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इफिसियों 3:2 पर इक्कीसवाँ उपदेश, तीसरे अध्याय का छठा और चौथे अध्याय का पहला
तीसरे अध्याय का और चौथे अध्याय का पहला
"अब जो ऐसा सामर्थी है कि हमारी बिनती और समझ से कहीं अधिक काम कर सकता है, उस सामर्थ्य के अनुसार जो हम में कार्य करता है, कलीसिया में और मसीह यीशु में उसकी महिमा पीढ़ी से पीढ़ी तक युगानुयुग होती रहे। आमीन।"
"इसलिये मैं जो प्रभु में बन्दी हूँ, तुम से बिनती करता हूँ कि जिस बुलाहट से तुम बुलाए गए थे, उसके योग्य चाल चलो, अर्थात् सारी दीनता और नम्रता सहित, धीरज धरकर प्रेम से एक दूसरे की सह लो।" - इफिसियों 3:20-4:2
जब परमेश्वर ने हमारे साथ बहुत भलाई की हो, तब यद्यपि हम अपने को उसका ऋणी और उसकी उचित स्तुति करने के लिये बाध्य अनुभव करते हैं, तथापि हम अपना कर्तव्य सच्चे मन से तब तक पूरा नहीं कर सकते, जब तक हमें यह आशा न हो कि जैसा हमने उसे बीते समय में जाना है, वैसा ही वह आगे भी बना रहेगा। विश्वास के बिना हम आशा नहीं रख सकते। इसलिये यह असम्भव हो जाता है कि परमेश्वर को मनुष्यों की ओर से वह स्तुति मिले जो उसके योग्य है, चाहे उसने हमारी सहायता की हो और हमारी हर इच्छा पूरी की हो।
यदि हम यह सोचें कि हमारे संकट के समय उसकी सहायता मात्र क्षणिक थी, जो शीघ्र ही जाती रही, और अब से हम उसके हाथ से और कुछ आशा नहीं रख सकते, तो हम उसे खोजने से हतोत्साहित हो जाएँगे। हमारे हृदय शोक और निराशा से दब जाएँगे। परमेश्वर की स्तुति को बनाए रखने के लिये हमें दो बातों को जोड़ना होगा: पहली, जो भलाई हमने उससे पाई है उसे स्मरण रखना, और दूसरी, यह आशा बनाए रखना कि वह अन्त तक अपनी भलाई में अटल रहेगा और निरन्तर हम पर अपनी आशीषें उँडेलता रहेगा।
सन्त पौलुस यहाँ इसी क्रम पर बल देता है जब वह कहता है, "परमेश्वर की स्तुति और महिमा हो, और अब भी उसी की हो," और आगे जोड़ता है, "जो हमारी बिनती से बढ़कर, वरन हमारी समझ से भी परे सब कुछ करने में समर्थ है।" सन्त पौलुस के मन में यह बात है, जैसा हम पहले देख चुके हैं, कि परमेश्वर ने सुसमाचार को, जो उद्धार का सन्देश है, सारे संसार में फैलाकर अपनी भलाई की असीम सम्पत्ति प्रकट की है।
तो भी उसने विश्वासियों को अपना कर्तव्य आनन्द से निभाने के लिये यह कहकर उत्साहित किया कि उन्हें इस बात में सन्देह नहीं करना चाहिए कि परमेश्वर अपना हाथ खींच लेगा, मानो उनके प्रति उसकी उदारता अस्थायी और क्षणिक रही हो। उसका आशय यह बताना था कि परमेश्वर अपना कार्य जारी रखेगा, जिससे वे बिना रुके उसके नाम की स्तुति कर सकें। इसका अर्थ यह है कि हमें न केवल उन आशीषों के लिये जो हम पा चुके हैं, वरन परमेश्वर की आगे भी बनी रहनेवाली विश्वासयोग्यता की आशा में भी धन्यवाद करना चाहिए। इस कथन से हमें यही मुख्य बात ग्रहण करनी है।
यह कथन इस बात का आग्रह है कि "कलीसिया में परमेश्वर की महिमा हो।" यह इस बात पर बल देता है कि प्रत्येक व्यक्ति का अकेले में परमेश्वर की दी हुई आशीषों को स्वीकार करना पर्याप्त नहीं है। इसके विपरीत, विश्वासियों को अपने धन्यवाद और स्तुति में एक हो जाना चाहिए। जब देह (कलीसिया) बढ़ती है और संख्या तथा आत्मिक वरदानों में उन्नति करती है, तब न केवल इन आशीषों को पानेवालों को, वरन सारी देह को परमेश्वर की स्तुति करने का प्रयत्न करना चाहिए। विश्वासियों को एक पवित्र एकता में बँधा होना चाहिए, जैसा कि प्रेरित पौलुस आगे समझाएगा। इसी कारण वह विशेष रूप से कलीसिया का उल्लेख करता है, यह दर्शाते हुए कि परमेश्वर की भलाई हर एक जन को उसकी महिमा करने के लिये प्रेरित करे। इस प्रकार हम पहचानते हैं कि परमेश्वर हमारे साथी विश्वासियों के लिये जो कुछ करता है, उसे ऐसा समझना चाहिए मानो वह हमारे लिये किया गया हो।
पौलुस विश्वासियों के बीच एकजुट स्तुति में एक सम्भावित बाधा की ओर भी ध्यान दिलाता है। यहूदियों और अन्यजातियों के बीच पुराना बैर चला आ रहा था; यहूदी अपनी विरासत और व्यवस्था के पालन के कारण प्रायः अपने को श्रेष्ठ समझते थे। दूसरी ओर, अन्यजातियों को ऐसे विशेषाधिकारों का कोई अधिकारी नहीं माना जाता था। पौलुस उन्हें स्मरण दिलाता है कि जब परमेश्वर ने दोनों दलों को भाई-बहिन के रूप में उद्धार की विरासत में सहभागी होने के लिये बुलाया है, तो उन्हें उसकी स्तुति करने में एक हो जाना चाहिए। वह कहता है, "परमेश्वर की महिमा हो, हाँ, सदा-सर्वदा, युग से युग तक, और यीशु मसीह के द्वारा।" पौलुस का आशय इस बात पर बल देना है कि कलीसिया सदा बनी रहेगी, और संसार में सदा एक बचा हुआ दल रहेगा। इस प्रकार उद्धार का सन्देश कभी व्यर्थ नहीं होगा, और सदा ऐसे लोग होंगे जो उस अपार दया का दर्पण बन सकें जो परमेश्वर ने हम पर हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा दिखाई है।
सो हम सन्त पौलुस का अभिप्राय समझ लेते हैं, जो हमें निश्चय दिलाता है कि यद्यपि शैतान परमेश्वर की स्मृति को मिटाने और कलीसिया को अस्त-व्यस्त करने के लिये अपनी सारी शक्ति लगा दे, तो भी अन्ततः हमारे प्रभु यीशु मसीह का अनुग्रह ही प्रबल होगा। कलीसिया बनी रहेगी, और हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग, अत्याचारियों की क्रूरता और शत्रुओं की युक्तियों के होते हुए भी, चाहे वे घरानों के भीतर हों या सारे भवन को ढा देना चाहते हों, प्रभावशाली बने रहेंगे। इसी कारण सन्त पौलुस यीशु मसीह के नाम पर बल देता है।
यह सच है कि हम परमेश्वर का धन्यवाद केवल यीशु मसीह के द्वारा ही कर सकते हैं, क्योंकि उसके बिना हम किसी भी भलाई को पाने के योग्य न होते। स्वभाव से हम परमेश्वर के बैरी हैं, और यद्यपि वह अविश्वासियों के प्रति भी उदार है, तो भी इससे उनका दण्ड और बढ़ता ही है, क्योंकि, जैसा सन्त पौलुस अन्यत्र कहता है, "अशुद्ध लोगों के लिये सब कुछ अशुद्ध है।" इसलिये हम परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता यीशु मसीह के नाम के बिना कभी प्रकट नहीं कर सकते, जिसके द्वारा हमें सब अच्छी वस्तुएँ मिलती हैं।
परन्तु इस खण्ड में सन्त पौलुस का मुख्य सन्देश हमें यह समझाना है कि परमेश्वर का अभिप्राय अपने एकलौते पुत्र के द्वारा सारी मानवजाति के सामने अपने आपको पिता के रूप में प्रकट करना था। उसने अपने पुत्र को ठहराया कि वह ऐसा मेल-मिलाप स्थापित करे जो अनन्तकाल तक बना रहे। हमें इस बात का निश्चय होना चाहिए कि परमेश्वर इस संसार में अपने सत्य को थामे रखेगा और अपने लिये सदा एक झुण्ड इकट्ठा रखेगा, जहाँ उसके नाम की प्रार्थना की जाएगी।
अब हम इस खण्ड के दूसरे भाग की ओर चलें, जहाँ सन्त पौलुस इस बात पर बल देता है कि यह पर्याप्त नहीं कि हमने बीते समय में परमेश्वर की भलाई का अनुभव किया है। हमें इस आशा से भरे होना चाहिए कि परमेश्वर आगे भी हम पर अपनी दया दिखाता रहेगा। इसी कारण सन्त पौलुस कहता है कि परमेश्वर "हमारी बिनती या समझ से कहीं अधिक, बहुतायत से सब कुछ करने में समर्थ है।" यहाँ सन्त पौलुस का सन्देश एक चेतावनी है कि यदि परमेश्वर ने बीते समय में हम पर बड़ी दया दिखाई है, तो हमें इसमें सन्देह नहीं करना चाहिए कि वह आगे भी ऐसा ही करता रहेगा। परमेश्वर चंचल मनुष्यों के समान नहीं है, और हमें यह भय नहीं रखना चाहिए कि बड़े-बड़े उपकार करने के बाद उसकी आशीषें सूख जाएँगी। इसके विपरीत, परमेश्वर के पास आशीषों की बहुतायत है, और जितना अधिक हम पाते हैं, उतनी ही उसकी बहुतायत बढ़ती जाती है।
इसलिये, परमेश्वर ने हमें जो भलाई दी है उसे पहचानने और उसका आदर करने के लिये अपने को तैयार करने हेतु, हमें सदा पूरी रीति से इस बात का निश्चय और दृढ़ विश्वास रखना चाहिए कि हम उसे पिता के रूप में पाएँगे, क्योंकि उसने ऐसा होने की प्रतिज्ञा की है। जब सन्त पौलुस परमेश्वर की सामर्थ्य की बात करता है, तब हमें उसे निष्क्रिय सामर्थ्य नहीं समझना चाहिए, जैसा संसारी लोग प्रायः समझते हैं।
वे सहज ही मान लेते हैं कि परमेश्वर सर्वशक्तिमान है, परन्तु इस बीच वे उस पर भरोसा कम से कम करते जाते हैं। उन्हें ऐसा लगता है कि वह स्वर्ग में विश्राम कर रहा है, या जब तक उसे उनकी याद न आए तब तक वह इस संसार के कार्यों की चिन्ता नहीं करता। परन्तु जब परमेश्वर हमसे अपनी सामर्थ्य की बात करता है, तो इसलिये कि हम उसे उन सब संकटों, रुकावटों और सन्देहों के विरुद्ध अपनी ढाल बना लें, जिन्हें शैतान हमारी आँखों के सामने रखता है ताकि हम परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर सन्देह करें।
उदाहरण के लिये, जब कहा जाता है कि इब्राहीम ने परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता पर विश्वास किया, तो वह कोई अस्पष्ट विश्वास नहीं था, वरन परमेश्वर की असीम सामर्थ्य का उस प्रतिज्ञा पर लागू होने के सन्दर्भ में विश्वास था जो उसे दी गई थी। प्रतिज्ञा यह थी कि उसके वंशजों के द्वारा पृथ्वी की सारी जातियाँ आशीष पाएँगी। इब्राहीम ने अपने आप को देखकर जाना कि वह एक ऐसा मनुष्य है जो तेजी से क्षीण हो रहा है और मृत्यु के द्वार पर खड़ा है। उसकी पत्नी जीवन भर बाँझ रही थी, और वह सन्तान जनने की आयु से भी आगे निकल चुकी थी। परमेश्वर की दी हुई प्रतिज्ञा नितान्त असम्भव प्रतीत होती थी। तो फिर इब्राहीम ने परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर अटल विश्वास क्यों रखा? इसलिये कि उसे परमेश्वर की उस असीम सामर्थ्य पर विश्वास था जो सब बाधाओं और रुकावटों पर जय पा सकती है। इब्राहीम ने परमेश्वर की सामर्थ्य को अपनी ही स्थिति पर लागू किया, यह मानते हुए कि परमेश्वर का सत्य और उसकी सामर्थ्य अविभाज्य हैं।
इसी प्रकार विचार करो कि प्रेरित पौलुस ने परमेश्वर का सन्देश सौंपे जाने के विषय में क्या लिखा। पौलुस अपने आप को एक निर्बल और असुरक्षित प्राणी के रूप में देखता था। उसका पीछा किया जाता था और उसे तुच्छ जाना जाता था, और जो सन्देश वह लिए फिरता था उससे घृणा की जाती थी और उसका विरोध होता था। उसका जीवन निरन्तर जोखिम में था, और उसके सामने अनगिनत कष्ट थे जो उसे दबा सकते थे। बन्दीगृह में पड़े और मृत्यु का सामना करते हुए भी, उसने इतनी परीक्षाओं और चुनौतियों पर जय कैसे पाई? वह जानता था कि परमेश्वर उसकी आत्मा का रखवाला है, और उसने परमेश्वर की उस असीम सामर्थ्य पर भरोसा रखा जो उन सब बातों को पूरा कर सकती है जो वह चाहता है।
इसलिये आओ, हम यह पाठ सीखें, क्योंकि पुराने और नए नियम दोनों में इस पर बल दिया गया है। इस सन्देश का बार-बार दोहराया जाना बिना कारण नहीं है। हम प्रायः निर्बल होते हैं और सहज ही डगमगा जाते हैं, इसलिये जब परमेश्वर हमारी रक्षा करने की प्रतिज्ञा भी करता है, तब भी थोड़ी-सी विपत्ति हमें शीघ्र निराश कर देती है। परन्तु यदि हम सचमुच परमेश्वर की सर्वशक्तिमान सामर्थ्य का आदर करते और उसे मानते, तो जो कुछ हमारे विरुद्ध दिखाई देता है उसका हम साहस से सामना करते। क्योंकि जैसा पौलुस ने कहा, "यदि परमेश्वर हमारी ओर है, तो हमारा विरोधी कौन हो सकता है?" हम यह भी देखते हैं कि दाऊद ने अपने सब शत्रुओं और मृत्यु तक को कैसे ललकारा, जब उसने कहा, "चाहे मैं घोर अन्धकार की तराई में और कब्र के भीतर भी चलूँ, तो भी मैं सुरक्षित रहूँगा, क्योंकि परमेश्वर मेरा चरवाहा है, और उसकी चरवाहे की लाठी मुझे चलाएगी।" दूसरी जगह वह कहता है, "यदि दस हज़ारों शत्रु मुझे चारों ओर से घेर लें, तो भी मैं न डरूँगा।" और क्यों? क्योंकि परमेश्वर मेरे साथ है। यदि हम परमेश्वर की सामर्थ्य पर उतने ही दृढ़ता से विश्वास करते जितना उसे अपने मुँह से मानते हैं, तो हम सहज ही घबरा न जाते, न हमारा विश्वास हर छोटी धमकी पर डगमगाता। इसलिये आओ, हम यह निष्कर्ष निकालें कि चूँकि हम इतने निर्बल हैं और छोटी-छोटी बातें हमें भयभीत कर देती हैं, इसलिये परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता का हमारा अंगीकार हमारे हृदय से नहीं निकलता। अतः हमें सचेत प्रयत्न करना चाहिए कि इस पाठ को दिन-रात अपने भीतर बैठाएँ और उसका अभ्यास करें, ताकि हम सचमुच उसका अनुभव कर सकें।
यह बात हमें इतनी बार इसलिये कही जाती है कि हम उसे बड़े महत्व की नहीं समझते। परन्तु जब हमारा प्रभु बार-बार हमें बताता है कि सब कुछ उसके हाथ में है, कि वह अपनी सृष्टि पर जैसा चाहे वैसा शासन करता है, और कोई बात उसके उद्देश्यों या उसकी प्रतिज्ञाओं की पूर्ति को रोक नहीं सकती, तो इसलिये कि हम उसकी प्रतिज्ञाओं को वह महत्व दें जिसकी वे अधिकारी हैं। जब हम अपने आप को निराशा के कगार पर पाएँ, और शैतान हमसे ऐसे घोर युद्ध करे कि हमें न बच निकलने का मार्ग दिखे, न अपने कष्टों का अन्त, तब हमें इस पर विचार करना चाहिए। वह कौन है जिसने कहा और हमारा रक्षक होने की प्रतिज्ञा की? क्या वह सर्वशक्तिमान नहीं, जो एक ही श्वास से शैतान की सारी युक्तियों को उड़ा सकता है, चाहे सारा संसार हमारे विरुद्ध हो? यदि परमेश्वर ने हमारा पक्ष लेना स्वीकार किया है, तो कोई हमारा क्या बिगाड़ सकता है? इस प्रकार हमें परमेश्वर की सामर्थ्य को सारे संसार से ऊपर ऊँचा उठाना चाहिए, ताकि हम उसकी प्रतिज्ञाओं में विश्राम पा सकें।
परमेश्वर का वचन और उसमें जो कुछ कहा गया है उसे पूरा करने की उसकी सामर्थ्य, ये दोनों अलग नहीं किए जा सकते। जब कभी हम सन्देह करते या डगमगाते हैं, यह सोचते हुए कि क्या वह हमारी रक्षा करने में समर्थ है जैसी उसने प्रतिज्ञा की है, तब हम परमेश्वर की निन्दा करते हैं। क्योंकि उसने प्रतिज्ञा की है, इसलिये इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह उसे पूरा करेगा, नहीं तो उसकी सामर्थ्य घट जाएगी, जो असम्भव है। इसी कारण सन्त पौलुस यहाँ परमेश्वर की सामर्थ्य की बात करता है। भविष्यद्वक्ता भी, जब उस टाट की बात करते हैं जो परमेश्वर विश्वासियों को मृत्यु से छुड़ाने के लिये, जब वे उसमें डूब जाएँ, सदा तैयार रखता है, तो प्रायः कहते हैं, "क्या वही परमेश्वर नहीं जिसने आकाश और पृथ्वी दोनों को बनाया?" यह दूर की बात लग सकती है, परन्तु जब मैं संकट में हूँ और केवल परमेश्वर की करुणा में शरण ढूँढ़ रहा हूँ, और वह मुझसे कहता है कि उसने आकाश और पृथ्वी को बनाया, तो ऐसा प्रतीत होता है कि वह मुझे दूर भेज रहा है और परमेश्वर की आशीष से हटाकर धूप में खड़ा कर रहा है।
परन्तु परमेश्वर के इस कथन का, कि उसने आकाश और पृथ्वी को बनाया, आशय यह बताना है कि वह अपनी सृष्टि पर शासन भी करता है, हमारी चिन्ता अपनी सन्तान के रूप में करता है, और ऊपर-नीचे की सब वस्तुओं पर अधिकार रखता है। वह सब कुछ अपनी इच्छा के अनुसार चलाता है, और कोई बात उसके नियन्त्रण से बाहर नहीं। इसलिये यदि वह ऐसा कहता है, तो हमें तुरन्त उसे अपने लाभ के लिये लागू करना चाहिए और इसमें सन्देह नहीं करना चाहिए कि उसकी सामर्थ्य सर्वोपरि है और जो कुछ हमारे विरुद्ध दिखाई देता है उसे जड़ से उखाड़ने में समर्थ है। परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को और उन्हें पूरा करने की उसकी सामर्थ्य को हमें सदा इसी प्रकार जोड़कर रखना चाहिए। सन्त पौलुस कहता है कि परमेश्वर हमारी बिनती या समझ से परे सब कुछ कर सकता है, और यह बिना कारण नहीं कि वह हमारे उद्धार से सम्बन्धित हर बात को इसमें सम्मिलित करता है। क्योंकि जो एक बात के लिये परमेश्वर पर भरोसा रखता है, वह यह प्रश्न करने में नहीं झिझकेगा कि क्या वह दूसरा या तीसरा उपकार भी जोड़ेगा। इसलिये सन्त पौलुस चाहता है कि हम सब कुछ अपने परमेश्वर के हाथ से आशा रखें।
वह कहता है, "हमारी बिनती से बढ़कर;" यह सच है कि जब परमेश्वर हमारी सहायता और अगुवाई कर रहा हो, तब हमें यह सोचकर सो नहीं जाना चाहिए कि उसका हाथ उसके उपकारों से भरा रहेगा। परन्तु यदि हम उसके वचन पर विश्वास करते हैं, तो हमें अपने विश्वास के सच्चे प्रमाण के रूप में उसके लिये प्रार्थना करने को भी प्रेरित होना चाहिए, जब हम अपने परमेश्वर की शरण लेते हैं। इसी कारण कहा गया है कि विश्वासियों को अपनी सारी चिन्ता उसकी गोद में डाल देनी चाहिए, इस बात की सच्ची गवाही के रूप में कि अपनी हर आवश्यकता के समय हम उसी की शरण में जाते हैं, जो चाहता है कि हम अपना सारा कल्याण केवल उसी में ढूँढ़ें।
इसलिये विश्वासियों को प्रार्थना में लगे रहना चाहिए, जैसा सन्त पौलुस एक और स्थान पर कहता है, जहाँ वह हमें प्रार्थना और विनती के लिये उभारता है, और यह परिश्रम हमारे सामने रखता है कि हम आलसी न हों। यदि हम अपने आप को पूरी तरह परमेश्वर से प्रार्थना करने में लगा भी दें, तो भी परमेश्वर को हमारी बिनतियों से बढ़कर करना और हमारी आवश्यकता से कहीं अधिक हमारे लिये करना ही होगा। इसके प्रमाण में, जब कोई विश्वासी अपनी निर्बलताओं को अनुभव करता है, तो वह तुरन्त अपने आप को दीन करके परमेश्वर की शरण लेगा, केवल एक बार नहीं, वरन घण्टे के हर क्षण। इसके बाद भी वह शरीर और आत्मा दोनों के लिये उसे खोजता रहेगा, और चाहे वह ऐसा बहुत बार करे, यह अधिक नहीं है। मुझे इस पर बल देना चाहिए कि विश्वासी उन दुःखों की भली-भाँति जाँच करें जिनके वे अधीन हैं, ताकि अपने आप को परमेश्वर से प्रार्थना करने के लिये उभारें।
तो भी हमें शैतान को तुच्छ नहीं समझना चाहिए, जिसके पास बहुत-सी चालें हैं जो हमें दिखाई नहीं देतीं, और परमेश्वर को उनके लिये प्रबन्ध करनेवाला पाया जाना चाहिए, नहीं तो हमारा क्या होगा? यद्यपि हम अनेक बातों को अपने को पीड़ित करते हुए अनुभव कर सकते हैं, फिर भी बहुत-सी दूसरी बातें ऐसी हैं जो हमसे अज्ञात और छिपी हुई हैं। इसलिये यह सदा सच रहेगा कि परमेश्वर हमारी सब प्रार्थनाओं और इच्छाओं से बढ़कर है। इस एक बात को ध्यान में रखो: हम जितना हम से हो सके उतना निरन्तर परमेश्वर की शरण में जाएँ, परन्तु साथ ही इस बात का पूरा निश्चय भी रखें कि वह हम पर दृष्टि रखनेवाला पाया जाएगा, और हमारी आवश्यकताओं और हमारी सहायता के उचित साधनों को पहचानने में हमसे कहीं अधिक जागरूक होगा। ये सब बातें उसी को सौंप दी जानी चाहिए, जैसा मैंने पहले भजन संहिता से कहा था।
इसलिये जब वह यह जोड़ता है, "हमारी समझ से परे," तो वह दिखाता है कि यद्यपि मनुष्य, सुसमाचार से प्रकाशित होकर, अपने आप पर अविश्वास करना और भय के साथ चलना सीखते हैं, और अपनी ही दुर्दशा से दीन हो जाते हैं, तो भी वे उसका एक अंश मात्र ही देख पाते हैं। शेष परमेश्वर पर छोड़ना चाहिए, और हमें उसके हाथ से उससे अधिक की आशा रखनी चाहिए जितनी हम कल्पना कर सकते हैं। इससे यह भी प्रकट होता है कि परमेश्वर पर भरोसा रखने और अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ उससे माँगने में हम बहुत आगे नहीं बढ़ सकते। फिर भी हमें इस स्वतन्त्रता का मूर्खतापूर्ण उपयोग नहीं करना चाहिए कि अपनी शारीरिक अभिलाषाओं से प्रेरित होकर परमेश्वर से यह या वह माँगें। हमें अपने आप को पूरी तरह उसके हाथ सौंप देना चाहिए, और विशेषकर प्रार्थना में अपनी ही लालसाओं से लड़ना चाहिए ताकि हम बहुत अधिक माँगनेवाले न बन जाएँ। हम देखते हैं कि उनके साथ क्या हुआ जिन्होंने अपनी इच्छाओं की पूर्ति की माँग की; इस्राएलियों को तब तक माँस खिलाया गया जब तक वे फटने को न हो गए।"
परन्तु माँस अभी उनके गले में ही था कि परमेश्वर का क्रोध और बदला उन पर आ पड़ा। उनके लिये यह उससे अच्छा न होता कि उनकी बिनती अस्वीकार कर दी जाती। इसलिये जब हम प्रार्थना करें, तो हमें ऐसी छूट नहीं लेनी चाहिए कि कहें कि परमेश्वर को हमारी भावनाओं और अभिलाषाओं के अधीन होना चाहिए। इसके बजाय, हमें उससे उन्हीं बातों को माँगना चाहिए जिनकी उसने हमसे प्रतिज्ञा की है, और अपने आप को निश्चय दिलाना चाहिए कि वह हमारी बिनतियों को स्वीकार करेगा। जैसा मैंने पहले कहा, हम यह भय न रखें कि हम बहुत अधिक हो जाएँगे, क्योंकि हम देखेंगे कि वह इससे भी अधिक करेगा। सो हमें यही करना चाहिए, और जब हम उसकी प्रतिज्ञाओं पर भरोसा रखें तो हमें ढिठाई या अहंकार के दोष लगाए जाने से डरना नहीं चाहिए।
सचमुच, यदि लोग अपने आप पर उससे अधिक भरोसा करें जितना परमेश्वर का वचन सहन करेगा, या उचित सीमा से परे आशाओं में लिप्त हों, तो ऐसी आशाएँ निःसन्देह उन्हें भटका देंगी। परन्तु यदि हम परमेश्वर के सत्य में, जो निश्चित और अकाट्य है, अपने आप को दृढ़ करें, तो आओ हम उस पर अटल भरोसा रखें, और इसमें सन्देह न करें कि वह उसे पूरी रीति से, वरन उससे भी अधिक पूरा करेगा। जैसा मैंने पहले कहा, परमेश्वर यहाँ हमारे साथ है। तब हम देखते हैं कि इस सन्दर्भ में स्मरण रखने की बातों में से एक यह है कि हमें परमेश्वर की आशीषों पर विचार करना चाहिए, न केवल उन पर जिनका अनुभव हमने स्वयं किया है, वरन उन पर भी जो सारे संसार में प्रकट हैं। उन्हें हमें परमेश्वर के नाम की स्तुति करने के लिये प्रेरित करना चाहिए और सब विश्वासियों के बीच एक मधुर समस्वर गान उत्पन्न करना चाहिए, कि उसकी सारी कलीसिया पर उसने जो जो उपकार किए हैं उनके लिये परमेश्वर का आदर करें।
फिर, हमें आशा रखनी चाहिए कि जो कार्य उसने आरम्भ किया है उसे वह जारी रखेगा, और चूँकि हम उसकी दया को तब पहले ही अनुभव कर चुके हैं जब हम उससे दूर थे और निराशा की गहराइयों से छुड़ाए गए, इसलिये हमें इसमें सन्देह नहीं करना चाहिए कि जो आशीषें हमने आंशिक रूप से पा ली हैं उन्हें वह जारी रखेगा और बढ़ाएगा। अपनी प्रार्थनाओं में हमें उन अनेक आवश्यकताओं पर भी विचार करना चाहिए जो हमें उसकी ओर फिरने को विवश करती हैं, और यह पहचानना चाहिए कि वह हमारे लिये हमारी इच्छा से कहीं अधिक करेगा। हम निर्बल-मन और अनाड़ी हैं, और नहीं जानते कि हमारे लिये क्या सबसे अच्छा है। परन्तु परमेश्वर इसका उपचार दो रीतियों से करता है: पहला, हम में अकथनीय आहें उत्पन्न करके, जैसा वह रोमियों 8 में अधिक पूर्णता से समझाता है, और दूसरा, हमें अपना अनुग्रह प्रदान करके, ताकि वह न केवल हमारी विनतियों का उत्तर दे, वरन अपनी दया के द्वारा हमसे पहले ही कार्य करे, तब भी जब हम अपनी दुर्दशा में हैं और जो कुछ हमें चाहिए उसका दसवाँ भाग भी नहीं पहचानते।
अब इसी आधार पर पौलुस विश्वासियों को उस बुलाहट के योग्य चाल चलने के लिये उत्साहित करता है जिसके लिये वे बुलाए गए हैं। यह केवल इसलिये नहीं कि वे अपने मुँह से परमेश्वर का धन्यवाद करें, जैसा वह उनसे आग्रह करता है, वरन इसलिये भी कि वे जो आत्मिक वरदान पाते हैं उनसे अपना लाभ करें और उन्हें परमेश्वर की महिमा के लिये काम में लाएँ। क्योंकि यदि हम परमेश्वर की स्तुति का प्रचार करें, परन्तु लोग हमारे जीवन में परमेश्वर का आदर और सेवा करने की कोई लगन न देखें, तो वह केवल दिखावा होगा, और ऐसा अंगीकार खोखला और व्यर्थ होगा जब हमारा जीवन उसके अनुरूप न हो। इसलिये पौलुस यहाँ उचित ही यह जोड़ता है कि लोगों को उस बुलाहट के अनुसार चाल चलनी चाहिए जिससे वे बुलाए गए हैं।
इस विषय में हमें पहले यह ध्यान देना चाहिए कि स्वभाव से हम सुस्त हैं, इसलिये हम में सदा बहुत अधिक आलस्य और ठण्डापन रहता है। परमेश्वर की आज्ञाकारिता में अधिक उत्साहित होने के लिये हम अपने आप को उभारने का इससे उत्तम उपाय नहीं पा सकते कि उसकी उस असीम दया पर मनन करें जो उसने हम पर दिखाई है। इस विषय में पौलुस रोमियों 12 में विश्वासियों को सीखने के लिये तत्पर होने और परमेश्वर पर भरोसा रखने का आग्रह करता है। वह उनके सामने उस दया को रखता है जो उन्होंने उसके हाथ से पाई है। मानो वह यह कह रहा हो कि जब कभी हम वह पत्थर सुनें जिसे हटाया जाना चाहिए, या उस अपार भलाई पर विचार करें जो परमेश्वर ने हम पर यह करके दिखाई कि उसने अपने एकलौते पुत्र को न छोड़ा वरन हमारे उद्धार के लिये उसे सौंप दिया, और उसे बलिदान के रूप में चढ़ाए जाने दिया ताकि हमारे अपराधों और कुकर्मों की स्मृति मिट जाए, तो यह हमारे हृदयों को गहराई से छू ले।
इसलिये इस खण्ड में वह सत्य कहता है जब वह परमेश्वर की बुलाहट को हमारी आँखों के सामने रखता है। परमेश्वर की सेवा और आदर करने के लिये स्वभाव से भी यह पर्याप्त बाँधनेवाली शक्ति है, क्योंकि हमारा जीवन उसी से है और हम उसी के पालन-पोषण से जीवित हैं।
हम देखते हैं कि उसकी सब सृष्टि कैसे हमारी सेवा करती है। परमेश्वर की इच्छा के अनुसार अपने जीवन को चलाने के लिये यह ऋण पर्याप्त बड़ा है। परन्तु परमेश्वर केवल हमें संसार में रख देना और हमारी शारीरिक आवश्यकताओं का प्रबन्ध करना ही पर्याप्त नहीं समझता। वह हमें अपनी सन्तान भी बना लेता है, और अपनी कलीसिया में, जो उसका घर है, हमारा पालन-पोषण करता है। हमें गोद लेकर वह हमें स्वर्ग की विरासत सौंपता है और उसका निश्चय दिलाता है, क्योंकि उसने हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह को बयाने के रूप में दिया है। यह जानना कि परमेश्वर ने अपने असीम प्रेम से हमें इतना कुछ दिया है, हमारे भीतर वह आग भड़काए कि हम उसकी ओर दौड़ें। अपने आप का और अधिक त्याग करते हुए, हमें अपने आप को पूरी तरह उसे सौंप देने का प्रयत्न करना चाहिए, ताकि वह हमारे सारे जीवन का पूरा उपयोग कर सके। हमारा एकमात्र उद्देश्य उसके नाम को ऊँचा उठाना होना चाहिए। सन्त पौलुस इसी बात पर बल दे रहा था जब उसने कहा कि वह चाहता है कि इफिसियों के लोग उस बुलाहट के योग्य चाल चलें जिससे परमेश्वर ने उन्हें बुलाया था।
इसलिये हम इस खण्ड से यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि अपने भीतर की सुस्ती पर जय पाने और विशेषकर उस हठ को वश में करने के लिये, जो हमें सब बातों में परमेश्वर को प्रसन्न करने से रोकता है, हमें अपना ध्यान उस असीम अनुग्रह की ओर लगाना सीखना चाहिए जो परमेश्वर ने हम पर किया है। उसने हमें अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा आत्मिक आशीषों का सहभागी बनाया है, हमें अपनी देह के अंग होने दिया है और हमें अपनी सन्तान और वारिस के रूप में गोद लिया है।
फिर, हमें उस उद्देश्य पर विचार करना चाहिए जो परमेश्वर के मन में था, ताकि उसे हमें वैसे न डाँटना पड़े जैसे उसने अपने भविष्यद्वक्ता यशायाह के द्वारा इस्राएलियों को डाँटा था। उसने उनकी कृतघ्नता की शिकायत की, और उन्हें उस दाख की बारी या बहुमूल्य दाख की बारी के समान ठहराया जिसकी उसने देखभाल की थी। उसकी देखभाल के होते हुए भी, उन्होंने जंगली अंगूर और कड़वे फल को छोड़ और कुछ न उपजाया। हमें स्मरण रखना चाहिए कि परमेश्वर के पास आज भी हमें डाँटने का कारण है, जैसा उसके पास उनके लिये था। यदि प्राचीन इस्राएलियों को बड़े-बड़े दान मिले, तो हम, अपने प्रभु यीशु मसीह के आगमन के बाद से, परमेश्वर का धन्यवाद करने और उसे मानने के और भी अधिक ऋणी हैं। विचार करो कि जो उसने हमारे पुरखाओं को प्राचीन काल में प्रतीकों और छायाओं के द्वारा दिया था, वह उसने आज हमें वास्तविकता और सार के रूप में दिया है। हम समय की पूर्णता में जी रहे हैं, जिसमें परमेश्वर की यह इच्छा रही है कि वह अपनी सब आशीषें हम पर भरपूरी से उँडेले। इसलिये यदि हम कृतघ्न हों और परमेश्वर ने हमारे लिये जो भलाई की है उसे न पहचानें, तो हम कम क्षमा के योग्य होंगे। हमें यही बात ध्यान में रखनी चाहिए।
इसके अतिरिक्त, हमें यह समझना चाहिए कि हमारे प्रभु ने, सिमोन पतरस के समान, हमें मृत्यु के पंजे से छुड़ाया है और अपने ज्योतिर्मय राज्य में बुलाया है। उसने यह इसलिये किया कि हम उसके गुणों का प्रचार करें और अपना सारा जीवन उसकी पूरी से पूरी बड़ाई करने में समर्पित करें, इस वर्तमान खण्ड के अनुसार, जो कहता है कि हमें उस बुलाहट के अनुरूप जीवन बिताना चाहिए जिससे परमेश्वर ने हमें बुलाया है।
अब हमारा यह महत्वपूर्ण इकट्ठा किया जाना और अपनी ओर खींचा जाना, मानो परमेश्वर हमें एक नया संसार बनाना चाहता हो, यह वास्तव में हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग के द्वारा पूरा हुआ। उद्देश्य यह था कि हमें संसार की अशुद्धताओं से अलग किया जाए। चूँकि हम परमेश्वर के द्वारा अलग किए गए और उसके लिये समर्पित किए गए हैं, इस अभिप्राय से कि हमें अपनी विरासत बनाए, इसलिये हम उसके उद्देश्य में उसे निराश न करें। यदि हम सचमुच ज्योति की सन्तान हैं, जैसा वह अन्यत्र कहता है, तो हम अविश्वासियों के समान अन्धकार में न चलें। वरन जो अनुग्रह हमने पाया है उसका प्रभावी उपयोग करें। "बुलाहट" शब्द के विषय में हमें सार रूप में यही स्मरण रखना है। संक्षेप में, यदि हम अपने आप को परमेश्वर की अगुवाई और अधीनता में रखने का प्रयत्न न करें, तो हम अज्ञानी और अन्धे प्राणियों से कहीं अधिक दोषी ठहरेंगे।
सच तो यह है कि वर्तमान युग में संसार का कोई कोना ऐसा नहीं जो भयावह सीमा तक भ्रष्ट न हो। वे लोग भी, जिन्होंने कभी सुसमाचार का सामना नहीं किया परन्तु निरन्तर अन्धविश्वास में डूबे रहे, परमेश्वर की ओर से उचित रूप से दण्ड पाएँगे। जहाँ तक हमारा सम्बन्ध है, यह निश्चित है कि हमें और भी बड़ा लेखा देना होगा, क्योंकि परमेश्वर ने अपने वचन से हमें प्रकाशित किया है। जब दूसरे विनाश में भटकते फिरते हैं, तब उसने हमें उद्धार का मार्ग दिखाया है, और हमें प्रतिदिन अपने और निकट बुलाता और लुभाता है। इसलिये हमें इस विशेषाधिकार पर सावधानी से विचार करना चाहिए और उस ज्योति को बुझाना नहीं चाहिए, न उस विशेष अनुग्रह को, जो हमें दिया गया है, एक ओर फेंक देना चाहिए। इसके विपरीत, हमें उसकी सेवा करने के लिये और भी अधिक प्रेरित होना चाहिए। तो भी हमें इस बात पर ध्यानपूर्वक ध्यान देना चाहिए कि प्रेरित पौलुस हमें क्या सलाह देता है। वह कहता है कि यह पूर्ण अधीनता, दीनता, धीरज और कोमलता के साथ किया जाना चाहिए। इससे उसका अभिप्राय यह प्रकट करना है कि यह पर्याप्त नहीं कि हर एक व्यक्ति अकेले अपना कर्तव्य करने का प्रयत्न करे। हमें अपने पड़ोसियों और भाइयों की ओर भी हाथ बढ़ाना चाहिए, ताकि हमारे बीच एक सामान्य सहमति से परमेश्वर की सेवा हो।
इसलिये हमें यह समझना चाहिए कि जैसा सन्त पौलुस कहता है, यह हर व्यक्ति को अलग-अलग सम्बोधित नहीं है। वरन यह कलीसिया की सारी देह और समुदाय को सम्मिलित करता है। मानो वह कह रहा हो, "मेरे मित्रो, यह पर्याप्त नहीं कि हम में से हर एक बुराई से हट जाए, उससे दूर रहे, और परमेश्वर के भय में और खराई से जीने का उत्साह दिखाए। हमें एक दूसरे की चिन्ता भी करनी चाहिए और इस बात का पूरा निश्चय रखना चाहिए कि यदि हम दूसरों को भी ऐसा ही करने के लिये प्रोत्साहित करने का हर सम्भव प्रयत्न न करें, तो परमेश्वर की सेवा करना पर्याप्त नहीं है। इसलिये जो आगे चलता है वह अपने पड़ोसी की ओर हाथ बढ़ाए, और हम मिलकर आगे बढ़ें। जो बलवन्त हैं वे निर्बलों की सहायता करें, आवश्यकता पड़ने पर उन्हें सँभालें, ताकि हम सब परमेश्वर के और निकट खिंच आएँ। यह न केवल हर नगर और गाँव के भीतर किया जाना चाहिए, वरन उनके प्रति भी जिन्हें हम व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते। तो भी वे हमारे प्रभु यीशु मसीह की देह के अंग हैं, और हमें उनके लिये दर्पण और आदर्श बनना चाहिए, उन्हें भक्तिमय जीवन के लिये प्रोत्साहित करते हुए, यह मार्ग दिखाकर कि वे हमारा अनुसरण करें।
फिर, ऐसा करके हम अपना भी लाभ करें। यदि हम दूसरों को अपने से अधिक सद्गुणी, उत्साही और दृढ़ देखें, तो हमें लज्जित होना चाहिए और अपने मन में सोचना चाहिए, "जब दूसरे परमेश्वर की ओर इतने साहस और उत्सुकता से बढ़ रहे हैं, तो मैं कैसे पीछे रह सकता हूँ?" इसलिये मुख्य बात जो हमें इससे ग्रहण करनी है यह है कि चूँकि परमेश्वर ने हमें अलग-अलग या एक-एक करके नहीं बुलाया, वरन अपनी वाणी हम सब की ओर निर्देशित की है, और चाहता है कि वह हमारे बीच एक पवित्र बन्धन हो, इसलिये हमें उसे उत्तर देना चाहिए, केवल अपने मुँह से नहीं, वरन अपने सारे जीवन से। हमारे बीच सच्ची एकता होनी चाहिए, और हमें यत्न करना चाहिए कि परमेश्वर की सर्वत्र शुद्धता से आराधना हो। चूँकि हम सब एक ही विरासत के लिये बुलाए गए हैं, इसलिये हमें एक दूसरे को भाई-बहिन समझना चाहिए। चूँकि हम परमेश्वर को अपना पिता कहते हैं, इसलिये उचित है कि हम अपने सिर, अर्थात् अपने प्रभु यीशु मसीह से जुड़े रहें। जब हम उससे जुड़े होंगे, तो निश्चय ही उनसे कटे हुए न होंगे जिन्हें उसने अपनी देह में सम्मिलित किया है। हाथ पाँव को तुच्छ न जाने, न पाँव हाथ को ठुकराए। चूँकि हम जानते हैं कि हमारा जीवन केवल यीशु मसीह पर निर्भर है, इसलिये हमें एक दूसरे को सँभालने का प्रयत्न करना चाहिए। हमें परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह शैतान के सब आक्रमणों के विरुद्ध हमें दृढ़ करे और हमें बाँटने के उसके प्रयत्नों को विफल करे। हमें अटल संकल्प के साथ लड़ते रहना चाहिए और उस मार्ग पर चलते रहना चाहिए जो परमेश्वर ने हमें दिखाया है, जब तक हम उस विरासत तक न पहुँच जाएँ जिसकी उसने हमसे प्रतिज्ञा की है और जिसे उसने हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा इतने मूल्य पर मोल लिया है।
अब आओ, हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने दीन हों, अपने पापों को मानते हुए और यह प्रार्थना करते हुए कि वह हमें सच्चे पश्चाताप की ओर खींचे। हम अपनी ही दृष्टि में पूरी तरह गिराए जाएँ, केवल इसलिये कि उसकी सेवा करने के लिये फिर उठाए जाएँ। यह केवल एक दिन के लिये नहीं वरन हमारे सारे जीवन भर के लिये हो। जैसे उसका अनुग्रह कभी घटता नहीं, वैसे हम भी उसकी सेवा करना कभी न छोड़ें। उसके दान हमें अधिकाधिक प्रज्वलित करें कि हम उसके और निकट आएँ और उससे दृढ़ता से जुड़ जाएँ। आओ, हम सब कहें, "सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता, इत्यादि।"
