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पन्द्रहवाँ उपदेश, जो तीसरे अध्याय पर पहला है — गलातियों 3:1-3
पन्द्रहवाँ उपदेश,
जो तीसरे अध्याय पर पहला है।
1 हे निर्बुद्धि गलातियो, किसने तुम्हें मोह लिया है कि तुम सत्य को न मानो, जिनकी आँखों के सामने यीशु मसीह का चित्र पहले ही खींचा गया, और जो तुम्हारे बीच क्रूस पर चढ़ाया गया?
2 मैं तुम से केवल यही एक बात जानना चाहता हूँ, कि तुमने आत्मा को व्यवस्था के कामों से पाया, या विश्वास के सन्देश के सुनने से?
3 क्या तुम ऐसे निर्बुद्धि हो, कि आत्मा से आरम्भ करके अब शरीर में अन्त करोगे?
हम देखते हैं कि परमेश्वर कोमलता और भली रीति से हमें जीतने का यत्न करता है, जब तक कि हमारी दुष्टता और हठ उसे हमारे साथ कठोरता से व्यवहार करने पर विवश नहीं कर देती, क्योंकि हम अपने आप को उसके हाथ से कोमलता के साथ सम्भाले जाने नहीं देते। सुसमाचार की सारी शिक्षा में परमेश्वर अपनी बाँहें फैलाता है कि हमें अपने पास ले आए और अपने पितृ-प्रेम में ग्रहण करे; या यों कहें (जैसा कि वह मूसा के द्वारा अपनी उपमा देता है) वह उस मुर्गी के समान है जो अपने पंख फैलाकर अपने चूज़ों को उनके नीचे इकट्ठा करती है। इस प्रकार तुम देखते हो कि परमेश्वर अपनी असीम भलाई से हमें अपनी ओर खींचता है, परन्तु हम जंगली पशुओं के समान हैं जो उसके द्वारा चलाए जाना नहीं चाहते। इसलिए हमारे ऐसे हठीलेपन के कारण उसे कठोरता का प्रयोग करना और हमारी कृतघ्नता हमें दिखाना पड़ता है, ताकि हम उस पर लज्जित होना सीखें।
यही कारण है कि सन्त पौलुस ने यह दिखाकर कि हमारा सारा कल्याण यीशु मसीह में है, और यदि हम उसकी धार्मिकता और उन लाभों के भागी होना चाहते हैं जो वह हमें देना चाहता है तो हमें अपने आप का पूरी रीति से त्याग करना और यह मान लेना होगा कि हम में पाप और भ्रष्टता के सिवाय कुछ नहीं है, अब उन लोगों को कड़ाई से डाँटा है जो अपनी भक्ति-क्रियाओं को उस अनुग्रह में मिलाना चाहते थे जो हमारे प्रभु यीशु मसीह में उन्हें दिया जा रहा है; क्योंकि उन्हें पहले विश्वासयोग्यता से शिक्षा दी जा चुकी थी। यदि सन्त पौलुस ने किसी ऐसे स्थान में आरम्भ किया होता जहाँ लोगों ने पहले सुसमाचार का एक शब्द भी न सुना होता, तो वह ऐसी कठोरता न दिखाता, क्योंकि वह उन अन्धे और अज्ञानी दुखियारों पर तरस खाता।
परन्तु क्योंकि गलातियों को उसके द्वारा विश्वासयोग्यता से सिखाया गया था, और उसने उन्हें सुसमाचार के अनुसार ढालने में परिश्रम किया था, और फिर भी वे पीछे हट गए और झूठे विचारों से अपने आप को उलझने दिया, इसलिए वह उनके साथ इतना कठोर है; जैसा कि वह स्वयं भी दिखाता है कि इसका कारण यह था कि यीशु मसीह उनके बीच क्रूस पर चढ़ाया गया था, और परमेश्वर की असीम भलाई के भण्डार उनके सामने इस प्रकार खोलकर रखे जाने को देखकर, उनके पास कोई बहाना न था कि वे व्यवस्था की रीतियों के द्वारा धर्मी ठहरने और उद्धार मोल लेने की आशा में अपने उन तुच्छ कूड़े-करकट की ओर फिर लौट जाएँ।
इस प्रकार सार यह है कि इस पाठ से हमें यह सीखना है कि यदि हम परमेश्वर के वचन में मधुर स्वाद पाना चाहते हैं, तो हमें अपनी ओर से सिखाए जाने योग्य होना चाहिए, हठीला नहीं। क्योंकि हमें स्मरण करना चाहिए कि अठारहवें भजन में कैसे लिखा है कि परमेश्वर उनके साथ सदा कोमलता से व्यवहार करेगा जो नम्र आत्मा के हैं, और जो हठ करते हैं और अपने आप को उसके आगे झुकाना सहन नहीं कर सकते, उनके प्रति वह कठोर और तीखा होगा। इसलिए जिनकी गर्दन पीतल की है और जिनका मन परमेश्वर की आज्ञाकारिता के आगे झुकने को नहीं मानता, वे अपने आप को एक बहुत ही बलवान विरोधी के सामने पाएँगे, और यदि वे नहीं झुकेंगे तो उन्हें अवश्य ही कुचला और टुकड़े-टुकड़े किया जाएगा।
इसके अतिरिक्त, हम यह ध्यान दें कि जब परमेश्वर हमारे दोषों को सुधारता है, तब हमें झल्लाना और बिगड़ना नहीं चाहिए, जैसा बहुत से लोग करते हैं, जो डाँटे जाने पर दाँत पीसने के सिवाय और कुछ नहीं करते, और कहते हैं कि उनके साथ ऐसा व्यवहार नहीं होना चाहिए, और उनके स्वभाव को कोमलता से सिखाए जाने की आवश्यकता है। हाँ, सच है, परन्तु उनकी यह हठीली अकड़ तो ठीक इसके विपरीत दिखाती है। क्योंकि जो इस प्रकार बोलते हैं वे चाहते हैं कि उनकी चापलूसी की जाए। और यद्यपि वे सब बुराई में गले तक डूबे हैं, तौभी वे अपनी छिली हुई पीठ को सहलाया जाना सहन नहीं करेंगे, वरन चाहते हैं कि लोग उनकी ओर से आँखें मूँद लें और उनकी दुष्टता को छिपा लें। परन्तु यदि उनके दोष उनके सामने रखे जाएँ, तो वे तुरन्त सुसमाचार के विरुद्ध कुढ़ने लगते हैं, और जहाँ पहले वे उत्साह का कुछ अच्छा चिह्न दिखाते थे, वहाँ बाद में ऐसा द्वेष प्रकट करते हैं कि मनुष्य देख ले कि उनके हृदय में विष और कड़वाहट के सिवाय कुछ न था।
यह इस बात का निश्चित चिह्न है कि ऐसे लोग कभी नहीं जान पाए कि परमेश्वर की पाठशाला में उन्नति करना क्या होता है, कम से कम शुद्ध रीति से, जैसा कि सन्त पौलुस दूसरे स्थान पर कहता है। वह कहता है कि परमेश्वर का वचन न केवल सिखाने के लिए लाभदायक है, कि हम जानें कि हमारे हित में क्या है और भले-बुरे में भेद कर सकें, वरन ताड़ना देने और सुधारने के लिए भी है। क्योंकि बहुत से आलसी लोग हैं जिन्हें एड़ी की कठोर चोटों से आगे बढ़ाए जाने की आवश्यकता है; कुछ को उनके घमण्ड के कारण वश में लाना आवश्यक है, और कुछ ऐसे हैं जो प्रबल हाथ से दबाए बिना बिलकुल सुधार से बाहर हो जाते हैं।
इस प्रकार तुम देखते हो कि जब हमारा प्रभु ऐसी कठोरता से काम ले, तब हम सब को धीरज से सहना चाहिए, और यह मानना चाहिए कि यह हमारे बड़े हित के लिए है। तौभी हम में से हर एक अपने जीवन को भली-भाँति जाँचे, और हम में कोई ऐसा नहीं मिलेगा जो परमेश्वर को अपने प्रति ऐसी तीक्ष्णता बरतने के लिए न उकसाता हो; जैसे कोई पिता चाहे जितना भी कोमल हृदय का हो जितना चाहा जा सकता है, फिर भी यदि उसके बच्चे उद्दण्ड हों, और रूखे तथा हठीले हों, तो वह इस प्रकार भड़क उठता है कि मानो अपना स्वभाव ही बदल लेता है, क्योंकि वह नहीं जानता कि उनके साथ कहाँ से आरम्भ करे, और एक प्रकार से अपने आप को ही बदलने पर विवश हो जाता है। हमारा भी यही हाल है। क्योंकि हमारा एक ऐसा पिता है जो भलाई में मनुष्यों के बीच दिखने वाली सब बातों से बढ़कर है; परन्तु हम अपनी ओर से (जैसा मैंने पहले कहा) जैसा हमें करना चाहिए उसके आगे आज्ञाकारिता से झुकने के बजाय, और जैसे ही वह केवल वचन कहे वैसे ही उसकी आज्ञा के अनुसार चलने को तैयार होकर अपने आप को प्रस्तुत करने के बजाय, भटकने के सिवाय और कुछ नहीं करते। हमारी अभिलाषाएँ सदा बेलगाम और उबलती रहती हैं, हमारे उत्तर सदा गढ़े-गढ़ाए तैयार रहते हैं; और यद्यपि हमारा मुँह नहीं बोलता, तौभी प्रकट होता है कि हमारे हृदयों में ऐसी शान्ति नहीं कि जैसा हमें करना चाहिए वैसे परमेश्वर के आगे झुकने में सन्तुष्ट रहें।
इसलिए जब अनुभव से हम मुँह पर दोषी ठहराए जाते हैं कि परमेश्वर को हमारे प्रति इतना कठोर और तीखा होना पड़ा, तो आओ, जो कुछ वह हमारे कल्याण के लिए उचित जानता है, उसे करने दें। और निःसन्देह गलातियों के कान भी हमारे समान सीधे-सादे थे और वे भी हमारे समान उत्सुकता से सुननेवाले थे; तौभी उनकी कृतघ्नता के कारण उन्हें इतनी तीखी डाँट सुननी पड़ी। जहाँ तक सन्त पौलुस का सम्बन्ध है, हम जानते हैं कि उसने पूरी दीनता और नम्रता से उन सब को, जो उसकी प्रेरिताई को सौंपे और ठहराए गए थे, हमारे प्रभु यीशु मसीह की आज्ञाकारिता में खींचने का यत्न किया। वह अपने आप की तुलना (और बिना कारण नहीं) एक धाय से करता है, जो अपने पाले हुए बच्चे को सहती है और अपने प्रेम को दिखाने में कुछ भी उठा नहीं रखती। हम आगे देखेंगे कि वह कहेगा, "तुम मेरे समान हो जाओ, क्योंकि मैं तुम्हारे समान हूँ। मैं और कुछ नहीं चाहता, केवल यह कि अपने आप को तुम्हारे अनुरूप ढालूँ, और ऐसा करूँ कि हम सब एक मन हो जाएँ।" फिर भी आवश्यकता ने उसे विवश किया कि वह वैसे चिल्ला उठे जैसा तुम अब सुनते हो, "हे निर्बुद्धियो, हे मूर्खो, हे पशुओं के समान विवेकहीन और बुद्धिहीन लोगो, किसने तुम्हें इस प्रकार मोह लिया है? क्या अवश्य ही तुम पर शैतान का वश नहीं चला है?" ये बहुत कठोर शब्द हैं, और निःसन्देह गलातियों को पहली दृष्टि में इनसे दुःख हुआ होगा। तौभी उनके लिए यह समझना उचित था कि सन्त पौलुस ने बिना कारण इस प्रकार की बोली और भाषा का प्रयोग नहीं किया।
इसलिए जब कभी हमें डाँटा जाए, तब उसके लिए अपने ही दोषों को दोष दें और अपने आप को दोषी मान लें; क्योंकि पलटकर उत्तर देने से हमें कुछ लाभ नहीं होगा। जब हम जितना हो सके वाद-विवाद कर चुकें, तो हो सकता है कि मनुष्यों के सामने अपने मुकदमे को सही ठहरा लें, परन्तु परमेश्वर के सामने हम सदा दोषी ही रहेंगे। इसके अतिरिक्त, हमें उस कारण को भली-भाँति ध्यान में रखना चाहिए जो सन्त पौलुस ने यहाँ जोड़ा है, जब वह कहता है, "यदि तुम सत्य को नहीं मानते, तो अवश्य ही तुम मोह में पड़े हो, जब कि हमारे प्रभु यीशु मसीह का मानो तुम्हारे सामने जीवित चित्र खींचा गया, वरन तुम्हारे बीच में वह क्रूस पर चढ़ाया गया।" इस प्रकार बोलकर सन्त पौलुस दिखाता है कि उसने कितने बल और प्रभाव के साथ सुसमाचार का प्रचार किया था। इसलिए वह उस शिक्षा की जो वह लाया था, एक चित्र से तुलना करता है; और फिर उसे और भी बढ़ाकर कहता है कि जो बात उसने गलातियों के बीच प्रचार की, उसका उतना ही प्रभाव होना चाहिए था मानो उन्होंने परमेश्वर के पुत्र को अपने बीच क्रूस पर चढ़ाया जाते और उनके प्राणों के आत्मिक धोए जाने के लिए उसका लहू बहाया जाते देखा हो। क्योंकि जब उन्हें इतनी विश्वासयोग्यता से सिखाया गया था, तो वे अपने पीछे हटने के लिए और कोई बहाना नहीं बना सकते थे। परन्तु सबसे पहले हम यहाँ देखते हैं कि सुसमाचार प्रचार करने की सच्ची रीति कौन सी है: अर्थात् हमारे प्रति परमेश्वर के प्रेम का ज्ञान देना, कि उसने अपने एकलौते पुत्र को भी न रख छोड़ा, वरन उसे हमारे लिए मृत्यु के हवाले कर दिया; जैसा कि वास्तव में बुद्धि और ज्ञान के सारे भण्डार हमारे प्रभु यीशु मसीह में छिपे हैं, जैसा कि कुलुस्सियों को लिखी पत्री में दूसरे स्थान पर कहा गया है। जब ऐसा है, तो यदि हम सुसमाचार में भली-भाँति उन्नति करना चाहते हैं, तो आओ उस अनुग्रह को पहचानना सीखें जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमारे लिए मोल लिया गया है; क्योंकि उसके बिना हमारे पास जो कुछ है वह कुछ भी नहीं। बहुत से लोग डींग मारेंगे कि वे परमेश्वर के वचन में अच्छे पढ़े-लिखे हैं; परन्तु यह जानने की सच्ची परख कि ऐसा है या नहीं, यह है कि हम समझें कि हमें कितनी बड़ी आवश्यकता है कि परमेश्वर अपनी दया हम पर उंडेले, कि हमें नरक के गड्ढे से निकालकर हमारी सहायता करे, और इस पर यह निष्कर्ष निकालें कि हम अपने किसी भी दाग से शुद्ध और धोए नहीं जा सकते, केवल परमेश्वर के पुत्र के लहू से; और न धार्मिकता पा सकते हैं, केवल उस आज्ञाकारिता के द्वारा जो उसने पूरी की; और न हमारे लिए कोई प्रायश्चित हो सकता है, केवल उस बलिदान से जो उसने चढ़ाया; और न परमेश्वर की कृपा में आ सकते हैं, केवल उसके द्वारा; और न उसे पुकारने के लिए अपना मुँह खोल सकते हैं, केवल उसकी मध्यस्थता से।
इसलिए जब हमें परमेश्वर के पुत्र के द्वारा हमारे लिए लाए गए अनुग्रहपूर्ण लाभों का पूरा निश्चय हो जाए, तभी हम कह सकते हैं कि हमें सुसमाचार की कुछ समझ है; इसके बिना हमारे पास कल्पना और मूर्खता के सिवाय कुछ नहीं। इसे एक बात के रूप में ध्यान रखो। और इसके साथ यह भी ध्यान रखें कि हमारे लिए यह जान लेना ही काफी नहीं कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमें इतने भारी मूल्य से मोल लिया है; वरन हमें सुसमाचार की शिक्षा में तब तक बने रहना चाहिए जब तक वह हमारे हृदयों में भली-भाँति अंकित न हो जाए, मानो उसका लहू बह निकला हो, कि उसका फल हमारे उपयोग के लिए लगाया जाए: और यह इसलिए कि हमें हमारी ऊँघ से जगाया जाए। क्योंकि हम बहुत से ऐसे लोगों को देखेंगे जो अपने आप को बड़े पण्डित समझते हैं, यदि वे सुसमाचार के तीन-चार शब्द एक नज़र में समझ लें।
और फिर भी वह शीघ्र ही मिट जाएगा और भुला दिया जाएगा, क्योंकि जहाँ हमें उन लाभों से भरपूर होने का यत्न करना चाहिए जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमारे लिए लाए हैं, वहाँ वे उनके केवल एक स्वाद से सन्तुष्ट हो जाते हैं। तब परमेश्वर ऐसे लोगों की कृतघ्नता और उसकी भलाई के तिरस्कार को दण्ड देता है। और इसलिए हमारे लिए और भी अधिक आवश्यक है कि हम पूर्वोक्त शिक्षा में भली-भाँति स्थिर होने के लिए अपना सारा यत्न लगाएँ, अर्थात् यह जानने में कि परमेश्वर के पुत्र की मृत्यु और दुःखभोग, और वे अनमोल लाभ जो हमें मिले हैं, हमारे किस काम आते हैं। फिर दूसरी ओर हमें चेतावनी मिलती है कि परमेश्वर के सामने हमारे पाप घोर हैं, यदि उसकी इच्छा सिखाए जाने के बाद हम फिर पीछे मुड़ जाएँ और अज्ञानता से नहीं, वरन तिरस्कार और हठ से पाप करें। क्योंकि यदि हम उसका जूआ उतार फेंकते हैं, तो यह पक्का प्रमाण है कि हम उसके अधीन होने से कतराते हैं और जंगली पशु बन जाते हैं। यह सच है कि संसार के सबसे अज्ञानी लोग भी अपनी ही पापमयता से दोषी ठहराए जाते हैं, क्योंकि कपट सब मनुष्यों में राज्य करता है; परन्तु फिर भी यदि उनके बीच, जिन्होंने सत्य का एक शब्द भी कभी नहीं सुना, और हमारे बीच, जिनके कान उससे पीटे जाते हैं और जिन्हें परमेश्वर के पास आने के लिए बिना अन्त और बिना रुके उकसाया जाता है, तुलना की जाए, तो हम उनसे कहीं अधिक दोषी हैं।
देखो, तुर्क मानते हैं कि वे उस परमेश्वर की उपासना करते हैं जिसने आकाश और पृथ्वी को बनाया; तौभी क्योंकि वे हमारे प्रभु यीशु मसीह को अस्वीकार करते हैं, उनके पास केवल एक मूर्ति है। पोप-पंथी भी अपनी मूर्खतापूर्ण भक्ति में धोखा खाए हुए हैं। फिर भी वे परमेश्वर के सामने रत्ती भर कम दोषी नहीं। परन्तु इससे क्या? यदि हम, जो उद्धार का मार्ग जानते हैं, जो परमेश्वर का शब्द अपने कानों में निरन्तर गूँजता सुनते हैं, जो धार्मिकता के सूर्य अर्थात् हमारे प्रभु यीशु मसीह से प्रकाशित हैं, यदि हम (मैं कहता हूँ) निरे पशुओं के समान हो जाएँ, और भले-बुरे में भेद न करें, तो क्या अवश्य ही यह नहीं कि हम (जैसा तुम कहोगे) मोहित हैं? क्योंकि जब परमेश्वर हम पर इतना अनुग्रहकारी है कि हमारे पास आकर हमें इतनी सरलता से सिखाता है, तो निश्चय ही उसे हमारी शिकायत करने का उचित कारण है, जैसा वह करता भी है: "हे मेरी प्रजा" (वह अपने भविष्यद्वक्ता मीका के द्वारा कहता है), "जो मैंने तेरे लिए किया उससे अधिक मैं और क्या कर सकता था?" तब यदि परमेश्वर हमारे विरुद्ध वाद करता है, और उन सब साधनों का दोष हम पर लगाता है जो उसने हमें दिए कि हमें पूरी तरह अपना बना ले, कि वह बिना विरोध के हमें अपना कर सके; और हम अपनी ओर से उसके मार्ग में रोक डालें, और उसका जूआ लेने के लिए अपनी गर्दनें झुकाना नहीं चाहें, या फिर चंचल मन के होकर आज या कल सब कुछ फिर छोड़ दें, और निश्चित सत्य से मार्गदर्शन पाने के बजाय शैतान की चालाकियों और भ्रमों से बहकाया जाना अधिक पसन्द करें, तो क्या अवश्य ही यह नहीं कि हम राक्षसों के समान हैं, अर्थात् ऐसे लोग जो प्रकृति से खुला विद्रोह करते हैं?
इसलिए आओ, यहाँ अपने आप को और भली-भाँति देखना सीखें; क्योंकि जो बात कभी गलातियों से कही गई थी, वही आज भी हम से कही जाती है। क्योंकि सन्त पौलुस ने केवल उस जाति के लिए नहीं लिखा, वरन पवित्र आत्मा आज भी हमें जगाता है और बताता है कि यदि हमने एक बार सुसमाचार की शिक्षा ग्रहण की और फिर उससे हट गए, ऐसे कि कोई हमारा पीछा करे तो हम में विश्वास की न कोई दृढ़ता पाए न स्थिरता, तो हम और भी अधिक दण्ड के योग्य हैं और किसी बात से अपना बचाव नहीं कर सकते; क्योंकि जब हम संसार भर की ओट ले चुकेंगे, तब भी ऐसी दुष्टता के दोषी ठहरे रहेंगे कि अन्त में हमारा मुँह अवश्य बन्द किया जाएगा, और परमेश्वर हमें सारी कृतघ्नता के उदाहरण के रूप में खड़ा करेगा, यहाँ तक कि हम मनुष्यों और स्वर्गदूतों दोनों की दृष्टि में घृणित हो जाएँगे, क्योंकि हमने उद्धार की शिक्षा को, जो ऐसा बहुमूल्य बीज है जैसा हम देखते हैं कि पवित्रशास्त्र उसके विषय में कहता है, कुछ अच्छा न समझा।
तुम देखते हो, तब, कि जो बात हमें ध्यान में रखनी है वह यह नहीं कि केवल गलातियों को ही यहाँ सन्त पौलुस डाँटता है, वरन यह कि हम उनके व्यक्तियों में यह सिखाए जाते हैं कि जब परमेश्वर हम पर इतना अनुग्रहकारी हुआ कि हमें अपने पास बुलाया और हमें दिखाया कि उसकी इच्छा क्या है, तब हम भय और श्रद्धा के साथ चलें। और वह ऐसे तीखे और कठोर शब्द व्यर्थ ही नहीं बोलता कि उन्हें मूर्ख और बुद्धिहीन कहे, और इसलिए यह कहे, "किसने तुम्हें मोह लिया है?" परन्तु हम सुनते हैं कि इफिसियों के चौथे अध्याय में सुसमाचार के उपयोग के विषय में वह कहता है कि जब हमें एक बार वह सिखाया जा चुका, तो हमें उन नन्हे बच्चों के समान नहीं होना चाहिए जिन्हें इधर-उधर हाँका जाता है और जिन्हें यह विश्वास दिलाया जाता है कि कौवा सफेद है; वरन हमें उसमें ऐसा स्थिर होना चाहिए कि चाहे शैतान कितने ही उपद्रव, झूठे विचार और झूठ उठाए, तौभी हम अपनी जगह डटे रहें और अपनी चाल चलते रहें, और अपने आप को निश्चय दिलाएँ कि परमेश्वर का सत्य अचूक है। इस प्रकार तुम देखते हो कि जिस उद्देश्य के लिए सुसमाचार को हमारे काम आना चाहिए वह केवल यह नहीं कि हमें दिखाए कि हमारे लिए क्या भला है, वरन यह भी कि हमें सब आक्रमणों और शैतान की सब चालों के विरुद्ध शस्त्र पहनाए और सुरक्षित करे, ताकि यदि कोई विधर्म या अन्य बिगाड़ उठे, तो हम फिर भी साहस के साथ लड़ाई जारी रखें, और अपने विश्वास से ऊपरी हाथ पाएँ, और फिर कभी चिड़ीमार के फन्दे में बाँसुरी बजाकर न फँसाए जाएँ, उस उपमा के अनुसार जो सन्त पौलुस प्रयोग करता है।
तो अब, जब ऐसा है, तो अवश्य ही हम मोहित और शैतान के वश में हैं, यदि ऐसा उपाय हमारे लिए पर्याप्त नहीं होता, जब परमेश्वर ने अपने आप को हम पर प्रकट कर दिया है, और हम (हाँ, पूरी तरह और निश्चय के साथ) जानते हैं कि वही बोलता है। यदि उसके अधिकार से हम प्रभावित नहीं होते, तो फिर क्या होगा? फिर, जब हमारा प्रभु यीशु मसीह दोपहर के प्रकाश के समान हम पर चमक रहा है, तो क्या अवश्य ही नहीं कि हम प्रकृति से विद्रोह में हैं, जैसा मैंने पहले कहा, यदि हम यहाँ-वहाँ पगडण्डियाँ खोजते हैं जबकि सीधा मार्ग हमारी आँखों के सामने रखा है?
इसलिए सन्त पौलुस का उस जाति से इतना कठोरता से बोलना व्यर्थ नहीं, जिसने शिक्षा को बदल डाला, जबकि परमेश्वर ने उन्हें यह अनुग्रह दिया था कि उनके सामने उसका सत्य प्रकट किया जाए। परन्तु हमें यह भी स्मरण करना चाहिए कि परमेश्वर ने प्राचीन काल में अपने लोगों को अपने भविष्यद्वक्ता यिर्मयाह के द्वारा कैसे उलाहना दिया। वह कहता है, "समुद्र पार जाओ, और द्वीपों में, और दूर देशों में जाओ, और तुम देखोगे कि हर जाति अपनी ही मूर्तियों की पूजा बिना बदले करती है। तो फिर तुम क्यों इतने चंचल हो? उन्हें तो पता नहीं कि वे किस आधार पर टिके हैं। उनकी बस एक निश्चित धारणा है जो उन्हें बहा ले जाती और धोखा देती है; तौभी वे बिना मुड़े उस पर डटे रहते हैं और पूरी तरह उसी से लगे रहते हैं; तो फिर तुम, जो जानते हो कि तुम किस परमेश्वर की आज्ञा मानते हो, क्यों इतने अस्थिर हो?"
इसलिए अब हम भली-भाँति ध्यान दें कि यदि हम सुसमाचार की शिक्षा से सहज ही मोड़े और धकेल दिए जाते हैं, तो अन्तिम दिन हमारे विरुद्ध किसी और गवाह की आवश्यकता नहीं होगी, सिवाय उन अभागे अविश्वासियों के जो अपने अन्धविश्वासों के पीछे चलते हैं; क्योंकि हम देखते हैं कि वे उनसे बँधे हुए हैं। तुर्कों और अन्यजातियों को देखो, यहूदियों और पोप-पंथियों को देखो। वे नहीं जानते कि वे किस परमेश्वर की उपासना करते हैं; उनके पास विश्वास के स्थान पर केवल एक अनुमान है; फिर भी कोई मनुष्य उन्हें उनकी झूठी कल्पनाओं से छुड़ा नहीं सकता, और वे उनमें ऐसे लगे हैं कि कोई उन्हें कभी हटा नहीं सकता। तब यदि हम अपनी ओर से, यह जानते हुए कि वही जीवित परमेश्वर है जो हमें प्रतिदिन बुलाता और सिखाता है, और जो बात मनुष्यों के द्वारा कही जाती है वह उसी से और उसके पवित्र आत्मा से आती है, और व्यवस्था और सुसमाचार की साक्षी रखते हुए जो कभी विफल नहीं हो सकती, यदि हम (मैं कहता हूँ) अपने विश्वास के लिए ऐसा विश्राम का आधार रखते हुए भी बाद में अस्थिर हों, ऐसे कि हमारे कान हर नई वस्तु सुनने को खुजलाएँ, और लोग हमारा मन हाथ पलटने से भी कम समय में बदल दें, तो इसका और क्या अर्थ है सिवाय इसके कि हम जान-बूझकर परमेश्वर के अनुग्रह को ठुकराते हैं, मानो उसके विरुद्ध द्वार बन्द कर देते हों कि वह हमारे पास न आ सके?
या फिर, यदि एक बार यह जान लेने के बाद कि वह अपने सुसमाचार में हमें ऐसा अनमोल लाभ देता है, हम उसे नीचे फेंककर पाँवों तले रौंद डालें, तो क्या हम सोचते हैं कि परमेश्वर अपने अनुग्रह का इतना हल्का मूल्य आँका जाना और उसका उपहास होना सहन करेगा? नहीं। क्योंकि हम सुसमाचार की शिक्षा को तुच्छ जानकर परमेश्वर के पुत्र के उस लहू को अपवित्र किए बिना नहीं रह सकते, जो उसने हमारे छुटकारे के लिए बहाया; क्योंकि एक को दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। जब कभी और जितनी बार परमेश्वर हम से बोलता है, और हमारे पापों की क्षमा हमें देता है, और अपने आप को हम पर दया करके ग्रहण करने को तैयार दिखाता है, उतनी ही बार हमारे प्रभु यीशु मसीह का लहू हम पर छिड़का जाता है। संसार भर की शिक्षा हमें कुछ लाभ नहीं पहुँचा सकती, जब तक हमारा प्रभु यीशु मसीह उसके साथ न हो, कि अपने लहू के बहाए जाने को हम पर लागू करे। और यदि हम सुसमाचार की शिक्षा को तुच्छ जानते हैं, तो यह ठीक वैसा ही है मानो हम परमेश्वर के पुत्र के पवित्र लहू पर थूकते हों, जो असह्य विश्वासघात है। इसलिए आओ, अपने आप को ध्यान से देखें, और इस पाठ को भली-भाँति तौलें, ताकि हम दृढ़ बने रहें; और क्योंकि परमेश्वर ने हमें इतने बड़े उपकार के लिए बुलाया है, और अब हम जानते हैं कि सुसमाचार संयोग से प्रचार नहीं किया गया, वरन इसलिए कि परमेश्वर की इच्छा थी कि अपनी भलाई के असीम धन को हमारे प्रति प्रकट करे; तो आओ, उसमें स्थिर रहें, और उससे ऐसे लगे रहें कि कोई बात हमें उससे हटा न सके, और न किसी रीति से हमें कभी हिला सके।
सार यह है कि इस पाठ से हमें क्या लेकर जाना है। इसके अतिरिक्त हमें यह चेतावनी भी मिलती है कि वे सच्चे चित्र या तस्वीरें कौन सी हैं जो हमें परमेश्वर तक पहुँचाएँ। पोप-पंथी कहते हैं कि हमें सिखाने के लिए स्मारक होने चाहिए, और मूर्तियाँ उन अनपढ़ों की पुस्तकें हैं जो ऊँची शिक्षा को समझने के योग्य नहीं: परन्तु क्या सन्त पौलुस ने यहाँ केवल तीन-चार लोगों से कहा है? नहीं: वह सामान्य रूप से, और बिना किसी अपवाद के सब मसीहियों से, क्या बड़े क्या छोटे, कहता है कि जब सुसमाचार प्रचार किया जाता है, तब यीशु मसीह का जीवित चित्र खींचा जाता है, और हमें उसे अपने शरीर की भौतिक आँखों से नहीं, वरन अपने विश्वास की आत्मिक आँखों से देखना है। तब जब ऐसा है, तो आओ सीखें कि हमें यह सिखाने के लिए कि हमारे उद्धार के लिए क्या आवश्यक है, मूर्तियों और पुतलों की आवश्यकता नहीं, और न हमें परमेश्वर का स्मरण दिलाने के लिए लकड़ी, पत्थर या ऐसे ही तुच्छ पदार्थ का एक टुकड़ा चाहिए (क्योंकि उन सब वस्तुओं में व्यर्थता और झूठ के सिवाय कुछ नहीं); परन्तु हमें इसकी आवश्यकता है कि परमेश्वर का वचन प्रचार किया जाए, और हम उसे अपने लिए सुपरिचित बनाने का यत्न और परिश्रम करें, कि हम वहाँ परमेश्वर को उसकी जीवित प्रतिमा में अर्थात् उसके एकलौते पुत्र हमारे प्रभु यीशु मसीह के व्यक्तित्व में देखें; जैसा कि सन्त पौलुस कुरिन्थियों की दूसरी पत्री में कहता है, जहाँ वह गवाही देता है कि जो शिक्षा वह उनके पास लाया वह अविश्वासियों को छोड़ किसी से छिपी नहीं थी, अर्थात् उनसे जो नाश होते हैं, जिन पर शैतान का अधिकार है, और जिनकी आँखें बन्द कर दी गई हैं। और आश्चर्य नहीं कि वे खुले प्रकाश में भी रत्ती भर नहीं देखते। परन्तु इसी बीच शिक्षा हमारे सामने इतनी प्रकट है कि हम परमेश्वर की इच्छा को सहज ही समझ सकते हैं। क्योंकि जितनी बार सुसमाचार प्रचार किया जाता है, वह उसे हमारे सामने काफ़ी सरलता से दिखाता है, इतना कि हमें इधर-उधर बहुत दौड़ने की, या दूर के चक्कर लगाने की आवश्यकता नहीं: हमें अब यह कहने की आवश्यकता नहीं कि कौन बादलों के ऊपर चढ़ेगा? कौन समुद्र पार जाएगा? कौन गहिराव में उतरेगा? क्या हमारे पास परमेश्वर का वचन है? कम से कम क्या हमारे पास वह शुद्ध रीति से प्रचारित है? तब यीशु मसीह मानो हमारे बीच में है, और अपने आप को मानो क्रूस पर टँगा हुआ दिखाता है, इस बात की गवाही देता हुआ कि जब उसने मृत्यु सही कि हमें परमेश्वर अपने पिता से मिलाए, तब उसने हमारे लिए क्या किया। वहाँ वह हमारे सामने एक निश्चित और अटल प्रतिज्ञा-पत्र रखता है, और हम उसी से सन्तुष्ट रहें। क्योंकि हम कितनी ही दलीलें दे लें, उससे हमारा बचाव नहीं होगा: हमारा मुकदमा सदा हमारे विरुद्ध जाएगा, यदि हम अपने विवेक में पूरी तरह निश्चिन्त नहीं कि हमने पूरी तरह परमेश्वर के वचन का सहारा लिया है, जो (जैसा मैंने कहा) हमें परमेश्वर के इतने निकट ले आता है कि वही वह एकता है जो हमें उसके साथ हमारे प्रभु यीशु मसीह के व्यक्तित्व में प्राप्त है।
और सचमुच, हम देखते हैं कि परमेश्वर मानो हमारी मोटी बुद्धि और दुर्बलता के आगे झुक जाता है। क्या वह ऐसी ऊँची और गूढ़ शैली में बोलता है कि हम कुछ समझ ही न सकें? नहीं; वरन इसके विपरीत वह अपने आप को नीचा करता है, और केवल बोल देना ही पर्याप्त नहीं समझता, वरन अपने वचन के साथ संस्कार भी जोड़ता है, जो वे सच्चे चित्र हैं जो हमारे पास होने चाहिए। जैसे जब हम बपतिस्मा का जल देखते हैं, तो वह एक चित्र है जो हमें दिखाता है कि जब तक हम धोए न जाएँ तब तक हम मैल और अशुद्धता से भरे हैं: और किसके द्वारा? हमें अपना धोया जाना ऊपर से खोजना है। इसके अतिरिक्त वह हमें दिखाता है कि हमें परमेश्वर के पवित्र आत्मा के द्वारा नया किया जाना है। तो यह एक अच्छा चित्र है। और क्यों? क्योंकि उस पर परमेश्वर की छाप है, और वह उसके वचन के साथ जुड़ा है। प्रभु-भोज के विषय में भी यही कहना चाहिए। जब हम रोटी के टुकड़े और दाखरस की बूँदें देखते हैं। ठीक है, वे वे सृजी हुई वस्तुएँ हैं जिनसे हम अपने शरीरों के लिए पोषण और आहार लेते आए हैं: परन्तु वही हमें अपने प्राणों के जीवन तक पहुँचाती हैं, और हमें समझाती हैं कि हमारे पास जीवन नहीं है, सिवाय हमारे प्रभु यीशु मसीह में। और दाखरस के जोड़े जाने का कारण यह दिखाना है कि उसमें ऐसा सामर्थ्य है कि जिन वस्तुओं की हमें घटी है उनका कोई भाग हमें कहीं और खोजने की आवश्यकता नहीं; वरन वह हमारे लिए भोजन और पेय और सब कुछ है। ये (मैं कहता हूँ) वे अच्छी मूर्तियाँ, अर्थात् प्रतिमाएँ, हैं जो परमेश्वर ने हमारे सामने रखी हैं: और अब यदि हम फिर भी हवा में उड़ते और अपनी ही अभिलाषाओं के पीछे भटकते हैं, यह कहते हुए कि मैं तो और चाहूँगा, तो यह हमें दिए गए अनुग्रह का तिरस्कार है। इसलिए हमारे लिए और भी अधिक आवश्यक है कि इस अंश को भली-भाँति ध्यान में रखें, जहाँ सन्त पौलुस परमेश्वर की सामर्थ्य से और उसके नाम से, वरन पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से गरजकर, उन सब को दोषी ठहराता है जिन्हें विश्वासयोग्यता से सुसमाचार सिखाया गया था और जो बाद में उससे मुड़कर खिसक जाते हैं। और इस पर वह यह जोड़ता है कि वह चाहता है कि यह जाना जाए कि पवित्र आत्मा किस रीति से पाया जाता है। क्योंकि यदि उन्होंने पवित्र आत्मा को व्यवस्था के कामों से पाया होता, तो सन्त पौलुस मान लेता कि उससे कुछ धार्मिकता मिल सकती है। परन्तु क्योंकि उन्होंने उसे सुसमाचार के द्वारा पाया, इसलिए यही निष्कर्ष निकालना आवश्यक है कि उन्हें उस गवाही पर टिके रहना चाहिए था जो परमेश्वर ने उन्हें इतने स्पष्ट रूप से दी। और जो बात वह यहाँ कहना चाहता था उसे अच्छी तरह समझने के लिए यह ध्यान रखें कि परमेश्वर का आत्मा सब विश्वासियों को सामान्य रूप से दिया जाता है, क्योंकि वे नया जन्म पाकर नई सृष्टि बन गए हैं। इसके अतिरिक्त आत्मिक वरदान भी हैं, जो परमेश्वर उस नाप और अंश के अनुसार बाँटता है जो वह उचित समझता है; परन्तु वे सब कलीसिया के सामान्य हित के लिए होते हैं।
यदि हम मसीही हैं, तो अवश्य ही हम में परमेश्वर का आत्मा होना चाहिए, जैसा हम आगे देखेंगे। क्योंकि वह बयाने की राशि कहलाता है, और उस मीरास की मुहर जिसकी हमसे प्रतिज्ञा की गई है और जिसकी हम बाट जोहते हैं। इस प्रकार तुम देखते हो कि यदि हम उसकी सन्तान हैं, तो परमेश्वर का आत्मा हम में वास करना चाहिए। परन्तु इसके अतिरिक्त अनुग्रह के वरदान भी हैं: जैसे, प्राचीन काल में भाषाओं का वरदान, भविष्यवाणी का वरदान, चंगाई का वरदान, और ऐसे ही अन्य वरदान थे। और आज भी परमेश्वर भली-भाँति दिखाता है कि उसने अपनी कलीसिया को पूरी तरह नहीं त्यागा। क्योंकि यद्यपि दिखाई देनेवाले वरदान अब वैसे नहीं रहे जैसे तब थे, तौभी हम अब भी देख सकते हैं कि परमेश्वर किसी न किसी रीति से अपना कार्य हमारे बीच प्रकट करता है।
इसके अतिरिक्त, सन्त पौलुस यहाँ सब मनुष्यों से कहता है। और इसलिए (उसके सामान्य और साधारण अर्थ के अनुसार) हम इस शब्द "आत्मा" को उस नवीनीकरण के अर्थ में लेंगे जो परमेश्वर अपनी सन्तान में करता है, जैसा कि सन्त यूहन्ना के तीसरे अध्याय में कहा गया है। क्योंकि जब हम शरीर से जन्मे हैं, तो हम में पूरी भ्रष्टता के सिवाय कुछ नहीं, और हम सदा पृथ्वी की ओर ही झुकते हैं। निःसन्देह मनुष्य अपनी बुद्धि पर घमण्ड करते हैं, और यह भी सोचते हैं कि भले को लेने और बुरे को छोड़ने के लिए उनकी अपनी स्वतन्त्र चुनाव-शक्ति और इच्छा है, परन्तु ये केवल स्वप्न हैं। क्योंकि यह निश्चित है कि जब तक हमें अपने ही स्वभाव पर छोड़ दिया जाए, तब तक हम सदा बुराई की ओर झुकते हैं, और पवित्रशास्त्र भी हमें इस पर दोषी ठहराता है, यह कहकर कि मनुष्य के मन में कोई विचार नहीं उठता जो दुष्ट न हो, और हमारी सारी भावनाएँ परमेश्वर की शत्रु और विद्रोही हैं। इसलिए आओ, अब और व्यर्थ की चापलूसियों से अपने आप को न बहकाएँ, वरन मान लें कि हम आदम में पूरी रीति से बिगड़ गए हैं, ऐसे कि हम में पापमयता के सिवाय कुछ नहीं।
तौभी परमेश्वर उस बुराई का उपाय करता है, जब वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें मर्म तक छूता है, और हमारे हृदयों को ऐसा शुद्ध करता है कि हम उसकी आज्ञा मानना चाहें; और यद्यपि हम उतने सिद्ध नहीं जितना आवश्यक है, तौभी हम अपने आप से लड़ते हैं और भलाई की ओर बढ़ते जाते हैं। और निश्चय ही जब परमेश्वर का आत्मा हमारे लिए लगाम के समान है जो हमें उसकी आज्ञाकारिता में रोके रखता है, तो यह निश्चित चिह्न है कि परमेश्वर हम में वास करता है, और हमें अपने झुण्ड के समान चलाता है, और हमें अपनी सन्तान मानता है। क्योंकि हम इस गवाही के बिना मसीही नहीं गिने जा सकते कि परमेश्वर अपने आप को हमारा पिता होने की प्रतिज्ञा देता है, और उसका पवित्र आत्मा उसकी मुहर के समान है, जैसा मैं इफिसियों के पहले अध्याय से सन्त पौलुस की गवाही पहले ही बता चुका हूँ।
और अब वह कहता है कि गलातियों ने परमेश्वर का आत्मा सुसमाचार के प्रचार के द्वारा पाया था। तब जब ऐसा है, तो यह निष्कर्ष निकलना ही था कि व्यवस्था के काम उन्हें धर्मी नहीं ठहरा सकते। और क्यों? क्योंकि हमें सदा उस सिद्धान्त पर लौटना है जिसकी हम चर्चा कर चुके, अर्थात् यह कि सुसमाचार में हमारी वह सारी भलाई और गुण छीन लिए जाते हैं जो हम अपने में समझते थे, और परमेश्वर हमें ऐसी लज्जा देता है कि हमें उसके पास पूरी तरह घबराए हुए होकर ही आना पड़ता है। क्योंकि यद्यपि परमेश्वर हमारी शापित दशा को व्यवस्था में हमारे सामने रखता है, तौभी हम उसे वहाँ उतनी अच्छी तरह नहीं देखते जितना सुसमाचार में। और हम देखते हैं कि कपटी लोग सदा अपनी चापलूसी करते रहते हैं, और समझते हैं कि जो उन्हें आज्ञा दी गई है उसे पूरा करते हैं। परन्तु सुसमाचार में दो बातें हैं। क्योंकि परमेश्वर दिखाता है कि हम में दरिद्रता के सिवाय कुछ नहीं, ऐसे कि हमें उसके अनुग्रह की भीख माँगने आना पड़ता है, अपनी तुच्छता को पूरी तरह मानते हुए, कि हमने बुरा किया है, और हम में प्रशंसा के योग्य गुण की एक चिनगारी भी नहीं।
तो अब, जब ऐसा है, तो सन्त पौलुस हमें यहाँ बिना कारण नहीं बताता कि जो सुसमाचार के प्रचार से परमेश्वर का आत्मा पाते हैं, उन्हें अपनी योग्यताओं पर सब भरोसे से रहित होना और अपने सारे उद्धार के लिए पूरी तरह परमेश्वर की केवल और निःशुल्क दया का ऋणी मानना चाहिए। और ऐसा क्यों? क्योंकि ये ऐसी बातें हैं जो आग और पानी से अधिक आपस में नहीं मिल सकतीं, कि हम सुसमाचार से भी धर्मी ठहरें और व्यवस्था से भी धर्मी ठहरें। तो फिर? क्या सुसमाचार व्यवस्था के विरुद्ध है? नहीं: क्योंकि (जैसा मैं पहले बता चुका हूँ) परमेश्वर एक का भी कर्ता है और दूसरे का भी, और उसमें कोई विरोधी कार्य नहीं; परन्तु यहाँ प्रश्न हमारे उद्धार के विषय का है।
परमेश्वर ने मनुष्यों को अपनी व्यवस्था इसलिए दी कि उन्हें भली रीति से जीने का मार्ग दिखाए, और उसके द्वारा उन्हें ऐसे दण्ड की स्थिति में लाने का अभिप्राय रखा, मानो वह उनके विरुद्ध अभियोग लगाए और उनकी गर्दनों में फन्दा डाले: क्योंकि सचमुच व्यवस्था में हम अपने ऊपर मुँह फाड़े हुए नरक के सिवाय कुछ नहीं देखते, कि परमेश्वर का प्रतिशोध पहले से हमारा सामना करने को तैयार है, और वह हमारे शत्रु के रूप में हमारे विरुद्ध सशस्त्र है। यही वे बातें हैं जो व्यवस्था हमारे सामने रखती है।
परन्तु अब सुसमाचार हमें उपाय के रूप में दिया गया है, ताकि जब हम ऐसे निराश हों, तो उस अनुग्रह की ओर भागें जो हमारे प्रभु यीशु मसीह में हमें दिया जाता है, और समझें कि हमारा भला करने का और कोई मार्ग नहीं सिवाय हमारे पापों की क्षमा के, जिसके द्वारा परमेश्वर हमारे अपराधों को ऐसा दूर करता और मिटा देता है कि वे उसके सामने फिर गिनती में नहीं आते। तब जिसमें हमारी धार्मिकता है वह यह है कि वह हम में जो बुराई है उसका बोझ अब हम पर नहीं डालता। और यद्यपि हम देखते हैं कि परमेश्वर का अभिप्राय और निश्चय व्यवस्था में भी और सुसमाचार में भी ऐसा ही है, तौभी हम निश्चित हैं कि उसमें कोई विरोध नहीं।
इसके अतिरिक्त, यदि हम सुसमाचार से धर्मी नहीं ठहरते, तो हम व्यवस्था से उद्धार कैसे पा सकते हैं? यह सच है कि व्यवस्था हमें सुसमाचार तक पहुँचाने की तैयारी है: क्योंकि जब तक मनुष्य अभिमान से फूले रहते हैं, तब तक परमेश्वर के अनुग्रह का उनमें प्रवेश नहीं हो सकता। यदि कोई बर्तन हवा से भरा हो, तो मनुष्य उसमें जो चाहे द्रव डालने का यत्न करे, वह उसे नहीं डाल पाएगा, क्योंकि हवा उसे लौटा देती है और भीतर डाले जाने में बाधा बनती है। और हम इसे मनुष्य की देह में भी समझ सकते हैं: क्योंकि ऊँची बातों तक पहुँचने के लिए हमें संसारी वस्तुओं की उपमाएँ लेनी पड़ती हैं। यदि कोई भूखा हो, और फिर भी उसका पेट ऐसा फूला हो कि वह कुछ भी सह न सके, तो वह भरा हुआ तो हो सकता है; परन्तु इससे क्या? सब कुछ हवा ही है; इस सब के बावजूद उसके भीतर पोषण नहीं बढ़ा, वरन हवा किसी भी अच्छे आहार को भीतर आने से रोकती है जो उसे पोषित करे और बनाए रखे। हमारे भीतर की मूर्खतापूर्ण धृष्टता का भी यही हाल है। हम अपने आप को मनाते हैं कि जिन सब वस्तुओं की हमें आवश्यकता है उनसे हम भली-भाँति सम्पन्न हैं; परन्तु हम चाहे कैसे भी हों, यह केवल हवा है, और वह हवा परमेश्वर के अनुग्रह को भीतर आने से रोक देती है।
परन्तु सुसमाचार के द्वारा हमारा प्रभु हमें नीचा करता है और हमारी दयनीय दशा दिखाता है। और इसलिए हमारे लिए आवश्यक है कि हम उसके पास इस विचार के साथ आएँ कि हमारा प्रभु यीशु मसीह वहाँ हमारे सामने रखा गया है, ताकि हम यह देखकर कि हम में भलाई की एक बूँद भी नहीं, उसे उसी में खोजें, हाँ, सारी की सारी, टुकड़ों में नहीं। इस प्रकार तुम देखते हो कि सन्त पौलुस क्यों तर्क करता है कि जब हमने परमेश्वर का आत्मा सुसमाचार के माध्यम से पाया है, तो हमें उसी से लगे रहना चाहिए, और न व्यवस्था की रीतियों में, न किसी और वस्तु में, एक में या दूसरे में, जाना चाहिए, वरन उस सिद्धता से सन्तुष्ट रहना चाहिए, क्योंकि वह हमें दी गई है और हम बिना विरोध के उसका आनन्द ले सकते हैं।
क्योंकि यद्यपि यह बात गलातियों को लिखी गई थी, तौभी यह आज हम सब के लिए भी उनके समान ही सामान्य है। आओ ध्यान दें (मैं कहता हूँ) कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हम में कैसे कार्य किया। और सबसे पहले हम उसका अभ्यास करें जो कुरिन्थियों की दूसरी पत्री में हमें दिखाया गया है: अर्थात् यह कि हमें पूरी तरह फिर से नया ढाला जाना और परमेश्वर का आत्मा हम में वास करना आवश्यक है। इसलिए वह सच्चा चिह्न जिससे हम पहचान सकते हैं कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं या नहीं, परमेश्वर का आत्मा है। परन्तु क्या हम उस आत्मा को अपनी माता के गर्भ से अपने साथ लाते हैं? हाय, नहीं। और न वह हमारी अपनी योग्यताओं से रत्ती भर भी आता है, जैसा मैं तुम्हें पहले बता चुका हूँ: वरन इसलिए कि परमेश्वर की अपनी अनुग्रहकारी भलाई से उसे हमें देना उसे भाया, कि इस प्रकार हमें अपनी ओर खींचे।
यदि हम में अपने परमेश्वर के भय में चलने की कोई इच्छा या तत्परता है, या यदि हम शुद्ध विवेक के साथ उसे पुकारने के योग्य होना चाहते हैं, तो यह चिह्न है कि परमेश्वर का आत्मा हम में वास करता है। हमें कोई और गवाह खोजने की, या इस विषय की और लम्बी छानबीन करने की आवश्यकता नहीं। परन्तु अब, क्या हमने इस आत्मा को अपनी योग्यताओं से पाया और प्राप्त किया है? निश्चय ही नहीं। तब हमें अवश्य यह निष्कर्ष निकालना होगा कि जब हमारे पास वह दान के रूप में है, तो वह हमें सुसमाचार के माध्यम से दिया गया। क्योंकि सुसमाचार में परमेश्वर मनुष्यों के उद्धार के लिए अपनी पराक्रमी सामर्थ्य और कार्य प्रकट करता है, जैसा रोमियों के पहले अध्याय में कहा गया है। अब यदि सुसमाचार वह साधन है जिसके द्वारा हम परमेश्वर का आत्मा पाते हैं, तो क्या हम दूसरे साधन खोजने जाएँगे?
क्या यह उस सामर्थ्य का इनकार करना न होगा जो हम पर स्पष्ट रूप से प्रकट है? यह ठीक वैसा ही है मानो हम जान-बूझकर उस मार्ग को छोड़ दें जो हमारे परमेश्वर ने हमें दिखाया, कि अपनी ही कल्पना के अनुसार पगडण्डियाँ खोजें। और यदि गलातियों के पास सुसमाचार से व्यवस्था की ओर मुड़ने के लिए कोई बहाना न था, तो आज हम क्या ठहरेंगे, यदि हम उन अन्धविश्वासों में उलझे रहना चाहें जो मनुष्यों ने अपनी ही दुकानों में गढ़े हैं?
उदाहरण के लिए, पोप-पंथी समझते हैं कि वे उन रीतियों से नहीं जो परमेश्वर ने प्राचीन काल में आज्ञा दी थीं, वरन उन सनकों और तुच्छ खिलौनों से धर्मी ठहरते हैं जो उन्होंने स्वयं रचे हैं। क्योंकि जिसे वे आजकल परमेश्वर की सेवा कहते हैं, वह एक खिचड़ी के सिवाय और क्या है जिसमें हर मनुष्य ने अपना अपना टुकड़ा और कतरा डाल दिया है? जब ऐसी बात है, तो क्या यह परमेश्वर का तिरस्कार और अपने आप को उससे खींच लेना नहीं, उसके अनुग्रह को ठुकराकर, कि उसकी हम तक कोई पहुँच ही न रहे, जब हम सुसमाचार की शुद्धता में मनुष्यों की कल्पनाओं को मिलाना चाहते हैं?
क्या ऐसा करने में हम पागलपन से भी बुरे नहीं ठहरते? इसलिए एक ही शब्द में जान लें कि हम मसीही नहीं हो सकते जब तक पवित्र आत्मा हमें ऐसी दीनता में न रखे कि हम मान लें कि हमारा सारा कल्याण परमेश्वर के केवल अनुग्रह से आता है, और हम अपने प्रभु यीशु मसीह से ऐसे लगे रहें कि उसे केवल अपने भरोसे का एक टुकड़ा या अंश न मानें, वरन उससे पूरी तरह सन्तुष्ट हों, कि हमने उसकी परिपूर्णता में से लिया है, और अपने आप को निश्चय दिलाएँ कि वही न केवल सारी बुद्धि की, वरन सारी धार्मिकता और सुख की भी पूर्ण सिद्धता है, और उसी में हमारा सारा कल्याण निहित और स्थित है, जिस कल्याण को हम तब पाते हैं जब हमारे पास सुसमाचार और विश्वास का प्रचार होता है, और जब हम अपनी दृष्टि में गिरा दिए जाते हैं, और सारी धृष्टता से पूरी तरह रहित हो जाते हैं, जो हमें परमेश्वर के पास आने से रोके रखती है।
इसके अतिरिक्त, आओ हम इतने मगन हो जाएँ, क्योंकि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमारे उद्धार के लिए जो कुछ आवश्यक था वह सब हमें इतनी उदारता से दिया है। मैं कहता हूँ कि हम उससे इतने मगन हों कि और सब वस्तुएँ जो हमारे सामने रखी जा सकती हैं, हमारे लिए धुएँ के समान हों, और हम उन्हें पूरी तरह तुच्छ जानें और उनसे घृणा करें, यह दिखाने के लिए कि हमने सुसमाचार में कितनी उन्नति की है, और साथ ही अपने भीतर ऐसे दृढ़ और अटल रहें कि शैतान हमारे कान में जो कुछ भी फुसफुसाए, हम कभी मार्ग से न हटाए जाएँ।
और इसके अतिरिक्त, क्योंकि हम इतने दुर्बल, स्थूल और भारी हैं कि यद्यपि परमेश्वर प्रतिदिन हम में से हर एक को अपने पास आने के लिए उकसाता है, तौभी हम मानो लँगड़ाते और रेंगते हुए ही आते हैं: तो आओ अपने आप को और अधिक विवश करें कि परमेश्वर से बिनती करें कि वह अपने पवित्र आत्मा से हमें दृढ़ करे, और अपने सुसमाचार के ज्ञान में हमें अधिकाधिक उन्नति करवाए। और हम वैसा न करें जैसा वे करते हैं जो कल्पना करते हैं कि वे पहले ही दिन पूर्ण सिद्धता तक पहुँच गए हैं, वरन स्वर्गीय जीवन की आशा में अधिकाधिक आगे बढ़ने का यत्न करें, और ऐसा बल इकट्ठा करें कि हमारा विश्वास दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाए, जब तक हम उस धन्य पड़ाव तक न पहुँचें जिसकी चर्चा सन्त पौलुस इफिसियों के चौथे अध्याय में करता है: अर्थात् यह कि हम पूरी तरह अपने प्रभु यीशु मसीह से लगे रहें।
अब आओ, अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने गिरें, अपने दोषों को मानते हुए, उससे प्रार्थना करते हुए कि वह हमें उन्हें अधिकाधिक अनुभव कराए, कि वही हमें उनसे अप्रसन्न भी करे और उसके हाथ से उनकी क्षमा माँगने को भी प्रेरित करे, कि इस रीति से हमारे द्वारा उसकी महिमा हो, और हम उसके पवित्र आत्मा से ऐसे दृढ़ किए जाएँ कि हमें सन्देह न रहे कि वह हम में वास करता है, और जैसे उसने एक बार हमें अपनी सन्तान के रूप में गोद ले लिया, वैसे ही वह हमें सदा वैसा ही मानता रहेगा। और इस प्रकार हम सब कहें, सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता। इत्यादि।
