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इफिसियों 1:17-18 पर पहले अध्याय का सातवाँ उपदेश
"कि हमारे प्रभु यीशु मसीह का परमेश्वर जो महिमा का पिता है, तुम्हें अपनी पहिचान में बुद्धि और प्रकाशन की आत्मा दे। और तुम्हारे मन की आँखें ज्योतिर्मय हों कि तुम जान लो कि उसके बुलाने से कैसी आशा होती है, और पवित्र लोगों में उसकी मीरास की महिमा का धन कैसा है।" - इफिसियों 1:17-18
स्वभाव से सब मनुष्यों में कुछ न कुछ समझ होती है। यह समझ जन्म लेते ही प्रकट नहीं हो जाती, वरन् समय के साथ धीरे-धीरे प्राप्त होती है, जिससे हर एक भले और बुरे में भेद कर सकता है, और इस प्रकार प्रमाणित होता है कि वह बुद्धिसम्पन्न प्राणी है। परन्तु जो समझ हममें जन्म से है, वह हमें स्वर्ग के राज्य तक पहुँचाने के लिए अपर्याप्त है। स्वर्गीय जीवन की बातों में हम प्रायः अपने आपको कमी में पाते हैं। बहुत से लोग सांसारिक चिन्ताओं और अपने स्वार्थों पर ही ध्यान लगाए रहते हैं। जो अपनी विवेक-शक्ति को चुप कराना चाहते हैं, उन्हें भी कभी-कभी नैतिक न्याय का क्षण आ घेरता है, और वे भले-बुरे के भेद को स्वीकार करते हैं। परमेश्वर ने यह नैतिक बोध हमारे हृदयों में रखा है, ताकि सब निरुत्तर रहें और अपने ही न्यायी बनने को विवश हों।
फिर भी, जैसा पहले कहा जा चुका है, यह आधारभूत समझ हमें परमेश्वर तक पहुँचाने के लिए, या स्वर्ग के राज्य को ऐसे प्रकट करने के लिए कि हम उद्धार का मार्ग जान सकें या परमेश्वर को ठीक रीति से पुकार सकें, अपर्याप्त है। इस विषय में हम पूरी तरह अन्धे हैं, क्योंकि हमारी दृष्टि पृथ्वी की सीमा से आगे नहीं जाती। इसलिए आवश्यक है कि परमेश्वर हममें कार्य करे और हमें नई आँखें दे, जो हमारे उद्धार की आवश्यक बातों को समझ सकें। इसी कारण सन्त पौलुस अपनी प्रार्थना में परमेश्वर से प्रकाशित आँखें माँगता है; वह मानकर चलता है कि मनुष्यों में पहले से कुछ प्रारम्भिक समझ है—इतनी नहीं कि वे अपेक्षित ऊँचाइयों तक चढ़ सकें, पर इतनी अवश्य कि उनमें धार्मिक चेतना का बीज हो और वे परमेश्वर के अस्तित्व को मानें।
इसके अतिरिक्त, परमेश्वर को हमें दृष्टि की स्पष्टता देनी होगी, जो एक अनमोल दान है और आदम के मूल पाप के कारण हममें बिलकुल नहीं रहा। हम ऐसे गहरे अन्धकार में डूबे हैं कि स्वभाव से ही सही मार्ग से भटकते फिरते हैं, और हमें परमेश्वर के दिव्य हस्तक्षेप की नितान्त आवश्यकता है। यह समझना आवश्यक है कि यहाँ यह कहा जा रहा है कि हमें समझ की आँखें देकर परमेश्वर ने हमारे लिए उससे कहीं अधिक किया है जो केवल हमें मनुष्य बनाकर इस संसार में रख देने से होता। इस गहन दान के द्वारा वह न केवल हमें बदलता है, वरन् हमें स्पष्ट और निश्चित अन्तर्दृष्टि भी देता है, विशेषकर अपने चुने हुओं के विषय में। यह विशेषाधिकार केवल उसकी सन्तानों के लिए सुरक्षित है; यह सारी मानवजाति का साधारण अनुभव नहीं है। जैसा हमने देखा है, जब परमेश्वर खुले रूप में आश्चर्यकर्म करता है, तब भी केवल वे ही जिनकी आँखें प्रकाशित हैं, उसकी सामर्थ्य की गहराई को सचमुच समझ सकते हैं।
इस सत्य का एक मार्मिक उदाहरण जंगल में यात्रा करते हुए इस्राएलियों में मिलता है। लाल समुद्र के फटने, चट्टान से जल की धारा फूटने, आकाश से मन्ना बरसने, दिन को बादल और रात को आग के खम्भे के द्वारा अगुवाई होने, मांस की भरपूर आपूर्ति, और विद्रोहियों तथा अपनी अभिलाषाओं के वश में होनेवालों के कठोर दण्ड जैसे अद्भुत चमत्कारों को देखने पर भी, वे लोग आत्मिक रीति से अन्धे ही रहे। मूसा ने उन्हें चिताया और आग्रह किया कि वे परमेश्वर को खोजें, ताकि उसका आत्मा उन्हें प्रकाशित करे। इन आश्चर्यजनक चिह्नों को देखने के बाद भी उनके हृदय और आँखों पर सत्य के आगे पर्दा पड़ा रहा। इससे प्रकट होता है कि मनुष्य स्वभाव से ही आत्मिक रीति से मन्दबुद्धि हैं, और जब तक परमेश्वर अनुग्रह करके उनमें कार्य न करे, वे अपने उद्धार से सम्बन्धित कुछ भी नहीं समझ सकते।
इसलिए अत्यन्त आवश्यक है कि हम सब घमण्ड त्यागकर दीनता से परमेश्वर से समझ माँगें। हमें मानना चाहिए कि हम स्वभाव से परमेश्वर के कामों को ठीक रीति से परखने और उनसे लाभ उठाने में असमर्थ हैं, जब तक वह स्वर्ग से हमें आत्मिक अन्तर्दृष्टि का दान न दे। इस अंश का मुख्य सन्देश यही है।
यह देखना उचित है कि संसार स्वतन्त्र इच्छा की उस धारणा में कैसा फँसा हुआ है जो उनके मन में गहराई से बैठी हुई है। पोप-मतवादी सहर्ष मान लेते हैं कि परमेश्वर के अनुग्रह के बिना हम जैसा चाहिए वैसा आचरण नहीं कर सकते। फिर भी वे यह भी कहते हैं कि हम अपनी स्वतन्त्र इच्छा से परमेश्वर के अनुग्रह को बढ़ा सकते हैं, और दोनों को मिला देते हैं। जब वे स्वतन्त्र इच्छा की परिभाषा करने चलते हैं, तो उसे एक मिली-जुली शक्ति बताते हैं जिसमें भले को चुनने और बुरे से बचने के लिए तर्क और विवेक है, और अपने इरादों को पूरा करने की सामर्थ्य और क्षमता भी है। परन्तु सन्त पौलुस के यहाँ के वचन मानवीय बुद्धि पर प्रकाश डालते हैं, जिसे वे हमारे सब विचारों और कार्यों को चलानेवाला सर्वोच्च अधिकारी ठहराते हैं। सन्त पौलुस स्पष्ट दिखाता है कि यह मानवीय बुद्धि तब तक पूरी तरह अन्धी है जब तक परमेश्वर उसे नया न करे। ऐसा नहीं कि हममें कोई जन्मजात सामर्थ्य है और परमेश्वर को केवल हमारी कमियाँ पूरी करनी हैं। यदि ऐसा होता, तो सन्त पौलुस कह सकता था कि परमेश्वर हमारे भीतर की ज्योति में सहायता करता या उसे बढ़ाता है या उसकी कमी को पूरा करता है। परन्तु उसकी भाषा बहुत भिन्न है। वह परमेश्वर से बिनती करता है कि वह हमें प्रकाशित आँखें दे, और इस बात पर बल देता है कि यह ईश्वरीय दान है, हमारी कमियों पर केवल पैबन्द लगाना नहीं। सन्त पौलुस निःसंकोच कहता है कि अन्धे होने के कारण हम तब तक कुछ भी देखने में असमर्थ हैं जब तक परमेश्वर हमारी आँखें न खोले। हम उसके पवित्र आत्मा के प्रकाशन से मार्गदर्शन पाते और संचालित होते हैं, जैसा पहले कहा जा चुका है।
अब, क्योंकि मानव स्वभाव अतियों की ओर झुकता है और प्रायः निष्फल अटकलों में लगा रहता है, इसलिए सन्त पौलुस बुद्धिमानी से हमारा ध्यान उस ओर मोड़ता है जिसमें हमारे हृदय और मन पूरी तरह लगे रहने चाहिए—अर्थात् हमारे ईश्वरीय बुलावे से जुड़ी आशा को समझने का प्रयत्न। जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, मनुष्य में स्वाभाविक जिज्ञासा है; वह निरन्तर खोज करता और तरह-तरह के निराधार विचार गढ़ता रहता है। यह प्रवृत्ति प्रायः लोगों को स्वयं को पीड़ित करने की ओर ले जाती है, कि वे बिना रुके ज्ञान बटोरते रहते हैं पर सत्य की सच्ची समझ तक कभी नहीं पहुँचते, जैसा सन्त पौलुस चतुराई से संकेत करता है। इसलिए यह पहचानना अत्यन्त आवश्यक है कि जो ज्ञान हमें खोजना चाहिए, वह सब उस आशा पर केन्द्रित है जिसके लिए परमेश्वर ने हमें बुलाया है। पवित्र शास्त्र का उद्देश्य हमारे मन को खोखली या अनावश्यक जानकारी से भर देना नहीं, वरन् हमारे परम लाभ के लिए हमारी उन्नति करना है। उसका प्रयोजन यह है कि हममें परमेश्वर की भलाई के प्रति गहरी कदर उत्पन्न हो, हमें उसके निकट खींचे, और हमारा सच्चा सुख प्रकट करे, जो उसकी उपस्थिति में है।
इससे प्रकट होता है कि प्रभु के पवित्र आत्मा के द्वारा उसके प्रकाश के बिना हम स्वर्गीय जीवन का मार्ग खोजने या उसमें प्रवेश पाने में पूरी तरह असमर्थ हैं; हम उसके स्वरूप की झलक तक नहीं पा सकते। इसलिए हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि प्रभु अपने पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से हमें हमारे उद्धार का अधिकारी बनाए। जैसा मैंने पहले कहा, विश्वास वह मार्ग है जिससे हम स्वर्ग के राज्य में और उस मीरास में प्रवेश करते हैं जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमारे लिए सुरक्षित की है। परन्तु अनिवार्य है कि परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा के द्वारा यह विश्वास हमें दे। इसलिए हमें न केवल यह चाहिए कि सुसमाचार हमें सुनाया जाए, वरन् यह भी कि परमेश्वर हमारे कान खोले कि हम सुनें और हमारी आँखें खोले कि जो वह प्रकट करता है उसे हम देखें। संक्षेप में, हमारी आत्मिक यात्रा की हर बात का आरम्भ और पूर्ति उसी को करनी है।
फिर भी, जैसा मैंने पहले संकेत दिया, मनुष्य की अतियों की ओर प्रवृत्ति के कारण हम प्रायः या तो जितना चाहिए उससे अधिक अपने ऊपर ले लेते हैं, या परमेश्वर के अनुग्रह के दानों को तुच्छ जानते हैं। सन्त पौलुस पूर्वोक्त आशा के महत्त्व पर बल देते हुए उसे "पवित्र लोगों में उसकी मीरास की महिमा का धन" कहता है। हम प्रायः मानते हैं कि परमेश्वर और हमारे प्रभु यीशु मसीह से जुड़ी बातें ऊँची हैं, पर इसी को बहाना बनाकर दूर बने रहते हैं। यदि हम धार्मिक बातों को समझने के दायित्व से बच सकते, तो सहर्ष अनजान ही रहते। हममें व्यर्थता और झूठ की अतृप्त भूख है, फिर भी जब परमेश्वर हमें ज्ञान खोजने को बुलाता है, तो हम पूरी शक्ति से विरोध करते हैं, और अपने सीधेपन, सीमित समझ, और परमेश्वर के वचन की गम्भीरता और अथाह स्वभाव को बहाना बनाकर बच निकलते हैं। हम ऐसे बहाने बनाना जानते होंगे, पर वास्तव में यह केवल दिखावा और कपट है।
इसके प्रमाण में, लोग सदा अपनी पूर्वधारणाओं के अनुसार निर्णय सुनाते हैं। जब उनके सामने परमेश्वर का वचन रखा जाता है, तो वे ऐसे प्रश्नों से उत्तर देते हैं: "क्या सचमुच ऐसा है? ऐसा कैसे हो सकता है?" वे तर्क और प्रश्न करते हैं, चाहे बोलनेवाला परमेश्वर ही क्यों न हो। वे आपत्तियाँ उठाए बिना परमेश्वर का सन्देश स्वीकार नहीं करते। इस प्रकार प्रकट होता है कि उनकी मन्दता या विवेक की कमी का दावा निष्कपट नहीं है, क्योंकि वे सोचते तो इसके ठीक विपरीत हैं। जिन्हें उनमें सबसे अज्ञानी और मूर्ख माना जा सकता है, वे भी प्रायः अपने आपको स्वयं परमेश्वर से अधिक बुद्धिमान समझते हैं।
इसके विपरीत, सुसमाचार के तिरस्कार का एक कारण यह है कि बहुत से घमण्डी और कल्पनाशील लोग उसे एक सरल शिक्षा समझते हैं, जिसमें वह जटिलता नहीं जिसकी उन्हें लालसा है। इसलिए हमारे लिए आवश्यक है कि जो सन्त पौलुस यहाँ बताता है उस पर मनन करें: वह महिमामय मीरास, जिसके लिए परमेश्वर ने हमें बुलाया है, अवर्णनीय रूप से धनी है। हमारी दीन उत्पत्ति और गिरी हुई दशा को देखते हुए, और इस बात को भी कि पाप ने हमें पूरी तरह आशाहीन छोड़ दिया होता, विशेषकर जब हम कभी परमेश्वर के बैरी थे, तो उसके हाथ से सम्पूर्ण विनाश के सिवाय हम और क्या आशा कर सकते हैं? फिर भी उसे यह भाया कि हमें स्वर्ग के स्वर्गदूतों की सहभागिता तक उठाए, और इससे भी आश्चर्यजनक यह कि हमें अपने प्रभु यीशु मसीह के अंग बनाए, कि हम उसके जीवन और महिमा में भागी हों। ये अतुलनीय वैभव के भण्डार हैं! जब हम इन धनों पर सारे हृदय और मन से विचार करें, तो क्या हम गहराई से दीन न हो जाएँ? परमेश्वर ने हम पर ऐसी अगम्य भलाई दिखाई है। इसलिए सन्त पौलुस, लोगों को उनकी आत्मिक नींद से जगाने और उनकी कृतघ्नता को डाँटने के लिए, क्योंकि वे परमेश्वर के अनुग्रह के एक अंश को भी वैसे नहीं मानते जैसा चाहिए, हमसे कहता है कि इन सत्यों पर विचार करके हम परमेश्वर से प्रकाश के लिए प्रार्थना करने को प्रेरित हों। उसके ईश्वरीय प्रकाश के बिना हम न कभी विश्वास के निकट आते, न सच्चे ज्ञान की किसी झलक के।
अब हम सन्त पौलुस का अभिप्राय समझ सकते हैं, जिसे वह यह जोड़कर और स्पष्ट करता है, 'और उसकी सामर्थ्य हम विश्वास करनेवालों के लिए कितनी बड़ी है।' वह यह भी कहता है, 'उसकी शक्ति के प्रभाव के अनुसार।' इन वाक्यांशों में वह मूलतः वही गहन सत्य कहता है। यह मनुष्य की दुष्टता का सुधार है, क्योंकि लोग प्रायः परमेश्वर की भलाई की महानता को घटाने का यत्न करते हैं। जब उसे पूरी तरह छिपा नहीं पाते, तो उसे घटाकर ऐसी जगह ले आते हैं जहाँ वह तुच्छ दिखाई दे। मानो परमेश्वर का अनुग्रह मात्र एक चिनगारी हो, जबकि उसे तेज चमकना चाहिए। परन्तु यह समझना अनिवार्य है कि जब सन्त पौलुस पवित्र लोगों और विश्वासियों की बात करता है, तो वह उन विश्वासियों की बात कर रहा है जिन्हें परमेश्वर पहले ही बुला चुका है। इससे वह दिखाता है कि जब हममें विश्वास है, तब भी हमारी सारी पवित्रता परमेश्वर की असीम दया से आती है, और मनुष्य अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ता। 'पवित्र लोग' नाम बहुत आदरणीय है, पर यह आवश्यक है कि पवित्रता का स्रोत खोजा जाए। अपने आप में हम अशुद्धता के सिवाय कुछ नहीं हैं। यद्यपि परमेश्वर की सन्तानों को पवित्र होना चाहिए, फिर भी उन्हें सदा सोचना चाहिए कि इस पवित्रता का मूल कहाँ है—क्या यह उनके अपने प्रयत्नों से उठती है या परमेश्वर की ओर से ईश्वरीय दान के रूप में दी जाती है। सन्त पौलुस दृढ़ता से दिखाता है कि इसका सारा गुणगान केवल परमेश्वर को ही दिया जाना चाहिए। यह परमेश्वर की अपनी पवित्रता की बारम्बार पुष्टियों में प्रकट है। इसके अतिरिक्त हम मानते हैं कि यीशु मसीह ने हमारे लिए अपने आपको पवित्र किया, और हमें हमारी सब अशुद्धताओं से शुद्ध किया।
इसके बाद सन्त पौलुस हमारे विश्वास की जड़ की ओर आता है: मनुष्य उसे तब तक नहीं पा सकते जब तक वे किसी गुप्त भीतरी आकर्षण से न खिंचें। जैसा कहा जा चुका है, हमें परमेश्वर से सीखना चाहिए, केवल इसलिए नहीं कि उसके वचन में सारी बुद्धि समायी है और वह हितकारी बातें सच्चाई से सिखाता है, वरन् इसलिए भी कि हमारे प्रभु ने स्वयं स्पष्ट कहा, 'जिस किसी ने पिता से सुना और सीखा है।' उसने, जो परमेश्वर की बुद्धि का साकार रूप है, यह सन्देश दिया, और साथ ही इस पर बल दिया कि उसके कहे हुए वचन तभी प्रभावी हो सकते हैं जब परमेश्वर का आत्मा मनुष्य के हृदय में कार्य करे। अब यदि यीशु मसीह, जो परमेश्वर की बुद्धि का मूर्त रूप था, अपनी शिक्षा से लोगों में परिवर्तन नहीं ला सका जब तक परमेश्वर का आत्मा उनके अन्तःकरण में कार्य न करे, तो केवल नश्वर मनुष्यों का प्रचार क्या प्रभाव डाल सकता है? हमें मानना चाहिए कि मनुष्य सत्य के बीज बो सकते और पोषण दे सकते हैं, परन्तु बढ़ाना परमेश्वर का काम है, जैसा सन्त पौलुस 1 कुरिन्थियों के तीसरे अध्याय में कहता है।
इसके अतिरिक्त, जैसा पहले बल दिया गया, हमें अपनी सारी पवित्रता यीशु मसीह से प्राप्त करनी है, जिसमें उसकी परिपूर्णता मिलती है। साथ ही हमें समझना चाहिए कि यह घोषणा अशुद्धता और कुकर्म के विरुद्ध चेतावनी है। इसके बदले यह हमें अलग किए जाने के लिए बुलाती है, कि हम अपने आपको पूरी तरह परमेश्वर की सेवा में समर्पित करें। बहुत से लोग विश्वासी होने का घमण्ड कर सकते हैं, और 'विश्वास' शब्द बहुतों की जीभ पर आसानी से आ जाता है। फिर भी विश्वास का महत्त्व उससे अधिक है जितना हम आरम्भ में सोचें, क्योंकि वह हमारे हृदयों को शुद्ध करता है, जैसा प्रेरितों के काम के पन्द्रहवें अध्याय में कहा गया है। वह हमें अलग करता और पवित्र ठहराता है, कि हम अपने आपको पूरी तरह परमेश्वर की सेवा में अर्पित करें। इसका अर्थ यह है कि जो हमारे प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करते हैं, वे एक रीति से संसार में से निकाल लिए गए हैं, जैसा सन्त पतरस भी अपनी पहली पत्री में कहता है।
जैसा पहले कहा गया, हम यह स्थापित कर चुके हैं कि हम यीशु मसीह के लहू से शुद्ध किए गए हैं ताकि इस संसार से अलग किए जाएँ। यह यूहन्ना के सुसमाचार में उसकी उस प्रार्थना के अनुरूप है, जहाँ उसने पिता परमेश्वर से बिनती की कि हमें इस संसार और इसके क्षणिक जीवन से न उठा ले, वरन् संसार के भ्रष्ट करनेवाले प्रभावों से बचाए और हमें उनकी पकड़ से मुक्त रखे। इसलिए स्मरण रखना आवश्यक है कि पवित्रता हमारे विश्वास का सच्चा प्रमाण है। जो कोई मसीही कहलाता है, उसे परमेश्वर के लिए पवित्र ठहराया जाना चाहिए, और संसार की अशुद्धताओं और मलिनता में उलझने या उनसे अपवित्र होने से बचना चाहिए। यह सच है कि जब तक हम इस संसार में रहते हैं हमारी पवित्रता कभी सिद्ध नहीं होगी, क्योंकि हम निरन्तर अपनी निर्बलताओं से लड़ते रहते हैं; फिर भी पाप हम पर राज्य न करे। वह हमारे भीतर बसा है, और हम उसे जीतने का निरन्तर यत्न करते हैं। तथापि जब परमेश्वर हमें पवित्र ठहरा चुका, तो हमें अपने आपको उसकी सेवा में लगा देना चाहिए, अपने आपको सब दोषों से अधिकाधिक शुद्ध करने का यत्न करते हुए, और पूरी तरह उसके अधीन होकर, ताकि हम उन संसारी लोगों के समान न रहें जो अपनी ही अभिलाषाओं के पीछे चलते हैं। सन्त पौलुस का मूल अभिप्राय यही था।
इसके अलावा, इसमें कोई सन्देह नहीं कि इस अंश में सन्त पौलुस उनके बीच, जो पूरे अज्ञान में डूबे हैं या इतने कठोर हो गए हैं कि सुसमाचार की आज्ञाकारिता में झुकने की इच्छा नहीं रखते वरन् उसका प्रचण्ड विरोध करते हैं, और विश्वासियों के बीच, जो भले चरवाहे की आवाज़ के पीछे चलनेवाली बेचारी भेड़ों के समान हैं, एक सशक्त तुलना करता है। यहाँ सन्त पौलुस उन सब ठट्ठा करनेवालों को दोषी ठहराता है जो परमेश्वर का उपहास करते हैं और कुत्तों या ऐसे पशुओं के समान हैं जिनमें धार्मिक भावना बिलकुल नहीं। जब हम उनसे मिलते हैं, तो वे ऐसे दर्पण हैं जो हमें ठहरकर सोचने पर विवश करें, और स्मरण दिलाएँ कि यदि परमेश्वर ने हम पर दया न की होती तो हम कैसे होते। इसलिए जब हम लोगों को खुलेआम परमेश्वर का उपहास करते और सब प्रकार की दुष्टता में बेधड़क कूदते देखें, तो हमें अपने परमेश्वर की असीम भलाई को स्वीकार करना चाहिए कि उसने हमें उनके बीच से अलग किया। अतः जब हम एक दल को अविश्वास में जड़ और दूसरे को सुसमाचार के विरुद्ध घमण्ड, कड़वाहट और हठ से भरा देखें, तो हमें समझना चाहिए कि यदि परमेश्वर ने हमारी ओर हाथ न बढ़ाया होता तो हम भी उन्हीं के समान होते।
अब हम उन शब्दों पर ध्यान से विचार करें जो सन्त पौलुस यहाँ प्रयोग करता है: 'उसकी शक्ति का अत्यन्त महान प्रभाव, उसकी सामर्थ्य के कार्य के अनुसार।' ऐसा प्रतीत होता है मानो पवित्र आत्मा ने उस भ्रामक विश्वास को कड़ाई से सम्बोधित करना चाहा जिसने युगों से लोगों के मन को धुँधला कर रखा है—स्वतन्त्र इच्छा की धारणा। अन्यजाति यहाँ तक कहने लगे कि परमेश्वर ने उन्हें संसार में होने के लिए बनाया है, और उन्हें भाग्य देना, जैसा वे कहते थे, उसी का दायित्व है। परन्तु वे मानते थे कि हर व्यक्ति में सद्गुण का पीछा करने और निर्दोष जीवन बिताने की सामर्थ्य और स्वतन्त्र चुनाव है। उन्होंने उत्तरदायित्व को परमेश्वर और अपने बीच बाँट लिया, जीवन की छोटी बातें, जैसे हमारा सांसारिक अस्तित्व, परमेश्वर के सिर मढ़ दीं, पर स्वर्ग की प्राप्ति और सद्गुणयुक्त आत्मसंयम को मनुष्य की क्षमता के भीतर ठहराया।
दूसरी ओर, यहूदियों और कैथोलिकों ने इस विश्वास को पूरी तरह नहीं अपनाया, क्योंकि जैसा पहले कहा गया, वे परमेश्वर की सहायता की हमारी आवश्यकता को मानते हैं। फिर भी वे यह मानते हैं कि हमें अपनी कुछ मात्रा की पवित्रता को परमेश्वर के अनुग्रह के साथ मिलाना और उससे सहयोग करना चाहिए। उनके मत में, सब विचार और रियायतों के बाद भी मुख्य भूमिका सदा हमारे ही भीतर पायी जाती है।
परन्तु आओ विचार करें कि पवित्र आत्मा इन शब्दों का प्रयोग क्यों करता है—ऊँचाई, सामर्थ्य, बल, प्रभावशाली कार्य, और शक्ति। यह उनकी मूर्खता दिखाने के लिए है जो अपने उचित स्थान से आगे बढ़ बैठते हैं। यहाँ एक भी शब्द ऐसा नहीं जो भलाई के अत्यन्त छोटे अंश पर भी हमारे घमण्ड का समर्थन करे। यदि कोई कहे, "मेरा स्वभाव अच्छा है, मुझमें कुछ सद्गुण है," तो इसी को सन्त पौलुस 'ऊँचाई' कहता है। मानो वह कहना चाहता हो कि हममें जो कुछ भी भलाई है वह ऊपर से उतरती है और हममें उसकी कोई जड़ या उत्पत्ति नहीं; वह ऊपर से उतरती है, जैसा सन्त याकूब संकेत करता है। यदि कोई तर्क करे कि हममें अपने दोषों का सामना करने और परीक्षाओं से लड़ने की सामर्थ्य है, तो सन्त पौलुस घोषित करता है कि हमारा बल, सामर्थ्य और शक्ति परमेश्वर से है, और उसे वही हमें देगा, और हम उसी से पाते हैं। यदि लोग फिर भी दावा करें कि वे अपने प्रयत्नों से कुछ कर सकते हैं, तो सन्त पौलुस हमसे कहता है कि जब तक परमेश्वर न दे, कोई प्रभावी कार्य नहीं हो सकता, कुछ सिद्ध नहीं हो सकता, जैसा वह फिलिप्पियों के दूसरे अध्याय में कहता है, जहाँ वह समझाता है कि हमें डरते और सावधान रहते हुए चलना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर ही है जो अपनी सुइच्छा के लिए हममें इच्छा और काम, दोनों बातों का प्रभाव डालता है। संक्षेप में, हमें समझना चाहिए कि प्रेरित जो शब्द यहाँ प्रयोग करता है वे बादलों की गर्जना और बिजली की कौंध के समान हैं, जिनका उद्देश्य मनुष्य के सब घमण्ड को चूर करना और दबाना है। इस प्रकार दीन होकर हम परमेश्वर की महिमा वैसी कर सकें जैसी उसके योग्य है। पूर्ण दीनता से हमें अपना दोष खुलकर और स्वतन्त्रता से मान लेना चाहिए, यह स्वीकार करते हुए कि सारी भलाई केवल उसी से निकलती है, और उसके लिए हम केवल उसी के ऋणी हैं। सार यह कि यह अंश हमें सिखाता है कि हम इतने गहरे दीन हों कि हममें परमेश्वर के साथ साझेदारी का दावा करने की कोई इच्छा न रहे। हमें यह कहने से बचना चाहिए कि वह केवल हमारी सहायता करता है और हमारी स्वतन्त्र इच्छा में उसके अनुग्रह और पवित्र आत्मा का कोई अंश है। इसके बजाय हमें अपने उद्धार का सारा गुणगान पूरी तरह और सीधे-सीधे उसी को देना चाहिए।
इसके अतिरिक्त, यह हमें संसार को तुच्छ जानने और उस अनन्त जीवन की आशा में सन्तुष्ट रहने की ओर ले जाए जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमारे लिए सुरक्षित की है। हम समझते हैं कि यद्यपि मनुष्यों पर प्रायः अनेक कष्ट आते हैं, और हमारे सांसारिक जीवन को ठीक ही दुःख की तराई कहा जाता है, फिर भी परमेश्वर अपनी सन्तानों को और भी बड़ी विपत्ति में डालता है, क्योंकि उन्हें संसार से अलग होने के लिए निरन्तर प्रोत्साहन की आवश्यकता रहती है। यदि हम यहाँ बहुत सुख-चैन और भोग-विलास से रहें, तो निश्चिन्त हो सकते हैं, यद्यपि परमेश्वर निरन्तर आग्रह करता है कि हम इस पृथ्वी पर टिके रहने के बजाय शीघ्रता करें। सार यह कि सुसमाचार में विश्वास के लिए बुलाने के बाद परमेश्वर हमें अनेक रीति से परखेगा, कि हम संसार से अत्यधिक न जुड़ जाएँ। यदि यहाँ सब कुछ सुगमता से चलता रहे, तो हम उसकी सेवा में रुचि खो बैठें, और उसका प्रेम हमें तुच्छ लगने लगे। इसलिए सन्त पौलुस हमें परमेश्वर के और निकट इस प्रकार लाना चाहता है कि हमारे बुलावे का पीछा करने में कुछ बाधा न बने। यदि इस संसार में हमारी अभिलाषाएँ सदा पूरी न हों, तो हम परमेश्वर की असीम आशीषों का मूल्य और गहराई से समझना सीखें, ताकि हम दाऊद की आत्मा में कह सकें (जैसा भजन संहिता 16:5 में कहा गया है), "मेरा भाग सुन्दर है।" क्योंकि परमेश्वर ने अपने आपको मुझे दे दिया है, मेरे पास ऐसी उत्कृष्ट विरासत है कि मैं संसार के क्लेश सहने के विषय में चिन्ता नहीं करता—दरिद्रता, रोग, निन्दा, भय और धमकियाँ। जब तक मेरा परमेश्वर मेरे पास है, जिसने मुझे अपने लिए चुना और अलग किया, और जो मुझे अपनी सब आशीषों का भागी बनाना चाहता है, ये सब परीक्षाएँ मुझे मधुर लगेंगी।
अतः मूलतः हमें प्रोत्साहित और धीरज में दृढ़ किया जाना है कि संसार के सब क्लेश और विपत्तियाँ नम्रता से सहें। जब परमेश्वर कभी हमारे हाथ में कड़वा प्याला थमाए और हमें आहें भरने और विलाप करने का कारण दे, तब हमें व्याकुल या चिढ़ना नहीं चाहिए। इसके बजाय हमें कुड़कुड़ाने और शिकायत करने से बचना चाहिए, और अपने आपको आश्वस्त करना चाहिए कि परमेश्वर ने हमें अपने राज्य में भागी होने को बुलाकर हमें बड़ी शान्ति दी है। उसने हममें अपनी सामर्थ्य पहले ही प्रकट कर दी है, चाहे हमें वह अपर्याप्त प्रतीत हो। हमें सब सांसारिक बातों से ऊपर उठकर उन्हें अपने पाँवों के नीचे की वस्तु जानना चाहिए।
परन्तु क्योंकि हम परमेश्वर के अनुग्रह की परिपूर्णता को अभी वैसा नहीं देखते जैसा चाहते हैं, इसलिए सन्त पौलुस हमारा ध्यान हमारे प्रभु यीशु मसीह की ओर ले जाता है। इस जोड़ के बिना यह निराशाजनक हो सकता था। हम पूछ सकते थे, "परमेश्वर के ये धन कहाँ हैं?" क्योंकि हम न केवल इस संसार की वस्तुओं से वंचित हैं, वरन् परमेश्वर के पवित्र आत्मा के अनुग्रह की दृष्टि से आत्मिक रीति से सूखे और बंजर भी हैं। यदि हममें उसका कोई अंश है भी, तो इतना छोटा है कि उससे हमें दीन होना चाहिए। फिर भी हम अपनी निर्बलताओं से दबे हुए हैं। यदि हम परमेश्वर की सामर्थ्य की बात करें, तो उसे हममें सब पाप पर जयवन्त होना चाहिए, फिर भी हम इतने निर्बल हैं कि सहज ही हार जाते हैं। हमें पूरी तरह परमेश्वर को समर्पित होना चाहिए, पर संसार हमें फँसा लेता है और हम उसमें उलझ जाते हैं।
इसलिए विश्वासियों के लिए आवश्यक है कि परमेश्वर के अनुग्रह पर विचार करते हुए हियाव न छोड़ें; वरन् वे यीशु मसीह के और निकट खींचे जाएँ। सन्त पौलुस इस पर बल देता है कि परमेश्वर ने हमारे प्रभु यीशु मसीह को मृत्यु के चंगुल से जिलाकर अपनी सामर्थ्य का प्रताप दिखाया। मसीह के पुनरुत्थान पर ध्यान जानबूझकर दिलाया गया है, क्योंकि केवल उसकी मृत्यु निर्बलता का कार्य प्रतीत हो सकती थी। उसके क्रूस पर चढ़ाए जाने में निर्बलता के सिवाय कुछ दिखाई नहीं देता था। परन्तु मृत्यु पर जयवन्त होकर मसीह ने अपने आपको परमेश्वर का पुत्र, महिमा और जीवन का प्रभु, और असीम अधिकार से सम्पन्न प्रकट किया। सन्त पौलुस आगे कहता है कि परमेश्वर ने उसे अपने दाहिने हाथ पर बैठाया। मसीह का पुनरुत्थान तो आरम्भ मात्र था; उसके स्वर्गारोहण ने उसे स्थायी प्रभुता दी। उसके पुनरुत्थान ने उसकी ईश्वरता की घोषणा की, और उसके स्वर्गारोहण ने पिता परमेश्वर के दाहिने हाथ बैठे हुए संसार पर उसकी सर्वोच्च प्रभुता की पुष्टि की। अब वह अपने उन अनुयायियों को, जो उसे पुकारते हैं, थामे और सुरक्षित रखता है, और शैतान, संसार और सब विरोधियों पर जयवन्त होने की सामर्थ्य रखता है।
इसलिए सन्त पौलुस का प्रयोजन स्पष्ट है। वह यीशु मसीह को परम आदर्श के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसके द्वारा हम वह देख सकते हैं जो हममें अभी पूरी तरह प्रकट नहीं है—परमेश्वर की वह अपरिमेय शक्ति जो सारे संसार की शक्ति से बढ़कर है। पहला, मसीह कब्र से जी उठा, और दूसरा, वह पिता के दाहिने हाथ का स्थान ग्रहण करता है। परमेश्वर के दाहिने हाथ का उल्लेख मानवीय उपमा का प्रयोग है। परमेश्वर, जो अनन्त और आत्मिक है, शारीरिक हाथ नहीं रखता। जब कहा जाता है कि मसीह परमेश्वर के दाहिने हाथ बैठा है, तो यह सारे विश्व में उसके सर्वव्यापी अधिकार का प्रतीक है। यद्यपि स्वर्ग में उसके चढ़ जाने के कारण उसकी शारीरिक उपस्थिति अब हमारे साथ नहीं है, तथापि उसका प्रभाव घटा नहीं है। वह अपने पवित्र आत्मा से सब वस्तुओं में व्याप्त है और हममें निवास करता है, और अपने सार के द्वारा हमारा पोषण करता है, जैसा इस विश्वास में पुष्ट होता है कि उसका मांस हमारा भोजन और उसका लहू हमारा आहार है।
इसलिए परमेश्वर का दाहिना हाथ कोई विशेष भौतिक स्थान नहीं है जहाँ मसीह बैठा है, वरन् उस प्रभुता का सूचक है जो उसने सारे विश्व पर पायी है। यह मानवीय रीतियों से ली गई एक लाक्षणिक अभिव्यक्ति है, जैसे कोई राजकुमार किसी उप-शासक को नियुक्त करके उसे अपनी दाहिनी ओर बैठाता है, जो दर्शाता है कि वह दूसरे स्थान का अधिकारी है जिसकी आज्ञा मानी जानी चाहिए। इसलिए परमेश्वर हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा दिखाता है कि वह हमारा पिता है। यद्यपि ईश्वरत्व की पूरी परिपूर्णता यीशु मसीह में वास करती है, फिर भी हम, जो परमेश्वर की महिमा को समझने में सीमित और मन्द हैं, आश्वस्त किए जाते हैं कि यीशु मसीह के पास सर्वोच्च अधिकार है। उसकी सुरक्षा में नरक की शक्तियाँ भी हम पर प्रबल नहीं हो सकतीं। हमारा सिर, यीशु मसीह, सब सामर्थ्य रखता है, चाहे हम अंग निर्बल हों। इसलिए हमें उसकी सहायता दूर-दूर खोजने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वह स्वर्ग और पृथ्वी की सब बातों पर शासन करता है, और हम उसकी प्रेममयी देखभाल को सौंपे गए हैं।
यहाँ सन्त पौलुस के सन्देश का सार यह है कि वह पुष्टि करता है कि परमेश्वर ने हममें अपनी ऊँची और असीम सामर्थ्य प्रकट की है। फिर भी अपनी प्रतीत होती अपर्याप्तताओं और अनेक अपूर्णताओं के कारण हमने अभी अपनी पूरी क्षमता नहीं पायी, उसका एक अंश भी नहीं। अपनी सब आवश्यकताओं के विषय में अपना भरोसा दृढ़ करने के लिए हमें पहचानना चाहिए कि ये सब प्रबन्ध यीशु मसीह में पाए जाते हैं।
क्या हम अब भी मृत्यु की छाया का सामना करते हैं? विचार करें कि यीशु मसीह अनन्त जीवन में इसीलिए चढ़ा क्योंकि उसने मरणशीलता धारण की, कि उसका जीवन हमारा जीवन बने। क्या पाप अब भी हममें बना है? मानें कि यीशु मसीह निष्कलंक और निर्दोष है। क्या हम निर्बल हैं? वह पिता परमेश्वर की सामर्थ्य का साकार रूप है, और उसने अपनी मनुष्यता में, जो हमसे ली गई थी, जो कुछ पाया वह हमारे लाभ के लिए था। संक्षेप में, हमारी सब घटियाँ और सान्त्वना तथा पोषण की आवश्यकताएँ हमारे प्रभु यीशु मसीह में मिल सकती हैं। यह समझ हमें चिन्ता और घबराहट से बचाती है, मानो हम उन आशीषों से वंचित हों जिन्हें सन्त पौलुस ने समझाया है।
संक्षेप में, यह अंश हमें सिखाता है कि यद्यपि हममें परमेश्वर का अनुग्रह सीमित दिखाई दे, और जिस सम्पूर्ण बहुतायत की हम लालसा करते हैं उसके बदले केवल साधारण आरम्भ दे, तथापि यह अनुग्रह हमें उसमें आशा का पूर्वस्वाद और प्रतिभूति देता है। उसके पवित्र आत्मा की थोड़ी सी मात्रा भी हममें बसी हो, तो हम उसे प्रतिज्ञा किए हुए जीवन का बयाना और अग्रिम चिह्न जानते हैं। हमारी नश्वर देहों में बसे हुए पाप के होते हुए भी, हमें इस बात में सन्तोष पाना चाहिए कि परमेश्वर दयालुता से अपने पवित्र आत्मा का अंश मात्र भी हमें देता है।
इसके अतिरिक्त, अपनी सीमित समझ, निर्बलताओं और घटियों के कारण हम इन सब सत्यों को पूरी तरह नहीं समझ सकते। इसलिए हमें अपनी दृष्टि यीशु मसीह की ओर लगानी चाहिए। यद्यपि हम उसमें सारी सिद्धता देख सकते हैं, तथापि शारीरिक उपस्थिति की दृष्टि से हम उससे अलग हैं। इस विषय में, जैसा सन्त पौलुस कहता है, हम उससे दूर हैं, क्योंकि हम प्रत्यक्ष दर्शन से नहीं वरन् विश्वास से चलते हैं। फिर भी हम उसकी देह के अभिन्न अंग हैं। जैसे जड़ वृक्ष से अलग नहीं की जा सकती और सब डालियों को अपना पोषण पहुँचाती है, वैसे ही हमें समझना चाहिए कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने अपनी सम्पूर्णता में स्वर्गीय जीवन के लिए आत्मिक दान पाए हैं, और उनका उद्देश्य है कि जैसे-जैसे हमारा विश्वास परिपक्व हो, वह धीरे-धीरे उन्हें हमारे साथ बाँटे।
फिर भी यह स्मरण रखना आवश्यक है कि हमें दीनता का अभ्यास करना और अपनी जन्मजात अपूर्णता को पहचानना चाहिए। हमें नम्रता से परमेश्वर के पास आना चाहिए, और अपनी कमियाँ और निर्भरताएँ खुलकर मान लेनी चाहिए। ऐसा करते हुए हमें उसके पास शीघ्रता से जाना चाहिए, यह जानकर कि उसकी सहायता दिन-प्रतिदिन बढ़ सकती है। उसकी निरन्तर सहायता के बिना हम बह जाते, और जो कुछ हमें प्रिय है वह हमारी पकड़ से फिसल जाता। इसलिए हमारे लिए सर्वोपरि है कि अपने प्रभु यीशु मसीह से घनिष्ठ रूप से जुड़े रहें, और उसके तथा अपने बीच के अटूट सम्बन्ध को समझें। उसने स्वेच्छा से दरिद्रता अपनाई कि हमें धन दे, और इसी रीति से उसकी प्रचुर आशीषें अब भी हम तक पहुँचती हैं। यद्यपि हम उनमें पूरी तरह भागी न हों, तो भी थोड़ा सा अंश परमेश्वर के असीम प्रेम का स्वाद चखने और यह भरोसा रखने के लिए पर्याप्त है कि वह हमें कभी न छोड़ेगा। वह हमारे निकट आ गया है, और अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हममें निवास करता है, जैसा हमने कुरिन्थियों के नाम दूसरी पत्री में देखा, जो हमें आश्वस्त करती है कि वह हमें निरन्तर लबालब भरता रहेगा।
सन्त पौलुस का 'धनी करना' शब्द चुनना हमें स्मरण दिलाता है कि हममें सदा अपर्याप्तता और आवश्यकता का बोध बना रहेगा। फिर भी हमें उस प्रतिज्ञा पर दृढ़ भरोसा रखना चाहिए कि जिसने हममें भला काम आरम्भ किया है वही उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा। यह आश्वासन हमें उन समयों में सान्त्वना देता है जब जीवन लम्बा खिंचता प्रतीत होता है, और हम यीशु मसीह के लौटने की उत्कण्ठा से प्रतीक्षा करते हुए अपने में सिद्धता की परिपूर्णता प्रकट होने की लालसा करते हैं। उस महिमामय दिन तक हमें अपनी यात्रा में लगे रहना और परमेश्वर से बिनती करनी चाहिए कि वह हमें लड़खड़ाने न दे। निःसन्देह हम घटी और अभाव के क्षणों का सामना करेंगे, पर वह हमारी सहायता को ऐसे आएगा कि हम अपने ऊपर उसकी कृपादृष्टि देखेंगे। अपने प्रभु यीशु मसीह से इस मेल के द्वारा हममें से हर एक, अपने विश्वास के अनुसार, उचित आशीषों का भागी होगा जब तक हम पूरी तरह भर न जाएँ, जो उस समय होगा जब हम उसके साथ निर्दोष रीति से एक हो जाएँगे।
और इसलिए, आओ हम अपने कृपालु परमेश्वर की महिमा के सामने दीनता से झुकें, अपने अपराधों को स्वीकार करें और प्रार्थना करें कि यह बोध हमें उनसे दूर रखे। यह हमारे लिए ऐसा दिशासूचक हो जो हमें उसकी आज्ञाओं का कर्तव्यनिष्ठा से पालन करने की ओर ले जाए, और हम अपने कामों से साक्षी दें कि उसने हमें इतने बड़े मूल्य पर व्यर्थ नहीं छुड़ाया। हमें शारीरिक अभिलाषाओं को त्यागकर अपने आपको पूरे हृदय से उसकी पवित्र सेवा में अर्पित करना चाहिए, यह मानते हुए कि उसने निश्चय ही हमें अपनी प्रिय मीरास के रूप में अपना लिया है। इसलिए हमारे स्वर एक होकर कहें, "सर्वशक्तिमान परमेश्वर, हमारे स्वर्गीय पिता।"
