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पहले अध्याय पर आठवाँ उपदेश - इफिसियों 1:19-23
"और उसकी सामर्थ्य हम विश्वास करनेवालों के प्रति कितनी महान है, उसकी शक्ति के सामर्थ्य के कार्य के अनुसार, जो उसने मसीह में किया, जब उसने उसे मरे हुओं में से जिलाया, और स्वर्गीय स्थानों में अपनी दाहिनी ओर बैठाया, सब प्रकार की प्रधानता, और अधिकार, और सामर्थ्य, और प्रभुता के, और हर एक नाम के ऊपर, जो न केवल इस लोक में, वरन् आनेवाले लोक में भी लिया जाता है: और सब कुछ उसके पाँवों तले कर दिया, और उसे सब वस्तुओं पर शिरोमणि ठहराकर कलीसिया को दे दिया, जो उसकी देह है, और उसी की परिपूर्णता है जो सब में सब कुछ पूर्ण करता है।" - इफिसियों 1:19-23
हम पहले देख चुके हैं कि परमेश्वर ने हम पर कैसे स्पष्ट रूप से प्रकट किया है कि जब हमारे पास उसका एकलौता पुत्र यीशु मसीह है, तो जो कुछ भी भला है उसकी चरम पूर्णता हमारे पास है। जब हम उसकी ओर दृष्टि करते हैं, तो वह सब पा लेते हैं जिसकी हमारे हृदय कभी कामना कर सकते हैं। हमारे भीतर अनेक दोष हैं और हमारी मानवीय दशा निर्बल है, तौभी हमारे पास एक अटल आधार है जिस पर हम टेक लगा सकते हैं। हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें अपने पास बुलाता है, और यह घोषणा करता है कि जो आशीषें परमेश्वर पिता ने उसे दी हैं, वे हम सब के लिए हैं। यद्यपि हम अभी इन आशीषों में पूरी रीति से सहभागी नहीं हैं, तौभी हम इन्हें पाने से चूकेंगे नहीं। सारांश यह कि हमारा प्रभु यीशु मसीह परमेश्वर पिता की दाहिनी ओर सिंहासन पर विराजमान है और सब बातों का संचालन कर रहा है। सारे संसार पर उसी का अधिकार है, और हर एक भली वस्तु उसी से निकलती है। उसकी सुरक्षा की चादर के नीचे हम शैतान और सब विरोधियों को निडर होकर ललकार सकते हैं।
हमें और भी उभारने के लिए कि हम केवल यीशु मसीह में पूर्ण सन्तोष पाएँ और भटकें नहीं, जैसा कि हम प्रायः करते हैं, सन्त पौलुस स्पष्ट रूप से यह भी जोड़ता है कि "वह सब सामर्थ्य, प्रभुता, प्रधानता और अधिकार के ऊपर बैठाया गया है।" यहाँ "सामर्थ्य" से स्वर्गदूतों का आशय है। सन्त पौलुस यह भाषा इसलिए काम में लाता है कि यीशु मसीह के प्रति हमारी भक्ति अटल रहे, और हम इधर-उधर मुड़ने या भटकने से बचें। सार रूप में वह यह कहता है कि यद्यपि परमेश्वर ने अपनी महिमा, आदर और सामर्थ्य का कुछ अंश स्वर्गदूतों को भी सौंपा है, तौभी इससे यीशु मसीह को दी गई श्रेष्ठता में रत्ती भर कमी नहीं आती। इसलिए हम जो कुछ चाहते हैं वह सब उसी में पाएँगे, और कहीं और ढूँढ़ने की आवश्यकता नहीं। यीशु मसीह के साथ किसी को सहभागी ठहराना अनुचित है, क्योंकि सारी श्रेष्ठता और जो कुछ भी उत्तम और उत्कृष्ट गिना जा सकता है, वह अकेले उसी का है। यही बात सन्त पौलुस कुलुस्सियों के पहले अध्याय में भी कहता है। स्वर्ग के स्वर्गदूतों के प्रति भक्ति का ढोंग करके हमारे प्रभु यीशु मसीह से विमुख हो जाने की संसार की प्रवृत्ति कोई नई बात नहीं है। हर युग में परमेश्वर की सृष्टि के प्राणी तरह-तरह के अन्धविश्वासों में फँसाए गए हैं, यहाँ तक कि उन्होंने स्वर्गदूतों के सम्मान में मूर्तियाँ भी गढ़ लीं। लोग प्रायः सन्त मीकाईल, सन्त जिब्राईल और अन्य की सुरक्षा चाहते हैं, और यह भूल से समझते हैं कि ऐसा करने से उन्होंने बहुत कुछ पा लिया। यह दोष कोई नया गढ़ा हुआ प्रलोभन नहीं है; यह उसी छल की बारम्बार पुनरावृत्ति है जिसे शैतान, जो झूठ का पिता और जनक है, युगों-युगों से चलाता आया है। जैसा कि सांसारिक इतिहास साक्षी है, मसीही लोग भी ऐसे भ्रमों में फँस चुके हैं।
इतिहास में अन्यजाति लोग यह मानते आए हैं कि स्वर्गदूत अर्धदेवताओं के समान हैं, और इसलिए परमेश्वर तक पहुँचने के लिए वे बिचवई हैं, क्योंकि वे स्वयं को इसके योग्य नहीं समझते थे। खेद है कि पोप के अनुयायी आज भी ऐसी ही धारणाएँ रखते हैं। ये भ्रान्त विश्वास सन्त पौलुस के समय में ही पृथ्वी पर जड़ पकड़ने लगे थे। इसीलिए सन्त पौलुस इस बात पर बल देता है कि यीशु मसीह के साथ किसी को सहभागी ठहराना अनुचित है। यद्यपि स्वर्गदूतों को सामर्थ्य, अधिकार, प्रधानता, प्रभुता और अन्य नामों से सम्मानित किया गया है, तौभी इन स्वर्गीय प्राणियों को अन्ततः शिरोमणि के सामने झुकना ही है। सर्वोच्च श्रद्धा केवल परमेश्वर के पुत्र के लिए सुरक्षित रखी जानी चाहिए, क्योंकि पवित्रशास्त्र की घोषणा के अनुसार पृथ्वी और स्वर्ग का हर एक घुटना उसके सामने झुकेगा [यशायाह 45:23; रोमियों 14:11; फिलिप्पियों 2:10]।
इसलिए यह स्पष्ट हो जाता है कि इस खण्ड में स्वर्गदूतों के विषय में सन्त पौलुस की इतनी विस्तृत शब्दावली हमें दृढ़ता से स्मरण दिलाती है कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के प्रति अपनी भक्ति में अडिग रहें। हमें अपना पूरा भरोसा उसी पर रखना है, और यह विचार मन में नहीं लाना कि स्वर्गदूतों में कोई उच्चतर और श्रेष्ठ गुण हैं। इस खण्ड से हम समझ सकते हैं कि पोप-तन्त्र में जो भूलें हैं, जहाँ संरक्षक, पैरोकार और परमेश्वर तक पहुँचानेवाले बिचवई गढ़े जाते हैं, वे हमारे प्रभु यीशु मसीह और उन ईश्वरीय वरदानों की समझ के अभाव से उपजती हैं जो परमेश्वर पिता ने उसे दिए हैं। जब तक लोग यह न समझ लें कि देहधारण में उसका उद्देश्य क्या था, तब तक वे उस पर टेक नहीं लगाते। एक ओर तो पोप के अनुयायी हमारे प्रभु यीशु मसीह से दूर हो गए हैं, और यह नहीं पहचानते कि वह हमारा भाई बन गया है और हमें परमेश्वर तक अन्तरंग पहुँच दिलाता है। दूसरी ओर उन्होंने पवित्रशास्त्र में उसे सौंपी गई नियुक्त भूमिका उससे छीन ली है और उसे निष्प्राण रूप में बदल डाला है।
इसलिए अत्यन्त आवश्यक है कि हम इन वचनों पर ध्यानपूर्वक मन लगाएँ और समझें कि हम स्वर्ग के स्वर्गदूतों के साथ, और पुरानी वाचा के अधीन जीनेवाले पवित्र कुलपतियों के साथ एक देह होकर जुड़े हुए हैं। भविष्यद्वक्ताओं, प्रेरितों और शहीदों के साथ हमें अपने साझे शिरोमणि यीशु मसीह की महिमा करने में अटल एकता से एक हो जाना चाहिए। उसकी महिमा सब को दिखाई दे, और उसकी महिमा को ढाँपनेवाली हर बाधा दूर कर दी जाए। शैतान हमारे और यीशु मसीह के निकट आने के बीच जो भी रुकावट डाले, उसे जीतने का सबसे निश्चित उपाय यह मानना है कि संसार में, चाहे ऊपर हो या नीचे, कोई ऐसी प्रतिष्ठा या योग्यता नहीं जो उसके अधिकार के अधीन न हो। इस प्रकार हम पूर्ण मेल में उससे जुड़े रहते हैं, और इस खण्ड से जो सन्देश हम पाते हैं उसका सार यही है।
यह सच है कि इन वचनों का अर्थ यह भी है कि परमेश्वर अपनी ईश्वरीय इच्छा के अनुसार अपने स्वर्गदूतों को अलग-अलग कार्य सौंपता है। परन्तु उनकी ज़िम्मेदारियों की सीमा को पूरी तरह समझना हमारी क्षमता से परे है। जो ज्ञान हमारे विश्वास के द्वारा हमें दिया गया है, उसी में सन्तुष्ट रहें, और नम्रता और संयम के साथ परमेश्वर के वचन के पास आएँ। हमें व्यर्थ की जिज्ञासा से बचना चाहिए, जैसा कि कुछ लोग स्वर्गदूतों के विषय में उलझे हुए वाद-विवादों में पड़कर करते हैं, मानो उन्हें परमेश्वर के घर में पद नियुक्त करने का अधिकार हो। इससे अधिक दुस्साहस की बात कम ही होगी कि परमेश्वर के भेदों के विषय में उससे आगे बढ़कर चर्चा की जाए जितना उसने अपने वचन में हम पर प्रकट किया है। इसलिए हम यह मानें कि स्वर्गदूत, चाहे कितने ही महान हों, यीशु मसीह के द्वारा हमारे उद्धार के सेवक हैं; परन्तु उनके प्रति हमारा व्यवहार वैसा न हो जैसा पोप के अनुयायी स्वर्गदूतों से अलग प्रार्थनाएँ करके करते हैं। इसके बदले हम यीशु मसीह के पास जाएँ, क्योंकि उसी के द्वारा हमारे और स्वर्गदूतों की सेना के बीच सब कुछ साझा हो जाता है।
जब हम कलीसिया के अंगीकार के बाद सन्तों की सहभागिता पर अपना विश्वास स्वीकार करते हैं, तो यह समझना अत्यन्त आवश्यक है कि स्वर्गदूत भी इस सहभागिता का अभिन्न अंग हैं, क्योंकि परमेश्वर उन्हें हमारे लिए अपनी सेवा में लगाता है। यह ईश्वरीय समावेश हमारी योग्यता का परिणाम नहीं है, परन्तु इस बात से उपजता है कि परमेश्वर ने अनुग्रह करके हम सब को यीशु मसीह की पताका के नीचे इकट्ठा किया है। इस प्रकार हमारे और स्वर्ग के स्वर्गदूतों के बीच एकता और भाईचारे का सच्चा बन्धन मसीह में हमारे साझे सम्बन्ध के द्वारा स्थापित होता है।
इसके अतिरिक्त, सन्त पौलुस इस बात पर बल देता है कि "यीशु मसीह ने ऐसा नाम (अर्थात् ऐसी महिमा) पाया है जो हर एक नाम से ऊपर है, चाहे स्वर्ग में हो चाहे पृथ्वी पर।" इस संक्षिप्त कथन में सन्त पौलुस हमारी बुद्धि का सार बताता है, जो इस बात को समझने में है कि परमेश्वर के पुत्र के द्वारा हम पर कौन-सी आशीषें दी गई हैं, और जो हमारे पास केवल उसी के द्वारा हैं। हमारे विश्वास की अटल नींव केवल उसी में होनी चाहिए, जैसा कि प्रेरितों के काम में दोहराया गया है, "स्वर्ग के नीचे और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया, जिसके द्वारा हम उद्धार पा सकें।" जैसा कि मैं पहले कह चुका हूँ, परमेश्वर तो अगम्य है और अप्राप्य ज्योति में बसता है, इसलिए अनिवार्य है कि यीशु मसीह उसके और हमारे बीच सेतु बनकर खड़ा हो। इससे हम साहस के साथ परमेश्वर के निकट जा सकते हैं, यह जानते हुए कि वह हम से दूर नहीं है। इसलिए यह पहचानना अत्यन्त आवश्यक है कि जब यहाँ "नाम" शब्द काम में लाया गया है, तो उसका अर्थ यह है कि परमेश्वर अपने एकलौते पुत्र के द्वारा अपने आप को प्रकट करना चाहता है। साथ ही यह ईश्वरत्व की अद्वितीयता की पुष्टि भी करता है; यद्यपि हमारा परमेश्वर तत्त्व में एक है, तौभी यीशु मसीह में हमें पिता का जीवित और यथार्थ प्रतिरूप मिलता है। इसलिए हमारे उद्धार के लिए जो कुछ आवश्यक है वह सब हमें उसी में मिलता है। यह सच है कि हमें एक सच्चे परमेश्वर के ज्ञान पर गर्व करना चाहिए, परन्तु यह ज्ञान हमारे प्रभु यीशु मसीह की व्यक्ति के द्वारा ही प्राप्त होता है। जो लोग यीशु मसीह को अपना मार्ग और मार्गदर्शक बनाए बिना परमेश्वर को ढूँढ़ते हैं, वे चकरा देनेवाले भूलभुलैये में फँस जाते हैं। इससे इस खण्ड में सन्त पौलुस का अभिप्राय स्पष्ट हो जाता है।
फिर यह भी जोड़ा गया है कि "यही न केवल इस लोक के लिए, वरन् आनेवाले लोक के लिए भी है", जिसका अर्थ यह है कि यीशु मसीह का हमारा ज्ञान हमारे स्वर्गीय जीवन के लिए भी पर्याप्त है। पहली दृष्टि में इस कथन और कुरिन्थियों की पहली पत्री के पन्द्रहवें अध्याय में कही गई बात के बीच विरोध प्रतीत हो सकता है, जहाँ कहा गया है कि अन्तिम दिन मसीह राज्य परमेश्वर पिता को सौंप देगा, जिसके अधीन वह उसे धारण करता है। परन्तु ये दोनों कथन परस्पर विरोधी नहीं हैं। जब हम यह कहते हैं कि यीशु मसीह के पास हर एक नाम से ऊपर नाम है और वह परमेश्वर पिता का प्रतिरूप है, तो हम अपनी मानवीय निर्बलता और भंगुरता के अनुकूल होकर ऐसा कहते हैं। इसी प्रकार जब मसीह को परमेश्वर का प्रतिनिधि कहा जाता है, तो वह हमें यह भरोसा दिलाने के लिए है कि हमारी आवश्यकता में परमेश्वर हमारी सहायता के लिए अपना हाथ बढ़ाता है। यह सत्य यीशु मसीह में सबसे स्पष्ट रूप से प्रकट हुआ है, जो हमारे निकट आया और हमारा भाई बन गया।
यह समझना अत्यावश्यक है कि जब परमेश्वर यीशु मसीह के द्वारा राज्य करता है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसने अपनी ईश्वरीय भूमिका त्याग दी है और स्वर्ग में निष्क्रिय पड़ा है। ऐसी धारणा भ्रम होगी। वास्तव में यूहन्ना के पाँचवें अध्याय (पद 17) में हमारे प्रभु यीशु मसीह ने स्वयं घोषणा की, "मेरा पिता और मैं सदा कार्य करते रहते हैं।" उसने स्पष्ट कर दिया कि संसार के शासक के रूप में उसकी नियुक्ति का यह अर्थ नहीं कि पिता स्वर्ग में विश्राम कर रहा है; परन्तु यह कथन हमारे लाभ के लिए है, कि जब हम परमेश्वर को खोजें तो उसकी निरन्तर उपस्थिति में हमारा विश्वास दृढ़ हो। आगे चलकर, अन्तिम न्याय के बाद, हमें नई आँखें दी जाएँगी, जैसा कि यूहन्ना ने बताया है। परमेश्वर के सदृश बनकर हम उसे वैसा ही देखेंगे जैसा वह वास्तव में है, जो हमारी वर्तमान सीमित समझ से परे का विशेषाधिकार है। इसलिए वर्तमान के लिए इतना ही पर्याप्त है कि हम उसे ऐसे देखें जैसे धुँधले दर्पण में, जैसा कि सन्त पौलुस ने वर्णन किया है, और हमारा ज्ञान अधूरा रहे। हमारे प्रभु यीशु मसीह से परमेश्वर पिता को राज्य का यह सौंपा जाना इसलिए है कि हम परमेश्वर के प्रतापी तत्त्व को देख सकें, जो इस समय हमारी पहुँच से परे है। हमारे स्वभाव में गहरा परिवर्तन होगा, वह स्वर्गीय महिमा को प्राप्त करेगा, और हम उस भ्रष्टता से छुड़ाए जाएँगे जो हमारे पार्थिव जीवन में हमें घेरे हुए है।
तौभी राज्य के इस सौंपे जाने का यह अर्थ नहीं कि यीशु मसीह की प्रतिष्ठा में कोई कमी आएगी; इसके विपरीत वह और भी अधिक ऊँचा किया जाएगा। जैसा कि कुलुस्सियों के तीसरे अध्याय में समझाया गया है, हमारा जीवन यीशु मसीह के साथ परमेश्वर में सुरक्षित रूप से छिपा हुआ है, और जब यीशु मसीह प्रकट होगा तब हमारा जीवन भी प्रकट होगा। सारांश यह कि जब हम उस परम सुख को प्राप्त करेंगे जो हमारी बाट जोह रहा है, तब हम अपनी वर्तमान आशाओं की पूर्णता को पहचान लेंगे। यीशु मसीह सब कुछ अपने पास इकट्ठा करेगा, और हम उसकी महिमा में अपने-अपने ठहराए हुए माप और श्रेणी के अनुसार सहभागी होंगे। इसलिए ये दोनों खण्ड निर्बाध रूप से मेल खाते हैं: मसीह राज्य परमेश्वर पिता को सौंप देगा ताकि हम परमेश्वर की उस स्वर्गीय महिमा को देख सकें जिसे हमारा वर्तमान शारीरिक स्वभाव पूरी रीति से नहीं समझ सकता। इसके अलावा हम यह पहचान लेंगे कि यीशु मसीह, जो हमें नश्वर मनुष्य के रूप में दिखाई दिया, इतना महिमान्वित किया गया है कि वह सचमुच परमेश्वर है, और अपने पिता के साथ एक ही ईश्वरीय तत्त्व में सहभागी है। यह प्रकाशन उस समय पूरी रीति से प्रकट होगा, हमारी वर्तमान आंशिक समझ के विपरीत।
इसके अतिरिक्त, हम यह मानें कि जब परमेश्वर ने यीशु मसीह को ऊँचा किया, तो उसका मुख्य उद्देश्य हमारा अनन्त उद्धार निश्चित करना था। इसीलिए यशायाह के नौवें अध्याय में उसे "आनेवाले युग का पिता" कहा गया है। इस उपाधि का अर्थ यह है कि वह न केवल हमारे सांसारिक जीवन के लिए हमें दिया गया है, बल्कि यह भी कि उसमें स्थापित हमारे विश्वास का मूल स्वर्ग में है। उस स्वर्गीय लोक में हम पूरी रीति से वह अनुभव करेंगे जो अभी हम से छिपा हुआ है, और जो आशीषें उसे पहले ही दी जा चुकी हैं उनकी सम्पूर्णता पाएँगे। इसी से स्पष्ट होता है कि सन्त पौलुस ने अपने प्रवचन में विशेष रूप से "आनेवाले युग" का उल्लेख क्यों किया।
इसके तुरन्त बाद सन्त पौलुस यह कहता है कि 'परमेश्वर ने सब कुछ उसके पाँवों तले कर दिया और उसे सब वस्तुओं पर कलीसिया का शिरोमणि ठहराया।'
सारे संसार के अधीन किए जाने पर बल इस बात को रेखांकित करता है कि यदि हम अपने प्रभु यीशु मसीह की ओर फिरें, तो वह हमें जो कुछ चाहिए वह देने में समर्थ है, क्योंकि सब कुछ उसके अधिकार के अधीन है। हमें आठवें भजन में कही गई बात याद करनी चाहिए, जो परमेश्वर की अपनी सारी सृष्टि के प्रति चिन्ता को घोषित करता है, भेड़ों और आकाश के पक्षियों से लेकर समुद्र की मछलियों तक। संक्षेप में, सब प्राणी उसके अधिकार में हैं। और इस ईश्वरीय व्यवस्था का प्रयोजन क्या है? पवित्र आत्मा हमें, बच्चों का पालन-पोषण करने की रीति से, यह सिखाना चाहता है कि सर्वोपरि महत्त्व की आत्मिक आशीषें हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा पहुँचाई जाती हैं। यह सन्देश इस बात को रेखांकित करता है कि रोटी का एक टुकड़ा भी हम तभी पा सकते हैं जब हम यीशु मसीह की देह के अंग हों।
मानो वह हमें धीरे-धीरे शिक्षा देता हुआ, आरम्भिक बातों से आरम्भ करके, आगे ले चल रहा है। क्योंकि सब कुछ हमारे प्रभु यीशु मसीह को सौंप दिया गया है, इस शर्त पर कि हम सचमुच उसकी देह के अंगों के रूप में उससे जुड़े हों, इसलिए जो कुछ उसके पास है वह हमारा न्यायसंगत उत्तराधिकार बन जाता है। यदि हम उससे अविभाज्य रूप से जुड़े रहें, तो वह आनेवाले दिनों में हमें और भी बड़ी और अद्भुत आशीषों का सहभागी बनाएगा। हम परमेश्वर की सन्तान पहचाने जाएँगे, और उसके पवित्र आत्मा के मन्दिर बनेंगे। उसके निकट स्वतन्त्र रूप से जाने और उसे अपना पिता कहकर पुकारने का यह महान विशेषाधिकार सचमुच अद्भुत है! आदम के पाप के कारण जो वरदान हमने खो दिए थे, उनकी पुनःप्राप्ति अद्भुत से कम नहीं है! शैतान के अत्याचार और पाप की दासता के अधीन जीने के बदले स्वर्गदूतों के साथ सहभागिता में होना कैसा आश्चर्यजनक परिवर्तन है! हम इन ऊँची और उत्तम आशीषों को कैसे पा सकते हैं? उत्तर इसी समझ में है कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के अंगों के रूप में ही किसी वस्तु पर, रोटी के एक टुकड़े पर भी, अधिकार जता सकते हैं। अब हम समझते हैं कि सन्त पौलुस की इस घोषणा के पीछे सच्चा अभिप्राय क्या है कि सब कुछ हमारे प्रभु यीशु मसीह के अधीन है। इसलिए आओ, हम उसके एकलौते पुत्र, हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम से परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता का भाव विकसित करें। मसीह, जो न केवल हमारे शरीरों को पालने के लिए भेजा गया, वरन् हमारी आत्माओं को अनन्त जीवन तक पोषित करने के लिए भी। आओ, हम मानें कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के पास हमारी सब आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपार भण्डार हैं। जब शैतान के आक्रमण हमें दबा देने की धमकी दें, तो हम पहचानें कि हमारा प्रभु यीशु मसीह एक अभेद्य गढ़ है, जो हमें हर युद्ध में विजय के लिए सुसज्जित करता है। इसलिए अपनी निर्बलता में हम उसके बल की ओर फिरें। जब हमारे पास अनुग्रह की घटी हो, तो हम उससे वह अनुग्रह माँगें जिसकी हमें आवश्यकता है। जब हमारे विरोधी, जंगली पशुओं की भाँति उग्र होकर, हमें उथल-पुथल में निगल जाने की धमकी दें, तो हम अपने प्रभु यीशु मसीह से उसकी रक्षक ढाल माँगें, और विनती करें कि वह शैतान और उसके साथियों को हम पर हावी होने से रोके।
इसलिए यह स्पष्ट है कि सब कुछ हमारे प्रभु यीशु मसीह के अधीन किया गया, उसके अपने लाभ के लिए नहीं (क्योंकि उसे उनकी क्या आवश्यकता थी?), परन्तु हमारी भलाई के लिए। यह ईश्वरीय योजना इसलिए बनाई गई कि जो कुछ वह हमारे लिए हितकर समझे वह हमें दे सके। इसलिए हमें उससे सब कुछ माँगना सीखना चाहिए, यह जानते हुए कि जब हमारे विरोधी हम पर प्रबल होते दिखाई दें, तब उन्हें वश में करने की सामर्थ्य उसी के पास है।
इसके अतिरिक्त, जब सन्त पौलुस बताता है कि मसीह 'सब बातों में' कलीसिया का शिरोमणि ठहराया गया, तो वह ऐसा हमें पूरी तरह यीशु मसीह की ओर निर्देशित करने के उद्देश्य से करता है। मानो वह कह रहा हो, "यह सच है कि परमेश्वर के अनुग्रहपूर्ण दान बिखरे हुए हैं, और स्वर्गदूत तथा नश्वर मनुष्य इन दानों के हम तक पहुँचने के पात्र ठहर सकते हैं, तौभी हमें सदा स्रोत की ओर फिरना चाहिए।" जैसे सारी देह में फैली हुई नसें जीवनदायक रक्त ले जाकर हर अंग को बल देती हैं, तौभी जीवन का स्रोत सदा मस्तिष्क में ही रहता है।
इसी प्रकार एक वृक्ष पर विचार करें जिसमें रस संचरित होता है। यद्यपि जड़ ऊपर चढ़कर हर डाली और पत्ते को सीधे पोषण नहीं देती, तौभी सारा पोषण जड़ से ही आता है। यदि कोई यह कहे कि सारा वृक्ष किसी एक डाली से जीवित रखा जाता है, तो वास्तविकता कुछ और ही कहती है। एक बड़ी डाली निकट की डालियों और टहनियों को अवश्य पोषण दे सकती है, परन्तु इससे जड़ का महत्त्व कम नहीं होता। इसी प्रकार मनुष्य की देह के अंग सिर पर हावी न हों, यद्यपि हर अंग अपना-अपना कार्य करता है।
यहाँ सन्त पौलुस इस बात पर बल देता है कि हमारा प्रभु यीशु मसीह सब बातों के ऊपर कलीसिया का शिरोमणि ठहराया गया, जिसका अर्थ है कि हम सब को उसी की ओर फिरना चाहिए। इस विषय में सन्त पौलुस, सन्त पतरस, कुँवारी मरियम या सन्त मीकाईल में कोई अन्तर नहीं, क्योंकि उनके पास अपना कुछ भी नहीं है। वे सब यीशु मसीह पर निर्भर हैं कि वह उन्हें भरे; इसलिए सब के लिए, चाहे उनकी पदवी कुछ भी हो, उसकी भरपूरी से लेना आवश्यक है। इसीलिए, जिस खण्ड का मैंने कुलुस्सियों 1:19 में उल्लेख किया, उसमें सन्त पौलुस कहता है कि परमेश्वर पिता को यह अच्छा लगा कि सारी परिपूर्णता मसीह में वास करे। शिरोमणि की उपाधि कोई मात्र सम्मान-सूचक पदवी नहीं है; वह हमारे प्रभु यीशु मसीह के सर्वोच्च अधिकार को दर्शाती है।
इसलिए जैसे स्वाभाविक सिर न केवल सारी देह पर अधिकार और प्रभुता रखता है बल्कि सारी देह का पोषण और भरण-पोषण भी करता है, वैसा ही हमारे प्रभु यीशु मसीह और हमारे सम्बन्ध में भी है। उसके बिना सब कुछ अव्यवस्था में बिखर जाएगा। यद्यपि ऐसा प्रतीत हो कि हम परमेश्वर से पहले ही अद्भुत दान पा चुके हैं, तौभी यदि हम अपने प्रभु यीशु मसीह से दृढ़ता से जुड़े नहीं हैं तो सब व्यर्थ है।
इसके अतिरिक्त, जब मसीह को शिरोमणि ठहराया गया है, तो उचित है कि अन्य सब उसके अधिकार के अधीन हों। हमें उसकी शिक्षाओं को स्वेच्छा से अपनाना चाहिए, और उसे कलीसिया का संचालन करने देना चाहिए, जैसे सिर मनुष्य की शेष देह को निर्देशित करता है। कलीसिया में मसीह को ही राज्य करना है, और सब को आज्ञाकारिता से उसके पीछे चलना है। इस खण्ड में हमें सबसे पहले यह पहचानना है कि हमारा उद्धार पूरी तरह यीशु मसीह पर निर्भर है, और ऐसे कोई स्वर्गदूत या मनुष्य नहीं, चाहे कितने ही पवित्र हों, जिन्हें अपनी घटी की पूर्ति के लिए उससे लेने की आवश्यकता न हो।
जब हमें अपने वर्तमान या भावी जीवन के लिए, अपने शरीरों या अपनी आत्माओं के लिए, कुछ आवश्यक वस्तु चाहिए, तो हमें सन्त पतरस, सन्त पौलुस या किसी और के पास नहीं जाना चाहिए। इसके बदले हमें सीधे अपने प्रभु यीशु मसीह के पास जाना चाहिए। इस खण्ड की यह एक मुख्य शिक्षा है। दूसरी बात, हमें उसके अधिकार के आगे झुकना और आज्ञाकारी होना सीखना चाहिए, और इस प्रकार अपने आप को उसकी देह के सच्चे अंग प्रमाणित करना चाहिए। वह हमारा शिरोमणि तब तक नहीं हो सकता जब तक वह हमारा चरवाहा भी न हो, जिसे हम पर पूरा अधिकार प्राप्त है। शैतान ने परमेश्वर के एकलौते पुत्र की महिमा को स्वर्गदूतों की छाया से ढाँपने का प्रयत्न किया है, और हमारे मार्ग में रुकावट डालने के लिए संसार में एक मूर्ति भी खड़ी कर दी है, जो यह सुझाती है कि यीशु मसीह हम से अलग किया जा सकता है। पोप निर्लज्जता से इस निन्दा को जारी रखता है, यह दावा करके कि यदि वह सार्वभौमिक प्रभुत्व के साथ कलीसिया पर शासन न करे तो कलीसिया बिना अगुवे की रह जाएगी, मानो सब को उसी की ओर देखना चाहिए और उसका सिंहासन सारे संसार से ऊपर हो।
यह तो ऐसा कहने के समान है कि यीशु मसीह के लिए यहाँ कोई स्थान नहीं है और उसे स्वर्ग में ही सन्तुष्ट रहना चाहिए, जबकि उसका उत्तराधिकारी उसके स्थान पर राज्य करता है। परमेश्वर के पुत्र की प्रभुता को घटाने का यह प्रयास स्पष्ट है, और हमें इस खण्ड को स्मरण रखना चाहिए, जिसमें सन्त पौलुस साफ़ घोषणा करता है कि यीशु मसीह सब से ऊपर कलीसिया का शिरोमणि ठहराया गया है।
यह सच है कि पोप अपने आप को अधीनस्थ भूमिका में बता सकता है, और इस प्रकार यीशु मसीह को उसके उचित स्थान से हटाया नहीं गया। तौभी हमें वह स्मरण रखना चाहिए जिस पर मैं पहले बल दे चुका हूँ: यीशु मसीह के पास केवल सम्मान-सूचक पदवी ही नहीं होगी, परन्तु वह अधिकार भी उसी के पास रहेगा जो स्वभावतः उसका है। शिरोमणि को न केवल सर्वोच्च स्थान पर होना चाहिए, परन्तु उसे वह स्रोत भी होना चाहिए जिससे अन्य सब को सब कुछ मिलता है। हम सब को समझना चाहिए कि वही हमारे जीवन का सोता है, और वह झरना है जिससे हमें जल भरना है, यद्यपि वह अपनी आत्मिक आशीषें और भलाई हमारे बीच अनेक नालियों के द्वारा, जैसा उसे उचित लगे, बाँटता है। इन बातों को हमें दृढ़ता से थामे रखना चाहिए।
इस विषय को कुलुस्सियों के पहले अध्याय (पद 16-18) में विस्तार से समझाया गया है। सन्त पौलुस दिखाता है कि हमारा प्रभु यीशु मसीह संसार के आरम्भ से ही शिरोमणि ठहराया गया था, क्योंकि सब कुछ उसी के द्वारा सृजा गया, न कि केवल इसलिए कि वह वर्तमान युग में हमारा छुड़ानेवाला है। यदि आदम उस विनाशकारी दशा में न गिरता जो उसने हम पर ला दी, तब भी परमेश्वर का पुत्र सदा सृष्टि में पहिलौठे के पद पर रहता। इसका अर्थ यह नहीं कि वह स्वयं एक सृजा हुआ प्राणी है, परन्तु यह कि वह नींव है। जैसा कि सन्त पौलुस आगे समझाता है, स्वर्गदूत उसी के द्वारा सृजे गए और उसी में स्थिर हैं। इसलिए यदि हम पाप से उत्पन्न उलझन की दशा में न गिरते, तब भी परमेश्वर का पुत्र स्वर्ग और पृथ्वी दोनों में सदा सर्वोपरि रहता। फिर भी अब हमारे प्रभु यीशु मसीह को एक विशेष रीति से हमारा शिरोमणि होना है, ताकि हमारा परमेश्वर पिता के साथ मेल कराए और हमें फिर उसके पास इकट्ठा करे। पाप के कारण हम परमेश्वर से अलग हो गए थे, और वह हमारा प्राणघातक शत्रु था, जब तक कि यीशु मसीह के द्वारा हमारे पापों की क्षमा से हमारा मेल-मिलाप न हो गया।
इसके अतिरिक्त, सन्त पौलुस उसी खण्ड में पुष्टि करता है कि यीशु मसीह कलीसिया का शिरोमणि इसलिए ठहराया गया कि सारी परिपूर्णता उसी में वास करे। इसलिए हमें स्वर्गदूतों, प्राचीन पिताओं और भविष्यद्वक्ताओं के साथ एक होना चाहिए, परन्तु इस शर्त पर कि हमारा प्रभु यीशु मसीह प्रथम और सर्वोपरि बना रहे, और सब कुछ उसी से सम्बन्ध रखे। एक-दूसरे के साथ हमारा व्यवहार ऐसा हो कि हर एक अपने स्थान पर बना रहे, और हम सब एक ही देह के अंग होकर कार्य करें, एक से अधिक सिर के बिना। यदि हम किसी और को यीशु मसीह का साझी बनाकर ले आएँ, तो वह उसे घटाता है जो परमेश्वर पिता ने केवल उसी को दिया है। हमें इसी में सन्तुष्ट रहना चाहिए कि वह हमें अपनी आशीषों का सहभागी बनाता है, यह समझते हुए कि सब भलाई उसी से निकलती है, और हमें सब कुछ उसी में ढूँढ़ना चाहिए। भजन संहिता 45 दिखाता है कि हम सब यीशु मसीह के साथ जुड़े हैं और जो आशीषें उसे दी गई हैं उनमें हिस्सा पाते हैं। तौभी इसका अर्थ यह नहीं कि वह हम में से केवल एक है या हमारे बराबर है, जैसा कि पोप के अनुयायी तर्क देते हैं। बल्कि यह इस बात को रेखांकित करता है कि जिन आशीषों की हम कामना करते हैं, उनमें से कोई भी हम से दूर नहीं; वे हमारे सामने उसी के द्वारा रखी जाती हैं। वह इतना उदार है कि चाहता है कि जो हमारी भलाई के लिए है वह हम पाएँ, जैसा कि वह स्वयं घोषणा करता है, "हे सब प्यासे लोगो, मेरे पास आओ, आओ और जल पियो, हाँ, बिना रुपये और बिना दाम के, जल, दाखमधु और दूध भर-भरकर पियो।" (यशायाह 55:1)
यहाँ हमारा प्रभु संकेत करता है कि हमें उसी की ओर फिरना चाहिए, और जब हम उसे देखते हैं तो हम पाएँगे कि उसकी महिमा हमारे लिए बहुत ऊँची और दूर है। इसलिए यीशु मसीह को हमारा मध्यस्थ होना है, और क्योंकि वह हमारे निकट उतर आया है, हमें उसी की ओर फिरना चाहिए, जैसा कि यूहन्ना के सातवें अध्याय (पद 37-38) में समझाया गया है, "हे सब प्यासे लोगो, मेरे पास आओ; और जो कोई वह जल पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह ऐसा तृप्त होगा कि उसके भीतर से जल के सोते बह निकलेंगे।" यदि लोग जो कुछ उन्हें चाहिए उसे विश्वास के साथ यीशु मसीह में ढूँढ़ें, तो वह न केवल हम में से हर एक को वह देगा जो उसके लिए लाभदायक है, वरन् हमें भरपूरी से इतना भी देगा कि हम अपने पड़ोसियों के साथ बाँट सकें और उनकी आवश्यकताओं में उनकी सहायता कर सकें।
अन्त में, सन्त पौलुस जोड़ता है कि "कलीसिया उसकी देह और उसकी परिपूर्णता है जो सब में सब कुछ पूर्ण करता है।" कलीसिया को यीशु मसीह की देह कहकर वह उसी बात पर बल देता है जो मैं पहले कह चुका हूँ: जो हमें चाहिए उसे पाने के लिए हमें लम्बी यात्राओं पर निकलने या कठिनाइयाँ उठाने की आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर के पुत्र से जुड़े और मिले हुए होने पर, हम और क्या माँग सकते हैं? हमें इस सिद्धान्त को ग्रहण करना चाहिए कि केवल परमेश्वर के सिवा हमारे पास न जीवन है, न आनन्द, न कोई भली वस्तु। इसे मानकर आओ, हम विचार करें कि हम उसके पास कैसे जा सकते हैं: हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा। इसीलिए हम समझते हैं कि यहाँ यह क्यों कहा गया है कि सारी परिपूर्णता उसी में वास करती है, और उसका कार्य हमारा परमेश्वर से मेल कराना और हमें हमारी खोई हुई दशा से छुड़ाना है।
इसलिए जो कुछ केवल यीशु मसीह के लिए सुरक्षित है उसे सन्त पतरस या सन्त पौलुस को देने में कोई भटकाव नहीं हो सकता, ऐसा किए बिना कि हम उस में से घटाएँ जो न्यायसंगत रूप से परमेश्वर का है। यद्यपि हम इसे मानने में आनाकानी करें, तौभी हमारा कपट हमें परमेश्वर के सामने निर्दोष नहीं ठहराएगा। हम अनेक बहाने बना सकते हैं, परन्तु ऐसा करके हम स्वयं को दोषी ठहराते हैं, क्योंकि हम यह मान लेते हैं कि हमें अपना उद्धार केवल परमेश्वर से ही माँगना चाहिए।
यदि हम मान लें कि हम परमेश्वर के पास जाने के योग्य नहीं हैं, तो यह स्वीकारोक्ति सच है। यदि हम कहें कि बिना पंखों के हम उड़ नहीं सकते, तो यह भी सच है। परन्तु यदि हम यह तर्क दें कि हमें सन्त पतरस या सन्त पौलुस की ओर फिरना चाहिए, तो हम अपनी ही कल्पनाओं से बोलते हैं। परमेश्वर इसके विपरीत घोषणा करता है - "मैं तुम्हें अपने एकलौते पुत्र के पास भेजता हूँ," वह कहता है, "क्योंकि उसी में तुम्हें वह सब मिलेगा जो तुम्हें चाहिए। इस बात से मत डरो कि तुम्हें किसी वस्तु की घटी होगी, यदि तुम उस अनुग्रह से भरे हो जो मैंने उसमें रखा है और उसी में बने रहते हो।" इसीलिए भविष्यद्वक्ता यशायाह विशेष रूप से दाखमधु, जल और दूध का उल्लेख करता है (यशायाह 55:1), मानो यह बताने के लिए कि यीशु मसीह में हमें जीवन की सारी परिपूर्णता प्राप्त है। इसलिए जो लोग सन्त पतरस और सन्त पौलुस की ओर फिरते हैं, और यह मानते हैं कि संरक्षक सन्तों और बिचवइयों की आवश्यकता है, वे न केवल जो पूरी तरह उसका है उसे बाँटकर यीशु मसीह के साथ अन्याय करते हैं, वरन् परमेश्वर का भी अनादर करते हैं। क्योंकि परमेश्वर की इच्छा है कि सारी परिपूर्णता यीशु मसीह में वास करे, जैसा कि मैं पहले कह चुका हूँ, इसलिए जब हम उन सीमाओं को लाँघते हैं जो उसने हमारे लिए ठहराई हैं, और अपने आप को उस व्यक्ति के अधीन नहीं करते जिसे उसने हमें वह सब देने के लिए दिया है जो हमें चाहिए, तब हम खुले रूप से उसकी अवज्ञा करते हैं।
इसके अतिरिक्त, सन्त पौलुस जो जोड़ता है वह हमें और भी अधिक सान्त्वना देनेवाला होना चाहिए, जब वह कहता है, "कलीसिया उसकी परिपूर्णता है जो सब को भरता है।" यहाँ "परिपूर्णता" से उसका आशय यह है कि हमारा प्रभु यीशु मसीह, और परमेश्वर पिता भी, अपने आप को तब तक अधूरा समझते हैं जब तक हम उससे जुड़े न हों। यह परमेश्वर की असीम भलाई का प्रमाण है, जो सचमुच आश्चर्य से परे है। सब से पहले, परमेश्वर को दूसरों पर निर्भर होने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वह अपने आप में पूर्ण है, और संसार की सृष्टि से पहले भी उसे किसी वस्तु की घटी न थी। जब उसने इसे सृजा, तो अपने लाभ के लिए नहीं सृजा, परन्तु इसलिए कि हम उसकी भलाई, सामर्थ्य, बुद्धि और धार्मिकता को देख सकें। उसने हमें इस रंगमंच पर इसलिए रखा कि हम उसकी सारी सृष्टि में उसकी महिमा को निहारें, यद्यपि वह हमारे बिना भी सरलता से रह सकता था। परन्तु मान लीजिए कि हम कल्पना करें कि परमेश्वर को अपने आप को पूर्ण करने के लिए दूसरों की आवश्यकता थी, जैसे नश्वर मनुष्य जो संगति के बिना रह नहीं सकते। तब हम उसे क्या दे सकते हैं? हम तो संक्रमण और मलिनता के सिवा कुछ नहीं, जो आदम के पाप से भयावह सीमा तक भ्रष्ट हो गए हैं। तब हम परमेश्वर को पूर्णता कैसे दे सकते हैं? यद्यपि हम निर्बल, हठीले और बुरे हैं, यद्यपि हम हर प्रकार की मलिनता से भरे हैं, और सारांश में यद्यपि हम उसकी दृष्टि में घिनौने हैं, तौभी वह हम से जुड़ना चाहता है, इस शर्त के साथ भी कि इस मिलन के द्वारा वह अपनी पूर्णता हम में पाए। मानो कोई पिता कहे, "जब मैं अपने घर में अपने बच्चे को नहीं देखता तो मुझे अपना घर सूना लगता है," या कोई पति कहे, "जब मेरी पत्नी मेरे साथ नहीं होती तो मैं अधूरा-सा लगता हूँ।"
इसी रीति से परमेश्वर प्रकट करता है कि वह अपने आप को तब तक पूर्ण और सिद्ध नहीं समझता जब तक वह हमें अपने पास इकट्ठा न करे और हमें अपने साथ एक न कर ले। वह हम में अपार आनन्द लेता है और चाहता है कि उसकी महिमा हमारे द्वारा चमके, ताकि उसका तेज सब कोनों को प्रकाशित करे। यद्यपि सारी महिमा न्यायसंगत रूप से उसी की है, तौभी वह चाहता है कि हम उसमें सहभागी हों। सार रूप में इसी से स्पष्ट होता है कि सन्त पौलुस ने कलीसिया को परमेश्वर और यीशु मसीह की परिपूर्णता का मूर्त रूप क्यों कहा।
अब, जब हम यह कहते हैं कि हम उसके निकट नहीं जा सकते, तो क्या हम परमेश्वर के सामने अपने आप को निर्दोष ठहरा सकते हैं? आख़िर हम अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा उसकी देह हैं। यदि हमारा एक पाँव रोगी होकर देह से कटकर कहीं और इलाज की खोज में भटक जाए, तो यह घोर मूर्खता होगी। यदि देह के अंगों में समझ और वाणी होती, तो वे पाँव को डाँटते कि वह देह के बाहर वह ढूँढ़ने गया जो उसे चाहिए था। इसी प्रकार जब पोप के अनुयायी और अन्य मूर्तिपूजक यह तर्क देते हैं कि परमेश्वर के निकट जाने के लिए उन्हें सन्तों और अनेक बिचवइयों की सहायता चाहिए, तो मानो वे यह घोषणा कर रहे हैं, "यीशु मसीह हमारे लिए कोई महत्त्व नहीं रखता, और उस तक हमारी कोई पहुँच नहीं।" क्या अंग सचमुच सिर से अलग हो सकते हैं? सन्त पौलुस ने निश्चय ही उन सब पर दोषारोपण किया और उन्हें दोषी ठहराया है, जो अयोग्यता के बहाने यीशु मसीह के बिना अपने लिए नए उपाय गढ़ लेते हैं, उसके अधिकार को घटाते हैं, और हमारे प्रभु यीशु मसीह के हम से, उसकी देह के रूप में, जुड़ने के लाभ और विशेषाधिकार को ठुकराते हैं। इसलिए आओ, हम अपने प्रभु यीशु मसीह के साथ ऐसी स्वतन्त्रता रखना सीखें कि हम हर समय उसी की ओर फिरें, विशेषकर जब हम अपनी घटियों और आवश्यकताओं को पहचानें।
इसके अतिरिक्त, यह सुनिश्चित करने के लिए कि प्रभु की महिमा पर परदा न पड़े, सन्त पौलुस जोड़ता है कि वह निरन्तर सब बातों में सब कुछ पूरा करता है। हम प्रायः देखते हैं कि जब लोगों को परमेश्वर के दान दिए जाते हैं, तो वे ऐसा व्यवहार करने लगते हैं मानो वे उसका स्थान ले सकते हैं और उससे अधिक मान्यता चाहते हैं जो उचित है। इसी प्रकार जब हम यीशु मसीह के हमारे लिए दीन होने, मृत्यु की गहराई में उसके उतर जाने और अनेक प्रकार की निन्दाओं के आगे उसके झुक जाने की बात सुनते हैं, तो हम उसे तुच्छ जानने के प्रलोभन में पड़ सकते हैं। सन्त पौलुस, सब अहंकार को नम्र करने और यह दिखाने के लिए कि यीशु मसीह की दीनता से उसकी महिमा घटी नहीं, पुष्टि करता है कि वह अब भी सब बातों में सब कुछ पूरा करता है। इसलिए हमें उन आशीषों, अनुग्रह और लाभों को ग्रहण करना चाहिए जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमें दिए हैं, और अपनी तुच्छता को स्वीकार करना चाहिए, यह समझते हुए कि हमारा जीवन क्षणभंगुर है और हमारे तथाकथित गुण मुरझाते फूलों के समान हैं। आओ, हम कंगाल होकर अपने धन पर घमण्ड न करें, अपनी स्वतंत्र इच्छा पर भरोसा न करें, अपने पुण्य पर अभिमान न करें, और पोप-तन्त्र के भ्रमों में न रमें। इसके बदले जब-जब हम प्यासे हों, उस अक्षय कुएँ से जल भरकर अपनी प्यास बुझाएँ।
अन्त में, दो रीतियाँ हैं जिनमें परमेश्वर सब बातों में अपना कार्य पूरा करता है। जैसे उसने संसार को अस्तित्व में लाया, वैसे ही वह अपने प्रेममय हाथ से सब कुछ को चलाता और संचालित करता रहता है। जब हम विचार करते हैं कि प्रतिदिन सूर्य को कौन उदय और अस्त कराता है, कौन प्रकृति का सामंजस्य संयोजित करता है, कौन दिनों, महीनों और वर्षों की लय ठहराता है, और कौन दिन और रात के उतार-चढ़ाव को नियन्त्रित करता है, तो उत्तर है परमेश्वर, जो सब बातों में अपना कार्य पूरा करता है। यह सिद्धान्त सार्वभौमिक व्यवस्था के हर पक्ष पर लागू होता है। इसलिए हम परमेश्वर को ऐसा सृष्टिकर्ता न समझें जिसने संसार को चालू करके अपने आप को हटा लिया; इसके बदले वह अपनी सृष्टि को हर क्षण थामे रहता है। परन्तु सन्त पौलुस यहाँ आत्मिक आशीषों की बात कर रहा है, जो परमेश्वर की सन्तानों को मिलनेवाले उत्तराधिकार के समान हैं। इस क्षेत्र में परमेश्वर हम में अपना कार्य केवल प्राकृतिक व्यवस्था के द्वारा नहीं करता, परन्तु सुसमाचार के विश्वास से हमें प्रकाशित करके, हमारे शरीर के दोषों और पापमय अभिलाषाओं से हमें शुद्ध करके, हमें संसारिक प्रलोभनों से खींचकर, और हमारी भलाई और उद्धार के लिए जो कुछ आवश्यक है वह सब हमें देकर करता है। इस प्रकार परमेश्वर सब बातों में अपना कार्य पूरा करता है। सन्त पौलुस सार रूप में यह कहता है कि विश्वासी पूरी तरह परमेश्वर पर निर्भर हैं, और उनके पास अपनी कोई क्षमता, सामर्थ्य या सम्पत्ति नहीं।
इन शब्दों में सन्त पौलुस प्राकृतिक तत्त्वों, जैसे सूर्य, चन्द्रमा, वृक्षों या भौतिक संसार के किसी अन्य पक्ष की बात नहीं कर रहा। वह पशुओं की, या अपनी अपुनर्जीवित दशा में मनुष्यों की भी बात नहीं कर रहा। इसके बदले वह उनकी बात करता है जिन्हें परमेश्वर ने अपने पवित्र आत्मा के द्वारा नया किया है। उद्धार और स्वर्गीय जीवन से सम्बन्ध रखनेवाली हर वस्तु केवल उसी के द्वारा प्राप्त की जा सकती है। वह सब कुछ अपने भीतर समेटे हुए है और सब बातों में अपना कार्य पूरा करता है, जैसा कि यहाँ कहा गया है। इसलिए आओ, हम सचमुच अपने आप को दीन करें और अपने आप को जीवित बलिदान करके परमेश्वर को चढ़ाएँ। जो स्तुति और आदर उसके योग्य है वह उसी को दें। हम में से कोई कृतघ्नता के द्वारा अपने आप को उससे अलग न करे, परन्तु इसके बदले यह पहचानकर उसे महिमा दें कि जो कुछ हमें मिलता है वह सब उसी से आता है। अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा, जो हमारा अनन्त परमेश्वर है, हम समझते हैं कि वही सब भलाई का स्रोत है, और सारी महिमा केवल उसी को दी जानी चाहिए।
अब आओ, हम अपने उदार परमेश्वर की महिमा के सामने श्रद्धा से झुकें, अपने पापों को मानें और उसकी सहायता माँगें कि हम उन्हें और स्पष्टता से देख सकें। यह बोध हमें अपने आप को दीन करने और अपने प्रभु यीशु मसीह के प्रति पूरे हृदय से अपने आप को समर्पित करने की ओर ले जाए। उसने हमें अपने सुसमाचार के द्वारा बुलाया है, और हमें उसकी राहों के अनुसार चलना चाहिए, और सब प्रकार के अन्धविश्वास को त्याग देना चाहिए। हम समझें कि स्वर्ग के राज्य को पाने के लिए मनुष्यों की जो भी युक्तियाँ हैं वे शैतान के धोखे मात्र हैं। हमारे लिए यही पर्याप्त है कि यीशु मसीह हमारा एकमात्र शरणस्थान है। जैसे पिता ने उसे ऊँचा किया कि सारी मानवजाति उसकी ओर फिरे, वैसे ही हम अपनी दृष्टि उसी पर टिकाएँ और अपना सारा अस्तित्व उसी की ओर लगा दें। हम मानें कि केवल वही मार्ग और वह तैयारी है जिसकी हमें आवश्यकता है। जब हम इस धर्ममय मार्ग पर चल पड़ें, तो अपने लक्ष्य की ओर दृढ़ता से डटे रहें जब तक कि हम सिद्धता को न पा लें। परमेश्वर यह अनुग्रह न केवल हम पर, वरन् सारी मानवजाति पर करे।
