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छियालीसवाँ उपदेश, छठवें अध्याय पर चौथा - इफिसियों 6:11-17
"परमेश्वर के सारे हथियार बाँध लो कि तुम शैतान की युक्तियों के साम्हने खड़े रह सको। क्योंकि हमारा यह मल्लयुद्ध लहू और मांस से नहीं, परन्तु प्रधानों से, अधिकारियों से, इस संसार के अन्धकार के हाकिमों से, और उस दुष्टता की आत्मिक सेनाओं से है जो आकाश में हैं। इसलिये परमेश्वर के सारे हथियार बाँध लो कि तुम बुरे दिन में सामना कर सको, और सब कुछ पूरा करके स्थिर रह सको। सो सत्य से अपनी कमर कसकर, और धार्मिकता की झिलम पहिनकर, और पाँवों में मेल के सुसमाचार की तैयारी के जूते पहिनकर, स्थिर खड़े रहो; इन सब के साथ विश्वास की ढाल लेकर स्थिर रहो, जिससे तुम उस दुष्ट के सब जलते हुए तीरों को बुझा सको। और उद्धार का टोप, और आत्मा की तलवार, जो परमेश्वर का वचन है, ले लो।" - इफिसियों 6:11-17
पिछले प्रवचन में मैंने समझाया था कि सन्त पौलुस यहाँ शैतान के बल और उसकी चालाकी की चर्चा क्यों करता है। यह इसलिये है कि हम जाग उठें और अचानक पकड़े न जाएँ, जैसा कि पहले कितनी ही बार हो चुका है। इसलिये हमारे लिये अपने शत्रु का स्वरूप जानना आवश्यक है, जो हमें उसका सामना करने के लिये प्रेरित करे। यह सच है कि जब हम पहले-पहल शैतान की युक्तियों और तैयारियों की तुलना में अपनी निर्बलता को देखते हैं, तो हमारा मन टूट सकता है। परन्तु उपाय स्पष्ट है, जैसा मैं पहले कह चुका और आगे और विस्तार से कहूँगा। पहले वह हमें बताता है कि जिस युद्ध में हम लगे हैं वह उस स्थिति से कहीं अधिक कठिन और जोखिम भरा है जब संसार के सारे मनुष्य हमारे विरुद्ध होते, क्योंकि शैतान का सामर्थ्य उन सब से बढ़कर है। इसीलिये वह कहता है कि हमारा मल्लयुद्ध लहू और मांस से नहीं है। इन शब्दों से वह हमें सिखाता है कि हमारा संघर्ष केवल नश्वर मनुष्यों से नहीं है। यह सच है कि मनुष्य प्रायः हमारा विरोध करते हैं, और वे हमें सताने में शैतान के औज़ार बन सकते हैं। परन्तु असली बात यह नहीं है। शैतान उन्हें इसलिये काम में लाता है कि हमें निराशा में धकेले, बदला लेने के लिये उकसाए, या हमसे परमेश्वर के विरुद्ध कुड़कुड़वाए। अन्ततः दुष्ट लोग स्वयं हमें नहीं सताते; वे किसी और के उकसाए हुए हैं, अर्थात् शैतान के, जो उनका शासक है और उनके कामों को अपने उद्देश्यों की पूर्ति की ओर चलाता है। इसलिये यदि हम केवल मनुष्यों पर ही दृष्टि रखें, तो हम उन कुत्तों के समान हैं जो अपनी ओर फेंके गए पत्थर को तो काटते हैं, परन्तु फेंकने वाले हाथ की उपेक्षा करते हैं। उसी प्रकार हम तब मूर्खता करते हैं जब यह समझते हैं कि हमारा संघर्ष केवल मनुष्यों से है और अपने अदृश्य शत्रु पर ध्यान नहीं देते। इसलिये यहाँ की इस महत्वपूर्ण बात को स्मरण रखें कि शैतान ही हमारा मुख्य विरोधी है। यद्यपि वह हमें सताने और परमेश्वर के भय से फेरने के लिये भाँति-भाँति के साधन काम में लाता है, तौभी हमें सदा उसी पर आँखें लगाए रखनी चाहिए, कि हम चौकस रहें।
किसी को यह अजीब लग सकता है कि शैतान आकाश के प्रधान, संसार के स्वामी और स्वर्ग के हाकिम कहलाते हैं, मानो वे किसी रीति से परमेश्वर को चुनौती दे रहे हों। परन्तु जब हम सन्त पौलुस का आशय समझ लेते हैं तो यह बात स्पष्ट हो जाती है। यहाँ इसकी कोई चर्चा नहीं कि शैतान के पास ऐसा सामर्थ्य है जो परमेश्वर की बराबरी कर सके। इसके विपरीत, हमें दृढ़ता से विश्वास करना चाहिए कि शैतान परमेश्वर के न्यायदण्डों का निष्पादक है और केवल वही कर सकता है जिसकी परमेश्वर अनुमति और आज्ञा देता है। यदि हम अय्यूब के पहले अध्याय पर विचार करें, जहाँ शैतान स्वर्गदूतों के बीच, जो परमेश्वर के पुत्र कहलाते हैं, हानि पहुँचाने की अनुमति माँगता हुआ प्रकट होता है, तो हमारी समझ को सन्तोष मिल जाना चाहिए। जब शैतान सब कुछ बिगाड़ने और उलट-पुलट करने का प्रयत्न करता है, तब परमेश्वर उसे रोके रखता है, और शैतान केवल वही कर सकता है जो परमेश्वर होने दे। जब शैतान युक्तियाँ और योजनाएँ रचते हैं, तब भी वे परमेश्वर की सम्मति के बिना कुछ नहीं कर सकते। हाँ, यदि परमेश्वर ने कुछ ठहराया हो और उन्हें विशेष आदेश दिए हों, तो वे उसे पूरा कर सकते हैं। फिर भी यह जान लेना आवश्यक है कि शैतान का मनुष्यजाति पर, जो परमेश्वर के स्वरूप में रची गई है, कोई भी सामर्थ्य या अधिकार रखना अनुचित है। यदि हम अपनी उस मूल दशा में बने रहते जैसी परमेश्वर ने हमें रची थी, तो शैतान को हम पर कोई लाभ न होता। परन्तु क्योंकि अब हम अन्धकार में हैं और अपने पतित स्वभाव के दास हैं, इसलिये शैतान संसार का हाकिम कहलाता है। इसलिये हमें समझना चाहिए कि सन्त पौलुस शैतान की शक्ति को जो इतना ऊँचा बताता है, वह इसलिये है कि इस शक्ति का स्रोत दिखाए, जैसा वह संसार के अन्धकार के विषय में आगे समझाएगा।
और इस शक्ति का स्रोत क्या है? यह इसलिये कि हम यह न सोचें कि शैतान के प्रभाव से परमेश्वर का सर्वोच्च शासन घट गया है। उनकी शक्ति इस बात से उपजी है कि यह संसार अन्धकार में है। यद्यपि सूर्य और चन्द्रमा हम पर चमकते हैं, तौभी हम मृत्यु और आत्मिक अन्धापन के कारागार में पड़े हैं, क्योंकि हम जीवन की उस ज्योति से निकाले हुए हैं जो परमेश्वर में है। उसे न जानने, बुराई में उलझे रहने और अपनी बुद्धि के बिगड़ जाने के कारण शैतान हम पर राज्य करता है। इस प्रकार यह प्रश्न सुलझ जाता है कि शैतान आकाश के प्रधान कैसे कहलाते हैं और इस संसार में, जिसे परमेश्वर ने रचा था, यद्यपि वह मनुष्य के पतन के कारण अपनी मूल व्यवस्था से गिर गया है, उनका ऐसा अधिकार कैसे है। जो भी हो, शैतानों का हम पर ऐसा बल है कि यदि परमेश्वर हमारी ढाल और रक्षक होकर, जब हम असमर्थ हैं, हमारी ओर से न लड़े, तो हम उनके सामने निस्सहाय हो जाएँ।
ध्यान देने योग्य बात है कि हमें अपने हृदयों में गहरी जमी उस मूर्ख अहंकार को दबाना है, जिसके कारण हम अपने आप को बड़ा ठहराते हैं। परन्तु पवित्र शास्त्र हमें शैतान के दास कहता है। जब तक आदम के पतन के कारण यीशु मसीह हमारा राजा नहीं है, तब तक शैतान हमारा हाकिम है और हम पर पूरा अधिकार रखता है, और हम उसके अधीन हैं। कुछ लोग चाहे डींग मारें और दावे करें, पवित्र आत्मा ने बोल दिया है और अटल निर्णय सुना दिया है कि शैतान हमारा हाकिम है, और जब तक हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें छुड़ा न ले, हम उसके अधिकार में रहते हैं, जैसा यूहन्ना के आठवें अध्याय में कहा गया है, जहाँ मसीह हमें शाप, अत्याचार और शैतान की दासता से स्वतन्त्र करता है।
हमारी इस दयनीय और पतित दशा के कारण शैतान का हम पर अधिकार है, और हमें अद्भुत रीति से छुड़ाए जाने की आवश्यकता है। इसीलिये हमें अपने आप को दीन करना चाहिए, जैसा मैं पहले समझा चुका हूँ, और अपनी कल्पित सामर्थ्य पर भरोसा नहीं करना चाहिए। हमें चौकस भी रहना चाहिए, परमेश्वर को खोजते हुए और उससे उसकी रक्षा के लिये प्रार्थना करते हुए, कि हम अपने शत्रुओं का आहार बनने के लिये सौंप न दिए जाएँ। हम में से प्रत्येक के लिये यह पहचानना अति आवश्यक है कि यद्यपि हम अपने आप से कुछ नहीं कर सकते, तौभी परमेश्वर हमारे द्वारा काम करता है। वह नहीं चाहता कि हम केवल दर्शक बने रहें, परन्तु यह कि हम युद्ध में सक्रिय रूप से लगें और सब बाधाओं और चुनौतियों पर जयवन्त हों। इसलिये यद्यपि हमें रुकावटें और कठिनाइयाँ मिलें, तौभी हमें उनसे हतोत्साहित हुए बिना आगे बढ़ते जाना चाहिए।
सारांश यह कि हमें इस पाठ का अर्थ यह समझना चाहिए कि जब तक हम सब कुछ पूरा न कर लें, तब तक हमें बुरे दिनों का सामना करते रहना है। सन्त पौलुस हमें स्मरण दिलाता है कि एक महीना या एक वर्ष वीरता से लड़ लेना पर्याप्त नहीं है; हमें अन्त तक, अपने सारे जीवन भर, धीरज धरना है। यद्यपि परमेश्वर कभी-कभी हमें कठिन परीक्षाओं से कुछ विश्राम के क्षण देता है, तौभी बड़ी परीक्षा और प्रलोभन के समय सदा आते रहेंगे। इसलिये हमें उनका सामना करने और उन पर जय पाने के लिये तैयार और सुसज्जित रहना चाहिए। यह परमेश्वर की इच्छा के विपरीत नहीं है; वह चाहे तो हमारे साथ अधिक कोमलता से व्यवहार कर सकता है, पर प्रायः हमें कठिनाइयाँ सहने देता है। इसलिये हमें निरन्तर युद्धों और चुनौतियों के लिये तैयार रहना चाहिए, सदा उन पर जय पाने को सन्नद्ध। यह जान लेना आवश्यक है कि ऐसी परीक्षाएँ हमारे विश्वास को निखारने का काम करती हैं, जो सोने से भी अधिक बहुमूल्य है और आग से परखा जाता है, कि वह शुद्ध और सिद्ध किया जाए।
इसलिये जो यहाँ कहा गया है उस पर भली भाँति विचार करें, अर्थात् यह कि जो हमने आरम्भ किया है उसे हमें पूरा करना है। यह इसलिये कि कोई कुछ समय डटे रहने और परमेश्वर की सेवा में बहुत परिश्रम करने के बाद निश्चिन्त न हो जाए। अन्त तक बने रहना अति आवश्यक है। पौलुस अपने ही कामों से हमें इसका उदाहरण देता है। यद्यपि उसने अद्भुत काम किए थे, जैसे समुद्र और स्थल पर भाँति-भाँति से संघर्ष करना, तौभी वह अपनी पिछली उपलब्धियों पर निश्चिन्त नहीं बैठा। इसके विपरीत, उसने कहा कि वह जो पीछे रह गया उसे भूलकर आगे बढ़ता जाता है, हमारे प्रभु यीशु मसीह के पुनरुत्थान की सहभागिता पाने के लिये यत्न करता हुआ। यह इसलिये कि लोग यह न सोच लें कि हमने बहुत कर लिया और अब चैन ले सकते हैं। कुछ लोग कह सकते हैं, "मैंने बीस या तीस वर्ष अथक परिश्रम किया है। संसार ने मेरी विश्वासयोग्यता, मेरी धुन और परमेश्वर की सेवा में मेरी लगन को देखा है। मेरा बुलाहट जो माँगती थी, उसे मैंने परिश्रम से पूरा किया है। इसलिये अब मैं विश्राम कर सकता हूँ।" परन्तु हमें निश्चिन्त नहीं हो जाना चाहिए। हमने जो कुछ पाया हो, हमें पिछला भूलकर अधूरे काम की ओर आगे देखना है। हम ने अब तक अपने प्रभु यीशु मसीह की महिमा को प्राप्त नहीं किया है, और हम में अब भी बहुत सी अपूर्णताएँ हैं। हमारे विश्वास को और निखारने की आवश्यकता है, जैसे सोना भट्ठी में। इसलिये हमें तब तक डटे रहना है जब तक हम सब कुछ पूरा न कर लें।
स्पष्ट करने के लिये, "सब कुछ पूरा करने" का अर्थ है हमारे परमेश्वर की आज्ञाकारिता में जीना और उसकी इच्छा के अनुसार मरना। हमें इस संसार में तब तक टिके रहने की लालसा नहीं करनी चाहिए जब तक हम जीवन से थक न जाएँ। इसके विपरीत, हमें सदा प्रस्थान करने को तैयार रहना चाहिए जब परमेश्वर को अच्छा लगे। ऐसा करने से, चाहे हम जीएँ या मरें, हम परमेश्वर के प्रति समर्पित बने रहते हैं, अपने आप को सच्चे बलिदान के रूप में उसके सामने अर्पित करते हुए। हमें इससे अधिक कुछ नहीं चाहना चाहिए कि अपनी आत्माओं और देहों को परमेश्वर के हाथों में सौंप दें। इसलिये हमें दृढ़ खड़े रहना है, विश्वास, धार्मिकता, सत्य, परमेश्वर के वचन और सुसमाचार से सुसज्जित होकर, जैसा सन्त पौलुस वर्णन करता है।
इस पर रुकना आवश्यक नहीं कि सन्त पौलुस मसीही के हथियार के भिन्न-भिन्न अंगों को टोप, झिलम और ढाल की उपाधि क्यों देता है। थिस्सलुनीकियों के नाम अपनी पहली पत्री में उसने इसी विचार को संक्षेप में छुआ है, जहाँ वह विश्वास और प्रेम के टोप का उल्लेख करता है। यहाँ आशय मसीही के हथियार के प्रत्येक अंग का ब्यौरेवार विवरण देना नहीं है, परन्तु यह बताना है कि जब हम परमेश्वर के दिए हुए साधनों को ग्रहण करते हैं और परिश्रम से उसकी सेवा करते हैं, तब हम सब आवश्यक अंगों से सुसज्जित होंगे। हमें डरने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि हमारे पास अपने शत्रुओं का सामना करने और उन पर जय पाने के साधन होंगे। सन्त पौलुस का मुख्य सन्देश स्पष्ट है। वह इस पर बल देता है कि हम सत्य, धार्मिकता और पवित्रता में जीएँ, कपट से मुक्त रहें, और सच्चे मन से परमेश्वर की सेवा करें, दिखावे के लिये नहीं परन्तु सच्चे अभिप्राय से। हमें समझना चाहिए कि जीवन की खराई और सच्चाई ही हमारी झिलम है।
इसलिये हमें सन्त पौलुस की इस शिक्षा को हृदय में रखना चाहिए कि परमेश्वर के दिए हुए हथियार बाँध लेने से हम अपने सब विरोधियों पर निश्चय ही जय पाएँगे। धार्मिकता इससे घनिष्ठ रूप से जुड़ी है, जो परमेश्वर के भय में जीने, अपने पड़ोसियों से भलाई का व्यवहार करने, और हानि, छल, द्वेष और अन्याय से बचने का मार्गदर्शन है। इसके विपरीत, हमें एक दूसरे की भलाई करने और सर्वसाधारण के कल्याण का लक्ष्य रखने का यत्न करना चाहिए। यदि हम में यह धार्मिकता न हो तो शैतान दिन-रात हमें सहज ही धोखा दे सकता है और बिना चेतावनी हम पर आक्रमण कर सकता है। खेद है कि बहुत से लोग ऊपरी कामों से और परमेश्वर के विरुद्ध खुले विद्रोह से बचने से सन्तुष्ट हैं, और यह सोचते हैं कि इतना ही काफ़ी है कि उसके प्रताप के द्वारा खुले रूप से तुच्छ न ठहराए जाएँ।
यदि हम केवल धर्म का दिखावा ओढ़ लें, धार्मिकता का स्वांग भरें और बाहर से मनभावन रूप प्रस्तुत करें, तो हम सोच सकते हैं कि हमने अपना कर्त्तव्य पूरा कर दिया। वास्तव में शैतान ने हमें विश्वास के सच्चे सार और खराई से भटका दिया हो सकता है, जैसा पौलुस ने वर्णन किया है। उसी प्रकार, धार्मिकता के विषय में हम मुँह से घोषणा कर सकते हैं कि परमेश्वर की सेवा और आदर करना, आपस में मेल से रहना और भले काम करने का यत्न करना उचित है। हम चोरी, उगाही, व्यभिचार, छल और अन्याय की निन्दा कर सकते हैं। फिर भी हम परमेश्वर को बहुत थोड़ा देकर सन्तुष्ट हो सकते हैं और यह आशा रख सकते हैं कि वह उसी से सन्तुष्ट हो जाएगा। यह मनोभाव हमें शैतान के प्रभाव के लिये खुला छोड़ देता है, और उसे हम पर और दृढ़ पकड़ बनाने देता है। हमारे लिये यही बुद्धिमानी होगी कि अपने विश्वास में बने रहें और स्थिर खड़े रहें।
बहुत से लोग आरम्भ में बड़ी धुन और समर्पण दिखाते हैं, पर उनका उत्साह शीघ्र ही ठण्डा पड़ जाता है। क्यों? क्योंकि वे शैतान की युक्तियों के विरुद्ध भली भाँति सुरक्षित नहीं हैं। इसके समर्थन में, यदि हम यहाँ दिए गए मार्गदर्शन पर चलें, तो यह स्पष्ट है कि परमेश्वर की प्रतिज्ञा हमें निराश न करेगी। जब पौलुस विश्वासियों को दृढ़ खड़े रहने और अन्त तक धीरज धरने को उभारता है, तब यह निश्चय भी है कि परमेश्वर आवश्यकता के समय सदा उनकी सहायता को आएगा, और वे निराश न छोड़े जाएँगे। यह इस पर निर्भर है कि वे उसके झण्डे के नीचे बने रहें, निरन्तर उसके सामर्थ्य पर भरोसा रखें, और उसके वचन के द्वारा दिए गए साधनों को काम में लाएँ। इसलिये यदि कायरता और शैतान के भय के कारण हम लड़खड़ाएँ, ठीक मार्ग से हट जाएँ और धार्मिकता की राह से भटक जाएँ, तो दोष हमारी ही लापरवाही का है। क्योंकि हमने परमेश्वर के दिए हुए आत्मिक हथियार नहीं बाँधे, परन्तु उन्हें खूँटी पर टाँग दिया।
आगे पौलुस कहता है कि हमारे पाँवों में मेल के सुसमाचार की तैयारी के जूते हों। यह वर्णन हमें प्राचीन काल के उन सैनिकों की रीति की याद दिला सकता है जो केवल युद्ध में जाते समय जूते पहनते थे। ये जूते उनके पाँवों को ठण्ड से बचाने और शत्रु के विरुद्ध लड़ाई में उन्हें स्थिरता देने के काम आते थे। पौलुस यह सुझाता है कि सुसमाचार हमारे आत्मिक जूते का काम करता है, जो हमें संसार में सुरक्षित चलने के योग्य बनाता है। अविश्वासी, जो सुसमाचार ग्रहण करने को तैयार नहीं, अपने आप को संसार के कामों में गहरे उलझा हुआ पाते हैं, मानो उनकी टाँगें टूटी हों, और दिन-प्रतिदिन संसार की चिन्ताओं में और गहरे धँसते जाते हैं।
इस संसार में से होकर चलने और स्वर्ग के राज्य तक पहुँचने का एकमात्र मार्ग यह है कि हमारे पास वह मार्गदर्शन हो जो सुसमाचार में मिलता है। सुसमाचार में हम सीखते हैं कि परमेश्वर ने हमें अपनी सन्तान होने के लिये चुन लिया है, और वह नहीं चाहता कि हम इस पृथ्वी पर सदा के लिये टिके रहें। इसके विपरीत, वह चाहता है कि हम शीघ्र उसके पास आएँ।
इसके अतिरिक्त, सुसमाचार हमें सिखाता है कि हम अविश्वासियों की अशुद्धता से अपने आप को अलग करें। यह अलगाव अति आवश्यक है।
अब पौलुस के प्रयोग किए हुए "तैयारी" शब्द की ओर आएँ; इसका अर्थ यह है कि यदि हम में सुसमाचार से लाभ उठाने की बुद्धि हो, तो हम उन सब बाधाओं से मुक्त किए जाएँगे जो हमें परमेश्वर के निकट आने से रोकती हैं। हम सुसमाचार में क्या पाते हैं? हम सीखते हैं कि पहले हम एक प्रकार की आत्मिक नींद में थे, अपने सुखों और व्यर्थताओं में खोए हुए। संसार अन्धकार में है, और जब तक हम उसमें रहते हैं, हम मानो नींद में चलते हैं और अपने आगे का मार्ग नहीं देख पाते। यदि हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें न छुड़ाता, तो हम सुस्त पड़े रहते और इस अन्धकार में भटकते फिरते। इसलिये हम अपने आप को तैयार करें कि हमारी कमरें तत्परता से कसी हों, और हमारे प्रभु यीशु मसीह के मार्गदर्शन में चलें, जो ठीक ही जगत की ज्योति कहलाता है। हमें उस आत्मिक नींद से जागना है जो अविश्वासियों को जकड़े रखती है, उन्हें नीचे के लोक में फँसाए रखती है, और अन्ततः उनके विनाश तक पहुँचाती है।
समझ लो कि जब तक हम भली भाँति तैयार न हों, तब तक हम सुसमाचार से पूरा लाभ नहीं उठा सकते। इसका अर्थ है संसार की भटकाने वाली बातों से अपने आप को दूर करना। परमेश्वर को हमें अपने निकट खींचना है कि हमारा एकमात्र उद्देश्य यह हो कि दिन-प्रतिदिन उसके और निकट आते जाएँ, जब तक हम इस संसार को छोड़ न दें। हमें शैतान के बन्धनों से और उन सब रुकावटों से जो वह हमारी प्रगति को रोकने के लिये काम में ला सकता है, पूरी तरह स्वतन्त्र होना है। जब हम यह समझ लेंगे, तो हमने बहुमूल्य अन्तर्दृष्टि पा ली होगी।
अन्त में, पौलुस सुसमाचार के लिये एक और विशेषण जोड़ता है कि उसके प्रति हमारा प्रेम जागे, और उसे "मेल का सुसमाचार" कहता है। यह नाम हमें युद्ध के लिये साहस देता है। यह सुझाता है कि यद्यपि हमारे विरोधी बलवन्त हैं और हमें घोर संघर्षों का सामना करना होगा, तौभी हमें निराश नहीं होना चाहिए। यदि परमेश्वर हमारी सहायता को न आता, तो हम थोड़े ही समय में बार-बार हार सकते थे।
परन्तु यदि तुम उस सहायता को जो परमेश्वर देता है ठुकराओ नहीं, वरन् सब बुराई का दृढ़ता से सामना करके उसे प्रभावी बनाओ, तो तुम उथल-पुथल के बीच शान्ति पाओगे। यह वह अद्भुत आशीष है जिसे सुसमाचार सदा अपने साथ लाता है। यह बड़ी उपलब्धि है कि हम निडर होकर युद्ध में उतर सकें। हम देखते हैं कि जिनमें शान्ति नहीं, वे निरन्तर व्याकुल रहते हैं, उनके पास न सम्मति है न धीरज। उनके हृदय घबराए रहते हैं और वे सहज ही निराश हो जाते हैं। फिर भी हमें अपनी चिन्ता को साथ लिए चलना है, जैसा पहले कहा गया। यदि हम लापरवाह हों, तो शीघ्र ही अभिभूत हो जाएँगे। परन्तु यह चिन्ता हमारे लिये बाधा न बने, वरन् हमें स्थिर और दृढ़ मन से युद्ध में उतरने दे, क्योंकि परमेश्वर हमारे पक्ष में है और हमारी रक्षा के लिये अपनी पराक्रमी शक्ति प्रकट करेगा। यह ज्ञान हमें शान्ति दे, कि कोई भय हमें फेर न सके और न हमारा विवेक छीन सके। इसके विपरीत, यह हमें प्रार्थना में परमेश्वर की ओर प्रेरित करे, कि हम उससे सहायता और अपनी सब आवश्यकताओं की पूर्ति माँगें, जिन्हें वह हमसे बेहतर जानता है।
अब हम समझ गए कि पौलुस का क्या आशय है जब वह हमें सुसमाचार को ग्रहण करने के लिये उभारता है। यह हमें इस संसार से बाँधने के लिये नहीं, परन्तु स्वर्ग के राज्य की ओर स्वतन्त्रता से यात्रा करने के लिये तैयार करने के लिये है। इसका यह भी अर्थ है कि परमेश्वर की सेवा के लिये शान्त हृदय हो, और निश्चय के साथ भरोसा रखें कि जो कष्ट हम सहते हैं उनके होते हुए भी हम नाश न होंगे। परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है कि वह केवल एक ही आक्रमण में सहायता न करेगा, परन्तु अन्त तक हमारे साथ रहेगा, और आज हम जो भी दुःख और कष्ट झेल रहे हैं उन सब से हमें छुड़ाएगा।
इसके अतिरिक्त, हमें सब से बढ़कर विश्वास की ढाल और आत्मिक तलवार, जो परमेश्वर का वचन है, ले लेनी चाहिए। इस ढाल के विषय में पौलुस समझाता है कि इससे हम शत्रु के फेंके हुए जलते तीरों को रोक सकते हैं। कुछ लोग पौलुस के परमेश्वर के वचन और विश्वास के बीच भेद को अनावश्यक समझ सकते हैं, क्योंकि वे मूलतः अविभाज्य हैं। विश्वास परमेश्वर के वचन पर आधारित है, और परमेश्वर का वचन तब तक किसी काम का नहीं जब तक विश्वास से ग्रहण न किया जाए। फिर भी पौलुस स्पष्टता के लिये यह भेद करता है। वह विश्वास को ढाल कहता है कि इस पर बल दे कि विश्वास ही के द्वारा हम शत्रु के आक्रमणों को दूर करते हैं। वह स्पष्ट कर देना चाहता है कि शैतान के जो प्रहार प्राणघातक हो सकते हैं, उनका सामना करने में हम अपने आप से निर्बल हैं। वह बताता है कि शैतान के आक्रमण केवल शारीरिक नहीं, परन्तु सूक्ष्म साधनों से भी होते हैं। उसने पहले शैतान की युक्तियों का उल्लेख किया था, और यहाँ वह शैतान के तीरों की चर्चा करता है, इस पर बल देते हुए कि हमें उसकी चतुराई के विरुद्ध चौकस रहना आवश्यक है। शैतान झूठ का पिता है और हमें धोखा देने और फँसाने के लिये नाना उपाय काम में लाता है। इसलिये हमें इन चेतावनियों को मानकर चौकस रहना और परमेश्वर के वचन में पाई जाने वाली प्रतिज्ञाओं को अपने जीवन में लागू करना चाहिए। पौलुस "जलते हुए तीर" शब्द इसलिये काम में लाता है कि संकेत दे कि शैतान के आक्रमण प्राणघातक हो सकते हैं, परन्तु परमेश्वर का सामर्थ्य हमें सुरक्षित रखता और हमारी रक्षा करता है। यही विश्वास की शक्ति है।
अब विचार करो कि विश्वास को जितना श्रेय दिया जाता है, उतना ही मनुष्यों से लिया जाता है। क्योंकि विश्वास सब कुछ परमेश्वर के निर्मल अनुग्रह और उदारता से उधार लेता है। इसलिये हम समझ लें कि इस पाठ में सन्त पौलुस का आशय हमें दीन करना और यह दिखाना था कि हमारी जय से सम्बन्ध रखने वाली और उसके लिये आवश्यक सब कुछ परमेश्वर ही को हमें देना है। इसलिये जो कोई शैतान को भगाने के लिये गढ़ी हुई किसी और दीवार से अपनी ढालें बनाता है, वह उन्हें मकड़ी के जाले जैसा निर्बल पाएगा। शैतान उनके अहंकार पर केवल हँसेगा। चाहे वे संसार के सब पहाड़ों से अपने आप को सुदृढ़ कर लें, आवश्यकता के समय उन्हें कुछ लाभ न होगा। इसलिये हम विश्वास को अपनी ढाल बनाना सीखें। जब हम युद्ध में उतरने और उसमें डटे रहने का मन करें, तब स्मरण रखें कि परमेश्वर हमारा पिता है, जिसने अपनी असीम भलाई से हमें अपनी सन्तान होने के लिये चुन लिया। उसने हमें निश्चय दिलाया है कि वह सदा हमारे पक्ष में रहेगा, क्योंकि वह सारे संसार से बड़ा है। उसने हमारे प्रभु यीशु मसीह को हमारा चरवाहा ठहराकर हमें अपनी देखरेख में रखा है। आओ हम इन सब प्रतिज्ञाओं को इकट्ठा करें और उनसे एक ढाल गढ़ें, कि जब कभी हम पर आक्रमण हो, उसे अपने आगे रखें। हम शैतान को ललकारें, क्योंकि हम अपने रक्षक की सुरक्षा में हैं, जिसका सामर्थ्य अजेय है। हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमारे उद्धार का उत्तरदायित्व ले लिया है और अन्त तक हमारी आत्माओं की विश्वासयोग्यता से रक्षा करने की प्रतिज्ञा की है। जब हम इस स्थान पर पहुँचते हैं, तब हम शैतान के तीरों को दूर कर सकते हैं।
शैतान एक ओर हमें परमेश्वर के अनुग्रह पर सन्देह कराने का यत्न करेगा, और दूसरी ओर यह विश्वास कराएगा कि हमारा प्रभु यीशु मसीह हमसे दूर है। वह हमें उसके विरुद्ध बुड़बुड़ाने या शिकायत करने, तुच्छ और निष्फल विवादों में पड़ने, या निन्दा तक करने के लिये भी लुभा सकता है। ये सब तीर हैं। इसके अतिरिक्त, जब बुरी अभिलाषाएँ या लालसाएँ हमारे हृदय में उठती हैं, तब हम असुरक्षित होते हैं। आरम्भ में ये प्रलोभन हानिकारक, कठिन या कष्टकर नहीं लगते। तौभी वे घातक तीर हैं। परन्तु विश्वास उन्हें दूर कर सकता है। उदाहरण के लिये, यदि हमें लोभ का प्रलोभन हो क्योंकि हमें डर है कि पृथ्वी हमें निराश कर देगी, तो हमें स्मरण रखना चाहिए कि परमेश्वर ने हमारा पालन-पोषण करने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर लिया है। हम उस पर भरोसा रख सकते हैं और उसके हाथ से अपनी दिन भर की रोटी माँग सकते हैं। यदि शैतान हमें लालची बनाने का यत्न करे, तो हमें स्मरण रखना चाहिए कि यीशु मसीह ने हमें अपने में मिला लिया है, हमें अपने ही अंग, अपने साथ एक बना लिया है। तो क्या हम गन्दगी और अशुद्धता से अपने आप को अशुद्ध करें? यदि हमें पेटूपन का प्रलोभन हो, तो हमें विचार करना चाहिए कि कहीं हम परमेश्वर की ठहराई हुई व्यवस्था को उलट तो नहीं रहे। उसने भोजन हमारे उपयोग के लिये बनाया है, परन्तु हमें इन वस्तुओं को ऐसी रुकावटें नहीं बना लेना चाहिए जो हमें स्वर्गीय जीवन से दूर ले जाएँ। यदि महत्वाकांक्षा के कारण हमें अपनी बड़ाई करने का प्रलोभन हो, तो हमें अपने प्रभु यीशु मसीह के दिए हुए उदाहरण पर ध्यान करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, यदि हम इस संसार में बड़ाई चाहते हैं, तो हम परमेश्वर के बैरी बन जाते हैं, क्योंकि वह अभिमानियों का साम्हना करता है, और उनका घमण्ड और अहंकार नीचा किया जाना अवश्य है। इस प्रकार हम हर स्थिति में शैतान के तीरों को दूर कर सकते हैं।
और फिर, यदि कोई मनुष्य यह कहकर विरोध करे, "तुम कैसे जानते हो कि इन सब यात्राओं से तुम्हारा कभी कुछ भला होगा?" - जबकि सुसमाचार की प्रतिज्ञा तो कुछ और है? इस स्थिति में विश्वास को काम करना होगा, क्योंकि जिस प्रतिफल की प्रतिज्ञा है वह हमें दिखाई नहीं देता। इसके विपरीत, हम कष्टों, मुठभेड़ों और दुःखों का भण्डार देखते हैं। संक्षेप में, हम संसार के सबसे अभागे प्राणी जान पड़ते हैं। तब हम क्या करें? यदि परमेश्वर अपना हाथ हम तक न बढ़ाए, तो हमें घण्टे के हर क्षण काँपना पड़े। हम उसका हाथ कैसे थामें? अर्थात्, हम उसके सामर्थ्य से अपना लाभ कैसे उठाएँ? उसके पक्ष में विश्वास को काम करना होगा। अर्थात् हमें उन वस्तुओं की ओर दृष्टि उठानी होगी जो अदृश्य हैं, जैसा प्रेरित इब्रानियों की पत्री में कहता है। इस रीति से हम शैतान के तीरों को पीछे धकेल देंगे।
अब अन्त में उसने वह शब्द जोड़ा, जिसे, जैसा मैंने कहा, चौथे के रूप में विश्वास से अलग नहीं करना चाहिए। परन्तु मैं तुम्हें पहले बता चुका हूँ कि उसका आशय केवल इतना था कि बात को और स्पष्ट करने के लिये वह कथन जोड़े। मानो उसने कहा हो, "मेरे मित्रो, जब मैंने तुम से कहा कि तुम विश्वास के द्वारा अपने शत्रुओं का सामना कर सकते और उनके सब तीरों को दूर कर सकते हो, तो यह इसलिये है कि परमेश्वर का वचन तुम्हें कभी निराश नहीं कर सकता। इसलिये, जब तुम्हारे पास उद्धार की प्रतिज्ञाएँ हैं और परमेश्वर तुम से बोलता है, तो तुम जानते हो कि वह तुम्हें अपनी रखवाली में रखता है, और यदि तुम उस पर भरोसा रखो तो तुम लज्जित नहीं हो सकते। इसलिये मैं विश्वास को ढाल के रूप में तुम्हारे सामने रखता हूँ। परन्तु यदि तुम में विश्वास है, तो तुम्हारे पास एक से अधिक ढालें हैं, क्योंकि परमेश्वर का वचन सच्ची आत्मिक तलवार है। उससे हम न केवल अपने शत्रु को भगा सकते हैं, वरन् उसे व्याकुल भी कर सकते और अपने पाँवों तले जीत सकते हैं।"
अब जो शेष है वह यह कि हम परमेश्वर के वचन से अपना लाभ और अच्छी रीति से उठाना सीखें, जैसा हमने यह देखकर सीखा है कि हमारा प्रभु यीशु मसीह अपनी पाठशाला में हमें सिखाकर यह अथाह अनुग्रह और लाभ देता है। इसलिये विचार करें कि वह यह किस उद्देश्य से करता है - कि हमें शैतान के विरुद्ध सुसज्जित करे। हम उसकी आज्ञाकारिता में जी नहीं सकते और उस मार्ग पर बने नहीं रह सकते जो उसने दिखाया है, सिवाय लड़ते हुए; और वह हमें हथियार भी देता है। इसलिये निश्चिन्त रहें कि जब हम परमेश्वर के वचन को अपने काम में कुशलता से ला सकें तो हमारे पास अच्छी तलवार है। इसके अतिरिक्त, वह विश्वास जो भय से पहले आता है, हमारे लिये अच्छी ढाल होगा। हमारे पास उद्धार की आशा का टोप भी होगा, और संक्षेप में हम चारों ओर से पूरी रीति से सुदृढ़ होंगे। हमारा परिणाम विवेक की खराई और जीवन की पवित्रता होगी, जिसकी उसने चर्चा की है।
अन्त में, यदि हम उन साधनों को कुशलता से काम में ला सकें जो परमेश्वर ने हमारे युद्ध के लिये ठहराए हैं, तो हमें किसी बात की घटी न होगी। इसलिये यद्यपि विश्वासियों की दशा जितनी बोझिल हो सकती है उतनी जान पड़े, क्योंकि परमेश्वर उन्हें नरक के सब शैतानों के विरुद्ध लगाए रखता है, और केवल एक दिन नहीं, परन्तु उनके सारे जीवन भर, तौभी हमें उसे मधुर और प्रिय समझना चाहिए, यह जानते हुए कि परमेश्वर ने हमारी सब आवश्यकताओं का प्रबन्ध कर रखा है। कम से कम हमें जागना चाहिए कि जिन ख़तरों का हम सामना करते हैं उन पर विचार करें और उनका सामना करें।
आओ हम एक ओर शैतान की हिंसा और बल पर विचार करें, और दूसरी ओर उसकी चालाकी और धूर्तता पर। इस सब के होते हुए हम अपने परमेश्वर को पुकारें, जैसा सन्त पौलुस आगे हमें दिखाएगा। साथ ही उन लाभों पर भी विचार करें जो परमेश्वर का वचन हमें देता है। इसी से हम देखते हैं कि अभागे याजकों ने अपने आप को उन सब हथियारों से कैसे वंचित कर दिया जो उनके उद्धार के काम आने चाहिए थे। उनके बीच परमेश्वर के वचन का क्या हुआ? वह घटते-घटते लुप्त हो गया है। उन्हें अपनी पुस्तकों और अपने उपदेशों दोनों में यह निन्दा फैलाते लज्जा नहीं आई कि परमेश्वर के वचन में कोई निश्चय नहीं है। परन्तु यदि वह शैतान के सब आक्रमणों से हमारी रक्षा न करे, तो उसे आत्मिक तलवार कहना हमारी भूल होगी। हम उन प्रलोभनों को दूर नहीं कर सकते जो हमें बुराई के लिये उकसाते हैं, यदि परमेश्वर का वचन इसमें भी हमारे काम न आए। यदि हम अनुभव से इसे ऐसा न पाते, तो सन्त पौलुस उसे कभी यह नाम न देता।
अब आओ हम उससे अधिकाधिक लाभ उठाने का यत्न करें, और परिश्रमी विद्यार्थी बनें, उस पर ध्यान से कान लगाते हुए जब परमेश्वर का मुख हमें सिखाने को खुला है। हम पाएँगे कि सन्त पौलुस ने हमसे व्यर्थ प्रतिज्ञा नहीं की कि जब तक हम स्वर्गीय राज्य तक न पहुँचें, जहाँ हम अपनी जय के फल का पूरा आनन्द उठाएँगे, तब तक हम सदा प्रबल होते रहेंगे।
अब आओ हम अपने भले परमेश्वर के प्रताप के सामने अपने आप को दीन करें, अपने दोष मानते हुए और यह प्रार्थना करते हुए कि वह हमें उनका और अधिक बोध कराए। इस बीच हम सदा उसकी ओर फिरें और साहस न छोड़ें, चाहे हम अपने आप को उसके प्रताप के सामने उपस्थित होने के अयोग्य समझें या अपने दोषों और अपूर्णताओं से निराश हों। यह देखते हुए कि वह हमारे पक्ष में है, भरोसा रखें कि वह हमारी आवश्यकता के उपाय प्रदान करेगा। हम उन्हें उसके हाथ से चाहें और उसके वचन से लाभ उठाने का यत्न करें कि वह अन्त तक हमारा मार्गदर्शन करे। इस प्रकार हम किसी मुठभेड़ में डगमगाएँगे नहीं, और शैतान व्याकुल किया जाएगा, और हमारा प्रभु यीशु मसीह महिमान्वित होगा। उसी की शक्ति के अधीन हम लड़ते हैं, और हमारी जय उसी की ओर से है।
वह प्रसन्न होकर यह अनुग्रह न केवल हमें, परन्तु सब लोगों को प्रदान करे, इत्यादि।
