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उन्नीसवाँ उपदेश, तीसरे अध्याय पर चौथा — इफिसियों 3:14-16
"इसलिये मैं तुम से बिनती करता हूँ कि जो क्लेश तुम्हारे लिये मैं उठाता हूँ, उनके कारण हियाव न छोड़ो, क्योंकि उसमें तुम्हारी महिमा है। इसी कारण मैं हमारे प्रभु यीशु मसीह के उस पिता के सामने घुटने टेकता हूँ, जिससे स्वर्ग और पृथ्वी पर हर एक घराने का नाम रखा जाता है, कि वह अपनी महिमा के धन के अनुसार तुम्हें यह दान दे कि तुम उसके आत्मा से अपने भीतरी मनुष्यत्व में सामर्थ्य पाकर बलवन्त होते जाओ।" - इफिसियों 3:14-16
यह बड़ी अद्भुत बात है कि परमेश्वर के निकट आने के इतने साधन होते हुए भी मनुष्य प्रायः उससे अधिक से अधिक दूर जाने का परिश्रम करते हैं। थोड़ा-सा बहाना भी उन्हें मुड़ जाने के लिए पर्याप्त होता है, और फिर भी वे समझते हैं कि उनके पास उचित कारण है। वे कहते हैं, "मुझे अमुक या अमुक बात ने रोक दिया," जो अत्यन्त हल्के कारण से बढ़कर कुछ नहीं। उनकी सच्ची इच्छा तो परमेश्वर से दूर हो जाने की है। हमारे समय में यह बात बहुत आम है। जो लोग सुसमाचार की शिक्षा को ठुकराने के लिए अपने को निर्दोष ठहराना चाहते हैं, वे सदा ठोकर के छोटे-छोटे कारणों में दोष ढूँढ़ते रहते हैं। वे कहते हैं, "अरे, यह बात मुझे खटकती है, इससे मुझे सुसमाचार से अरुचि हो सकती है, इससे मैं उसे पूरी तरह छोड़ दे सकता हूँ।" जो कुछ वे बताते हैं, सब तुच्छ बातों के विषय में है। तौभी हमें और भी अधिक प्रयत्न करना चाहिए कि उन सब बाधाओं और रुकावटों को पार करें जो शैतान हमारे मार्ग में डालना चाहता है। हमें अपने विश्वास में दृढ़ बने रहना और अपने मार्ग पर स्थिर रहना चाहिए। पौलुस इफिसियों से यही आग्रह कर रहा है—कि वे बिना हियाव छोड़े सुसमाचार के विश्वास में बने रहें, चाहे उसे बन्दी के रूप में, मानो पहले ही दण्ड पाए हुए देखकर वे व्याकुल क्यों न हों।
निश्चय ही सुसमाचार की रक्षा में पौलुस का दुःख उठाना इसलिए नहीं था कि इफिसी लोग परमेश्वर के शुद्ध सत्य से फिर जाएँ। इसके विपरीत, यह उनके लिए महिमा का कारण था। वे पौलुस की अटल दृढ़ता को देखकर पहले ही से जयजयकार कर सकते थे। जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, जो कुछ मैंने छुआ है उससे परे, हमारे स्वभाव में एक गहरी जमी हुई दुष्टता है। यदि परमेश्वर से दूर होने के लिए हमें कोई बाहरी बहाना मिल जाए तो हम सन्तुष्ट हो जाते हैं। जो भी कारण परमेश्वर की उपस्थिति से बच निकलने का मार्ग दे, उसे हम उत्सुकता से पकड़ लेते हैं। इस प्रवृत्ति को पूरी तरह त्याग देना चाहिए; परन्तु पौलुस यहाँ केवल एक ही जाति की बात नहीं कर रहा। वह हमें ऐसी शिक्षा देता है जो आज भी हमारे काम आनी चाहिए।
वह शिक्षा यह है: यद्यपि संसार का अधिकांश भाग सुसमाचार का विरोध करता है और हमारे प्रभु यीशु मसीह की स्मृति को मिटाने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगा देता है, और यद्यपि विश्वासी सताए जाते, बदनाम किए जाते और पीड़ित किए जाते हैं, तौभी हमें हियाव नहीं छोड़ना चाहिए। इसके विपरीत, हमें इन परीक्षाओं को अपने प्रभु यीशु मसीह में अपने विश्वास को दृढ़ करने देना चाहिए। हमें स्मरण रखना चाहिए कि हम महिमा के लिए ठहराए गए हैं। यह तथ्य कि सुसमाचार को व्यापक रूप से ठुकराए जाने पर भी परमेश्वर अपनी कलीसिया को अपने सामर्थी हाथ से थामे रखता है, और उसे पूरी तरह दबने और कुचले जाने नहीं देता, इस बात का प्रमाण है कि वही उसका रचयिता है।
यदि सुसमाचार बिना किसी विरोध के सब लोगों में ग्रहण किया जाता, तो आनन्द मनाने का बड़ा कारण होता, और स्वर्ग और पृथ्वी परमेश्वर की भरपूर भलाई की स्तुति से गूँज उठते, जो सब मनुष्यों पर चमक रही है। परन्तु सुसमाचार के प्रति मनुष्यों का विरोध और बैर हमारे लिए निश्चित चिह्न है कि परमेश्वर ही उसका रचयिता है। जो उसके कारण बन्दीगृह में डाले जाते हैं और मृत्यु का सामना तक करते हैं, वे डगमगाते नहीं, वरन् अटल रहते हैं। इससे परमेश्वर की अद्भुत सामर्थ्य प्रकट होती है। शैतान चाहे जो कुछ करे, हमारे पास यह प्रमाण है कि परमेश्वर हमारे पक्ष में है, हमारे साथ लड़ रहा है और अपनी सामर्थ्य से हमें थामे हुए है। इससे हम क्लेश से मुक्त नहीं हो जाते, परन्तु यह हमें विजय का निश्चय दिलाता है और हमें निर्दोष ठहराता है।
सारांश यह कि सन्त पौलुस के इस पद से जो सन्देश हमें लेना चाहिए वह यह है कि जितने आक्रमण शैतान हम पर करे, उन सब को सहने के लिए हमें तैयार रहना चाहिए। जब हम देखें कि सुसमाचार की शुद्ध शिक्षा संसार में बुरी तरह ग्रहण की जाती है, तुच्छ जानी जाती है, ठुकराई जाती है, यहाँ तक कि घृणा की जाती है, और अविश्वासी उसे नष्ट करने के क्रोध से भरे हुए हैं, तब भी हम उसका आदर कम न करें। हमें परमेश्वर की महिमा को मनुष्यों की राय से नहीं नापना चाहिए। चाहे परमेश्वर हर कहीं तुच्छ ही क्यों न जाना जाए, जैसा अधिकतर लोगों में है—जो सचमुच इतने कृतघ्न और अपने विद्रोह में इतने भयंकर हैं—तौभी जो आदर हमें उसे देना चाहिए, उसे हम घटा न दें। इसी प्रकार सुसमाचार की शुद्ध शिक्षा को भी, संसार के विरोध और उन बहुतों के होते हुए जो उसका उपहास करते, उसे बुरा-भला कहते और उसे सताते भी हैं, आओ हम आज्ञाकारिता और दीनता से ग्रहण करें। हमारा विश्वास अटल रहे, चाहे बहुत सी धमकियों, हिंसा और षड्यन्त्रों का सामना क्यों न करना पड़े।
अब, सन्त पौलुस जो कहता है कि यह हमारी महिमा है, तो यह किस काम का है? यदि परमेश्वर हमारे विश्वास की परीक्षा न ले, तो वह मृतप्राय ही होगा। तौभी जब हम विश्वासियों को परखे जाते देखते हैं, तब उस शिक्षा की जो परमेश्वर ने हमें दी है और भी दृढ़ पुष्टि हमें मिलती है। यह सच है कि हमारा विश्वास स्वर्ग में जड़ पकड़े हुए होना चाहिए, अर्थात् किसी सृष्टि की ओर देखे बिना केवल परमेश्वर के अधिकार पर टिका होना चाहिए। स्वर्ग के स्वर्गदूत भी सुसमाचार को प्रमाणित नहीं कर सकते; हमारे टेक लगाने के लिए केवल परमेश्वर की महिमा ही पर्याप्त होनी चाहिए, और तब हम कभी डिगाए न जाएँगे।
परन्तु जब शहीद परमेश्वर के सत्य की गवाही में अपने प्राण देने से नहीं हिचकिचाते, तब, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, उस शिक्षा को ग्रहण करने और सँजोने के लिए हमें और भी अधिक प्रोत्साहन मिलना चाहिए। सताव उस शिक्षा को पक्का करते हैं, और इसलिए यह हमारी महिमा है, और हमें इसमें जयजयकार करना चाहिए। परमेश्वर उन्हें भी सहारा देता और दृढ़ करता है जिन्हें वह इस संग्राम में भेजता है। यह निश्चित है कि शरीर की दुर्बलता के कारण वे कभी-कभी लड़खड़ा सकते हैं, परन्तु जब अन्त में वे जयवन्त होते हैं, तो यह परमेश्वर का कार्य है, और इसके लिए हमें उसकी महिमा करनी चाहिए।
अब यदि हम हर आक्रमण पर घबरा जाते और हार मानने को ललचते हैं, तो यह इस बात का चिह्न है कि हम उन साधनों से लाभ उठाना नहीं जानते जो परमेश्वर ने हमें अपने निकट आने और स्थिर बने रहने के लिए दिए हैं। इसलिए हमें अपनी ही दुर्बलता से और अपने स्वभाव की जन्मजात दुष्टता से लड़ना चाहिए। जब हम देखें कि शैतान लगभग हर कहीं सुसमाचार को खोखला करने का यत्न कर रहा है, तब हमें विचार करना चाहिए कि परमेश्वर अपने लोगों को नहीं भूलता, परन्तु अपनी सामर्थ्य से उन्हें दृढ़ करता है कि वे अन्त में जयवन्त हों। इससे हमें आशा मिलनी चाहिए और अपने आपको भी तैयार करने का उत्साह होना चाहिए। जब हम सुख-चैन में हों और विश्राम के समय में, तब भी हमें उनके उदाहरण पर चलना न छोड़ना चाहिए और लड़ने के लिए तैयार रहना चाहिए।
पौलुस इस बात पर बल देता है कि हमारे लिए केवल शिक्षा पा लेना पर्याप्त नहीं; हमें शिक्षा पाकर ही नहीं रुक जाना चाहिए। हमें निरन्तर उभारे जाते रहना और सचेत रहना चाहिए, जब तक परमेश्वर की शिक्षा हम में जड़ न पकड़ ले और हमारे हृदय की गहराई तक न पहुँचे। इसलिए इफिसियों को समझाने के बाद वह आगे कहता है, "मैं हमारे प्रभु यीशु मसीह के पिता के सामने घुटने टेकता हूँ।" वह ऐसा इसलिए करता है कि अपने उदाहरण से उन्हें दिखाए कि उन्हें क्या करना चाहिए। जब परमेश्वर के वचन से शिक्षा और प्रेरणा पाकर हम अपना कर्तव्य जान भी लें, तब भी हम में सदा कुछ आलस्य, ठण्डापन और लापरवाही बनी रहेगी।
जब तक परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा से हमें न छुए, तब तक वह शिक्षा हमारे लिए बहुत कम काम की है, और यही हमारे अभिमान को नम्र करता है। बहुत से लोग जो अपने आपको बहुत ऊँचा समझते हैं, अद्भुत काम कर दिखा सकते हैं, परन्तु परीक्षा में पड़ने पर अपने को धोखा खाया हुआ पाते हैं। पतरस का उदाहरण लो; उसने सच्चे मन से प्रतिज्ञा की थी कि चाहे उसके लिए मरना ही पड़े, वह अपने स्वामी का इनकार न करेगा। उसके शब्द उत्साह भरे और भले आशय के थे, परन्तु एक साधारण दासी ने उससे मसीह का इनकार करवा दिया। वह बार-बार, यहाँ तक कि शाप और सौगन्ध के साथ भी, इनकार करने को तैयार था। यह देखकर हमें पतरस के अनुभव से अपनी दुर्बलता को मान लेना चाहिए। पौलुस इस बात पर बल देता है कि हम उसकी ओर फिरें जिसमें सारी सामर्थ्य है। केवल अपना रोग जान लेना पर्याप्त नहीं; हमें उपचार भी ढूँढ़ना चाहिए।
पहले तो हम उन मूर्खतापूर्ण धारणाओं को अपने से दूर करें कि मनुष्य अपनी स्वतंत्र इच्छा से सब परीक्षाओं पर जयवन्त हो सकता है। इसके बदले अपनी दुर्बलता को मानें, और यह कि परमेश्वर अपने वचन के द्वारा हमें इसलिए नहीं सिखाता कि हमें समर्थ बना दे, परन्तु इसलिए कि हम अपने दोष को और अधिक पहचानें। अज्ञानता को ढाल न बनाएँ।
इसके बदले अपनी दुर्बलता को पहचानें और परमेश्वर की ओर फिरें, क्योंकि वह हमें बुलाता और अपनी ओर खींचता है। इसमें सन्देह न करें कि जब हम उसके चरणों में दीन होंगे तो वह हमें निराश न करेगा, यह जानते हुए कि वह हमें उठाएगा। पौलुस का अपनी प्रार्थना का उल्लेख करना केवल यह जताने के लिए नहीं कि उसने अपना कर्तव्य पूरा किया, परन्तु सब विश्वासियों के लिए उदाहरण रखने के लिए है। वे अपनी आवश्यकताओं को पहचानकर परमेश्वर की ओर फिरें, यह जानते हुए कि वह निरन्तर अपने बलवन्त हाथ से उन्हें थामे रहता है और उन्हें सहने के लिए अजेय धीरज देता है।
सार यह कि परमेश्वर का वचन सुनते समय हमें अपनी बुद्धि पर भरोसा नहीं करना चाहिए और न अपनी शक्ति पर घमण्ड करना चाहिए। इसके बदले हमें यह चाहना चाहिए कि परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हम से भीतर ही भीतर बात करे, कि प्रचार की गई शिक्षा जड़ पकड़े और फल लाए। क्योंकि परमेश्वर हम से हमारी अपनी योग्यताओं से अधिक की अपेक्षा रखता है, इसलिए हमें उससे सहायता माँगनी चाहिए। हमारी मानवीय बुद्धि के विरुद्ध लग सकता है कि हमें मृत्यु सहनी और संसार तथा अपने प्राणों तक को त्यागना पड़े, परन्तु परमेश्वर हम में कार्य कर सकता है कि हम अपनी दुर्बलताओं पर जय पाएँ। यद्यपि सुसमाचार के लिए दुःख उठाना और मृत्यु का सामना करना मनुष्य की क्षमता से परे कठिन है, तौभी यदि हम उन हथियारों से सज्जित हो जाएँ जो वह देता है, तो परमेश्वर का अनुग्रह हमें सब कठिनाइयों पर जय पाने की सामर्थ्य देगा। इसलिए यह शिक्षा निष्फल नहीं है।
हमारा प्रभु अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें वे वस्तुएँ देता है जो स्वभाव से हमारे पास नहीं हैं, ताकि शिक्षा प्रभावशाली हो और हमें निराश न करे। जो लोग निन्दा करते हुए कहते हैं कि यदि हम अपनी इच्छा से परमेश्वर का अनुसरण नहीं कर सकते तो प्रचार करना बन्द कर देना ही अच्छा है, वे भूल करते हैं। वे यह जताते हैं कि परमेश्वर की व्यवस्था उसे हमारे लिए निश्चित नहीं ठहराती। परन्तु अनुभव हमें दिखाता है कि वचन का प्रचार एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा परमेश्वर गुप्त रीति से कार्य करता है। जब हम यह समझ लेते हैं, तब देखते हैं कि परमेश्वर अपने आपसे पूरी तरह मेल खाता है, जब वह चाहता है कि सुसमाचार हमें सुनाया जाए और साथ ही बल देता है कि जब तक उसका पवित्र आत्मा हमारे हृदयों में कार्य न करे, उससे हमें कोई लाभ न होगा। सुसमाचार की तुलना साधन से करना ऐसा है जैसे कहना कि हल और दूसरे औज़ार खेती के साधन हैं, परन्तु वे भूमि से फल नहीं उपजाते—परमेश्वर उपजाता है। इसी अर्थ में हम उससे अपनी प्रतिदिन की रोटी माँगते हैं, यह समझते हुए कि वह हमारी चिन्ता वैसे ही करता है जैसे पिता अपने बच्चों की करता है।
इसलिए हमें केवल उपदेश में उपस्थित हो जाना या अकेले परमेश्वर का वचन पढ़ लेना ही नहीं चाहिए; आत्मिक भोजन के लिए हमें परमेश्वर की ओर भी फिरना चाहिए। यह न समझें कि प्रचार किया हुआ वचन ग्रहण कर लेना पर्याप्त है और परमेश्वर से बढ़ती नहीं माँगनी। इस विषय में पौलुस यह उपमा देता है कि जो रोपता है या सींचता है वह कुछ नहीं; ऊपर से बढ़ानेवाला केवल परमेश्वर है। वह शारीरिक परिश्रम की बात नहीं कर रहा, परन्तु उनकी जो परमेश्वर का वचन बोते और समझाइशों के द्वारा उसकी कलीसिया का पालन-पोषण करते हैं। हमारा परिश्रम व्यर्थ है जब तक परमेश्वर का पवित्र आत्मा उसके साथ कार्य करके उसे प्रभावी न बनाए। इससे सुसमाचार के प्रचार और पवित्र आत्मा के गुप्त भीतरी कार्य का निकट सम्बन्ध प्रकट होता है। वे अविभाज्य हैं, और सुसमाचार विश्वास करनेवालों के उद्धार के लिए परमेश्वर की सामर्थ्य है।
अब प्रार्थना की बात कहने के बाद पौलुस यह माँगता है कि पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से भीतरी मनुष्यत्व में बल पाएँ। वह हमारी दुर्बलता पर बल देता है, क्योंकि यदि हम अपनी आवश्यकता को न पहचानें तो दीन भिखारियों के समान परमेश्वर की ओर न फिरेंगे। साधारणतः लोग परमेश्वर से सहायता माँग लेते होंगे, पर सच्ची दीनता दुर्लभ है। बहुत से अभिमानी हैं और परमेश्वर की सहायता माँगते हुए भी अपने ऊपर अत्यधिक भरोसा रखते हैं। यह अत्यधिक घमण्ड एक भारी दोष है। परमेश्वर के पास सच्चाई और दीनता से आने के लिए पहले हमें अपनी अयोग्यता स्वीकार करनी होगी। हमें समझना होगा कि हमारा बल ऊपर से और पवित्र आत्मा से आता है। पौलुस के शब्द इसी बात पर बल देते हैं: "कि वह उसके पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से बलवन्त होते जाएँ।" वह उसकी तुलना करता है जो हम अपने आप कर सकते हैं और जो परमेश्वर का आत्मा देता है। जब तक मनुष्य सब कुछ अपने आप कर सकता है, उसे परमेश्वर के आत्मा की आवश्यकता नहीं। परन्तु क्योंकि सारी सामर्थ्य परमेश्वर की भलाई से उत्पन्न होती है, हम जान लेते हैं कि हम अपने आप कुछ नहीं कर सकते। जो भी बल हम अपने में समझते हैं, वह क्षणभंगुर भ्रम है, शैतान का धोखा है, जो हमें अपने ही ऊपर भरोसे में फँसाना चाहता है कि हम परमेश्वर की ओर न फिरें और पूरी तरह निर्धन न हों।
इसके अतिरिक्त, मैं और स्पष्ट करना चाहूँगा कि यह मुफ़्त में दिया गया उपकार है, अर्थात् यह केवल परमेश्वर के अनुग्रहपूर्ण दान से आता है। हमें यह धारणा नहीं रखनी चाहिए कि परमेश्वर का बलिदान हमारी दीन-हीन दशा के सिवा किसी और बात पर निर्भर है। वह इसे हम में किसी समझी हुई भलाई या स्वभाव के कारण नहीं देता। ठीक इसी कारण वह हमारी सब आवश्यकताएँ पूरी करता है। इसलिए, जैसा पौलुस कहता है, यह आवश्यक है कि हम उसके पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से बलवन्त किए जाएँ, और यह मुफ़्त दान के रूप में दिया जाता है।
अब जब पौलुस कहता है, "उसकी महिमा के धन के अनुसार," तो वह परमेश्वर की भरपूर भलाई पर बल देने के लिए ऐसा कहता है। यह उन लोगों की भ्रमपूर्ण धारणाओं का खण्डन करता है जो समझते हैं कि वे अपना उद्धार कमा सकते हैं या किसी रीति से परमेश्वर की महिमा में सहभागी हो सकते हैं। हमारे लिए यह बात मन में रखना अत्यावश्यक है। यद्यपि इफिसी लोग सुसमाचार के प्रति बड़ी दृढ़ता और अटल समर्पण दिखा चुके थे, तौभी पौलुस चाहता है कि वे और अधिक दृढ़ किए जाएँ। इससे प्रकट होता है कि हम स्वभाव से दुर्बल हैं। यद्यपि परमेश्वर हमें सही मार्ग पर ले चलता है, हमारी ओर हाथ बढ़ाता है और निरन्तर अपना अनुग्रह देता रहता है, तौभी उसके हाथ का क्षण भर का हटना भी हमें पूरी तरह निर्बल कर देगा। यह चेतावनी है, जैसा हम पहले देख चुके हैं, कि जिस प्रकार परमेश्वर हमारे उद्धार का आरम्भ करता है, उसी प्रकार वही उस कार्य को चलाता भी है। उसके थामनेवाले हाथ के बिना हम में कोई स्थिरता नहीं, विशेषकर हमारे आत्मिक जीवन के विषय में। इसलिए हमें जीवन भर प्रतिदिन प्रार्थना करने की प्रेरणा मिलनी चाहिए। जो अपने आपको भूलकर निश्चिन्त हो जाते हैं, वे शीघ्र ही अपने को परमेश्वर के अनुग्रह से वंचित पाएँगे। इसका कारण यह है कि वे उसे निरन्तर चिन्ता के साथ नहीं खोजते। इसलिए हमें हमारे आलस्य और लापरवाही से जगाने के लिए यह स्मरण रखना चाहिए कि परमेश्वर ने हमें अपनी कलीसिया में बुलाया है और हमारे हृदयों को गहराई से छुआ है कि हम सच्ची आज्ञाकारिता से उसका सुसमाचार ग्रहण करें। इससे हम सब और भी अधिक दृढ़ होने चाहिएँ।
इसके अतिरिक्त, यह पहचानना आवश्यक है कि जब परमेश्वर हम में अपने पवित्र आत्मा को बढ़ाता है, तब वह अपनी भलाई के असीम धन को प्रकट करता है। अनुग्रह की यह क्रमिक बढ़ती परमेश्वर की भलाई के अनन्त भण्डार को प्रकट करती है, जब वह हमें अपनी ओर खींचता है। आरम्भ में हम केवल कीचड़ के गड्ढे में ही नहीं, पाप और विद्रोह की गहराइयों में धँसे हुए थे। हम माता के गर्भ से एक विरासत लेकर आए थे—भ्रष्टता, परमेश्वर से बैर, द्वेष, विद्रोह और अन्धापन। इन गुणों ने हमें हर प्रकार की बुराई के प्रति असुरक्षित कर दिया, और पाप के अत्याचार के अधीन हमें शैतान के बँधुआ दास बना दिया। हमारी इस दयनीय दशा को देखते हुए परमेश्वर का हम पर तरस खाना हमारे लिए उसकी भलाई के विशाल धन को प्रकट करता है। उचित ही है कि इसके लिए उसकी महिमा की जाए।
जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, हमें इसे और अच्छी तरह समझना चाहिए—जिस प्रकार परमेश्वर ने हमें अपने बच्चों के रूप में गोद लिया है, उसी प्रकार हमें भी उसे स्वेच्छा से अपना पिता मान लेना चाहिए। परन्तु हम यह कैसे कर सकते हैं? यद्यपि उसने हम में अपना स्वरूप बदल दिया है, तौभी उसे अपनी भलाई के धन को प्रकट करते रहना, हम में अपने दानों को बढ़ाते रहना, और हमारी यात्रा में हमारी अगुवाई करते रहना होगा। इस शिक्षा को स्मरण रखना हमारे लिए अत्यावश्यक है, विशेषकर जब हम देखते हैं कि संसार इस विचार से कैसे धोखा खा गया है कि हर मनुष्य अपनी स्वतंत्र इच्छा से अपने आपको सक्षम कर सकता है, या कम से कम परमेश्वर के पास आने के लिए अपने आपको तैयार कर सकता है। इसके अतिरिक्त, कुछ लोग मानते हैं कि परमेश्वर उन्हें अनुग्रह पर अनुग्रह देता है जिन्होंने उस अनुग्रह का, जो वह पहले दे चुका है, भली रीति से उपयोग किया है।
पहली बात के विषय में, जब हम आत्मिक रूप से मरे हुए लोगों के समान, सड़ी हुई लाशों जैसे हैं, तब हम परमेश्वर की कृपा कैसे कमा सकते हैं? उसकी कृपा पाने के लिए हम क्या तैयारी कर सकते हैं? जो ऐसी धारणाएँ रखते हैं वे मोहित होने से अधिक भटके हुए हैं। इसलिए हमें अपने उद्धार के लिए आदि से अन्त तक पूरी तरह परमेश्वर पर निर्भर रहना सीखना चाहिए, और उन शैतानी भ्रमों को ठुकराना चाहिए जो सुझाते हैं कि हम अपने प्रयासों से अनुग्रह जमा कर सकते हैं। हमें विचार करना चाहिए कि हम में से हर एक कुछ भी पाने के योग्य नहीं। जैसा पौलुस सिखाता है, हमें केवल परमेश्वर की भलाई पर अपनी आँखें लगानी चाहिए, और हमारे प्रति उसकी असीम उदारता को स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि वह हम पर भलाई उण्डेलना कभी बन्द नहीं करता। वह नश्वर मनुष्यों के समान नहीं जो कह दें, "मैंने बहुत भलाई कर दी; मैं सन्तुष्ट हूँ।" इसके विपरीत, परमेश्वर न केवल अपने पवित्र आत्मा के दान हम पर उण्डेलता है, परन्तु उनकी मात्रा बढ़ाना भी चाहता है, जब तक हम सिद्धता के पूरे कद तक न पहुँच जाएँ।
अब आओ, पौलुस के भीतरी मनुष्यत्व के विशेष उल्लेख पर ध्यान दें। हमें पहचानना चाहिए कि परमेश्वर को इस संसार में निरन्तर हमें दृढ़ करना और ऊँचा उठाना चाहिए। परन्तु बहुत से लोग सांसारिक अभिलाषाओं में लगे रहते हैं। कुछ अपनी वीरता दिखाना चाहते हैं, अपने आपको स्वर्गदूतों के समान कुलीन मानते हुए, मान और ख्याति खोजते हैं। मान्यता की यह चाह उस सांसारिक सामर्थ्य का एक रूप है जिसे लोग खोजते हैं। दूसरे व्यापार से अपना धन बढ़ाना या अनेक उपायों से सम्पत्ति पाना चाहते हैं। और दूसरे सामाजिक पद और अधिकार के लालची हैं। संक्षेप में, जिन उपायों से हम प्रायः चाहते हैं कि परमेश्वर हम पर अपनी उदारता प्रकट करे, उनमें हमारी विषय-वासना और सांसारिक अभिलाषाओं की पूर्ति सम्मिलित है। परन्तु पौलुस हमारा ध्यान भीतरी मनुष्यत्व की ओर फेरता है—आत्मिक जीवन का वह क्षेत्र जो हमारी शारीरिक इन्द्रियों से छिपा है परन्तु हमारी चेतना के द्वारा हमें ज्ञात है। इसी के समान पौलुस कुरिन्थियों से भी भीतरी मनुष्यत्व की बात करता है, यह कहते हुए कि जबकि बाहरी मनुष्यत्व नाश होता जाता है, भीतरी मनुष्यत्व नया होता जाता है। इसलिए बाहरी मनुष्यत्व से पौलुस का आशय धन, शारीरिक स्वास्थ्य, मान, प्रतिष्ठा और अधिकार है—जिन सब की हम स्वभाव से अभिलाषा करते हैं। बाहरी मनुष्यत्व इन्हीं तत्वों को दर्शाता है।
अब, जैसा मैंने पहले कहा, हमें इन बातों में दृढ़ होने का प्रयत्न करना चाहिए। परन्तु इस बीच हम भीतरी मनुष्यत्व की उपेक्षा करते हैं, जो स्वर्गीय जीवन से सम्बन्ध रखता है। ऐसा इसलिए होता है कि ये बातें हमें दिखाई नहीं देतीं, और हम प्रायः इस संसार की चिन्ताओं में व्यस्त और फँसे रहते हैं। इसलिए पौलुस हमें सिखाता है कि यदि परमेश्वर हमें सांसारिक बातों में घटने दे, तो हमें उसे धीरज से स्वीकार करना चाहिए। वह इस बात को इस पद से समझाता है: जब अविश्वासी और संसारी लोग, जिनका धन इसी संसार में है, अपनी सांसारिक समृद्धि में गिरावट अनुभव करते हैं, तो वे विलाप करते और पूछते हैं, "वह धन कहाँ गया जो मेरे पास था?
सुख-सुविधाएँ कहाँ गईं?" तब वे परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत करने लगते हैं। इसी प्रकार जब धनवान की सम्पत्ति घटती है और परमेश्वर वह ले लेता है जो उसके पास था, तो वह बड़े असन्तोष से प्रतिक्रिया करता है, मानो वह पहले ही गाड़ दिया गया हो और अब अपने धन को धीरे-धीरे घटते देखना उसे पड़ रहा हो। इसी प्रकार जो महत्त्वाकांक्षा से प्रेरित होकर संसार में केवल मान और ख्याति चाहते हैं, जब वे अपनी आदत की प्रतिष्ठा खो देते हैं, तो समझते हैं कि सब कुछ खो गया।
इसके विपरीत, परमेश्वर की सन्तान, जो नीचे की सांसारिक लुभावनी वस्तुओं की ओर से स्वेच्छा से आँखें मूँद लेते और विश्वास के द्वारा स्वर्गीय मीरास पर दृष्टि लगाते हैं, जब अपने को घटते देखते हैं, यहाँ तक कि सांसारिक पद में भी, तो बहुत व्याकुल नहीं होते। वे उसे प्रसन्नता से स्वीकार करते हैं, क्योंकि वे उसके पीछे के परिवर्तन को समझते हैं: परमेश्वर उन्हें नया कर रहा है, अनदेखी बातों के निकट खींच रहा है और नई शक्ति से भर रहा है, मानो स्वर्ग का राज्य निकट ही हो। इस प्रकार पौलुस यहाँ हमें यह सिखा रहा है कि जैसे हम में से हर एक अपनी मूर्खतापूर्ण अभिलाषाओं में फँसा है, वैसे ही हमें बल के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करके यह सीखना चाहिए कि यदि हम सांसारिक बातों में घटें तो व्याकुल न हों, क्योंकि यह घटना आत्मिक बढ़ती की ओर ले जा सकती है और हमें परमेश्वर के राज्य के और निकट ला सकती है। हमें विश्वास बनाए रखना चाहिए कि हमारा सांसारिक घटना अन्त में हमारे ऊँचे किए जाने का कारण होगा। चाहे हम कब्र में उतरें, तौभी पूरी तरह नाश होने के लिए नहीं, परन्तु नए किए जाने के लिए है। इसलिए आओ, हम नीचा किया जाना स्वीकार करें, यह जानते हुए कि हमारे परमेश्वर की सामर्थ्य से हम ऊपर उठाए जाएँगे। यद्यपि हम इस संसार में दीन प्राणी हों, तौभी यदि हम धीरज से सहें, तो हमें सन्देह नहीं करना चाहिए कि परमेश्वर हम में वैसे ही कार्य करेगा जैसे उसने प्रतिज्ञा की है।
इसके अतिरिक्त, आओ, हम ध्यान से देखें कि पौलुस यहाँ क्या कहता है। वह केवल परमेश्वर का नाम ही नहीं लेता, परन्तु कहता है, "हमारे प्रभु यीशु मसीह का पिता, जिससे स्वर्ग और पृथ्वी पर हर एक घराने का नाम रखा जाता है।" इसके द्वारा वह हमें पहले यह दिखाता है कि हम कितनी घनिष्ठता से परमेश्वर के पास आ सकते हैं, जैसा पहले चर्चा हुई। बीते रविवार के उपदेश में यह पद पहले ही भली भाँति समझाया जा चुका है, जहाँ हमने सीखा कि हम परमेश्वर के पास कैसे आ सकते हैं। वहाँ सबसे पहले और मुख्यतः विश्वास पर बल दिया गया। तो यह जानते हुए कि हमारे लिए द्वार खुला है, हम निडर होकर परमेश्वर की उपस्थिति में प्रवेश कर सकते हैं। विश्वास हमारे हृदयों में भरोसा उत्पन्न करता है, और भरोसा हमें हियाव देता है। सन्त पौलुस यहाँ ये ही तीन सीढ़ियाँ बताता है। वह यह भी सिखाता है कि हमें यह विशेषाधिकार कैसे मिलता है—क्योंकि परमेश्वर केवल अपनी स्वर्गीय महिमा के कारण आराधना के योग्य नहीं है, जिसका हमें आदर करना चाहिए, परन्तु जो इतनी भय उत्पन्न करनेवाली हो सकती है कि हम उसकी उपस्थिति से यथासम्भव दूर रहना चाहें। इसके बदले वह हमें आमन्त्रित करता है कि उसे पिता और उद्धारकर्ता कहकर पुकारें, जो उपाधियाँ वह हमें अपनी सन्तान के रूप में प्रदान करता है।
इसके द्वारा हम उससे अब नहीं डरते, परन्तु आवश्यकता पड़ने पर घनिष्ठता से उसके पास आ सकते हैं। यह स्मरण रखने योग्य एक महत्त्वपूर्ण बात है, क्योंकि यदि हम परमेश्वर को पुकार न सकें, तो हमारा क्या होगा? हम किस दशा में पाए जाएँगे? कहा गया है कि हमारा सारा कुशल और जीवन परमेश्वर में शरण लेने पर निर्भर है। अब यदि हम सोचें कि जब हम सन्देह और झिझक के साथ प्रार्थना करते हैं तो परमेश्वर हमारी सुनेगा, तो हम अपने आपको धोखा देते हैं। जैसा सन्त याकूब कहता है, "ऐसा मनुष्य यह न समझे कि मुझे प्रभु से कुछ मिलेगा।" इसलिए हमें हवा से हिलते सरकण्डों या समुद्र की लहरों के समान नहीं होना चाहिए। हमें पूरी तरह निश्चित होना चाहिए कि परमेश्वर, जो हमें अपने पास बुलाता है, जब हम प्रार्थना करें तो हमें निराश न करेगा।
परन्तु हम ऐसा निश्चय कैसे पा सकते हैं? विचार करो कि परमेश्वर की महिमा अगम्य है, और उसमें और हम में अपार दूरी है। यदि हम बादलों के ऊपर भी उड़ सकते, तो भी उसकी असीम महानता के कारण हम परमेश्वर के निकट न जा पाते। यदि यीशु मसीह न होता, जो इस खाई को पाटने का साधन है, तो हम खोए हुए और मिटे हुए प्राणियों के समान होते। सन्त पौलुस इसी की ओर संकेत करता है जब वह कहता है कि वह हमारे प्रभु यीशु मसीह के पिता से प्रार्थना करता है। यह इसलिए कि हम समझें कि परमेश्वर हम से दूर नहीं है यदि हम उस मार्ग पर चलें जो उसने दिखाया है। वह मार्ग यह है कि यीशु मसीह को अपना सहायक बनाएँ, जो हमारी ओर से बोलता है। वह हमारे प्रतिनिधित्व के लिए स्वर्गीय पवित्रस्थान में प्रवेश कर चुका है, इसलिए मानो वह हमें अपने कन्धों पर उठाए हुए है, यह निश्चित करते हुए कि हम और हमारी प्रार्थनाएँ परमेश्वर के द्वारा ग्रहण और स्वीकार की जाएँ। हम निश्चित हो सकते हैं कि हमारी प्रार्थनाएँ हवा में नहीं खो जातीं, परन्तु परमेश्वर के द्वारा ग्रहण की जाती हैं, जैसा पवित्र शास्त्र में प्रतिज्ञा है कि वह उन सब के निकट है जो सच्चाई से उसे पुकारते हैं।
इसे देखते हुए संसार संतों को अपना संरक्षक और सहायक बनाने की खोज में भटक गया है। उदाहरण के लिए, जब लोग कहते हैं कि उन्हें कुँवारी मरियम और सन्त मीकाईल को मध्यस्थ बनाना चाहिए, और अपने गढ़े हुए अन्य सन्तों को भी, तो वे मानते हैं कि वे सीधे परमेश्वर की उपस्थिति में आने के योग्य नहीं। इस अयोग्यता में सत्य तो है, परन्तु इसे हमें उस उपचार की खोज के लिए विवश करना चाहिए जो परमेश्वर ने ठहराया है। हमें अपने प्रभु यीशु मसीह की ओर फिरना चाहिए, जो हमें उसके पिता तक पहुँचानेवाला मार्ग है, जैसा उसने घोषित किया, "मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ, और जो कुछ तुम मेरे नाम से परमेश्वर से, मेरे पिता से, माँगोगे वह तुम्हें दिया जाएगा।" यहाँ हमारा प्रभु यीशु प्रतिज्ञा करता है कि जो कुछ हम उसके नाम से उसके पिता परमेश्वर से माँगें वह हमें दिया जाएगा, और इस प्रकार इस शिक्षा की पुष्टि करता है। इसलिए आओ, हम समझें कि जब हमारा प्रभु यीशु अपने आपको हमें परमेश्वर पिता तक पहुँचानेवाले मार्ग के रूप में प्रस्तुत करता है, तो हमें भटकते नहीं फिरना चाहिए।
यदि हम कोई और मार्ग खोजें, तो केवल भटक जाएँगे और परमेश्वर तक पहुँचने का निश्चय कभी न पाएँगे। इसके अतिरिक्त, केवल यीशु मसीह से सन्तुष्ट रहने के लिए, आओ, स्मरण करें कि उसने कैसे कहा कि हमारी सब प्रार्थनाएँ सुनी जाएँगी यदि वे उसके नाम पर आधारित हों। इसलिए जब हम परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं, तो हमें अपने को निश्चित कर लेना चाहिए कि यद्यपि हम उसके पास आने के योग्य नहीं हैं, तौभी वह हमें स्वीकार करता है, और जब हम उसे अपने प्रभु यीशु मसीह का पिता मानते हैं, तो हमारी प्रार्थनाएँ उसे चढ़ाई गई भली और ग्रहणयोग्य भेंट के समान होती हैं। इसके अतिरिक्त, हमें पहचानना चाहिए कि हम उसके एकलौते पुत्र की देह के अंग हैं। यह आवश्यक है, क्योंकि यदि यीशु मसीह से हमारा कोई सम्बन्ध न होता, तो उसे परमेश्वर का पुत्र मान लेना हमें कोई लाभ न देता। परन्तु क्योंकि हम उसके साथ एक हैं, और वह अनुग्रह से अपनी सारी आशीषें हमारे साथ बाँटता है, इसलिए हम उचित रीति से परमेश्वर को अपना पिता कह सकते हैं। इसी कारण यीशु ने अपने चेलों से कहा, "मैं अपने परमेश्वर और तुम्हारे परमेश्वर, अपने पिता और तुम्हारे पिता के पास जाता हूँ।"
बड़ी बात की ओर बढ़ते हुए, हमें देखना चाहिए कि पौलुस एक व्यापक विचार को कैसे सम्बोधित करता है: कि स्वर्ग और पृथ्वी के सब घराने उसी के नाम से कहलाते हैं। इस सन्दर्भ में पौलुस यहूदियों और अन्यजातियों की एकता पर बल देता है। सुसमाचार का प्रचार व्यापक रूप से होना है, और परमेश्वर का अनुग्रह सब जातियों और पृष्ठभूमियों के लोगों तक पहुँचाया जाता है। इसका अर्थ यह है कि जो पहले बाहरी माने जाते थे, जैसे अन्यजाति, वे अब परमेश्वर के घराने के और स्वर्ग के नागरिक हैं। हमारे प्रभु यीशु मसीह के पिता और यीशु मसीह को हमारा सिर और देह कहकर पौलुस यह दर्शा रहा है कि सब घराने मसीह के नाम से कहलाते हैं, क्योंकि उसने हमारी अयोग्यता के होते हुए भी हमें अपनी संगति में ग्रहण कर लिया है।
पौलुस मनुष्यों के बीच सम्बन्ध स्थापित करने से भी आगे जाता है और दिखाता है कि हम स्वर्ग के स्वर्गदूतों के साथ भी मेल रखते हैं। वह केवल यह नहीं कहता कि विश्वासियों में सबसे छोटा भी इब्राहीम, दाऊद, पतरस और पौलुस जैसे पवित्रशास्त्रीय व्यक्तियों के बराबर है। इसके बदले वह दिखाता है कि हम स्वर्ग के स्वर्गदूतों के साथ भी मेल रखते हैं, क्योंकि यीशु मसीह ने झुककर हमारा भाई होना स्वीकार किया है और भाईचारे में अपने आपको हमारे साथ एक कर लिया है। इसलिए जब हम परमेश्वर से प्रार्थना करें, तो हमें उसकी असीम महिमा के प्रति श्रद्धा और उसके स्वीकार करने पर भरोसे, दोनों के साथ उसके पास आना चाहिए। हम निडर होकर परमेश्वर को अपना पिता कह सकते हैं, क्योंकि उसने हमें अपनी सन्तान के रूप में गोद लिया है, और गोद लिए जाने के द्वारा यीशु मसीह हमारा भाई है। हमें सन्देह नहीं करना चाहिए कि जब हम अपने प्रभु यीशु मसीह के साथ एक होकर परमेश्वर के पास आते हैं, तब स्वर्ग के सब स्वर्गदूत हमें अपने भाई-बन्धु जानकर स्वीकार करते हैं।
इसके विपरीत, यदि हम इस मार्ग से हटें, तो ठुकराए जाने का जोखिम उठाते हैं, और स्वर्गदूत भी हमारे विरोधी बनकर हमारी प्रार्थनाओं के विरुद्ध हो सकते हैं। इसलिए आओ, हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने दीन हों, अपने दोष मानें और प्रार्थना करें कि वह हमारे जीवन को सुधारे, कि हमारे कार्य दिखाएँ कि हमने उसकी पाठशाला में अपना समय व्यर्थ नहीं गँवाया। आओ, हम सब बातों में उसे प्रसन्न करने का प्रयत्न करें, यह जानते हुए कि हम सिद्धता से उसकी सेवा नहीं कर सकते, और जब तक हम आवश्यकता के समय उसे खोजते रहेंगे, वह हमारी दुर्बलताओं को सह लेगा। अन्त में, आओ, हम मिलकर कहें, "हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता, इत्यादि।"
