से शुद्ध करके पवित्र बनाए।" - इफिसियों 5:22-26 हमने देखा है कि हम में से प्रत्येक अपने पड़ोसियों के अधीन है, और कर्तव्य के रूप में कुछ न कुछ अधीनता निभाए बिना हम एक साथ जीवन नहीं बिता सकते। हम दूसरों को अस्वीकार करने की ओर झुक जाते हैं, क्योंकि हम में से हर एक अपने साथियों से ऊपर होना चाहता है, और हम अपने अभिमान को इतना ऊँचा मानते हैं कि स्वयं को दीन करना हमारे लिए कठिन हो जाता है। हमने यह भी देखा है कि यदि हम परमेश्वर का भय मानें, तो अपने पड़ोसियों के अधीन होना हमें अनोखा नहीं लगना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर ने हमें इसी दशा के साथ रचा है। सामान्य रूप से प्रेम हमें इतनी दृढ़ता से बाँधता है कि हमें न तो किसी को तुच्छ जानना चाहिए, न एक का पक्ष लेकर दूसरे की उपेक्षा करनी चाहिए, और न किसी तीसरे को सेवा के योग्य न समझना चाहिए। क्योंकि परमेश्वर के सम्बन्ध में हमें या तो अपनी गर्दन झुकानी होगी, या हमारा हठ हमें विनाश की ओर ले जाएगा।

अब हम और गहराई में उतरें और समझें कि मनुष्यों के बीच कुछ श्रेणियाँ होती हैं। यद्यपि सामान्य नियम यह है कि हम में से प्रत्येक को अपना कर्तव्य निभाने का यत्न करना चाहिए, तथापि एक और बड़ी अधीनता भी है, विशेषकर पुत्र की पिता के प्रति, पत्नी की पति के प्रति, और अधीनस्थों की अपने ऊपर के अधिकारियों के प्रति, जो सब मनुष्यों की सामान्य अधीनता से अधिक है। मैं पहले कह चुका हूँ कि पृथ्वी पर अजनबियों के बीच भी भाईचारा है, क्योंकि उनका स्वभाव एक ही है, और हर एक को स्वीकार करना चाहिए कि वह दूसरों का ऋणी है। परन्तु जब परमेश्वर ने लोगों को और निकट तथा और पवित्र बन्धन में जोड़ा है, तब उन्हें अपने विषय में और अधिक ध्यान देना चाहिए। जब पत्नी अपने पति से जुड़ती है, तब वह उसे सहायक के रूप में दी जाती है और उसकी देह का अंग बन जाती है। इस विशेष अधीनता में, यद्यपि पति के पास श्रेष्ठ अधिकार है, तथापि वह अपनी पत्नी से भी बँधा है, क्योंकि वह जीवन और मृत्यु दोनों में उसकी संगिनी है। यही सिद्धान्त बच्चों और पिताओं पर, प्रजा और उनके राजाओं या अधिकारियों पर, तथा सेवकों और उनके स्वामियों पर लागू होता है, प्रत्येक अपनी-अपनी भूमिका और पद के अनुसार।

अब जिस मुख्य बात पर हमें विचार करना है वह यह है कि हमें एक-दूसरे के साथ प्रेम में जीवन बिताना है, और सामान्यतः अपनी सामर्थ्य के अनुसार वे कर्तव्य निभाने का यत्न करना है जो परमेश्वर ने हमें सौंपे हैं। हमें परमेश्वर की स्थापित की हुई व्यवस्था को तुच्छ नहीं जानना चाहिए, बल्कि अपना कर्तव्य निभाने के लिए और भी प्रेरित होना चाहिए, यह जानते हुए कि इस दशा को ठुकराकर हम परमेश्वर से विरोध में पड़ेंगे।

अब विवाह के विषय पर आएँ, जो मनुष्य का आविष्कार नहीं, परन्तु परमेश्वर का ठहराया हुआ है। वह उसी के नाम में सम्पन्न होता है, और पवित्रशास्त्र उसे पवित्र और ईश्वरीय वाचा कहता है। इसलिए यदि कोई पत्नी हठीली हो और जुआ उठाना न चाहे, तो वह केवल अपने पति के साथ ही नहीं, परमेश्वर के साथ भी अन्याय करती है। क्यों? क्योंकि परमेश्वर की इच्छा है कि यह बन्धन अटूट रहे, फिर भी एक नश्वर प्राणी इसे तोड़ना और चीर डालना चाहता है।

तो हम देखते हैं कि जब पत्नी अपने पति के विरुद्ध विद्रोह करती है, तब वह स्वयं परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करती है। दूसरी ओर, जब पुरुष अपनी मनमानी से शासन करने पर अड़ा रहता है, अपनी पत्नी को तुच्छ जानता है, या उसके साथ क्रूरता और कठोरता से व्यवहार करता है, तब वह खुले रूप से परमेश्वर की अवज्ञा और अवहेलना करता है। उसे स्मरण रखना चाहिए कि वह क्यों रचा गया, विवाह का उद्देश्य क्या है, और परमेश्वर ने कौन-सी व्यवस्थाएँ ठहराई हैं। इसीलिए सन्त पौलुस हमें बुलाता है कि हम सब परिस्थितियों में, विशेषकर दूसरों के साथ व्यवहार करते समय, परमेश्वर पर ध्यान रखें। यदि हम उन लोगों के दोषों और बहानों पर दृष्टि जमाए रहें जिनके साथ हमारा संग है, तो हम परमेश्वर की व्यवस्थाओं के पालन से स्वयं को छूट देने के कारण सदा ढूँढ़ लेंगे।

पति तर्क दे सकते हैं कि उनकी पत्नी हठीली या घमण्डी है, अपनी ही इच्छा चलाने वाली है, या बड़बोली है। कुछ पत्नियों के पति चिड़चिड़े और उपद्रवी हो सकते हैं, या वे जो सराय और मदिरालयों में जाते हैं, या जुआ और छिछोरे आचरण में लगे रहते हैं। औरों के पति विश्वासघाती, पेटू या पियक्कड़ हो सकते हैं। हर व्यक्ति वैवाहिक कर्तव्य निभाने से बचने के बहाने ढूँढ़ सकता है। परन्तु जब हम परमेश्वर के सामने आते हैं, तब बहाने बनाकर अपने को निर्दोष नहीं ठहरा सकते। यद्यपि पति और पत्नी बुरा आचरण करें, फिर भी परमेश्वर उनके विवाह के टूटने की अनुमति नहीं देता, केवल तलाक की उस दशा को छोड़कर जो हमारे प्रभु यीशु ने समझाई है। एक जीवनसाथी के दोष दूसरे की अधीनता और आज्ञाकारिता में बाधा न बनें, और यदि पत्नी अपने कर्तव्य वैसे नहीं निभाती जैसे उसे निभाने चाहिए, तो भी पति उसे त्याग नहीं सकता। परमेश्वर की विधियाँ सदा अटल रहनी चाहिए, और उसके वचन से बना बन्धन अटूट होना चाहिए।

यह स्पष्ट है कि संसार में इस शिक्षा की प्रायः उपेक्षा की जाती है। समस्या की जड़ यह है कि विवाह में थोड़े ही लोग परमेश्वर पर दृष्टि रखते हैं।

यद्यपि वे परमेश्वर से आशीष और समृद्धि चाहते हैं, फिर भी वे अपने आप को उसके मार्गदर्शन में नहीं सौंपते और न सच्चे मन से उसे पुकारते हैं। कोई धन और लाभ खोजता है, कोई सुख और भोग-विलास, परन्तु थोड़े ही परमेश्वर को अपने विवाह के केन्द्र में रखते हैं। इसमें आश्चर्य नहीं कि जब आरम्भ ही इतना दोषपूर्ण हो, तब अन्त अव्यवस्थित हो जाता है। जब विवाह में परमेश्वर को हल्का समझा और तुच्छ जाना जाता है, तब उसे बदला लेना ही पड़ता है। इसलिए आओ, हम सन्त पौलुस की शिक्षा पर ध्यान दें और जानें कि विवाह परमेश्वर का ठहराया हुआ है, और जो उसमें प्रवेश करते हैं उन्हें अपने आप को पूरी तरह उसी को समर्पित करना चाहिए और उसे अपना शरणस्थान बनाना चाहिए। पति और पत्नी के बीच यह बाँधने वाली प्रतिज्ञा परमेश्वर की ओर से स्थापित है, और दोनों पक्षों को अपने-अपने कर्तव्य निभाने चाहिए।

पत्नियों की अपने पतियों के प्रति अधीनता के विषय में हमें यह ध्यान देना चाहिए कि यह अधीनता दोहरी है। हव्वा की सृष्टि और आदम तथा हव्वा के पतन से भी पहले पुरुष स्त्री का सिर था। सन्त पौलुस पत्नियों के अपने पतियों के बराबर दर्जे के विचार के विरुद्ध यही तर्क देता है। वह समझाता है कि पुरुष स्त्री से नहीं रचा गया, परन्तु स्त्री पुरुष से। वह उसकी देह का एक अंग है। परमेश्वर हव्वा को भी भूमि से रच सकता था, जैसे उसने आदम को रचा, परन्तु उसने पुरुष और स्त्री को ऐसी दशा के साथ जोड़ना चुना कि पुरुष अपनी पत्नियों से प्रेम करें, यह जानते हुए कि वे एक ही तत्व और एक ही मांस की हैं। इसी प्रकार स्त्रियाँ, यह जानते हुए कि उनका पुरुष को छोड़ और कोई मूल नहीं, अपनी अधीनता को धीरज और प्रसन्नता से सहें। यदि हाथ, जो देह का एक अंग है, अपना स्थान छोड़ने से इनकार करे और सिर के ऊपर होने पर अड़ जाए, तो कैसी अव्यवस्था होगी!

यदि हम पुरुष और स्त्री की सृष्टि पर विचार करें, तो पतियों को प्रोत्साहित होना चाहिए कि वे अपनी पत्नियों से वैसा ही प्रेम और स्नेह रखें जैसा अपने आप से रखते हैं। पत्नियाँ, पुरुष के तत्व से रची जाने के कारण, अपने सिर के रूप में अपने पतियों के अधीन प्रसन्नता से रहें। परन्तु पत्नी की अधीनता का एक और पक्ष भी है। हम जानते हैं कि वह बहकाई गई थी। इसलिए स्त्रियाँ स्मरण रखें कि अपने पतियों की अधीनता में वे हव्वा के पाप की छाप लिए हुए हैं। वे विचार करें कि यदि विवाह शुद्ध और बिगाड़ से रहित रहता, तो वह पतियों और पत्नियों दोनों के लिए आनन्द लाता। सब बातें परमेश्वर की आशीष पातीं, और जीवन का हर पक्ष सुख और समृद्धि से भरा होता। फिर भी आदम के पतन के कारण अब हर वस्तु में, विवाह में भी, परमेश्वर के शाप के चिह्न हैं।

स्त्रियाँ अपने पापों के परिणाम अनुभव करें, और पुरुष भी उन्हें अनुभव करते हैं। यदि आदम और हव्वा उस धार्मिकता में बने रहते जो परमेश्वर ने उन्हें दी थी, तो पृथ्वी पर जीवन स्वर्ग के समान होता, और विवाह इतना सुन्दर होता कि पति और पत्नी मेल-मिलाप से रहते, ठीक स्वर्ग के उन स्वर्गदूतों के समान जो शान्ति और भ्रातृ-प्रेम में रहते हैं। इसलिए जब किसी पुरुष की पत्नी कष्टदायी और शापित हो जिसे वह वश में न कर सके, तो उसे मूल पाप के फल और अपने भीतर की भ्रष्टता पर विचार करना चाहिए। और पत्नी अपनी ओर से परमेश्वर के प्रति अपनी अवज्ञा के परिणाम स्वीकार करे, यह मानते हुए कि उसने उसकी इच्छा के आगे सिर नहीं झुकाया।

यहाँ जो "अधीनता" शब्द आया है, उसके विषय में सन्त पौलुस यह नहीं कह रहा कि पुरुषों को परमेश्वर या हमारे प्रभु यीशु मसीह के बराबर ठहराया जाए, क्योंकि यह घोर भूल होगी। वह तो यह बल देता है कि जो भय और श्रद्धा स्त्री को परमेश्वर के प्रति रखनी चाहिए और अपने पति के प्रति उसकी अधीनता, ये दोनों अलग नहीं किए जा सकते। जैसे उसने पहले "परमेश्वर के भय से" इस वाक्यांश के साथ परस्पर अधीनता का आग्रह किया था, वैसे ही अब वह दिखाता है कि पति और पत्नी को परमेश्वर की ईश्वरीय व्यवस्था की आज्ञाकारिता में एक-दूसरे के अधीन होना चाहिए। परमेश्वर का आदर और उसकी आज्ञा मानने का दिखावा करना, और अपने पड़ोसी को ठुकराना और तुच्छ जानना, निरा पाखण्ड है। इसी प्रकार वह पत्नी जो बड़ी भक्ति का स्वांग रचती है पर घर में अपने पति से झगड़ती और कलह करती है, परमेश्वर के भय की कमी प्रकट करती है।

यह ध्यान देना आवश्यक है कि सन्त पौलुस यह उपमा इसलिए नहीं देता कि नश्वर पतियों को यीशु मसीह के बराबर ठहराए, परन्तु इस बात पर बल देने के लिए कि चूँकि हमारे प्रभु यीशु का विवाह पर अधिकार है, इसलिए सब को उसी की ओर देखना चाहिए। हर एक व्यक्ति प्रसन्नता से अधीन हो, यह जानते हुए कि अपनी भूमिका को ठुकराना उसकी अवहेलना करना होगा, क्योंकि वह चाहता है कि विवाह परस्पर कर्तव्य से निभाया जाए। अर्थात् पति अपनी पत्नियों से प्रेम रखें और पत्नियाँ अपने पतियों के अधीन रहें; इस सन्दर्भ में स्मरण रखने की यही मूल बात है।

अब पत्नियाँ अपने कर्तव्यों पर ध्यान से विचार करें और समझें कि जब वे अपने पतियों से वाद-विवाद करती हैं, तो मानो वे परमेश्वर को ठुकरा रही हैं। परमेश्वर ने उन्हें इस दशा के साथ रचा है कि वे अपने पतियों के अधीन हों। कुछ स्त्रियाँ इतनी घमण्डी और अहंकारी हो सकती हैं कि पूछें, "क्या मेरे पति का मुझ पर अधिकार होना चाहिए?" परन्तु ऐसा करके वे दिखाती हैं कि वे अपने ऊपर परमेश्वर का अधिकार मानने को तैयार नहीं हैं और परमेश्वर की व्यवस्था को पाँवों तले रौंदने को तैयार हैं। इसलिए स्त्रियों को अनिवार्य रूप से दीन होना चाहिए और समझना चाहिए कि सारी मानवजाति का नाश और गड़बड़ी उन्हीं के द्वारा आई। उनकी अवज्ञा के कारण हम सब अपमान में गिरे और स्वर्ग के राज्य से निकाल दिए गए।

जब स्त्रियाँ कहती हैं, "मैं समझती हूँ कि यह सब स्त्री-जाति के पाप के कारण हुआ," जैसा कि सन्त पौलुस किसी और स्थान में समझाता है, तब उन्हें दीन होना चाहिए और परमेश्वर की डाली हुई अधीनता को धीरज से सहना चाहिए। यह अधीनता उन्हें स्मरण दिलाती है कि वे नम्र और कोमल बनी रहें। परन्तु यदि वे अपने पतियों के विरुद्ध उठ खड़ी हों और उनका अधिकार न मान सकें, तो वे वस्तुतः आदम और हव्वा के पाप की पुष्टि कर रही हैं और उस घाव की परमेश्वर द्वारा की जाने वाली चंगाई को ठुकरा रही हैं। जब वे इस प्रकार परमेश्वर के अनुग्रह के विरुद्ध युद्ध करती हैं, तो परिणाम पूर्ण गड़बड़ी ही हो सकता है। यदि हठीली पत्नियाँ इस पर ध्यान न दें, तो भी परमेश्वर इसे देखता है, और अन्त में उन्हें अपने कामों का उत्तर अपनी ही लज्जा के साथ देना पड़ेगा। इसलिए आओ हम इस चेतावनी पर ध्यान दें, ताकि हर एक अपने-अपने घर में परमेश्वर की महिमा करे।

दूसरी ओर, पतियों को भी अपने कर्तव्यों पर विचार करना चाहिए। यद्यपि वे कठोरतम अर्थ में अपनी पत्नियों के अधीन नहीं हैं, क्योंकि उनकी पत्नियों का उन पर कोई अधिकार नहीं, तथापि वे कुछ शर्तों के साथ श्रेष्ठता के आदर तक ऊँचे किए गए हैं। उन्हें अपनी पत्नियों के प्रति क्रूर नहीं होना चाहिए, और न ऐसा व्यवहार करना चाहिए मानो सब कुछ उन्हें दिया गया और उचित है, क्योंकि वे अधिकारी हैं। बल्कि उनका अधिकार तानाशाही नहीं, साझेदारी होना चाहिए। पति अपनी पत्नियों के सिर इसलिए नहीं हैं कि उन्हें दबाएँ या उनके कामों का लेखा रखें। बल्कि उन्हें यह पहचानना चाहिए कि उनका अधिकार उन्हें अपनी पत्नियों से और भी अधिक बाँधता है। सिर होने के नाते उन्हें विवेक और बुद्धि से अपनी पत्नियों और घरानों की अगुवाई करनी है। इसका मार्ग कोमलता, दयालुता और धीरज है, और अपनी पत्नियों की निर्बलताओं का ध्यान रखना है।

पति अपनी पत्नियों से आज्ञाकारिता माँगें, पर साथ ही अपने कर्तव्य भी निभाएँ। उन्हें समझना चाहिए कि यदि वे अपनी पत्नियों को विद्रोह के कारण दें, तो परमेश्वर उन्हें सहन नहीं करेगा। यदि पति बुद्धिमानी और सच्चाई से व्यवहार करें, तो पत्नियाँ प्रसन्नता से अधीन होंगी, और परमेश्वर उनके हृदयों में कार्य करके घर में शान्ति लाएगा। परन्तु मुख्य बात परमेश्वर को पुकारना है, क्योंकि केवल मनुष्य का प्रयास प्रायः व्यर्थ ठहरता है। पतियों को अनुग्रह और सामर्थ्य के लिए प्रार्थना करनी चाहिए कि वे अपनी पत्नियों की सहमति और दीनता को जीत सकें। खेद की बात है कि बहुत-से पति अपनी पत्नियों के साथ कठोर व्यवहार करते हैं, यह सोचकर कि बल से वे उन्हें जीत लेंगे, और प्रायः शारीरिक हानि पहुँचाते हैं। ऐसे काम अमानुषिक और यातनापूर्ण हैं और परमेश्वर द्वारा दिए गए अधिकार के उद्देश्य के विरुद्ध हैं।

दूसरी ओर, बहुत-सी स्त्रियाँ विवाह से पहले परमेश्वर की शिक्षाओं पर विचार नहीं करतीं। ऐसी स्त्री कम ही मिलती है जो विवाह पर विचार करते समय परमेश्वर से मन लगाकर प्रार्थना करे। अधिकतर यह सुनती हैं कि पति को सिर होना चाहिए, और इसे संसार की रीति मानकर स्वीकार कर लेती हैं। फिर भी वे प्रायः हठ और घमण्ड दिखाती हैं, और परमेश्वर को उसके आसन से हटाना चाहती हैं। वे मानती हैं कि जो शिक्षाएँ हम पढ़ते हैं वे केवल पवित्रशास्त्र से निकली हैं, और वे उनके अधीन होने का विरोध करती हैं।

इसके अतिरिक्त वे प्रायः आपस में गठजोड़ करती हैं और कहती हैं, "मैं तुम्हें विश्वास दिलाती हूँ, मैं अपनी बात पर अड़ी रहूँगी। यदि मेरा पति मेरा सामना करने का यत्न करेगा, तो शीघ्र ही जान लेगा कि मुझे कोई परवाह नहीं, और मैं उसे तब तक दूर रखूँगी जब तक वह यह न देख ले कि वह अपना परिश्रम व्यर्थ कर रहा है और हार मान ले।" घर चलाने में स्त्रियाँ प्रायः अपनी भूमिका को इसी प्रकार लेती हैं। इसलिए सौ में से एक भी ऐसी स्त्री ढूँढ़ना कठिन है जिसकी मनोदशा भिन्न हो या जो पूरी तरह इसी प्रकार करने का इरादा न रखती हो।

पति की ओर से वे सोच सकते हैं, "इसे मुझ पर छोड़ दो; मैं इसे भली-भाँति सँभाल लूँगा।" मानो वे समझते हैं कि वे परमेश्वर से अधिक जानते हैं, जिसने इस स्थिति को सँभालने का मार्गदर्शन दिया है। पत्नी को जीतना हठ के साथ उसके पास जाने, तानाशाह का रूप धरने, या धमकाने की बात नहीं है। इनमें से कोई भी उपाय काम नहीं करेगा। फिर भी पुरुष प्रायः अपने आप को इतना ऊँचा समझते हैं कि मानते हैं कि कड़ी दृष्टि ही काफी होगी। वे वाद-विवाद और तर्क-वितर्क में लगे रहते हैं, और परमेश्वर की उपेक्षा करते हैं मानो उसे उन्हें सिखाने को कुछ न हो। वे यह नहीं पहचानते कि उन्हें उसी की ओर फिरना चाहिए, और उससे मार्गदर्शन की प्रार्थना करनी चाहिए कि वह उनकी पत्नियों के हृदय कोमल करे और उन्हें आज्ञाकारिता और नम्रता की ओर ले जाए।

इसलिए हमें उन मूल्यवान शिक्षाओं को स्मरण रखना चाहिए जो यहाँ हमें दी गई हैं। इसी कारण पौलुस प्रभु यीशु मसीह की उपमा को विवाह के दोनों पक्षों पर लागू करता है। वह स्त्रियों को सिखाता है कि अपने पतियों के अधीन होना उन्हीं के भले के लिए है। क्यों? आओ, कलीसिया की आत्मिक दशा पर विचार करें। यदि हम अपने प्रभु यीशु मसीह से अलग हो जाते, तो हमारी दशा कितनी दयनीय होती! हम जीवन की सारी आशा और परमेश्वर की सब आशीषें खो देते। चाहे हम संसार के बहुत-से वरदानों का आनन्द लेते, तब भी वे सब अप्रसन्नता का कारण बन जाते, यदि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के अंग न होते। संक्षेप में, परमेश्वर के पुत्र के बिना इस संसार में सब कुछ बिखरा हुआ और अस्त-व्यस्त होता।

इसलिए विवाह में भी ऐसा ही सम्बन्ध होना चाहिए। स्त्रियाँ समझें कि चूँकि दाम्पत्य हमारे और परमेश्वर के पुत्र के बीच की आत्मिक एकता का प्रतिरूप है, इसलिए पतियों के अधीन रहना और उनकी आज्ञा मानना उन्हीं के लाभ के लिए है। यह व्यवस्था उन्हें उससे कहीं अधिक लाभ देगी जितना बिना रोक-टोक अपने आप पर शासन करने से मिलता। यद्यपि वे इस बात को भली-भाँति न समझें, तथापि उन्हें विचार करना चाहिए कि अन्त में सही कौन है, परमेश्वर या स्त्रियाँ। यदि वे अड़ी रहें कि उनके लिए अपने पतियों के अधीन न होना ही अच्छा है, तो वे परमेश्वर की ठहराई हुई योजना के विरुद्ध तर्क कर रही हैं, जो उन्हीं के कल्याण के लिए रची गई है। उन्हें स्वीकार करना चाहिए कि यीशु मसीह देह का उद्धारकर्ता ठहराया गया है, ताकि पत्नियाँ जानें कि परमेश्वर ने उनकी आवश्यकताओं का प्रबन्ध उससे कहीं अच्छी रीति से किया है जैसा वे गहन चिन्तन और तर्क के बाद भी कभी सोच न सकतीं।

यह स्पष्ट है कि स्त्रियाँ पूरी रीति से नहीं समझतीं कि उनका अपना भला किसमें है, क्योंकि परमेश्वर ने स्वयं उन्हें अपने पतियों के अधीन रखा है, केवल उन्हीं के कल्याण के लिए। दूसरी ओर, पौलुस पतियों से भी बात करता है, ताकि वे अपने को दिए गए अधिकार का दुरुपयोग न करें और उस मेल को न बिगाड़ें जो विवाह में बना रहना चाहिए। वह उन्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह का उदाहरण स्मरण दिलाता है, और पूछता है कि उसने अपनी कलीसिया से कैसे प्रेम किया। सबसे पहले, मसीह ने अपने आप को उसके लिए दे दिया, और जब उसने मानव देह धारण की तब अपने आप को बचाया नहीं। यद्यपि उसके पास सारी सामर्थ्य और प्रभुता थी, और सब को उसके सामने झुकना आवश्यक था, यहाँ तक कि प्रेरित पौलुस ने भी कहा कि सब, क्या बड़े क्या छोटे, उसे स्वीकार करें। फिर भी मसीह ने ऐसा राज्य नहीं किया जिसमें हम पर अत्याचार करता। इसके विपरीत, उसने अपने आप को दीन किया। स्वर्ग के स्वर्गदूतों पर अपनी सर्वोच्च प्रभुता के होते हुए भी, उसने स्वेच्छा से अपने आप को व्यवस्था के अधीन किया और दास बन गया, यहाँ तक कि हमारे लिए अपने आप को खाली कर दिया।

जब हम उस असीम प्रेम पर विचार करते हैं जो परमेश्वर ने हम पर हमारे प्रभु यीशु मसीह में दिखाया, जिसने पति की भूमिका ग्रहण की और हमें अपने अधीन पत्नी के समान होने दिया, तो यह पतियों और पत्नियों दोनों को प्रेरित करे। जब तक वे पशुओं जैसे या शैतानी अभिमान से भरे न हों, पति और पत्नी दोनों को द्रवित होना चाहिए। यह विचार करते हुए कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हम से प्रेम के कारण अपने आप को दीन किया, यद्यपि हम अयोग्य हैं, और कि उसने बताया है कि पत्नियों का अपने पतियों के अधीन होना और पतियों का अपनी पत्नियों को सहना उत्तम है, यह उन्हें प्रेरित करने के लिए पर्याप्त होना चाहिए। समस्या की जड़ यह है कि बहुत-से लोग अत्यन्त पशु-समान और घमण्डी हैं, या विवेक से रहित हैं। यदि इस सत्य की एक बूँद भी उनके हृदयों में होती, तो वह उन्हें अपना मार्ग सुधारने और दोनों ओर अपने कर्तव्य निभाने के लिए प्रेरित करती। यदि इस पर सचमुच विचार किया जाए, तो घरों में कहीं अधिक शान्ति होगी, और पति-पत्नी बिल्ली और कुत्तों की तरह निरन्तर एक-दूसरे पर ताने कसते न रहेंगे।

असली बात यह है कि उनके बीच परमेश्वर का भय नहीं है। क्या मनुष्यों को प्रातः और सन्ध्या हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने से हम पर हुए अनुग्रह का स्मरण नहीं करना चाहिए? जब वे सचमुच इस अनुग्रह पर मनन करें, तब विवाहित पुरुष यह भी सोचें कि उन्हें अपनी पत्नियों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, जैसा यीशु मसीह ने उनके साथ किया है। क्या यह पत्थर या लोहे जैसे अटल कठोरतम हृदयों को भी पिघलाने के लिए पर्याप्त नहीं? इसी प्रकार, यदि स्त्रियाँ उस छुटकारे और उद्धार का स्मरण करें जो उन्हें दिया गया है, तो निश्चय ही उनके हृदय कोमल हो जाएँगे और वे हठ पर न अड़ी रहेंगी। वे प्रसन्नता से हमारे प्रभु यीशु मसीह का जुआ स्वीकार करेंगी, और इस प्रकार उन लाभों में भागी होंगी जो उसने अपनी मृत्यु और दुःखभोग से प्राप्त किए।

इसलिए हम देखते हैं कि जब हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह का प्रचार किया जाता है, तब वह प्रायः बहरे कानों पर पड़ता है, और अधिकांश लोग उससे कुछ नहीं पाते, क्योंकि वे अपनी हठीली चाल पर चलते रहते हैं। यह ध्यान देना आवश्यक है कि यद्यपि पति कठोर हों और पत्नियाँ सुधार से परे दिखें, तो भी इससे दोनों में से किसी को अपने कर्तव्य निभाने से छूट नहीं मिलती।

उदाहरण के लिए, ऐसे पति पर विचार करो जिसकी पत्नी कोमल और सीधी है, जैसा मैंने पहले कहा। वह अपनी ओर से उसे सह सकता है, और उनके बीच अद्भुत मेल और आनन्द हो सकता है। परन्तु कोई दूसरा मनुष्य कह सकता है कि उसकी पत्नी पियक्कड़ या पेटू है, और कोई और दावा करे कि उसकी पत्नी फिजूलखर्च और अत्यन्त घमण्डी है, जो अपने बनाव-सिंगार पर अत्यधिक खर्च करती है। औरों को शिकायत हो सकती है कि उनकी पत्नियाँ आलसी गृहिणियाँ हैं जो कुछ नहीं करतीं। ये बातें कुछ लोगों को उचित प्रतीत हो सकती हैं, और जैसा मैंने पहले कहा, यदि बात केवल उन दोनों पक्षों की होती, तो उनके पास सब उत्तरदायित्व झाड़ देने का बचाव तैयार हो सकता था। परन्तु ऐसे मामलों में पतियों को अपने ही आचरण पर विचार करना चाहिए, न केवल संसारिक बातों में, बल्कि परमेश्वर के प्रति भी।

जब पति अपने आप को भली-भाँति जाँचता है और अपने दोष स्वीकार करता है, तब वह धीरज रखेगा और अपनी पत्नी की कमियों को तब तक सहेगा जब तक परमेश्वर उसे अपना मार्ग सुधारने का अनुग्रह न दे। इस बीच, संसार जैसा भी चले, वह दयालुता से उसे जीतने का यत्न करके एक भला पति बना रहे। वह अपने लाभ के लिए नहीं, अपनी संगिनी के कल्याण के लिए श्रेष्ठ स्थान पर है। चूँकि यह अटूट व्यवस्था है, इसलिए यही तर्क स्त्रियों को भी मनाए। यदि किसी स्त्री का पति पियक्कड़ हो, सराय और मदिरालयों में जाता हो, जुए का आदी हो, उड़ाऊ हो, उपद्रवी आचरण में लिप्त हो, या उसके प्रति उदासीन हो, ऐसा कि उसके आज्ञा मानने और उसे प्रसन्न करने के भरसक यत्न के बाद भी उसे बदले में न शान्ति मिले न सद्भाव, तो वह इसे अपने ऊपर परमेश्वर का कोड़ा समझे। वह विचार करे कि वह परमेश्वर की सेवा और आदर करने में कैसे चूकी, और उसने परमेश्वर द्वारा दी गई चुनौतियों का कैसे सामना नहीं किया। तब वह यह निष्कर्ष निकाले कि अपने दोष चाहे जो हों, वह उस बन्धन को नहीं तोड़ सकती जो परमेश्वर ने नश्वर प्राणियों के लिए ठहराया है। ऐसा करना परमेश्वर से लड़ना होगा, और उसे अपने पति के अधीन होना है, जो उसका सिर है। चाहे वह डरावना हो, उसे स्मरण रखना चाहिए कि वह परमेश्वर के अधीन हो रही है, जिसके हाथ में उसके पति का हृदय है और जो उसे जैसा चाहे बदल सकता है। वह अपने पति को बल से जीतने के लिए न भड़काए, क्योंकि इससे परमेश्वर और उसका पति दोनों अप्रसन्न होंगे।

इसलिए पत्नी के दोष पति को उस अटूट व्यवस्था से मुक्त नहीं कर सकते जो परमेश्वर ने ठहराई है, अर्थात् मेल-मिलाप से साथ रहना। इसी प्रकार पति के दुर्गुण पत्नी को परमेश्वर के निमित्त सब बातों में अधीनता और आज्ञाकारिता देने से मुक्त न करेंगे, जैसा यहाँ कहा गया है। सन्त पौलुस इस उपदेश को दृढ़ करने के लिए आगे समझाता है कि हमारा प्रभु यीशु मसीह देह का उद्धारकर्ता कैसे है। उसने यह कलीसिया के लिए अपने आप को देकर किया, कि उसे पवित्र करे और शुद्ध बनाए। यद्यपि यहाँ की पूरी शिक्षा अभी विस्तार से नहीं कही जा सकती, तथापि हमें समझना चाहिए कि वह उसी बात को बढ़ाती है जो पहले संक्षेप में कही गई थी। पति और पत्नी दोनों अपनी दुष्ट अभिलाषाओं को वश में कर सकते हैं, और जब अलग होने या झगड़ने की परीक्षा आए, तब सब बुरी वासनाओं को दबाने का उपाय यह है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह और हमारे बीच की आत्मिक एकता की प्रतिज्ञा पर ध्यान लगाएँ, जिसकी चर्चा आगे और की जाएगी। सबसे पहले कहा गया है कि हमें विचार करना चाहिए कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने अपने आप को हमारे लिए दे दिया, और इस शब्द "के लिए" को महत्वपूर्ण चिह्नित करना चाहिए। हमारे छुटकारे के आरम्भ में यह दिखाता है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने, एक अर्थ में, अपने आप की उपेक्षा की और हमारे उद्धार के लिए कार्य करते समय अपने निज व्यक्तित्व पर ध्यान न दिया। वह हमें परमेश्वर की ओर से दिया गया, जिसने, जैसा सन्त यूहन्ना के तीसरे अध्याय में कहा गया है, जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपने एकलौते पुत्र को न बचा रखा, परन्तु हमारे लिए दे दिया।

तथापि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने अपने आप को स्वेच्छा से दे दिया। "कोई मेरा प्राण मुझसे नहीं छीनता," वह कहता है, "परन्तु मैं आप ही उसे देता हूँ," क्योंकि आवश्यक था कि जो बलिदान उसने हमारे पापों की क्षमा के लिए चढ़ाया, वह स्वेच्छा से हो। तुम देखते हो कि यीशु मसीह ने अपने आप को मृत्यु तक दे दिया। यदि हम कारण पूछें, तो निश्चय ही मुख्यतः अपने पिता परमेश्वर की इच्छा और अनादि ठहराव को पूरा करना था। फिर भी ऐसा करते हुए उसने दिखाया कि हम उसे कितने प्रिय थे और हमारे प्राण उसकी दृष्टि में कितने बहुमूल्य थे, कि उसने इस प्रकार स्वेच्छा से अपने आप को हमारे लिए अर्पित कर दिया।

इसलिए एक ओर पतियों को विचार करना चाहिए कि वे अपनी पत्नियों के कितने ऋणी हैं, अर्थात् वे उन्हें कम से कम अपने प्राणों के समान प्रिय हों। यदि वे ऐसा करें भी, तो भी वे हमारे प्रभु यीशु मसीह की सिद्धता तक नहीं पहुँच सकते, पर बहुत दूरी से उसके पीछे चलते हैं। दूसरी ओर पत्नियाँ भी स्मरण रखें कि परमेश्वर की इच्छा है कि विवाह में हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह का प्रतिरूप हो। यदि वे परमेश्वर के बुलाने पर अपने आप को अधीन नहीं करतीं, तो वे बड़ी भूल करेंगी। साथ ही यह समझें कि यह कहकर कि यीशु मसीह ने अपने आप को हमारे लिए दिया, हम अपने ऊपर परमेश्वर की भलाई और उस प्रेम की महिमा बढ़ा रहे हैं जो यीशु मसीह ने हम से रखा। हमें स्वीकार करना चाहिए कि यह सब उसके पिता परमेश्वर की सेंतमेत की दया के कारण है, और हमारे प्रभु यीशु मसीह अपनी बड़ी करुणा से हमारी सहायता को आया। इन बातों पर मनन करके हम बिना हिचकिचाहट अपने कर्तव्य निभाने को प्रेरित होंगे। हम अपने परमेश्वर की महिमा करने को भी प्रेरित होंगे, और अपने शब्दों से और अपने सारे जीवन से स्वीकार करेंगे कि हम उसके कितने ऋणी हैं।

यह देखते हुए कि परमेश्वर ने अपनी दया के भण्डार हम पर उंडेल दिए हैं, न केवल हमें उस दण्ड-आज्ञा से छुड़ाकर जिसके अधीन हम थे और मृत्यु से बचाकर, परन्तु अपने प्रिय पुत्र को भी अपने प्रेम की प्रतिज्ञा के रूप में देकर, हमें कृतज्ञ होना चाहिए। यीशु मसीह ने हमारे मध्यस्थ और छुड़ौती की भूमिका ग्रहण की, और हमें परमेश्वर के सामने निर्दोष ठहराकर प्रस्तुत किया, ताकि शैतान अब हम पर दोष न लगा सके। यद्यपि वह हमारा विरोधी बना रहता है, हम तब तक उसके अधीन हैं जब तक छुड़ानेवाले के द्वारा इस दासत्व से स्वतन्त्र न किए जाएँ। अब आओ, अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने दीन हों, अपने दोष स्वीकार करें, और प्रार्थना करें कि हमें उन्हें पहचानने की बुद्धि मिले, हम उससे क्षमा माँगें, और निरन्तर अपने आप को सुधारते रहें। हमारा जीवन उस अनुग्रह के माप के अनुसार, जो हमने उससे पाया है, उसकी व्यवस्था द्वारा अधिकाधिक गढ़ा जाए। हम सब कहें, "सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता, इत्यादि।"

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