अध्याय 27

चौथे अध्याय पर पाँचवाँ, अर्थात् पच्चीसवाँ उपदेश - इफिसियों 4:11-12

Sermons on Ephesians (Modernized) · John Calvin

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चौथे अध्याय पर पाँचवाँ, अर्थात् पच्चीसवाँ उपदेश - इफिसियों 4:11-12

"और उसने कितनों को प्रेरित, और कितनों को भविष्यद्वक्ता, और कितनों को सुसमाचार सुनानेवाले, और कितनों को रखवाले और उपदेशक नियुक्त करके दे दिया; जिससे पवित्र लोग सिद्ध हों, और सेवा का काम किया जाए, और मसीह की देह उन्नति पाए।" - इफिसियों 4:11-12

हम देख चुके हैं कि यद्यपि हमारे प्रभु यीशु मसीह स्वर्ग से भी ऊपर चढ़ गए हैं, और संसार से उनकी शारीरिक अनुपस्थिति के कारण उनके और हमारे बीच बड़ी दूरी है, तथापि वे अपने पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से सदा उपस्थित रहते हैं और सब कुछ को परिपूर्ण करते हैं। इस परिपूर्णता का उद्देश्य यह है कि हर विश्वासी जन को प्रोत्साहन मिले कि वह प्रभु की ओर से दिए गए वरदानों और अनुग्रह को उन लोगों के हित के लिए नम्रता से काम में लाए जिन्हें प्रभु ने अपनी कलीसिया में अगुवाई करने के लिए ठहराया है। और इसके विपरीत, जिन्हें इन वरदानों की अधिक मात्रा मिली है, वे अपने आप को ऊँचा न समझें, वरन् परमेश्वर की सब सन्तानों की सामान्य भलाई, उद्धार और कल्याण के लिए परिश्रम करें।

संक्षेप में, पौलुस का आशय यह बताना था कि यीशु मसीह के पास सब आत्मिक धन है, फिर भी उसने उसे हम सब में बराबर नहीं बाँटा, वरन् भिन्न-भिन्न मात्रा और क्रम में बाँटा है, जैसा उसकी कलीसिया में दिखाई देता है। सब के सब भविष्यद्वक्ता, उपदेशक या सुसमाचार सुनानेवाले नहीं हैं; इससे प्रकट होता है कि मसीह ने सोच-समझकर वरदानों को नाप-नापकर बाँटा है। इसलिए जो कोई यह समझता है कि जो कुछ आवश्यक है वह सब उसी के पास है, वह दो प्रकार से अपने आप को धोखा देता है। पहला, कोई भी मनुष्य ऐसी सिद्धता को नहीं पहुँचता कि उसे दूसरों के मार्गदर्शन की आवश्यकता ही न रहे। दूसरा, जो ज्ञान में बढ़कर हैं, वे अपने वरदानों को दूसरों की भलाई के लिए काम में लाने को बाध्य हैं। और इसके विपरीत, जो कम कुशल और अज्ञानी हैं, वे अधिक समझ रखनेवालों से डाह न करें; वरन् यह जानें कि परमेश्वर की व्यवस्था का एक प्रयोजन है, और उसके आधीन हो जाएँ।

भविष्यद्वक्ता का सन्देश इस बात पर बल देता है कि हमें अपने उद्धार के लिए आवश्यक आत्मिक वरदानों से परिपूर्ण होने देना चाहिए और अपने ही जैसे मनुष्यों से मिलनेवाली शिक्षा को ठुकराना नहीं चाहिए। हमें यह मूर्खता नहीं करनी चाहिए कि प्रचार और पठन को लाँघकर स्वर्ग से प्रकाशनों की चाह करें। वरन् सब लोग हमारे प्रभु यीशु मसीह की ठहराई हुई व्यवस्था का स्वेच्छा से पालन करें। जिन्हें पवित्र शास्त्र का ज्ञान और निपुणता मिली है, वे अपने आप को सारी कलीसिया की सेवा में लगा दें, क्योंकि परमेश्वर ने इसी लिए उन्हें ऊँचा किया है। जो कम कुशल और अज्ञानी हैं, वे दूसरों से डाह न करें, वरन् यह मान लें कि वरदानों का जो वितरण परमेश्वर ने किया है, वह उनके उद्धार के लिए भलाई का कारण है।

परमेश्वर की इच्छा है कि सब वस्तुएँ साझी हों, और देह के हर अंग को अपना भाग मिले। इसलिए जब सन्त पौलुस कहता है कि यीशु मसीह ने प्रेरित, भविष्यद्वक्ता, सुसमाचार सुनानेवाले, रखवाले और उपदेशक ठहराए, तो वह यह बताता है कि सुसमाचार का प्रचार और विश्वासियों का इकट्ठा होकर पवित्र शास्त्र की व्याख्या सुनना कोई मनुष्य की गढ़ी हुई बात नहीं, वरन् ईश्वरीय विधान है। यीशु मसीह ने इसे व्यवस्था के रूप में स्थापित किया है, और इसका बिना किसी विचलन के पालन होना चाहिए। फिर भी कुछ लोग अहंकार के कारण इस जूए को उतार फेंकना चाहते हैं। वे पूछते हैं कि जब पवित्र शास्त्र उनके पास है तो अपने ही जैसे लोगों से शिक्षा क्यों लें। वे समझते हैं कि उन्हें अपना सारा ज्ञान वहीं से लेना चाहिए, और इस विषय में किसी को दूसरों से बढ़कर मानने का कोई कारण नहीं देखते।

इसका परिणाम कलीसिया में भयंकर अव्यवस्था होगा, जहाँ कोई भी स्वेच्छा से सिखाया जाना या किसी गुरु या उपदेशक को स्वीकार करना न चाहेगा, जब तक कि उसे यह विश्वास और निश्चय न हो कि यह व्यवस्था मनुष्य की गढ़ी हुई नहीं है। यह तो परमेश्वर के पुत्र की ओर से सब विश्वासियों के लिए स्थापित शासन-प्रणाली है। वह चाहता है कि जिन पर सिखाने का दायित्व है, वे उसी के भेजे हुए माने जाएँ। ऐसे उपदेशक दूसरों से उचित ही कहेंगे कि उसके उपदेश को तुच्छ जानने और उसका विरोध करने से वे उसे और उसके पिता को भी तुच्छ जानते और उनका विरोध करते हैं। इसलिए जो कोई मसीही कहलाना चाहता है, उसे कलीसिया की सन्तान भी होना चाहिए। इससे यह बात स्पष्ट होती है कि हमारे सामने प्रचार किए जानेवाले उपदेशों को ग्रहण करने में दीनता और ग्रहणशीलता कितनी आवश्यक है, और यह भी कि हमें अपने प्रभु यीशु मसीह की पाठशाला में सदा के विद्यार्थी बने रहना चाहिए।

सन्त पौलुस यह भी संकेत करता है कि जब हमारे पास ऐसे विश्वासयोग्य और परिश्रमी उपदेशक होते हैं जो हमें उद्धार के मार्ग पर चलाते हैं, तो यह इस बात का चिह्न है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमें त्यागा या भुलाया नहीं है। वह हमारे साथ है, हमारे उद्धार और कल्याण की चौकसी कर रहा है। इसलिए हमें यह नहीं मान लेना चाहिए कि लोग ईश्वरीय मार्गदर्शन के बिना अपने आप सिखाने का निर्णय ले सकते हैं। कोई मनुष्य यीशु मसीह की महिमा के लिए एक शब्द भी नहीं बोल सकता, जब तक वह उसे ऊपर से न दिया जाए, और पवित्र आत्मा उसकी वाणी का मार्गदर्शन न करे। पवित्र शास्त्र को ऐसी बुद्धि कहा गया है जो मनुष्य की समझ से परे है, और स्वाभाविक मनुष्य उसे पूरी रीति से नहीं समझ सकता। परमेश्वर को ही ये गूढ़ और उच्च बातें हमारे सामने प्रकट करनी होती हैं। इसलिए जब हम देखते हैं कि पवित्र शास्त्र की सही व्याख्या की जा रही है और उसे हमारे लाभ के लिए लागू किया जा रहा है, तो हम निश्चित हो सकते हैं कि परमेश्वर का आत्मा हमारे बीच अपनी उपस्थिति की गवाही देता है। हमें इस उत्तम दान को ग्रहण करना सीखना चाहिए, और यह मानना चाहिए कि यही वह श्रद्धांजलि है जो हमारे प्रभु यीशु मसीह हमसे माँगता है।

इसी कारण सुसमाचार को स्वर्ग का राज्य भी कहा जाता है। हम समझते हैं कि यदि हम उन साधनों के द्वारा शासित होना अस्वीकार करें जो उसने ठहराए हैं, जैसे सुसमाचार का प्रचार, तो हम परमेश्वर को अपना राजा नहीं मानते, और जब हमारे प्रभु यीशु मसीह हमारे पास भेजा जाता है तो उसका आदर भी नहीं करते। हमें सुसमाचार के उपदेश को बिना विरोध के मानना और ग्रहण करना चाहिए। जिन्हें सिखाने का भार सौंपा गया है, वे अपने कर्तव्य को विश्वासयोग्यता से निभाएँ, और शेष लोग जो उन्हें सिखाया जाए उसे स्वेच्छा से ग्रहण करें। वे अपने आप को शिक्षा पाने दें, ऐसा न हो कि अनजाने में परमेश्वर के पुत्र का विरोध कर बैठें। इसी रीति से हम जीवन भर ज्ञान में बढ़ते रह सकते हैं, जैसा आगे और विस्तार से समझाया जाएगा।

अब इसके अतिरिक्त, पौलुस भिन्न-भिन्न पदों और अधिकारियों की गणना करके और अच्छी रीति से दिखाता है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने अपने लोगों के उद्धार के लिए अपने आप को कितनी पूर्णता से समर्पित प्रकट किया है। उसने कोई ऐसी बात अधूरी नहीं छोड़ी जो उन्हें उद्धार की मीरास तक पहुँचाने के लिए आवश्यक और उचित थी।

इन अधिकारियों के विषय में, जिनका उल्लेख पौलुस करता है, यह बात ध्यान देने योग्य है कि इनमें से कुछ अस्थायी रूप से सेवा करते थे, जैसे प्रेरिताई का पद। वे इस मनसा से नहीं चुने गए थे कि जगत के अन्त तक बने रहें, वरन् केवल इसलिए कि सुसमाचार का उपदेश सारे संसार में फैलाएँ, चाहे सब लोग उसे न मानें। यही वह विशेष कारण था जिससे हमारे प्रभु यीशु मसीह ने बारह प्रेरितों को ठहराया। बाद में पौलुस उनके साथ अन्यजातियों में प्रचार करने के लिए जोड़ा गया, और इस प्रकार उसके राज्य के विस्तार का आरम्भ हुआ। परन्तु जब सुसमाचार भली-भाँति स्थापित हो गया, तो प्रेरिताई का पद समाप्त हो गया। फिर भी कुछ साथी और सहकर्मी थे, जो समान पद पर तो नहीं थे, पर उद्धार का बीज फैलाने के लिए नियुक्त किए गए थे। पौलुस उन्हें सुसमाचार सुनानेवाले, अर्थात् इंजीलिस्ट कहता है। तीमुथियुस को लिखी अपनी पत्री में वह उन्हें आज्ञा देता है कि सुसमाचार प्रचारक का काम लगन से करें।

अब रही भविष्यद्वक्ताओं के पद की बात, तो उसकी वह प्रमुखता नहीं रही जो पहले थी। संसार के अविश्वास के कारण परमेश्वर ने अपने वरदान घटा दिए हैं। इसका कारण यह नहीं कि वह कम उदार है या उसके पास हमारे उद्धार के लिए आवश्यक वस्तुओं की कमी है, वरन् यह कि संसार की दशा चाहे जैसी हो, हम इस योग्य नहीं कि सुसमाचार के आरम्भिक दिनों की भाँति उसके भण्डारों को प्रचुरता से पाएँ। इसलिए हम इन वरदानों का थोड़ा-सा अंश ही पाते हैं। फिर भी भविष्यद्वक्ता परमेश्वर की इच्छा के व्याख्याता थे और साधारण उपदेशकों की अपेक्षा पवित्र शास्त्र की कहीं गहरी समझ रखते थे। उनका काम शिक्षा देना था।

पौलुस ने जिन रखवालों का उल्लेख किया है, वे वचन के सेवक हैं, जिन पर किसी निश्चित स्थान में सिखाने का साधारण दायित्व है। उपदेशकों के विषय में भी यही बात है। इसका एक उदाहरण प्रेरितों के काम के तेरहवें अध्याय में अन्ताकिया की कलीसिया में मिलता है। कोई रखवाला उपदेशक हुए बिना नहीं हो सकता। तथापि उपदेशकों का एक अलग दायित्व है, और वह यह कि पवित्र शास्त्र की व्याख्या करें ताकि उसकी उचित और सच्ची समझ बनी रहे। इस प्रकार उनका सामर्थ्य कलीसिया में बना और चलता रहता है। विधर्म और झूठे मत प्रबल नहीं हो पाते, और विश्वास दृढ़ और निश्चित बना रहता है। उपदेशकों ने यही प्रयोजन पूरा किया। सन्त लूका का वृत्तान्त दिखाता है कि प्रेरित किसी विशेष स्थान से बँधे नहीं थे; यीशु मसीह ने उन्हें सारी सृष्टि में सुसमाचार प्रचार करने के लिए भेजा था। जहाँ-जहाँ अवसर मिलता और सुसमाचार प्रचार के लिए द्वार खुलते, वहाँ उन्हें जाना था, किसी एक स्थान से बँधे बिना। सुसमाचार सुनानेवालों के विषय में भी यही है। वे सारे संसार में घूमे, परन्तु जब बुलाए गए तो विशेष स्थानों पर नियुक्त किए गए।

इसी प्रकार तीमुथियुस एक समय के लिए चुना गया था, और यद्यपि उसने मुख्यतः सुसमाचार प्रचारक के रूप में सेवा की, फिर भी परिस्थिति की माँग के अनुसार वह स्थान बदलने को तैयार रहता था। तीतुस भी क्रेते द्वीप में नियुक्त किया गया था, यद्यपि वह वहाँ अभी दृढ़ता से स्थापित नहीं हुआ था। वह वर्तमान परिस्थिति और आवश्यकताओं के अनुसार इधर-उधर जाता रहा। यहाँ हम देख सकते हैं कि कुछ भटके हुए लोग, जो केवल अव्यवस्था चाहते हैं और स्थापित व्यवस्था को बिगाड़ते हैं, अनुचित रीति से यह दावा करते हैं कि किसी को एक ही स्थान पर नहीं रहना चाहिए, वरन् प्रेरितों का अनुकरण करना चाहिए। यह यीशु मसीह की मनसा को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करना है, जैसा इस अंश से प्रकट होता है।

प्रेरित हरकारों की नाईं सब जगह सुसमाचार की घोषणा करते थे, और उनके साथ सुसमाचार सुनानेवाले चलते थे। इसी बीच भविष्यद्वक्ता भी थे, जिनमें से कुछ, जैसे परमेश्वर ने अपना अनुग्रह बाँटा, कुछ स्थानों से अधिक जुड़े हुए थे। फिर भी हर कलीसिया में भविष्यद्वक्ता थे, जैसा हम कुरिन्थियों की पत्री में देखते हैं। इससे भविष्यद्वाणी के वरदान का महत्त्व प्रकट होता है, जिसे सब वरदानों से बढ़कर मूल्यवान समझना चाहिए, क्योंकि कलीसिया की उन्नति में उसका लाभ और योगदान अधिक है।

रखवालों के विषय में हम देख सकते हैं कि सन्त पौलुस और उसके साथी बरनबास ने उन्हें भिन्न-भिन्न स्थानों में नियुक्त किया। उन्होंने तीतुस और तीमुथियुस को आज्ञा दी कि वे देखें कि कलीसियाओं को अगुवाई करने के लिए रखवाले मिलें, ताकि अव्यवस्था न हो। इसलिए सेवक और रखवाले यीशु मसीह के अधिकार से नियुक्त किए गए और अपने-अपने स्थानों पर ठहराए गए। अपने ठहराए हुए पद पर बने रहना आवश्यक है, और दूसरे पदों का लालच नहीं करना चाहिए। इन भिन्न-भिन्न पदों के विषय में सन्त पौलुस की चर्चा से हमें यही शिक्षा लेनी चाहिए।

अब, जब हम देखते हैं कि सेवकों और रखवालों की नियुक्ति यीशु मसीह के अधिकार से होती है, और वे विशेष कामों पर ठहराए जाते हैं, तो हमें समझना चाहिए कि हर एक को अपने ठहराए हुए स्थान पर बने रहना चाहिए। जैसे कोई मनुष्य गढ़ या बुर्ज की रखवाली के लिए, जब उस पर संकट हो, वहाँ तैनात किया जाता है, वैसे ही हर एक अपने स्थान पर सन्तुष्ट रहे और दूसरे पदों का लालच न करे। भिन्न-भिन्न पदों के विषय में सन्त पौलुस की चर्चा का यही मुख्य सार है।

सार यह कि हम सीखें कि हमारे प्रभु यीशु ने अपनी अपार बुद्धि से जान लिया कि उसकी कलीसिया के कल्याण के लिए क्या आवश्यक है। उसने विश्वासियों को वह सब दिया जो आवश्यक था, ताकि उन्हें किसी बात की घटी न हो, और उन्हें राज्य की ओर खींचने के लिए पर्याप्त और सुविधाजनक साधन मिलें। आजकल, जैसा मैंने पहले कहा, हमारे पास न प्रेरिताई का पद है, न साधारण सुसमाचार सुनानेवाले। तथापि यीशु मसीह अब भी अनुग्रह से हम पर अपनी देखरेख और सहायता बढ़ाता है। वह ऐसा तब भी करता है जब उसके वचन की प्रायः उपेक्षा की जाती है; वह हमें अपने वरदान देता है, यद्यपि उतनी प्रचुरता से नहीं जितनी हम पा सकते यदि हममें उनका पूरा मूल्य समझने की उत्कण्ठा होती।

तौभी हम अपनी दशा को सबसे बुरी न समझें, केवल इसलिए कि अब हमारे पास प्रेरित नहीं हैं। पूर्वकाल में पोपवाद से उत्पन्न गड़बड़ी और अव्यवस्था के कारण यह आवश्यक था कि परमेश्वर ऐसे मनुष्य उठाए जो कलीसिया की स्थापित व्यवस्था के अनुसार चुने नहीं गए थे। उसने उन्हें अपना अनुग्रह दिया और उन्होंने उसका प्रयोजन पूरा किया। परन्तु अब, जहाँ सुसमाचार का प्रचार होता है और व्यवस्था स्थापित है, वहाँ हमें पहले की बात पर लौटना चाहिए। अर्थात् जब परमेश्वर हमें ऐसे रखवाले देता है जो विश्वासयोग्यता से हमारी अगुवाई करते हैं, और ऐसे उपदेशक जो उपदेश की शुद्धता को बनाए रखते हैं और सच्चे सुसमाचार में हमें दृढ़ करते हैं, ताकि हम पन्थों और भ्रान्तियों का सामना कर सकें, तो हमें इस अनुग्रह को बहुत मूल्यवान समझना चाहिए और परमेश्वर के विरुद्ध कुड़कुड़ाना नहीं चाहिए।

फिर यह निश्चित है कि यदि सुसमाचार को वैसी श्रद्धा और गम्भीरता से ग्रहण किया जाता जिसका वह अधिकारी है, और यदि परमेश्वर अपनी ओर से और अधिक उदार होता, तो हमारे पास और भी अच्छे प्रचारक होते। खेद है कि इस समय हमारे पास इतने थोड़े अच्छे प्रचारक हैं, और उनमें से बहुत-से अनाड़ी राजमिस्त्रियों के समान हैं, जो नीरो से भी बुरे और पोपीय व्यवस्था के भिक्षुओं से भी कम जानकार हैं। वे कुछ भी प्रचार करने को तैयार हैं, चाहे वह मुहम्मद का क़ुरान हो या मसीह का सुसमाचार, बस उनकी जीविका चलती रहे।

इसके अतिरिक्त, हम पियक्कड़ों का एक झुण्ड देखते हैं जिनमें सूअरों से अधिक उत्साह नहीं, और वे उन कुत्तों के समान चुप हैं जो कभी नहीं भौंकते। वे केवल प्रकाश और अन्धकार को गड्डमड्ड करने और गड़बड़ी फैलाने के लिए अपना मुँह खोलते हैं। हमें समझना चाहिए कि परमेश्वर उन पर, जो उसके सुसमाचार की उपेक्षा करते हैं, न्यायोचित बदला ले रहा है। विचार करो कि उपदेश सुनने और सुसमाचार को अपने ऊपर उसके राज्य के रूप में घोषित होते देखने पर भी लोग परमेश्वर के प्रति कितनी दीनता और अधीनता दिखाते हैं। अधिकतर लोगों में धर्म के प्रति थोड़ी ही रुचि है, और जो भक्त दिखाई देते हैं, वे भी सुसमाचार को प्रायः रीति-रिवाजों के संग्रह से अधिक कुछ नहीं समझते। वे किसी भी प्रकार का अंकुश स्वीकार करने से कतराते हैं, और अपने दोषों पर डाँटा जाना उनसे सहा नहीं जाता।

ये कपटी चाहते हैं कि सुसमाचार का प्रचार हो, पर कुछ शर्तों पर, मानो वे यीशु मसीह से कोई सौदा करने को तैयार हों। फिर भी उनका बहाना इस सत्य को नहीं छिपा सकता कि वे निर्लज्ज हैं, और संसार उनका असली स्वभाव देख सकता है। यह दुःखद वास्तविकता है कि जहाँ सुसमाचार का प्रचार होता है उन स्थानों के लोगों की अपेक्षा अपरिवर्तित लोगों में अधिक धर्म और परमेश्वर का भय पाया जा सकता है। सबसे बुरी बात यह है कि इन दुष्टों में से कुछ अधिकार और सत्य के पदों पर बैठे हैं। कुछ पियक्कड़ हैं, कुछ अनैतिक कामों में लिप्त हैं, और कुछ तो निन्दा भी करते हैं। संक्षेप में, उनमें दुष्टता का भयावह स्तर है।

जब हम यह जानते हैं, तो आओ हम दीन हो जाएँ और अपने भीतर की कृतघ्नता और विद्रोह को उस सारी अव्यवस्था का कारण मानें जो हम देखते हैं। हमारी अपनी दशा चाहे जैसी हो, यदि हमारा प्रभु इतना अनुग्रहकारी बना रहे कि अपना उपदेश हमें सुनवाए, तो यह इस बात का आश्वासन और अचूक चिह्न है कि वह निकट है और हमें अपनी ओर बुलाकर हमारे उद्धार का काम कर रहा है। हमें स्वर्ग से प्रकाशन नहीं ढूँढ़ने चाहिए और न चिह्नों की खोज में भटकना चाहिए, क्योंकि वचन तो पहले ही हमारे हृदय और मुँह में है। हम और क्या माँग सकते हैं? कौन बादलों के ऊपर चढ़ सकता है या अथाह कुण्ड में उतर सकता है? हम दृढ़ता से विश्वास करें कि परमेश्वर सुसमाचार के प्रचार के द्वारा अपने आप को हमारे सामने प्रस्तुत करता है, और हमें कहीं और देखने की आवश्यकता नहीं।

जब हमें वचन सुनाया जाता है, तो हमें यह सौभाग्य मिलता है कि हम परमेश्वर की पुकार सुनें और उसकी खुली बाँहों का अनुभव करें, मानो हम उसकी साक्षात् उपस्थिति में हों। हमें स्मरण रखना चाहिए कि परमेश्वर ने प्रचारकों और उपदेशकों को अपने साधन बनाकर हमारे पास भेजा है, और उनके द्वारा वह हमें अपने पास बुलाता है। जब परमेश्वर का वचन हमें सहज उपलब्ध है, तो हमें असाधारण चिह्नों की खोज करने की आवश्यकता नहीं। इसलिए जिन्हें परमेश्वर ने अधिक ज्ञान दिया है, वे अपने आप को ऊँचा न समझें, वरन् यह सोचें कि वे सारी देह की बड़ी भलाई की कैसे सेवा कर सकते हैं। वे अपने वरदानों को जमा करके न रखें, वरन् उन्हें परमेश्वर की महिमा के लिए और जरूरतमन्दों की सहायता में लगाएँ।

यह समझना आवश्यक है कि इन वरदानों का उपयोग एक साझा उत्तरदायित्व है। जिनके पास ज्ञान है, वे उसे खज़ाने की नाईं ताले में बन्द करके न रखें, वरन् जिनमें समझ की घटी है उनके साथ बाँटें। वे यह पहचानें कि परमेश्वर ने ये वरदान उन्हें सौंपे हैं, परन्तु उसकी मनसा है कि इनसे सारे समुदाय का लाभ हो। इसलिए वे उन दूसरों से डाह न करें जिन्हें परमेश्वर ने भिन्न रीति से आदर देने के लिए चुना है। वरन् हर एक अपना स्थान और श्रेणी जाने और कलीसिया में परमेश्वर की ठहराई हुई व्यवस्था से झगड़ा न करे। हमें निश्चित रहना चाहिए कि कलीसिया में स्थापित ढाँचा और व्यवस्था परमेश्वर के पुत्र के अधिकार पर आधारित है, और इसे उन लोगों की सनक से छेड़ा नहीं जाना चाहिए जो इसे बिगाड़ना चाहते हैं।

कुछ ऐसे हैं जो सुसमाचार के प्रचार को अनावश्यक, बच्चों के लिए, समझते हैं, और मानते हैं कि पवित्र आत्मा उनके वश में है और किसी भी क्षण स्वर्ग की बातें उन पर प्रकट कर देगा। परन्तु स्पष्ट है कि शैतान ने उन्हें ऐसे घमण्ड से धोखा दिया है, और लोगों को समझना चाहिए कि यदि हमारे उद्धार के साधन मिटा दिए जाएँ तो वह अपना उद्देश्य पूरा कर लेगा। जैसा पौलुस कहता है, सुसमाचार का प्रचार कलीसिया को सिद्ध करने और हमें स्वर्ग के राज्य तक पहुँचाने के लिए है। इसके विपरीत, जब कोई उपदेश या रखवाली न रहेगी, तो शैतान निःसन्देह हम पर अधिकार कर लेगा, जिससे हम तितर-बितर होंगे और हमारा विनाश अटल होगा।

इसलिए यह पहचानकर कि यह व्यवस्था मनुष्य की ओर से नहीं है, हमें स्वेच्छा से इसके आधीन हो जाना चाहिए। हम सब, क्या बड़े क्या छोटे, इस साधन के द्वारा परमेश्वर का मार्गदर्शन ग्रहण करें, क्योंकि उसे यही ठहराना भाया है। इसके अतिरिक्त हम देख सकते हैं कि परमेश्वर की सन्तानों को कलीसिया की सन्तान कहा जाता है। सन्त पौलुस इस पर बल देता है कि हमारा प्रभु यीशु हम पर इस शर्त पर राज्य करेगा कि उसका वचन सदा हमारे मुँह में रहे। वह यह नहीं कहता कि स्वर्गदूत आकर हमें परमेश्वर की इच्छा बताएँगे, वरन् यह कि हमें परमेश्वर की इच्छा उन्हीं के द्वारा जाननी है जो उसे हम तक पहुँचाने के लिए ठहराए गए हैं।

जैसे व्यवस्था के समय में कहा जाता था कि याजक परमेश्वर के दूत हैं, और लोगों से अपेक्षा थी कि उन्हीं से मार्गदर्शन लें, वैसे ही आज भी परमेश्वर नहीं चाहता कि हम अपने ही विचारों के साथ इधर-उधर भटकते फिरें। वह हमें उस स्रोत की ओर निर्देशित करता है जो सहज उपलब्ध है, और अपना वचन हमारे लिए सुलभ बनाता है। यदि कोई मनुष्य किसी सोते के उस छिपे हुए स्रोत को, जो पृथ्वी के गहरे में दबा है, खोजे और जब तक उसे न पा ले तब तक पानी पीने से इनकार करे, तो लोग उसे पागल और निर्बुद्धि समझेंगे। परमेश्वर ने अपनी बुद्धि से अपने वचन को हमारे लिए सहज उपलब्ध किया है, और उसे पाने के लिए हमसे बड़े परिश्रम की अपेक्षा नहीं करता। उसने हमें यह सोता दिया है, और अपना वचन नालियों के द्वारा हमारे पास पहुँचाया है। हमें केवल अपना मुँह खोलना है कि उसे ग्रहण करें, जैसे लोग लगातार बहती भरपूर नालियों पर पानी भरने आते हैं।

इसलिए जब परमेश्वर ने मनुष्यों को अपने पवित्र आत्मा के साधन ठहराया है कि उसका वचन हम तक पहुँचाएँ, तो आओ हम इस ठहराए हुए साधन पर बने रहें। यदि हम चाहते हैं कि परमेश्वर हमें सिखाए, तो मनुष्य-साधनों के द्वारा हमें सुनाए जानेवाले उपदेश को ग्रहण करें। इस अंश से हमें यही स्मरण रखना है, ताकि हम मूर्खता से यह प्रश्न न करें कि परमेश्वर ने हमें अमुक अनुग्रह या वरदान क्यों नहीं दिया, या उसने ऐसे साधनों का उपयोग क्यों चुना। हमें परमेश्वर के विधान से सन्तुष्ट रहना चाहिए, यह जानते हुए कि इन बातों की छानबीन करने से हमें केवल लज्जित होना पड़ेगा, क्योंकि सच्ची बुद्धि केवल उसकी ईश्वरीय इच्छा में है।

और आओ, यह भी देखें कि इस अंश में तुरन्त क्या कहा गया है, अर्थात् यह कि परमेश्वर की इच्छा है कि सेवकाई या सेवा की एक व्यवस्था हो। मानो यह कहना है कि परमेश्वर चाहता तो बिना किसी और साधन या सहायता के स्वयं ही हमें सिद्ध कर सकता था, फिर भी वह चाहता है कि मनुष्य उसकी सेवा करें, और उन्हें भिन्न-भिन्न कामों पर ठहराता है। ऐसा करके वह इन सेवकों को ऐसा साधन बनाता है जिनके द्वारा उसकी भलाई और हमारे उद्धार की स्तुति हम तक पहुँचती है। इसलिए मनुष्यों का कर्तव्य है कि इस ईश्वरीय प्रबन्ध के आधीन हों।

कुछ लोगों को यह अनोखा लगे कि पौलुस केवल पवित्र आत्मा के वरदानों की चर्चा करने के बजाय हमें पदों की ओर ले जाता है। उसने यह चर्चा यह समझाते हुए आरम्भ की थी कि हमारा प्रभु यीशु मसीह जैसा हमारे लिए उचित समझता है उसके अनुसार वरदान देता है, और हमें पूरी रीति से सज्जित करने के लिए ये वरदान भिन्न-भिन्न रीति से देता है। इस बात को दृढ़ करने के लिए पौलुस कहता है कि प्रेरित, रखवाले, उपदेशक और सुसमाचार सुनानेवाले हैं। ऐसा लग सकता है कि वह अपनी आरम्भिक चर्चा से भटक रहा है। परन्तु हमें ध्यान देना चाहिए, जैसा हम पहले कुरिन्थियों में और विस्तार से देखते हैं, कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने अपनी कलीसिया में वह व्यवस्था स्थापित की और बनाए रखी है जिसकी हम पहले चर्चा कर चुके हैं। उसकी मनसा है कि रखवाले, भविष्यद्वक्ता और उपदेशक हों। वह तुरन्त उन्हें उनके कर्तव्यों के निर्वाह के लिए जो आवश्यक है उससे सज्जित कर देता है। वह मनुष्यों की नाईं काम नहीं करता। हमारे यहाँ हम एक मनुष्य को न्यायी और दूसरे को प्रचारक ठहरा सकते हैं। फिर भी हम उन्हें उनके अपने-अपने कामों के लिए आवश्यक गुण नहीं दे सकते। जब कोई मनुष्य सम्मान के पद पर चढ़ा दिया जाता है तो हम उसे सर्वथा नया मनुष्य नहीं बना सकते; वह मूल रूप से वैसा ही रहता है। इसी प्रकार रखवालों को चुनते समय हम ऐसे मनुष्य को चुन सकते हैं जो अन्त में अयोग्य निकले, क्योंकि हम उसे वे योग्यताएँ नहीं दे सकते जिनकी उसे आवश्यकता है। परन्तु जब मनुष्य स्वयं परमेश्वर के द्वारा चुने जाते हैं और अपने आप को पूरी रीति से उसकी ईश्वरीय इच्छा के आधीन कर देते हैं, तो उनके दायित्वों के साथ और वरदान भी जोड़ दिए जाते हैं।

जब हमारे प्रभु यीशु ने अपने प्रेरितों को चुना, तो उसने सीधे-सादे मछुओं को और उनको चुना जिनका बहुत मान नहीं था। फिर भी उसने उन्हें अपने सुसमाचार की घोषणा के लिए प्रभावी रीति से काम में लिया, आरम्भ में राजा के आगमन की घोषणा करनेवाले हरकारों के रूप में। परन्तु जब वह उन्हें उनके कर्तव्य निभाने के लिए भेजना चाहता था, तो उसने उनके पास पवित्र आत्मा भेजा, और इस प्रकार, जैसा वह अन्य बहुत-से स्थानों में करता है, यह संकेत दिया कि कलीसिया के कल्याण के लिए जो कुछ आवश्यक है, वह सब उसी की ओर से मुफ़्त दान के रूप में आना चाहिए। क्योंकि यह भली-भाँति समझा जाता है कि सब कुछ उसी से उत्पन्न होता है, और अन्तिम उद्देश्य यह है कि सारी स्तुति उसी को दी जाए। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि वरदानों की विविधता और उनके वितरण की चर्चा में पौलुस जान-बूझकर इस बात पर बल देता है कि परमेश्वर विशेष कामों के लिए विशेष वरदान देता है। मानो यह कहना है कि परमेश्वर के पास कारण है कि वह सब को एक ही वरदान नहीं देता। वह नहीं चाहता कि हर एक मनुष्य रखवाला, भविष्यद्वक्ता, उपदेशक, प्रेरित या सुसमाचार सुनानेवाला हो। वह जिन्हें चुनता है उन्हें बुलाता है, और इस प्रकार दीनता के महत्त्व पर बल देता है। इसलिए यदि हम उसके आधीन होने को तैयार हैं, तो हमें अपना अधिकार और मूल्य उसकी ईश्वरीय व्यवस्था में जड़ें जमाए हुए उसी से पाने में संकोच नहीं करना चाहिए।

परमेश्वर कभी-कभी कुछ लोगों को निजी जीवन की ओर ले जाता है, और साथ ही दूसरों को अपना वचन सुनाने के लिए चुनता है। इसलिए मनुष्यों को अपनी-अपनी भूमिका उसी के निर्देश के अनुसार स्वीकार करनी चाहिए।

इसके अतिरिक्त, आओ हम यह भी देखें कि यदि मनुष्य अपने चुनावों में परमेश्वर का भय मानकर चलें और उसकी आज्ञा मानना चाहें, तो वह उनके परिणामों के द्वारा अवश्य दिखा देगा कि जिन्हें उसने सिखाने के लिए बुलाया और झुण्ड की रखवाली का दायित्व सौंपा, उनमें उसकी सामर्थ्य की कमी न होगी। अनुभव इसकी पुष्टि करता है, और हमारे सामने यह गवाही है कि यदि हम सच्चाई और खरेपन से अपने प्रभु यीशु मसीह के नाम से इकट्ठे हों, तो वह हमारे बीच में होगा। हमें यह बात स्मरण रखनी चाहिए। तथापि हम देखते हैं कि पोपवाद ने लोगों को अपने उद्देश्यों के अनुसार तोड़ा-मरोड़ा और ढाला, जिससे वे हमारे प्रभु यीशु मसीह की स्थापित व्यवस्था और प्रेरितों के समय में कलीसिया के शासन की रीति से पूरी तरह भटक गए।

आओ यहाँ चर्चा के मुख्य विषय पर फिर आएँ। मनसा यह है कि हमें पहले कही गई एकता की ओर ले जाया जाए। इसलिए हम एक मन हों, भाइयों की नाईं एक साथ जुड़ें और एक सामान्य लक्ष्य रखें, सब उस एक सिर की अगुवाई में जो हमें एक करता है। न डाह हो, न द्वेष, न दलबन्दी, और न कोई और बात जो हमें बाँटे। इस एकता को लाने के लिए कहा गया है कि एक ही परमेश्वर और एक ही प्रभु है जिसे सब अधिकार दिया गया है, एक ही बपतिस्मा और एक ही विश्वास है। हम सब एक ही मीरास के लिए बुलाए गए हैं। इसी पर आगे जोड़ा जाता है कि इस एकता को दृढ़ करने के लिए यीशु मसीह ने ठहराया है कि एक मनुष्य शेष लोगों को सिखाए, और मण्डली उसकी सुने। इस प्रबन्ध से बोलनेवाला और सुननेवाले, दोनों एक ही विश्वास में सहभागी हों। क्योंकि हम सब प्रेरित, उपदेशक और भविष्यद्वक्ता नहीं हो सकते, उसने कुछ को इन पदों के लिए चुन लिया है। उद्देश्य यह है कि हम ऊपर कही गई एकता तक पहुँचें और यीशु मसीह को अपना सिर मानें, और हम सब उसके आधीन इकट्ठे हों। प्रेरित पौलुस इसी पर बल दे रहा है।

अब यदि इस संसार में परमेश्वर की ओर से कोई प्रधान या सर्वोच्च अधिकारी ठहराया गया होता, तो जो बिशप उस पद पर होता उसे सारी कलीसिया पर श्रेष्ठता प्राप्त होती, और उसका अधिकार-क्षेत्र इतना फैला होता कि उसकी प्रभुता सर्वत्र स्थापित हो जाती। निश्चय ही सन्त पौलुस इसे अनदेखा न करता, अथवा यदि करता, तो पवित्र आत्मा की प्रेरणा से लिखते हुए यह घोर चूक होती। वह अपने सन्देश की मुख्य और सबसे सुविधाजनक बात को न छोड़ता। इसलिए, यदि और कुछ न भी हो, तो यही अंश उन लोगों की ढिठाई का खण्डन करने के लिए पर्याप्त है जो दावा करते हैं कि इस संसार में कोई सर्वोच्च प्रधान होना चाहिए, यह तर्क देते हुए कि चूँकि यीशु मसीह इस संसार को छोड़ चुका है, इसलिए कोई प्रतिनिधि होना चाहिए। परन्तु यह निश्चित है कि सन्त पौलुस का आशय वही बताना था जो हमने अन्य अंशों में देखा है, अर्थात् यह कि सन्त पतरस की प्रेरिताई हम तक विस्तृत नहीं थी, क्योंकि वह विशेष रूप से यहूदियों के लिए नियुक्त किया गया था, जैसा गलातियों 2 में कहा गया है।

जो भी हो, हम यहाँ वह निरन्तर चलनेवाली व्यवस्था देखते हैं जिसे हमें बनाए रखना और मानना चाहिए यदि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के आधीन होना चाहते हैं। इसका अर्थ पोप का होना नहीं, वरन् यह है कि हर कलीसिया के अपने रखवाले और उपदेशक हों, उसकी आवश्यकताओं, लोगों की संख्या और स्थान की माँगों के अनुसार। इससे यह होगा कि जब हम एक कलीसिया के रूप में एक देह में एक किए जाएँ, तो हमारा वैध शासन हो। हमारी अपरिपक्वता और विश्वास की दुर्बलता के कारण हमारे लिए अन्यथा करना असम्भव है। इसलिए हमारे लिए आवश्यक है कि हम उस उपाय को स्वीकार करें जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने दिया है, ताकि हम अपने आप को उसके वचन और अधिकार के आधीन कर दें।

हमारे विरोध में हमें जिस बात पर बल देना है, उसका सार यही है। पौलुस आगे इस व्यवस्था को बनाए रखने से उत्पन्न होनेवाले असीम लाभों और फलों को दिखाता है। जैसा पहले कहा गया, कुछ मनुष्य इतने घमण्डी हैं कि वे दूसरों पर प्रभुता करना चाहते हैं। इसलिए इससे उत्तम कुछ नहीं कि हम समझें कि परमेश्वर ने अपनी बुद्धि से शासन की यह व्यवस्था स्थापित की है और हमें सिखाने के लिए रखवाले ठहराए हैं। जब हम हठपूर्वक उसका विरोध करते और उसे ठुकराते हैं जो परमेश्वर ने हमारी भलाई के लिए ठहराया है, तो यह हमारे ही उद्धार के विरुद्ध है।

सच तो यह है कि यदि विचार करने को और कुछ न होता, केवल यह कि परमेश्वर की यही इच्छा है, तो भी हमें उसकी आज्ञाओं के आधीन स्वेच्छा से हो जाना चाहिए। परन्तु हमारे मन ऐसा करने में प्रायः संघर्ष करते हैं, जब तक कि हम स्पष्ट न देख लें कि यह हमारे ही लाभ के लिए है। परमेश्वर की मनसा केवल हमें दीन करने की नहीं, वरन् इस व्यवस्था को स्थापित करके हमें ऊँचा उठाने की भी है। इसलिए केवल परमेश्वर की आज्ञाओं को मानना या अनिच्छा से मानना पर्याप्त नहीं है। हमें उन्हें उत्सुकता से अपनाना चाहिए, यह जानते हुए कि वे हमारी ही भलाई के लिए हैं।

अब जब हम समझते हैं कि यह व्यवस्था हमारे उद्धार के लिए विशेष रूप से आवश्यक है, तो हमें पूरे मन से इसमें अपने आप को लगा देना चाहिए। नहीं तो जब हम उसे ठुकराएँगे जो परमेश्वर हमें देता है, मुख्यतः उसके लिए नहीं, वरन् हमारे ही लाभ के लिए, तब हमारी कृतघ्नता और भी निन्दनीय होगी। सन्त पौलुस ने सुसमाचार के प्रचार और इस उद्देश्य के लिए मनुष्यों की नियुक्ति की चर्चा करते हुए यही कहना चाहा था, अर्थात् हमें एक साथ बाँधना और फूट को मिटाना।

इसके अतिरिक्त, सन्त पौलुस इस पर भी बल देता है कि जो कोई सामान्य व्यवस्था को ठुकराता है और अत्यधिक आत्मिक बनने का प्रयत्न करता है, मानो वह सांसारिक चिन्ताओं से अलग हो, वह वास्तव में अपने आप को कलीसिया की देह से अलग कर रहा है, और ऐसा करके परमेश्वर का त्याग कर रहा है। ऐसे लोगों से घातक महामारियों की नाईं बचना और दूर रहना चाहिए, क्योंकि वे कलीसिया में फूट डालते हैं। हम एकता की कितनी ही इच्छा करें, यदि हम यहाँ बताए गए सिद्धान्तों का पालन न करें तो हमारे सारे प्रयत्न व्यर्थ होंगे। हमारे प्रभु यीशु की मनसा थी कि हमें अपनी ही देह में दृढ़ता से एक करे।

इसलिए यदि कोई मनुष्य कहे कि वह अपने आप को कलीसिया की आज्ञाकारिता से अलग कर लेगा, तो यह किसी देह की नसों को काट डालने के समान है। यह ऐसा है जैसे कोई कहे कि मैं किसी से प्रेम करता हूँ, पर फिर उसकी नसें सब जगह से काट डाले, जिससे सारी देह जोड़-जोड़ से अलग होकर, टुकड़े-टुकड़े होकर अन्त में अव्यवस्था में ढह जाए। यही बात हम पर भी सच बैठती है, क्योंकि हमें एक किया जाना है, और परमेश्वर ने हमें भविष्यद्वक्ता, उपदेशक, रखवाले और सुसमाचार सुनानेवाले देकर इस एकता का प्रबन्ध किया है। अब यदि हम उन्हें ठुकराएँ, तो इसके सिवा और क्या कहा जा सकता है कि हम उस एकता को तोड़ना चाहते हैं जो हमारे प्रभु ने हमारे बीच ठहराई है? सचमुच पौलुस हमें स्पष्ट दिखाता है कि जो सुसमाचार के उपदेश के आधीन नहीं होते और सेवकों का आदर नहीं करते, वे परमेश्वर के लोगों के घातक शत्रु हैं और उनके विनाश की खोज में हैं। इसलिए हमें उनसे भेड़ियों की नाईं बचना चाहिए, क्योंकि वे सर्वथा असह्य हैं; वे कलीसिया का पतन कराते हैं, परमेश्वर के सुव्यवस्थित कामों को तुच्छ जानते हैं, और सब भली बातों को छोड़ देते हैं।

इसके अतिरिक्त, मसीह की देह की इस उन्नति या निर्माण के विषय में सन्त पौलुस की घोषणा तुरन्त आती है। इससे उन लोगों के महत्त्व पर बल मिलता है जो उस आत्मिक अधिकार के आधीन होने से इनकार करते हैं जिसकी अनुमति हमारे प्रभु यीशु ने दी है। हमारे प्रभु यीशु की देह हमारे लिए बहुमूल्य होनी चाहिए। सचमुच, यदि वह कहता "कलीसिया", तो पर्याप्त होता, परन्तु इस आदरणीय उपाधि का प्रयोग करके सन्त पौलुस यह प्रकट करता है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह की देह को फाड़ने का प्रयत्न करना विश्वासघात होगा। उसकी उन्नति के बिना वह सिद्ध नहीं हो सकती, और न अच्छी दशा में बनी रह सकती है। यह उन्नति केवल परमेश्वर के वचन के प्रचार के द्वारा ही हो सकती है। इसलिए यदि हम चाहते हैं कि परमेश्वर का आदर और सेवा हो, कि हमारा प्रभु हमारे बीच शान्ति से राज्य करे, यदि हम उसके लोग होना, उसकी सुरक्षा में जीना, उसमें उन्नति पाना, उससे जुड़े रहना और अन्त तक उसमें बने रहना चाहते हैं, संक्षेप में यदि हम अपना उद्धार चाहते हैं, तो हमें दीन विद्यार्थी बनना चाहिए, सुसमाचार के उपदेश को ग्रहण करना चाहिए और रखवालों की ऐसे सुनना चाहिए मानो स्वयं यीशु मसीह हमसे बोल रहा हो। हमें निश्चित होना चाहिए कि हम जिन नश्वर मनुष्यों को उसने ठहराया है, उनकी सुनने में हमारी आज्ञाकारिता और विश्वास को वह स्वीकार करता है।

इसलिए आओ हम परमेश्वर के आदर की अपनी इच्छा, और अपने उद्धार तथा कलीसिया के कल्याण और उन्नति की अपनी चिन्ता प्रकट करें। यह तब होगा जब हम सब, चाहे किसी भी पद के हों, इस बात पर सहमत हों कि यीशु मसीह के पास ऐसे साधन होने चाहिए जिनके द्वारा वह हमसे बोले और हमें अपने और निकट खींचे। यदि हम इस व्यवस्था पर चलें, तो वह निश्चय ही हमें आशीष देगा, और हमारे पास उसकी महिमा करने का कारण होगा। हम देखेंगे कि उसकी सदा से यही इच्छा रही है कि हमारे प्राणों का उद्धार सुरक्षित करे, और वह सदा हमारे साथ उपस्थित है और हमारे परम लाभ के लिए काम कर रहा है। अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने दीन हों, अपने दोषों को मानें और प्रार्थना करें कि वह हमें उन्हें गहराई से अनुभव कराए। हम नम्र किए जाएँ और उसके द्वारा उठाए जाने के सिवा कुछ न चाहें। हमारे प्रभु यीशु का हम पर ऐसा प्रथम स्थान हो कि हम उसका वैसा आदर करें जैसा उसके योग्य है। हम उसकी देखरेख में रहें, उसके पवित्र आत्मा से चलाए जाएँ, ताकि उसका वचन हममें और भी अधिक फले-फूले और हमें दृढ़ करे। वह हमारी निर्बलताओं को सहे और जब तक हम इस संसार में जीते हैं, हमें अपना कहना कभी न छोड़े, जब तक हम सब उसके राज्य में इकट्ठे न हो जाएँ। हम उसके अनुग्रह के लिए प्रार्थना करते हैं, केवल अपने लिए नहीं, वरन् सब के लिए।

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