अध्याय 9

पहले अध्याय पर सातवाँ उपदेश, जो दूसरे अध्याय पर पहला भी है — गलातियों

Sermons upon Galatians · John Calvin

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पहले अध्याय पर सातवाँ उपदेश, जो दूसरे अध्याय पर पहला भी है — गलातियों

जो दूसरे अध्याय पर पहला भी है।

22 मैं मसीह में यहूदिया की कलीसियाओं के लिए मुख पहचाना हुआ नहीं था।

23 उन्होंने केवल इतना सुना था कि जो हमें पहले सताता था, वह अब उस विश्वास का प्रचार करता है जिसे वह कभी नष्ट करता था।

24 और वे मेरे विषय में परमेश्वर की महिमा करते थे।

दूसरा अध्याय।

1 चौदह वर्ष के बाद मैं बरनबास के साथ फिर यरूशलेम को गया, और तीतुस को भी साथ ले गया।

2 और मैं प्रकाशन के अनुसार गया, और जो अन्यजातियों में मैं प्रचार करता हूँ, उस सुसमाचार के विषय में उनसे बातचीत की, परन्तु एकान्त में उनसे जो प्रतिष्ठित माने जाते थे, ऐसा न हो कि मैं किसी रीति से व्यर्थ दौड़ूँ, या दौड़ चुका होऊँ।

हम देख चुके हैं कि पौलुस ने एक ओर तो किसी मनुष्य के अधिकार-पत्र के बिना सारे संसार में सुसमाचार का प्रचार किया, और इसी में सन्तुष्ट रहा कि उसे निश्चय था कि वह परमेश्वर की सेवा कर रहा है और उसका परिश्रम उसे ग्रहणयोग्य है। तो भी उसने इसी बीच प्रेरितों के साथ भाईचारा और अच्छा मेल-मिलाप खोजने में ढिलाई नहीं की; क्योंकि यह उन लोगों की दुर्बलता को सँभालने के लिए अत्यन्त आवश्यक था जो मार्ग से भटक सकते थे, यदि परमेश्वर उनकी निर्बलता में उनकी सहायता न करता। इस प्रकार एक ओर हमें पौलुस की शिक्षा का प्रमाण मिलता है, और दूसरी ओर हम देखते हैं कि उसका अभिप्राय परमेश्वर की सन्तानों को इकट्ठा करना था, कि वे विश्वास के एक दल में जुड़ जाएँ और मानो एक हृदय, एक मन और एक मुख से परमेश्वर की महिमा करें। और साथ ही हम यह भी देखते हैं कि पौलुस को यह सम्मति माँगने में कोई संकोच नहीं हुआ कि वह आगे बढ़े या पीछे हटे। क्योंकि यद्यपि वह उन लोगों के लिए अपरिचित था जो उससे पहले विश्वास में थे, फिर भी उसने उस परमेश्वर की सेवा करने में ढिलाई नहीं की जिसके लिए वह पहले बुलाया जा चुका था। और निश्चय यह एक और अति उल्लेखनीय बात है; क्योंकि इससे प्रकट होता है कि वह पूरी तरह परमेश्वर की सेवा में लगा था और मनुष्यों के हाथ से अपनी मजदूरी की आशा नहीं रखता था कि वे उसे प्रसन्न करें या उसकी योग्यता के अनुसार उसका आदर करें। इसलिए हम सीखें कि जिस बुलाहट में हम बुलाए गए हैं उसमें इस प्रकार चलें कि यद्यपि मनुष्य हम पर ध्यान न दें, तो भी हम अपना कर्तव्य विश्वासयोग्यता से निभाना न छोड़ें, और इसी में सन्तुष्ट रहें कि परमेश्वर ने हमें स्वीकार करना चाहा। क्योंकि जो मनुष्यों पर टिके रहते हैं, उनमें सदा थोड़ा-बहुत व्यर्थ घमण्ड का दाग रहेगा, और उनके लिए शुद्धता और खराई से चलना असम्भव होगा।

इसके अतिरिक्त, सन्त लूका हमें दिखाता है कि पौलुस अवश्य ही अजेय दृढ़ता से चलाया जाता रहा होगा, क्योंकि वह मार्ग से नहीं हटा, यद्यपि मनुष्य उसके कामों को कुछ भी नहीं गिनते थे। क्योंकि वह कहता है कि विश्वासी उसे सन्देह की दृष्टि से देखते थे और जब वह यरूशलेम आया तो वे उससे कतराते थे। अब पौलुस के लिए यह कठिन परीक्षा थी कि उसे विश्वासियों की संगति में ग्रहण नहीं किया जा सकता, जबकि वह पहले ही इतना कष्ट उठा चुका था। क्योंकि हम जानते हैं कि दमिश्क में उसके पहली बार आने पर फाटक उसके लिए बन्द कर दिए गए थे, जैसा कि हम पहले देख चुके हैं, यहाँ तक कि उसे टोकरी में उतारा जाना पड़ा। तो तुम देखते हो कि जैसे ही वह हमारे प्रभु यीशु मसीह के विश्वास में फिरा, वैसे ही उस पर तुरन्त बड़े-बड़े उपद्रव टूट पड़े। इसके बाद वह अरब देश को गया और वहाँ विश्वासयोग्यता से परिश्रम किया। और क्या इतने पर भी वह विश्वासियों के साथ मित्रता और मेल की आशा करता है? उसके विरुद्ध फाटक बन्द है, और मनुष्य उससे जंगली पशु की नाईं बचते हैं। परन्तु [विश्वास में फिरने] से पहले वह सुसमाचार के शत्रुओं के बीच और यहूदियों के आराधनालय में भी आदर पाता और बड़ी प्रतिष्ठा रखता था। उसने इन सब बातों को त्याग दिया था, यहाँ तक कि अपने आपको उस स्थान से निकाला हुआ भी देखा, और फिर भी उन्होंने उसे कलीसिया में स्थान देना स्वीकार न किया। इसलिए यदि उसका मन यहीं नीचे लगा होता, तो वह ऐसी निर्दयता से इतना खिन्न हो सकता था कि सब कुछ छोड़ बैठता। परन्तु क्योंकि उसने अपने आपको पूरी तरह परमेश्वर की सेवा में दे दिया था और अन्त तक टिके रहने का पूरा निश्चय कर लिया था, चाहे मनुष्य उसके परिश्रम के लिए उसका धन्यवाद न करें, इसलिए वह अपने सीधे मार्ग से न हटा। और ऐसे उदाहरण आज हमें प्रोत्साहित करें, जब हम देखते हैं कि इतने थोड़े लोग हैं, यहाँ तक कि कलीसिया में भी, जो शुद्ध और सच्चे मनवाले उत्साह से किए गए काम को पसन्द करते हैं; कुछ लोग तो डाह के कारण उसकी निन्दा करते हैं, कुछ इतने नाक-भौं सिकोड़नेवाले हैं कि मनुष्य उन्हें किसी प्रकार सन्तुष्ट नहीं कर सकता, और कुछ दुष्ट कलंक लगाने और झूठ बोलने से भरे हैं। इसलिए, जब हम देखते हैं कि मनुष्य हमें प्रायः इधर-उधर भटका देते हैं, तो हम अपने आपको परमेश्वर को इस रीति से सौंपना सीखें कि जो मार्ग वह हमें दिखाता है उस पर दृढ़ता से बने रहें, और अपनी निर्बलता का बहाना न बनाएँ, क्योंकि पौलुस हमारे आगे-आगे चलता है और हमें अपना हाथ बढ़ाता है। वह हमारी ही नाईं दुर्बल मनुष्य था, फिर भी परमेश्वर ने अपने पवित्र आत्मा से उसे ऐसा बल दिया कि वह ऐसी बाधाओं को लाँघ गया।

इसलिए जब हम अपने आपको निर्बल जानते हैं, तो आओ हम परमेश्वर से बिनती करें कि वह हमें ऐसी दृढ़ता से सज्जित करे कि यद्यपि कुछ लोग हमारी झूठी चर्चा करें, कुछ हमें दोष दें, और कुछ हमारा उपहास करें और जब हम भला करने का यत्न करें तो हमारे सारे परिश्रम को कुछ न गिनें, तो भी हम उसके प्रति अपना कर्तव्य निभाना न छोड़ें। तब यद्यपि हमारा परिश्रम खोया और व्यर्थ गया दिखाई दे, तो भी हमारे लिए यही बहुत है कि परमेश्वर उसे पसन्द और स्वीकार करता है। तो तुम देखते हो कि उस पाठ से हमें क्या सीखना है। सब बातों से बढ़कर, हम इस संसार में प्रसिद्ध होने और बड़ा नाम कमाने की लालसा न करें; क्योंकि हम जितना हो सके उतना जोर लगा लें, फिर भी हम कभी पौलुस से बढ़कर न होंगे। जब उसने इस रीति से सुसमाचार का प्रचार किया था, मानो ऐसे मनुष्य की नाईं जो निरन्तर स्वर्ग तक उठा लिया गया हो, यहाँ तक कि यद्यपि जिस प्रकाशन की चर्चा वह 2 कुरिन्थियों में करता है वह उसे केवल एक ही बार दिया गया था, तो भी उसका फल उसके जीवन भर प्रकट होता रहा; तो भी इसी बीच वह अपरिचित ही रहा, यहाँ तक कि यहूदिया की सब कलीसियाओं में भी। और इसलिए ऐसा लग सकता था कि उसे कोई बड़ा लाभ नहीं हुआ, क्योंकि उसका सारा परिश्रम मानो गाड़ दिया गया था। परन्तु उसके लिए यही बहुत था कि परमेश्वर ने उसके द्वारा दूर-दूर के परदेशियों की उन्नति की। तो हम देखते हैं कि उसने बहुत प्रसिद्ध होना, या मनुष्यों के बीच साख और अधिकार बटोरना नहीं चाहा।

जहाँ तक उसके इस कहने का सम्बन्ध है कि यहूदिया की कलीसियाएँ जो मसीह में थीं: उसने यह शब्द जानबूझकर जोड़ा, क्योंकि यहूदियों में अब भी परमेश्वर का कुछ बीज बचा था, और प्रतिज्ञाएँ उन्हें इस प्रकार दी गई थीं कि वे तब तक पूरी तरह काटे नहीं गए जब तक उन्होंने यीशु मसीह को सर्वथा अस्वीकार न कर दिया, और इस प्रकार उस जीवन की मीरास से, जो उनके लिए ठहराई गई थी, पूरी तरह वंचित न हो गए। क्योंकि जैसे परमेश्वर ने अब्राहम के वंश को चुना था, वैसे ही हमारा प्रभु यीशु मसीह उनका सेवक होने के लिए संसार में आया जिन्हें परमेश्वर ने इस प्रकार गोद लिया था, और उन प्रतिज्ञाओं को पूरा करने के लिए जो उनके पूर्वजों को दी गई थीं। हमारे प्रभु यीशु मसीह ने उन यहूदियों को तिरस्कृत नहीं किया जिनके लिए प्रतिज्ञाएँ थीं (जैसा कि प्रेरितों के काम के दूसरे अध्याय में भी कहा गया है), परन्तु परमेश्वर की कलीसिया उनके बीच बनी रही, और उनका खतना मनुष्य की गढ़ी हुई वस्तु न था।

और यद्यपि वे सब अपने स्वभाव से गिर गए थे, और बहुत-सी भूलें और दुष्ट मत उनके बीच घुस आए थे, यहाँ तक कि परमेश्वर की सेवा में उथल-पुथल मच गई और धर्म बिगड़ गया, तो भी वह जाति परमेश्वर के घराने की भेड़-बकरियाँ मानी जाती रही। इसलिए जिन आराधनालयों ने यीशु मसीह से अलग होकर अब तक अपना अविश्वास प्रकट नहीं किया था, उन्हें पौलुस यहाँ कलीसियाएँ गिनता है, फिर भी सिद्ध कलीसियाएँ नहीं, क्योंकि वे अब तक यीशु मसीह में नया जन्म नहीं पा चुकी थीं। क्योंकि सारे संसार का नया किया जाना तब हुआ जब यीशु मसीह भेजा गया कि जो निकट थे और जो दूर थे, दोनों को परमेश्वर के पास ले आए: निकट वाले, अर्थात् यहूदी जिनके पास अब भी व्यवस्था थी; और दूर वाले, अर्थात् अन्यजाति के लोग, जिनके लिए स्वर्गीय राज्य की कोई आशा न दिखती थी, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें बेचारे जंगली पशुओं की नाईं छोड़ दिया था और वे अपनी ही अन्धविश्वासों और मूर्तिपूजाओं में भटक गए थे। परन्तु यीशु मसीह सबको इकट्ठा करने और जो पहले बिखरा हुआ था उस सब को फिर से जोड़ने आया। और इससे हम देखते हैं कि व्यवस्था को यहूदियों को सुसमाचार तक पहुँचाना चाहिए था, जैसा कि सारे पवित्रशास्त्र में कहा गया है। और यह हमारे लिए [जानना] बहुत आवश्यक है, ऐसा न हो कि हम यह मान बैठें कि व्यवस्था में जो कुछ लिखा है उसमें से कुछ भी आज के दिनों में हमारे काम का नहीं। क्योंकि निश्चय है कि यद्यपि रीति-विधियाँ अब व्यवहार में नहीं रहीं, तो भी उनका सत्य और सार सदा हमारे लिए बना रहता है, यहाँ तक कि आज भी हम विश्वासी नहीं हो सकते जब तक हम अब्राहम की सन्तान और मूसा के चेले भी न हों। इसलिए नहीं कि हमें अब भी पुरानी छायाओं के अधीन रखा जाए, परन्तु इसलिए कि हमें उन वस्तुओं को एक साथ जोड़ना है जो अलग नहीं की जा सकतीं, अर्थात् व्यवस्था और सुसमाचार।

परन्तु इससे आगे, हम यह समझ लें कि आज हम परमेश्वर के सामने कलीसिया नहीं गिने जा सकते (अर्थात् संसार में मनुष्यों की सारी मण्डलियाँ वह आदरणीय नाम नहीं पा सकतीं) जब तक हम यीशु मसीह में न हों। क्योंकि वही सिर हमें परमेश्वर पिता से जोड़ता है, और उसी के द्वारा हमें स्वर्ग के राज्य में प्रवेश मिलना है। और इसलिए उन सब लोगों के विषय में जो यीशु मसीह को नहीं जानते, यद्यपि वे बपतिस्मा की छाप से चिह्नित हैं और मसीही कहलाते हैं, तो भी वे सड़े हुए अंगों के समान पूरी तरह काट दिए गए हैं, चाहे वे यह दिखावा करें कि वे परमेश्वर की सन्तानों की टोली और गिनती में हैं। तो तुम देखते हो कि इस पाठ पर हमें और क्या ध्यान देना है।

इसके अतिरिक्त, पौलुस यह जोड़ता है कि लोगों में चर्चा थी कि जो पहले विश्वास को सताता था वही अब उसका प्रचार करता है, और इस रीति से परमेश्वर की महिमा हो रही थी। यहाँ फिर हम देखते हैं कि पौलुस अपनी प्रशंसा का प्रचार नहीं करता, क्योंकि वह अपने आपको कलीसिया का शत्रु और सतानेवाला होने का दोषी ठहराता है। सच है कि वह लोगों की चर्चा के विषय में बोलता है, फिर भी वह उस बात को ठीक वैसे ही दोहराता है जैसी वह वास्तव में हुई थी। तो वह उस बात को नहीं छिपाता जो उसकी अपनी निन्दा और लज्जा की थी। कोई उसके मुँह पर यह कह सकता था कि उसने बेचारे विश्वासियों को सताया था, कि उसने अपनी पूरी शक्ति से निर्दोष लहू बहाया था, और यह भी कि उसने निर्बलों को निन्दा करने पर विवश किया था।

परन्तु फिर भी वह इस अभियोग को अपनी ही इच्छा से मान लेता है, और अधिकांश मनुष्यों की नाईं नहीं बोलता, जो इस बात को मानो गौरव की बात बनाते हैं कि वे सुसमाचार के शत्रु रहे हैं। निश्चय है कि पौलुस ने ऐसा वर्णन करते समय अपने उस दुराचरण के लिए गहरा शोक अनुभव किया, जैसा कि दूसरे स्थान में वह कहता है कि मैं प्रेरित कहलाने के योग्य नहीं। तो तुम निश्चय जानो कि वह अपने हृदय में सदा कुछ चुभन अनुभव करता रहा, क्योंकि वह पहले परमेश्वर के विरुद्ध ऐसा विद्रोही, ऐसा बुरे मनवाला, वरन् सुसमाचार के प्रति पूरी तरह द्वेष से भरा था। फिर भी, संसार में जो कुछ भी उसके साथ हो, उसने पूरी नम्रता से अपना दोष मान लेना इससे अच्छा समझा कि वह उस बात को अधूरा छोड़ दे जो परमेश्वर की महिमा के लिए हो सकती थी। इसलिए हम उसके साथ सीखें कि जब परमेश्वर का आदर करने की बात हो, तो अपने किए हुए अपराधों को सीधे-सीधे मान लें, और मनुष्यों के सामने कुछ लज्जा का भाग लेने में अनिच्छुक न हों। क्योंकि हमारे लिए भी यही मार्ग है कि परमेश्वर के सामने हमारे पाप गाड़े जाएँ, कि वे फिर कभी लेखे में या स्मरण में न आएँ: अर्थात् यदि हम आवश्यकता पड़ने पर मनुष्यों के सामने कुछ अपयश का चिह्न सहने को सन्तुष्ट हों, कि परमेश्वर को उसका प्राप्य मिले। इसलिए यह वह बात है जो हमें इस कथन से स्मरण रखनी है कि लोगों में चर्चा थी कि उसने पहले विश्वास को नष्ट किया था, जैसा कि उसने वास्तव में किया भी था। सच है कि सुसमाचार का विश्वास शैतान के और सब दुष्टों के सब आक्रमणों पर सदा विजयी रहेगा: इसलिए पौलुस के सामर्थ्य में न था कि वह विश्वास को मिटा दे या उलट दे, जब वह ऐसे क्रोध से भरा हुआ था जैसा हम देख चुके हैं। क्योंकि विश्वास परमेश्वर के उस सत्य पर आधारित है जो अजेय है; वह मनुष्यों की राय के अधीन नहीं है।

परन्तु पौलुस ने यहाँ सीधे-सादे लोगों की निर्बलता पर ध्यान दिया, जिन्हें उसने अपनी ओर से जितना हो सका गिरा दिया था। क्योंकि प्रेरितों के काम में कहा गया है कि उसने मसीहियों को केवल सताया ही नहीं, परन्तु उनमें से कुछ से मुकरवा भी दिया। जैसे आजकल जब किसी बड़ी संख्या को सताया जाता है, तो कुछ लोग हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम के अंगीकार के लिए न अपना लहू बचाते हैं और न अपने प्राण। दूसरे मुकर जाने के द्वारा इस दुखी और भागनेवाले जीवन को मोल ले लेते हैं, यहाँ तक कि वे जितना हो सके अपने आपको स्वर्ग के राज्य से निर्वासित कर देते हैं, शैतान के फन्दों में अपने आपको डाल देते हैं, और अनन्त मृत्यु में सिर के बल गिर पड़ते हैं, और यह सब अत्याचारियों और अपने शत्रुओं के हाथ से बचने के लिए। इसलिए पवित्र आत्मा ने जानबूझकर पौलुस की क्रूरता की निन्दा की है, क्योंकि वह न केवल परमेश्वर के विरुद्ध घमण्ड और हठ से भरा था, परन्तु उसने बहुतों को मुकरने और सुसमाचार के विश्वास को छोड़ देने के लिए विवश भी किया था। तो तुम देखते हो कि उसने अपना व्यवहार कैसा रखा: और यह हमारी शिक्षा के काम आना चाहिए। क्योंकि यद्यपि वचन अपनी पूरी स्थिति में बना रहता है, और हम अपनी निर्बलता से उसकी कोई हानि नहीं करते, फिर भी हमारे व्यक्तियों में विश्वास गिरा दिया जाता है। क्योंकि यदि मैं परमेश्वर के शत्रुओं को प्रसन्न करने के लिए डगमगाऊँ, या सत्य पर परदा डालूँ, या किसी रीति से छल करूँ: तो मेरा विश्वास बिगड़ जाता है।

सच है (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) कि परमेश्वर का वचन सदा अपना स्थान बनाए रखेगा: फिर भी प्रायः एक मनुष्य का गिरना अपने पीछे बड़ा विनाश खींच लाता है। यदि लोग किसी एक व्यक्ति को मुकरते देखते हैं, जिससे बड़ी दृढ़ता की आशा की जाती थी, तो बहुत-सी बेचारी आत्माएँ हिल जाती हैं, और उन्हें समझ नहीं आता कि क्या कहें। सच है कि हमें मनुष्यों पर भरोसा नहीं रखना चाहिए: परन्तु फिर भी (जैसा हम शीघ्र ही फिर बताएँगे) बहुत-से हैं जिन्हें अच्छे उदाहरण से दृढ़ किए जाने की आवश्यकता है। अब यदि कोई उनके मार्ग में ठोकर का पत्थर डाल दे, तो वे लगभग पूरी तरह गिरा दिए जाते हैं, या फिर उनका हृदय ऐसा हिल जाता है कि उन्हें पता नहीं रहता कि कहाँ जाएँ। इसलिए हम अपने आपको परमेश्वर को सौंपना सीखें! और क्योंकि शैतान के इतने अधीनस्थ हैं जो सब कुछ को गड़बड़ी में डालने के सिवा कुछ नहीं चाहते, और अपने आपको पूरी तरह मसीही विश्वास को दबा देने में लगाते हैं: आओ हम परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह हमें ऐसी दृढ़ता से सामर्थी करे कि हमारे शत्रु लज्जित हों, चाहे हम पर उससे अधिक निकट से आक्रमण किया जाए जितना अब किया जाता है। और हम केवल अपनी-अपनी ही चिन्ता न करें, परन्तु उन बेचारी आत्माओं की बड़ी संख्या की भी जिन्हें हम मानो भेड़ियों के मुँह में देखते हैं: क्योंकि वे सताई और धमकाई जाएँगी, और अन्त में चापलूसी और लुभावनों से उन्हें मुकरने के लिए मनाया जाएगा। इसलिए जब हम अपने भाइयों पर ऐसे आक्रमण होते देखें, तो कम से कम हममें इतना साहस हो कि हम परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह आवश्यकता के समय उनकी सहायता करे, कि उनका विश्वास अजेय बना रहे और ऊपर रहे, और शैतान और उसका सारा कुल जो कुछ भी चाल चले, वे कभी न डगमगाएँ। इसलिए हमारे लिए और भी आवश्यक है कि हम इस पाठ पर ध्यान दें, जहाँ कहा गया है कि पौलुस ने विश्वास को गिराया और नष्ट किया।

क्योंकि यद्यपि परमेश्वर सदा अपने सत्य को थामे रखेगा: तो भी मनुष्य विनाश की ओर जाना नहीं छोड़ते, क्योंकि सीधे मार्ग से डगमगाने और एक ओर हट जाने से उनका विश्वास हिल जाता है। इसके अतिरिक्त, हमारे पास अपने आपको दृढ़ करने के साधन हैं, कि यद्यपि मनुष्य उस दृढ़ता में बने नहीं रहते जो आवश्यक और वांछनीय थी, तो भी हम इससे बहुत अधिक घबरा न जाएँ, क्योंकि यह ऐसी बात है जो सब युगों में होती आई है। क्या पौलुस का प्रचार इसलिए कम विश्वसनीय था कि बहुत-से भगोड़े थे, जो अन्त में कपटी और विश्वासघात से भरे प्रकट हुए? उसके अपने कुछ साथी भी, जो उसके साथ एक ही हाथ की दो उँगलियों की नाईं जुड़े थे, अन्त में उसे पूरी तरह छोड़ गए। फिर भी पौलुस की शिक्षा इस कारण ठुकराई नहीं जानी चाहिए। और जब वह मन फिराने से पहले मसीहियों को सताता था, तब यद्यपि बहुतों ने उस उद्धार को त्याग दिया था जिसे यीशु मसीह में जैसा दिया गया था वैसा ही ग्रहण करना चाहिए था, तो भी इस कारण विश्वास को बिगाड़ा नहीं जाना चाहिए। इसी प्रकार आजकल जब हम बहुत-से दुखी लोगों को हिम्मत हारते और सब कुछ छोड़ते देखते हैं, और दूसरों को टिके रहते देखते हैं जिनके हाथ से हमने बड़ी दृढ़ता की आशा न की थी: तो हम इससे लाभ उठाएँ, और इस विषय में सब सन्देह से परे रहें कि यद्यपि सारा संसार विनाश की ओर चला जाए, तो भी यदि हम अपने परमेश्वर पर टिके रहें तो हमारी नींव अच्छी और पक्की है।

अब जो पौलुस यह जोड़ता है कि विश्वासियों ने उसमें परमेश्वर की महिमा की: यह इसलिए है कि (मनुष्य इसे आँखों से भी देख सकें) और अच्छी तरह प्रकट हो कि उसमें जो परिवर्तन हुआ वह केवल परमेश्वर के हाथ से हुआ। और यह सब इसी बात पर आकर ठहरता है, अर्थात् यह कि उसने अपने आपको घुसेड़ा नहीं था, और उस पर यह दोष नहीं लगाया जा सकता था कि उसने यों ही अटकल से प्रचार किया, या उसमें कोई उतावलापन या ढिठाई थी, या वह किसी सांसारिक विचार से प्रेरित था, परन्तु परमेश्वर ने उसे चलाया और मार्ग दिखाया था। क्योंकि जो विश्वासियों ने उसमें परमेश्वर की महिमा की, वह इस बात को मानकर थी कि ऐसे मनुष्य का इस रीति से नया किया जाना, और फाड़नेवाले भेड़िये को भेड़, वरन् चरवाहा बना देना, उसी का काम था, और ऐसा अद्भुत काम था जो उसी की ओर से हुआ। इसे विशेष बात जानकर ध्यान में रखो। और इससे हम संक्षेप में देखते हैं कि जिन पर परमेश्वर ने अनुग्रह के वरदान इस प्रकार दिए हैं कि वे सब दूसरों से बढ़कर और ऊपर हैं, उन्हें इसके कारण अपने को बढ़ाना नहीं चाहिए, परन्तु ऐसा उपाय करना चाहिए कि स्तुति उसी को मिले जिसका उस पर अधिकार है, और जो उसके योग्य है। इसलिए हम नम्रता का यह नियम थामे रहें, अर्थात् यह कि जो वरदान परमेश्वर ने हमें दिए हैं उनमें से किसी के कारण हम अपनी प्रतिष्ठा न खोजें, और न अपने पड़ोसियों से अपने को ऊँचा ठहराएँ, परन्तु परमेश्वर की श्रेष्ठता सदा बनी रहे, और जब हम किसी मनुष्य में उसके किसी अनुग्रहपूर्ण वरदान को देखें तो हममें से हर एक उसके लिए उसकी महिमा करना सीखे।

और यह बहुत आवश्यक है: क्योंकि मनुष्यों में सदा ऐसा द्वेष रहा है कि हर एक अपने साथी से डाह करता है, क्योंकि सब मनुष्य सबसे बड़ा होना चाहते हैं। और जब तक परमेश्वर हमें भली-भाँति वश में न कर ले, और हम नम्रता से आज्ञा मानना न सीख लें: निश्चय है कि हम में से कोई ऐसा नहीं जो अपने साथी को पछाड़ना न चाहे। अब इसी महत्त्वाकांक्षा से सदा डाह और झगड़ा उपजते हैं, साथ ही घृणा, कुड़कुड़ाहट, चुगली, और ऐसी ही अन्य बातें। परन्तु इसके विपरीत, जब हम इस नियम को जो हमें यहाँ दिया गया है भली-भाँति पचा लेते हैं, तो तुरन्त सीखते हैं कि जब-जब हम उसकी ओर से आए हुए कोई चिह्न देखें तब-तब परमेश्वर की महिमा करें। क्योंकि जब हम उनसे डाह करते हैं जिन्हें परमेश्वर आदर देना चाहता है, और उनमें जो उसके वरदान और हर उत्तमता हम देखते हैं उसे बिगाड़ने का यत्न करते हैं: तो निश्चय हम केवल नश्वर प्राणियों के साथ ही अन्याय नहीं करते, परन्तु परमेश्वर के साथ भी, जो उनमें उन वरदानों का कर्ता है। [उदाहरण के लिए:] मैं एक ऐसा मनुष्य देखता हूँ जो कलीसिया की उन्नति कर सकता है, और परमेश्वर ने उसे ऐसे वरदान दिए हैं कि उसका परिश्रम भलाई कर सके: अब मैं, इस भय से कि वह बहुत बढ़ न जाए और मैं उसके कारण पीछे न खींचा जाऊँ, अपनी निन्दाओं और उलटे उपायों से उस वस्तु को बिगाड़ने और घटाने का यत्न करता हूँ जो परमेश्वर ने उसमें रखी है। यह वैसा ही है मानो वह परमेश्वर के सब वरदानों को छिपा दे और उन्हें तिरस्कार में डाल दे।

और यह किस से आता है, सिवाय उस शापित महत्त्वाकांक्षा के जिसकी चर्चा मैंने पहले की? अब मनुष्यों के विरुद्ध ऐसे उछलने में सदा कोई झगड़ा और हृदय की जलन रहेगी: और संक्षेप में, सब कुछ अवश्य ही नाश हो जाएगा, क्योंकि परमेश्वर इससे अप्रसन्न होता है। क्योंकि ये अन्याय किस पर निशाना बाँधते हैं? सच है कि मैं अपने पड़ोसी के साथ अन्याय करता हूँ जिसे मैं इस प्रकार अपमानित करता हूँ: परन्तु साथ ही मैं परमेश्वर की निन्दा भी करता हूँ: यहाँ तक कि हम किसी मनुष्य में जो वरदान और गुण हैं उन्हें बिगाड़ नहीं सकते, कि हमारा यह काम तुरन्त निन्दा के साथ जुड़ न जाए, जिससे परमेश्वर बहुत अप्रसन्न होता है। और क्यों? क्योंकि परमेश्वर अपने सब वरदानों में पहचाना जाना चाहता है, और जब वह अपने आपको हमारे सामने प्रस्तुत करता है तो उचित है कि हम उसका आदर करें। इसलिए जब कभी हम किसी मनुष्य में पवित्र आत्मा के चिह्न देखें, यदि हम उन्हें पाँवों तले रौंदें, या उनका तिरस्कार करें, और उन्हें नापसन्द करें: तो क्या यह अपनी पूरी शक्ति से परमेश्वर की महिमा को बिगाड़ना नहीं है? सच है, हम इसे मानेंगे नहीं, परन्तु वास्तव में ऐसा ही है। और इसलिए जो कुछ यहाँ कहा गया है उस पर हमें और भी अच्छी तरह ध्यान देना चाहिए: अर्थात् यह कि विश्वासियों ने पौलुस के व्यक्ति में परमेश्वर की महिमा की, जब उन्होंने देखा कि उसने उसमें इस रीति से काम किया था: और इसी से हमें स्मरण दिलाया जाता है कि जब कभी वह हमें अपना कोई वरदान दिखाता या देता है तो हम परमेश्वर को उसका उचित आदर देने के लिए बाध्य हैं। क्योंकि निन्दा या अन्याय सृष्टि के प्राणी के साथ नहीं होता: परन्तु ऐसा करने में परमेश्वर ही अनादर पाता है; क्योंकि उसे उस अधिकार से ठगा और लूटा जाता है जो उसका है।

और इस पाठ को स्मरण रखना हमारे लिए और भी आवश्यक है, क्योंकि हम देखते हैं कि यह दुष्टता आजकल उतनी ही बड़ी है जितनी कभी थी। कितने हैं जो परमेश्वर के उन वरदानों की सराहना करते हैं जो सर्वसाधारण की उन्नति और सारी कलीसिया के कल्याण के लिए लाभदायक हैं? नहीं, परन्तु शैतान का ऐसा बोलबाला है कि हर एक अपनी ही कृतघ्नता के कारण अपने को परमेश्वर के वरदानों का फल पाने से रोक लेता है, जिसमें वह भागी हो सकता था। इसलिए यदि हमारे हृदय सीधे और भले अभिप्रायवाले होते, तो निश्चय जब हम कोई अच्छा उदाहरण देखते तब हम सदा और भला करते: और जहाँ किसी मनुष्य को परमेश्वर के वरदान मिले हैं, हम उन्हें अपने लाभ के लिए काम में लाते: परन्तु हम अपनी ही कुढ़न-भरे हृदय के कारण अपने आपको द्वार से बाहर कर देते हैं, यहाँ तक कि जो लाभ हमें दिया जा रहा है उसे हम भोग नहीं सकते। फिर, हम देखते हैं कि कुछ लोग ऐसे द्वेषी हैं कि निरे बैर के कारण वे मनुष्यों को यह विश्वास दिलाना चाहेंगे कि सूर्य चमकता ही नहीं: तुम उन्हें ऐसा शैतानी पाओगे कि दूसरे मनुष्य के द्वारा परमेश्वर के नाम की महिमा होते देखकर उन्हें हृदय में कुढ़न होती है। वे कहते हैं, क्या उस आदमी को आदर मिलना चाहिए? सचमुच मानो हर एक को यह ध्यान न रखना चाहिए कि अपने को नीचा करे ताकि परमेश्वर का उन वरदानों में जो वह मनुष्यों को अपनी इच्छा के अनुसार देता है उसके योग्य आदर हो। परन्तु कुछ ऐसे कुढ़न-भरे हृदयवाले हैं कि वे परमेश्वर को उसके सिंहासन से खींच निकालना सह लेते, परन्तु उन्हें धीरज से सहना न चाहते जिन्हें उसने अपने वरदान दिए हैं, और जो अपने आपको उसकी कलीसिया की उन्नति में लगाते हैं, या यह कि मनुष्य उन्हें ग्रहण करें और मानें कि परमेश्वर उनमें आदर पाना चाहता है। इसलिए जब कि आजकल मनुष्य इतने बैर और विष से भरे हैं: तो हमें और भी आवश्यक है कि जो यहाँ हमें दिखाया गया है उसे मन में रखें: अर्थात् यह कि परमेश्वर की महिमा उसके उन सब उपकारों में होनी चाहिए जो हमें दिखाई देते हैं, और हम अपने आपको निश्चय दिलाएँ कि वे सब उसकी निरी उदारता से आते हैं, और वही सब उत्तम गुणों का कर्ता है, यहाँ तक कि किसी सृष्टि में कोई ऐसी सराहनीय वस्तु नहीं जिसका श्रेय उसी को न दिया जाना चाहिए। इसलिए हम सब बातों में और सब प्रकार से परमेश्वर की महिमा करना सीखें।

अब इसके बाद वह जोड़ता है कि वह एक बार फिर यरूशलेम की यात्रा पर गया, और उनसे बातचीत की जो प्रतिष्ठित दिखाई देते थे और जिनका सबसे अधिक अधिकार था, कि वह पहले व्यर्थ न दौड़ा हो, और आगे भी व्यर्थ न दौड़े। यहाँ हम देखते हैं कि पौलुस हमारे प्रभु यीशु मसीह के राज्य की उन्नति और बाधाओं को दूर करने के लिए जो कुछ भी हो सकता था उसे खोजने में कभी सन्तुष्ट न हुआ, कि सुसमाचार का मार्ग स्वतन्त्र और पूरा खुला रहे, और यह भी कि वह इसमें व्यर्थ घमण्ड से नहीं चलाया गया, जैसा हमने आज सुबह देखा: परन्तु उसने यह सोचा कि दुष्ट लोग उस पर यह दोष लगाएँगे कि अन्त में वह प्रेरितों के आगे झुका कि उनसे कुछ सीखे। उसने सोचा कि उससे यह कहा जा सकता है: पर जो हो सो हो, वह [दूसरे] प्रेरितों से मेल खोजने के अपने कर्तव्य में ढिलाई करना नहीं चाहता था। मैं यह नहीं कहता कि वह संसारी मनुष्यों के हाथ से कोई संसारी बात खोजता था: परन्तु यह कि उसके काम सब बातों में भली-भाँति स्वीकार किए जाएँ। क्योंकि निश्चय है कि पौलुस यरूशलेम इसलिए नहीं गया था कि यह जाँचे कि किसने सबसे अच्छी शिक्षा दी: परन्तु इसलिए कि आपस में परस्पर यह घोषणा की जाए कि उनमें से हर एक ने परमेश्वर की सेवा की और सुसमाचार की विश्वासयोग्यता से प्रचार किया। पौलुस वहाँ इसी कारण गया था।

इसलिए हम यहाँ उसकी नम्रता देखते हैं, कि वह अपने आपको जरा भी नहीं बचाता, ताकि कलीसिया को उससे कोई फल या विश्वास की दृढ़ता मिले, और मनुष्य भली-भाँति निश्चित हो जाएँ कि प्रेरित उसे अपनी पंक्ति और संगति में का एक गिनते थे। फिर, उसकी नम्रता के अतिरिक्त, हम उसका उत्साह भी देखते हैं। उसके लिए इतना ही बहुत था कि वह बहुत से देशों में दौड़ चुका था: वह अरब में रहा था और उस सारे देश में घूमा था: वह किलिकिया में रहा था जहाँ वह जन्मा था, और सूरिया में भी: और फिर पहले सारे यहूदिया देश में घूमकर वह यरूशलेम लौटा। जब उसने ये सब यात्राएँ कीं और जरा भी विश्राम न लिया: तो यह इस बात का चिह्न था कि वह जीवित रहने से मर जाना अधिक पसन्द करता, यदि इससे हमारे प्रभु यीशु मसीह का राज्य आगे बढ़े, और कलीसिया को उसके परिश्रम से कोई लाभ पहुँचे, जैसा मैंने पहले कहा। जब हम ऐसे उदाहरण देखें, तो एक ओर हम अपने आलस्य को काटना सीखें, और परमेश्वर से प्रार्थना करने में और भी मन लगाएँ, कि जब हम अत्यन्त ठंडे हों तब वह हमें अपने पापों में सदा लोटते रहने न दे, परन्तु हमें जगा दे, और हमें यह अनुग्रह दे कि हम उसकी सेवा में अपने आपको खर्च करें, विशेषकर आवश्यकता के समय और जब आवश्यकता माँगे: और साथ ही हमें उस शिक्षा में दृढ़ करे जो पौलुस लाता है, क्योंकि उसका परमेश्वर की महिमा और हमारे कल्याण के लिए सेवा करना सचमुच सच्चे मन से था। क्योंकि यदि उसने ऐसा कपट से किया होता, तो निश्चय वह संसारी लोगों की रीति से काम कर सकता था। परन्तु अब जब कि वह बिना बुलाए आया, और विश्वासियों के साथ मित्रता और मेल खोजा, यद्यपि वह ठुकराया गया था, और अपने आपको नहीं बचाया, यद्यपि जो पीड़ाएँ और परिश्रम उसने उठाए वे जाने नहीं गए: तो यह इसका चिह्न है कि वह परमेश्वर के सामने चला, और पवित्र आत्मा ने सब बातों में उसका मार्गदर्शन किया।

इसके अतिरिक्त, जो वह कहता है कि उसने प्रतिष्ठित और मान्य लोगों से बातचीत की, कि वह [प्रतीत न हो कि] व्यर्थ दौड़ा या [आगे] व्यर्थ दौड़े: उसका अर्थ यह नहीं कि यदि कोई भी जीवित मनुष्य उसके कामों को स्वीकार न करता तो उसका परिश्रम खो जाता: परन्तु उसकी दृष्टि बहुत-से निर्बलों पर थी जो सन्देह में पड़ जाते, यदि परमेश्वर इस उपाय से उन्हें सुसमाचार के पूर्ण ज्ञान और निश्चय तक न खींच लाता। मैंने तुम्हें कुछ ही समय पहले बताया कि हमारा विश्वास अवश्य गिराया जाएगा, (यद्यपि अपने आप के विषय में नहीं, परन्तु हमारी निर्बलता के विषय में,) जब हम हिम्मत हार जाते हैं। उसी प्रकार सुसमाचार का प्रचार और घोषणा करनेवालों का परिश्रम व्यर्थ और निष्फल होता है, क्योंकि हम उतना लाभ नहीं उठाते जितना चाहा जाता, जब तक परमेश्वर परिश्रम पर आशीष न दे और उसे बढ़ा न दे। जहाँ पौलुस कहता है कि ऐसा न हो कि प्रतीत हो कि वह व्यर्थ दौड़ा: इसका यह अर्थ नहीं समझना चाहिए कि जो सुसमाचार का प्रचार करते हैं वे अपना परिश्रम खो देते हैं और कुछ काम नहीं आते जब तक परमेश्वर अपने सहकार्य से उनके कामों को आशीष न दे: क्योंकि सुसमाचार का प्रचार सदा परमेश्वर के लिए ग्रहणयोग्य बलिदान रहेगा, चाहे संसार उससे मृत्यु और दण्ड के सिवा कुछ न पाए, जैसा हमने देखा कि पौलुस 2 कुरिन्थियों में कहता है, हम परमेश्वर के लिए सुगन्ध हैं। यद्यपि अविश्वासी अपनी ही दुष्टता के कारण सुसमाचार से विष खा लेते हैं, और उन्हें लगता है कि उसमें गन्दगी के सिवा कुछ नहीं: तो भी परमेश्वर सदा उस बलिदान को जो हम उसे चढ़ाते हैं भला ही मानेगा।

इसलिए इस पाठ में पौलुस का यह अर्थ न था कि वह व्यर्थ दौड़ा था, मानो उसके द्वारा परमेश्वर का उपहास हुआ हो और उसका प्रचार बिना प्रयोजन रहा हो: परन्तु उसकी दृष्टि उन पर थी जिन्हें उसने सिखाया था, और उन पर भी जिन्हें वह अन्त तक सिखाने का विचार रखता था, कि जब वे उसके और अन्य प्रेरितों के बीच, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के ठहराए हुए जाने जाते थे, कोई अच्छा मेल न देखते तो उनकी उन्नति न होती। यहाँ कोई सन्देह उठा सकता है कि वे लोग विश्वासी थे भी या नहीं, क्योंकि उन्होंने सुसमाचार पर विश्वास नहीं किया होता, यदि मनुष्यों से सहायता न मिली होती। उत्तर सरल है: अर्थात् यह कि केवल परमेश्वर का वचन ही हमारे विश्वास के लिए पर्याप्त होना चाहिए। यदि पूछा जाए कि हमारा विश्वास किस पर आधारित है, और वह पूर्णता तक कैसे पहुँचता है: तो परमेश्वर के वचन से। कैसे? क्या वचन के साथ संस्कार नहीं जोड़े गए? हाँ, सहायक के रूप में, क्योंकि हम बहुत निर्बल हैं: और शपथ भी है, यहाँ तक कि परमेश्वर शपथ खाता है: ये सब बातें वचन के अतिरिक्त और ऊपर से हैं, वरन् अधिक के रूप में।

परन्तु वह हमें फिर उठाना चाहता है जब हमें ठोकर खाते देखता है: और जब हम इतने निर्बल हैं कि उसके सामर्थ्य पर उतना निश्चित भरोसा नहीं रखते जितना रखना चाहिए, तब वह हमें ऐसे सहारे देता है। क्योंकि जब हम परमेश्वर के दासों के बीच अच्छा मेल देखते हैं, तो निश्चय यह हमारी बहुत सहायता करता है, और यह हमारे लिए अच्छा प्रमाण है। इसी प्रकार शहीदों का लहू निश्चय हमारे उद्धार का बड़ा सहायक होना चाहिए, और हमें उससे दृढ़ होना चाहिए, मानो वह कोई मुहर हो जो परमेश्वर की शिक्षा को हमारे बीच और भी अधिकार दे। तब वे हमें विश्वास की ओर खींचने, और उसी में हमें बनाए रखने और दृढ़ करने के सहायक हैं। चमत्कारों के विषय में भी यही कहना चाहिए। चमत्कार हमें परमेश्वर के वचन पर विश्वास नहीं देते, परन्तु उसके लिए तैयार करते हैं। क्योंकि परमेश्वर उनमें अपना सामर्थ्य प्रकट करता है, कि हम और अच्छी तरह जागें, और उसके वचन का हमारे बीच अधिक आदर हो, और अन्त में वे हमारे लिए मुहरों का काम करते हैं। क्योंकि जब हम सुसमाचार पर विश्वास करते हैं, और हमारा विश्वास सब सन्देह से पूरी तरह परे नहीं है: तब परमेश्वर वह दृढ़ता और जोड़ देता है। यही बात उस विषय की भी है जिसकी चर्चा पौलुस अभी कर रहा है। क्योंकि यदि मनुष्य बड़े अधिकारवाले लोगों के बीच कोई मतभेद या बखेड़ा देखते तो कैसी बात होती? भोले लोग क्या सोचते, सिवाय इसके कि वे इससे चकित हो जाते और कहते, हाय, इसका क्या अर्थ है? हमें नहीं पता कि किधर मुड़ें। जब कि उनके बीच, जिन्हें हमें मार्ग दिखाना चाहिए, ऐसा विरोध है कि एक बिलकुल उलटा और दूसरे के पीछे खींचता है: हाय, अब हम कैसे निश्चित हों?

तो तुम देखते हो कि बहुत-से सीधे-सादे लोग बुरी तरह हिल गए थे। और पौलुस का यही अर्थ था जब उसने कहा कि वह पतरस, यूहन्ना और याकूब से बातचीत करना चाहता था, कि सारे संसार में साक्षी हो कि वे उसके कामों को स्वीकार करते हैं, और कि जो सुसमाचार वह प्रचार करता था वह कोई अनोखी शिक्षा नहीं, परन्तु वही सुसमाचार है जो यीशु मसीह ने अपने चेलों को सिखाया था, और जिसे उसने उन्हें आज्ञा दी थी कि सारे संसार में प्रचार करें, और जिसका भार उसने उन्हें सौंपा था। और इससे हमें फिर समझाया जाता है कि पौलुस के उत्साह, नम्रता, साहस और दृढ़ता के अतिरिक्त, परमेश्वर ने तभी देख लिया था कि यह मेल जो उसने उसके और अन्य प्रेरितों के बीच प्रकट किया, हमारी निर्बलता के कारण आज के दिन भी हमें दृढ़ करने के काम आएगा। इसलिए जब कि हम कच्चे और निर्बल हैं, तो जितने सहारे परमेश्वर हमें देता है उन सब को हम अपने काम में लाएँ, और अपनी ओर से भी यत्न करें कि परमेश्वर की सन्तानों के साथ ऐसा मेल रखें कि हम में से हर एक अपने पड़ोसी का सहायक हो, और दूसरे के विरुद्ध मोर्चा न बाँधे। क्योंकि हाय उस पर जो ऐसा जंगली दाना बोएगा कि अज्ञानी और निर्बल लोग उससे बाधा पाएँ।

और साथ ही हम उस हानि पर विचार करें जो तब हो सकती है जब वे, जिन पर सुसमाचार प्रचार करने का भार है, निन्दाओं से इतने बदनाम किए जाएँ, या इतने सन्देह में डाले जाएँ, कि मनुष्य नहीं जान सकता कि उन पर विश्वास करे या नहीं, मानो परमेश्वर ने उन्हें अपने पुत्र के राज्य को बढ़ाने और अनेक देशों में, या कम से कम उन बहुत-से लोगों के बीच जिनकी उनके द्वारा उन्नति होनी थी, सुसमाचार का प्रचार करने के लिए ठहराया ही न हो। इसलिए शापित हो वह जो उनके मार्ग में ऐसी ठोकर डाले। तो हम हर प्रकार से यत्न करें कि परमेश्वर की सेवा करनेवालों से मेल रखें, और उनकी सहायता करें जिन्हें कलीसिया की उन्नति का वरदान और सामर्थ्य मिला है और जो पद पर ठहराए गए हैं। हम उन्हें अपना हाथ दें, कि उनका परिश्रम हमारे लिए और हमारे सब पड़ोसियों के लिए भी लाभदायक हो, कि इस रीति से परमेश्वर की महिमा हो, और हम अधिकाधिक एक हृदय और एक मुख से उसे अपना पिता कहकर पुकारें।

और अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने दोषों को मानते हुए गिर पड़ें, और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उन्हें इतनी गहराई से अनुभव कराए कि वह हमें सच्चे पश्चात्ताप की ओर खींचे, और हमसे बिनती कराए कि वह हम पर अपनी अपार दया तब तक करता रहे जब तक वह हमें हमारी सब अपूर्णताओं से छुड़ा न ले, कि हम उसे आमने-सामने जैसा वह है वैसा देखें, और उस सिद्धता को पाएँ जिसके लिए वह अब हमें अपने वचन के द्वारा बुलाता है, और जिसकी ओर हमें अपने जीवन भर आगे बढ़ने का यत्न करना चाहिए, भली-भाँति निश्चित होकर कि जब तक हम अपने शरीर से छूट न जाएँ और इस कारागार से, जिसमें हम अब पाप की दासता के अधीन रखे गए हैं, निकाल न लिए जाएँ, तब तक हम उस तक नहीं पहुँच सकते। वह कृपा करके यह अनुग्रह न केवल हमें, परन्तु पृथ्वी के सब लोगों और जातियों को भी दे, इत्यादि।

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