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इफिसियों 1:15-18 पर पहले अध्याय का छठा उपदेश
"इस कारण मैं भी, उस विश्वास का समाचार सुनकर जो तुम लोगों में प्रभु यीशु पर है, और सब पवित्र लोगों के प्रति प्रेम है, तुम्हारे लिये धन्यवाद करना नहीं छोड़ता, और अपनी प्रार्थनाओं में तुम्हें स्मरण किया करता हूँ; कि हमारे प्रभु यीशु मसीह का परमेश्वर जो तेजोमय पिता है, तुम्हें अपनी पहचान में ज्ञान और प्रकाश का आत्मा दे। और तुम्हारे मन की आँखें ज्योतिर्मय हों कि तुम जान लो कि उसके बुलाने से कैसी आशा होती है, और पवित्र लोगों में उसकी मीरास की महिमा का धन कैसा है।"—इफिसियों 1:15-18
हम पहले देख चुके हैं कि सन्त पौलुस ने इफिसियों को उनके उद्धार के न केवल मुख्य, वरन् एकमात्र स्रोत की ओर निर्देशित किया। उसने स्पष्ट कर दिया कि उन्हें अपना सारा उद्धार परमेश्वर ही का ठहराना चाहिए, और उसमें किसी मूर्खतापूर्ण अभिमान को मिलाना नहीं चाहिए। उन्हें यह विचार मन में नहीं लाना चाहिए कि उन्होंने परमेश्वर के अनुग्रह में किसी भी रीति से कुछ योगदान दिया, चाहे अपनी स्वतंत्र इच्छा के द्वारा, चाहे अपने अच्छे इरादों के द्वारा।
इस प्रकार सन्त पौलुस ने दिखा दिया है कि न केवल वे इफिसियों जिनसे वह बात कर रहा था, वरन् उनसे पहले परमेश्वर की कलीसिया के जितने भी लोग थे, सबको खुलकर मान लेना चाहिए कि उनका कल्याण केवल परमेश्वर की मुफ़्त कृपा से उत्पन्न हुआ। यह इसलिए सच था कि वे सब हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा छुड़ाए गए थे, और इसलिए भी कि परमेश्वर ने उन्हें जगत की उत्पत्ति से पहले उनके चुनाव के अनुसार सुसमाचार पर विश्वास करने के लिये बुलाया था।
अब वह परमेश्वर के सामने साक्षी देकर इसी शिक्षा की फिर पुष्टि करता है, और परमेश्वर की भलाई पर तब भी बल देता है जब वह मनुष्यों की दृष्टि और सब गवाहों से अलग प्रतीत होता है। निश्चय ही सुसमाचार की शिक्षा जब सारे संसार के सामने खुले रूप से प्रचार की जाती है, तब भी उसका मूल्य कम नहीं आँका जाना चाहिए। फिर भी जो उसका प्रचार करता है उसके हृदय में वह गहराई से अंकित होनी चाहिए, ताकि वह अपने आप से और परमेश्वर तथा उसके स्वर्गदूतों के सामने वही बात कहे जो वह मनुष्यों के सामने कहता है। नहीं तो वह केवल शोर होगा, या यों कहें कि परमेश्वर के वचन का अपमान। यदि कोई बड़ी वाक्पटुता से प्रचार करे, पर जो प्रचार करता है उसकी उसके अपने मन में प्रतीति न हो, तो उसके लिये सौ बार डूब मरना ही भला होगा।
इसलिए यह अकारण नहीं कि सन्त पौलुस ने परमेश्वर के चुनाव और बुलाहट में उसकी मुफ़्त कृपा का वर्णन करने के बाद, और अपने चुने हुओं को अपने सामर्थी हाथ से दृढ़ करके उन्हें अटल स्थिरता और दृढ़ता देने की बात कहने के बाद, अब यह जोड़ दिया कि परमेश्वर उसकी सच्चाई और तत्परता को जानता है जिससे वह इसकी गवाही देता है। वह अपनी उन प्रार्थनाओं की साक्षी देता है जो उसने अकेले में की थीं, जब कोई उसके विचारों या उसके कहे शब्दों को नहीं जान सकता था, और जिनमें वह परमेश्वर के सामने वही शिक्षा मान रहा था। तब भी वह प्रार्थना करता है कि परमेश्वर ने जो आरम्भ किया है उसे पूरा करे।
यहाँ सबसे पहले यह ध्यान देना अवश्य है कि जो कलीसिया की उन्नति में लाभदायक होना चाहते हैं, और जिनमें सच्ची धुन है, उन्हें केवल सिखाने में ही नहीं लगे रहना चाहिए, वरन् उत्कट रूप से परमेश्वर से विनती भी करनी चाहिए कि वह अपनी सामर्थ्य और अनुग्रह के साथ उनके संग कार्य करे। प्रायः हम केवल "हवा को पीटते" रह जाते हैं, चाहे हमारे पास स्वर्गदूतों की सी वाक्पटुता ही क्यों न हो, क्योंकि हम यह प्रार्थना नहीं करते कि परमेश्वर हमारी शिक्षा को प्रभावशाली बनाए। हम तो निकम्मे औज़ार मात्र हैं, और परमेश्वर ने हमें बोलने का जो वरदान दिया है, उसमें उसी को सामर्थ्य भरनी होगी। जैसा कहा गया है, "न तो लगानेवाला कुछ है, और न सींचनेवाला, परन्तु परमेश्वर जो बढ़ानेवाला है" [1 कुरिन्थियों 3:7]। इसलिए जिन्हें परमेश्वर की कलीसिया को सिखाने का काम सौंपा गया है, उन्हें अपने कर्तव्य के पास श्रद्धा और परिश्रम के साथ आना चाहिए। उन्हें केवल लोगों को परमेश्वर की ओर ले जाने का यत्न ही नहीं करना चाहिए, वरन् अपनी अयोग्यता को भी नम्रता से स्वीकार करना चाहिए। वे तो हवा में गूँजती प्रतिध्वनि मात्र हैं, जो शीघ्र ही विलीन हो जाती, यदि परमेश्वर का आत्मा अपने रहस्यमय कार्य के द्वारा उनके साथ न होता। सन्त पौलुस के इन वचनों से हमें यही शिक्षा लेनी चाहिए।
फिर हममें से हर एक इस सिद्धान्त को अपने जीवन में भी लागू करे। जब हम परमेश्वर का वचन पढ़ने बैठते हैं, या जब हममें से कोई उसे अकेले पढ़ता है, तब हमें यह नहीं मान लेना चाहिए कि हमारी बुद्धि इतनी विवेकशील है कि पवित्रशास्त्र जो कुछ सिखाता है उसे पूरी तरह समझ ले। इसके बदले हमें अपनी समझ की कमी को मानकर परमेश्वर से विनती करनी चाहिए कि वह अपनी शिक्षा को हमारे भीतर जड़ पकड़ने दे, ताकि वह हमारे हाथ से निकल न जाए। इस स्थल में सन्त पौलुस की रीति इस बात पर प्रकाश डाल सकती है, यदि हम उसके प्रयुक्त शब्दों को ध्यान से तौलें।
वह कहता है कि इफिसुस की कलीसिया में जिस विश्वास का समाचार उसने सुना, और "सब पवित्र लोगों के प्रति उनके प्रेम" के कारण वह "निरन्तर परमेश्वर का धन्यवाद करता है।" फिर भी वह परमेश्वर से विनती करता रहता है कि वह उन्हें और ज्योति दे और उस सिद्धता तक पहुँचाए जिसकी आकांक्षा सब विश्वासियों को तब तक रखनी चाहिए जब तक परमेश्वर उन्हें इस संसार से उठा न ले। उसके इस कथन में कि वह धन्यवाद देना नहीं छोड़ता, हमें इस बात का नमूना मिलता है कि विश्वासियों को अपना समय किस प्रकार बिताना चाहिए। परमेश्वर जिस मुख्य भेंट की माँग करता और जिसे ग्रहण करता है वह है उसकी आशीषों को मानना और उसकी योग्य स्तुति करना। यह कभी-कभार की बात नहीं, वरन् निरन्तर होनी चाहिए। जैसे परमेश्वर निरन्तर अपनी आशीषें देता है, वैसे ही हममें से हर एक के लिये उचित है कि उसे अनवरत धन्य कहने और बड़ा मानने में अथक परिश्रम करे। सन्त पौलुस, इफिसियों को आशीर्वाद देते हुए, यही भाव अन्य सब कलीसियाओं के लिये भी रखता है। परमेश्वर की दी हुई भलाइयों को न पहचानना अनुचित होगा। हम सब पर अपने भाइयों के लिये भी परमेश्वर की स्तुति करने का कर्तव्य है। यदि हमें पता चले कि परमेश्वर ने अपनी कलीसिया पर आशीष दी है, या अपने लोगों पर दया की है, चाहे वे दूर ही क्यों न हों, तो हमारे मुँह बिना चूके स्तुति के लिये खुलने चाहिए।
यदि उन आशीषों के लिये भी धन्यवाद देना हमारा कर्तव्य है जिन्हें हम देख नहीं पाते, पर जो हमारे दूर बसे पड़ोसियों को मिली हैं, तो जब परमेश्वर हमें आत्मिक अनुग्रह के वरदानों से धनी करता है, जो हमें इस संसार की सीमाओं से कहीं आगे ले जाते हैं, तब हम पर यह कर्तव्य और कितना अधिक है! परमेश्वर हमारे प्रति जो भरपूर उदारता दिखाता है, उसे देखते हुए यदि हम सन्त पौलुस के उदाहरण का अनुसरण न करें और अपना सारा जीवन परमेश्वर के नाम की निरन्तर स्तुति में न लगा दें, तो हमारे पास कोई उचित बहाना नहीं।
सन्त पौलुस आगे दिखाता है कि विश्वास और प्रेम परमेश्वर के दान हैं, हमारे अपने बनाए हुए नहीं, चाहे कुछ लोग भ्रमित अभिमान में कुछ भी सोचें। वह इफिसियों में पाए गए विश्वास और प्रेम के लिये सचमुच परमेश्वर का धन्यवाद करता है। यदि विश्वास और भरोसा हर मनुष्य को अपने आप, या अपनी इच्छा-शक्ति से प्राप्त हो सकते, तो इन वरदानों के लिये परमेश्वर का धन्यवाद करना अन्याय होता। यदि हम उसका ऋणी होने का दावा करें उस वस्तु के लिये जो हमने कहीं और से पाई, तो वह धन्यवाद एक उपहास ठहरता। सन्त पौलुस परमेश्वर के नाम की बड़ाई इसलिए करता है कि उसने इफिसियों को विश्वास में प्रकाशित किया और उनके हृदयों को प्रेम में ढाला। इसलिए हर आशीष अन्ततः परमेश्वर ही से आती है।
अन्यजातियों का विश्वास उन्हें प्रायः यह मानने की ओर ले जाता था कि उनका सौभाग्य केवल उनके अपने पराक्रम और सामर्थ्य का फल है, और वे परमेश्वर के कुछ ऋणी नहीं। पोपवादियों में से कुछ भले परमेश्वर के अनुग्रह को कोई भूमिका दे दें, फिर भी वे विश्वास प्राप्त करने में मनुष्य के प्रयास का समर्थन करते हैं। सन्त पौलुस इन भ्रामक विचारों को दृढ़ता से ठुकराता है और घोषणा करता है कि जब भी कोई कलीसिया या कोई जाति सुसमाचार को ग्रहण करती है, तो पूरी महिमा परमेश्वर की है, क्योंकि उसके हाथ ने ही इसमें काम किया होगा। अपने ही हाल पर छोड़े जाने पर हम स्वभाव से भलाई की ओर नहीं झुकते, जब तक पवित्र आत्मा हमारी अगुवाई न करे, हमें न चलाए, और कभी-कभी हमें विवश भी न करे। हमारा जन्मजात विद्रोह इतना गहरा जमा हुआ है कि हम केवल निर्बल ही नहीं, जैसा कि कुछ पोपवादी कहते हैं, वरन् जब तक वह हमें बदल न दे, परमेश्वर के सर्वथा विरुद्ध हैं। इसी कारण वह अपने भविष्यद्वक्ता यहेजकेल के द्वारा पत्थर के हृदयों को माँस के हृदयों में बदलने की बात कहता है, जो उस कोमलता और अधीनता का संकेत है जो उसके प्रति आवश्यक है।
फिर, इन दो मूल बातों, विश्वास और प्रेम, में सन्त पौलुस सम्पूर्ण मसीही सिद्धता को समेट लेता है। व्यवस्था की पहली तख़्ती का मुख्य उद्देश्य यह है कि हम उस एक परमेश्वर का आदर करें, सब बातों में उसी पर भरोसा रखें, अपनी निर्भरता को मानें, केवल उसी में शरण लें, और अपना जीवन उसकी सेवा में अर्पित करें। यही व्यवस्था की पहली तख़्ती का सार है। इसके विपरीत दूसरी तख़्ती न्याय और धार्मिकता से जीने पर ध्यान देती है, कि हम अपने पड़ोसियों के साथ ऐसा व्यवहार करें जो सबकी सहायता चाहे और किसी की हानि न करे। परमेश्वर ने हमें अपनी व्यवस्था में धार्मिक जीवन के लिये एक उत्तम और परिपूर्ण मार्गदर्शन दिया है, जिसमें कुछ जोड़ा नहीं जा सकता।
इसलिए यह अकारण नहीं कि सन्त पौलुस यीशु मसीह में विश्वास और प्रेम को सम्पूर्ण मसीही जीवन के व्यापक सार के रूप में प्रस्तुत करता है, और दिखाता है कि हमें किस मार्ग पर चलना और किन मानकों को बनाए रखना चाहिए। परन्तु यह पहचानना आवश्यक है कि 'विश्वास' शब्द में सन्त पौलुस हमारी सम्पूर्ण ईश्वरीय सेवा को सम्मिलित करता है। जब हम परमेश्वर की उस असीम भलाई को समझ लेते हैं जो उसके एकलौते पुत्र के द्वारा प्रकट हुई, तो यह अनिवार्य है कि हम अपने स्वर्गीय पिता के प्रेम में डूब जाएँ। परमेश्वर हमें भ्रम और मृत्यु के गड्ढे से छुड़ाता है, अपने स्वर्गीय राज्य के द्वार हमारे लिये खोल देता है, और घोषणा करता है कि वह हमें अपने बच्चों के रूप में अपनाना चाहता है। ऐसे गम्भीर सत्य सुनकर हम बिना अपने आप को पूरी रीति से उसे सौंपे, संसार को त्यागे, और उस अन्धकार से घृणा किए जो हमें उसकी तेजोमय उपस्थिति से अलग करता है, कैसे विश्वास कर सकते हैं? इसलिए 'विश्वास' का अर्थ है परमेश्वर के प्रति पूर्ण मन से समर्पण।
फिर, विश्वास कोई निष्क्रिय अवस्था नहीं; उसमें परमेश्वर की ओर गहरा मुड़ना सम्मिलित है। जब पाप हमारे प्राणों को कलंकित करता है, तब विश्वास हमें प्रार्थना के द्वारा उसकी चंगाई खोजने की ओर ले जाता है। हमारे सामने आनेवाली हर आवश्यकता एक ईश्वरीय संकेत है जो हमें उसके निकट आने को प्रेरित करती है। इसलिए विश्वास में प्रार्थना और विनती सम्मिलित है। उसमें परमेश्वर पर अपना अटल भरोसा रखकर और वह महिमा देकर जो स्वभाव से केवल उसी की है, उसके नाम को पवित्र ठहराना भी सम्मिलित है। हम समझते हैं कि सब कुछ उसकी असीम उदारता से बहता है, और वह हमसे धन्यवाद की नम्र भेंट के सिवा और कुछ नहीं चाहता। इसलिए विश्वास में व्यवस्था की पहली तख़्ती में दिए गए सब सिद्धान्त सम्मिलित हैं।
सच है कि यह एक ऐसा अंश है जो पूर्ण का प्रतीक है, फिर भी हमें सदा स्मरण रखना चाहिए कि ये बातें अलग नहीं की जा सकतीं। हमें यह भी स्मरण दिलाया जाता है कि अपने संगी मनुष्यों के साथ धार्मिकता और न्याय से जीना आवश्यक है, जैसा भजन संहिता 15:2-3 में कहा गया है। हम मानते हैं कि हम अपनी सब आशीषों के लिये सदा परमेश्वर के ऋणी हैं, और यह भी कि हमारा सर्वोत्तम प्रयास उसे कभी सचमुच चुका नहीं सकता। जब हम परमेश्वर के पास कोई भेंट लाने का यत्न करते हैं, तो उसकी दृष्टि में उसका मूल्य बहुत कम होता है। तो फिर वह सचमुच क्या चाहता है? वह चाहता है कि हम उसके भक्त लोगों के प्रति भलाई के कार्य करें, जिस बात पर सन्त पौलुस ने इस स्थल में स्पष्ट रूप से बल दिया है।
यह निर्विवाद है कि हमें अपने विरोधियों से भी प्रेम करने के लिये बुलाया गया है, क्योंकि उनसे प्रेम किए बिना और उनकी सहायता का यत्न किए बिना हम परमेश्वर की सन्तान होने का दावा नहीं कर सकते; फिर भी इससे परमेश्वर की सब सन्तानों के प्रति भाईचारे का स्नेह बढ़ाने का महत्त्व घटता नहीं। उनके साथ हमारा एक विशेष बन्धन है। ठीक इसी कारण सोलहवें भजन में यह ज़ोर देकर कहा गया है, और सन्त पौलुस ने इस स्थल में दोहराया है, कि हमें सब विश्वासियों के प्रति प्रेम को पोषित करना चाहिए। एक और स्थान पर सन्त पौलुस इस आज्ञा से उत्पन्न कठिनाई की चर्चा करता है, और हमें सब मनुष्यों से सामान्य रूप से, और विशेष करके विश्वासी घराने के लोगों से प्रेम करने का निर्देश देता है। इसलिए परमेश्वर हमें बुलाता है कि हम उसके स्वरूप का अनुकरण करें, उसके उदाहरण पर चलकर सब पर भलाई के कार्य करें, उन पर भी जो उसके योग्य न दिखाई दें, यहाँ तक कि हम उनके कल्याण का भी यत्न करें जो हमारे प्रति बुरी मंशा रखते हों।
इसके अतिरिक्त, चूँकि परमेश्वर ने अपना ईश्वरीय स्वरूप सब विश्वासियों पर अंकित किया है और उन्हें हमारी देखभाल में सौंपा है, इसलिए उनके प्रति गहरा भ्रातृ-प्रेम रखना हमारा पवित्र कर्तव्य बन जाता है। जब-जब हम उनमें परमेश्वर के वरदानों को कार्य करते देखें, तब-तब हमें उन्हें अत्यन्त आदर देना चाहिए, भजन संहिता 15:4 की बुद्धि के अनुसार, जो हमें चेतावनी देती है कि जो परमेश्वर का भय मानते हैं उन्हें अपनाएँ और जो दुष्टता की राह पर चलते हैं उनसे दूर रहें। जब हम परमेश्वर के भक्त लोगों में उसकी उपस्थिति के स्पष्ट चिह्न देखते हैं, तो उचित ही है कि हम उनसे गहरा प्रेम करने को प्रेरित हों। सार यह कि सन्त पौलुस यहाँ धर्मी और पवित्र जीवन की सम्पूर्ण रूपरेखा समेट देता है, और ज़ोर देता है कि हमें पहले अपने आप को पूरी रीति से परमेश्वर के ईश्वरीय प्रभुत्व के अधीन कर देना और दृढ़ता से उसी से लिपटे रहना चाहिए। दूसरे, हमें अपने संगी मनुष्यों के साथ व्यवहार में आदर और धार्मिकता का जीवन जीना चाहिए, बुरे कामों से दूर रहना, और अपनी पूरी शक्ति और सामर्थ्य भर सबकी भलाई करने का परिश्रम से यत्न करना चाहिए। यह उत्तम कार्य हम कैसे पूरा कर सकते हैं? अपने प्रति अपने स्वर्गीय पिता की असीम भलाई को पहचानकर, उसकी निरन्तर आशीषों को मानकर, और प्रतिदिन उसकी कृपा में सहभागी होकर। हमारा अस्तित्व उसी पर टिका है, और वही हमारे अनन्त उद्धार का एकमात्र सोता है, जो हमें विवश करता है कि हम निरन्तर उसे पुकारें और अपनी पृथ्वी की यात्रा भर हार्दिक धन्यवाद चढ़ाते रहें।
फिर, दूसरे पहलू के सम्बन्ध में यह समझना आवश्यक है कि हम अपने पड़ोसियों से सच्चा प्रेम तभी कर सकते हैं जब हम संयम का जीवन जिएँ, हानिकारक उदाहरणों से बचें, और अपना आचरण ऐसा रखें कि निन्दा के लिये कोई स्थान न रहे। उस व्यभिचारी के कार्यों में, जो दूसरे के विवाह को कलंकित करना चाहता है, या उस चोर के कार्यों में, जो दूसरे की सम्पत्ति लेकर भाग निकलना चाहता है, किस प्रकार का प्रेम पाया जा सकता है? चूँकि हमारा जीवन आदर और खरेपन से आलोकित होना चाहिए, इसलिए लम्पटता, निन्दा या ऐसे ही दुर्गुणों में पड़ना न केवल दूसरों को हानि पहुँचाता है, वरन् चोरी, लूट और बेलगाम भोग-विलास की ओर भी ले जाता है। इसलिए यदि हम सचमुच अपने संगी मनुष्यों से प्रेम रखते हैं, तो हमें धार्मिकता और न्याय का जीवन जीना चाहिए, और अपने कार्यों को ऐसे संचालित करना चाहिए कि हम व्यर्थ की बातों में न उलझें। पोपवादियों के रीति-रिवाज़ों के विपरीत, जो प्रायः विस्तृत रस्में निभाते हैं और बिना सोचे-समझे बड़बड़ाने तथा तीर्थयात्राओं को परमेश्वर की उपासना का रूप मानते हैं, हमें परमेश्वर की ईश्वरीय बुलाहट के अनुसार सद्गुणी जीवन के मार्ग पर बने रहना चाहिए। निष्फल परिश्रम में न पड़ने के लिये हमें ध्यान से देखना चाहिए कि परमेश्वर किस बात से प्रसन्न होता है, और विश्वासयोग्यता से उसी पर चलना चाहिए। जब हम सदा उस मार्ग पर चलते हैं जो उसके पवित्र वचन में बताया गया है, तो मार्ग से भटकना सम्भव नहीं, विशेषकर इसलिए कि प्रभु हमारे जीवन से अपनी अपेक्षाएँ इतने संक्षिप्त और सीधे-सादे ढंग से बता देता है। यदि ये अपेक्षाएँ लम्बी और जटिल होतीं, तो कोई विद्या या स्मरण-शक्ति की कमी का बहाना बना सकता था। परन्तु जब प्रभु अपनी सारी इच्छा केवल थोड़े से शब्दों में कह देता है, तब हमें मानना पड़ता है कि इतनी छोटी, सारगर्भित और स्पष्ट शिक्षा को याद न रख पाना हमारे ही हठ, चतुराई और उसकी ईश्वरीय सम्मति पर कान न देने के जानबूझकर किए गए इनकार का परिणाम है।
अन्त में यह भी ध्यान देने योग्य है कि जब सन्त पौलुस 'विश्वास' शब्द का प्रयोग करता है, तो वह जानबूझकर एक गहरे कारण से 'यीशु मसीह में विश्वास' कहता है। प्राचीन पितरों के सामने परमेश्वर का ईश्वरीय स्वरूप सदा रखा रहता था, क्योंकि उन्हें वाचा के सन्दूक के सामने बलिदान चढ़ाने होते थे, जिसमें ईश्वरीय दया प्रतीक रूप में प्रकट होती थी। उनके पास किसी और मार्ग से परमेश्वर की सुनवाई या दया की आशा रखने का कोई कारण नहीं था, क्योंकि उनके पास सन्दूक का दृश्य स्वरूप था। परन्तु हमें यीशु मसीह दिया गया है, जो स्वयं परमेश्वर का जीवित स्वरूप है, यद्यपि परमेश्वर का अपना स्वभाव नश्वर आँखों के लिये अदृश्य ही रहता है। सन्त पौलुस बड़ी बुद्धि से घोषणा करता है कि परमेश्वर तब तक अगम्य रहता है जब तक वह अपने प्रिय पुत्र के द्वारा अपने आप को प्रकट करना न चाहे।
यीशु मसीह को अपना मार्गदर्शक पाकर, जो परमेश्वर का यथार्थ स्वरूप है, हमारी दृष्टि उसी पर दृढ़ता से टिकी रहनी चाहिए। इसी से स्पष्ट होता है कि उसे क्यों उचित रूप से 'अपने पिता परमेश्वर की सामर्थ्य का यथार्थ स्वरूप' कहा जाता है। यद्यपि हम पिता और पुत्र के भिन्न व्यक्तित्वों को मानते हैं, फिर भी वह मसीह ही है जो हमारे उद्धार का अनिवार्य मार्ग हमें प्रकट करता है। जैसा सन्त यूहन्ना ने घोषित किया है, पुत्र को जानना स्वभावतः हमें पिता तक पहुँचाता है, और जो पुत्र से मुँह मोड़ते हैं, वे पिता के पास आने का चाहे कितना ही दावा करें, अस्वीकृत ही ठहरते हैं। इसलिए जब हमें यहाँ यीशु मसीह में विश्वास रखने की चेतावनी दी जाती है, तब हम उसकी उस सम्मति पर कान दें जो उसने अपने चेलों को दी: 'तुम परमेश्वर पर विश्वास रखते हो, मुझ पर भी विश्वास रखो।' ऐसा कहकर वह यह समझ प्रकाशित करता है कि पुरानी वाचा के अधीन जीनेवाले आदरणीय पितरों के पास, उसके जगत में आने तक, ईश्वरीय प्रकाशन की केवल धुँधली छायाएँ ही थीं। वे जीवते परमेश्वर की सच्ची भक्ति से उपासना करते थे, पर उसके पास बिचौलियों और चिह्नों के द्वारा आते थे। उनके पास वह उज्ज्वल स्पष्टता नहीं थी जो अब सुसमाचार के अधीन हमें प्राप्त है। इसलिए मसीह को परमेश्वर का स्वरूप, उस स्वभाव से अदृश्य परमेश्वर का स्वरूप, कहना उचित है, क्योंकि जब तक वह स्वयं इस रीति से अपने आप को प्रकट करना न चाहता, हम उसे सचमुच समझ नहीं सकते थे।
सारांश यह कि हम दृढ़ता से यह समझ लें कि जब तक हमारे विश्वास को यीशु मसीह में अटल नींव नहीं मिलती, तब तक हमारे सारे यत्न सच्चे मूल्य से रिक्त रहते हैं। जब हम उन अनगिनत भूलों की जाँच करते हैं जो अब भी संसार में फैली हुई हैं, तब यह यथार्थ और भी स्पष्ट हो जाता है। पोपवादी, तुर्कों और यहूदियों की नाईं, परमेश्वर में अपने विश्वास का बड़े उत्साह से अंगीकार कर सकते हैं। उदाहरण के लिये यहूदी उस जीवते परमेश्वर की उपासना का दावा करते हैं जिसने मूसा के द्वारा अपनी व्यवस्था दी। परन्तु जब वे यीशु मसीह को, जो उसी व्यवस्था की पूर्णता और सार है, ठुकराते हैं, तब इस दावे का क्या मूल्य रह जाता है? जहाँ तक पोपवादियों की बात है, यद्यपि वे अपने आप को मसीही कहते हैं और यीशु मसीह को अपना उद्धारकर्ता मानते हैं, फिर भी स्पष्ट है कि वे उसकी शिक्षाओं के विरोध में खड़े हैं। उन्होंने परमेश्वर की सेवा करने की अपनी ही रीति गढ़ ली है, और ऐसे आचार बनाए हैं जो अव्यवस्था से भरे हैं। तुर्क बड़े साहस से घोषणा कर सकते हैं, "सर्वशक्तिमान परमेश्वर, आकाश और पृथ्वी का सृजनहार," पर क्या हम सचमुच मान सकते हैं कि परमेश्वर अपनी ही उस आज्ञा को वापस ले लेगा कि कोई उसके प्रिय पुत्र के द्वारा ही उसके पास आ सकता है, जिसे उसने अपने और मनुष्यों के बीच एकमात्र मध्यस्थ ठहराया है? हम देखते हैं कि पोपवादी परमेश्वर में विश्वास का अंगीकार करते हैं, फिर भी अपनी ओर से बिचौलियों के रूप में संरक्षक सन्तों और वकीलों को पुकारते रहते हैं। उनके लिये केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के लहू से छुड़ाया जाना काफ़ी नहीं; वे अपने ही पुण्य ले आते हैं और अपने प्रयास से अपने पापों का प्रायश्चित करने का यत्न करते हैं। जब वे परमेश्वर के विरुद्ध अपराध करते हैं, तो मेल-मिलाप के नाना उपायों का सहारा लेते हैं। पोपवादियों के विश्वासों की निकट से जाँच करने पर पता चलता है कि वह उनकी अपनी कल्पनाओं का बुना हुआ ताना-बाना है, जिसमें वे यीशु मसीह के साथ जो भी विचार चाहें बुन लेते हैं, जबकि वह सर्वोपरि होना चाहिए।
सन्त पौलुस हमें हमारे विश्वास के प्रामाणिक माप की ओर ले जाता है, जो यीशु मसीह पर टिके रहने में दृढ़ता से जमा है। हमें पूरे मन से मानना चाहिए कि हममें कोई धार्मिकता नहीं है, और उसकी असीम भरपूरी से लेकर हर भली वस्तु से परिपूर्ण होना चाहिए, नहीं तो हम दण्ड के भागी होंगे। यदि स्वर्ग के सब स्वर्गदूत भी हमारे पक्ष में हों (यदि ऐसी बात सोची भी जा सके), तब भी उससे कुछ न मिलेगा सिवाय घबराहट के, जब तक हम सिर से दृढ़ता से लिपटे न रहें, जैसा सन्त पौलुस ने कुलुस्सियों की पत्री के पहले और दूसरे अध्याय में कहा है। इस प्रकार इस घोषणा से जो गम्भीर शिक्षा हमें लेनी चाहिए वह अत्यन्त स्पष्ट हो जाती है।
अब, जब सन्त पौलुस इफिसुस की कलीसिया में ईश्वरीय अनुग्रह के प्रकट होने के लिये परमेश्वर का हार्दिक धन्यवाद करता है, तब वह यह भी बताता है कि वह सर्वशक्तिमान के सामने निरन्तर प्रार्थनाएँ चढ़ाता रहता है। यह हमें मार्मिक रूप से स्मरण दिलाता है कि जब हम देखें कि परमेश्वर अपनी सन्तान पर अपने उत्तम वरदान भरपूरी से उण्डेल रहा है, तब उनकी निरन्तर बढ़ती के लिये उससे विनती करना हमारा कर्तव्य है। इसके दो प्रमुख कारण हैं। पहला, आज जो दृढ़ खड़े हैं वे कल लड़खड़ा सकते हैं, क्योंकि हमारा मानव स्वभाव निर्बलता की ओर झुका रहता है। दूसरा, परमेश्वर का अनुग्रह निरन्तर ऊपर चढ़ता रहना चाहिए, क्योंकि प्राण की बढ़ती और आत्मिक विकास के लिये ईश्वरीय कृपा का अनवरत उण्डेला जाना आवश्यक है। सार यह कि हममें जो सबसे सिद्ध आत्माएँ हैं, वे भी यदि अपनी भीतरी कंगालियत की बारीकी से जाँच करें, तो अपने आप को छोटा मानने के बहुत कारण पाएँगे। इसलिए सन्त पौलुस हमें प्रोत्साहित करता है कि जब हम परमेश्वर के उन अनुग्रहपूर्ण वरदानों के लिये उसकी बड़ाई करें जो उसने अपने चुने हुओं पर उण्डेले हैं, तब अपने धन्यवाद के साथ प्रार्थना भी जोड़ें। क्यों? क्योंकि यह उचित है कि प्रभु ने जो आरम्भ किया है उसे पूरा करे, और हमें इस प्रतीति के साथ बिना चूके उसके पास आना चाहिए कि प्रभु अपने हाथों के काम को नहीं छोड़ेगा, वरन् उसे सिद्ध करेगा।
दूसरों की ओर से जो करने के लिये हम बुलाए गए हैं, वह हमारी अपनी आत्मिक भलाई के लिये भी उतना ही अनिवार्य है। सार यह कि हमें यहाँ बुलाया जाता है कि हम परमेश्वर की भलाई और उसके दिए वरदानों को इस प्रकार बड़ा मानें कि हम अपने भीतर की अपर्याप्तता के प्रति पूरी तरह सचेत हो जाएँ। हमारी आत्मिक यात्रा के लिये यह अनिवार्य है कि परमेश्वर हमें यात्रा के अन्त तक स्थिर रहने का वरदान दे। साथ ही, वह हमारे प्राणों को बिगाड़ने वाली शेष अपूर्णताओं को सुधारे और हममें अपना अनुग्रह बढ़ाता रहे, उस दिन तक जब हम सम्पूर्ण सिद्धता पाएँगे, जो इस नश्वर देह से छूटने पर ही प्राप्त होती है।
फिर भी, इस शिक्षा के सर्वोपरि महत्त्व के बावजूद, हम इस निराशाजनक यथार्थ की अनदेखी नहीं कर सकते कि शैतान ने कुछ प्राणों को आत्मिक सिद्धता की एक दोषपूर्ण धारणा में फँसा लिया है। इस भ्रम में वे प्रभु की प्रार्थना को टुकड़ा मात्र बना देते हैं, और केवल आरम्भिक तीन विनतियों पर ही ध्यान लगाते हैं, अर्थात् परमेश्वर के नाम के पवित्र माने जाने, उसके राज्य के आने, और उसकी इच्छा के पूरी होने की विनतियों पर। प्रार्थना का शेष भाग, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने अनुग्रह करके हमें दिया है, उसकी वे उपेक्षा करते हैं। मेरे पास उनके अपने हाथ के लिखे प्रमाण हैं, और उनके चेले इस शोचनीय तथ्य के गवाह हैं। यह गम्भीर भूल करके वे अनजाने में परमेश्वर को वह आदर और स्वीकृति देने से रुक जाते हैं कि हम अब भी अपनी जन्मजात निर्बलताओं का बोझ ढोते हैं, अनेक भ्रष्टताओं से जूझते हैं, और नाना प्रकार के दुर्गुणों से लड़ते हैं। इसलिए परमेश्वर को प्रतिदिन इन अशुद्धियों से हमें निरन्तर शुद्ध करना होगा, जब तक वह हमें उस सिद्धता की चोटी पर न पहुँचा दे जिसके लिये उसने हमें बुलाया है।
हमें इस शिक्षा के पास अत्यन्त सावधानी और विवेक से आना चाहिए, क्योंकि पोपवादी, अपनी भूलों के बावजूद, झूठ में उतनी गहराई तक नहीं गिरे जितनी गहराई तक वे गिरे हैं जो अब अपनी घातक शिक्षाओं को गुप्त सभाओं और एकान्त मण्डलियों में फैलाते हैं। इसलिए हम सजग और ध्यान देनेवाले रहें उस गम्भीर शिक्षा के प्रति जो पवित्र आत्मा सन्त पौलुस के द्वारा देता है, जब वह परमेश्वर से अपनी निरन्तर प्रार्थनाओं की बात करता है। प्रश्न उठता है: उसने यह पवित्र कार्य क्यों आरम्भ किया? जैसा मैं पहले समझा चुका हूँ, इफिसुस की मण्डली अद्भुत रीति से बढ़ चुकी थी, और जैसा सन्त पौलुस संकेत करता है, परमेश्वर और उसके पवित्र आत्मा के वरदान उनमें भरपूर थे। अपने समापन के शब्दों में वह सर्वशक्तिमान से विनती करता है कि उन्हें वह दे जिसकी उनमें अभी कमी है और जिसकी उन्हें अब भी आवश्यकता है। इसलिए हमें समझना चाहिए कि हम जितने अधिक आशीषित और समृद्ध हुए हैं, उतनी ही अधिक उत्कटता से हमें अपने आप को दीन करना और गहरी नम्रता के साथ परमेश्वर से विनती करनी चाहिए कि जो उसने आरम्भ किया है उसे पूरा करे, और हममें अपने ईश्वरीय वरदान तब तक बढ़ाता रहे जब तक हम और कुछ न चाहें। इस विषय पर चौथे अध्याय में बताई गई आगामी सभा में और गहराई से विचार किया जाएगा।
अब हम सन्त पौलुस के प्रयुक्त ठीक-ठीक शब्दों पर ध्यानपूर्वक विचार करें। वह एक सामर्थी पुकार से आरम्भ करता है, "हमारे प्रभु यीशु मसीह का परमेश्वर, तेजोमय पिता," अर्थात् महिमामय पिता (क्योंकि इब्रानी भाषा में 'महिमा का पिता' का अर्थ 'महिमामय पिता' ही है)। वह सर्वशक्तिमान से उत्कट विनती करता है कि हमें वह आत्मिक ज्योति दे जो उसे पूरी रीति से समझने के लिये आवश्यक है। हमारा ध्यान यीशु मसीह की ओर निर्देशित करके सन्त पौलुस घोषणा करता है कि जिस परमेश्वर को वह पुकारता है वही हमारे प्रभु यीशु मसीह का पिता है, और इस प्रकार वह अपनी अटल प्रतीति प्रकट करता है कि उसकी प्रार्थनाएँ सुनी जाएँगी। उसका उद्देश्य इफिसियों को प्रार्थना की इसी रीति और ढंग को अपनाने के लिये प्रेरित करना है। जब भी वे परमेश्वर के पास आएँ, तो उन्हें प्रोत्साहित किया जाता है कि उसी मार्ग पर चलें जिस पर वह चला है, वह मार्ग जो सीधे हमारे प्रभु यीशु मसीह से जुड़ा है।
जो लोग यह सोचते हैं कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के सम्बन्ध में परमेश्वर की स्थिति क्या है, उनके लिये यह प्रश्न मध्यस्थ की भूमिका पर विचार करने से सहज ही हल हो जाता है। इस मध्यस्थ ने हमारे लिये नम्रता से उतरकर परमेश्वर और हमारे बीच की खाई को पाट दिया। यह निर्विवाद सत्य है कि यीशु मसीह अपने पिता के साथ एक है, जैसा यूहन्ना 10:30 में स्पष्ट कहा गया है। जब हम जीवते परमेश्वर का नाम पुकारते हैं, तब यह पहचानना अत्यन्त आवश्यक है कि ईश्वरत्व की सारी परिपूर्णता उसी में वास करती है, जैसा कुलुस्सियों 2:9 में सुन्दर रीति से पुष्टि की गई है। इसलिए हमारे प्रभु यीशु मसीह को ऐसे अलग करने का यत्न करना, मानो वह कोई भिन्न देवता हो या उस परमेश्वर से कोई और हो जो अनादि काल से मनुष्यों पर प्रकट होता आया है, घोर भूल है। हाय, हमारे इस युग में कुछ भटके हुए लोग ऐसी घृणित और ईश-निन्दापूर्ण बातें फैलाते हैं।
यह समझना अत्यन्त आवश्यक है कि यीशु मसीह वही परमेश्वर है, एकमात्र परमेश्वर, जिसने पिता के व्यक्तित्व में अपने आप को हम पर प्रकट करना चाहा। फलस्वरूप जब हम परमेश्वर के पास आना चाहते हैं, तो यीशु मसीह की मध्यस्थता के द्वारा आते हैं। इसी सन्दर्भ में हमें यीशु मसीह की उस मध्यस्थ की भूमिका पर भी विचार करना चाहिए जिसमें उसने स्वेच्छा से अपने आप को दीन किया। यह समझना अनिवार्य है कि नम्रता के इस कार्य में उसने अपनी ईश्वरीय महिमा का कोई अंश नहीं त्यागा, और न ही अपने अनन्त तेज को किसी प्रकार घटाया। इनमें से कुछ भी नहीं हुआ। इसके विपरीत, मनुष्यों के प्रति असीम प्रेम के कारण उसने स्वेच्छा से अपने आप को दीन किया और मानव रूप धारण किया, जैसा सन्त पौलुस ने फिलिप्पियों 2:7 में सुन्दर शब्दों में वर्णन किया है। इसलिए जब हम कहते हैं कि यीशु मसीह अपने पिता परमेश्वर के अधीन हुआ, तो इसका अर्थ है कि उसने स्वेच्छा से हमारा मानव स्वभाव अपनाया और हमारी मानवता के साथ गहराई से एकरूप हो गया।
इस गहरे मेल पर स्वयं यीशु मसीह के वे वचन प्रकाश डालते हैं जो सन्त यूहन्ना ने अपने बीसवें अध्याय (पद 17) में लिखे हैं: "मेरे भाइयों के पास जाकर उनसे कह दे, कि मैं अपने पिता और तुम्हारे पिता, और अपने परमेश्वर और तुम्हारे परमेश्वर के पास ऊपर जाता हूँ।" यह घोषणा सचमुच अद्भुत है, क्योंकि यह उस घनिष्ठ बन्धन को रेखांकित करती है जो यीशु मसीह का अपने विश्वासी अनुयायियों से है, यहाँ तक कि वह उसी परमेश्वर को अपना और उनका कहता है। पर यह कैसे हो सकता है? क्या यीशु मसीह स्वयं परमेश्वर नहीं? निश्चय ही वह परमेश्वर है, फिर भी क्योंकि उसने स्वेच्छा से हमारी मानवता को अपनाया और हमारे लिये देहधारी होने तक झुक गया, इसलिए उसका और हमारा परमेश्वर एक ही है। इसी कारण प्रेरित यशायाह के शब्दों को लेकर यीशु मसीह के व्यक्तित्व पर लागू करता है: "देखो, मैं और वे बच्चे जिन्हें यहोवा ने मुझे दिया है, हम चिह्न और अद्भुत लक्षण हैं" (यशायाह 8:18; इब्रानियों 2:13)। इस सन्दर्भ में यीशु मसीह उस सेनापति के रूप में खड़ा है जो अपने स्वामी और राजकुमार के सामने उपस्थित होकर कहता है, "देख, मैं यहाँ हूँ, उन बच्चों के साथ जो तूने मुझे दिए हैं।" सारांश यह कि यीशु मसीह वह मार्ग है जिसके द्वारा हम अपने पिता परमेश्वर की ओर खींचे जाते हैं, और वह हममें यह पूरा भरोसा उत्पन्न करता है कि हमारी प्रार्थनाओं को स्वागत-भरी सुनवाई मिलेगी। यीशु मसीह के बिना, जो मार्ग, सत्य और जीवन है (यूहन्ना 14:6), कौन यह आशा करने का साहस करेगा कि उसकी विनतियाँ ईश्वरीय सिंहासन तक पहुँचेंगी, और हम किस मात्रा में अनुग्रह पाने की आशा कर सकते हैं?
हमारे प्रभु यीशु मसीह के मार्गदर्शन की आवश्यकता को और गहराई से समझने के लिये सन्त पौलुस हमें परमेश्वर की असीम महिमा पर विचार करने को कहता है। भला हम अपनी ढिठाई में परमेश्वर की उपस्थिति में कैसे आ सकते हैं, जब तक कोई सहायक न हो जो हमारे प्रवेश का मार्ग तैयार करे? विचार करो कि जब सूर्य, जो मात्र एक सृष्टि है, दूर से ही हमारी आँखों को चौंधिया देता और हमारी त्वचा को झुलसा देता है, तो जब हम परमेश्वर की उपस्थिति के निकट आएँगे तब हमारा क्या हाल होगा? सूर्य के पास तो उस ईश्वरीय सामर्थ्य का केवल एक अंश है जो स्वयं परमेश्वर ने उसमें रखा है। तो परमेश्वर की अगम्य प्रतापमयता के निकट आने पर क्या हमें भस्म हो जाने का भय नहीं होना चाहिए? फिर भी, यीशु मसीह को अपना सहायक पाकर हम समझते हैं कि परमेश्वर केवल महिमा का पिता ही नहीं, वरन् दया का पिता भी है। वह उन पर, जो संसार की दृष्टि में सबसे अभागे और तुच्छ हैं, करुणा और अनुग्रह की दृष्टि करता है। यही वह निश्चयता है जिस पर हमें प्रार्थना में परमेश्वर के पास आते समय भरोसा रखना चाहिए।
यहाँ सन्त पौलुस उत्कट विनती करता है कि परमेश्वर इफिसियों को ज्ञान और प्रकाश का आत्मा दे। यह निर्विवाद सत्य है कि परमेश्वर उन पर अपने सुसमाचार का सत्य पहले ही प्रकट कर चुका था, जैसा हमने देखा है। जब तक परमेश्वर पहले हममें कार्य न करे, तब तक विश्वास या समझ की एक झलक भी हमारी पहुँच से बाहर रहेगी, जैसा यीशु ने पतरस से अपने कथन में स्पष्ट कहा: "माँस और लहू ने नहीं, परन्तु मेरे पिता ने जो स्वर्ग में है, यह बात तुझ पर प्रगट की है" (मत्ती 16:17)। फिर भी, यद्यपि उन्हें कुछ ज्ञान मिल चुका था, पतरस ने, जैसा हम आगे देखते हैं, मसीह के आत्मिक राज्य की समझ का अभाव दिखाया। इसलिए सुसमाचार का जो थोड़ा-सा स्वाद उसके पास था, वह भी परमेश्वर का दान था। इससे स्पष्ट होता है कि परमेश्वर को हममें अपने दान को निरन्तर बढ़ाते रहना आवश्यक है। हमारी आत्मिक यात्रा को ठीक ही "मार्ग" कहा गया है, क्योंकि उसमें निरन्तर आगे बढ़ना आवश्यक है जब तक हमारी दौड़ अन्त में पूरी न हो जाए। जो कोई इस पार्थिव लोक में सिद्धता पाने का भ्रम पालता है, वह शैतान की चालों से धोखा खाया हुआ है और परमेश्वर के अनुग्रह को ठुकराता है। फिर भी यह समझना आवश्यक है कि इसका किसी प्रकार यह अर्थ नहीं कि परमेश्वर अपना ईश्वरीय उद्देश्य बदल देता है या अपने अनुग्रह को मनुष्य की सनक के अनुसार बँटने देता है। परमेश्वर ने एक क्रम ठहराया है जिसमें हम प्रतिदिन बढ़ें और परिपक्व हों, और साथ ही अपनी अपूर्णताओं के प्रति सजग रहें, उन पर शोक करें, अपने आप को अनुशासित करें, और संयम का अभ्यास करें।
इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि इफिसियों को प्रकाश का आत्मा पहले ही दिया जा चुका था, फिर भी उन्हें परमेश्वर की ओर से उसके दिए जाने की आवश्यकता बनी हुई थी। यद्यपि आत्मा तो एक ही है, फिर भी जो वरदान वह देता है वे नाना प्रकार के हैं और अपनी प्रभुता की इच्छा और नाप के अनुसार हममें से हर एक को बाँटे जाते हैं। केवल यीशु मसीह ने इन वरदानों को सम्पूर्णता में पाया है; वही अकेला वह अक्षय सोता है जिससे ये बहते हैं। परमेश्वर का आत्मा उस पर ठहरा है, और इस प्रकार हम सब उसके भरपूर अनुग्रह में सहभागी होते हैं। इसलिए हम यह मानें कि हममें जो सबसे बुद्धिमान हैं, उन्हें भी अपनी पृथ्वी की यात्रा के अन्त तक सदा सीखनेवाले बने रहना और ज्ञान प्राप्त करते रहना चाहिए। इस सन्दर्भ में "प्रकाश" शब्द उस जन्मजात आत्मिक अन्धेपन की निन्दा करता है जो हममें से हर एक को ग्रस्त किए हुए है। हम काले और सफ़ेद में भेद कर सकते हैं, सूर्य और चन्द्रमा को देख सकते हैं, और सांसारिक बातों के विषय में नए प्रकाश की आवश्यकता के बिना निर्णय कर सकते हैं, क्योंकि ये क्षमताएँ हममें स्वाभाविक हैं। फिर भी सन्त पौलुस हमारे आत्मिक अन्धेपन को प्रकट करता है, और बताता है कि जब तक परमेश्वर हमारी आँखें न खोले, हमारी समझ पर पड़े परदे को न हटाए, और हमें वह नई दृष्टि न दे जो हममें स्वभाव से नहीं है, तब तक हम उसके अनुग्रह की थाह नहीं पा सकते। सार यह कि जब तक परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा से हमारी आत्मिक आँखों को ज्योतिर्मय नहीं करता, तब तक हम एक प्रकार से अन्धे से भी बदतर हैं, जिससे हमारी समझ के लिये ईश्वरीय हस्तक्षेप का सर्वोपरि महत्त्व रेखांकित होता है।
इसके अतिरिक्त, सन्त पौलुस एक महत्त्वपूर्ण पहलू की ओर बढ़ता है, कि तुम्हारे मन की आँखें ज्योतिर्मय हों। अब कोई पूछ सकता है, "यदि हमारे पास प्रकाश का आत्मा पहले से है, तो और की क्या आवश्यकता?" इसके उत्तर में मैं कहता हूँ, तुम ऐसे बोलते हो मानो तुम्हारी दृष्टि साफ़ है। सच है, तुम कुछ अंश तक देखते हो, पर तुम्हारी दृष्टि धुँधली है। यह हम सब के लिये सच है, क्योंकि हमें बताया गया है कि इस संसार में हम बातों को धुँधला देखते हैं, मानो दर्पण में। जब हम परमेश्वर को उसकी स्वर्गीय महिमा में देख सकेंगे, तभी हमारी दृष्टि सिद्ध होगी, और हम उसके समान बना दिए जाएँगे। सन्त पौलुस इस प्रकार इसलिए लिखता है कि कोई यह न कहे कि परमेश्वर को हमें बातें ऐसे प्रकट करनी होंगी मानो हम कुछ भी देखने में सर्वथा असमर्थ हों। क्या हम विवेक और निर्णय से रहित पशुओं से कुछ बेहतर नहीं? इसके उत्तर में मैं कहता हूँ कि यद्यपि हमारे पास कुछ समझ है, फिर भी पाप की भ्रष्टता के कारण हम अन्धे हैं। इसलिए परमेश्वर को हमें नई आँखें देनी होंगी, जैसा मैंने पहले कहा।
प्रेरित 'ज्ञान' शब्द भी उस मूर्खतापूर्ण अभिमान को दीन करने के लिये जोड़ता है जो प्रायः हममें तब फूल उठता है जब हम अपने आप को बुद्धिमान समझकर बिना पंखों के परमेश्वर की ओर उड़ने का यत्न करते हैं। यद्यपि परमेश्वर के हाथ से सच्चा ज्ञान चाहना सराहनीय और उचित अभिलाषा है, फिर भी हम प्रायः दो दोषों से ग्रस्त रहते हैं। पहला, हम अपनी ही दृष्टि में बुद्धिमान होना चाहते हैं, और सोचते हैं, "क्या मैं इतना बुद्धिमान नहीं कि अपने आप को सँभाल सकूँ?" दूसरा, हम परमेश्वर के वचन की उपेक्षा करते हैं, और पूर्ण स्वायत्तता चाहते हैं कि जो जी में आए वही करें। ये दोनों अति हानिकारक हैं। सन्त पौलुस यहाँ दोनों भूलों को सुधारता है। जब वह परमेश्वर से विनती करता है कि अपने विश्वासी लोगों को ज्ञान का आत्मा दे, तब वह रेखांकित करता है कि उनमें विवेक नहीं है, वे पशुओं के समान हैं, जब तक हमारे प्रभु यीशु मसीह उन्हें स्वर्ग के राज्य की यात्रा में मार्ग न दिखाए। सांसारिक बातों में भी परमेश्वर विवेक केवल उन्हीं को देता है जिन्हें वह चुनता है।
इसलिए यदि परमेश्वर ज्ञान का अपना विशेष वरदान अपने ही लिये सुरक्षित रखता है, और जिसे चाहे उसे सांसारिक कार्यों के संचालन के लिये देता है, तो वही अविश्वासियों को बुद्धिमान बनाता है। परन्तु स्वर्गीय जीवन की बातों में हममें कोई जन्मजात बुद्धि नहीं है। इसलिए सन्त पौलुस उसे मानकर चलता है जो मैं कह चुका हूँ: हमें परमेश्वर से सीखना होगा कि हम सुसमाचार की गवाही द्वारा पहुँचाई गई सत्य की शिक्षा के द्वारा उसे जानें। इसके बिना हम उन उन्मत्तों के समान होते जो परमेश्वर के पवित्र आत्मा के प्रकाश के पाने के बहाने भूल में पड़ जाते हैं। परन्तु सन्त पौलुस 'प्रकाश' शब्द का प्रयोग इस रीति से नहीं करता जब वह प्रार्थना करता है कि परमेश्वर उसे अपनी सन्तान को दे। उदाहरण के लिये, जब यीशु मसीह अपने आत्मा की बात करता है, तब वह उसे उस शिक्षा से अलग नहीं करता जिसका उसने प्रचार किया। वह कहता है, "जब वह आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य बताएगा।" पर यह कैसे होता है? क्या प्रेरित उसे पहले ही नहीं पा चुके थे? हाँ, पर वह जोड़ता है, "जो तुम अब मेरे मुँह से सुनते हो, वही वह तुम्हें दिखाएगा।" सार यह कि पवित्र आत्मा का विशेष काम हमें इस प्रकार सिखाना है कि जो वचन हम सुनते हैं वे सचमुच जड़ पकड़ें और मूल्यवान ठहरें, जिससे हम उनसे लाभ उठा सकें।
इसके अतिरिक्त, सन्त पौलुस हमारी सारी ज्योति और ज्ञान का सार प्रकट करता है, कि परमेश्वर को उसके एकलौते पुत्र के द्वारा जानना। यही ज्ञान है जिसे पाने की हमें चाह करनी चाहिए। यदि हमारे मन जिज्ञासु हैं और हमारी क्षमता से परे की बातों को खोजने के लिये उत्सुक हैं, तो हमें अपनी निर्बल और अविकसित समझ की सीमाओं पर विचार करना चाहिए। यदि हमारे हृदय बोझिल और सुस्त हैं, तो हम आकाश और पृथ्वी की सीमाओं से परे चढ़ने की आकांक्षा कैसे कर सकते हैं? क्या हम अपनी सीमित शक्तियों से इस सब को सचमुच समेट सकते हैं? फिर भी हम प्रायः लोगों को घमण्ड से ऐसे प्रश्नों और विवादों में उतरते देखते हैं जो उनकी पहुँच से बाहर हैं, और परमेश्वर को चुनौती देते हैं। इसलिए सन्त पौलुस यहाँ हमें स्मरण दिलाता है कि सच्चे ज्ञान के लिये संयम आवश्यक है। ज्ञान परमेश्वर और हमारे प्रभु यीशु मसीह से आता है, जैसा वह आगे और स्पष्ट करेगा। जब हम इस बिन्दु तक पहुँच जाते हैं, तब हमारे पास वह सब है जिसकी हमें आवश्यकता है। यदि हम और आगे बढ़ने का साहस करें, तो अपने आप को व्यर्थ ही संकट में डालते हैं।
सन्त पौलुस इस विषय को आगे चलकर विस्तार से समझाएगा, पर हमारे लिये इतना समझना काफ़ी है, इस स्थल में भी और सारे पवित्रशास्त्र में भी, कि हमें उस परमेश्वर के विषय में सीखना चाहिए जिसकी हमें सेवा करनी है, उसकी इच्छा के विषय में, उस पर भरोसा कैसे रखें, और प्रार्थना में उसके पास कैसे आएँ और सब समय उसमें शरण कैसे लें। हमारा ध्यान इसी पर होना चाहिए। परन्तु यह केवल यीशु मसीह के द्वारा ही प्राप्त हो सकता है, जिसमें परमेश्वर ने अपने आप को प्रकट किया है। सार यह कि परमेश्वर का प्रताप हमारी पहुँच से परे है, और यदि वह हमारे पास उतर न आता, तो उसके निकट आने के हमारे यत्नों में हम खो जाते।
फिर भी, यीशु मसीह में हमारे पास परमेश्वर का जीवित स्वरूप है, जिसमें हम अपने उद्धार के लिये आवश्यक सब कुछ देख सकते हैं। उसमें हम समझते हैं कि परमेश्वर हमारा पिता है, और उसी के द्वारा हम अपने पापों से शुद्ध किए जाते और परमेश्वर की महिमा में रूपान्तरित होते हैं। उसी के द्वारा हम पहचानते हैं कि परमेश्वर हमें धर्मी मानकर ग्रहण करता है और अपने साथ हमारा मेल कराता है। उसी के द्वारा हम जानते हैं कि हम छुड़ाए गए हैं, और जब तक हम अपना अनन्त प्रतिफल न पा लें, तब तक कभी उसके पवित्र आत्मा के अनुग्रह से वंचित नहीं किए जाएँगे। इसलिए हमें जो कुछ जानना आवश्यक है वह सब हमारे प्रभु यीशु मसीह में मिल जाता है।
इसी कारण सन्त पौलुस एक और स्थान पर कहता है कि वह यीशु मसीह को छोड़ और कुछ जानना नहीं चाहता और केवल उसी में घमण्ड करता है। जैसा हम पहले देख चुके हैं, उसने सब सांसारिक खोजों को त्याग दिया ताकि हमारे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस के अधीन रहे। यद्यपि इससे संसार की दृष्टि में लज्जा और निन्दा आ सकती है, वह घोषणा करता है कि जो कुछ उसे पहले मूल्यवान लगता था, उस सब को वह हमारे प्रभु यीशु मसीह की भक्ति की तुलना में तुच्छ और बाधा, यहाँ तक कि कूड़ा और गोबर, समझता है। वह ज़ोर देकर कहता है कि जो अपने ही पुण्य में भ्रान्त विश्वास से चिपके रहते हैं, वे अपने आप को हमारे प्रभु यीशु मसीह से अलग कर लेते हैं। उसके साथ एक होने के लिये हमें अपनी धार्मिकता का सहारा छोड़ना और अपने आप को उसके सामने अपनी ही भलाई से खाली होकर प्रस्तुत करना होगा, कि वह हमें भर दे।
अब विचार करो कि सन्त पौलुस सांसारिक अभिमान के खतरनाक समुद्र में रहने के बदले उद्धार के बन्दरगाह पर सर्वथा नंगा और कंगाल पहुँचने को क्यों तैयार है। यदि उसे पवित्र प्राणी या आधा स्वर्गदूत भी माना जाता, तो भी वह इन प्रशंसाओं को उस पापक्षमा में सहभागी होने की तुलना में तुच्छ समझता जो यीशु मसीह के द्वारा उसे मिली और जो उसके सब अनुयायियों को दी गई है। इसलिए हम परमेश्वर के अनुग्रह को इतना ऊँचा मानें कि उन भ्रमों को त्याग दें जिनसे शैतान अविश्वासियों का अभिमान फुलाता है। हम पूरी दीनता और खालीपन के साथ अपने प्रभु यीशु मसीह के पास आएँ और उसका अनुग्रह माँगें। हमें मानना चाहिए कि हम उसकी एक बूँद पाने के भी सर्वथा अयोग्य हैं।
अब हम अपने उपकारी परमेश्वर के प्रताप के सामने दण्डवत् करें, अपने दोषों को मानें और उनके प्रति और अधिक सचेत होने की प्रार्थना करें। यह चेतना हमें गहराई से दीन करे और हमें उसके अनुग्रह में दृढ़ नींव की ओर ले जाए। हम उसके और निकट, और निकट आने का यत्न करें, अपने आप को दीन करते हुए कि वह अपनी असीम दया से हमें ऊपर उठाए। हम पूरी रीति से उसी पर निर्भर हों, उसकी ओर अपने पिता के रूप में फिरें, और तब तक ऐसा करते रहें जब तक वह हमें पाप के कारागार से छुड़ाकर अपने साथ सिद्ध रूप से एक न कर ले। वह यह अनुग्रह केवल हम पर ही नहीं, वरन् सब जातियों पर करे।
