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बीसवाँ उपदेश, जो तीसरे अध्याय पर छठा भी है — गलातियों 3:15-18
बीसवाँ उपदेश,
जो तीसरे अध्याय पर छठा भी है।
15 हे भाइयो, मैं मनुष्यों की रीति पर कहता हूँ। चाहे वह मनुष्य ही की वसीयत क्यों न हो, फिर भी जब वह पक्की हो जाती है, तो न कोई उसे टालता है और न उसमें कुछ बढ़ाता है।
16 अब प्रतिज्ञाएँ अब्राहम और उसके वंश से कही गईं। वह यह नहीं कहता, "वंशों से," जैसे बहुतों के विषय में कहा जाता है, परन्तु जैसे एक के विषय में, "और तेरे वंश को," जो मसीह है।
17 मेरा कहना यह है कि जो वाचा परमेश्वर ने पहले से मसीह में पक्की की थी, उसको व्यवस्था, जो चार सौ तीस वर्ष के बाद आई, न तो रद्द कर सकती है और न प्रतिज्ञा को व्यर्थ ठहरा सकती है।
18 क्योंकि यदि विरासत व्यवस्था से मिलती है, तो फिर प्रतिज्ञा से नहीं मिलती; परन्तु परमेश्वर ने उसे अब्राहम को प्रतिज्ञा के द्वारा दिया।
यह हमारे लिए बड़ी लज्जा की बात होगी, यदि परमेश्वर का हमारे बीच नश्वर प्राणियों से अधिक अधिकार न माना जाए। क्योंकि उसकी महिमा की और मनुष्यों की दशा की, जो मिटती हुई छाया मात्र हैं, क्या तुलना हो सकती है? तो भी मनुष्यों में यह साधारण बात है कि वे अपने आपको परमेश्वर से बढ़कर मानें; और यह ऐसी घिनौनी बात है कि यदि सूर्य को नरक के अन्धकार के बराबर ठहराया जाए, तो भी इतना बड़ा उलट-फेर न होगा जितना कि मनुष्यों को उसके ऊपर चढ़ा देना, जिसका सारा आदर है। परन्तु बात जैसी भी हो, यह वह दोष है (जैसा मैंने कहा) जो सदा से संसार में राज्य करता आया है और आज भी बहुत अधिक कर रहा है। क्योंकि देखो, जो कुछ मनुष्य कहता है, उसका तुरन्त विश्वास कर लिया जाता है; और यदि लोग अपनी इच्छा से ऐसा करने में आनाकानी भी करें, तब भी जो बातें व्यवस्था द्वारा मान्य हैं, उन सब में उन्हें विवश होकर उससे बँधे रहना ही पड़ता है।
देखो, परमेश्वर बोलता है, और वह भी भली-भाँति ठोस रीति से, यहाँ तक कि उसने अपने वचन को साख और निश्चय देने वाली कोई बात छोड़ी नहीं; तो भी हम सदा डाँवाडोल रहते हैं, नहीं तो उसके विरुद्ध सीधे तर्क करने लगते हैं। तब क्या यह अनिवार्य नहीं कि हम बुद्धि खो बैठे हैं, जब हम इस प्रकार परमेश्वर के अधिकार को घटाते हैं और उस पर, जिसने केवल अपने वचन से आकाश और पृथ्वी दोनों को बनाया और उसी से सब कुछ को थामे रखता है, सृजे हुओं से भी कम विश्वास करते हैं? इसी कारण सन्त पौलुस इस पद में यह भूमिका बाँधता है: "मैं मनुष्यों की रीति पर कहता हूँ।" क्योंकि यदि वह केवल इतना ही कहता: "यहाँ नीचे वाचाएँ बिना टूटे और बिना रद्द हुए निभाई जाती हैं, इसलिए परमेश्वर की प्रतिज्ञा अवश्य सदा बनी रहेगी," तो यह बात सच तो होती, परन्तु उसने परमेश्वर की महिमा के विषय में अति ठण्डेपन से कहा होता, क्योंकि उसने उसे इस प्रकार पृथ्वी के प्राणियों की पंक्ति में खड़ा कर दिया होता। परन्तु जब वह कहता है कि वह मनुष्यों की रीति पर कहता है, तो मानो वह यह कह रहा है कि वह ऐसी शैली और बोली नहीं बरतता जो परमेश्वर की महिमा की चर्चा करने के योग्य हो। क्योंकि जब परमेश्वर का तेज उपस्थित होता है, तब सूर्य और चन्द्रमा दोनों को अपनी चमक छोड़ देनी चाहिए। सब कुछ अवश्य ही धुँधला पड़ जाएगा; तो फिर उनका क्या होगा जो पृथ्वी पर रेंगनेवाली मक्खियों और मेंढकों के समान हैं?
क्योंकि मनुष्य अपनी रंगी-पुती म्यान को चाहे कितना ही बड़ा समझें, फिर भी परमेश्वर के सामने वे शून्य से भी कम मूल्य के हैं।
अब जब हम यह सुनते हैं, तो हमें और भी संयमी होना चाहिए कि हम कोई उत्तर-प्रत्युत्तर न करें, परन्तु पूरी श्रद्धा के साथ इस बात को भला जानकर ग्रहण करें जो हमें यहाँ बताई जा रही है: अर्थात् यदि परमेश्वर ने उन्हें, जो उस प्रतिज्ञा को ग्रहण करते हैं जो उन्हें सुनाई जाती है, अपने उद्धार का पूरा निश्चय देने की कृपा की है, तो हमें उसके विरुद्ध तर्क करने का साहस नहीं करना चाहिए। क्योंकि जब मनुष्यों के बीच कोई दस्तावेज़ पारित हो जाता है और अभिलेख में दर्ज हो जाता है, तो वह मान्य होता और अच्छे प्रमाण के रूप में चलता है; तब क्या किया जाएगा जब परमेश्वर ने अपना पवित्र मुख खोलकर हमारे प्रति अपनी भली इच्छा की गवाही दी हो? क्या मनुष्यों के बीच कोई ऐसी गम्भीर विधि है जो परमेश्वर की महिमा के निकट भी आती हो, जो चाहता है कि हम उसी पर डटे रहें जो उसने कहा और प्रकट किया है? यह सच है (जैसा मैं पहले छू चुका हूँ) कि हमें उस दुष्टता से लड़ना चाहिए जो हमारे भीतर जमी हुई है, ताकि हम परमेश्वर पर विश्वास करें; क्योंकि हम अविश्वास की ओर ऐसे झुके हुए हैं कि जो बातें परमेश्वर ने कही हैं, उनमें से एक भी हमारे हृदयों में कभी न बैठेगी, जब तक कि हम उस दोष से न लड़ें जिसमें हम इतनी बुरी तरह उलझे हैं।
इसलिए जब हममें से हर एक परमेश्वर के वचन में सिखाया जाने आता है, तो उसे जाँचना चाहिए कि उसके अपने भीतर क्या है; और जब वह देखे कि वह अब भी बहुत से अविश्वासों और सन्देहों के अधीन है, तो उसे इससे अप्रसन्न होना और परमेश्वर से प्रार्थना करना चाहिए कि वह उसकी सारी इन्द्रियों को इस प्रकार मर्म तक छू ले कि वह उस बात पर, जो वह [उसके हाथ से] सुनता है, पूरी तरह विश्राम पाए; जैसा कि पवित्र आत्मा का कार्य भी है कि वह हमारे हृदयों में उस सत्य पर मुहर लगाए जो अपने आप में तो पर्याप्त निश्चित है, परन्तु हमारे लिए तब तक निश्चित नहीं होता जब तक ऊपर से हमें उसका निश्चय न कराया जाए। क्योंकि यदि हम अपनी ही प्रेरणा से परमेश्वर पर विश्वास करने की ओर झुके होते, तो पवित्र आत्मा को इस विषय में कार्य करने की आवश्यकता न होती।
परन्तु कहा गया है कि वही वह मुहर है जिससे परमेश्वर हमें चिह्नित करता है, और जिसके द्वारा वह उन बातों को हमारे हृदयों में छापता और खोदता है जो अन्यथा कभी ग्रहण न की जातीं। हाँ, और हमें यह भी भली-भाँति ध्यान देना चाहिए कि सन्त पौलुस यहाँ दो शब्द रखता है, अर्थात् जो बात मनुष्यों के बीच वैध और क्रमबद्ध रीति से प्रमाणित हो चुकी है, उसे न कोई घटाता या रद्द करता है, और न उसमें कुछ बढ़ाता है। क्योंकि यद्यपि हम सदा पूरे विद्रोही नहीं होते, तो भी हमारी बुद्धि परमेश्वर के वचन में कुछ जोड़ने और टीका-टिप्पणी करने को खुजलाती रहती है, और हम उस सादगी में बने रहना सह नहीं सकते जो वहाँ निहित है।
तब यदि हम अपने आपको बिना चापलूसी के भली-भाँति जाँचें, तो हममें से हर एक अपने भीतर दो दोष पाएगा। एक यह कि जब परमेश्वर ने हमसे बात की है, तब भी हम पूरे मन से सहमत होकर बिना चूके "आमीन" कहने, या उसकी प्रतिज्ञाओं को ग्रहण करने, या उसकी चेतावनियों से प्रभावित होने के लिए तैयार नहीं होते। मनुष्य सदा बहाने ढूँढ़ेंगे, और इसका उदाहरण हमें दूर खोजने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि (जैसा मैंने कहा) हम अपने ही भीतर इसका अनुभव करते हैं। दूसरा यह कि यद्यपि हम परमेश्वर को उसका उचित आदर यह मानकर देते हैं कि उसका वचन सच्चा और अचूक है, तो भी हम उसमें सदा कुछ न कुछ जोड़ते रहना चाहेंगे; और यह हम पोपतन्त्र में बहुत अधिक देखते हैं। परमेश्वर की सेवा में जो गड़बड़ी और भूल-भुलैया हम देखते हैं, तरीक़ों की यह बड़ी संख्या और विविधता, और अनेक कुरीतियों और झूठों का यह बड़ा भण्डार, इन सबका कारण इसके सिवा और क्या है कि मनुष्यों ने उन बातों को नहीं माना जो परमेश्वर उन्हें दिखाता है, वरन अपनी ही बुद्धि से उपजी बातों के जोड़ और गड्डमड्ड मिश्रण बना डाले?
पोपवादी लोग परमेश्वर की सेवा करने के लिए किस रीति से प्रयत्न करते हैं? हर एक की अपनी निजी भक्ति है, और उसके साथ अनगिनत खिलौने-से आडम्बर। उनका कहना है कि कलीसिया ने सब कुछ आज्ञा दिया है; परन्तु जो कुछ भी हो, वह सब मनुष्य की गढ़ी हुई बात है। और यह कैसी बात है? क्या परमेश्वर ने पहले से नहीं देख लिया था कि उसे क्या भाएगा? वह हमें बताता है कि व्यवस्था में हमारे पास सारी सिद्धता है, और वह नहीं चाहता कि हम कोई और नियम मानें। फिर वह यह भी कहता है कि वह संसार के सब बलिदानों से बढ़कर आज्ञाकारिता को पसन्द करेगा। उसकी इच्छा है कि मनुष्यों को भय में रखे, ताकि वे अपने मन और कल्पना की कोई बात मिलाने का साहस न करें।
परन्तु यदि परमेश्वर ने ऐसा कह भी दिया हो, तो क्या? फिर भी मनुष्य उसे दबा देंगे कि यह और वह अच्छा होगा, और जितना उसने ठहराया था उससे सौ गुना और जोड़ना चाहेंगे। हाँ, और (जो इससे भी बुरा है) जिस बात की वह सबसे कड़ाई से माँग करता है, उसकी वे हँसी उड़ाते हैं, और इस बीच मूर्खतापूर्ण खिलौनों और तुच्छ कूड़े-करकट की बड़ाई करते हैं, जो उसके सामने न केवल किसी मूल्य के नहीं, वरन घृणित भी हैं, क्योंकि जो कुछ मनुष्य इस प्रकार उसे चिढ़ाने के लिए उस पर थोपते हैं, उस सब को वह अस्वीकार करता है।
अब इससे हम देखते हैं कि मनुष्य अपनी ही रुचि के अनुसार परमेश्वर की सेवा करने के लिए अपने आपको आगे बढ़ाने में सदा कितने उतावले और ढीठ रहे हैं; तथापि यह तो सारे पवित्रशास्त्र को बिगाड़ना ही था। क्योंकि देखो, परमेश्वर हमें बताता है कि वह मुख्य बलिदान जो वह हमसे चाहता है, यह है कि हम उसके पास आएँ और उस रीति से अपनी विनतियाँ चढ़ाएँ जो उसने हमारे लिए ठहराई है कि हम उसके निकट परिचितों की भाँति और निडर होकर आ सकें, अर्थात् हमारे प्रभु यीशु मसीह को अपना वकील बनाकर: मनुष्य चाहते हैं कि हम मरे हुए सन्तों से प्रार्थना करें, और उन्हें अपना संरक्षक और वकील बनाएँ कि जब हम उसकी कृपा खोजने चलें तो वे परमेश्वर और हमारे बीच बिचवई हों। उनकी शेष सारी शिक्षा के विषय में भी यही कहना है। परमेश्वर ने हमें आज्ञा दी है कि हम एक दूसरे के लिए प्रार्थना करें; और वे कहते हैं कि हमें उन अभागी आत्माओं के लिए प्रार्थना करनी चाहिए जो शोधन-स्थान में हैं। और यह सब आज्ञा किसने दी? मनुष्यों ने कल्पना कर ली कि ऐसा होना चाहिए, और उनकी कल्पना के अनुसार वैसा ही होना पड़ेगा। देखो, उनका दुस्साहस कैसा है।
परमेश्वर ने अपनी प्रतिज्ञाओं का निश्चय दिलाने के लिए अपने संस्कार हमारे लिए ठहराए हैं, और वह चाहता है कि वे बढ़कर मुहरों के समान हों, ताकि हमारी दुर्बलता को और अच्छी सहायता मिले। हमारे पास बपतिस्मा है, जिसके द्वारा परमेश्वर हमें जताता है कि हम उसके एकलौते पुत्र के बहाए हुए लहू से हमारे सब दागों से धोए और शुद्ध किए गए हैं, और इसके साथ वह हमें अपनी देह के अंग जानकर ग्रहण करता है और अपनी कलीसिया में ले आता है। अब पोपवादी लोग इस सादगी से सन्तुष्ट नहीं हैं, वरन थूक, और मोमबत्ती की रोशनी, और अन्य ऐसे खिलौने-से आडम्बर चाहते हैं जिनका सोचना भी अरुचिकर है। और ऐसी बढ़ोतरियाँ कहाँ से आती हैं, सिवाय इस शैतानी ढिठाई के, कि जब परमेश्वर ने वह सब कुछ ठहरा दिया था जो प्रयोजन के लिए उचित और योग्य था, और ऐसे कि किसी बात में कोई दोष न था, तब भी मनुष्यों का मन उसे भला जानकर ग्रहण करने को न माना, वरन (जैसा मैंने पहले कहा) ऐसी अति उत्सुकता और उद्दण्डता से भड़क उठे कि उन्हें जोड़ते, मिलाते, बदलते, गूँथते और अन्त और सीमा के बिना उथल-पुथल मचाते ही रहना पड़ा।
इसलिए हमारे लिए और भी आवश्यक है कि हम उसे दृढ़ता से थामे रहें जो परमेश्वर हमें सन्त पौलुस के द्वारा दिखाता है: अर्थात् इसलिए कि परमेश्वर ने अपने वचन को प्रमाणित कर दिया है, मनुष्यों के लिए उसमें कुछ जोड़ना उचित नहीं, वरन हमारी सारी बुद्धि इसी में है कि हम उसके साथ मिल जाएँ और जो कुछ उसके मुख से निकलता है उसे बिना छानबीन के ग्रहण करें। और यदि यह उस प्रतिज्ञा के विषय में सच ठहरता है जो अब्राहम से की गई थी, तो और भी उचित है कि हम आजकल उसी नम्रता को बनाए रखें, क्योंकि सुसमाचार में हमें कहीं अधिक पूर्ण शिक्षा मिली है।
सच है कि आजकल हमें जो बात सुनाई जाती है उसका सार उससे भिन्न नहीं जो अब्राहम ने परमेश्वर के अपने मुख से सुना। परन्तु जो भी हो, अब हमारे पास सिखाने की कहीं अधिक परिचित रीति है, क्योंकि हमारे प्रभु यीशु मसीह, जो धार्मिकता का दिन-सूर्य है, हम पर प्रकट हो गया है। तब जबकि यदि हम कान लगाना चाहें तो हमारे लिए कोई कठिनाई नहीं, तो क्या यह असह्य विश्वासघात नहीं कि हमारी लालसाएँ फिर भी कुछ न कुछ जोड़ने को खुजलाती रहें? हम चाहे जैसे भी हों, आओ हम सीखें कि जो कुछ परमेश्वर ने हमें सिखाया है, उसी में बने रहें। क्योंकि इस विषय में हमें ऐसी नम्रता के साथ ही चलना चाहिए, क्योंकि यदि हम उस नियम से तनिक भी इधर-उधर हटें, तो तुरन्त शैतान के फन्दों में पड़ जाते हैं, और सब प्रकार की गड़बड़ी की ओर इधर या उधर घसीट ले जाए जाने को तैयार हो जाते हैं।
परन्तु हम भली-भाँति सावधान हो जाएँ; और जब सन्त पौलुस यहाँ कहता है कि व्यवस्था उस प्रतिज्ञा को, जो पहले की गई थी, तनिक भी रद्द नहीं कर सकती, तो आजकल हमारा क्या होगा यदि हम मनुष्यों के मूर्ख सिरों की गढ़ी हुई बातों से सुसमाचार की शुद्धता को बाधा पहुँचाना चाहें, ऐसे कि यह पहचाना न जा सके कि परमेश्वर या उसके सृजे हुए, इनमें स्वामी कौन अधिक है? इस प्रकार तुम देखते हो कि हमें किस बात से भय में रहना चाहिए, कि हम अपनी सीमा न लाँघें, वरन हमारा विश्वास सदा पूर्णतः परमेश्वर के अकेले वचन से ही चलाया और निर्देशित किया जाए, और जो कुछ मनुष्य जोड़े उसे हम ठुकरा दें।
और सार रूप में यही बात है जो हमें यहाँ से ग्रहण करनी है। अब जो सन्त पौलुस कहता है कि वाचा व्यवस्था से चार सौ वर्ष पहले परमेश्वर की ओर से यीशु मसीह के प्रति स्थापित की गई थी, उसमें हम वही बात देखते हैं जो मैंने आज सवेरे छुई थी: अर्थात् जब परमेश्वर ने अपने आपको पिता प्रकट किया, चाहे अब्राहम के प्रति, चाहे नूह के प्रति, या किसी और के प्रति, तो वह हमारे प्रभु यीशु मसीह के माध्यम के बिना नहीं था। क्योंकि परमेश्वर और मनुष्य के बीच मानो एक प्राणघातक बैर है, इस कारण कि वे आदि पाप से बिगड़ गए हैं, यहाँ तक कि यदि परमेश्वर हमें हमारी स्वाभाविक दशा में छोड़ दे, तो निश्चय ही हमारे सब विचार शापित हैं, हमारे सब मनोभाव टेढ़े, हठीले और अड़ियलपन से भरे हैं, और हमारी सारी बुद्धि दोषों से कलंकित है, यहाँ तक कि सिर की चोटी से पाँव के तलवे तक हममें एक भी स्थान स्वस्थ और निर्मल नहीं।
क्योंकि जब हम परमेश्वर के और उसकी इच्छा के इतने विपरीत हैं, तो अनिवार्य है कि हम उसके शत्रु हों, क्योंकि वह अपने से भिन्न नहीं हो सकता। तब यदि परमेश्वर हमारा शत्रु है, तो हम उसके पास आकर उसके हाथ से किसी कृपा या अनुग्रह की आशा नहीं कर सकते, जब तक कि यीशु मसीह हमें फिर मिलाने का माध्यम न हो। इस प्रकार तुम देखते हो कि सब युगों के पुरखों ने परमेश्वर का प्रचार मध्यस्थ की अगुवाई के बिना नहीं किया। और इसी कारण सन्त पौलुस इस पद में कहता है कि वाचा यीशु मसीह के प्रति बाँधी गई थी।
सच है कि यीशु मसीह को उन प्रतिज्ञाओं में से किसी की आवश्यकता न थी जो प्राचीन काल के पुरखों से की गईं और परमेश्वर की ओर से आज तक हमारे प्रति जारी हैं, तो भी उसने उन्हें कलीसिया के सिर के रूप में ग्रहण किया। इस प्रकार हम देखते हैं कि परमेश्वर की दृष्टि केवल अब्राहम पर, या उस योग्यता पर जो उसमें थी, नहीं थी, वरन अब्राहम कलीसिया का एक अंग था, जिसका सिर यीशु मसीह सदा रहा है।
और जब परमेश्वर ने दाऊद को राजा चुना और उससे कहा कि उसका सिंहासन तब तक बना रहेगा जब तक आकाश में सूर्य और चन्द्रमा हैं, तो वह दाऊद की अपनी किसी योग्यता के कारण नहीं था, परन्तु यह सब हमारे प्रभु यीशु मसीह को ध्यान में रखकर किया गया। और वैसे ही आज, जब परमेश्वर हमें बताता है कि यदि हम उसे खोजें तो वह हम पर कृपालु होगा, हाँ, और यह कि वह चाहता है कि हम निडर होकर उसके पास आएँ, तो वह इस कारण से और किसी बात के लिए नहीं, सिवाय इसके कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमें अपनी देह का अंग होने के लिए इकट्ठा किया है।
और यह हमारे लिए दो प्रयोजनों में काम आता है। एक हमें दीनता में लाना है। क्योंकि यदि हममें से हर एक भली-भाँति देखे कि वह क्या है, तो हम परमेश्वर के शत्रु हैं। जिस कारण हमारे विरुद्ध द्वार बन्द है, ताकि हम उसके हाथ से किसी कृपा की आशा नहीं कर सकते, वरन उसे अपना न्यायी जानें और अनुभव करें, जो सदा हमारे सिरों पर गरजकर टूट पड़ने और हमें कुचल डालने को तैयार है।
इसलिए जबकि कहा गया है कि प्रतिज्ञाएँ हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह के माध्यम से दी गई हैं, हमें सिर झुका लेना और यह मान लेना चाहिए कि परमेश्वर का एकलौता पुत्र ही उसका अकेला प्रिय है, और जो कृपा हमें प्राप्त है वह केवल उसी में और उसी के कारण है। एक बात के लिए इतना ही पर्याप्त हो।
दूसरा यह कि इस दृष्टि से प्रतिज्ञाओं में और भी अधिक निश्चय है। क्योंकि यदि ऐसे क्लेश हमारे मन में आएँ कि हम अपने आप से सोचें, तू क्या है? क्या तू समझता है कि परमेश्वर तेरी ओर झुकने की कृपा करता है? तू तो पृथ्वी का कीड़ा, धूल, राख और सड़ाहट मात्र है। फिर तुझमें दोषों का समुद्र भरा है, और इसलिए जब तक वह स्वयं तुझे खोजने न आए, तब तक अपने आपको परमेश्वर की सन्तानों में से एक समझना तेरे लिए कैसा दुस्साहस होगा?
यदि हम इस प्रकार अविश्वास करने के लिए परखे जाएँ, तो आओ हम उस बात को सोचें जो इस पद में हमसे कही गई है: अर्थात् यह कि प्रतिज्ञा यीशु मसीह की ओर से की गई थी। इसलिए यद्यपि हममें सब दुर्दशा ही के सिवा कुछ नहीं, तो भी हमारे लिए इतना पर्याप्त होना चाहिए कि परमेश्वर के पुत्र में योग्यता, सामर्थ्य और धार्मिकता भरपूर है, और यह भी कि वही वह जन है जिसमें हम प्रतिज्ञाएँ पाते हैं।
अब हमें यह जानना शेष है कि हम परमेश्वर के पास किस माध्यम से आते हैं: अर्थात् प्रतिज्ञा किए हुए वंश के द्वारा, जो केवल एक ही है, जैसा सन्त पौलुस आगे कहता है। क्योंकि यदि मनुष्य हमारे प्रभु यीशु मसीह से तनिक भी फिरें, तो तुरन्त स्वर्ग के राज्य से काट दिए जाते हैं।
और यदि यह अब्राहम के शारीरिक सन्तानों के बीच के अभिमान और झूठे दुस्साहस को गिराने के लिए कहा गया था, तो हमसे क्या कहा जाए, जो उनकी तुलना में केवल अकाल जन्मे गर्भ-पात हैं, जैसा सन्त पौलुस रोमियों के दसवें अध्याय में हमें कहता है?
इसलिए हम समझ लें कि जितने लोग हमारे प्रभु यीशु मसीह से सन्तुष्ट नहीं होते, वे अपने उद्धार की सारी आशा को पूरी तरह त्याग देते हैं। क्योंकि दो या तीन नहीं, केवल एक ही मध्यस्थ है, सन्त पौलुस कहता है, जैसे यह नहीं कहा गया कि एक से अधिक वंश है।
मैं तुमसे पहले कह चुका हूँ कि बहुत से अब्राहम के वंश से निकले हैं, तो भी प्रतिज्ञा के वारिस नहीं थे। तब यदि हम यीशु मसीह के पास उसमें इकट्ठे होने को नहीं आते, तो निश्चय परमेश्वर हमें अपना नहीं मानता और हमसे कहता है कि हम उसके कुछ नहीं, और वह हमसे कोई जान-पहचान ही नहीं रखेगा।
इसलिए यद्यपि संसार भटककर इधर-उधर उछाला जाता है, जैसा हम देखते हैं कि एक ओर पोपवादियों के पास परमेश्वर तक पहुँचने के अनगिनत उपाय हैं, और वैसे ही दूसरी ओर तुर्कों और यहूदियों के पास, जिन सब ने हमारे प्रभु यीशु मसीह को पूरी तरह छोड़ दिया है, तो भी आओ हम पूरी तरह उसी पर टेक लगाएँ और अपने आपको निश्चय दिलाएँ कि यदि हम एक बार विश्वास के द्वारा उसकी देह में कलम लगा दिए गए और उसके साथ एक हो गए, तो प्रतिज्ञाएँ हमारी हैं।
ऐसा क्यों? क्योंकि वे उसे दी गईं, उसके अपने लाभ के लिए नहीं, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ (क्योंकि उसे उनकी कोई आवश्यकता न थी), परन्तु हमारे हित के लिए, ताकि हम उनके भागी बनाए जाएँ।
इस प्रकार तुम सार रूप में देखते हो कि हमें इस पद से कैसे लाभ उठाना चाहिए। परन्तु हमें उस प्राचीनता पर भी ध्यान देना है जिसकी चर्चा सन्त पौलुस यहाँ करता है, कि सुसमाचार की शिक्षा कोई नई गढ़ी हुई बात नहीं, और न ऐसी कोई बात जो पहले अज्ञात रही हो, वरन परमेश्वर अब्राहम के समय से आज तक निरन्तर हमें अपनी गोद ली हुई सन्तान होने के लिए बुलाता आया है और अपने आपको हमारा पिता प्रमाणित करता आया है।
सच है, यह तो अब्राहम के जन्म से भी पहले की बात थी; तो भी हमारे लिए इतना पर्याप्त है कि उस समय इसका ऐसा पूर्ण प्रकाशन हुआ, कि हम जानते हैं कि परमेश्वर ने तभी उन बातों को प्रकाशित करना आरम्भ किया जो आज सुसमाचार में निहित हैं, और यह कि पुरखों के लिए उद्धार तक पहुँचने का और कोई मार्ग न था सिवाय उसी के जो आज हमें दिखाया गया है।
और यह हमारे लिए अति आवश्यक है। क्योंकि बहुत से दखलन्दाज़ आजकल अनाड़ीपन से कल्पना करते हैं कि सुसमाचार का पहले कभी नाम ही नहीं सुना गया; हाँ, और परमेश्वर का तिरस्कार करनेवाले इन विधर्मी जनों में से कुछ ऐसे भी हैं जो परमेश्वर और उसके सुसमाचार के अधिकार को ग्रहण करने के बहाने कहते हैं कि यह इन सोलह सौ वर्षों के भीतर ही निकला है और संसार में इससे पहले कभी सुना नहीं गया।
क्या (वे कहते हैं)? क्या परमेश्वर ने संसार को बिलकुल ही छोड़ दिया था? मानो हम अपनी आँखों से नहीं देखते और अपनी उँगलियों से टटोलकर अनुभव नहीं कर सकते कि परमेश्वर कभी नहीं बदला, वरन जिस समय उसने अब्राहम को गोद लेना चाहा, तब हम भी उसमें सम्मिलित थे, और उद्धार का द्वार हमारे लिए खोल दिया गया, यद्यपि उसकी पूर्ति तब तक न आई जब तक पूरा समय न बीत गया, जैसा मैं आज सवेरे बता चुका हूँ, और उचित समय पर और विस्तार से बताऊँगा।
यहाँ तुम देखते हो कि सन्त पौलुस क्यों कहता है कि सुसमाचार का प्रचार एक भेद था जो जगत के आरम्भ से छिपा रखा गया था। तो भी परमेश्वर ने उसे पहले से ठहरा लिया था और उसकी यथेष्ट प्रतिज्ञा कर दी थी, जैसा हम देख चुके हैं। यहाँ तुम यह भी देखते हो कि हम अब्राहम की सन्तान क्यों कहलाते हैं।
क्योंकि हम शरीर के नाते तो उससे बिलकुल सम्बन्ध नहीं रखते। परन्तु विश्वास हमें उससे जोड़ने के लिए पर्याप्त बन्धन है। इसके अतिरिक्त हम देखते हैं कि हमारा प्रभु यीशु मसीह, जो मनुष्यों के कल्याण की प्रतिभूति है, अब हम पर प्रकट हुआ है, ताकि हमें और भी निश्चय हो कि हम उसके हैं और वह हमें अपनी देह के अंग जानकर थामे रखेगा। और इसी कारण मसीह ने कहा कि अब्राहम ने उसका दिन देखा और आनन्दित हुआ। यहूदियों ने पितृपुरुष की योग्यता का हवाला दिया: हाँ (मसीह कहता है) मानो तुम्हारा पिता अब्राहम उन बातों पर, जो उससे मेरे विषय में कही गईं, विश्राम नहीं करता था। इसलिए उसने मेरा दिन देखा, और वही बात थी जिसमें उसने अपना सारा आश्वासन पाया, यहाँ तक कि उसे उद्धार की और कोई आशा नहीं थी सिवाय उस विश्वास के जो उसे उस शिक्षा पर था जो आज सुसमाचार के द्वारा तुम्हें सुनाई जाती है। यही वह बात भी है जो भविष्यद्वक्ता मलाकी के द्वारा यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले के विषय में कही गई है, अर्थात् यह कि वह पुरखों के हृदयों और मनों को सन्तानों से जोड़ने के लिए भेजा गया था। और यह केवल यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले के व्यक्ति के विषय में ही नहीं कहा गया, वरन सुसमाचार की शिक्षा पर भी लागू होता है।
इसलिए तुम देखते हो कि हमारा प्रभु हमें जिसकी ओर बुलाता है वह यह है कि यद्यपि अब्राहम को पृथ्वी में सड़े हुए इतना समय हो गया, तो भी हम अपने आपको निश्चय दिला सकें कि हमारे लिए भरोसा रखने को और कोई प्रतिज्ञा नहीं, जब कि हम विश्वास के द्वारा उससे जुड़े हैं, और ऐसे एकमत हैं कि हम उसी मन से परमेश्वर को पुकार सकते हैं जिस मन से वह चलाया जाता था, जैसा वास्तव में उसका मन हमारे प्रभु यीशु मसीह पर लगा था। अब जब हम अब्राहम के साथ एक हैं, तो आओ हम अपने प्रभु यीशु मसीह की ओर बढ़ें, और वही हमारा लक्ष्य और हमारा दृढ़ लंगर हो, जब तक हम सब एक साथ इकट्ठे होकर स्वर्गीय राज्य में उठा न लिए जाएँ।
देखो, जब व्यवस्था से पहले की गई प्रतिज्ञा का उल्लेख होता है, तो हमें क्या विचार करना है। हाँ, और जब हम देखें कि हमारा पिता अब्राहम सदा हमारे प्रभु यीशु मसीह की बाट जोहता रहा, यद्यपि उसके जगत पर प्रकट होने में इतना लम्बा समय था, और उससे कहा गया था कि उसका वंश पराए देश में बन्दी रखा जाएगा, तो हमें दृढ़ता के लिए अत्यन्त उभारा जाना चाहिए। जब परमेश्वर ने उससे कह दिया कि सारा संसार उसके वंश में आशीष पाएगा, तब वह जोड़ता है, और फिर भी यह न समझ कि यह दो-तीन दिन में, या सौ वर्ष बाद पूरा होगा: क्योंकि तुझे स्वयं पहले मरना होगा, तुझे स्वयं पहले यहाँ से परदेश पहुँचाया जाएगा, जहाँ तेरी सन्तान पर सब प्रकार का अत्याचार और क्रूरता होगी। निश्चय जान कि मैं इसका बदला लूँगा, पर इस बीच तेरे वंश को पीड़ा सहनी होगी।
अब्राहम ने यह सब सुना: फिर व्यवस्था दिए जाने के बाद भी हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने से पहले दो हज़ार वर्ष और बीते। अब अब्राहम उस पर कभी भरोसा न कर सकता था जो उससे कहा गया था, यदि वह स्वर्गीय सामर्थ्य से सज्जित न होता, क्योंकि वह स्वयं उस भलाई का सुख न ले सकता था जो उसे दी जा रही थी, और न उसके आनेवाले बच्चे ही उसे भोग सकते थे। इस प्रकार तुम देखते हो कि तब दो हज़ार चार सौ वर्ष बीतने थे, तो भी अब्राहम को इस बात का पछतावा न हुआ कि उसने अपने पिता का घर छोड़ा था, जैसा प्रेरित इब्रानियों के ग्यारहवें अध्याय में बताता है, वरन अपनी दौड़ में लगा रहा, यद्यपि परमेश्वर उसके धीरज को पूरी सीमा तक परखना चाहता था।
कहीं अधिक उचित है कि हम आजकल जहाँ कहीं परमेश्वर हमें बुलाता है वहाँ दृढ़ता से चलते जाएँ, और जब तक महिमा के मुकुट तक न पहुँचें अपना सिर ऊँचा रखें, यद्यपि अभी वह हमसे छिपा है, और हमें ऐसी बातों पर विश्वास और आशा रखनी पड़ती है जो हमारी सारी समझ से परे हैं और जिन्हें हम देख नहीं सकते। इस प्रकार तुम देखते हो कि हमें इस पद को कैसे काम में लाना चाहिए। अब इस पर सन्त पौलुस यह निष्कर्ष निकालता है कि यदि विरासत व्यवस्था से मिलती है, तो वह विश्वास से न मिलेगी। परन्तु परमेश्वर ने अब्राहम को सब कुछ विश्वास के कारण दिया; इसलिए निष्कर्ष यह निकलता है कि जब मनुष्य परमेश्वर के हाथ से कृपा पाने का प्रयत्न करते हैं, तब व्यवस्था को अवश्य समाप्त हो जाना चाहिए, और हमारे उद्धार की प्रशंसा पूर्णतः उसी को दी जानी चाहिए।
सन्त पौलुस यहाँ विरासत की बात करते हुए दो बातें कहना चाहता है। एक यह कि जो कुछ परमेश्वर ने कभी हमसे प्रतिज्ञा की है वह उसकी अपनी निरी मुफ़्त भलाई से है: क्योंकि विरासत मज़दूरी या भाड़ा नहीं होती। यह सच है कि पिता अपने बच्चों को उनका उत्तराधिकार देते हुए भली-भाँति कह सकता है, देखो मैं तुम्हारे लिए कितना परिश्रम करता हूँ। ध्यान दो इसका क्या फल होगा। तुम्हारे बीच मेरी सम्पत्ति बँटेगी। तो भी पिता उनके साथ जैसा भी व्यवहार करे, उसका ध्यान अपने कुटुम्ब के सिवाय और किसी बात पर नहीं होता। वह उन लोगों के लिए प्रबन्ध करने में परिश्रम करता और बड़ा कष्ट उठाता है जो उससे इस प्रकार सम्बन्धित हैं। तब जब मनुष्यों के बीच उत्तराधिकार मुफ़्त दान की वस्तुएँ हैं, तो हमें परमेश्वर के हाथ से अनन्त जीवन को कमाई हुई मज़दूरी या भाड़े के रूप में नहीं लेना चाहिए। क्योंकि यह एक विरासत है। इसे दृढ़ आधार जानकर ध्यान रखो कि यहाँ मनुष्यों की सारी योग्यता निकाल दी गई है।
क्योंकि जब कोई मनुष्य अपने बच्चों को अपना वारिस बनाता है, तो उसे इसकी परवाह नहीं होती कि उन्होंने कोई बड़ा काम किया है या नहीं, या वे सुन्दर हैं या कुरूप, या वे यह हैं या वह: परन्तु उसके लिए इतना ही पर्याप्त है कि वे उसके बच्चे हैं और उसकी इच्छा उनके लिए प्रबन्ध करने की है। दूसरी बात यह कि सन्त पौलुस ऐसा कहकर हमें संकेत देता है कि हम सब के सब परमेश्वर की ओर से पूरी तरह ठुकराए हुए हैं, ऐसे कि हम (इस क्षणभंगुर जीवन में भी नहीं) कुछ भी नहीं भोग सकते, सिवाय परमेश्वर के अकेले निरे अनुग्रह के। यह सच है कि सूर्य अविश्वासियों पर भी वैसे ही चमकता है जैसे विश्वासियों पर, और सब मनुष्य उन वस्तुओं से जो परमेश्वर उन्हें देता और प्रदान करता है एक समान पोषित होते हैं; तो भी वे जैसे भी रहें, अविश्वासी किसी वस्तु के उचित अधिकारी नहीं होते। वे तो चोर हैं, और जो भलाइयाँ और धन उन्होंने परमेश्वर से पाए हैं, उन सब का हिसाब, पानी की अन्तिम बूँद तक, उन्हें देना होगा, क्योंकि वे पवित्र नहीं किए गए थे, वरन उन्होंने जितना उनसे हो सका उन्हें अशुद्ध किया, क्योंकि उन में विश्वास नहीं था, जो (जैसा सन्त पौलुस कहता है) वही है जिससे परमेश्वर की दी हुई भलाइयाँ हमारे लिए शुद्ध ठहरती हैं।
हमारे लिए उन्हें उचित रीति से बरतने का यही मार्ग है: परन्तु विश्वास हटा दो, तो अशुद्धता के सिवाय और कुछ न रहेगा। क्योंकि देखो, यदि मेरे हाथ मैले हों और मैं उनसे संसार की बहुमूल्य वस्तुओं को छूऊँ, तो वे मेरे हाथों की मैल से अशुद्ध हो जाएँगी। वैसा ही तब होता है जब हम परमेश्वर की भलाइयों का दुरुपयोग करते हैं। हममें जो अविश्वास है वह सब कुछ अशुद्ध कर देता है; और अन्त में सारी सृष्टि हमसे बदला लेने के लिए दुहाई देगी, क्योंकि यदि हमने उनको विश्वास के साथ नहीं बरता तो हमने उनका दुरुपयोग किया।
तुम देखते हो कि यदि हम परमेश्वर की सन्तान नहीं हैं तो हम कुछ भी नहीं भोग सकते। और इसी कारण सन्त पौलुस रोमियों के चौथे अध्याय में स्वर्गीय जीवन और अनन्त उद्धार को ही बताना पर्याप्त नहीं समझता, वरन जगत की विरासत का भी नाम लेता है, और कहता है कि अब्राहम जगत का वारिस बनाया गया, और वह केवल उस एक मनुष्य के लिए नहीं, वरन सब मनुष्यों के लिए सामान्य रूप से था। इसलिए जब परमेश्वर हमें गोद लेता है और हमसे कहता है कि वह हम पर कृपालु होगा, तो यह इस प्रयोजन से है कि जब तक हम यहाँ नीचे जीवित हैं, हम उसके हाथ से खिलाए जाएँ, और वह हमें भोजन देते हुए हमें उस प्रेम का, जो वह हमसे रखता है, और उस चिन्ता का, जो वह हमारी करता है, पहले से स्वाद चखाए। संक्षेप में हम परमेश्वर की पितृवत् भलाई को उसकी सारी सृष्टि में देख सकते हैं और हमें देखना भी चाहिए। क्या हम आँखें खोलकर सूर्य के प्रकाश को देखते हैं? वहाँ भी परमेश्वर हमारे प्रति अपने आपको पिता दिखाता है। जब हम खाते और अपना आहार पाते हैं, तब परमेश्वर अपना हाथ बढ़ाकर दिखाता है कि हम अपनी सन्तान की भाँति उसके द्वारा पहले ही से खिलाए जा रहे हैं। संक्षेप में सब बातों में और सब उपायों से वह हमें अपने पितृवत् प्रेम का पहले से स्वाद चखाता है, इस उद्देश्य से कि हम उन बातों में दृढ़ हों जो वह हमें सुसमाचार में दिखाता है: अर्थात् यह कि उसने अपनी गोद ली हुई सन्तान के रूप में हमारे लिए एक उत्तम विरासत रख छोड़ी है। तब सारी सृष्टि को हमें स्वर्ग की ओर निर्देशित करना चाहिए। परन्तु निश्चय हम इसके ठीक विपरीत करते हैं: क्योंकि हम परमेश्वर की सृष्टि को अपनी लालसाओं में लगाते हैं, ऐसे कि हम उनके द्वारा यहीं नीचे देखते रहते हैं। संक्षेप में, देखो परमेश्वर ने हमें अपनी ओर खींचने के लिए जितनी सहायताएँ दी हैं, उतनी ही रुकावटें हमारे पास हमें संसार में थामे रखने को हैं। क्योंकि हमें इसकी कभी चिन्ता नहीं होती कि हम परमेश्वर की सन्तान कैसे गिने जाएँगे, बस हम इस संसार में आराम से जी सकें: हमारे लिए इतना ही बहुत है। फिर भी हमारे लिए यह समझना अत्यन्त आवश्यक है कि परमेश्वर इसी संसार में अब भी अपने आपको हमारा पिता दिखाता है, और हमें जताना चाहता है कि उसे हमारी कितनी चिन्ता है, कि हम अपने आपको पूरी तरह उसी को सौंपना और उसी में विश्राम पाना सीखें।
इसलिए तुम देखते हो कि "विरासत" या "उत्तराधिकार" इस शब्द के द्वारा परमेश्वर पहले यह दिखाता है कि जो कुछ वह हमें देता है वह उसकी अपनी निरी मुफ़्त उदारता से है; और दूसरे यह कि हम ऐसे शापित हैं कि हमारा किसी वस्तु पर, पानी की एक बूँद तक पर, कोई अधिकार नहीं, जब तक परमेश्वर हमें अपना वारिस न बनाए, और यह केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के कारण ही हो सकता है। और इसलिए हमें एक बार फिर स्मरण करना चाहिए कि हम पहले देख चुके हैं कि प्रतिज्ञा यीशु मसीह से की गई थी। तब अब्राहम उसका सहारा और लंगर नहीं है। और इसी कारण हमारा प्रभु यीशु सब वस्तुओं का वारिस कहलाता है: और जो कुछ उसका निजी है, वही वह हमें, अपनी देह के अंग होने के नाते, बाँट देता है।
इसी दृष्टि से सन्त पौलुस यह भी कहता है कि जो बात भजन संहिता के आठवें भजन के सातवें पद में लिखी है, (अर्थात् यह कि वह सब वस्तुओं का प्रभु बनाया गया है) वह सबसे पहले उसी की ओर लागू होनी चाहिए। यह सच है कि उक्त पद सब मनुष्यों के विषय में कहा गया है, जैसा हम देखते हैं कि परमेश्वर ने पृथ्वी के सब पशुओं को मनुष्य के अधीन कर दिया है, ऐसे कि वे हमें भोजन देने के लिए मरने को, और हमें पहनाने और गर्म रखने को विवश हैं। फिर हम देखते हैं कि पृथ्वी हमें फल देती है। इसलिए जगत का प्रभुत्व हमें दिया गया है, तथापि यह केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के माध्यम से है। क्योंकि (जैसा मैं पहले छू चुका हूँ) यदि हम उससे अलग हो जाएँ, तो तुरन्त परमेश्वर के घर से ऐसे कट जाते हैं कि उनकी विरासत पर हमारा अधिकार संसार के दूर-से-दूर परदेशियों से अधिक नहीं रहता। परन्तु अब हम उस मुख्य बात पर आएँ जो यहाँ है। सन्त पौलुस कहता है कि यह विरासत व्यवस्था से नहीं, वरन विश्वास से मिलती है। जब वह इन दो वचनों को बरतता है और उन्हें साथ जोड़ता है, तो वे बातें सर्वथा विपरीत हैं, जैसा मैंने तुम्हें पहले बताया है। इसलिए नहीं कि व्यवस्था विश्वास के विपरीत है, परन्तु इसलिए कि परमेश्वर के सामने धर्मी ठहरना, और उसके हाथ से कृपा और दया पाना, व्यवस्था के द्वारा नहीं हो सकता। व्यवस्था इस उद्देश्य से नहीं दी गई थी, (जैसा हम अगले उपदेश में देखेंगे) वरन ठीक इसके विपरीत उद्देश्य से। इसलिए जब विरासत विश्वास से मिलती है, तो हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि हमारे कर्म कुछ नहीं कर सकते, और हमें परमेश्वर के पास एकदम खाली हाथ, कंगालों की भाँति आना पड़ता है कि उससे भरे जाने की भीख माँगें, क्योंकि हममें अपनी भलाई की एक बूँद भी नहीं। इसलिए तुम देखते हो कि सन्त पौलुस का लक्ष्य क्या है, जब वह कहता है कि विरासत विश्वास से मिलती है, व्यवस्था से नहीं, जैसा कि परमेश्वर ने उसे अब्राहम को विश्वास के कारण दिया। और ध्यान दें कि यदि हम इस संसार में आहार भी कमाने के योग्य नहीं, तो स्वर्ग के राज्य को पाने के लिए हम क्या कर सकेंगे? जब नाशमान आहार की बात चलती है, तो स्वर्गीय महिमा की तुलना में वह कुछ भी नहीं। क्योंकि कहा गया है कि हम अपने परमेश्वर की महिमा के भागी बनाए जाएँगे, और तब हम सब वस्तुओं में सब कुछ होंगे। परन्तु अभी हम रोटी का एक टुकड़ा तक कमाने के योग्य नहीं: क्योंकि विरासत विश्वास से मिलती है: अर्थात् जो कुछ परमेश्वर ने मनुष्यों से प्रतिज्ञा की है, वह सब उसकी अपनी निरी मुफ़्त भलाई से है।
तब हम स्वर्ग के राज्य को कैसे मोल ले सकते हैं? मनुष्यों का यह दावा करना कि वे अपने बल से उसमें पहुँच जाएँ, कैसा अभिमान है! क्या यह अनिवार्य नहीं कि वे किसी भयंकर उन्माद में बह गए हैं? फिर सन्त पौलुस यह कहकर कि परमेश्वर ने हमारे पिता अब्राहम को उसके विश्वास के कारण सब कुछ दिया, उस बात को और भी अच्छी तरह व्यक्त और प्रकट करता है जो मैं तुम्हें पहले बता चुका हूँ: अर्थात् यह कि मनुष्य अपने आप से कुछ भी कमाने योग्य नहीं, और उसे सब कुछ मुफ़्त दान के रूप में ही लेना पड़ता है। उसने पहले कहा था, (जैसा हम देख चुके हैं) कि प्रतिज्ञाएँ की और कही गईं; परन्तु यहाँ वह "देना" शब्द बरतता है। मानो वह यह कहे कि यहाँ पक्ष और पक्ष के बीच कोई सौदा नहीं कि मैं यह करूँगा और तुम वह करोगे: मैं बेचूँगा और तुम मोल लोगे: परन्तु परमेश्वर मुफ़्त देता है, और मनुष्य केवल पाता है। तब जब हमें परमेश्वर के पास उसे पाने आना है जो वह हमें देता है, और जिन बातों की हम उसके हाथ से आशा रखते हैं उन पर हमारा और कोई अधिकार नहीं सिवाय मुफ़्त दान के: तो आओ हम वह सारी योग्यता भूल जाएँ जो हम अपने भीतर मानते हैं, और मान लें कि हम कुछ भी नहीं हैं।
और निश्चय सन्त पौलुस एक और प्रकार की बात बरतता है जो यहाँ के अर्थ को और अच्छी तरह व्यक्त करती है: कि यदि विरासत व्यवस्था से मिलती, तो प्रतिज्ञा रद्द हो जाती, और परिणामस्वरूप विश्वास भी। इसलिए प्रतिज्ञा के निश्चित होने के लिए अनिवार्य है कि विरासत विश्वास से मिले। और मैं यह इसलिए कह रहा हूँ कि इस पद में जो कहा गया है वह अपनी संक्षिप्तता के कारण अस्पष्ट लग सकता है: अर्थात् उद्धार की विरासत, हाँ, और जो सब भलाइयाँ परमेश्वर इस संसार में हमें देता है, वे हमारे विश्वास से आनी चाहिए: अर्थात् अपना कुछ भी न लाकर, केवल परमेश्वर के मुफ़्त दान से सब कुछ पाकर। क्योंकि मान लो कि हम अपने कर्मों के अनुसार, अपनी योग्यता के अनुसार और परमेश्वर के प्रति अपनी कमाई के अनुसार पाने की आशा रखें: तो हम प्रतिज्ञाओं के विषय में निश्चित कैसे हो सकते हैं? निश्चय हम सदा डाँवाडोल लटके रहते: क्योंकि हमें बार-बार यही सोचना पड़ता, बहुत अच्छा, तूने अपना कर्तव्य कैसे निभाया? तूने क्या किया है? और इस प्रकार विश्वास पूरी तरह चूर-चूर हो जाता। परन्तु विश्वास को हमें परमेश्वर की हमारे प्रति भली इच्छा का पूरा निश्चय देना चाहिए: जो वह न कर पाता, वरन हम सदा सन्देह में लटके रहते, और वह केवल एक खोखली धारणा होती, और वह धारणा शैतान का छलावा मात्र होती। क्योंकि जो कोई सोचता है कि उसके पास अपने सामर्थ्य से कुछ है, उसे अवश्य शैतान ने मोह लिया है। इसलिए तुम देखते हो कि जब हम सोचते हैं कि परमेश्वर के हाथ से कुछ कमा लेंगे, तो यह कितनी मोटी ठट्ठेबाज़ी है। परन्तु हम जिस रीति से भी काम करें, चाहे हमारी आँखें कपट से बन्द हों और हम अपने आपको अद्भुत जन मानें: तो भी विश्वास के बिना हमारे भीतर कोई निश्चय नहीं हो सकता। क्योंकि वह एक बार हट जाए, तो तुरन्त प्रतिज्ञाएँ भूमि पर गिर पड़ती हैं: हमें उनका कोई निश्चय नहीं हो सकता। इसलिए हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि विरासत विश्वास से मिलती है, ताकि हममें और अभिमान न रहे: अर्थात् इसलिए कि हम और यह आशा न रखें कि हम अपने आप से कुछ कर सकते हैं, या कि हमें उस अनुग्रह को, जो दिया जा रहा है, लेने या ठुकराने की कोई स्वतन्त्र इच्छा है। हमें वे सब बातें भूल जानी चाहिए जो मनुष्य अपने लिए दावा करने के आदी हैं: सब कुछ पाँव तले रौंदा जाना चाहिए: हमें सब सामर्थ्य से रहित, खाली और भूखे आना और परमेश्वर के हाथ से वह माँगना चाहिए जिसकी हमें घटी है, और इसमें सन्देह न करना चाहिए कि हमारी सहायता करने को उसके पास अपने ही भीतर बहुत है, और यह कि उसने हमारे प्रभु यीशु मसीह में वह सब कुछ रख दिया है जो हम चाह सकते हैं, और वह सब जिसे वह हमारे हित और लाभ का जानता है। इस प्रकार तुम देखते हो कि हम उस विरासत का सुख कैसे ले सकते हैं जिसकी प्रतिज्ञा सब युगों में हमसे की गई, और जिसे परमेश्वर आज भी सुसमाचार की शिक्षा के द्वारा देता है।
और अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सम्मुख अपने पापों को मानते हुए गिर पड़ें, उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उन्हें और अधिक अनुभव कराए, ताकि हम उसके भय में इस प्रकार चलें कि अपने आपको पूरी तरह उसी को समर्पित करने के सिवाय और कुछ न चाहें, और जैसे वह हमें दुर्बलता और बिगाड़ में लिपटा देखता है, वैसे ही अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें उससे शुद्ध करने और अन्त तक हमें सहने की कृपा करे। वह यह अनुग्रह केवल हमें ही नहीं, वरन पृथ्वी के सब लोगों और जातियों को भी देने की कृपा करे, आदि।
