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इकतालीसवाँ उपदेश, पाँचवें अध्याय पर आठवाँ - इफिसियों 5:28-30
"इसी प्रकार पतियों को चाहिए कि वे अपनी पत्नियों से अपनी देह के समान प्रेम रखें। जो अपनी पत्नी से प्रेम रखता है, वह अपने आप से प्रेम रखता है। क्योंकि किसी ने कभी अपनी देह से बैर नहीं रखा, बरन उसका पालन-पोषण करता है, जैसा प्रभु भी कलीसिया के साथ करता है: क्योंकि हम उसकी देह के अंग हैं, उसके माँस और उसकी हड्डियों में से।" - इफिसियों 5:28-
जब पवित्रशास्त्र हमें एक-दूसरे के प्रति कोमल-हृदय, नम्र और धीरजवन्त होने का उपदेश देता है, और हमारे सामने परमेश्वर का उदाहरण रखता है, जो अपने पुत्र, हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमसे मेल कर चुका है, और मसीह की बलिदानरूपी मृत्यु के द्वारा हमें दिखाता है कि वह हमसे कितना प्रेम रखता है और हमारे उद्धार की कितनी चिन्ता करता है, तब यह स्पष्ट है कि यदि इन बातों से हमारे हृदय न पिघलें तो वे लोहे से भी अधिक कठोर होंगे। तौभी इन उपदेशों के होते हुए भी हमारी हठीली और बिगड़ी हुई प्रकृति के कारण वे प्रायः हमारे लिए अपर्याप्त ठहरते हैं। इसलिए हमें और अधिक कायल करने और लज्जित करने के लिए हमें प्रकृति के क्रम को देखने का निर्देश दिया जाता है। परमेश्वर के वचन या पवित्रशास्त्र की शिक्षा के बिना भी, यदि हम में से हर एक अपनी ही दशा पर विचार करे, तो हमें दोषी ठहराने के लिए किसी और गवाह की आवश्यकता नहीं रहेगी।
अन्यजाति लोग, जिनमें परमेश्वर पर विश्वास नहीं था और कोई धर्म नहीं था, वे भी इस बात को पहचान सकते थे। वे जानते थे कि जंगली पशु आपस में युद्ध नहीं करते; उदाहरणार्थ, एक भेड़िया दूसरे भेड़िये को नहीं खाता। जंगल में रहनेवाले रीछों और सिंहों में एक प्रकार की सहज प्रवृत्ति थी, जो उन्हें एक-दूसरे को हानि पहुँचाने से रोकती थी। यद्यपि उनमें मनुष्य का विवेक नहीं था, फिर भी उनमें एक स्वाभाविक झुकाव था जो उन्हें आपसी सहयोग की ओर प्रवृत्त करता था, जिससे वे शान्ति से साथ रह सकते थे। इसलिए यह बात खेदजनक है कि मनुष्य, जो कहने को परमेश्वर के स्वरूप में सृजे गए हैं, प्रायः कुत्तों और बिल्लियों के समान जीवन बिताते हैं, और एक-दूसरे के प्रति क्रूरता, चालाकी और द्वेष दिखाते हैं। जब अपने पड़ोसियों के साथ व्यवहार की बात आती है, तो हर व्यक्ति की तुलना भेड़िये या लोमड़ी से की जा सकती है, मानो उनके बीच धूर्तता, द्वेष या सरासर क्रूरता के सिवा कुछ है ही नहीं। इसी कारण परमेश्वर हमसे कहता है कि हम एक ही माँस और एक ही जाति के हैं, जैसा कि यशायाह भी हमें अपने पड़ोसियों की सहायता करने और उनकी विपत्ति के समय उन पर दया और करुणा दिखाने के लिए समझाने को इसी प्रकार तर्क करता है। वह कहता है, "तू अपने ही माँस से मुँह न छिपाना," क्योंकि जगत में परदेशी भी हमसे पूर्णतया अलग नहीं है। वे भी और हम भी एक ही स्रोत से उत्पन्न हुए हैं, और हमें उन्हें अपने संगी मनुष्य के रूप में पहचानना चाहिए। इसलिए जो कोई दूसरे मनुष्य को तुच्छ जानता या उसका तिरस्कार करता है, वह अपनी ही पहचान भूल जाता है, और परमेश्वर द्वारा ठहराए गए आदरणीय पद के योग्य नहीं रहता, क्योंकि वह सारी व्यवस्था को बिगाड़ देता है।
यदि यह तर्क सामान्य रूप से लागू होता है, तो जब लोगों को उनकी अपनी प्रकृति का स्मरण दिलाया जाता है तब इसका प्रभाव उन पर और भी प्रबल होना चाहिए। वे कहीं अधिक निकट के बन्धन से जुड़े हुए हैं। उदाहरणार्थ, यदि कोई किसी पिता से कहे, "तुम अपने ही पुत्र से इतने दूर कैसे हो गए कि उसे देखना या उससे बात करना भी नहीं चाहते, और उससे मेल करना तुम्हें असम्भव लगता है? यह कितनी निर्दयता है! आखिर वह तुम्हारा ही लहू है। तुम क्रोध में इतने अन्धे कैसे हो गए कि यह नहीं पहचानते कि परमेश्वर ने उसे तुम्हें मानो तुम्हारे ही अंग के रूप में दिया है, और उसके द्वारा तुम आशीष पाए हो?" हमारे बीच परमेश्वर का ठहराया हुआ सबसे पवित्र बन्धन पति और पत्नी का सम्बन्ध है। इसी कारण सन्त पौलुस कहता है कि कोई मनुष्य अपने आप से प्रेम रखे बिना अपनी पत्नी से प्रेम नहीं रख सकता। इसके विपरीत, यदि वह अपनी पत्नी को तुच्छ जानता या उससे घृणा करता है, तो मानो वह स्वयं अपने ही से विरोध कर रहा है। क्या ऐसी स्थिति भी सम्भव है? इससे पहले उसने पतियों से आग्रह किया था कि वे अपने कर्तव्य पूरे करें, और इसके लिए हमारे प्रभु यीशु मसीह का उदाहरण सामने रखा था।
उसने तर्क दिया है कि परमेश्वर के पुत्र ने अपनी कलीसिया को शुद्ध करने के लिए अपने आप को मृत्यु के हाथ सौंप दिया; वह कलीसिया, जो दीन, दुखी और मैल और अशुद्धता से भरी हुई थी, उस पर उसने तरस खाया। हमारे उद्धार के लिए जो कुछ आवश्यक था उसे सहने के बाद, उसने हमारे लिए मोल लिए हुए अनुग्रह का एक दृश्य चिन्ह हमारे लिए छोड़ा। बपतिस्मा में हमारे पास इस बात का प्रत्यक्ष स्मरण है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह का लहू हमारी शुद्धि है। क्या हम इन सब बातों पर मनन करें और फिर भी कोमलता की ओर न झुकें?
वास्तव में, यदि हम पहले यह विचार करें कि हम अभागे प्राणी हैं, दुर्दशा के सिवा और किसी चीज़ से भरे हुए नहीं, यहाँ तक कि हमारी तुलना कीड़े-मकोड़ों से की जा सकती है, जो सड़ाहट और घिनौनी अशुद्धता से भरे हैं, तो क्या हमारे पास अपनी प्रशंसा करने या दूसरों को पैरों तले रौंदने के लिए कोई घमण्ड बचा रह सकता है?
अब, यदि यह सब मनुष्यों पर लागू होता है, जैसा मैंने कहा, तो पति और पत्नी का आपसी सम्बन्ध कैसा होना चाहिए? परमेश्वर ने उनके बीच जो बन्धन बाँधा है वह ऐसा है कि पति, मानो, अपनी पत्नी के बिना अधूरा है, जैसे पत्नी अपने पति के बिना अधूरी है। उन्हें चाहिए कि वे अपनी-अपनी स्थिति पर विचार करें, जैसा मैंने पहले कहा और आगे और विस्तार से कहूँगा। पति निश्चय ही सिर है, परन्तु स्त्री देह है। यद्यपि सिर को देह पर प्रधानता और अधिकार है, फिर भी इसका अर्थ यह नहीं कि वह उसे तुच्छ जाने या लज्जित करे, क्योंकि सिर का आदर सारी देह तक पहुँचता है। परन्तु क्योंकि पति प्रायः हमारे प्रभु यीशु मसीह के उदाहरण से, जो उन्हें उनके मूल का स्मरण दिलाता है, पर्याप्त रूप से प्रभावित नहीं होते, और क्योंकि अन्यजाति और अविश्वासी लोग भी विवाह को समझते थे और उसका आदर करते थे, इस विषय में हमें पवित्रशास्त्र से सिखाए जाने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
ये अज्ञानी लोग, जिनमें स्वाभाविक समझ है और जो उसी राह पर चलते हैं जो उनकी माता ने उन्हें दिखाई, जानते हैं कि पत्नी पति का एक अंग है और वे अटूट रूप से एक-दूसरे से बँधे हैं। एक को दूसरे को नहीं छोड़ना चाहिए, जब तक कि वे अपने आप को ही चीर डालना न चाहें। यदि अन्धे भी यह देख सकते हैं, तो परमेश्वर के वचन से प्रकाशित लोगों के लिए कितनी लज्जा की बात है, जिन्हें यह सत्य पालन-पोषण के भाग के रूप में सिखाया गया है, मानो एक ऐसे पिता द्वारा जो अपनी सन्तान की देखभाल करता है। यदि हम इस सत्य से अनजान बने रहें, जबकि परमेश्वर ने हमसे आत्मीयता से बात की है और अपनी इच्छा हम पर प्रकट की है, तो हम अविश्वासियों से भी बुरे हैं और अधिक दण्ड के योग्य हैं।
हम अपने हृदय कठोर न करें और जो सलाह हमें दी जाती है उससे अपने कान बन्द न करें। विचार करो कि जब सन्त पौलुस ने हमारे प्रभु यीशु मसीह को उदाहरण के रूप में हमारे सामने रखा है और हमें स्मरण दिलाया है कि हम उससे किस प्रकार जुड़े हैं, तो इस सम्बन्ध को देखते हुए यह उचित ही है, कि हम उसके पीछे चलने और उसका अनुकरण करने को तैयार रहें। इसका अर्थ है दुखियों पर दया दिखाना, अपने पड़ोसियों के दोषों और दुर्बलताओं को धीरज से सहना, और जब भी हमसे हो सके तो जरूरतमन्दों की सहायता करना।
फिर, यह देखते हुए कि यहाँ पति और पत्नी का उल्लेख है, जो विवाहित हैं उन्हें उस कठोर न्याय पर विचार करना चाहिए जो उनकी प्रतीक्षा कर रहा है, यदि वे यहाँ दी गई शिक्षाओं से प्रभावित नहीं होते। एक ओर, अन्तिम दिन अन्यजाति लोग उनके विरुद्ध गवाही देंगे, और दूसरी ओर, प्रकृति का क्रम उन्हें सिखाता है कि उन्हें क्या करना चाहिए। यदि वे जैसा यहाँ बताया गया है वैसे मेल और मित्रता से नहीं रहते, तो वे जान-बूझकर परमेश्वर का विरोध करते हैं और अपने आप को भूल जाते हैं, और अविवेकी पशुओं से भी बुरे बन जाते हैं।
इसके अतिरिक्त, उन्हें जानना चाहिए कि चूँकि विवाह परमेश्वर के पुत्र और सब विश्वासियों के बीच के पवित्र मिलन का चिन्ह है, इसलिए उन्हें उसका और भी अधिक आदर करना चाहिए। जो अनेक विवाद उठ खड़े हुए हैं, उनके होते हुए भी उन्हें उन्हें शान्त करने का यत्न करना चाहिए, और यह सोचना चाहिए कि चूँकि हमारा प्रभु यीशु मसीह उन पर राज्य करता है, इसका अर्थ यह है कि विवाह को परमेश्वर पिता ने इस प्रकार आशीष दी कि पुत्र ने स्वयं अपनी मृत्यु और दुःखभोग के द्वारा इस आशीष की पुष्टि की। उसने हमें परमेश्वर से मिला लिया, और दिखाया कि पति और पत्नी एक जीवित प्रतिमा में एक के समान हैं, तौभी परमेश्वर की आज्ञाकारिता में। दोनों को मेल के साथ उसकी सेवा करनी है, जब तक कि वे सिद्धता में ऐसे एक न हो जाएँ कि पूरी तरह उससे लिपट जाएँ।
तौभी, यद्यपि ऐसी चेतावनियों का बहुत वजन है, बहुत थोड़े ही उन्हें हृदय में रखते हैं। संसार इसका साक्षी है; क्योंकि कोई एक-एक घर को जाँच सकता है, और ऐसी संगति कहाँ मिलेगी जो यीशु मसीह और उसकी कलीसिया के सम्बन्ध से मेल खाती हो? कहीं नहीं। इसके बजाय पति और पत्नी प्रायः आपस में विरोध में रहते हैं, और यदि उनमें एक-दूसरे के लिए कुछ स्नेह हो भी, तो ज़रा-सा उकसावा उन्हें एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा कर देता है। वे यहाँ बताए गए सिद्धान्तों को भूल जाते हैं, या सच कहें तो उन पर कभी विचार ही नहीं करते। उनके बीच का प्रेम उनकी वासनाओं से उभारा जाता है, न कि उनके कर्तव्यों की समझ पर आधारित है।
पति यह नहीं सोचते कि उन्हें अपनी पत्नियों को कैसे सहना चाहिए, परमेश्वर के भय में उनका मार्गदर्शन कैसे करना चाहिए, और सहायकों के रूप में उनसे कैसे प्रेम रखना चाहिए, उनका जीवन सरल बनाना चाहिए, ताकि वे वैसे चलें जैसा उन्हें चलना चाहिए। उसी प्रकार पत्नियाँ भी अपने पतियों के सामने दीन नहीं होतीं, उन्हें प्रसन्न करने का यत्न नहीं करतीं, यह नहीं समझतीं कि वे सहारा बनने के लिए दी गई हैं, बाधा बनने के लिए नहीं। इस सबकी कोई चर्चा नहीं, कोई आभास तक नहीं। सब कुछ देखने पर मुझे कहना पड़ता है कि हर घर में सामान्य और सबसे आम दशा यह है कि वहाँ अपशब्द, कोसना, निन्दा, शपथ, द्वेष और हानि मिलेगी। यद्यपि कुछ स्त्रियाँ अपने पड़ोसियों के साथ वैसा ही शैतानी व्यवहार करती हैं जैसा अपने पतियों के साथ, फिर भी यदि पति के पास उसी के द्वारा कुछ धन या सम्पत्ति है, तो उसे बिना शर्त उसका पक्ष लेना और उसका समर्थन करना पड़ता है, चाहे वह सही हो या गलत। यह विकृति लगभग हर कहीं देखी जा सकती है।
फिर, हर पुरुष अपनी पत्नी की शिकायत करता है, और कहता है, "मैं उसके साथ नहीं रह सकता। वह जंगली पशु है। उसमें घमण्ड और हठ के सिवा कुछ नहीं, और मैं उससे कुछ कह नहीं सकता कि वह क्रोध से भरकर उत्तर न दे।"
निश्चय ही अनेक मामलों में पुरुष अपनी पत्नियों को वैसा ही गढ़ते हैं जैसा वे जानते हैं, और मैं जिस बात की चर्चा करता हूँ उसके विषय में वे अधिक जानते हैं। पुरुष, मानो परमेश्वर की अवहेलना करते हुए, अपनी पत्नियों का अन्यायपूर्ण झगड़ों में साथ देते हैं या उनकी अनुचित माँगों के आगे झुकने में नहीं हिचकिचाते, और अपनी ही हानि करते हैं। मैं जो कुछ भी कहूँ, यदि कोई मनुष्य प्रतिदिन के जीवन को ध्यान से देखे, तो पाएगा कि एक प्रकार का स्नेह और अत्यधिक लगाव हो सकता है। परन्तु सुव्यवस्थित मित्रता, जो परमेश्वर पर निर्भर है और उसके वचन में जड़ पकड़े हुए है, वह दुर्लभ है। सौ घरानों में शायद ही कहीं ऐसे पति-पत्नी मिलें जो इतने अच्छे जोड़े हों।
फिर भी यदि हम इस शिक्षा से नहीं सीखते तो हम निरुत्तर हैं। हम में से हर एक को अपनी उच्छृंखल भावनाओं से संघर्ष करना चाहिए। यदि किसी पुरुष को वैसी पत्नी नहीं मिली जैसी वह चाहता है, तो उसे समझना चाहिए कि परमेश्वर उस पत्नी के द्वारा उसके धीरज की परीक्षा लेना चाहता है। उसे यह भी स्मरण रखना चाहिए कि उसने हमारे प्रभु यीशु मसीह के प्रति और भी बुरा व्यवहार किया है, जो वह पति है जिससे हम सब ब्याहे गए हैं। इसलिए वह अपनी पत्नी के प्रति कठोर न हो, यह सोचकर कि वह स्वयं दीन किए जाने के योग्य है। संक्षेप में, हर पुरुष इस शिक्षा को मन में रखे, ताकि जब पति को अपनी पत्नी में वह सब न मिले जो वह चाहता है, तो वह अपने मन में सोच सके, "तौभी मैं उससे बँधा हूँ, और केवल अपनी पत्नी से ही नहीं, वरन परमेश्वर से भी, जो विवाह का स्वामी है, और हमारे प्रभु यीशु मसीह से, जो हमारे लिए उसका दर्पण और जीवित प्रतिमा है। इसलिए मैं उसके प्रति अपना कर्तव्य निभाने, उससे प्रेम रखने और उसे सहने के लिए बाध्य हूँ, चाहे उसमें दोष हों।"
तौभी इसका यह अर्थ नहीं कि पति को अपनी पत्नी के दोषों को बढ़ावा देना और पोसना चाहिए। जैसे हमें एक-दूसरे को चेतावनी और सलाह देनी चाहिए, वैसे ही ऐसी कोई दूरी या अलगाव न हो कि पति अपनी पत्नी में किसी कमी को न बता सके, उसे डाँट न सके, और उसे सही मार्ग पर लाने का हर प्रयत्न न करे। फिर भी, जब तक हम विवाहित हैं, हमारे प्रभु की ठहराई हुई व्यवस्था अटल रहती है। इसलिए हमें सम्बन्धित व्यक्तियों के निजी गुणों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। यदि किसी स्त्री का पति रूखा और कठोर है और उसके साथ कड़ाई से पेश आता है, तब भी उसे सदा स्मरण रखना चाहिए कि वह उसका पति है, और परमेश्वर ने उन्हें इसलिए जोड़ा कि वह इसके योग्य थी। उसे अपने ही पापों की जाँच भी करनी चाहिए और परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह उस छड़ी को हटा दे और उसके साथ अधिक कोमलता से व्यवहार करे।
दूसरी ओर, जब पति के पास अपनी पसन्द की पत्नी नहीं है, तो उसे भी इसी प्रकार सोचना चाहिए, "मेरी पत्नी अपना कर्तव्य नहीं निभाती, मैं उसके साथ नहीं रह सकता। परन्तु विवाह किसने ठहराया? परमेश्वर ने। इसलिए यदि मैं अपने कर्तव्य की उपेक्षा करूँ और अपनी पत्नी से बदला लूँ या अपने उत्तरदायित्वों पर विचार किए बिना हठ दिखाऊँ, तो मैं किसी नश्वर प्राणी से नहीं लड़ रहा। मैं परमेश्वर से लड़ रहा हूँ और उसे ढहाने का यत्न कर रहा हूँ जो स्वभाव से अटल है।"
इसलिए हम में से हर एक इस शिक्षा को अपने जीवन में लागू करे। केवल विवाहित जन ही नहीं, वरन सब लोग सामान्य रूप से यह समझें कि हम एक-दूसरे से अलग होकर निर्दय, कठोर और अधीर नहीं हो सकते। हमें बिना बुद्धि के उन अविवेकी प्राणियों के समान व्यवहार नहीं करना चाहिए जो इस संसार में अपने मूल और उद्देश्य का कोई ध्यान नहीं रखते। हमें जो बात स्मरण रखनी चाहिए उसका सार यही है।
यदि हम भविष्यद्वक्ता के तर्क पर ध्यान से विचार करें, तो यहाँ दिए गए इस उपदेश से हम और अधिक प्रभावित होंगे। किसी ने कभी अपनी देह से बैर नहीं रखा, परन्तु उसका पालन-पोषण करता है। यदि हर व्यक्ति इस पर विचार करे कि वह अपनी देह की कितनी चिन्ता करता है, उसके सब अंगों की कितनी कोमलता से देखभाल करता है, और यह कैसे सुनिश्चित करता है कि किसी चीज़ की घटी न रहे, तो वह समझ जाएगा कि अपने पड़ोसियों के लिए भी ऐसा ही करना कितना महत्वपूर्ण है। यह सब मनुष्यों पर लागू होता है, और पिताओं और सन्तानों, पतियों और पत्नियों, और उन सब पर और भी अधिक, जो हमारे प्रभु द्वारा निकट बन्धनों में बाँधे गए हैं। यदि कोई बहाने बनाकर कहे, "मैं ऐसा नहीं हूँ," तो मैं उत्तर देता हूँ कि वह सचमुच मनुष्य नहीं है। क्योंकि, जैसा मैंने पहले कहा, परमेश्वर ने हमें इस प्रकार रचा और बनाए रखा है कि हम सब एक ही देह के अंग हैं। यद्यपि मानव देह में अनेक उँगलियाँ और अनेक नसें हैं, फिर भी यह उन्हें एक इकाई होने से नहीं रोकता। न ही यह इस बात का कारण है कि एक अंग अपने साथ दूसरे को भी लाभ न पहुँचाए। देह का बँट जाना और गुटों में बिखर जाना अस्वाभाविक है, और ऐसा होना असम्भव है। इसलिए यदि हम में से हर एक अपने ही लाभ में इतना लीन है कि इस बीच वह अभिमान या क्रूरता से दूसरों को हानि पहुँचाता है, करुणा नहीं दिखाता, न कुछ सहता है, न क्षमा करता है, तो क्या यह इस बात का चिन्ह नहीं कि हम अपनी ही प्रकृति को भूल गए हैं?
इस शिक्षा को बेहतर समझने और अधिक भयभीत होने के लिए आइए हम सन्त पौलुस के शब्दों पर विचार करें: "किसी ने कभी अपनी देह से बैर नहीं रखा, परन्तु उसका पालन-पोषण करता है।" क्या इसमें हमें सिखाने के लिए किसी शिक्षक की आवश्यकता है? क्या परमेश्वर को स्वर्ग से स्वर्गदूत भेजने पड़ेंगे? क्या हमें अपनी देखभाल की इस कला को सीखने के लिए बड़े प्रयास करने होंगे? नहीं, हम स्वभाव से ही इसकी ओर प्रवृत्त हैं। हम में से हर एक पहले से ही अपनी बहुत देखभाल करता है, जैसा कि अपनी ही भलाई को बनाए रखने से प्रकट होता है।
सारांश यह है कि जो जितना अधिक आत्म-प्रेम दिखाता है, उतने ही कठोर दण्ड से परमेश्वर उसे दोषी ठहराएगा क्योंकि उसने दूसरों के प्रति, यहाँ तक कि अपने ही माँस और लहू के प्रति भी, वैसा नहीं किया। और जब हमारे बीच ये अव्यवस्थाएँ हैं, जहाँ माता-पिता अपनी सन्तान के प्रति कठोर हैं और माताएँ अपने बच्चों के प्रति निर्दय हैं, या पति अपनी पत्नियों के साथ इतने रूखे हैं कि उन्हें हताश कर देते हैं और शोक में डाल देते हैं, जिससे वे अनुचित आचरण में पड़ जाती हैं, और जब स्त्रियाँ हठीली हैं और सुव्यवस्था का विरोध करती हैं, तब हमें दोषी ठहराने के लिए और किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं।
हमारा स्वार्थ और हमारी निर्दयता यह दिखाने के लिए पर्याप्त हैं कि हम उन लाभों का आनन्द लेने के योग्य नहीं जो परमेश्वर इस क्षणभंगुर जीवन में हम पर बरसाता है। क्योंकि हम इससे अत्यधिक जुड़े हुए हैं और जितना चाहिए उससे अधिक इसकी चिन्ता करते हैं, इसलिए हम सब दोषी हैं, और कोई ऐसा नहीं जो अपना मुँह खोलकर अपना बचाव या सफाई दे सके।
सन्त पौलुस, हमें यह सिखाने के बाद कि हमें क्या जानना चाहिए और अपनी प्रकृति को कैसे परखना चाहिए, फिर मुख्य विषय पर लौट आता है। जो अपने आप को हमारे प्रभु यीशु मसीह की देह के अंग कहते हैं, या जो उसके उदाहरण से अपने जीवनसाथियों के साथ मेल और एकता से रहने के लिए प्रेरित होते हैं, उन्हें समझना चाहिए कि यदि कोई मनुष्य सचमुच अपने आप से प्रेम रखता है, तो वह अपनी पत्नी से भी प्रेम रखेगा। परमेश्वर ने विवाह को इस प्रकार ठहराया है कि पत्नी अपने पति की देह के समान हो। इसलिए यदि कोई मनुष्य अपने आप से प्रेम रखता है, तो उसे अपनी पत्नी से भी प्रेम रखना चाहिए, क्योंकि वह उसकी हड्डियों में से हड्डी और उसके माँस में से माँस है। ऐसा ही होना चाहिए, न कि किसी विकृत प्रकार का प्रेम। इस बात को स्मरण रखना अत्यन्त आवश्यक है।
जब पौलुस ने पहले हमारे प्रभु यीशु मसीह का उदाहरण दिया, तो उसने बताया कि मसीह ने अपने आप को नहीं बचाया, वरन अपना लहू बहाया ताकि हमें हमारी मैल और अशुद्धता से शुद्ध करे। हम परमेश्वर के सामने अशुद्ध और कलंकित थे, परन्तु हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमें उसके अनुग्रह में पुनः स्थापित करने का मार्ग निकाला, और ऐसा अपना ही लहू बहाकर किया। इसके अतिरिक्त, पौलुस अब तर्क को दृढ़ करने के लिए एक और कारण प्रस्तुत करता है, कि हम उसकी हड्डियों में से हड्डी और उसके माँस में से माँस हैं। यह कहकर वह हमें सिखाता है कि जब पुरुष अपना कर्तव्य पूरा करते हैं, तो यह उन्हीं के लाभ के लिए है। वे परमेश्वर के उस असीम और अनन्त अनुग्रह का अनुभव करते हैं जो विवाह के द्वारा हर मनुष्य में, उसकी अपनी स्थिति के अनुसार, प्रतिबिम्बित होता है। विवाह में हम अपने और हमारे प्रभु यीशु मसीह के बीच का मिलन देखते हैं। इसलिए सन्त पौलुस का आशय यह था कि वह हमारे हृदयों की कठोरता को यह दिखाकर नरम करे कि हम उस अनुग्रह का पूरा आनन्द नहीं ले सकते जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमारे लिए मोल लिया, जब तक कि हम एक-दूसरे के साथ मेल से न रहें, उस प्रेम की प्रतिमा के अनुसार जो उसने अपनी मृत्यु और दुःखभोग में दिखाया। तौभी, इसमें और गहराई से उतरने से पहले, आइए हम देखें कि पौलुस यह क्यों कहता है कि हम हमारे प्रभु यीशु मसीह की हड्डियाँ और माँस हैं।
पौलुस स्पष्ट कर रहा है कि यीशु मसीह, जो आदम के वंश से उतरा और दाऊद का वंश कहलाता है, हमारे मानव वंश का अंग है। यद्यपि वह कुँवारी मरियम के गर्भ में आश्चर्यजनक रीति से गर्भ में आया, उसने मानव शरीर धारण किया और सचमुच मनुष्य बना। अपने आप को मनुष्य का पुत्र कहकर उसने संकेत दिया कि उसने सामान्य मानव स्वभाव धारण किया ताकि हमसे परिचित हो। जैसा प्रेरित इब्रानियों की पत्री में कहता है, वह हमें भाई कहने में नहीं लजाता। तौभी हमें समझना चाहिए कि यीशु मसीह को, इब्राहीम के वंश में जन्म लेने के बावजूद, हमारे स्वभाव में सहभागी होना आवश्यक था ताकि जो प्रतिज्ञा की गई थी वह पूरी हो। हमारे स्वभाव का हुए बिना वह परमेश्वर और हमारे बीच मध्यस्थता नहीं कर सकता था। उसे हमारी देह पहनना और सब मनुष्यों की ओर से अपने आप को प्रस्तुत करने के लिए आत्मा रखना आवश्यक था। इस प्रकार यीशु मसीह हमारा माँस बना और उसने हमारी देह धारण की, जिससे वह हमारी हड्डियों में से हड्डी और हमारे माँस में से माँस ठहरा। यद्यपि उसका गर्भ में आना पवित्र आत्मा के द्वारा आश्चर्यजनक था, तौभी वह सचमुच मनुष्य बना ताकि हमारा मध्यस्थ हो।
इसलिए जब सन्त पौलुस यीशु मसीह को दूसरा आदम कहता है, तो वह मसीह के द्वारा मेल-मिलाप के अनुग्रह और पहले आदम द्वारा लाए गए घातक पतन के बीच तुलना कर रहा है। पहले आदम के अपराध ने हमें परमेश्वर का शत्रु बना दिया, जिसके परिणामस्वरूप हम उसके पास आने में असमर्थ हो गए, ऐसा न हो कि उचित रीति से पीछे धकेले जाएँ। पाप ने एक अलंघ्य दीवार खड़ी कर दी, क्योंकि परमेश्वर, जो सारी धार्मिकता का स्रोत है, हमारे अधर्म और भ्रष्टाचार को सहन नहीं कर सकता था। परन्तु दूसरा आदम, यीशु मसीह, इस दशा का उपचार करने आया। वह दूसरा आदम कहलाता है क्योंकि जैसे पहले आदम के पाप ने हमारे और परमेश्वर के बीच बैर उत्पन्न किया, वैसे ही दूसरे आदम के बलिदान और अनुग्रह ने हमें परमेश्वर से मिला दिया। मसीह में हम पुनःस्थापित और नए बनाए जाते हैं। यह उसकी ईश्वरीय सामर्थ्य और उसके पवित्र आत्मा के कार्य से है कि हम उसकी हड्डियों में से हड्डी और उसके माँस में से माँस बनते हैं, न कि अपनी मानवीय प्रकृति से। इस प्रकार हम उससे एक नई और दूसरी सृष्टि में जुड़े हैं।
सन्त पौलुस, जैसा हम यहाँ देखेंगे, हव्वा की उस मूल सृष्टि का उल्लेख करता है, जो आदम की पसली से ली गई थी। अब जब हम अपने पहले जन्म पर विचार करते हैं, जो हमें इस संसार में नश्वर प्राणियों के रूप में लाता है, तो हम अपने माँस पर घमण्ड नहीं कर सकते, जब तक कि हम अपने पूर्वजों के वंश से जन्म न लें। परन्तु यदि हम उस वंश से जन्मे हैं, तो हम शापित हैं। यह सच है कि आदम आरम्भ में परमेश्वर के स्वरूप में सृजा गया था, परन्तु वह स्वरूप पाप से मलिन हो गया। इसलिए हम परमेश्वर की सृष्टि में गिने जाने के योग्य नहीं, और परमेश्वर ने स्वयं हम पर कठोर दण्डाज्ञा सुनाई, और मनुष्य को बनाने पर पछतावा प्रकट किया, मानो उसने हम सब को त्याग दिया हो। हम कीड़ों, जूँओं, पिस्सुओं और अन्य कीड़े-मकोड़ों से भी कम योग्य माने जाते हैं। आदम के वंश से हमारे सम्बन्ध का यही परिणाम है - दण्डाज्ञा और भ्रष्टता की दशा।
अब जब हम अपने प्रभु यीशु मसीह की ओर मुड़ते हैं, तो हमें पुनःस्थापना मिलती है। पवित्रशास्त्र हमें उसमें नई सृष्टि कहता है। यह प्रत्यक्ष है कि हम उससे प्रकृति के क्रम से या साधारण साधनों से नहीं, वरन पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से जुड़े हैं। यह मिलन हमें उसकी देह के अंग बनाता है। हम उसकी देह के अंग इसलिए हैं कि परमेश्वर पिता ने उसे हमारा सिर ठहराया है। यह एक रहस्यमय सामर्थ्य के द्वारा सिद्ध होता है जिसे हम पूरी तरह समझ न सकें, परन्तु विश्वास से ग्रहण करते हैं।
इस प्रकार दोनों पहलू पूरी तरह मेल खाते हैं: यीशु मसीह हमारी हड्डी और माँस माना जाता है क्योंकि उसने हमारा मानव स्वभाव धारण किया, जिसके बिना हमारा उससे कोई सम्बन्ध नहीं होता। भाइयों के रूप में हमारे साथ एक होने की उसकी इच्छा उसके पवित्र आत्मा के कार्य से सम्भव हुई है, जो उसे हमारा सिर और हमें उसकी देह के अंग बनाता है। यह हमें एक स्वर्गीय दशा में उठा देता है जो हमारे पूर्व के पार्थिव अस्तित्व से, जो भ्रष्टता से विकृत था, कहीं ऊँची है।
अब तुम पूछ सकते हो कि हम यीशु मसीह की हड्डी और माँस के कैसे हो सकते हैं, जबकि वह स्वर्ग में है और हम पृथ्वी पर। इसके अतिरिक्त, जब हम में से हर एक जन्म लेता है, तो यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जिसमें एक ही जाति के मानव माता-पिता होते हैं। तब हम यीशु मसीह की हड्डी और माँस के कैसे गिने जा सकते हैं? इस सम्बन्ध में हमारा भौतिक पदार्थ - हमारी त्वचा, हड्डियाँ या बाल - यीशु मसीह की देह से नहीं आता। इसके बजाय, यह आदम से विरासत में मिले शाप के हटाए जाने और हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा पवित्र आत्मा के अनुग्रह के उँडेले जाने पर आधारित है। इस अनुग्रह के द्वारा हम प्रकाशित और रूपान्तरित किए जाते हैं।
इसलिए यीशु मसीह के साथ यह सम्बन्ध भौतिक प्रकृति का नहीं, वरन आत्मिक गुण का है। मानव वंश का वह सामान्य क्रम, जो परमेश्वर ने आरम्भ से ठहराया है, जारी रहता है, जहाँ लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी संसार में जन्म लेते हैं। परन्तु यीशु मसीह उन्हें नया करता है जो परमेश्वर के चुने हुए हैं, जो उसकी अपनी देह के अंग हैं। वह उन्हें आदम से विरासत में मिली भ्रष्टता से शुद्ध करता है। फिर वह उन्हें एक ऐसी सामर्थ्य देता है जिससे वे विश्वास के द्वारा उसे अपना सिर स्वीकार करते हैं। वे समझते हैं कि वे सब उसमें इकट्ठे किए गए हैं, और उसका जीवन उन्हें दिया गया है, इसलिए वे अब अपने लिए या संसार के लिए नहीं जीते, परन्तु मसीह उनमें जीता है, जैसा पवित्रशास्त्र पुष्टि करता है। इसलिए यीशु मसीह के लिए आवश्यक नहीं कि वह हमें अपनी देह के अंग बनाने के लिए शारीरिक रूप से स्वर्ग से उतरे, या अपने ही माँस को घटाकर हमें अपने में से उत्पन्न करे। यह रूपान्तरण पवित्र आत्मा की अद्भुत सामर्थ्य से पूरा होता है। हम मसीह के माँस या स्वर्ग में उसकी देह से कुछ नहीं लेते। परन्तु हमारा बल निरन्तर उसी से बहता है। जैसे वृक्ष अपनी जड़ों से पोषण पाते हैं, और जैसे मानव देह अपने सिर से बल पाती है, वैसे ही हम अपने और हमारे प्रभु यीशु मसीह के बीच के मिलन की शक्ति और सामर्थ्य को अनुभव करते हैं। वह अपनी पूरी महिमा में बिना किसी बाधा के बना रहता है, और हम इस सम्बन्ध से बहुत लाभ उठाते हैं।
आइए हम सदा स्मरण रखें कि यह भीतरी जागृति हमें अपने-अपने कर्तव्य पूरे करने में समर्थ बनाती है। इसी के द्वारा हम परमेश्वर के उस अनुग्रह का स्वाद चखते हैं जो हमारी आत्माओं के उद्धार से सम्बन्ध रखता है। यहाँ विषय यह है कि पति और पत्नी आपस में मेल से रहें। जब पति यहाँ दी गई शिक्षाओं पर मनन करे, तो उसे न केवल परमेश्वर और अपनी पत्नी के प्रति अपने दायित्व पूरे करने के लिए प्रेरित होना चाहिए, वरन इस दशा पर भी विचार करना चाहिए। उसे इसे एक जीवित प्रतिमा के रूप में देखना चाहिए जिसमें वह देखता है कि यीशु मसीह उसका सिर है, कि वह मसीह का है, और मसीह उसका है। इसलिए मसीह का जीवन उसका है, और वह मानो मसीह की देह का एक अंग है। यह समझ पतियों और पत्नियों को अपनी-अपनी भूमिकाएँ निभाने के लिए प्रोत्साहित करे। यदि हम यह न पहचानें कि हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें जीतने और हमें अपनी सेवा स्वेच्छा से करने के लिए प्रेरित करने में कितनी गम्भीरता से कार्य करता है, तो हम कृतघ्न ठहरेंगे। वह न केवल कोमल और प्रेमपूर्ण साधनों से हमें लुभाता है, वरन हमें अपनी ओर खींचता भी है। इस संसार में भी और क्षणभंगुर, पार्थिव बातों में भी, वह उस अनन्त उद्धार को प्रकट करता है जो हमारे लिए स्वर्ग में तैयार किया गया है। उसने इस उद्धार को बड़े मूल्य पर, अपने इकलौते पुत्र के लहू के द्वारा मोल लिया, ताकि अन्त में हम उसके लाभों और गुणों में पूरी रीति से सहभागी हों।
अब आइए हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने दीनता से घुटने टेकें, अपने दोषों को मानें और उसका अनुग्रह माँगें कि हमारे हृदय और जीवन सुधर जाएँ। हम अपने आप को पूरी तरह उसकी सेवा और आज्ञाकारिता में लगा दें, और उस अनन्त उद्धार को पहचानें जो हमारी प्रतीक्षा कर रहा है। हम प्रार्थना करते हैं कि परमेश्वर हमारी दुर्बलता में हम पर अपनी दया बढ़ाए, और हमें अपनी उपस्थिति में खड़े होने की सामर्थ्य दे। आइए हम सब कहें, "सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता, इत्यादि।"
बयालीसवाँ उपदेश, पाँचवें अध्याय पर नौवाँ
"इस कारण मनुष्य अपने माता-पिता को छोड़ेगा, और अपनी पत्नी से मिला रहेगा, और वे दोनों एक तन होंगे। यह भेद तो बड़ा है: परन्तु मैं मसीह और कलीसिया के विषय में कहता हूँ। तौभी तुम में से हर एक अपनी पत्नी से अपने समान प्रेम रखे, और पत्नी भी अपने पति का आदर करे।" - इफिसियों 5:31-33
परमेश्वर अपने कार्यों को इस प्रकार व्यवस्थित करता है कि हम उसके सब कामों में गहरी बुद्धि को पहचान सकें और उनसे बहुमूल्य शिक्षाएँ ग्रहण कर सकें। उदाहरण के लिए, यहाँ सन्त पौलुस जिस बात का उल्लेख करता है: कि स्त्री पुरुष के पदार्थ से रची गई। परमेश्वर हव्वा को वैसे ही रच सकता था जैसे उसने आदम को बनाया, परन्तु उसने मनुष्य की बगल से एक पसली ली और उसी से स्त्री को गढ़ा। उसकी इच्छा थी कि पति और पत्नी के बीच गहरा मिलन हो, ताकि पति सोचे, "यह मेरा माँस है, यह मेरी हड्डी है," और पत्नी सोचे, "परमेश्वर ने मुझे कहाँ से जीवन दिया? उसने मुझे मनुष्य से ली गई एक पसली से गढ़ा।" इस प्रकार हम देखते हैं कि पुरुष और स्त्री को भिन्न रीति से रचने में परमेश्वर का जान-बूझकर किया गया चुनाव एक उद्देश्य रखता था, और विवाह में निरन्तर एक स्मरण का काम करता है। यह इस बात का स्मरण है कि यदि पति अपनी पत्नी के साथ अच्छा और मेलपूर्ण सम्बन्ध नहीं रखता, तो वह वस्तुओं के स्वाभाविक क्रम को बिगाड़ता है। उसी प्रकार जो पत्नी चुपचाप अपने पति के अधीन नहीं रहती और उसे अपना सिर नहीं मानती, वह इस क्रम के विरुद्ध जाती है।
सन्त पौलुस इस विचार को और आगे ले जाता है, और इसे हमारे प्रभु यीशु मसीह और उसकी कलीसिया के मिलन पर लागू करता है। जैसा पहले कहा गया, विवाह हमारे और परमेश्वर के पुत्र के बीच के सम्बन्ध का चिन्ह है। इसलिए वह पुकार उठता है कि यह एक गहरा भेद है - एक रहस्य जिस पर हमें बहुत ध्यान देना चाहिए। यीशु मसीह और उसकी कलीसिया के सम्बन्ध में यहाँ दो बातें ध्यान देने योग्य हैं। पहली, हम देखते हैं कि परमेश्वर ने आरम्भ ही से पति और पत्नी को एक अटूट बन्धन में जोड़ा है। दूसरी, परमेश्वर ने हमें और ऊँचा उठाना चाहा। चूँकि हम में अपने भीतर तरह-तरह की दुर्दशा के सिवा कुछ नहीं, इसलिए हमें परमेश्वर के पुत्र से जोड़ा जाना है, जो सारी भलाई का स्रोत है। हमें अपना आत्मिक जीवन उसी से लेना है और अपना सारा बल और सामर्थ्य उसी से पाना है।
जब सन्त पौलुस, मूसा का यह वचन उद्धृत करने के बाद, यह जोड़ता है कि यह भेद इसलिए बड़ा है कि परमेश्वर के पुत्र ने हमें अपनी हड्डियों में से हड्डी और अपने माँस में से माँस बनाया है, तो कुछ लोगों ने इसे जो कहा गया उसकी भविष्यवाणी मान लिया है। परन्तु इस व्याख्या का समर्थन करने के लिए कोई ठोस कारण नहीं है। पाठ को वैसा ही सरलता से लेना चाहिए जैसा वह है: यह पतियों और पत्नियों को उनके कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों की शिक्षा देने का परमेश्वर का तरीका है। इतना ही पर्याप्त हो। इस विषय में कुछ लोगों ने अपनी सीमा बहुत लाँघी है और ऐसी अज्ञानता दिखाई है कि छोटे बच्चे भी उन पर ठीक ही हँस सकते हैं। इसका कारण यह है कि "संस्कार" शब्द किसी समय आम तौर पर भेदों, रहस्यों और ऊँचे महत्व की उन सब बातों के लिए प्रयुक्त होता था जो हमारे आश्चर्य के योग्य हैं।
इसलिए इस पाठ के अनुवाद में यहाँ "संस्कार" शब्द प्रयुक्त हुआ। सन्त पौलुस इसे बड़ा संस्कार कहता है, अर्थात् बड़ा भेद या रहस्य। इसमें उससे अधिक सन्देह नहीं होना चाहिए जितना उसके यह कहने में है कि यह बड़ा संस्कार है कि परमेश्वर शरीर में प्रकट हुआ। यह भी बड़ा संस्कार है कि सुसमाचार सारे जगत में प्रचारित किया गया, और अभागे अन्यजातियाँ और अविश्वासी इब्राहीम की सन्तानों में सम्मिलित किए गए। इस पाठ में हमारे परमेश्वर की असीम भलाई एक संस्कार है, अर्थात् कोई ऊँची और हमारे ध्यान के योग्य बात का संकेत। फिर भी कुछ लोगों ने बड़ी मूर्खता की है, यह कहकर कि विवाह, बपतिस्मा या प्रभु-भोज के समान, एक संस्कार है। वे "संस्कार" शब्द को नहीं समझे, और मान बैठे कि इसका अर्थ कोई मूर्त तत्व है, जैसे बपतिस्मा में जल या प्रभु-भोज में रोटी और दाखरस। उन्हें आशा थी कि विवाह में भी कुछ ऐसा ही मिलेगा।
जब हम देखते हैं कि ऐसी अज्ञानता संसार में फैल गई है, और ये प्रसिद्ध विद्वान भी सुधारे जाने के योग्य थे क्योंकि उनमें वह समझ न थी जो स्वाभाविक बुद्धि से उनमें होनी चाहिए थी, तो हम उन पर परमेश्वर का कठोर न्याय देखते हैं जिन्होंने सच्चे धर्म को बिगाड़ा और परमेश्वर के वचन को अपनी इच्छाओं के अनुसार तोड़ा-मरोड़ा। इसलिए हमें और भी अधिक परमेश्वर का धन्यवाद करना चाहिए कि उसने हमें ऐसी उलझन से छुड़ाया। चूँकि उन लोगों में, जो अपने आप को कलीसिया की ज्योति और खम्भे कहते थे और वैसा ही माने जाते थे, ऐसी भयानक अव्यवस्था थी, इसलिए हमें उनकी संगति और सभा से अलग होने में डरना नहीं चाहिए, क्योंकि परमेश्वर ने हमें यह अनुग्रह दिया है कि हम उनसे अपने आप को छुड़ा सकें। हम अपनी राह पर दृढ़ रहें और संयम से आगे बढ़ें। यह हमारे लिए चेतावनी है कि हम परमेश्वर के सच्चे चेलों के रूप में सतर्क रहें, अपने आप पर अविश्वास करें और पवित्रशास्त्र को अपनी पसन्द के अनुसार न मरोड़ें। इसके बजाय हम पवित्रशास्त्र को श्रद्धा से सँभालें, और परमेश्वर के पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में सच्चे अर्थ की खोज करें।
अब आइए सन्त पौलुस के आशय की ओर मुड़ें। वह निःसन्देह मूसा के वृत्तान्त को इसलिए उद्धृत करता है कि दिखाए कि पुरुष को अपनी पत्नी को ऐसे सँजोना चाहिए मानो वह उसकी अपनी देह का अंग हो, स्वयं उसका एक अभिन्न भाग। इसका उद्देश्य पत्नियों को प्रोत्साहित करना था कि वे अपने पतियों का आदर करें और परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार उनके अधीन रहें। हव्वा आदम की एक पसली से इसलिए रची गई कि परमेश्वर पुरुष और स्त्री के बीच ऐसा मेल स्थापित करे जिसकी तुलना संसार का कोई और बन्धन न कर सके। यद्यपि सन्तान को अपने पिता का आदर करना चाहिए क्योंकि वह उसके वंश और लहू से है, फिर भी विवाह का बन्धन और ऊँचा माना गया है। इस बन्धन का आरम्भ मनुष्य की पसन्द से नहीं, वरन आदम की घोषणा और ईश्वरीय निर्णय से निश्चित हुआ है। यह एक अटूट आज्ञा है कि पुरुष अपनी पत्नी से मिला रहे, और ऐसी रीति से कि यदि उसे दोनों में से किसी एक को छोड़ना पड़े, तो उसका पिता उसके लिए उतना निकट न होगा जितनी उसकी पत्नी।
फिर भी क्या यह ऐसा कहना नहीं है कि परमेश्वर जूआ तोड़ना चाहता था और सन्तान को विवाह के बाद अपने माता-पिता के विरुद्ध विद्रोह करने की अनुमति देना चाहता था? परमेश्वर अपनी ठहराई हुई किसी भी विधि को नहीं बदलता। इसलिए जिसके माता या पिता जीवित हैं, उसे उनके अधीन बने रहना चाहिए, और जैसा पवित्रशास्त्र में दिखाया गया है और जैसा स्वयं प्रकृति सिखाती है, अपने कर्तव्य निभाना कभी बन्द नहीं करना चाहिए। ये उत्तरदायित्व हमारे भीतर जमे हैं और मिटाए नहीं जा सकते। इसलिए विवाहित लोग अपने माता-पिता के अधीन सदा बने रहना बन्द नहीं करते।
बात तब स्पष्ट हो जाती है जब हम एक स्थिति की तुलना दूसरी से करते हैं। यह ऐसा कहना है कि यदि कोई जवान अपने पिता को त्याग दे, उसे तुच्छ जाने, हठी या अनादर करनेवाला हो, या उसके प्रति श्रद्धा न दिखाए, तो क्या संसार उसे राक्षस न कहेगा? परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था में आज्ञा दी है कि अवज्ञाकारी और हठीले पुत्रों को पथराव किया जाए, और ऐसे उपाय ठहराए ताकि ऐसी दुष्टता को संसार से मिटा दिया जाए। तब यह कितना अधिक घृणित है जब कोई पुरुष अपनी पत्नी को, या कोई स्त्री अपने पति को छोड़ देती है? निश्चय ही यह एक भयंकर अपराध है। यदि पुत्र का अपने पिता के विरुद्ध उठना असहनीय है, तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि विवाह का बन्धन परमेश्वर की दृष्टि में और भी पवित्र और अधिक सराहनीय है, क्योंकि हर व्यक्ति को अपने कर्तव्य पूरे करने का यत्न करना चाहिए। जब कोई स्त्री झगड़ालू और हठीली हो, अपने पति के अधीन होने से इनकार करे, या कोई पति चिड़चिड़ा और क्रूर हो, अपनी पत्नी को तिरस्कार से देखे, तो यह केवल एक मनुष्य के प्रति निर्दयता का कार्य ही नहीं, वरन परमेश्वर का अपमान है, जो विवाह का रचयिता है और जिसने उसे उन्हीं शर्तों के साथ ठहराया है जो हम यहाँ सुनते हैं।
यह इस विचार तक भी जाता है कि हर व्यक्ति को उनसे प्रेम रखना चाहिए जो परमेश्वर की व्यवस्था से उसके साथ जुड़े हैं। उदाहरण के लिए, जिस पुरुष का अपनी पत्नी के सिवा कोई और नहीं है, उसे भी मानना चाहिए कि परमेश्वर ने हम सब को एक साथ जोड़ा है। जब परमेश्वर ने सारी मानवजाति की माता हव्वा को आदम की बगल से रचा, तो उसका इरादा था कि यह एकता सार्वभौमिक रूप से फैले। हमें समझना चाहिए कि वह चाहता है कि हम ऐसे मेल से रहें कि हम में से कोई भी दूसरों से अलग न हो। इसलिए किसी को इतना निर्दय नहीं होना चाहिए कि कहे, "वह मेरी पत्नी नहीं है।"
हमें विचार करना चाहिए कि हमारे प्रभु की इच्छा सब मनुष्यों के बीच सामान्य मेल की है, और हर एक अपने आप को अपने पड़ोसियों से बँधा समझे। मानवजाति दो लिंगों से बनी है, नर और नारी, और इस नाते हम सब एक-दूसरे से बँधे हैं। जैसा मैंने कहा, विवाह एक विशेष संस्था है, फिर भी पुरुष स्त्रियों का सहारा देने के लिए बाध्य हैं, जैसा हमारे प्रभु ने सृष्टि के आरम्भ से दिखाया है। स्त्रियों को भी पुरुषों के बीच, चाहे वे उनके पति न हों, शालीनता से आचरण करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, वे एक तन होकर जुड़े हैं, जैसा हमारे प्रभु यीशु मसीह ने दिखाया, जिसका संकेत है कि विवाहित पुरुष को केवल अपनी पत्नी से सन्तुष्ट रहना चाहिए, और स्त्री को पूरी तरह अपने पति पर निर्भर रहना चाहिए। उन्हें अपनी इच्छाओं को खुला भटकने नहीं देना चाहिए, न उस व्यवस्था को बदलना चाहिए जो हमारे प्रभु ने ठहराई है और जो जगत के अन्त तक बनी रहनी है।
इतिहास भर में मनुष्यों ने अपनी सीमाएँ लाँघी हैं और प्रकृति तथा दया दोनों को भुला दिया है। उन्होंने न केवल परमेश्वर और उसके वचन की उपेक्षा की, वरन उन शर्तों को भी भुला दिया जिनके अधीन वे संसार में रचे गए थे। वे उसे पहचानने में चूके जो स्वाभाविक बुद्धि भी उन्हें दिखा सकती थी, और वे इस स्थिति तक इसलिए पहुँचे कि वे अपनी वासनाओं में डूबे थे, और जंगली पशुओं के समान व्यवहार करते थे, विशेषकर जब उनकी इच्छाओं पर परमेश्वर का भय अंकुश न लगाता था। इसी से अनेक देशों में बहुविवाह जैसी प्रथाएँ चलीं, जैसे आज भी तुर्कों में इसकी अनुमति है। यहाँ तक कि यहूदी, मूसा की व्यवस्था रखते हुए भी, तुच्छ कारणों से अपनी पत्नियों को त्याग देते थे। यदि कोई स्त्री पर्याप्त सुन्दर न होती या पर्याप्त धनवान न होती, तो उसे त्याग दिया जाता। यद्यपि हमारे प्रभु ने इस स्थिति के लिए प्रबन्ध किया था, यह कहकर, "तुम्हारे मन की कठोरता के कारण उसने तुम्हें अपनी पत्नियों को त्यागने की आज्ञा दी," फिर भी उन्होंने विवाह की विश्वासयोग्यता का आदर करने के बजाय अपनी पत्नियों को त्यागना चुना। एक साथ जीने और मरने की प्रतिज्ञा करने के बाद अपनी पत्नियों को त्यागकर उन्होंने अपने आप को विश्वासघाती और झूठी शपथ खानेवाला ठहराया। इसलिए त्याग देना एक लज्जाजनक प्रथा थी। यद्यपि परमेश्वर ने उन्हें कठोर दण्ड नहीं दिया, इसका अर्थ यह नहीं कि वे इसे और बुरा करने का अवसर समझें।
यहूदियों ने त्याग देने के विषय में एक ऐसे अंश के आधार पर छूट ले ली थी जो कहता था, "जो अपनी पत्नी से अप्रसन्न हो वह उसे त्यागपत्र दे।" परन्तु हमारे प्रभु यीशु ने उनसे कहा कि यद्यपि परमेश्वर ने अतीत में इसकी अनुमति दी थी, इसका कारण यह था कि उसे उनके साथ जंगली पशुओं के समान व्यवहार करना पड़ा। परमेश्वर ने उनकी हठ के कारण उन्हें जितना उचित था उससे अधिक दिया था। परन्तु अब यह उनके लिए इसलिए नहीं है कि वे इसे और भी बुरा करने का बहाना बनाएँ।
हमें सदा आरम्भ की ओर लौटना चाहिए, जब परमेश्वर ने आदम को बनाया और उसकी बगल से हव्वा को गढ़ा। उस समय परमेश्वर ने घोषित किया कि दो एक तन होंगे। इसलिए जो कोई दो पत्नियाँ रखता है वह चीरे जाने के योग्य है, और जो तीन रखते हैं उन्हें तीन टुकड़ों में काटा जाना चाहिए। यह परमेश्वर और प्रकृति की अवहेलना के बराबर है, क्योंकि परमेश्वर ने पुरुष और स्त्री के व्यक्तित्व में एक चिन्ह रखा है, जो संकेत करता है कि विवाह जैसा होना चाहिए वैसा ही बना रहे। इसलिए यदि कोई परमेश्वर की विधि के क्रम को बिगाड़ता है, तो वह दोषी ठहराए जाने के योग्य है।
हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि मनुष्य को अपनी सब इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखना चाहिए और अपनी आँखों को भटकने नहीं देना चाहिए, ऐसा न हो कि जब वह विपरीत लिंग के किसी ऐसे व्यक्ति को देखे जो उसके जीवनसाथी से अधिक आकर्षक लगता है, तो उसका मन बह जाए। उसी प्रकार पत्नी को भी अपने पति के सिवा किसी पुरुष को निहारना नहीं चाहिए, सिवाय सरलता के। दोनों सदा स्मरण रखें कि वे दो हैं, फिर भी एक तन। कोई व्यक्ति अपने जीवनसाथी के बिना पूरा नहीं हो सकता। पति को अपनी पत्नी से प्रेम रखना चाहिए, और पत्नी को अपने पति का आदर या श्रद्धा करनी चाहिए। यहाँ प्रयुक्त शब्द का अर्थ भय है, परन्तु इसे पत्नी की ओर से श्रद्धा और अधीनता के अर्थ में लिया जाता है।
पति और पत्नी के कर्तव्यों में अन्तर है। परमेश्वर पति को आज्ञा नहीं देता कि वह अपनी पत्नी का भय माने, वरन उसे उससे प्रेम रखने की आज्ञा देता है। दूसरी ओर, स्त्री को अपने पति के अधीन रहना है। यदि कोई पूछे कि पति अपनी पत्नी का आदर कैसे करे, तो श्रद्धा के बिना सच्चा प्रेम करना सम्भव नहीं है। कोई उससे कभी प्रेम नहीं करेगा जिसे वह तुच्छ जानता है। प्रेम में आपसी सम्मान और शिष्टाचार होना चाहिए। यदि पति अपनी पत्नी को अपना ही एक अंग, अपने व्यक्तित्व का आधा भाग समझे, तो वह उसे तुच्छ कैसे जान सकता है? इसलिए पति को अपनी पत्नी का आदर करना चाहिए, यद्यपि अधीनता के द्वारा नहीं। क्या उसे सदा सिर और अपनी पत्नी पर शासन करनेवाले की अपनी स्थिति में नहीं बने रहना चाहिए? इसी कारण सन्त पौलुस पति से केवल प्रेम माँगता है। कुलुस्सियों को लिखे एक और पाठ में वह जोड़ता है कि पति अपनी पत्नियों के प्रति कठोर न हों। यदि प्रेम है, तो मनुष्य अपने जीवनसाथी के अनेक दोषों और दुर्बलताओं को सह लेगा। यदि हम एक-दूसरे के लिए ऐसा करते हैं, तो पति को उसके लिए कितना अधिक करना चाहिए जो परमेश्वर ने उसे दी है, और उससे अपनी ही देह के समान प्रेम रखे। इसलिए सन्त पौलुस स्पष्ट कहता है कि पुरुषों को विवेक और बुद्धि से अपनी पत्नियों की दुर्बलताओं में उनकी निर्बलता को सहकर उनकी सहायता करनी चाहिए। यदि कोई मनुष्य अपने मन में यह बिठा ले कि उसकी पत्नी चंचल और हल्की है, या संक्षेप में, उसे इसलिए तुच्छ जाने कि वह पुरुष नहीं है, तो यह उसके बारे में एक बुरी धारणा है। जो निर्बल हैं, उनके विषय में अपनी ही दुर्बलताओं को सोचकर उन्हें वैसे ही सहना चाहिए जैसे अपने आप को सहता है। सन्त पौलुस यहाँ इसी की बात कर रहा है। उसका अर्थ यह नहीं कि पुरुष को प्रेम में कमज़ोर होना चाहिए, जैसा प्रायः होता आया है।
पिछले रविवार के उपदेश में मैंने उन लोगों के उदाहरण दिए थे जो सार्वजनिक झगड़ों में अपनी पत्नियों का बचाव करने में बहुत उत्साही दिखते थे, परन्तु घर में उनके लिए शैतान थे। जिस प्रेम की मैं बात करता हूँ वह सच्चा और धार्मिक स्नेह है जो पुरुष को अपनी पत्नी के लिए रखना चाहिए क्योंकि वह पहचानता है कि परमेश्वर ने उन्हें ऐसे जोड़ा है मानो उसने उन्हें अपने ही हाथ से साथ रखा हो, यह कहकर, "शान्ति और मेल से साथ रहो।"
उन पत्नियों के विषय में जो उस जूए को उठाने में अनिच्छुक हैं जो परमेश्वर ने उनके कन्धों पर रखा है, एक और पाठ में पौलुस उन्हें स्मरण दिलाता है कि परमेश्वर विवाह का रचयिता है। उसने यह शर्त ठहराई कि पत्नियाँ अपने पतियों के अधीन रहें और अपने आप को उनके द्वारा सिर के रूप में शासित होने दें, और आदर दिखाएँ। स्त्रियाँ प्रायः अपने पतियों को तुच्छ जानने के कारण ढूँढ लेती हैं। यदि किसी पुरुष में भलाई है, तो वह उसे घटाने का यत्न कर सकती है ताकि यह कहने का कारण मिले, "इस पुरुष को मुझ पर अधिकार क्यों हो? वह मुझसे अधिक शासन करने के योग्य नहीं है।" पुरुष और स्त्री दोनों अभिमानी होते हैं और अपने आप को दूसरों से अधिक योग्य समझते हैं। इसलिए पत्नियाँ ऊपर रहना चाह सकती हैं। इसी कारण पौलुस उनसे कहता है कि वे उसी स्थिति में बनी रहें जिसमें परमेश्वर ने उन्हें रखा है, जो अधीनता की है। उन्हें अपने पतियों की जाँच-पड़ताल नहीं करनी चाहिए कि वे अधिकार और श्रेष्ठता के योग्य हैं या नहीं। इसके बजाय उन्हें विचार करना चाहिए कि परमेश्वर ने क्या ठहराया है और बिना प्रश्न या आपत्ति के उसका पालन करना चाहिए। उन्हें यह नहीं पूछना चाहिए कि यह या वह ऐसा क्यों है, इस प्रयास में कि परमेश्वर और उसकी आज्ञाओं का पालन करने से छूट के बहाने ढूँढें। हमें परमेश्वर की ओर ध्यान देना चाहिए, और हम में से हर एक को उसकी आज्ञाएँ बिना विवाद के ग्रहण करनी चाहिए।
यह शिक्षा अपने आप में स्पष्ट और सीधी है। फिर भी व्यवहार में संसार के लोग प्रायः अपना कर्तव्य टालने के लिए अज्ञानता को बहाना बनाना चाहते हैं, यह कहकर, "यह बहुत ऊँचा और समझने में बहुत कठिन है।" जब कहा जाता है कि पुरुषों को अपनी पत्नियों से प्रेम रखना चाहिए, तो क्या इसके लिए इस बात की व्याख्या चाहिए कि पवित्र आत्मा का क्या अर्थ था? नहीं, अर्थ प्रत्यक्ष है, और हर एक अपने मन में जानता है कि वह इसे भली-भाँति समझता है। परन्तु जब उस प्रेम की बात आती है जो पुरुषों को अपनी पत्नियों के लिए रखना चाहिए, तो सौ में मुश्किल से एक ही उसे छोड़ने के प्रलोभन का सामना कर पाता है और उसके मन में भटकते विचार नहीं होते।
स्त्रियों के भी मन प्रायः इतने चंचल होते हैं कि वे वर्ष में बीस बार अविवाहित होना चाहें। पवित्रशास्त्र के मार्गदर्शन के बिना भी संसार के लोग सामान्यतः विवाह का आदर करते हैं, क्योंकि परमेश्वर ने चाहा कि यह समझ सबसे अज्ञानी और अशिक्षित लोगों के हृदयों में भी खुदी हो। इसमें उसका उद्देश्य यह दिखाना है कि जब सबसे अनपढ़ और सरल लोग भी समझते हैं कि पति और पत्नी को अपनी-अपनी भूमिकाओं के अनुसार प्रेम और मेल से साथ रहना चाहिए, तो हम सब को उसी ओर प्रयत्न करना चाहिए। अब, हमारे पास जो शिक्षाएँ और उपदेश हैं, उनसे हमें और प्रोत्साहन मिलता है कि हम अपने दोषों में निश्चिन्त न रहें। फिर भी, इन निर्देशों के होते हुए, हमने क्या प्रगति की है? पतियों का अपनी पत्नियों को डाँटना और पत्नियों का अपने पतियों की चुगली करना आम दृश्य है। ऐसा आचरण हर घर में पाया जाता है, यहाँ तक कि उनमें भी जो निरन्तर लड़ते और झगड़ते रहते हैं। संक्षेप में, कलह और तिरस्कार के सिवा कुछ नहीं है।
जिन घरों में ऐसी मनोवृत्तियाँ हैं, वहाँ पति और पत्नी के लिए परमेश्वर के पास आना असम्भव हो जाता है। चूँकि प्रार्थना ही वह साधन है जिससे हम उसकी दया और सुरक्षा के लिए परमेश्वर के निकट आते हैं, वह आवश्यक है। सन्त पतरस स्पष्ट कहता है कि जब पति अपनी पत्नी के साथ अत्यधिक कठोर और अड़ियल होता है और पत्नी, बदले में, इतनी हठीली है कि उसे वश में नहीं किया जा सकता और वह जैसा चाहिए वैसे अधीन होने से इनकार करती है, तो उनकी प्रार्थनाएँ रुक जाती हैं। दूसरे शब्दों में वह कह रहा है, "अभागे लोगो, क्या तुम अपनी दुर्दशा नहीं समझते जब तुम्हारे लिए द्वार बन्द हैं, और तुम परमेश्वर को पुकार नहीं सकते?" तब हमारा क्या होगा जब हम सहायता के लिए अपने परमेश्वर की ओर नहीं फिर सकते? हमारे लिए सौ हज़ार बार मर जाना अच्छा होगा। परमेश्वर पुरुषों और स्त्रियों दोनों से शान्ति चाहता है, क्योंकि वह हमें शान्ति और मेल से रहने की आज्ञा देता है। इसके अतिरिक्त वह हमें अपने पास आने को बुलाता है, यह कहकर, "यदि तुम मुझे पुकारोगे तो मैं तुम्हारी सुनूँगा।" हमारे प्रभु का यह निमन्त्रण हमें हमारे अपने लाभ और कल्याण का स्मरण दिलाए। यदि हम ऐसी अनुकूल दशा को ग्रहण नहीं करते, तो हम पूरी तरह शैतान के वश में और बुद्धि से रहित होंगे।
इसलिए आइए हम समझें कि यदि पति और पत्नी अपने कर्तव्य पूरे करना चाहते हैं, तो दोनों को परमेश्वर को विवाह का रचयिता मानना चाहिए और पहचानना चाहिए कि वे महज संयोग से साथ नहीं आए। प्रभु ने उन्हें इसलिए जोड़ा कि पति अपनी पत्नी का साथी हो, और उसे अपना ही एक अंग मानकर व्यवहार करे, जबकि पत्नी अपने पति का आदर करे जैसी परमेश्वर की आज्ञा है, और उसे अपना सिर मानकर उसके अधीन रहे। इस विषय में परमेश्वर की सुनने और उसकी आज्ञा मानने का सबसे उत्तम मार्ग यह है कि उसे विवाह का आरम्भकर्ता मानें और सब बातों में उसके मार्गदर्शन पर चलें। पतियों को अपनी पत्नियों के दोषों की जाँच करके अपने आप को अत्यधिक कष्ट नहीं देना चाहिए, यह कहकर, "मैं इस स्त्री का क्या करूँ?" हम जानते हैं कि झिड़कियाँ अप्रिय और घृणित हैं। उसी प्रकार पत्नियों को अपने पतियों की कमियों पर ध्यान नहीं देना चाहिए और उन्हें ऐसा शैतान नहीं कहना चाहिए जिसे सुधारा नहीं जा सकता। उन्हें उस भूमिका में बने रहना चाहिए जिससे वे बँधी हैं और यह प्रश्न नहीं उठाना चाहिए कि ऐसा क्यों है, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें अपने पतियों के प्रति इस अधीनता में रखा है। उन्हें अपने पतियों के प्रति परमेश्वर की ठहराई हुई अधीनता का विरोध करके अपने आप को ऊँचा नहीं करना चाहिए।
अब आइए हम दूसरे मुद्दे की ओर मुड़ें और उस गहरे भेद में और भी गहराई से उतरें जिस पर सन्त पौलुस ने यहाँ बल दिया। यह निश्चय ही एक बड़ा भेद है, मसीह और उसकी कलीसिया का मिलन। इन शब्दों से प्रकट होता है कि सन्त पौलुस का आशय विवाह या दाम्पत्य को संस्कार कहना नहीं था, जैसा वह आगे स्पष्ट करता है। जैसा मैंने पहले कहा, यहाँ मुख्य बात परमेश्वर की उस अगम्य भलाई को व्यक्त करना है कि वह हमें अपने इकलौते पुत्र से जोड़ने को तैयार हुआ। मैं पहले समझा चुका हूँ कि हम मसीह की हड्डी और माँस के कैसे माने जाते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि हम भौतिक रूप से उसकी देह से लिए गए हैं, क्योंकि हम सब आदम से उत्पन्न हुए हैं। फिर भी हम उसी के सार से जीवित हैं, जैसा उसके यह कहने से प्रकट होता है कि उसका माँस हमारा भोजन है और उसका लहू हमारा पेय। इसका अर्थ है कि हम उसमें जीते हैं, यद्यपि आत्मिक रीति से।
यद्यपि हम सब मनुष्यों के साथ एक सामान्य जीवन में सहभागी हैं, ऐसा जीवन जो परमेश्वर के विशेष अनुग्रह का परिणाम नहीं है, फिर भी हम में जन्म से ही परमेश्वर की एक सहज छाप भी है। तौभी हम अपनी ही प्रकृति में शापित हैं और इतने अभागे हैं कि हम मरे हुए कहलाते हैं। इसी कारण यीशु मसीह ने कहा कि वह समय आता है जब मरे हुए, जो कब्र में सड़ी हुई लोथों के समान हैं, परमेश्वर के पुत्र का शब्द सुनेंगे। सन्त पौलुस भी दूसरे अध्याय में कहता है कि जब हम यीशु मसीह के द्वारा नए किए जाते हैं, तो हम मृत्यु से जीवन में पार हो जाते हैं, क्योंकि पहले हम अपने पूर्वज आदम की विरासत के कारण अपने अपराधों और पापों में मरे हुए थे।
जिस रीति से हम यीशु मसीह के माँस में से और उसकी हड्डी में से हैं, वह उसकी देह में कलम लगाए जाने के समान है। जैसे कोई डाली, जड़ से कटने पर भी, यदि किसी दूसरे वृक्ष में कलम लगा दी जाए तो रस और पोषण पा सकती है, वैसे ही हम भी हैं। यदि हम अपनी स्वाभाविक दशा में बने रहें, तो हम अपने प्रभु यीशु मसीह से अलग रहते हैं। परन्तु यदि हम उसमें मिला लिए जाएँ और वह हमें अपने आप को देना उचित समझे, तब हम सचमुच अनुभव करते हैं कि रोटी और दाखरस केवल हमारा पोषण ही नहीं करते, वरन हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह की देह और लहू के द्वारा सचमुच जीवन और बल मिलता है।
अब यह प्रत्यक्ष है कि यह एक गहरा भेद है। हम इस विषय पर चाहे जितना विचार और मनन करें, क्या हम में से कोई पूरी तरह समझ सकता है कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह से कैसे जोड़े जाते हैं और उसके साथ एक हो जाते हैं? क्या हम सचमुच अपने आप को आश्वस्त कर सकते हैं कि इस मिलन के द्वारा हम परमेश्वर की महिमा में सहभागी होंगे और अभी भी अपने प्रभु यीशु मसीह में जीते हैं, जैसा उसने घोषित किया, "क्योंकि मैं जीवित हूँ, तुम भी जीवित रहोगे"? क्या हमारे सीमित मन इस वास्तविकता को ग्रहण कर सकते हैं? निश्चय ही नहीं। इसी कारण बहुत लोग इस धारणा को स्वीकार करने में संघर्ष करते हैं कि हम यीशु मसीह के माँस और उसकी हड्डियों में से हैं। वे अपनी ही कल्पनाओं से सन्तुष्ट रहते हैं, जो परमेश्वर के अनुग्रह को घटाती हैं - ऐसा अनुग्रह जिसे सन्त पौलुस पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सका, वरन संकेत किया कि वह हमें चकित कर दे।
इसलिए कुछ लोग भूल भरी, यहाँ तक कि अन्यजातियों जैसी धारणाएँ बना सकते हैं कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह से जुड़े हैं और उसके अनुग्रह से बचाए गए हैं। परन्तु पवित्रशास्त्र इससे भी आगे जाता है। यदि हमारे पास केवल यही कथन होता कि यह एक बड़ा भेद है, तो भी हमें इसे अपनी धारणाओं के अनुसार सीमित करने से बचना चाहिए। ऐसा करना सन्त पौलुस को झूठा ठहराने के समान होगा। जो लोग उस आत्मिक मिलन को अनदेखा करते हैं जो हमारा अपने प्रभु यीशु मसीह के साथ है, वे प्रकट करते हैं कि वे परमेश्वर की गुप्त और अद्भुत सामर्थ्य और यहाँ समझाए गए गहरे सत्यों को पहचानने में असफल रहे हैं।
पवित्र आत्मा ऐसी भाषा इसलिए प्रयोग करता है कि हमें दीन करे और फिर हमें दोबारा उठाए। इसलिए हमें एक ओर यह मानना चाहिए कि हमारे पास जितनी बुद्धि और समझ है वह इस विषय के लिए अपर्याप्त है। दूसरी ओर हमें फिर उठना चाहिए, क्योंकि हम अपने प्रभु यीशु मसीह को अपने आप को बुलाते सुनते हैं। वह हमसे कहता है कि हम उससे इतनी निकटता से जुड़े हैं कि उसका अपना कुछ भी ऐसा नहीं जो वह हमारे साथ साझा न करता हो, और जिससे वह नहीं चाहता कि हम लाभ न उठाएँ। इसलिए यदि हम अपने भीतर विरोधी विचारों का सामना करें, यदि हम सोचने लगें, "हमारा प्रभु यीशु मसीह, जो स्वर्ग में है, हमें अपने ही सार से कैसे पोषित कर सकता है, कि उसकी देह हमारा भोजन और उसका लहू हमारा पेय बन जाए?" यदि ऐसे विचार हमारे मन में आएँ, तो हमें उन्हें यहाँ कहे गए से दूर कर देना चाहिए, अर्थात् कि यह एक बड़ा भेद है। हमें अपनी ही मूर्खता और उतावलेपन को डाँटना चाहिए कि हम किसी अनन्त वस्तु को समझने का प्रयास करते हैं। हमारा प्रभु स्पष्ट करता है कि जब उसने हमें अपने इकलौते पुत्र से जोड़ दिया है, तो उसने एक ऐसा कार्य किया है जो इतना गहरा और उच्च है कि हमारी हर क्षमता से परे है। इसलिए हम सदा यही निष्कर्ष निकालें कि यद्यपि हम इसे एक अद्भुत बात पाते हैं, हमें उसी पर भरोसा रखना चाहिए जो स्वयं परमेश्वर द्वारा कहा गया है। विशेषकर जब वह कहता है कि वह ऐसी उच्च रीति से कार्य करेगा कि हम पूरी तरह चकित हो जाएँगे।
इसलिए आइए हम इस पाठ से सामान्य रूप से सीखें कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा स्वर्गीय जीवन पाने के लिए जो भी लाभ हमें मिलते हैं, वे परमेश्वर की अपार बुद्धि से निकलते हैं। हमारे लिए यह उचित नहीं कि हम इतने मूर्ख और ढीठ हों कि कहें, "मैं इसे समझूँगा," या फिर, "मैं केवल वही स्वीकार करूँगा जो मुझे भाता है।" हमें ऐसी ढिठाई से अपने आप को रोकना चाहिए, क्योंकि यह हमें विश्वास के भेद के अयोग्य बना देती है। यह कथन उसके महत्व को रेखांकित करता है: यह एक बड़ा रहस्य है। यीशु मसीह के द्वारा उन्नति तक पहुँचने और उसके अनुग्रह में सहभागी होने के लिए हमें समझना चाहिए कि हमारे उद्धार में परमेश्वर का कार्य एक गहरी और रहस्यमय बात है। जैसा तीमुथियुस को लिखी पत्री के उस पाठ में दिखाया गया है जिसका मैंने पहले उल्लेख किया, यह वास्तव में बड़ा भेद है कि परमेश्वर शरीर में प्रकट हुआ। परमेश्वर और मनुष्य के बीच जो विशाल खाई है उस पर विचार करो; हम केवल कीड़े हैं, निर्बल और सड़ने वाले, जबकि परमेश्वर की महिमा इतनी ऊँची है कि कोई उसका सही वर्णन नहीं कर सकता या उसके एक अंश की भी कल्पना विचार में नहीं कर सकता। इसलिए हमें विस्मय और आश्चर्य से अभिभूत होने में सन्तुष्ट रहना चाहिए।
यह देखते हुए कि परमेश्वर ने अपने आप को हमसे इतनी निकटता से जोड़ा है, सच्चे इम्मानुएल के रूप में, जैसा यशायाह में नाम दिया गया है, और जो बातें दूर दिखती हैं वे हमारे प्रभु यीशु मसीह के व्यक्तित्व में बाँधी गई हैं, आइए हम समझें कि हमारे परमेश्वर से मिलने वाले सारे अनुग्रह में रहस्यों और भेदों के सिवा कुछ नहीं है। यह विशेष रूप से तब सच है जब हम अपने प्रभु यीशु मसीह में मिलाए या कलम लगाए जाते हैं। उसने हमारा स्वभाव धारण किया और हमारे माँस को ओढ़ लिया, और चाहता है कि हम उसमें अपनी जड़ के समान कलम लगाए जाएँ, उसकी आत्मा से जिलाए जाएँ, और उसके जीवन के सहभागी हों। वह अपने लिए कुछ भी अलग नहीं रखता, वरन चाहता है कि सब कुछ उसके द्वारा हमें दिया जाए।
अपने प्रभु यीशु मसीह को, उन लाभों के साथ जो वह लाता है, ग्रहण करके हम उन सब परीक्षाओं पर जय पा सकते हैं जो हमारे सामने आएँ। हमें पवित्रशास्त्र की शिक्षाओं पर गम्भीरता से मनन करना चाहिए, उन्हें गम्भीरता से लेना चाहिए और उन्हें उचित आदर देना चाहिए। हमें मानना चाहिए कि परमेश्वर हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमारे भीतर कार्य करता है, जिसके लिए हमें अपनी स्वाभाविक समझ को छोड़ना पड़ सकता है।
अब आइए हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने आप को दीन करें, अपने पापों को मानें और उससे विनती करें कि वह हमें इस प्रकार क्षमा करे कि हम उनसे छूट जाएँ। वह अपने पवित्र आत्मा से हम पर शासन करे, ताकि हम उसकी पवित्र इच्छा के अनुसार जी सकें और अपना सारा जीवन उसकी आज्ञाओं की आज्ञाकारिता में सुधार सकें। वह हमारी सब दुर्बलताओं को तब तक सहे जब तक वह हमें पूरी तरह रूपान्तरित न कर दे, और उस सिद्धता तक न पहुँचा दे जिसके लिए हम अब यत्न करते हैं। और इसलिए आइए हम सब कहें, सर्वशक्तिमान परमेश्वर, इत्यादि।
