अध्याय 7

इफिसियों 1:13-14 पर पहले अध्याय का पाँचवाँ उपदेश

Sermons on Ephesians (Modernized) · John Calvin

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इफिसियों 1:13-14 पर पहले अध्याय का पाँचवाँ उपदेश

"जिसमें तुम भी, जब तुमने सत्य का वचन सुना, जो तुम्हारे उद्धार का सुसमाचार है, और उसी में विश्वास किया, तो प्रतिज्ञा की हुई पवित्र आत्मा की छाप तुम पर लगी; वह उसके मोल लिए हुओं के छुटकारे के लिये हमारी मीरास का बयाना है, कि उसकी महिमा की स्तुति हो।" - इफिसियों 1:13-14

हम अब तक देख चुके हैं कि सन्त पौलुस किस स्पष्टता से घोषणा करता है कि हमारे उद्धार की नींव केवल परमेश्वर की असीम भलाई पर टिकी है। उसके चुनाव का कारण हमें कहीं और नहीं ढूँढ़ना चाहिए, कि वह एक को क्यों चुनता है और दूसरे को क्यों नहीं। हमारा कर्तव्य है कि हम उसकी शुद्ध इच्छा, उसके अटल संकल्प और उसके अपरिवर्तनीय आदेश में सन्तुष्ट रहें। जो इस सीमा के पार जाने का साहस करेंगे, वे अपनी ही ढिठाई के कारण अवश्य ही किसी भयानक गड्ढे में गिरेंगे; और वे पाएँगे कि जो लोग परमेश्वर की महिमा और उसकी गुप्त युक्ति का गहरी नम्रता और श्रद्धा से आदर नहीं करते, वे उलझन के जाल में फँस जाते हैं। इसलिए जब हम अपने उद्धार का स्रोत खोजें, तो हमें सीखना चाहिए कि उसे पूरी तरह परमेश्वर ही का ठहराएँ।

निःसन्देह परमेश्वर की सन्तान और वारिस बनने के लिए हमें अपने प्रभु यीशु मसीह की देह का अंग होना आवश्यक है, जो विश्वास के द्वारा प्राप्त होता है। परन्तु हम सुसमाचार पर तब तक विश्वास नहीं कर सकते जब तक परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें अपने निकट न खींचे। हम देख सकते हैं कि परमेश्वर सब मनुष्यों से एक-सा व्यवहार नहीं करता; वह तो सारे संसार को सहज ही प्रकाशित कर सकता था और सब अविश्वास को मिटा सकता था, पर हम इसके विपरीत देखते हैं। इसलिए हमें दृढ़ता से मानना चाहिए कि वह अपनी इच्छा के अनुसार चुनता है। यदि कोई उसके चुनाव का कारण पूछे, तो यह अभिमान की बड़ी भूल होगी। ठीक इसी कारण अनेक ढीठ लोग अपने ही विनाश में ठोकर खाते हैं, क्योंकि वे यह मानने को तैयार नहीं होते कि परमेश्वर मनुष्यों पर अपनी ही इच्छा के अनुसार शासन करता है, जो उसका उचित अधिकार है।

फिर, अब तक की हमारी जाँच में सन्त पौलुस ने यहूदियों और अन्यजातियों को एक ही स्तर पर रखा है; यह ऐसा विषय है जिस पर और विस्तार से विचार करना उचित है। जब परमेश्वर ने अब्राहम के वंशजों को चुना, तो भूल से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता था कि उनमें कोई स्वाभाविक योग्यता थी। सच है कि यदि हम उस अनुग्रह पर विचार करें जो यहूदियों को मिला, तो वे शेष संसार से बहुत ऊपर ठहरते हैं। परन्तु यदि हम उन्हें उनकी अपनी दशा में आँकें, तो उनमें कोई धार्मिकता नहीं पाई जाती। स्मरण रखने की मूल बात यह है कि परमेश्वर किसी मनुष्य का देनदार नहीं है, और उसने यहूदियों को जो मुफ़्त गोद लेकर अपनाया, वह इसलिए नहीं कि वे अधिक योग्य थे, या कि वे अपने आप पर घमण्ड करें। इसलिए सन्त पौलुस स्पष्ट कहता है कि जिन्होंने बीते समयों में यीशु मसीह पर विश्वास किया, वे भी औरों के समान परमेश्वर के चुनाव में सम्मिलित हैं। अतः कोई यह घमण्ड नहीं कर सकता कि वह औरों से अधिक योग्य है या उसने औरों से अधिक कमाया है। यह समझना आवश्यक है कि यहूदी और अन्यजाति दोनों को परमेश्वर ने अपनी इच्छा से चुना, और इस विषय में केवल दया ही को देखना चाहिए। इससे सब आपत्तियाँ शान्त हो जाती हैं और कोई यह नहीं कह सकता कि उसने इस ईश्वरीय योजना में अपनी ओर से कुछ योगदान दिया।

अब, जब सन्त पौलुस यहूदियों और अन्यजातियों की इस तुलना में प्रवेश करता है, तो वह बताता है कि यदि कोई इस बात पर ध्यान दे कि परमेश्वर ने यहूदियों को अपनी मीरास के रूप में चुना, तो वे सचमुच एक पवित्र वंश थे। परमेश्वर ने उन्हें अपनी व्यवस्था और प्रतिज्ञाएँ दी थीं और उन्हें उन सब से ऊपर उठाया था जिन्हें उसने ठुकरा दिया और त्याग दिया था। परन्तु जब हम अपनी दृष्टि स्वयं परमेश्वर की ओर करते हैं, तो मनुष्य का सारा घमण्ड बन्द हो जाना चाहिए। उस सन्दर्भ में सन्त पौलुस विशेष रूप से हमारे पापों की क्षमा और विश्वास के द्वारा परमेश्वर के अनुग्रह को ग्रहण करने की चर्चा करता है। वह ज़ोर देता है कि ये आशीषें परमेश्वर की गहरी करुणा को छोड़ और किसी बात का फल नहीं ठहराई जा सकतीं। जैसा हमने गलातियों की पत्री में देखा, सन्त पौलुस ने पतरस को स्मरण दिलाया कि वे जन्म से यहूदी थे। फिर भी उनके उद्धार का एकमात्र शरणस्थान और निश्चय यीशु मसीह पर विश्वास करने में था। सन्त पौलुस जानता था कि मनुष्य अपने स्वभाव से पूरी तरह बिगड़ा हुआ और खोया हुआ है, और परमेश्वर के क्रोध और श्राप के सिवा कुछ नहीं लाता। इसलिए, जैसा उसने पहले अन्य स्थलों में दिखाया, सन्त पौलुस मनुष्य की योग्यता या पात्रता के सब भ्रमों को दूर करना चाहता है। इस शिक्षा को दृढ़ता से स्थापित करने, विवादों को मिटाने और आपत्तियों को शान्त करने के लिए वह हमें स्रोत की ओर ले जाता है: परमेश्वर जिसे चाहता है उसे विश्वास देता ही नहीं, वरन् उसने जगत की सृष्टि से पहले हमें चुन भी लिया और अलग भी कर लिया। सार यह कि छोटे-बड़े सब मनुष्य परमेश्वर के ऋणी हैं, और कोई इतना पवित्र या प्रतिष्ठित नहीं जो इस सार्वभौम दशा से अपने को अलग बता सके।

फिर, सन्त पौलुस परमेश्वर की भलाई का गुणगान इस बात में करता है कि इफिसी लोग सुसमाचार पर विश्वास करने से पहले उनके साथ एकत्र और एक किए गए, जो पहले परमेश्वर की प्रजा और उसकी कलीसिया के अंग माने जाते थे। उनके मन फिराने से पहले इफिसियों में भेद था, जैसा दूसरे अध्याय में विस्तार से बताया गया है। विश्वास करनेवाले यहूदी, जो पहले ही हमारे प्रभु यीशु मसीह को ग्रहण कर चुके थे, एक ही सिर के अंग होकर स्वर्ग के स्वर्गदूतों के भाइयों के समान थे। जबकि इफिसी लोग अपनी दयनीय दशा में उद्धार की सब आशा से कटे हुए, परमेश्वर के शत्रु और विनाश के लिए ठहराए हुए थे। इन भेदों के होते हुए भी परमेश्वर ने वह भेद मिटा दिया और उन्हें एक देह में मिला लिया। परमेश्वर की भलाई तब स्पष्ट प्रकट हुई जब उसने उन्हें बचाया जो निराशा की गहराइयों में डूबे हुए थे, और उन्हें अपनी सन्तान के साथ अपने स्वर्गीय राज्य का भागी और वारिस बनाया। इसी कारण सन्त पौलुस, उनकी चर्चा करने के बाद जिन्होंने पहले यीशु मसीह पर विश्वास किया था, विशेष रूप से यह बात कहता है कि परमेश्वर ने अपनी कलीसिया को ऐसे इकट्ठा और स्थापित किया है कि प्रकट हो जाए कि हम में जो सबसे बड़े हैं वे भी पूरी तरह उसकी शुद्ध दया पर निर्भर हैं। जो ठुकराए और घृणित से दिखाई देते थे, उनके पास अब उसकी महिमा करने का कारण है, क्योंकि वे उलझन की दशा से छुड़ाए गए हैं।

इसके अतिरिक्त, सन्त पौलुस दिखाता है कि जो बात उसने पहले कही उसकी सच्चाई परमेश्वर के अनुग्रह के प्रभावों से प्रकट है। जैसा पहले कहा गया, हमारा चुनाव एक गुप्त और अगम्य विषय है। जब लोग उसकी पूरी-पूरी खोज करने का यत्न करते हैं, तो वे अपने ही विचारों से अवश्य दब जाते हैं और जान लेते हैं कि वे परमेश्वर की अनन्त युक्ति की थाह नहीं पा सकते। इसलिए हमें वहाँ से आगे नहीं बढ़ना चाहिए जहाँ तक पवित्रशास्त्र हमारी अगुवाई करता और मार्ग दिखाता है। अतः हमारे विषय में परमेश्वर का चुनाव उसी के भीतर छिपा रहता है, तौभी वह उन अनुग्रह के दानों के द्वारा, जो वह हमें देता है, जैसे विश्वास, जो पवित्र आत्मा का दान है, इसका प्रमाण देता है।

अब, यदि यह केवल ऐसा दान होता जैसा तब होता है जब वह अपना सूर्य भले और बुरे दोनों पर उदय करता है, या पृथ्वी से बिना भेद सब को फल देता है, तब भी यह परमेश्वर के दानों और आशीषों में गिना जाता। परन्तु विश्वास एक विशेष दान है, जिसे परमेश्वर सब को साधारण रूप से नहीं देता, वरन् एक खज़ाने की नाईं सुरक्षित रखता है कि अपनी इच्छा के अनुसार दे। वह ऐसा क्यों करता है? हम सब आदम से उतरे हैं और एक ही वंश के हैं। तो फिर वह कुछ को क्यों प्रकाशित करता है और औरों को उनकी आत्मिक अन्धता में छोड़ देता है? उसके चुनाव को छोड़ और कोई व्याख्या नहीं। इसलिए यद्यपि हम तर्क या बुद्धि से नहीं समझ सकते कि परमेश्वर ने जगत की सृष्टि से पहले हमें कैसे चुना, फिर भी हम इसे जानते हैं क्योंकि उसने इसे हम पर प्रकट किया है। जब हम विश्वास से प्रकाशित होते हैं, तब अनुभव ही इसका दृढ़ समर्थन करता है।

इस पर विचार करो: मैं सुसमाचार को क्यों ग्रहण करता और उससे क्यों लगा रहता हूँ, जबकि दूसरे पशुओं की-सी जड़ता में पड़े रहते हैं या उद्धार के सन्देश के विरोधी भी हो जाते हैं? यदि मैं मानूँ कि यह मेरी अपनी बुद्धि या प्रयत्न के कारण है, तो मैं परमेश्वर की निन्दा करता हूँ। हमें सदा उसी बात पर लौटना चाहिए जिसे हम पहले मान चुके हैं, और स्वीकार करना चाहिए, "तुझ में और दूसरे में कौन भेद करता है?" इसलिए सन्त पौलुस इस कथन में मनुष्य के सब अभिमान को नीचा करता है, ताकि कोई अपने आप को ऊँचा न करे या यह दावा न करे कि उसका अपना कुछ है। हमें यह नहीं मान बैठना चाहिए कि हम में स्वाभाविक पात्रता है, वरन् यह कि सब कुछ परमेश्वर से है। इस प्रकार इस स्थल में सन्त पौलुस दिखाता है कि इफिसी लोग अपने अनुभव के द्वारा परमेश्वर के चुने हुए ठहरे। उन्हें अपना विश्वास पूरी तरह परमेश्वर की मुफ़्त भलाई पर टिकाना चाहिए। प्रमाण इस बात में है कि उन्होंने सुसमाचार की शिक्षा को सुना और उस पर विश्वास किया। परन्तु यह कैसे हुआ? सन्त पौलुस समझाता है कि उन पर पवित्र आत्मा की छाप लगना आवश्यक था। यदि उन पर छाप लगी, तो इसका अर्थ है कि पवित्र आत्मा ने पहले से काम किया। इसलिए परमेश्वर की अनन्त युक्ति की उलझी हुई भूल-भुलैया में अत्यधिक गहरे उतरना व्यर्थ है। परमेश्वर सार रूप में बताता है कि उसने हमें कैसे चुना, बशर्ते हम कृतघ्न न हों वरन् उस भलाई को पहचानें जो उसने हम पर की है। हमें अपने भीतर पूरी तरह निश्चित और दृढ़ होना चाहिए कि इसका एकमात्र कारण यही है कि उसने अनादि काल से हमें अपने लिए मुहर लगाकर अपनी सन्तान होने के लिए रख छोड़ा। सन्त पौलुस का आशय स्पष्ट है। इसलिए जब यह स्वीकार करने की बात आए कि हम सब कुछ केवल परमेश्वर की शुद्ध दया से रखते हैं, तब हम लम्बी भूमिकाओं से बचें। हमारा विश्वास इस सत्य की गवाही देता है, क्योंकि वह हमारी मानवीय समझ की उपज नहीं, वरन् ऊपर से दिया हुआ दान है, जो केवल उन्हीं को दिया जाता है जिन्हें वह चुनता है।

इसके अतिरिक्त, यहाँ गहरी सच्चाइयाँ हैं जो हमारे ध्यानपूर्वक विचार के योग्य हैं। सबसे पहले, सन्त पौलुस पवित्र आत्मा के अनुग्रह को ऊँचा ठहराना चाहता है, इस बात पर ज़ोर देकर कि न हमारा अपने प्रभु यीशु मसीह में कोई भाग हो सकता है, न उन अनगिनत आशीषों में जो उसने हमारे लिए प्राप्त की हैं, जब तक परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें हमारा उद्धार न दे। यह बहुत महत्त्वपूर्ण बात है। सन्त पौलुस उस असीम लाभ पर भी बल देता है जो सुसमाचार के द्वारा हमें मिला, और उसे 'सत्य का वचन' और 'उद्धार का सुसमाचार' कहता है।

सबसे पहले, वह हमें अटल निश्चय देना चाहता है कि हम बिना हिचकिचाहट और बिना व्याकुल विवेक के परमेश्वर को पुकार सकें। जब तक हम अनिश्चित रहते हैं कि परमेश्वर हम से प्रेम करता है या घृणा, तब तक हम सच्चे और पूरे मन से उससे प्रार्थना नहीं कर सकते। फलतः हमारा उद्धार संकट में पड़ जाता है, जैसा भविष्यद्वक्ता योएल ने कहा। पवित्रशास्त्र निरन्तर सिखाता है कि हम उद्धार केवल तभी पा सकते हैं जब प्रार्थना और विनती के द्वारा परमेश्वर की शरण लें। यह निश्चय अनिवार्य है, जैसा हम तीसरे अध्याय में और गहराई से देखेंगे।

इसलिए हमारे लिए यह अत्यावश्यक है कि हमें पूरा निश्चय हो कि परमेश्वर हमारा पिता है और वह हमें अपने प्यारे बच्चों के रूप में गले लगाता है। यदि सुसमाचार की शिक्षा हर पहलू में अकाट्य न हो और उसमें सन्देह की कोई गुंजाइश रह जाए, तो हम ऐसा निश्चय कैसे पा सकते हैं? इसीलिए सन्त पौलुस उसे "सत्य का वचन" कहता है। और भी सत्य हैं, क्योंकि जब परमेश्वर चेतावनी देता है या धमकी देता है, तब भी वे निष्फल नहीं होतीं; उसकी प्रतिज्ञाएँ और उसकी चेतावनियाँ दोनों विश्वासयोग्यता से पूरी होती हैं। फिर भी इस सन्दर्भ में मुख्य उद्देश्य हम में से सब अविश्वास को मिटाना है, जिसकी ओर हम झुके रहते हैं। सन्त पौलुस सुसमाचार को सत्य की शिक्षा ठहराता है, मानो कह रहा हो, "प्रिय मित्रो, परमेश्वर सुसमाचार के द्वारा तुम्हें अपनी इच्छा का विश्वासयोग्य गवाह है। इसलिए उस पर अपना अटल भरोसा रखो।" और वह यह भी ज़ोर देता है कि हमारा उद्धार सुसमाचार के साथ गुँथा हुआ है, ताकि हम उसे प्रिय जानें और सँजोए रखें। आख़िर कौन अपने होश में अपने ही कल्याण को तुच्छ जानेगा? वह कहता है कि यह सब परमेश्वर की शुद्ध दया और उसके अनन्त चुनाव से निकलता है, जो हमारे लिए दूर और रहस्यमय बना रहता है। तौभी हम उसका ज्ञान सुसमाचार के द्वारा पाते हैं, जो उसकी नली और साधन है।

इसलिए, जैसा सन्त पौलुस आग्रह करता है, हम सुसमाचार की शिक्षा पर ऐसे दृढ़ता से टिकें कि मानो परमेश्वर स्पष्ट रूप से हम पर अपने आप को प्रकट कर रहा हो और आकाश हमारी आँखों के सामने खुल रहा हो। हमारे प्रभु यीशु मसीह के वचन सदा स्मरण रखो, जिसने कहा कि जब सुसमाचार की घोषणा के द्वारा मनुष्यों के पाप क्षमा किए जाते हैं, तब यह क्षमा स्वर्ग में भी पक्की की जाती है। इसके बाद हमारे मन में कोई सन्देह न रहे कि परमेश्वर हमारी प्रार्थनाएँ सुनेगा या नहीं। जैसे सुसमाचार हमें विश्वास करना सिखाता है, वैसे ही सन्त पौलुस हमें स्मरण दिलाता है कि उसे अमूल्य दान जानकर सँजोएँ, क्योंकि वह हर एक विश्वास करनेवाले के लिए उद्धार के निमित्त परमेश्वर की सामर्थ्य है, जैसा वह रोमियों की अपनी पत्री में ज़ोर देता है।

अपनी खोई हुई और असहाय दशा पर विचार करते हुए, जब कि हमें परमेश्वर की ओर लौटाने का सुसमाचार को छोड़ और कोई उपाय नहीं, हमें इस खज़ाने को बहुत मूल्यवान जानना चाहिए और यह देखना चाहिए कि हम उससे सच्चा लाभ उठाएँ। ऐसा करते हुए हमें शैतान और उसकी सब परीक्षाओं को निडर होकर ठुकरा देना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर ने हमें बुलाया है और हम पर अपने पितृवत् प्रेम और भली इच्छा के भरपूर प्रमाण दिए हैं।

अब मैं उस दूसरे पहलू की ओर आता हूँ जिसका मैंने उल्लेख किया था। सन्त पौलुस कहता है कि इसके अतिरिक्त कि परमेश्वर हमें सुसमाचार सुनवाना चाहता है, यह भी आवश्यक है कि वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा कार्य करे और विशेष अनुग्रह दे। कुछ लोग सहज ही मान लेंगे कि परमेश्वर ने हमारे पास सुसमाचार भेजने में केवल अपने मुफ़्त अनुग्रह से प्रेरणा पाई। तौभी वे यह सोच सकते हैं कि कुछ उसे ग्रहण करते हैं और कुछ नहीं, इसका कारण उनकी अपनी स्वतन्त्र इच्छा का प्रभाव है, और इस प्रकार वे परमेश्वर के अनुग्रह को घटाते हैं। परमेश्वर अपना अनुग्रह हमें ऐसे नहीं देता जैसे कोई बच्चों को सेब दे, कि जो सबसे जल्दी लपके वही पा ले। ऐसी धारणा का अर्थ होगा कि हमारे उद्धार का अधिकांश हमारी अपनी शक्ति और कौशल का परिणाम है, और प्रशंसा हमारी ओर जाती है।

यह दिखाने के बाद कि परमेश्वर अपने शुद्ध और मुफ़्त अनुग्रह से हमें, अभी और निरन्तर, अपने स्वर्गीय राज्य का वारिस होने के लिए बुलाता है, सन्त पौलुस आगे इस पर ज़ोर देता है कि उसके पवित्र आत्मा से प्रभावित होना आवश्यक है। यद्यपि वह यहाँ पवित्र आत्मा के अनुग्रह के केवल एक पक्ष की चर्चा करता है, उसका कारण यह है कि दूसरे भाग को वह पहले समझा चुका है। उसने परमेश्वर की मुफ़्त भलाई को बताते हुए आरम्भ किया, जिससे हम सब परिपूर्ण होते हैं, और प्रकट किया कि विश्वास मुफ़्त चुनाव के सोते से फूटता है। अब दूसरे पक्ष के विषय में वह बल देता है कि परमेश्वर का हमारे हृदयों को अपने पवित्र आत्मा के द्वारा प्रकाशित करना, हमें अन्धता से निकालना और अपना अनुग्रह हम में अंकित करना ताकि हमारी इच्छाएँ आज्ञाकारिता की ओर झुकें, अपने आप में पर्याप्त नहीं है। इसके अतिरिक्त परमेश्वर को हमें स्थिर और दृढ़ करना है, और अन्त तक टिके रहने के लिए अटल धीरज देना है।

तुम देख सकते हो कि सन्त पौलुस हमें किस ओर ले जा रहा है। पवित्र आत्मा से विश्वास पाने और उसके अनुग्रह से प्रकाशित होने के अतिरिक्त, जिसकी चर्चा मैं पहले कर चुका हूँ, परमेश्वर यह भी निश्चित करता है कि हम दृढ़ बने रहें और गिर न पड़ें। इस धारणा को और गहराई से समझने के लिए हमें पहले वह स्मरण करना चाहिए जो पहले अधिक विस्तार से समझाया जा चुका है। जब परमेश्वर हमें हमारी अपनी दशा और स्थिति पर छोड़ देता है, तब हम अन्धकार में भटकते अन्धों के समान हैं। हमें जो कुछ भी प्रचारित या बताया जाए, हम अपनी अज्ञानता में अडिग बने रहते हैं। क्योंकि सांसारिक मन का मनुष्य परमेश्वर या उद्धार सम्बन्धी बातों को नहीं समझ सकता। इसलिए तुम देख सकते हो कि जब तक परमेश्वर हम पर तरस खाकर हमें प्रकाश और समझ की आत्मा न दे, तब तक हम स्वर्गीय ज्योति से पूरी तरह वंचित हैं। यह पहली बात हुई, जिसकी चर्चा पहले की जा चुकी है, और मैं उस पर आगे नहीं बढ़ूँगा।

अब एक और पहलू पर विचार करना है। जब हम विश्वास के द्वारा परमेश्वर के अनुग्रह को ग्रहण कर चुके हैं, और समझ चुके हैं कि हमारा प्रभु यीशु मसीह हमारी सिद्ध सुख के लिए आवश्यक हर वस्तु का स्रोत है, तब हमारे लिए इस सत्य में दृढ़ता से स्थापित होना अत्यावश्यक है। ऐसा क्यों? हमें देखना चाहिए कि मनुष्य कितने चंचल हैं। जो परमेश्वर के पीछे चलने को सबसे अधिक इच्छुक हैं वे भी शीघ्र ठोकर खा जाएँगे, क्योंकि हम इतने निर्बल हैं कि शैतान हर क्षण हमें जीतना चाहता है। परमेश्वर के अटल सहारे के बिना हम निरन्तर पराजित होते रहते, केवल एक बार के असफल होने से नहीं, वरन् अनगिनत गिरावटों से, जैसा मैंने पहले कहा। ज्यों ही हम उद्धार के मार्ग पर पाँव रखते, हमारी निर्बलता, हल्कापन और अस्थिरता यदि रोकी न जाती तो हमें तुरन्त मोड़ देती। कहा गया है कि जब परमेश्वर हमें चुन चुका और हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह को सौंप चुका, तब वह हमें थामे रखने में अपनी सामर्थ्य दिखाता है। परमेश्वर के हस्तक्षेप के बिना हमारा क्या होता? हम पूरी तरह हार जाते, केवल एक असफलता के कारण नहीं, वरन् अनगिनत गिरावटों का सामना करते हुए। जिस क्षण हम उद्धार के मार्ग पर चलना आरम्भ करते, हमारी अपनी दुर्बलता हमें उससे फेर देती। केवल हम में परमेश्वर के कार्य के द्वारा, उसके पवित्र आत्मा के द्वारा, हम शैतान और संसार के सब आक्रमणों का सामना कर सकते हैं। हमारे विश्वास में परमेश्वर का आत्मा दोहरा कार्य करता है। पहला, वह हमें प्रकाशित करता है, उन बातों को समझने में हमारी सहायता करता है जो अन्यथा हम से छिपी रहतीं, ताकि हम परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को पूरी आज्ञाकारिता से ग्रहण करें। यह उसके कार्य का पहला भाग है। दूसरा भाग यह है कि वही आत्मा हम में निवास करने से प्रसन्न होता है और हमें धीरज देता है कि हम अपनी यात्रा में डगमगा न जाएँ। सन्त पौलुस इस समय इसी की चर्चा कर रहा है।

मानो वह कह रहा हो, "मेरे प्रिय मित्रो, तुमने परमेश्वर का अनुग्रह अनुभव किया है, और उसने तुम्हें अपने सुसमाचार का आज्ञाकारी होने के लिए खींचा है। यदि उसने तुम पर दया न दिखाई होती, तो तुम कभी उसके पास न आते। निश्चय जानो कि वह अपना अनुग्रह आरम्भ ही नहीं करता, वरन् तुम्हें टिके रहने की शक्ति देकर उसे बढ़ाता भी है। यदि तुम केवल तीन दिन, तीन वर्ष या उससे भी अधिक टिके रहते, तो भी परमेश्वर को तुम्हें सँभालना पड़ता; नहीं तो तुम खोए हुए प्राणियों की नाईं बिना किसी निश्चय के इधर-उधर उछाले जाते। परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है कि वह तुम्हारी देखभाल करेगा और तब तक तुम्हारी अगुवाई करेगा जब तक तुम अपनी यात्रा के अन्त तक पहुँचकर अपनी दौड़ पूरी न कर लो। इसीलिए वह यहाँ कहता है कि तुम पर पवित्र आत्मा की छाप लगी। आओ, सन्त पौलुस जो उपमा प्रयोग करता है उस पर ध्यानपूर्वक विचार करें। सब युगों में लोग विलेखों और दस्तावेज़ों को मुहरों से प्रमाणित करते आए हैं, प्रायः हस्ताक्षर के स्थान पर मुहर या अँगूठी का प्रयोग करते हुए। वसीयतनामे, वाचाएँ और अन्य समझौते इसी प्रकार पक्के किए जाते थे।

इस सन्दर्भ में सन्त पौलुस सुझाता है कि हमारे हृदयों में छाप लगाई जानी आवश्यक है। ठीक-ठीक कहें तो उसे कहना चाहिए था कि सुसमाचार पर छाप लगाई गई। परन्तु इस बात पर ज़ोर देने के लिए कि हमारा सन्देह और अस्थिरता हम ही से उत्पन्न होती है, और सुसमाचार स्वयं में अधिकारपूर्ण है, वह दिखाना चाहता है कि परमेश्वर का अपने सत्य पर छाप लगाना हमारे कठोर हृदय के उत्तर में है। हम हिलते हुए सरकण्डों के समान हैं, जो हर हवा से हिलते हैं, जब तक परमेश्वर हमें दृढ़ न करे। इसलिए समझो कि पवित्र आत्मा वह मुहर है जिसके द्वारा परमेश्वर अपना सत्य हम पर पक्का करता है।

जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, हमें इस निश्चय की बड़ी आवश्यकता है। यद्यपि हम मानते हैं कि परमेश्वर का वचन बिना प्रश्न और बिना सन्देह के ग्रहण करना चाहिए, फिर भी हम प्रायः डगमगाते पाए जाते हैं। कष्ट और झंझट हमारे सन्देहों को प्रकट कर देते हैं। यदि हम परमेश्वर की भलाई के विषय में वैसे ही पूरी तरह निश्चित होते जैसा वह हमें आश्वासन देता है, तो कठिनाइयाँ आने पर हम भय से इतनी सरलता से न हिल जाते। जो परीक्षाएँ हमें हिलाती हैं, वे दिखाती हैं कि हम सुसमाचार को वैसा पूरी तरह ग्रहण नहीं करते जैसा करना चाहिए। इसलिए परमेश्वर उसे अपने पवित्र आत्मा के द्वारा सामर्थ्य देता है और हमारे हृदयों में ऐसे निश्चय के साथ अंकित करता है कि शैतान उसे नष्ट करने को जो कुछ भी करे, हमारा विश्वास उससे अडिग रहे।"

जैसा मैंने पहले कहा, अपनी निर्बलताओं पर विचार करने से हम इस बात को और गहराई से समझ सकते हैं। संसार के सब कारणों के होते हुए भी, हम इस संसार के निरन्तर संकटों के बीच परमेश्वर की दया और रक्षा के विषय में शायद कभी उतने पूरे और सिद्ध रूप से निश्चित न हों जितना होना चाहिए। मानो हम एक उफनते समुद्र में हों, जहाँ आँधी और तूफ़ान लगातार हम पर टूटते हैं और हम सदा डूब जाने के संकट में हैं। तो फिर हम शैतान के सामने कैसे खड़े रहें, जब हम निहत्थी भेड़ों के समान हैं, जिनके पास न कवच है, न हथियार, न सहायता का कोई साधन? यदि हम जानते हैं कि जब तक हम पर दृढ़ छाप न लगे शैतान हमें तहस-नहस कर सकता है, तो हम जीवन और मृत्यु दोनों में कैसे आनन्दित हो सकते हैं? इसलिए इस पाठ की यह चेतावनी मानने के अतिरिक्त कि हम सब अहंकार और अभिमान को त्याग दें ताकि केवल परमेश्वर ही की स्तुति और बड़ाई हो, हम सन्त पौलुस के शब्दों से यह भी निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि हमारे पास शत्रु का सामना करने और उसे रोकने के लिए आवश्यक हथियार हैं। यद्यपि हमारा शत्रु बलवन्त और दृढ़ निश्चय का है, तौभी जब तक हम उस बात से लाभ उठाते हैं जो सन्त पौलुस यहाँ बताता है, कि परमेश्वर का आत्मा हम में सुसमाचार की प्रतिज्ञाओं की सच्चाई और निश्चय पर छाप लगाता है, तब तक वह हम पर कभी प्रबल न होगा।

फिर, सन्त पौलुस एक और उपमा का प्रयोग करता है, और परमेश्वर के आत्मा को बयाने के समान बताता है। इस पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि सन्त पौलुस इस शिक्षा को पक्का करता है, क्योंकि शैतान ने आदि से लगातार यत्न किया है कि लोगों को उनकी अपनी बुद्धि और बल के व्यर्थ विचारों से फुला दे। आदम का पतन इसलिए हुआ कि वह अपने उचित स्थान से ऊपर चढ़ना चाहता था और परमेश्वर से अधिक बुद्धिमान होने की इच्छा करता था, जिसकी परमेश्वर ने कोई अनुमति नहीं दी थी। हमारे विषय में भी यही सच है, और शैतान अपना आक्रमण जारी रखता है। देखो कि उसने चतुराई से मनुष्य को कैसे धोखा दिया, और उसका निरन्तर यत्न यह है कि हमें विश्वास दिलाए कि हम अनेक कार्य सिद्ध कर सकते हैं। इसलिए सन्त पौलुस को मनुष्य की स्वतन्त्र इच्छा और आत्म-धार्मिकता की इस झूठी और श्रापित मान्यता को हटाना पड़ा, यह प्रकट करते हुए कि हम सब कुछ के लिए पवित्र आत्मा के ऋणी हैं।

इसके अतिरिक्त, हमारे मोटे और सांसारिक स्वभाव के कारण आवश्यक है कि यह शिक्षा हमारे लिए ठोस रूप में प्रस्तुत की जाए। हम परमेश्वर के अदृश्य, अनुग्रहपूर्ण दानों को समझने में असमर्थ हैं, ठीक जैसे हम उन्हें अपनी शारीरिक इन्द्रियों से देख या छू नहीं सकते। इसलिए सन्त पौलुस ने आवश्यक जाना कि अलंकारिक भाषा से दिखाए कि यह परमेश्वर का पवित्र आत्मा ही है जो हमें सुसमाचार और उसके सब लाभों का अधिकारी बनाता है और अन्त तक उनमें हमें थामे रखता है।

हम जानते हैं कि अनुबन्धों को पक्का करने के लिए बयाना दिया जाता है, जिसे प्रायः अग्रिम धन कहते हैं। जब भूमि, घर, मीरास या वस्तुएँ खरीदी जाती हैं, तब यद्यपि मनुष्य का वचन ही पर्याप्त होना चाहिए, फिर भी मनुष्य की दुष्टता ऐसी है कि यदि लोग किसी बात में अपनी हानि देखें, तो अपनी प्रतिज्ञाओं से मुकरने में उन्हें संकोच नहीं होता। इसलिए बयाना देने की यह रीति चलाई गई, जो इस बात की गारंटी है कि सौदा तय हो गया और अनुबन्ध अटल है। इस सन्दर्भ में सन्त पौलुस संकेत करता है कि परमेश्वर का आत्मा हमारे उद्धार का पूर्ण निश्चय है। तुम पूछोगे, किस लिए? वह कहता है, "तुम्हारी मीरास के लिए, तुम्हारे छुटकारे के दिन तक।" यह निर्विवाद है कि हम अभी से परमेश्वर के वारिस हैं, क्योंकि हम उसकी सन्तान हैं। परन्तु रोमियों के आठवें अध्याय [पद 24] में जो कहा गया है उसे स्वीकार करना आवश्यक है: हमारा उद्धार आशा में थामा हुआ है। इसलिए हम अभी उसे देख या पूरी तरह उसका स्वाद नहीं ले सकते, जैसा कुलुस्सियों के तीसरे अध्याय [पद 3] में बताया गया है, जहाँ कहा गया है कि हम मरे हुओं के समान हैं, इस संसार से अलग, और हमारा जीवन मसीह यीशु में परमेश्वर के साथ छिपा हुआ है। इसलिए यद्यपि हम सचमुच परमेश्वर की सन्तान हैं, तौभी हम अभी उसके पूरे फल को नहीं पकड़ पाए।

यह सन्त यूहन्ना की अपनी पत्री की शिक्षा से पूरी तरह मेल खाता है: वह कहता है, "हम जानते हैं," जिसका अर्थ है कि हमारा विश्वास अडिग है। फिर भी वह जोड़ता है कि वह अभी पूरा नहीं हुआ, और हमें उस दिन की प्रतीक्षा करनी है जब हम परमेश्वर के समान होंगे, एक ऐसा समय जब हमारे पास वह स्पष्टता होगी कि जो हम अभी केवल विश्वास में थामे हैं उसे पूरी तरह देख सकें [1 यूहन्ना 3:2]। इसके अतिरिक्त हमने देखा है कि सन्त पौलुस ने कुरिन्थियों को अपनी दूसरी पत्री में समझाया कि हमारे पृथ्वी के प्रवास में हम एक अर्थ में परमेश्वर से अलग हैं [2 कुरिन्थियों 5:6]। ऐसा क्यों है? क्योंकि हम आशा के मार्ग पर चलते हैं, पूर्णता को ऐसे नहीं देखते मानो वह उपस्थित हो; वरन् उसे विश्वास के द्वारा पकड़ते हैं। संक्षेप में, यद्यपि हम मृत्यु से पार होकर जीवन में आ गए हैं, जैसा यूहन्ना के पाँचवें अध्याय [पद 24] में कहा गया है, तौभी हम मृत्यु के उन अनेक रूपों से लड़ते रहते हैं जो हमें घेरे हुए हैं।

सन्त पौलुस इस स्थल में दोनों पक्षों को कुशलता से जोड़ता है। एक ओर वह कहता है कि हम अभी अपने छुटकारे और मीरास तक नहीं पहुँचे; साथ ही वह इस पर बल देता है कि हम उसके विषय में पूरा निश्चय रख सकते हैं और केवल हमारी कृतघ्नता ही हमें परमेश्वर को पूरी तरह महिमा के साथ ग्रहण करने से रोकती है। हम निडर होकर कह सकते हैं कि हमें स्वर्गीय जीवन पाने में कोई सन्देह नहीं, क्योंकि पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे पास उसका बयाना है और हम अपने प्रभु यीशु मसीह के साथ ऐसे घनिष्ठ रूप से जुड़े हैं कि उसका सब कुछ विश्वास के द्वारा हमारा हो जाता है।

आओ, सन्त पौलुस इन शब्दों में जो ज्ञान बताता है उसकी गहराई में उतरें। वह कहता है कि पवित्र आत्मा हमारी गारंटी है। इस ज्ञान से सज्जित होकर हमें अपने छुटकारे में अटल भरोसा बढ़ाना चाहिए, जो अनुभव अन्तिम दिन पूरी तरह प्रकट होगा। हमारे अस्तित्व की कठोर वास्तविकताएँ इस सत्य की पुष्टि करती हैं। हम तो तुच्छ प्राणी हैं, जो क्षय और सड़न की अनवरत गति में फँसे हैं और अनगिनत क्लेश सहते हैं। संसार हमारे सीधे-सादे विश्वास को प्रायः तुच्छ जानता और उसकी हँसी उड़ाता है। हम भूख और प्यास से जूझते हैं, और कभी-कभी ऐसा लगता है मानो परमेश्वर ने हमें त्याग दिया हो और हमें अपने ईश्वरीय मौन के अधीन कर दिया हो। बाहरी आँख को हम बिलकुल तुच्छ दिखाई देते हैं। हमारी बाहरी दुर्दशा ऐसी ही है। इसलिए जो परीक्षाएँ और दुःख कभी न थमनेवाले-से लगते हैं, उनके बीच हमें पवित्र आत्मा की प्रतिज्ञा में, जो हमारा बयाना है, शान्ति पानी चाहिए। जब संसार हम पर तिरस्कार उँडेले और हमें परीक्षाओं और जाँचों की भट्ठी में डाले, तब भी हम स्तुति कर सकते हैं, जैसा रोमियों 8:15 में गूँजता है, क्योंकि वह हमें आश्वासन देता है कि परमेश्वर की निडर सन्तान होकर हम उसे पुकारते रह सकते हैं। यद्यपि हम क्लेशों और यातनाओं से घिरे हों, हमारा अडिग विश्वास बना रहता है कि वह हमारा पिता है, जो हमें स्वर्गीय महिमा की ओर ले चलता है। इस परीक्षा के बीच भी हमारी आशा बनी रहती है।

इसके अतिरिक्त, हमें धीरज रखने की सम्मति मिलती है। यह जानते हुए कि परमेश्वर ने हमें अपना पवित्र आत्मा गारंटी के रूप में दिया है, हमें उस अधीरता को शान्त करना चाहिए जो प्रायः हमारे हृदयों को सताती है। जब परमेश्वर हमारे साथ कठोरता से व्यवहार करता है, तब हम कुड़कुड़ाते और दुःख सहने का विरोध करते हैं। हमारा मानवीय स्वभाव हमारी जन्मजात कोमलता और संवेदनशीलता की गवाही देता है। तौभी हमें धीरज से सहना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर यह नहीं चाहता कि हम उसके राज्य का मार्ग एक ही छलाँग में पार कर लें। वह हमें काँटों और ऊँटकटारों से भरे संसार में से ले चलता है, और हमें अनेक प्रकार की परीक्षाओं और क्लेशों का सामना करना होगा। हमारे पास ऐसा सामर्थी प्रतिकारक है, जो अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें अटल दृढ़ता से बलवन्त करता है; इसलिए हमें तब तक अनवरत युद्ध करने को तैयार रहना चाहिए जब तक हम अन्तिम विजय न पा लें।

यह सच है कि हमारा विश्वास अब भी कुछ प्रभाव डालता है, तौभी हमने अभी उसके प्रतिफलों का पूरा स्वाद नहीं चखा और न उसका पूरा फल देखा है। इसलिए हमें दृढ़ता से निरन्तर संघर्ष और विलाप के लिए अपने को समर्पित करना चाहिए, और साथ ही अपने हृदयों में आनन्दित भी रहना चाहिए। तुम पूछोगे, ऐसा क्यों? हृदय में आनन्दित रहते हुए सन्त पौलुस की यह पुकार दोहराना कोई असंगति नहीं, "मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ! मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा?" इसलिए हम में से हर एक शोक और दुःख मनाए, यह स्वीकार करते हुए कि हम पापमय अभिलाषाओं और अनेक दुर्गुणों में कितने गहरे उलझे हैं। तौभी हम परमेश्वर का धन्यवाद करना कभी न छोड़ें, और जो प्रबन्ध उसने कृपा से हमें दिया है उसी में सन्तुष्ट रहें, और उस कार्य को जो उसने हम में आरम्भ किया है उसके पूरा और सिद्ध करने की प्रतीक्षा करें। उसका पवित्र आत्मा हम में वास करता है और प्रतिज्ञा देता है कि वह यात्रा के अन्त तक हमें कभी न छोड़ेगा; इससे हम सहने की शक्ति और प्रोत्साहन पाते हैं और अपने अन्तिम गन्तव्य की ओर बढ़ते हुए इस संसार के अनेक दुःखों पर जयवन्त होते हैं।

इसीलिए सन्त पौलुस जानबूझकर छुटकारे की चर्चा करता है। यद्यपि यह निर्विवाद है कि हमारा प्रभु यीशु मसीह हमारे छुटकारे का स्रोत है, जो हमें अन्य स्थलों में भी दिया गया बताया गया है [1 कुरिन्थियों 1:30; 1 तीमुथियुस 2:6], तौभी हमने अभी उसके गहरे प्रभाव और अन्तिम पूर्ति का पूरा अनुभव नहीं किया। इसलिए छुटकारे के दो पक्ष हैं: एक हमारे प्रभु यीशु मसीह की देह में पूरा हो चुका, और दूसरा उसके आगमन पर प्रकट होने की बाट जोह रहा है। रोमियों के आठवें अध्याय [पद 23] में सन्त पौलुस ज़ोर देता है कि यद्यपि हम कराहते और दुःख उठाते हैं, हमें निराश या चकित नहीं होना चाहिए, क्योंकि सारी सृष्टि इसी दशा में सहभागी है, उस स्त्री के समान जो प्रसव की पीड़ा में हो। हम देखते हैं कि आदम के अपराध के कारण सारा संसार भ्रष्टता में कैसे मुरझा रहा है। इसे देखते हुए हम अपनी आहों में डगमगाएँ नहीं, वरन् अपनी अभिलाषाओं को संयम में रखें, और यह जानकर शान्ति पाएँ कि हमारा छुटकारा हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा निश्चित हो चुका है। हमें भरोसा रखना चाहिए कि जो उसने अपने आप में पूरा किया है, वही वह हम में और हमारे लिए पूरा करेगा। सन्त पौलुस का सन्देश स्पष्ट है: जब हम इस नश्वर अस्तित्व से मुक्ति और सब प्रकार के दुःखों की बेड़ियों से छूटने की बाट जोहते हैं, तब परमेश्वर का आत्मा हमारा आश्वासन है, और पाप का बोझ उन सब में सबसे भारी है। जब तक हम इन परीक्षाओं से छुड़ाए नहीं जाते, हमें परमेश्वर के आत्मा की भीतर बसी उपस्थिति पर भरोसा रखना चाहिए।

'मोल लिए हुओं का छुटकारा' शब्द के विषय में, इसे 'मोल का छुटकारा' भी समझा जा सकता है, जो बोलने की एक सामान्य रीति है। जैसे 'प्रतिज्ञा का आत्मा' का अर्थ वह आत्मा है जो सब प्रतिज्ञाएँ पूरी करता है, या 'परमेश्वर के भय का आत्मा' का अर्थ वह आत्मा है जो हमें उसकी धार्मिकता में आज्ञाकारिता की ओर ले जाता है, वैसे ही 'मोल का छुटकारा' का भाव है हमारे निमित्त प्राप्त किया हुआ छुटकारा। यह इस बात के महत्त्व को रेखांकित करता है कि हम अपने भीतर उसके परिवर्तनकारी प्रभावों का अनुभव करें, ताकि इसमें कोई सन्देह न रहे कि यीशु मसीह ने हमारे लाभ और आनन्द के लिए क्या सिद्ध किया है। सचमुच, यदि उसका दुःख उठाना हमारे उद्धार और आनन्द को पूरा करने के लिए हम तक न पहुँचे, तो वह हमारे लिए सर्वथा अर्थहीन होगा। इसलिए यही उसका सार है जो हमारे प्रभु यीशु मसीह की देह में पूरा हुआ।

फिर भी इस बीच के समय में हमें आत्म-संयम का अभ्यास करना चाहिए, और उस कृतघ्नता से सावधान रहना चाहिए जो हमें परमेश्वर के बढ़ाए हुए बहुमूल्य दान को ठुकराने की ओर ले जाए; वह दान जो हमें अपने क्लेशों के बीच आनन्दित होने के योग्य बनाता है, क्योंकि हमें अपने अन्तिम उद्धार का निश्चय है। हमें परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत करने या निन्दा के शब्द बोलने से रुकना चाहिए। इसके बदले हमें दृढ़ता से चलना चाहिए जब तक हम अपनी वर्तमान दासता से छुड़ाए न जाएँ और अन्ततः अपने प्रभु यीशु मसीह में इकट्ठे न किए जाएँ।

अब आओ, हम अपने उपकारी परमेश्वर की महिमा के सामने झुकें, अपने आप को दीन करें और अपने अपराध स्वीकार करें। हम प्रार्थना करें कि वह इन दोषों की हमारी चेतना को इतना गहरा करे कि हम अपने भीतर की भ्रष्टता से सच्ची घृणा करने लगें। जब हम अपने आप को अधर्म की खाई मात्र जानें, तब उसकी धार्मिकता को उसके स्रोत पर खोजना सीखें। हमें स्वीकार करना चाहिए कि उसने अपने आप को हम पर दयालु पिता के रूप में प्रकट किया है। ऐसा करते हुए हम इस बात में अपना विश्वास प्रकट करते हैं कि उसने जगत की उत्पत्ति से पहले हमें पूर्वनिर्धारित किया, जो हमें साहस दे कि हम अटल धीरज के साथ उसे पुकारें और अपनी विनतियों में कभी न थकें।

और इसलिए हम में से हर एक यह कहे, "हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता।"

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