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तैंतीसवाँ उपदेश, चौथे अध्याय पर तेरहवाँ और पाँचवें अध्याय पर पहला
"सब प्रकार की कड़वाहट, और क्रोध, और रोष, और कोलाहल, और निन्दा सब बैरभाव समेत तुम से दूर की जाए। और एक दूसरे पर कृपालु और करुणामय हो, और जैसे परमेश्वर ने मसीह में तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी एक दूसरे के अपराध क्षमा करो।
इसलिए प्रिय बालकों के समान परमेश्वर का अनुकरण करो। और प्रेम में चलो, जैसे मसीह ने भी तुम से प्रेम किया, और हमारे लिए अपने आप को सुखदायक सुगन्ध के लिए परमेश्वर के आगे भेंट करके बलिदान कर दिया।" - इफिसियों 4:31 - 5:2
हम जानते हैं कि परमेश्वर की सब सन्तानों को न केवल स्वयं शान्तिप्रिय होना चाहिए, वरन् यथाशक्ति शान्ति के लिए यत्न भी करना चाहिए, और जहाँ मतभेद और झगड़ा हो वहाँ मेल-मिलाप कराना चाहिए। यह हमारे प्रभु यीशु मसीह के उदाहरण के अनुसार है। इसलिए यदि हमें उन लोगों को, जिनके मन में एक दूसरे के प्रति शिकायतें हैं, इकट्ठा करना और भाईचारे का मेल-मिलाप बढ़ाना है, अथवा जब वे खीझ और आवेश से भरे हों तब उनके क्रोध को शान्त करना है, तो पहले हमें यह निश्चित कर लेना चाहिए कि हम स्वयं झगड़े और उथल-पुथल से मुक्त हों, और चिल्लाने, चीखने और आग-बबूला होने से दूर रहें। निःसन्देह पौलुस ठीक ही कहता है कि सब प्रकार की कड़वाहट, रोष, क्रोध और बुरी बातें विश्वासियों से दूर की जानी चाहिए, और साथ ही हर प्रकार का बैरभाव भी। वह बैरभाव को उस जड़ के रूप में बताता है जिससे उसके कहे हुए फल उत्पन्न होते हैं। बैरभाव से उसका अर्थ वह आत्मकेन्द्रितता है जिसके कारण मनुष्य दूसरों से कट जाता है और उनकी भावनाओं का कोई ध्यान नहीं रखता। क्योंकि जो मनुष्य अपने आप से अत्यधिक प्रेम रखता है, वह अवश्य ही अपने पड़ोसियों को तुच्छ जानेगा और उन्हें इस प्रकार ठुकरा देगा कि किसी भलाई के लिए कोई स्थान ही न रहे। अतः यदि हम झगड़े और विवाद से बचना चाहते हैं, तो हमें इसी बैरभाव को दूर करने से आरम्भ करना होगा।
इसी बैरभाव से कड़वाहट उत्पन्न होती है, जो तब प्रकट होती है जब हम चिड़चिड़े और जल्दी भड़कनेवाले हो जाते हैं। इस कड़वाहट की जड़ अपने आप को बड़ा समझने की भावना में है, जिसमें हम अपने आप को सब से ऊँचा मानते हैं और दूसरों को हेय जानते हैं। जब हम घमण्ड से इतने फूल जाते हैं कि सोचने लगते हैं कि संसार हमारे ही चारों ओर घूमता है, और ज़रा-सी असुविधा से भी रुष्ट हो जाते हैं, तब हम हर बात को बुरी दृष्टि से देखते हैं और निर्दयता दिखाने के अवसर ढूँढ़ते रहते हैं। बहुत से लोग इसी रीति में पड़ जाते हैं; वे न केवल तब क्रोधित होते हैं जब उनके साथ अन्याय हो, वरन् ऐसा जान पड़ता है कि वे सदा शिकायत करने का कोई न कोई कारण खोजते ही रहते हैं। चाहे कोई उन्हें प्रसन्न करने और उनकी इच्छाएँ पूरी करने का पूरा प्रयत्न करे, तो भी वे किसी न किसी बात में असन्तुष्ट ही रहते हैं। यदि उनसे पूछा जाए कि वे सदा असन्तुष्ट क्यों रहते हैं, तो इसका एकमात्र उत्तर उनकी अपनी हठ और उस घमण्ड में है जो दूसरों के प्रति उनकी घृणा को भड़काता है। सारांश यह कि उनमें कड़वा स्वभाव और अपने विषय में फूला हुआ विचार उत्पन्न हो गया है, जिसके कारण वे अपनी ही इच्छाओं को बहुत ऊँचा मानते और दूसरों को तुच्छ जानते हैं।
अतः, जैसा पौलुस ने हमें दिखाया है, शान्ति बनाए रखने और झगड़ों से बचने का सच्चा उपाय यह है कि हम अपने आप को कड़वा होने से बचाएँ और अपने आप को बड़ा समझने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाएँ। जैसे वैद्य अपने रोगी को ज्वर या किसी और रोग से सावधान रहने की सलाह देता है, वैसे ही हमें भी अपने आप को जाँचना और अपनी प्रवृत्तियों को पहचानना चाहिए, और उन बातों को जान लेना चाहिए जो हमें भटका सकती हैं। तब हम सचेत रहें, क्योंकि यदि हम ऐसा न करें, तो हम रोग या अन्य संकटों में पड़ने का जोखिम उठाते हैं। जब हम शरीर के स्वास्थ्य के लिए चिकित्सा की सलाह मानने में परिश्रमी हो सकते हैं, तो अपनी आत्मिक कुशलता के लिए दिए गए निर्देशों के पालन में भी हमें वैसा ही परिश्रमी होना चाहिए।
जब बात आत्मा की आती है, तो हम लापरवाह हो जाते हैं, जिससे प्रकट होता है कि हम अपने उद्धार को मूल्यवान नहीं समझते। यह लापरवाही इसलिए होती है कि हम यह नहीं पहचानते कि एक ओर तो शैतान निरन्तर हमें धोखा देने का यत्न कर रहा है, और दूसरी ओर हम ऐसे निर्बल हैं कि जब तक प्रभु हमें अपने वचन से सज्जित न करे, हम बुराई का सामना नहीं कर सकते। इसलिए यहाँ दिए गए निर्देश पर ध्यान देना अत्यन्त आवश्यक है: कि हम मेल-मिलाप से रहें, विवाद और झगड़े से बचें। सब से पहले, हमें अत्यधिक स्वप्रेम से अन्धे नहीं होना चाहिए, वरन् घमण्ड को दूर करने का यत्न करना चाहिए, जिससे हम अपने पड़ोसियों को मूल्यवान जानें और उनके साथ नम्रता से रहें। इस रीति से हम कड़वे और चिड़चिड़े नहीं होंगे, और हर छोटी बात पर बुरा नहीं मानेंगे। इस सन्दर्भ में पौलुस हमें सिखाता है कि जब हम बैरभाव और कड़वाहट को दूर कर चुके हों, तब हमें अपने क्रोध को बढ़कर रोष और भड़कावे में भी नहीं बदलने देना चाहिए। वह उन अचानक के क्रोध के आवेगों की बात करता है जिनके कारण लोग उतावली से काम करते हैं और बाद में पछताते हैं। इससे बचने के लिए हमें आत्म-संयम का अभ्यास करना चाहिए। जब हम संयमी होते हैं, तब हम अपने क्रोध को सरलता से ठण्डा कर सकते हैं, यहाँ तक कि बुझा भी सकते हैं। परन्तु जब हम रोष से भर जाते हैं, तब कोई रोक नहीं रहती और हमारे क्रोध की कोई सीमा नहीं रहती। इसलिए यहाँ की मुख्य शिक्षा यह है कि परमेश्वर की सन्तान को शान्ति और मेल से रहना चाहिए। इसे पाने के लिए हमें अपनी भावनाओं को वश में रखने का यत्न करना और क्रोध तथा कड़वाहट के परिणामों को समझना चाहिए।
यह समझना अत्यावश्यक है कि हमारा चिड़चिड़ा स्वभाव हमें कहाँ ले जाता है; वह हमें शैतान की पकड़ में ले जाता है, जहाँ हम अपने ऊपर से नियन्त्रण खो देते हैं और बिना विवेक के काम करते हैं। इसलिए हमें सचेत रहना चाहिए और शैतान को अवसर नहीं देना चाहिए, जैसा पहले कहा जा चुका है। झगड़े और विवाद से बचते हुए हमें अपने मन को कड़वाहट और चिड़चिड़ेपन से शुद्ध करना सीखना चाहिए। इसके लिए हमें उनका सच्चे मन से आदर करना चाहिए जो हमारे साथ जुड़े हैं और जिनके साथ हम बँधे हैं। अन्ततः हमें एक दूसरे के प्रति कोमल, कृपालु और विनम्र होना चाहिए, क्योंकि यह पहले बताई गई कड़वाहट और बैरभाव का उपाय है। पौलुस फिर उसी मूल सिद्धान्त पर लौटता है कि हम मनुष्य होने के नाते परमेश्वर के स्वरूप में रचे गए हैं। सुसमाचार पर विश्वास करने से हम नए किए जाते हैं और उसके स्वरूप में नया बनाए जाते हैं। यह सत्य हमें कोमलता दिखाने के लिए प्रेरित करे। हमें जानना चाहिए कि हम किसी को भी तुच्छ जानकर परमेश्वर का अनादर किए बिना नहीं रह सकते, क्योंकि प्रत्येक मनुष्य उसी के स्वरूप में बना है। यह असह्य है कि कोई नश्वर मनुष्य अपने आप को इतना ऊँचा उठाए कि अपने सृजनहार की भी अवहेलना करे। इस व्यवहार के लिए कोई उचित बहाना नहीं हो सकता। परमेश्वर ने मनुष्य को ऐसे अनुपम स्वभाव के साथ रचकर उसे आदर दिया है। उचित यही है कि हम उसकी महिमा के प्रति श्रद्धा और आदर दिखाएँ, और उन्हें न रौंदें जो हमारे सामने उसका प्रतिनिधित्व करते हैं।
फिर, यदि मनुष्य अपने आप को ध्यान से जाँचे, तो वह अपने सब पड़ोसियों में अपना ही स्वभाव झलकता देखेगा। संसार के सब से प्रतिष्ठित लोग भी यह दावा नहीं कर सकते कि वे आदम की शेष सन्तान से भिन्न किसी वस्तु के बने हैं। जब ऐसा है, तो हम इतने घमण्डी क्यों हों कि उन्हें तुच्छ जानें जो हमारे ऐसे सम्बन्धी हैं कि यह बन्धन टूट नहीं सकता? विश्वासियों के विषय में एक और विशेष कारण भी है। परमेश्वर ने उनमें अपने उस स्वरूप को नया किया है जो आदम के पाप से बिगड़ गया था। इसलिए हम एक दूसरे के प्रति कोमल और विनम्र होना सीखें, और ऐसे दुर्गम न हों कि कोई हमारे पास आ ही न सके, और न इतने अलग-थलग और घृणा करनेवाले हों कि अपने आप को अन्य मनुष्यों की साधारण सभा और संगति से अलग कर लें। पौलुस की कही हुई कोमलता या विनम्रता का यही अर्थ है। वह आगे "करुणा" भी जोड़ता है। यदि हम एक दूसरे पर तरस खाएँ, तो वह तरस दूर तक फैलता है और उसे उस स्रोत के रूप में देखा जा सकता है जो हमें कोमलता की ओर प्रेरित करता है। कोमल आत्मा निःसन्देह एक अद्भुत गुण है, ऐसा गुण जिसके बिना हम संसार में रह ही नहीं सकते। हम इसे अपने बीच कैसे बनाए रखें? इसका एकमात्र उपाय यही करुणा है, मन का वह स्वभाव जो हमें यह सोचने पर विवश करता है कि जब हम किसी तिरस्कृत मनुष्य को देखते हैं, तो भी वह हमारा पड़ोसी, हमारा अपना मांस और लहू है। चाहे वह तिरस्कृत हो और उसमें आदर के योग्य कुछ भी न हो, तो भी हमें विचार करना चाहिए कि जो दुर्दशाएँ उसमें हैं वे हम पर भी आ सकती हैं। इस विचार से हमारे मन उस मनुष्य के साथ सहानुभूति रखने को प्रेरित होंगे जिसके साथ औरों की तुलना में इतना बड़ा अन्याय हुआ है, चाहे वह शारीरिक दुर्बलता के कारण हो या मानसिक रोग के कारण। यह हमें दुःखी करेगा और उसकी दशा पर तरस खाने के लिए हमें उभारेगा; और यही हममें कोमलता का सार है, जो करुणा से पोषित होती है। यदि हम किसी दीन-दुःखी से मिलें जो पीड़ित है या शारीरिक रोग के कारण धीरे चलता है, तो क्या हम उसका तिरस्कार करें? नहीं, बिल्कुल उलटा। यदि हम जंगली पशुओं के समान सर्वथा निर्दय न हों, तो कम से कम इतना तो होना चाहिए कि हम उसकी दशा पर तरस खाएँ, यदि हम अपना कर्तव्य निभा रहे हों। इसी प्रकार, यदि किसी में बुद्धि या समझ की कमी हो, जो सौ में से एक बात भी मुश्किल से समझ पाता हो और श्वेत और श्याम में भेद न कर सके, तो उस पर तरस न खाना केवल अपनी ही क्रूरता के कारण हो सकता है, जो हमें उस साधारण दया को भुला देती है जो हम सब को एक साथ बाँधती है। इसलिए करुणा की एक छोटी-सी बूँद भी हमें अपने सम्बन्धियों को ठुकराने से और तरस और दया के योग्य लोगों को तुच्छ जानने से रोक लेगी। हर अवस्था में और हर समय हम अपने पड़ोसियों के प्रति स्वाभाविक रूप से कोमल और विनम्र होंगे। संक्षेप में, जैसे वे दुर्दशाएँ जिन्हें परमेश्वर हममें जानता है उसे हम पर दया करने को प्रेरित करती हैं, वैसे ही हमारे पड़ोसियों की दुर्दशाएँ हमारे लिए उन्हें करुणा दिखाने को उभारने वाली अंकुश बनें। इतना ही नहीं, उनके दोष भी हममें क्रोध और रोष न भड़काएँ, वरन् अपने पड़ोसियों पर तरस खाने का अवसर बनें। उदाहरण के लिए, यदि कोई मेरे साथ बुरा करता है, तो प्रायः शैतान ही उसे ऐसा करने को उकसाता है, और वह अभागा मनुष्य परमेश्वर के क्रोध को अपने ही ऊपर भड़काकर केवल अपनी ही हानि करता है।
अब यदि मुझमें उस साधारण स्वभाव के सिवाय और कुछ न होता जिससे परमेश्वर ने हम सब को बाँधा है, तब भी जब मैं किसी प्राण को शैतान की चालाकी से धोखा खाकर विनाश की ओर जाते देखता, तो मेरा हृदय टूटे बिना न रहता। सचमुच, हमें अपने साथ किए गए अन्यायों को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए, और न इतना उत्तेजित होना चाहिए कि भटके हुओं पर तरस न खाएँ। क्योंकि वे शैतान द्वारा अन्धे किए गए हैं, परमेश्वर के क्रोध को भड़का रहे हैं और अपने ही उद्धार के विरुद्ध काम कर रहे हैं। विचार करो: जो उपाय हमें कोमल बनाता है वह यही है कि हम करुणामय हों और तरस खाएँ, जैसा पिछले अंशों में कहा गया है। हम में से कोई ऐसा नहीं जो यह न चाहे कि उसके साथ सहनशीलता का व्यवहार किया जाए, जिसके बिना हमारे लिए इस संसार में एक दिन भी टिके रहना कठिन होता। हम में से जो सब से सिद्ध हैं, उनमें भी कुछ दुर्बलताएँ हैं, यहाँ तक कि यदि सब उनके साथ कठोरता से पेश आएँ, तो वे तुच्छ और अपमानित ठहरेंगे। और फिर ऐसा मनुष्य कहाँ मिलेगा जिसमें बहुत सी त्रुटियाँ न हों, जिनके कारण दूसरों को धीरज धरना पड़ता है, न कि कुछ दोषों के कारण उसे ठुकरा देना, जिनसे दूर हट जाना उचित लग सकता है? यदि हम दूसरों से आशा रखते हैं कि वे हम पर धीरज धरें, तो क्या हमें भी दूसरों पर दया नहीं दिखानी चाहिए? जब हम किसी में कोई दोष या त्रुटि देखें, तो क्या हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि हम भी उसी में पड़ सकते हैं? भली-भाँति जाँचने पर हम अपने ही भीतर और अधिक ऐसी बातें पाएँगे जो दोषी ठहराए जाने के योग्य हैं। तो भी हम आशा रखेंगे कि हमारे साथ सहनशीलता का व्यवहार हो, चाहे हम बहुत अधिक दोषी ठहरें। इसलिए जैसे हम चाहते हैं कि दूसरे हमें क्षमा करें, वैसे ही हमें उन पर दया करना सीखना चाहिए, क्योंकि वे भी हमसे बढ़कर स्वर्गदूत नहीं हैं। सन्त पौलुस यही बताना चाहता था। उसने निष्कर्ष निकाला कि हमें एक दूसरे को क्षमा करना चाहिए, क्योंकि जहाँ करुणा नहीं होती, वहाँ हम हर छोटी बात को अत्यधिक जाँचने लगते हैं और बहुत अप्रसन्न हो जाते हैं, जैसा अनुभव ने बहुत बार दिखाया है। इस प्रकार छोटी से छोटी उत्तेजना भी हमें अशान्त कर देती है, क्योंकि हमारे हृदय में तरस नहीं है। परन्तु यदि हम दया से द्रवित हों, तो हम सहज ही क्षमा कर देंगे और बहुत सी बातों को अनदेखा जाने देंगे। इतना ही नहीं, हम सरलता से भड़केंगे नहीं, वरन् हमें रोक रखनेवाला संयम होगा, और जिन्होंने हमें बहुत ठेस पहुँचाई है उन्हें फिर से मित्रता में स्वीकार करने में हम न हिचकिचाएँगे। इसलिए सन्त पौलुस हमें यही क्रम अपनाने को प्रोत्साहित करता है कि हम प्रेम तक पहुँचें और उसे बनाए रखें। सारी शिक्षा इस पर टिकी है कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं, अर्थात् हमें एक दूसरे से प्रेम करना और भली एकता में बँधे रहना चाहिए ताकि हमारे बीच शान्ति बनी रहे। फिर भी यह कठिन हो सकता है, क्योंकि प्रत्येक मनुष्य अपने आप को बहुत ऊँचा आँकने की प्रवृत्ति रखता है।
फिर, उनके मन भी उतने ही भिन्न हैं जितने उनके स्वभाव और दशाएँ भिन्न हैं। संक्षेप में, हमारे पास अलग हट जाने और सारी संगति से अकेले हो जाने के असंख्य कारण हैं। यदि हर मनुष्य स्वार्थ के आगे झुक जाए, तो प्रेम को हमारे बीच कभी स्थान न मिलेगा और वह हमसे दूर निकाल दिया जाएगा। तो हम क्या करें? पहले, हमें सब प्रकार की घृणा और घमण्ड से अपने आप को छुड़ाना चाहिए, जैसा मैंने पहले कहा। इसके बाद हमें कड़वाहट और चिड़चिड़ेपन से अपने आप को शुद्ध करना चाहिए। हमें यत्न करना चाहिए कि हम जल्दी क्रोधित या भड़कनेवाले न हों, वरन् अपने आप पर नियन्त्रण रखना और अपनी भावनाओं को वश में करना सीखें। परन्तु यह तभी हो सकता है जब हम कोमल और दयालु हृदय के हों। हम परमेश्वर के स्वरूप में गढ़े गए प्राणी हैं और एक अटूट बन्धन में बँधे हैं। फिर भी यह भी पर्याप्त नहीं, जब तक हम अपनी ही दुर्बलताओं और त्रुटियों को पहचानना न सीखें। हम में से प्रत्येक को अपने विषय में कठोर परखनेवाला होना चाहिए, क्योंकि हम सुधार की आवश्यकता देखते हैं और यह कि हममें बहुत से दोष हैं जो हमारे पड़ोसियों के दोषों के समान हैं। इसलिए हमें इस बन्धन की आवश्यकता है जो हमें एक साथ थामे रखे, और यह तब सम्भव है जब हम दयालु और करुणामय हों।
यदि साधारण शिष्टाचार हमें दीन-दुःखियों की सहायता के लिए विवश करे, तो उसे हमें मेल-मिलाप के लिए भी प्रेरित करना चाहिए। जब हमारे प्रभु यीशु ने हमें दयालु होने का उपदेश दिया, तो वह केवल भूखों और प्यासों को खाना-पानी देने या दुर्दशा में पड़े हुओं की सहायता करने के लिए ही नहीं था। यद्यपि ये सब कार्य उसमें सम्मिलित हैं, तथापि उसका मुख्य अभिप्राय यह दिखाना था कि की गई भूलों को क्षमा करने में दया दिखाई जाए। हमें इतने कठोर नहीं होना चाहिए कि उन्हें पूरी तरह ठुकरा दें जो सर्वथा प्रशंसनीय नहीं हैं या जिनमें हम बहुत से दोष देखते हैं। हमें चापलूसी में भी नहीं पड़ना चाहिए, क्योंकि सच्ची मित्रता उसे सहन नहीं करती; अन्त में वह हमारे लिए हानिकारक ही होगी। यदि एक मनुष्य दूसरे का मित्र हो और उसे खाने-पीने में इतनी छूट दे कि वह अपने ही विनाश का कारण बन जाए, तो क्या हम सचमुच कह सकते हैं कि उसकी चापलूसी और मूर्खतापूर्ण लालसाओं को बढ़ावा देना मित्रता का कार्य है? नहीं।
इसलिए यदि हम किसी दीन मनुष्य को सिर के बल विनाश में गिरने पर देखें और उसे खींच लाने का यत्न न करें, तो हम अपनी मित्रता दिखाते नहीं, वरन् उसके साथ विश्वासघात करते हैं। जिस करुणा तक हमारे प्रभु यीशु ने हमें उठाया है, वह इसलिए नहीं कि चापलूसी के द्वारा हम अपनी दुर्बलताओं में निष्क्रिय पड़े रहें। वरन् वह हमें नियन्त्रण में रखने, हमारी कठोरता को संयत करने के लिए है, ताकि, जैसी कहावत है, हमारे सिरके में सदा तेल मिला रहे। पौलुस प्रेरित हमें यही समझाना चाहता था। यद्यपि हर मनुष्य करुणामय होने का यत्न करे और अपने पड़ोसी के प्रति किसी अत्यधिक कठोरता से बचे, तो भी यह हमारे स्वभाव के विरुद्ध है। जैसा मैंने पहले कहा, हमारा स्वप्रेम हमें इतना अन्धा कर देता है कि हम छोटे से छोटे अपराधों को क्षमा न किए जा सकनेवाले पाप और अपराध समझते हैं। फलस्वरूप, यदि कोई हमें क्रोधित करे, तो हम उसके दोष को क्षमा से परे मान लेते हैं। इस प्रकार सच्ची नम्रता मनुष्यों में बहुत कम पाई जाती है, जब तक वे अपनी ही प्रवृत्तियों से अपनी पूरी शक्ति से संघर्ष न करें। इस विषय में केवल शिक्षा पर्याप्त नहीं होगी। हमारी रूखाई हमारे हृदयों में गहरी जमी है। चाहे हमारा कर्तव्य हमें स्पष्ट रीति से समझाया भी जाए, तो भी वह हम पर थोड़ा ही प्रभाव डाल सकता है। पौलुस ने इसे समझाने के लिए परमेश्वर का उदाहरण लिया, यह दिखाते हुए कि परमेश्वर ने हमें अपने एकलौते पुत्र के द्वारा क्षमा किया। उसने तुरन्त जोड़ा कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने, जिसने हमारे छुटकारे और उद्धार के लिए अपने आप को नहीं छोड़ा, हमारी कठोरता को तोड़ने, हमारी अत्यधिक उत्कट लालसाओं को संयत करने, हमारी क्रूरता को सुधारने, हमारे घमण्ड और अहंकार को नम्र करने और हमारी कड़वाहट को मधुर बनाने की कुंजी दी है। यह सब पूरा करने के लिए हमें अपने प्रति परमेश्वर के व्यवहार को देखना चाहिए। उसने जगत से ऐसा प्रेम किया कि हमारे लिए अपना एकलौता पुत्र बलिदान कर दिया। जब हम अपनी तुलना परमेश्वर से करते हैं, तो हमारे बीच की दूरी अपार है। इसलिए बड़े से बड़े अन्याय जो हमारे साथ किए जा सकते हैं, वे परमेश्वर के विरुद्ध किए गए छोटे से छोटे अपराध की तुलना में कुछ भी नहीं हैं। परमेश्वर की इच्छा के छोटे से छोटे अंश को भी तोड़ना उसके सर्वोच्च प्रभुत्व को चुनौती देना, उसकी महिमा का उल्लंघन और उसकी धार्मिकता का अपमान है, जो मेरे विचार में इतनी बहुमूल्य है कि उसका दुरुपयोग नहीं किया जा सकता। किस मनुष्य या वस्तु को इतना पवित्र कहा जा सकता है कि यदि उसके साथ बुरा किया जाए, तो उसे परमेश्वर की धार्मिकता का उल्लंघन माना जाए? अब हमारे पास अपने आप को दोषी ठहराने का भरपूर कारण है कि हम परमेश्वर की वैसी सेवा नहीं करते जैसी करनी चाहिए। हम आरम्भ से ही, यहाँ तक कि अपनी माता के गर्भ से ही, उसके शत्रु थे। जैसे-जैसे हमारी आयु बढ़ती है, हम निरन्तर दुष्टता, पापमयता और अधर्म में बढ़ते जाते हैं। तो भी इस सब के होते हुए, परमेश्वर ने अपनी असीम दया को रोक न रखा, और हमारे पास अपना एकलौता पुत्र भेज दिया। जब हम इस पर विचार करते हैं, तब सारा घमण्ड एक ओर रखा जाए, कड़वाहट शान्त की जाए, हठ वश में की जाए, और बैरभाव हमारे हृदयों से मिटाया जाए। सब प्रकार का झूठ दूर किया जाए। सचमुच, हमारी हठीली चाल का कारण क्या है? क्यों ऐसा होता है कि एक बार किसी मार्ग पर चल पड़ने के बाद हम अपने आप को विवाद और झगड़े की ओर इतनी सरलता से धकेलने से नहीं रुकते, यहाँ तक कि सारा घर हमारे झगड़ों से गूँज उठता है? समस्या की जड़ हमारी कृतघ्नता है, क्योंकि हम अपने प्रति परमेश्वर की अतुलनीय भलाई पर मनन नहीं करते। उसने अपने एकलौते पुत्र को नहीं छोड़ा, यद्यपि हम उसके घोर शत्रु थे, उससे युद्ध कर रहे थे और अपने भीतर की भ्रष्टता के कारण स्वभाव से ही शापित थे। इस सब के होते हुए भी, जैसा मैंने पहले कहा, हम परमेश्वर की दया का सचमुच अनुभव नहीं कर सकते जब तक हम करुणा से द्रवित न हों और अपने हृदयों को बदला लेने की उस शापित लालसा से शुद्ध न करें। ये ही बातें सन्त पौलुस की माँगों को इतना कठिन, वरन् हमारे स्वभाव के सर्वथा विपरीत, और परमेश्वर के हस्तक्षेप के बिना असम्भव बनाती हैं।
तो भी, जो घोषणा यहाँ हमारे सामने रखी गई है, उसका हम पर इतना प्रभाव होना चाहिए कि हम सब अन्याय भूल जाएँ। क्योंकि मान लो कि दूसरे मनुष्य ने मेरा अपराध किया। तो क्या? जब मैं परमेश्वर के सामने आऊँगा, तो क्या मैं अपनी धार्मिकता और निर्दोषता की घोषणा कर सकूँगा? हाय, मुझमें इतने अधर्म और अपराध हैं कि मैं घबरा जाऊँगा। यदि मेरे विरुद्ध किया गया एक दोष क्षमा के योग्य नहीं, तो क्या वे दस लाख, हाँ पूरे दस लाख, जो मैंने परमेश्वर के विरुद्ध किए हैं, कुछ भी नहीं? उस परम प्रभुता की तुलना में मैं क्या हूँ? इसलिए सन्त पौलुस की इस चेतावनी के अनुसार, जब कभी किसी अप्रसन्नता या अन्याय के कारण हम अधीर हो उठें, यहाँ तक कि बदला लेने की इच्छा करें, तो आओ हम अपने होश सँभालना और यह विचार करना सीखें कि हम कौन हैं।
सब से पहले, यदि किसी मनुष्य ने हमारे विरुद्ध कोई दोष किया है, तो हमने भी वही या उससे भी बुरा किया है। दूसरी ओर, आओ हम विचार करें कि परमेश्वर ने हमें कैसे छुड़ाया है, विशेष करके अपने एकलौते पुत्र के बहाए हुए लहू की उस अति बहुमूल्य गारण्टी के द्वारा। क्या हम उसके योग्य थे? फिर, परमेश्वर को हम पर इतना दयालु होने के लिए किस बात ने प्रेरित किया? हमारी दीनता के सिवाय और कुछ नहीं। अब जब उसने, जो इतना भला है और हमारे स्वभाव का नहीं है, हमारी दीनता पर तरस खाया, तो हम क्या करें? क्या हमें एक दूसरे पर और भी अधिक तरस नहीं खाना चाहिए, क्योंकि हम अपने ही भीतर वे बातें पाते हैं जिन्हें हम अपने पड़ोसियों में क्षमा करते हैं? परमेश्वर अपने आप में कोई निर्बलता नहीं पा सकता, और तब वह हमें क्षमा करने के लिए कैसे प्रेरित होगा? सचमुच, इसलिए कि वह सारी भलाई और दया का सोता है।
परन्तु जब मैं अपने में और अपने पड़ोसी में वही दोष देखता हूँ, और यदि मैं अपने आप को भली-भाँति जाँचूँ, तो वही या उससे भी अधिक पाऊँगा। क्या ये सब बातें मुझे कुछ करुणा दिखाने के लिए नहीं मनाएँगी, यदि मैं अपने आप को बहुत अधिक न भूल जाऊँ? बहुत से दोषों को सरलता से क्षमा करने और अपने पड़ोसियों के उन बहुत से अवगुणों को सह लेने का, जो हमें अप्रिय लग सकते हैं, उपाय यह है कि हम उस अनमोल प्रेम पर दृष्टि डालें जो परमेश्वर ने अपने पुत्र के द्वारा हम पर दिखाया है।
जैसा मैंने पहले कहा, यदि हम इतने कृतघ्न न होते, तो हमारे बीच एक भिन्न प्रकार की कोमलता होती, और हम अपने साथ हुए हर अन्याय पर इतनी जल्दी झगड़ा न करते। क्योंकि उस अनुग्रह पर, जो हमें अपने प्रभु यीशु मसीह में दिया गया है, जो हमें प्रकाशित करने के लिए दिन का सूर्य है, भोर और साँझ, दिन और रात विचार न करना पशुओं का सा काम होगा। क्या हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि वह अपनी आत्मिक ज्योति हम पर चमकाता है ताकि हमें उद्धार की ओर ले चले? और यह परमेश्वर की दया के सिवाय और किस रीति से होता है?
फिर, जब हम उस कृपा को देखते हैं जो परमेश्वर इस वर्तमान जीवन में हमें बनाए रखने में दिखाता है, तो क्या हम इस योग्य हैं कि उसे उसकी हानि पर पाएँ? नहीं, यह सब हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा मिलता है। इसलिए हमें शोभा देता है कि अपने विश्राम में और अपने परिश्रम में, खाते समय और पीते समय, सोते और जागते दोनों में, परमेश्वर की उस दया पर सदा विचार करें जो वह हम पर दिखाता है और उसे अपना निरन्तर अभ्यास बनाकर मन में रखें।
यह अनुग्रह विशेष करके तब हमारी आँखों के सामने रहना चाहिए जब हम परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं। क्योंकि यदि हम अपने प्रभु यीशु मसीह में उसकी मुफ़्त दी हुई भलाई के द्वारा उसकी ओर नहीं खींचे जाते, तो हम कैसे उसके पास निःसंकोच आ सकते, अपनी सारी चिन्ताएँ और दुःख उसकी गोद में उँडेल सकते और उसे अपना पिता कह सकते? वह हमारे अपराध क्षमा करता है।
यदि हम इन सब बातों पर विचार न करें, तो हम बहुत मन्दबुद्धि और पशु-समान ठहरेंगे। इससे स्पष्ट होता है कि यदि हम परमेश्वर की सन्तान, उसके घराने के और विश्वासयोग्य सन्तान होने का घमण्ड करें, तो हम सदा भूल में रहेंगे।
यदि हम क्षमा करने को इच्छुक और प्रसन्न नहीं हैं, तो हम अपने औपचारिक बाहरी रूप का घमण्ड कर सकते और दूसरों से आदर पा सकते हैं, परन्तु फिर भी अपने आप को लज्जित करेंगे। इसलिए यदि हम क्षमा करने में अनिच्छुक हैं, तो इसलिए कि हम अपने परमेश्वर की उस असीम भलाई पर विचार नहीं करते जो वह हमारे प्रभु यीशु मसीह में दिखाता है। सन्त पौलुस यही प्रभाव उत्पन्न करना चाहता था। उसने जोड़ा कि हमें प्रिय बालकों के समान परमेश्वर का अनुकरण करनेवाले होना चाहिए।
कोई उत्तर दे सकता है, "यह सच है कि परमेश्वर की दया हमें चकित और विस्मित कर देनी चाहिए, क्योंकि वह अद्भुत बात है, और हमारे सारे मनोभाव उसी पर लगे होने चाहिए। परन्तु क्या हम परमेश्वर के समान हो सकते हैं?" नहीं, क्योंकि वह सारी भलाई का स्रोत है, और हम दोषपूर्ण और असंयमी हैं। परमेश्वर में सारी भलाई की परिपूर्णता है, जबकि हमारे स्वभाव में उसकी एक बूँद भी नहीं। तो भी इस सब के होते हुए, सन्त पौलुस यह वाक्यांश जोड़ता है, "परमेश्वर का अनुकरण करनेवाले बनो।" अर्थात् उसके पीछे चलो, उसे अपना आदर्श या नमूना बनाओ।
यद्यपि परमेश्वर स्वयं भलाई का सार है और हममें बुरी प्रवृत्तियों के सिवाय कुछ नहीं, जैसे द्वेष, बैरभाव, घमण्ड और उग्र लालसाएँ, तो भी हमें अपने आप को उसके सर्वथा विरुद्ध नहीं समझना चाहिए। यद्यपि आदम के पाप ने हमें परमेश्वर से अलग कर दिया, फिर भी हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि हमारा स्वभाव बदल नहीं सकता, जब परमेश्वर हमें अपने पास इकट्ठा करने और बिखरी हुई वस्तुओं को फिर से जोड़ने के लिए अपना हाथ बढ़ाता है। इसलिए सन्त पौलुस कहता है, "परमेश्वर के प्रिय बालकों के समान," यह दिखाने के लिए कि यदि हम एक दूसरे को सहने के द्वारा, जैसा हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमें सिखाया, परमेश्वर को भलाई से उत्तर न दें, तो हमारे मुँह बन्द हो जाएँगे। अपने स्वर्गीय पिता के पीछे चलो, जो अपना सूर्य भले और बुरे दोनों पर उदय करता है।
यह कहना कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं, उसे पुकारना, मसीही कहलाना, और फिर भी परमेश्वर से तुच्छ ठहरना, जबकि हम दिखाते हैं कि हम उससे कोई गुण नहीं पाते, हमारे स्वभाव के विरुद्ध है। हमें अपने आप को धोखा नहीं देना चाहिए। हमें जानना चाहिए कि जब हम परमेश्वर के समान नहीं होते और फिर भी उसकी सन्तान गिने जाना चाहते हैं, तो हम न केवल कपट से भरे हैं, वरन् निर्लज्ज भी हैं।
यद्यपि हर बात में परमेश्वर के पूरे समान होना असम्भव है, तो भी हमें हियाव नहीं हारना चाहिए। हमें स्मरण रखना चाहिए कि पवित्र शास्त्र कहता है कि यदि हम परमेश्वर के वचन के अनुसार यत्न करें, तो चाहे हम अपने लक्ष्य तक न पहुँचें, परमेश्वर हमारी इच्छा और प्रयास को ग्रहण करता है जब हम आगे बढ़ने का निरन्तर यत्न करते रहते हैं, चाहे हम धीमे, निर्बल हों और ठोकर खाएँ। जब हम उसके समान होने की इच्छा करते हैं, जब हम उस लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं, तो चाहे हम चूक जाएँ, परमेश्वर हमारी त्रुटियों को हमारे विरुद्ध नहीं गिनता। इससे हमें साहस मिलना चाहिए।
यदि हमसे अपेक्षा की जाती कि हम हर बात में बिन्दु-बिन्दु परमेश्वर के समान हों, तो यह असम्भव होता। स्वर्गदूत भी, जो पूर्णतः पवित्र हैं और परमेश्वर की महिमा से चमकते हैं, परमेश्वर की सिद्धता से बहुत पीछे हैं। फिर हमारा क्या, जो इतने भ्रष्ट और दोषपूर्ण हैं, दुष्टता से भरे हैं, और उन असंख्य दोषों और परीक्षाओं से रुके हुए हैं जो शैतान हमारे मार्ग में रखता है? तो भी हमारे पास आनन्द करने का कारण है क्योंकि प्रभु हमें सहता है और हमारे सब कार्यों को भले भाव से ग्रहण करता है जब तक हम उसकी ओर यत्न करते रहते हैं। उसके अनुकरण का मार्ग यही है, जैसा उसने आज्ञा दी है। हमें बहुतों के समान सो नहीं जाना चाहिए, यह कहते हुए कि "मैं परमेश्वर के समान होना चाहूँगा," और फिर केवल इच्छा ही करते रहें। वरन् हमें प्रतिदिन और प्रति घड़ी विचार करना चाहिए कि परमेश्वर के सच्चे समान बनने में हमने कितना थोड़ा लाभ पाया है। हमें इसके लिए अपने आप को दोषी ठहराना और मानना चाहिए कि यद्यपि कल हममें कुछ सद्भाव था, वह बढ़ा नहीं, वरन् और ठण्डा पड़ता दिखता है। इसी रीति से हमें परमेश्वर की ओर अपनी यात्रा जारी रखनी चाहिए।
हमें अपने आप को उभारना और उन बाधाओं से लड़ना चाहिए जो हमें रोकती हैं, ताकि हम अपने लक्ष्य के निकट बढ़ने का यत्न करें, चाहे हम अब भी उससे दूर हों। हमारा प्रभु हमें सदा अपने समान और अपने सच्चे अनुयायी गिनने में चूकेगा नहीं, यदि हम जिन्होंने हमारा अपराध किया है उन्हें स्वेच्छा से और कपट के बिना क्षमा करें, कम से कम उसके उदाहरण पर चलकर। उसने हमें ऐसी क्षमा दी है जो उन सब नमूनों से बढ़कर है जो हमारे बीच मिल सकते हैं। हमें अपने पड़ोसियों के दोषों और निर्बलताओं को वैसे ही सहना चाहिए जैसे उसने हमें सहा है। वह न्यायपूर्वक हमें गहराइयों में गिरा सकता था, तो भी उसने हमें अपनी सन्तान बनाने में संकोच नहीं किया। इसलिए जब उसने हमारी अयोग्यता के होते हुए भी हमसे इस प्रकार प्रेम किया, तो उचित ही है कि इस विषय में हम उसका अनुकरण करें।
यदि हमारे पास अपने स्वाभाविक जन्म से बढ़कर कोई विशेषाधिकार न होता, तब भी हमें पहचानना चाहिए कि परमेश्वर ने हमें एक दूसरे से अलग नहीं किया। अन्यजाति भी इस धारणा को समझते थे, क्योंकि वे मानते थे कि मनुष्य का जीवन परमेश्वर को समर्पित और उसके स्वरूप में ढला होना चाहिए। वे इसे सुख का परम रूप मानते थे। इतना ही नहीं, उन्होंने जोड़ा कि हम किसी बात में परमेश्वर के समान उससे अच्छा नहीं हो सकते जितना एक दूसरे के प्रति दयालु होने, भलाई करने और करुणामय होने में।
इसलिए आओ हम विचार करें कि परमेश्वर ने हमें अपने प्रिय बालक बनाया है, यद्यपि हम पहले उसके शत्रु थे, गन्दगी से भरे और बहुत से दोषों के बोझ से दबे हुए। तो भी उसने हमसे प्रेम करने में संकोच न किया। तो यह केवल उचित है कि हम बहुत सी ऐसी बातों को अनदेखा करें जो हमें ठेस पहुँचा सकती और हमारे पड़ोसियों के साथ हमारे प्रेम और एकता में बाधा डाल सकती हैं।
सन्त पौलुस, परमेश्वर के प्रेम की बात करने के बाद, हमारे प्रभु यीशु मसीह का उदाहरण भी देता है। हमारे स्वर्गीय पिता ने जगत से ऐसा प्रेम किया कि अपने एकलौते पुत्र को नहीं छोड़ा, वरन् हमारे लिए उसे मृत्यु के हाथ सौंप दिया। यीशु मसीह ने क्या किया? उसने अपने आप को भुला दिया और अपनी भलाई का विचार न किया। सारी महिमा के प्रभु ने सब प्रकार की निन्दा सहने के लिए अपने आप को दीन किया। अनन्त जीवन ने अपने आप को मरणशील बनाया। परमेश्वर की सर्वशक्तिमान सामर्थ्य ने हमारे लिए अपने आप को निर्बल किया। जिसके हाथ में सब कुछ था, वह हमें धनी बनाने के लिए कंगाल हुआ। जिसके द्वारा सब वस्तुएँ आशीषित होती हैं, उसने अपने आप को श्राप के अधीन किया।
यह देखकर कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने अपने आप को इस रीति से दीन किया, सन्त पौलुस ने उसे हमारे लिए उदाहरण के रूप में भी रखा। उसने अपनी महिमा के स्थान पर लज्जा ग्रहण की और अपनी धार्मिकता के स्थान पर पाप बन गया। इसलिए नहीं कि उसने पाप किया या उसमें कोई दोष था, वरन् उसने हमारे पापों का दण्ड उठाया, इसी कारण पवित्र शास्त्र उसे पाप कहता है। उसने जीवन को मृत्यु से बदल लिया और स्वेच्छा से इस संसार में परमेश्वर का श्राप ग्रहण किया ताकि हम उसके द्वारा आशीष पाएँ।
घमण्ड, ढिठाई, उग्रता, घृणा और कड़वाहट से अपने आप को छुड़ाने के लिए हमें विचार करना चाहिए कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमें परमेश्वर अपने पिता से कैसे मिलाया। इन सब बातों पर मनन करने से हमें इन बुरे मनोभावों को दूर करने और उनसे तब तक लड़ने की प्रेरणा मिलनी चाहिए जब तक हम उन पर जय न पा लें। इसलिए आओ हम एक दूसरे के प्रति कृपालु और धैर्यवान हों। क्योंकि परमेश्वर ने हमें एक झुण्ड में इकट्ठा किया है और हमारा प्रभु यीशु मसीह हमारा चरवाहा है, इसलिए हमें भेड़ों के झुण्ड के समान व्यवहार करना चाहिए, न कि फाड़ू भेड़ियों के समान।
क्योंकि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने कुछ भी रोक न रखा, वरन् हमारे पापों का प्रायश्चित करने के लिए अपने आप को परमेश्वर अपने पिता के लिए बलिदान के रूप में अर्पित कर दिया, इसलिए जब कभी हम इस पर विचार करें, तब हमें परमेश्वर की महिमा करने और अपने प्रभु यीशु मसीह की आराधना करने की प्रेरणा मिलनी चाहिए। जब यह कहा जाता है कि यीशु मसीह का चढ़ाया हुआ बलिदान परमेश्वर के सामने सुखदायक सुगन्ध था, तो इससे बल मिलता है कि हममें दुर्गन्ध के सिवाय कुछ नहीं है। यह इसलिए कहा गया है कि हम अपनी गन्दगी और उन संक्रामक रोगों से छूटने को उत्साहित हों जो हमें परमेश्वर के सामने घृणित बनाते हैं।
जब हम अपनी प्रार्थनाओं और विनतियों में परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित होते हैं, तब हमारे पाप हमारे विरुद्ध नहीं गिने जाने चाहिए। अपनी दीनता और पापमयता के होते हुए भी, हम इस भरोसे के साथ परमेश्वर के पास आ सकते हैं कि वह हमें धर्मी और निर्दोष जानकर अपनाएगा और हमें अपने स्वरूप में बदल देगा। यह इसलिए सम्भव है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह हमें हमारे सब दागों से शुद्ध करेगा, ताकि हम सिर ऊँचा करके उसके सम्मुख खड़े हों और उसकी दया की परिपूर्णता का अनुभव करें।
अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने घुटने टेकें, अपने दोषों को मानें और गहरे पश्चाताप के बोध के लिए प्रार्थना करें। तो भी हमें इसमें सन्देह न हो कि वह सदा हमें सहता रहेगा, और जब तक हम सच्चाई से उसे खोजें और उसके वचन पर चलकर अपने आप को उसके स्वरूप के अनुसार सुधारें, तब तक हमें दया और क्षमा देता रहेगा। इस रीति से हम सचमुच उसे अपना पिता कह सकेंगे और उसकी सच्ची सन्तान बन सकेंगे। और इसलिए हम कहते हैं, "हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता, आदि।"
