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इफिसियों 2:16-19 पर दूसरे अध्याय का छठा, अर्थात् चौदहवाँ उपदेश
"और क्रूस पर बैर को नष्ट करके, उसके द्वारा दोनों को एक देह बनाकर परमेश्वर से मिला दे: और उसने आकर तुम्हें, जो दूर थे, और उन्हें भी, जो निकट थे, मेल-मिलाप का सुसमाचार सुनाया। क्योंकि उसी के द्वारा हम दोनों की एक आत्मा में पिता के पास पहुँच होती है। इसलिये अब तुम विदेशी और परदेशी नहीं रहे, परन्तु पवित्र लोगों के संगी स्वदेशी और परमेश्वर के घराने के हो गए।" - इफिसियों 2:16-19
आज सुबह हमने देखा कि सन्त पौलुस ने उन लोगों से कैसे बात की जो उद्धार की आशा से रहित थे, और उसने इस बात पर बल दिया कि वे परमेश्वर के और भी अधिक ऋणी हैं, क्योंकि उसने उन्हें अपनी सन्तानों में गिने जाने के लिये बुलाया। यह बुलाहट साधारण या अपेक्षित नहीं थी। दूसरी ओर, उसने सब घमण्ड को नीचा किया, ताकि यहूदी यह न समझें कि गोद लिये जाने का विशेषाधिकार उन्होंने अपने परिश्रम से कमाया था। यद्यपि परमेश्वर ने उन्हें सब लोगों में से चुन लिया था, फिर भी उन्हें अपनी योग्यताओं पर घमण्ड नहीं करना चाहिए था।
उसी विषय को आगे बढ़ाते हुए सन्त पौलुस कहता है कि हम, इधर के भी और उधर के भी, यीशु मसीह की मृत्यु के द्वारा मेल-मिलाप पा चुके हैं। अपनी मृत्यु के द्वारा उसने हमें एक देह में एकत्र किया है और क्रूस पर अपने बलिदान से सारे बैर को मिटा दिया है। यह उस बात को और स्पष्ट करता है जो हम पहले सीख चुके हैं: कि हमें अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा ही परमेश्वर के पास आना है, क्योंकि उसके बिना यहूदी और अन्यजाति दोनों ही अपने पाप के कारण परमेश्वर से दूर रहते हैं। जब तक परमेश्वर का क्रोध शान्त न हो, तब तक वह हमारा शत्रु है। यह शान्ति इस प्रकार प्राप्त होती है कि यीशु क्रूस पर हमारे पापों को उठा ले, क्योंकि उसकी आज्ञाकारिता ही हमारे अधर्म को दूर करती है, और उसका बलिदान ही हमारे पापों को धो डालता है।
सचमुच, हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग के बिना हम अपने पापों के ऋण में बँधे रहते, परमेश्वर के सामने अपना मुकद्दमा लड़ने में असमर्थ होते, और उस दण्ड से, जिसके हम योग्य हैं, बच न पाते। यदि हम अपने आप को धर्मी ठहराने का प्रयत्न करें, तो हज़ार दोष हमारा मुँह बन्द कर देंगे। इसलिये जब हम प्रार्थना करें या परीक्षाओं का सामना करें, तब हमें स्मरण रखना चाहिए कि दृढ़ बने रहने के लिये हमें प्रोत्साहन चाहिए, अनन्त जीवन का निश्चय चाहिए, और हमें परमेश्वर के पुत्र की मृत्यु और दुःखभोग की शरण लेनी चाहिए। उसी के लहू से और उसके पवित्र आत्मा के कार्य से हम शुद्ध किये जाते हैं। इसके बिना परमेश्वर उचित रूप से हमें ठुकरा देता, और पिता के रूप में नहीं, वरन् न्यायी के रूप में हमसे व्यवहार करता।
इतना जान लेना पर्याप्त नहीं कि यीशु मसीह ने हमारे लिये प्रायश्चित किया और अपनी मृत्यु और दुःखभोग के द्वारा हमारे उद्धार के लिये जो कुछ आवश्यक था वह सब पूरा कर दिया। हमें इस लाभ को वैसे ही ग्रहण भी करना है जैसे वह हमें दिया जाता है। यहूदी, तुर्क और अन्य लोग जिन्होंने सुसमाचार को ठुकराया, दुगुने दोषी ठहरेंगे, क्योंकि उन्होंने उस लाभ का इनकार किया जिसमें वे विश्वास के द्वारा सुसमाचार की प्रतिज्ञाओं को ग्रहण करके सहभागी हो सकते थे। जहाँ कुछ ने प्रभु यीशु मसीह को धन्य कहा, वहाँ औरों ने उसका तिरस्कार किया। पोपवादियों ने उसके अनुग्रह को घटाना चाहा। ये कार्य उनके दण्ड को और बढ़ाएँगे।
जिन्होंने कभी सुसमाचार सुना ही नहीं, वे भी इस भण्डार से बाहर हैं। पौलुस आगे कहता है कि यीशु मसीह ने जो निकट थे उन्हें भी और जो दूर थे उन्हें भी मेल-मिलाप का सुसमाचार सुनाया। इससे प्रकट होता है कि जैसे-जैसे सुसमाचार का प्रचार होता है, वैसे-वैसे हम निरन्तर उस उद्धार के भागी बनाए जाते हैं जिसे हमारे प्रभु यीशु मसीह ने मोल लिया है। यह तब होता है जब हम सच्चे विश्वास के द्वारा अपने हृदय में उसे थाम लेते हैं, जो फिर अच्छा फल उत्पन्न करता है। इसलिये दो बातें आवश्यक हैं: एक यह कि हम समझें कि हमारे उद्धार का सार यीशु मसीह में है, और दूसरी यह कि यह हमें सुसमाचार के द्वारा घोषित किया जाता है। पौलुस इस पर बल देता है कि प्रेरितों या अनेक शिक्षकों को भेजने के बदले स्वयं मसीह सब लोगों को शान्ति का समाचार सुनाने आया है।
अब यह निश्चित है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने अपने पुनरुत्थान के बाद अपने चेलों को छोड़ किसी के बीच स्वयं प्रचार का कार्य नहीं किया; और उनके बीच भी इसलिये कि उन्हें तैयार करे कि वे उन्हें सौंपी गई शिक्षा को सब जगह फैलाएँ। फिर भी सन्त पौलुस कहता है कि उसने उन्हें प्रचार किया जो परमेश्वर से दूर रहे थे। उसने यह स्वयं व्यक्तिगत रूप से नहीं किया, क्योंकि प्रकट है कि सुसमाचार का प्रचार साधारण वक्ताओं के द्वारा, अर्थात् परमेश्वर और यीशु मसीह के ठहराए हुए सेवकों के द्वारा चलता रहता है। तो भी वह कहता है कि स्वयं मसीह ने प्रचार किया। यह इस बात पर बल देने के लिये है कि हमें सुसमाचार को परम आदर के साथ थामना चाहिए और उसे परमेश्वर की ओर से प्रमाणित सत्य मानना चाहिए। हम में से हर एक को बिना सन्देह और विवाद के उसके अधीन हो जाना चाहिए। यदि हमें उसके विषय में कोई सन्देह हो, तो हमें यह आशा नहीं रखनी चाहिए कि यीशु मसीह उसकी पुष्टि करेगा। इसलिये हमें उसका निश्चय होना चाहिए। जैसा हम पहले अध्याय में देख चुके हैं, परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर हमारे हृदयों में पवित्र आत्मा की मुहर लगनी चाहिए, जो उस जीवन की, जिसकी हम आशा रखते हैं, बयाना कहलाता है, और वही मुहर है जो परमेश्वर हम पर लगाता है। यह इसलिये कि हमारे विश्वास में हमें पूर्ण निश्चय मिले। हम देखते हैं कि पौलुस इस पाठ में यही बात बल देकर कहता है कि यीशु मसीह ने, मरे हुओं में से जी उठकर और अपने पिता परमेश्वर की आज्ञा को पूरा करके, हमारा छुड़ानेवाला होकर वही सन्देश हमें दिया। उसने इसे केवल एक बार नहीं सुनाया, वरन् निरन्तर सुनाता रहा, यहाँ तक कि उसका मुँह खुला ही रहेगा कि हमें गवाही दे कि उसमें हमें अनन्त जीवन के लिये आवश्यक सब कुछ निःसन्देह मिलेगा।
इन वचनों को सुनकर हमें गहराई से प्रभावित होना चाहिए। सच है कि परमेश्वर का पुत्र शारीरिक रूप से एक स्थान से दूसरे स्थान नहीं जाता, और न दृश्य रूप में हमारे बीच चलता-फिरता है। इसकी आवश्यकता भी नहीं। फिर भी उसके नाम से जो शिक्षा प्रचारित की जाती है, उसका अधिकार वैसा ही होना चाहिए मानो वह स्वयं सीधे हमसे बोल रहा हो। उसने कहा, "जो तुम्हारी सुनता है वह मेरी सुनता है," और "जो तुम्हें ग्रहण करता है वह मुझे ग्रहण करता है।" जब हम सुसमाचार पर विश्वास करते हैं, तब पिता परमेश्वर का आदर होता है। इसके विपरीत, जब इतनी दृढ़ता से प्रमाणित बातों पर सन्देह किया जाता है, तो यह उसका बड़ा अनादर और अपमान है। पोप और उसके पादरी अपनी निरंकुशता बनाए रखने के लिये प्रायः यही तर्क प्रयोग करते हैं। परन्तु हमारे प्रभु यीशु मसीह का अभिप्राय हमें हमारे पापों की क्षमा के सन्देश का निश्चय दिलाना था, जो निरन्तर सुना जाता रहे, चाहे हम में विश्वास की कमी ही क्यों न हो। यदि हम पूरी तरह आश्वस्त न हों कि सुसमाचार में जो कुछ है वह यीशु मसीह के द्वारा पुष्ट किया गया है, जो स्वयं अचूक सत्य है, तो हम सदा सन्देहों से सताए जाते रहेंगे। इसलिये, यद्यपि हमारा प्रभु यीशु मसीह अपनी स्वर्गीय महिमा में विराजमान है, और हम शारीरिक रूप से उससे अलग हैं, और यह कहना अटपटा लग सकता है कि वह हमारे भीतर वास करता है, फिर भी हमें पूरी तरह निश्चित होना चाहिए कि जब सुसमाचार की शुद्ध शिक्षा का प्रचार होता है, तो यह ऐसा ही है मानो वह स्वयं हमसे बोल रहा हो और हमारे बीच हो। संक्षेप में, हमारा विश्वास उसी की ओर लक्ष्य और लंगर के रूप में स्थिर होना चाहिए। चूँकि पिता परमेश्वर ने उसे विश्वासयोग्य गवाह करके भेजा है, इसलिये जो कुछ उसके नाम से सच्चाई से सिखाया जाता है उसे हमें बिना आपत्ति के स्वीकार करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, इस ज्ञान से हम विश्वास की सच्ची दृढ़ता में बलवन्त किये जाते हैं और शैतान जो भी आक्रमण और धमकियाँ ला सके, उन सबके विरुद्ध हथियारबन्द होते हैं।
यह हमारे लिये बड़ी लज्जा की बात है कि हम सुसमाचार के प्रचार के प्रति बहरे हो जाएँ, या उसे मात्र कहानी या बेकार की चीज़ समझकर उपेक्षा करें और उसे उचित आदर दिये बिना हवा में लटका छोड़ दें। फिर भी, इस सब के बावजूद, आज अधिकतर लोग या तो सुसमाचार को तुच्छ जानते हैं, या इतने भटके हुए हैं कि उसे महत्वहीन समझते हैं। कुछ लोग उपदेश सुनकर या व्याख्यानों में जाकर कहते हैं, "हो सकता है कि यह सच हो, परन्तु मैं तो धर्मशास्त्र में निपुण नहीं हूँ, इसलिये इसे रहने देता हूँ।" दूसरे कहते हैं, "मैं तो अपने बाप-दादों के विश्वास पर ही रहूँगा; बदलना बहुत जोखिम भरा है।" कुछ तर्क करते हैं, "यह तो नई शिक्षा है जो हमने कभी सुनी नहीं।" और ऐसे भी हैं जो केवल उदासीनता से सन्तुष्ट न होकर खुलकर इसका विरोध करते हैं। वे यहाँ तक जा सकते हैं कि परमेश्वर को सिंहासन से उतार फेंकना चाहें, और सुसमाचार की स्मृति मिटाने के लिये निर्दोष लहू बहाने पर उतर आएँ। परन्तु हमें समझना चाहिए कि जब हमारे उद्धार का सन्देश हमारे सामने रखा जाता है, तब यदि हम उसे तुच्छ जानें, तो हम केवल एक नश्वर प्राणी के द्वारा लाए गए लाभ को ही नहीं ठुकरा रहे, वरन् परमेश्वर के उस पुत्र के विरुद्ध भी द्वार बन्द कर रहे हैं जो हमारा उद्धार ढूँढ़ने आया।
हमारी सुस्ती को दूर करने और उस हठ का सामना करने के लिये जो सुसमाचार को पूरे और आज्ञाकारी मन से ग्रहण करने में बाधा बन सकता है, हमें यह पहचानना चाहिए कि सुसमाचार का प्रचार कोई संयोग की बात नहीं है। यह ऐसा काम नहीं जो लोग अपनी इच्छा से करते हों, जैसा सन्त पौलुस रोमियों से कहता है। वरन् स्वयं परमेश्वर हमारी सुधि लेता है, हमारे पास आता है, और हमारा प्रभु यीशु मसीह चरवाहे का कर्तव्य निभाता है, और अपनी ही वाणी से हमें अपनी ओर बुलाता है। यद्यपि हम अनेक दिशाओं में भटक गए हों, उसका अभिप्राय हमें फिर अपने झुण्ड में इकट्ठा करना है। जब यह बात हमारे हृदयों पर दृढ़ता से अंकित हो जाएगी, तो हम केवल नम्रता से सुसमाचार की शिक्षा को ग्रहण करने के लिये ही नहीं, वरन् उत्साह और उमंग से भर जाने के लिये भी अधिक तैयार होंगे। हम परमेश्वर के वचन को मधु से भी मीठा, और सब सोने-चाँदी से भी बहुमूल्य समझेंगे। इसका कारण यह है कि अपनी महिमा में रहते हुए भी परमेश्वर का पुत्र हमें अपनी वाणी सुनाता है। यह हवा में कोई दूर की या मिटती हुई ध्वनि नहीं, और न कोई ऐसी बात जिसका हमें निश्चित ज्ञान न हो। वरन् यह ऐसा है मानो वह हमारे पास आकर स्वयं हमें प्रचार करता है। इसलिये, जैसा उसने अपने प्रेरितों को दिये गए अधिकार और आज्ञा के द्वारा यह किया है, वैसे ही हमें इसे उसी के कारण ग्रहण करना चाहिए, जैसा मैंने पहले कहा।
आगे, सन्त पौलुस का अभिप्राय यहाँ हमें यह प्रेरणा देना है कि हम सुसमाचार को केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह की महत्ता के कारण ही नहीं, वरन् उसके कारण भी ग्रहण करें जो स्वयं सुसमाचार में निहित है। वह मेल-मिलाप का सन्देश है। आइए हम विचार करें कि उसके साथ युद्ध की स्थिति में होने का क्या अर्थ है जिसने हमें रचा और बनाया। यदि इस संसार में हमारा कोई शत्रु हो, चाहे वह दुर्बल और साख में कम ही क्यों न हो, तब भी हम डरते हैं कि कहीं वह हमारे विरुद्ध षड्यन्त्र न रचे या बल से बदला न ले। जब तक संसार में हमारे शत्रु हैं, हम सदा बेचैन रहेंगे। तब हम कितने अधिक मूर्ख ठहरेंगे यदि हम सो जाएँ जबकि परमेश्वर हमारे पापों के कारण बदला लेने को शस्त्र बाँधे हमारे विरुद्ध खड़ा है? यदि हम सचमुच समझते कि परमेश्वर से वैर रखने का क्या अर्थ है, तो हम उसके साथ शान्ति और मेल-मिलाप के असीम लाभ को पहचान लेते। यह शान्ति हमें सुसमाचार के द्वारा दी जाती है, और इसे हमारे भीतर उसे पूरे मन से अपनाने और अपना सारा चित्त उसमें लगा देने की प्रचण्ड उत्कण्ठा जगानी चाहिए।
अपनी उदासीनता और आलस्य को देखते हुए आइए हम इस कथन पर और भी विचार करें। पहली बात, हमें समझना चाहिए कि परमेश्वर का पुत्र हमें सिखाने और हमारा शिक्षक बनने को तैयार है, यदि हम उसके शिष्य बनने को तैयार हों। दूसरी बात, हमारे पास ऐसी शिक्षा है जो संसार के सब सुखों, मानों और धन-दौलत से अधिक चाहने योग्य है। वह है परमेश्वर से मेल में होने का निश्चय, उसके अनुग्रह को अपने प्रति जानना, और उसकी सन्तान के रूप में उसके पास पहुँच पाना। हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि सन्त पौलुस सच्ची शान्ति क्या है यह स्पष्ट करना चाहता था, क्योंकि बहुत से लोग समझते हैं कि वे चैन से हैं, जबकि वास्तव में उन्हें परमेश्वर के साथ शान्ति नहीं है। कुछ लोग अभिमानी आत्म-धार्मिकता से फूले हुए हैं, जैसे पोप के अधीन भिक्षु और साधु, जो अपने आप को यह विश्वास दिला लेते हैं कि उन्होंने परमेश्वर की कृपा ऐसी कमा ली है कि उन्हें लगता है उनमें कोई दोष नहीं। जो अपने गुणों और भले कामों पर भरोसा बाँधते हैं, वे सोचते हैं कि परमेश्वर उनका ऋणी है, और वे उस मूर्खतापूर्ण आत्म-विश्वास से, जिससे शैतान ने उन्हें मतवाला कर रखा है, सहज ही सुला दिये जाते हैं।
और यह इसलिये कि वे परमेश्वर को खोजते नहीं, वरन् अपने मन में एक मूर्ति गढ़ लेते हैं। सच कहें तो वे परमेश्वर को जो कुछ चढ़ाते हैं वह तुच्छ है, मानो बच्चों के खिलौने और सामान। ये कपटी लोग तरह-तरह की धार्मिक रीतियाँ निभाते हैं, जैसे पवित्र जल छिड़कना, क्रूस का चिह्न बनाना, कुछ दिनों में उपवास करना, तीर्थयात्राओं पर निकलना, निश्चित अवसरों पर माँस से परहेज़ करना, निर्धारित मुद्राएँ अपनाना, सन्तों के लिये मोमबत्तियाँ जलाना, बहुत से मिस्साओं में सम्मिलित होना, और बहुत सी प्रार्थनाएँ दोहराना। जब तुम इन सब रीतियों को इकट्ठा करते हो, तो प्रकट हो जाता है कि वे केवल अन्धविश्वास की तलछट और गन्दगी में लिप्त हैं। फिर भी उनकी दृष्टि में परमेश्वर उनसे अत्यन्त प्रसन्न है, मानो वह कोई मूर्ति या छोटा बच्चा हो। जैसा पहले कहा गया, ये कपटी लोग, जो अहंकार से फूले हैं, इनमें से कोई भी परमेश्वर के साथ सच्ची शान्ति नहीं पा सकता। इसका कारण यह है कि वे अपना ध्यान परमेश्वर की ओर नहीं लगाते, वरन् तिरछी दृष्टि से देखते हैं। यद्यपि वे परमेश्वर के पास आने का ढोंग करते हैं, उनका अपने आप को अर्पित करना सच्चाई और पूरे मन से नहीं होता। वे अपनी ही खोखली चापलूसी से अपने आप को धोखा देते हैं।
ऐसे लोग भी हैं जो उनके उद्धार की बात कही जाने पर उपहास करते हैं, और कहते हैं, "यदि हम एक बार हृदय से आह भर सकें तो बस है।" फिर भी वे आमोद-प्रमोद और रंगरलियाँ मनाने से नहीं रुकते। हमें अपना सारा जीवन ऐसी मूर्खता में क्यों बिताना चाहिए जिससे हमारा कोई भला नहीं होता? इसलिये वे अलग-अलग तरीकों से, हर एक अपनी-अपनी रुचि के अनुसार, रंगरलियाँ मनाते और अपने आप को लिप्त करते हैं, और अपने ही विनाश की ओर दौड़े चले जाते हैं। उनके पास अपने आप को नष्ट करने के हज़ार उपाय हैं, और वे सब जहाँ तक हो सके परमेश्वर के विरुद्ध मिलकर काम करते हैं। ऐसे लोग सदा बहुत रहे हैं, और अब भी हैं, जो अपनी अन्तरात्मा को सुला देते हैं। सन्त पौलुस इस स्थान में, जैसा रोमियों के पाँचवें अध्याय में, सच्ची शान्ति की रूपरेखा देता है, कि जब हम परमेश्वर के सामने आएँ, तब उसकी महिमा के सम्मुख इस निश्चय के साथ खड़े हों कि वह हम पर दया करेगा और हमारे पापों का दोष हम पर नहीं लगाएगा, वरन् हमें अपनी सन्तान के रूप में ग्रहण करेगा।
अब, यदि हम उस आत्मिक शान्ति का अनुभव करना चाहते हैं जो संसार की सब भली वस्तुओं से बढ़कर है, तो हमें अपने ही विरुद्ध युद्ध करना सीखना होगा। यह कैसे होता है? पहले, हमें पहचानना चाहिए कि हम दोषी और त्यागे हुए हैं, और जब तक हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमारा उद्धार न हो, हमारे छुटकारे की कोई आशा नहीं। जब हम अपनी योग्यताओं पर सब भरोसे से रहित हो जाएँ, और जान लें कि हम खाली और बिलकुल नंगे हैं, तब हमें कंगाल भिखारियों की नाईं परमेश्वर के पास आना चाहिए। सच्ची शान्ति पाने के लिये यही आवश्यक मनोभाव है। इस मार्ग में हमें यह न सोचना चाहिए कि सुस्त पड़े रहने से हमें कुछ मिलेगा। चूँकि हमारे लिये कोई निश्चित समय ठहराया नहीं गया, इसलिये हमें सुबह और शाम अपने आप को परमेश्वर के सामने बुलाना चाहिए, अपने पापों की भली-भाँति जाँच करनी चाहिए, और उनके लिये खेदित और लज्जित होना चाहिए। जब हम अपने ही दोषों के विरुद्ध युद्ध करना, और वह भी गम्भीरता से, बिना कपट या ढोंग के, सीख लेते हैं, तब हम उस शान्ति के मार्ग पर हैं जिसकी घोषणा और प्रचार हमारे प्रभु यीशु मसीह ने सुसमाचार में हमारे लिये किया है।
इसी कारण सन्त पौलुस विशेष रूप से कहता है कि उसी के द्वारा हमारी पिता तक पहुँच है। अर्थात् अविश्वासी, अन्यजाति के संसारी लोग, परमेश्वर का उपहास करनेवाले, और जो अपने अनन्त उद्धार के विषय में सोचते नहीं, वे सुसमाचार की दी हुई शान्ति के मूल्य का स्वाद नहीं ले सकते, और न यह समझ सकते हैं कि वह कितनी बहुमूल्य और चाहने योग्य है। इसका कारण यह है कि वे अपने ही मार्ग में बहुत सी बाधाएँ डालते हैं, जिससे वे परमेश्वर की धार्मिकता का अनुभव नहीं करते और अपने पापों से नहीं डरते। संक्षेप में, वे जान-बूझकर अपने आप को मतवाला कर लेते हैं, ताकि उनकी अन्तरात्मा सुन्न हो जाए, और वे अपने आप को यह समझा लेते हैं कि उनमें समझ नहीं है, और पशुओं की नाईं व्यवहार करते हैं। परन्तु जब हम जान लेते हैं कि हमारा कल्याण इस पर निर्भर है कि हम सहायता के लिये परमेश्वर की ओर फिर सकें, और उसके पास भरोसे के साथ आ सकें, तब हम और सब चिन्ताएँ भूल जाएँगे और अपने प्रभु यीशु मसीह से एक होने की लालसा करेंगे। हम इच्छा करेंगे कि परमेश्वर हमें ग्रहण करे, और आवश्यकता के समय अटल भरोसे से उसे पुकारेंगे। हम उस प्रेम पर विश्राम करेंगे जो वह हम से रखता है, यह जानकर कि सुसमाचार में जो कुछ हमें दिया जाता है वह ऐसा है मानो परमेश्वर ने स्वयं हम से कहा हो।
अब सन्त पौलुस, सुसमाचार के प्रचार की बात कहकर, एक आत्मा में एक होने के महत्व पर बल देता है। यद्यपि सुसमाचार की घोषणा होती है, बहुत से हठीले लोग और अन्य इस संसार में इतने डूबे हैं कि वे स्वर्गीय जीवन को कुत्तों और सूअरों से अधिक महत्व नहीं देते। फिर भी कुछ और हैं जो अपने कपट में फँसे रहते हैं। यद्यपि परमेश्वर अपने पुत्र के द्वारा हमें बुलाता और मधुरता से अपनी ओर खींचता है, तो भी जो सचमुच परमेश्वर के पास आते हैं उनकी संख्या बहुत थोड़ी है। इसी कारण सन्त पौलुस कहता है कि हमारे पास परमेश्वर का आत्मा होना चाहिए। निश्चित है कि स्वभाव से हम चंचल हैं। हम में से हर एक की अपनी-अपनी राय ही नहीं होती, वरन् हम हर घण्टे की हर मिनट में बदलते भी रहते हैं। इसी कारण हम एकमत होने से बहुत दूर हैं, और जब तक परमेश्वर हमारी अगुवाई न करे, हम में से कोई भी सुबह से शाम तक एक स्थिर मत पर नहीं रहता। इसलिये जब हम सुसमाचार का प्रचार सुनें, तब यह आवश्यक है कि परमेश्वर का आत्मा हमारे पास हो जो हमारी अगुवाई और संचालन करे, ताकि हम पूरे मन से अपने प्रभु यीशु मसीह को ग्रहण करें और पिता तक पहुँच पाएँ।
यह स्मरण रखना आवश्यक है कि जब हमारा प्रभु यीशु मसीह अपने सेवकों के द्वारा हमें बुलाता है, जैसा सन्त पौलुस 2 कुरिन्थियों में बताता है, तो हमें उसके पास आने को उत्सुक होना और अपनी पूरी शक्ति से उसकी ओर दौड़ना चाहिए। जब हम अपनी भरसक चेष्टा कर चुके हों, तब भी हम उस तक नहीं पहुँच सकते जब तक उसका आत्मा हमारी अगुवाई न करे। इसलिये हमें परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह अपने पवित्र आत्मा से हमें छूए और हमें अपने पास आने योग्य करे, जैसा रोमियों और गलातियों में कहा गया है। सन्त पौलुस परमेश्वर की सन्तानों और निकम्मों में भेद करता है, और कहता है कि जिनके पास गोद लेने का आत्मा है वे पुकार सकते हैं, "अब्बा, हे पिता।" हम अपने आप में परमेश्वर को अपना पिता कहने के लिये बहुत दुर्बल और निर्बल हैं। जब परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा के द्वारा अपने सुसमाचार की सच्चाई हमारे भीतर मुहरबन्द कर दे और हमें भीतर से ज्योतिर्मय कर दे, ताकि हम पहचानें कि वही बोलनेवाला है, तभी हम स्वतन्त्रता और भरोसे से उसे अपना पिता घोषित कर सकेंगे। सार यह है कि हमें स्मरण रखना चाहिए कि जब सुसमाचार का प्रचार हमारे सामने हो, तब हम अपनी समझ पर भरोसा न करें, वरन् अपनी अज्ञानता और दुर्बलता को देखते हुए अपने आप को परमेश्वर के आत्मा की अगुवाई में सौंप दें। यही आत्मा स्वर्गलोक का द्वार खोलने की प्रमुख कुंजी है।
इसके अतिरिक्त, हमें अपने प्रभु यीशु मसीह के लहू से शुद्ध किया जाना है, जैसा 1 तीमुथियुस में कहा गया है। इब्रानियों में प्रेरित यह भी कहता है कि यीशु मसीह ने आत्मा के द्वारा अपने आप को अर्पित किया। इसका अर्थ यह है कि उसका बलिदान, जिसने हमारी धार्मिकता को सुरक्षित किया, व्यर्थ होता यदि पवित्र आत्मा उसे सामर्थ्य न देता। यहाँ चर्चा हुए विषय को आगे बढ़ाते हुए सन्त पौलुस फिर कहता है कि जो दूर थे और जो निकट थे, दोनों ने एक ही सन्देश सुना। यह सन्देश आज हमारे लिये भी प्रासंगिक है, और हमारे विश्वास में हमें दृढ़ और बलवन्त करता है। जैसा मैंने पहले कहा, यहूदी, जिन्हें व्यवस्था के द्वारा, जो परमेश्वर ने उन्हें दी, और उन्हें अपनी चुनी हुई प्रजा मानने के द्वारा, परमेश्वर से कुछ परिचय था, वे तब तक उससे पूरी तरह एक नहीं हुए थे जब तक यीशु मसीह के द्वारा उनके पाप क्षमा न किये गए। व्यवस्था उन्हें केवल भय, पीड़ा और श्राप ही दे सकती थी, जैसा सन्त पौलुस रोमियों और 2 कुरिन्थियों में कहता है। इसलिये व्यवस्था के साथ सुसमाचार को जोड़ना आवश्यक था। यद्यपि पुराने नियम के विश्वासियों के पास, दाऊद, पवित्र भविष्यद्वक्ताओं और राजाओं समेत, सुसमाचार वैसे स्पष्ट रूप में नहीं था जैसा हमारे पास है, तो भी परमेश्वर ने उन पर उद्धार का सार प्रकट किया, कि वह अपनी भलाई से उन्हें उस छुड़ानेवाले के कारण, जिस पर वे भरोसा रखते थे, दया से ग्रहण करता है। यदि व्यवस्था सुसमाचार से अलग कर दी जाए, तो वह किसी के लिये लाभदायक न होगी, वरन् दोषी ठहराने और डराने का काम करेगी। सच्ची शान्ति सुसमाचार में मिलती है, और यहूदियों के लिये इस शिक्षा में सहभागी होना आवश्यक था। रही हमारी बात, जो अन्यजाति हैं, जैसा मैंने पहले कहा, हमें उस दोहरे बन्धन को और भी अधिक पहचानना चाहिए जो हमें परमेश्वर से बाँधता है। उसने कृपा करके हमें अपनी चुनी हुई प्रजा के साथ सहभागी बनाया, और हमें, जो मानो असमय जन्मे लोगों जैसे थे, उन लोगों की संगति में ले आया जिन्हें उसने चुना और गोद लिया। यह भविष्यद्वाणियों को पूरा करता है, क्योंकि अब हम उसकी अपनी प्रजा के साथ, अन्यजातियों और यहूदियों दोनों के साथ मिलकर, परमेश्वर की महिमा कर सकते हैं, जैसा पवित्र आत्मा ने पहले से कहा था। यह एकता और मेल तब प्रकट होता है जब हम अपनी बिखरी हुई दशा से इकट्ठे किये जाते हैं, जैसा हम पहले चर्चा कर चुके हैं। सन्त पौलुस का यह कहने का उद्देश्य कि सुसमाचार सब लोगों को, चाहे निकट हों या दूर, सुनाया गया, यह बल देना है कि हमारा विश्वास अटल होना चाहिए और हमें अनिश्चित और सन्देही नहीं रहना चाहिए, जैसा रोमियों में कहा गया है।
यदि हम न जानते कि सुसमाचार का प्रचार परमेश्वर के अधिकार और अटल आज्ञा से होता है, तो यह उचित न होता कि व्यक्ति स्वयं को प्रस्तुत करें जब तक परमेश्वर ने उन्हें भेजा न हो। पहले परमेश्वर ने संसार को केवल प्रचार या लेख के द्वारा ही नहीं, वरन् संसार के अस्तित्व के द्वारा भी सिखाया है। इसलिये प्रकट है कि परमेश्वर का अनुग्रह सब जातियों तक पहुँचाया गया है, और यह जताया गया है कि वह उनका पिता होगा। इसे देखते हुए यहूदियों को यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर से मेल-मिलाप की महान आवश्यकता को पहचानना चाहिए था। उन्हें अपने जन्मसिद्ध अधिकार, खतने, या व्यवस्था की किसी छाया पर भरोसा करके धोखे में नहीं पड़ना चाहिए था। वरन् उन्हें उसी एकमात्र उपाय की ओर फिरना चाहिए था जिसकी चर्चा मैं पहले कर चुका हूँ: कि परमेश्वर उन्हें यीशु मसीह के द्वारा अर्पित किये गए अनन्त बलिदान के कारण दया से ग्रहण करता है। इसी प्रकार हमें भी परमेश्वर की भलाई को बड़ा मानना चाहिए, क्योंकि उसने हमें अपने घराने और कलीसिया का भाग होने दिया, जबकि पहले हम बहिष्कृत और निर्वासित थे। हमें सावधान रहना चाहिए कि अकृतज्ञता के कारण यह आशीष हाथ से न निकल जाए। यदि हम अपने हृदय से उसकी ओर उत्सुकता और गम्भीरता से न दौड़ें, और यह न दिखाएँ कि हम समझते हैं कि हमारा सारा कल्याण, आनन्द, सुख और महिमा केवल उसकी मुफ़्त भलाई से ही प्राप्त हो सकते हैं, तो हमारे पास कोई बहाना नहीं।
इसके अतिरिक्त, यदि हम इस शान्ति को ठुकराएँ, तो हमें सावधान रहना चाहिए कि कहीं यीशु मसीह अपना सन्देश न बदल दे। सुसमाचार सदा उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं लाता जो परमेश्वर की इच्छा के अनुसार नहीं चलते। पवित्र शास्त्र बाँधने और खोलने, दोनों की चर्चा करता है, क्योंकि हमारे प्रभु यीशु मसीह का अभिप्राय यह दिखाना था कि सुसमाचार का स्वभाव और कर्तव्य हमें उस दासता और बन्दीगृह से छुड़ाना है जिसमें हम तब तक रखे जाते हैं जब तक वह हमें स्वतन्त्र न करे। उसने यूहन्ना के सुसमाचार में यह घोषित किया है। परन्तु उनके लिये बन्धन तैयार हैं जो उसे अपना छुड़ानेवाला नहीं मानते, या उसे अपने आप को स्वतन्त्र करने नहीं देते। यही उसके इस कथन का अर्थ है: "जिन के पाप तुम क्षमा करो वे उनके लिये क्षमा किये गए हैं, और जिन के तुम रखो वे रखे गए हैं।" इसलिये जब हम सुसमाचार का प्रचार करते हैं, तो हमारा प्रमुख कार्य मेल-मिलाप का सन्देश सुनाना है, जैसा 1 कुरिन्थियों में कहा गया है। हमें निरन्तर घोषणा करनी चाहिए कि परमेश्वर अपने पुत्र के व्यक्तित्व में हम से मेल कर चुका है, हमें हमारी सब अशुद्धताओं से शुद्ध किये जाने के लिये ग्रहण कर चुका है और अपने सामने धर्मी गिन चुका है। हम बन्धन-मुक्त हैं, बन्दी छुड़ाए गए हैं, और जो मृत्यु के अन्धकार में डूबे थे वे जीवन की ज्योति में लौटा लिये गए हैं।
दूसरी ओर, हमें यह भी आज्ञा है कि जो परमेश्वर के वचन को तुच्छ जानते हैं, उन्हें उसके भयानक क्रोध की चेतावनी देकर उनके पापों की क्षमा रोक रखें। हमें उन्हें बताना चाहिए कि जब वे सुनी हुई शिक्षा की उपेक्षा करते हैं, तो वही उन्हें बाँधने की रस्सियाँ और बेड़ियाँ बन जाएगी। सिम्पल एक और स्थान में स्पष्ट कहता है कि हमारे पास उन सब के लिये बदला तैयार है जो हमारी शिक्षा का विरोध करते हैं, चाहे वे संसार में सबसे ऊँचे पदों पर क्यों न हों। यदि वे परमेश्वर के विरुद्ध अपनी रक्षा-पंक्तियाँ खड़ी करें और उसे तुच्छ जानें, तो वे उस दण्ड से बच न सकेंगे जिसकी चेतावनी दी गई है, विशेषकर जब विश्वासी अपना कर्तव्य पूरा कर चुके हों।
सचमुच, जब कोई शत्रु दूसरों को बुलाता है, तो कँपकँपी होती है कि कहीं उचित शर्तें ठुकराने पर दया न मिले। तो तब क्या होगा जब परमेश्वर हमें केवल अपने आप को उसके हाथ सौंपने के लिये ही नहीं बुलाता, वरन् स्वयं को हमें अर्पित भी करता है, और चाहता है कि हम यीशु मसीह के व्यक्तित्व में उसे और उसकी सब आशीषों को पाएँ? हमारा क्या होगा यदि हम ऐसे अनुग्रह को ठुकराएँ जब वह हम पर ऐसी कृपा दिखाता है? क्या हमें ऐसे नीच घमण्ड और तिरस्कारपूर्ण अस्वीकार पर भयंकर दण्ड गिरने की आशा नहीं करनी चाहिए? जब लोग उसे ग्रहण करने से इनकार करते हैं, जिसने न केवल उनका उद्धार मोल लिया वरन् उन्हें रचा और सम्भाले भी रखता है, तो उन्हें किस दण्ड की आशा करनी चाहिए?
इसलिये आइए हम इस समझाई गई शिक्षा पर ध्यानपूर्वक मन लगाना सीखें, ताकि हम परमेश्वर को और न भड़काएँ, और अपनी रोटी को व्यर्थ और अपने भोजन को प्राणघातक विष न बना दें। परमेश्वर जो अनुग्रह हमें प्रतिदिन देता है, उससे हमें सचमुच जीवित किया जाना चाहिए। इसी कारण पौलुस निष्कर्ष निकालता है कि जो परमेश्वर के आत्मा से स्पर्श किये गए, उन्होंने सादगी और सच्चाई से सुसमाचार का पालन किया। वे अब परदेशी नहीं, वरन् पवित्र लोगों के संगी स्वदेशी और परमेश्वर के घराने के सदस्य हैं। यह इसलिये कि परमेश्वर के नाम की महिमा वैसी हो जैसी उसके योग्य है, और हम उसे हल्के में न लें जैसा हम प्रायः करते हैं।
सुसमाचार के प्रचार से पहले अन्यजातियाँ उद्धार की आशा से रहित थीं, परमेश्वर की कृपा से कटी हुई, प्रतिज्ञाओं से रहित, और जगत में बिना परमेश्वर के। वे संसार में रहती थीं, भोजन पाती थीं, और सूर्य के प्रकाश का आनन्द लेती थीं, फिर भी वे परमेश्वर के बिना थीं। सब अविश्वासियों का यही हाल है। इसलिये जब परमेश्वर हमें वह अतुलनीय भलाई समझाता है जो उसने हमें भविष्यद्वक्ताओं, प्रेरितों, शहीदों और सब विश्वासियों के बीच रखकर दी है, तब हमें और आगे बढ़कर यह भी समझना चाहिए कि उसने हमें स्वर्ग के स्वर्गदूतों के संगी स्वदेशी बनाया है। बहुत से लोग सांसारिक नागरिकताओं, मुफ़्त भोजों या नगर के विशेषाधिकारों के लिये बड़ा परिश्रम करते हैं, यद्यपि ये अस्थायी हैं। यह जीवन क्या है, केवल एक क्षणिक छाया जो शीघ्र ही मिट जाती है? परमेश्वर हमें अपनी कलीसिया में परदेशियों की नाईं टिकने के लिये ही नहीं बुलाता, वरन् हमें निश्चय भी दिलाता है कि उसने हमें अपनी सन्तान के रूप में ग्रहण कर लिया है। सच्चे भरोसे से हम निर्भय होकर उसे अपना पिता कह सकते हैं और सब पवित्र लोगों के साथ अपने स्वर मिला सकते हैं। यही हमें स्मरण रखना है।
यद्यपि हम अभी इसका पूर्ण अनुभव न करते हों, तो भी विश्वास के द्वारा हम इस जीवन में संसार के लिये परदेशी होकर चल सकते हैं, यह जानते हुए कि परमेश्वर अपनी सन्तानों और वारिसों को नहीं त्यागेगा। यद्यपि हम बहुत से दोषों और अपूर्णताओं में लिपटे हैं, स्वर्ग के सब पवित्र लोग हमें अपने भाई मानते हैं और हमारे प्रभु यीशु मसीह के कारण हमें अपनाते हैं। आइए हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने दीन हों, अपने दोषों को मानें, और प्रार्थना करें कि हम उन्हें गहराई से अनुभव करें और पवित्र लोगों के और अधिक समान होना चाहें। दूसरी ओर, आइए हम उस असीम अनुग्रह पर मन लगाएँ जो परमेश्वर ने हम पर बढ़ाया है, जो हमें अपनी ओर बुलाता है। हम द्वेषी, मूर्ख या उसकी बुलाहट के प्रति अन्धे न हों, वरन् जो शिक्षा वह हमारे सामने रखता है उसके आज्ञाकारी होकर झुक जाएँ। यह शिक्षा हमारा जीवन, हमारा कल्याण और हमारा उद्धार हो, जो हमें संसार की बुरी अभिलाषाओं और उन भ्रामक लगावों से खींच ले जो हमें उससे भटकाते हैं। इस प्रकार हम उसके भय और प्रेम में बढ़ सकें, और उसके स्वरूप के अनुसार ढलते जाएँ, जब तक हम उसकी स्वर्गीय महिमा को न पहुँचें। वह हमें इसी के लिये बुलाता है, और वह यह अनुग्रह केवल हमें ही नहीं, वरन् सब लोगों को भी दे, इत्यादि।
