अध्याय 28

छब्बीसवाँ उपदेश, जो चौथे अध्याय पर तीसरा है — गलातियों 4:8-11

Sermons upon Galatians · John Calvin

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छब्बीसवाँ उपदेश, जो चौथे अध्याय पर तीसरा है — गलातियों 4:8-11

जो चौथे अध्याय पर तीसरा है।

8 उस समय जब तुम परमेश्वर को नहीं जानते थे, तुम उनकी सेवा करते थे जो स्वभाव से देवता नहीं हैं।

9 पर अब जब कि तुम परमेश्वर को जान गए हो, वरन परमेश्वर ने तुम्हें जाना, तो तुम उन निर्बल और निर्धन आदि-शिक्षाओं अर्थात् विधियों की ओर क्यों फिरते हो, जिनके दास तुम फिर पहले के समान होना चाहते हो?

10 तुम दिनों और महीनों और नियत समयों और वर्षों को मानते हो।

11 मुझे तुम्हारे विषय में डर लगता है कि कहीं ऐसा न हो कि मैंने तुम्हारे लिए व्यर्थ परिश्रम किया हो।

हम पहले देख चुके हैं कि गलातियों को, जिनके बीच सन्त पौलुस ने बहुत परिश्रम किया था, विश्वासयोग्यता से सिखाए जाने के बाद वे फिर पीछे हट गए; इसलिए नहीं कि उन्होंने यीशु मसीह और सुसमाचार का पूरी तरह त्याग कर दिया था, परन्तु इसलिए कि उन्होंने भिन्न-भिन्न मतों के पीछे चलकर अपने आपको बहकाए जाने दिया, और इस विषय में वे बहुत ढीले निकले; जैसा कि हम देखते हैं कि सारे संसार में हुआ है। क्योंकि हमारे प्रभु यीशु मसीह का नाम और विश्वास के चिह्न के रूप में बपतिस्मा तो अब भी बना हुआ है; फिर भी हम देखते हैं कि सब कुछ अन्धविश्वास और मूर्तिपूजा से बिगड़ गया है। सो गलाती अब भी परमेश्वर की कलीसिया के होने का दावा करते थे, और तब भी वे अनेक मूर्खताओं में फँसे हुए थे; विशेषकर इसमें कि वे व्यवस्था की विधियों का पालन करके अनुग्रह और प्राणों का उद्धार कुछ अंश में परमेश्वर से मोल लेना चाहते थे। परन्तु यह हमारे प्रभु यीशु मसीह का बहुत बड़ा अपमान था। क्योंकि जब तक हम सब आत्म-भरोसा त्यागकर अपना पूरा भरोसा उसी पर न रखें, तब तक उसका हमारा उद्धारकर्ता होना असम्भव है।

तो हम देखते हैं कि गलातियों का दोष यह था कि वे सुसमाचार में इतने दृढ़ जड़ नहीं पकड़े हुए थे कि स्थिर और अटल रहकर सब भूलों को झटक देते, वरन वे अति सहज विश्वास के कारण भटक गए। इसी कारण सन्त पौलुस कहता है कि वे दुगुने दोष के योग्य हैं, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें भले मार्ग पर और अच्छी उन्नति की दशा में रखा था, फिर भी वे अपनी ही चंचलता से इधर-उधर मुड़ गए। और वह उनकी वर्तमान दशा और उनकी पहली दशा की तुलना करता है। क्योंकि वे बेचारे अन्यजाति थे जिन्होंने सच्चे धर्म का स्वाद कभी नहीं चखा था। परमेश्वर ने उनकी सुधि ली, और अनुग्रह से उन्हें अपनी ओर खींचा, और उन्हें अपने सत्य का ज्ञान दिया। अब जब कि इसके बाद उन्होंने शैतान के भ्रमों और छलावों को सुसमाचार के शुद्ध सत्य में मिला दिया, तो यह दोष बहुत ही मर्यादा से बाहर था, और उनके पहले दोष से अधिक क्षमा के योग्य नहीं था। और इसीलिए सन्त पौलुस कहता है, "जिस समय तुम अभी कुछ भी नहीं जानते थे, तब मूर्तियों की सेवा करना कोई आश्चर्य की बात न थी, क्योंकि तुम अपनी भूलों में अन्धे थे, और परमेश्वर ने कभी अपने आपको तुम पर प्रकट नहीं किया था, कि तुम जीवित परमेश्वर को मनुष्य के अपने मन की सब गढ़ी हुई बातों से अलग पहचान सकते। पर अब जब कि तुम्हें सुसमाचार सिखाया गया है, और तुमने इतना बड़ा उपकार पाया है, अपने परिश्रम से नहीं, मानो तुमने उसे अपनी बुद्धि से प्राप्त कर लिया हो, परन्तु परमेश्वर की भलाई से, जिसने तुम्हारे उसे ढूँढ़ने से पहले ही तुम्हें चुन लिया: और जब उसने इस प्रकार तुम्हें अपने लिए इकट्ठा कर लिया है, तो उस शिक्षा में स्थिर न रहने के लिए, जिसे तुम निश्चित और अचूक जानते हो, तुम्हारे पास क्या बहाना है?"

इसके सिवा देखो, वह कहता है, कि तुमने कैसा बुरा चुनाव किया है। क्योंकि परमेश्वर ने अपने आपको तुम्हें दे दिया था, और तुमने उसे तुच्छ बातों के लिए छोड़ दिया। क्योंकि व्यवस्था की विधियाँ, जब वे हमारे प्रभु यीशु मसीह से अलग अकेली रखी जाएँ, तो कूड़ा-करकट ही हैं। देखो, तुम व्यर्थ बातों को कितना बड़ा समझते हो, और इसी बीच परमेश्वर की तुम्हें तनिक भी चिन्ता नहीं। इस पर वह बड़े शोक से भरे मनुष्य के समान यह निष्कर्ष निकालता है कि उसे बहुत डर है कि कहीं उसका परिश्रम व्यर्थ न गया हो, क्योंकि उसने इतने समय तक अपने आपको थका डाला कि उन्हें सुसमाचार के शुद्ध ज्ञान तक पहुँचाए। और साथ ही वह उन बातों का एक नमूना भी देता है जिन्हें उसने निर्धन और निष्फल विधियाँ कहा था: अर्थात् यह कि वे व्यवस्था में दिए हुए पर्व मनाते थे, मानो उस बात में कोई अनिवार्यता हो, और यह समझते थे कि उनसे वे परमेश्वर के सामने अनुग्रह के योग्य ठहरेंगे और उसे कमा लेंगे। यहाँ जो विषय चल रहा है, उसका सार यही है। अब इस पाठ से हमें एक भली चेतावनी लेनी चाहिए: वह यह कि यदि परमेश्वर के हमें सुसमाचार तक एक बार पहुँचा देने के बाद हम सुसमाचार के विश्वास में दृढ़ न रहें, तो यद्यपि बेचारे अविश्वासी क्षमा के योग्य ठहर सकते हैं, फिर भी हम अपनी कृतघ्नता के कारण भयानक दण्ड से नहीं बच सकते, क्योंकि हमने अपने परमेश्वर की पाठशाला में इससे अच्छी उन्नति नहीं की। यह सच है कि यद्यपि अन्यजातियों को कोई ज्ञान न था, फिर भी वे दोषी ठहराए जाने से नहीं बचेंगे, क्योंकि मनुष्यों में सदा दुष्टता पाई जाती है, इसलिए कि उन्होंने अपने आपको अपने ही अन्धविश्वास के हाथ सौंप दिया; परन्तु यदि हम देखें कि हमारी तुलना में वे क्या हैं, तो निश्चय ही जहाँ उनके पास दर्जन भर बहाने हो सकते थे, वहाँ हमारे पास एक का टुकड़ा भी नहीं होगा। इसलिए जब हम एक बार सुसमाचार के सत्य से प्रकाशित हो चुके हैं, तो जैसे परमेश्वर का उपकार अनुपम है, वैसे ही यदि हम उसकी कुछ भी परवाह न करें तो उसका मूल्य भी हमें भारी चुकाना पड़ेगा। और यह भी ध्यान रहे कि यह किसी एक ही जाति से नहीं कहा गया, परन्तु हमें भी आज उन बातों को अपने काम में लाना चाहिए जो सन्त पौलुस हमसे कहता है, ताकि हम ऐसे अभागे न बन जाएँ कि सुसमाचार के सत्य को एक बार जान लेने के बाद उसे छोड़ दें, वरन वह हमारे हृदयों में ऐसा छप जाए और ऐसी जड़ पकड़ ले कि शैतान उससे हमें कभी हिला न सके।

सो देखो, हमें क्या स्मरण रखना है, जब कि सन्त पौलुस यहाँ गलातियों की दुष्टता को उनके सामने रखता है, और उन्हें सर्वथा निरुत्तर ठहराता है, कि एक बार उस शुद्ध सत्य से प्रकाशित हो जाने के बाद वे उससे इस रीति से फिर गए। अब इसके साथ हम यह भी देखते हैं कि मूर्तिपूजा कहाँ से उत्पन्न होती है, और उसका सोता क्या है: अर्थात् जीवित परमेश्वर के ज्ञान का अभाव। क्योंकि हमारे भीतर यह बोध अवश्य होना चाहिए कि एक परमेश्वर है जिसकी हमें उपासना करनी चाहिए, और जो क्या छोटे क्या बड़े, सबसे आदर पाने के योग्य है, क्योंकि हमारा जीवन उसी से है। यह हमारे मन से ऐसा साफ़ मिटाया नहीं जा सकता कि हममें धर्म की कोई चिंगारी सदा न रहे। फिर भी इसी बीच हर मनुष्य अपनी ही मूर्खतापूर्ण कल्पनाओं में क्षीण होता जाता है, क्योंकि हम नहीं समझते कि परमेश्वर क्या है, और न उस तक पहुँच सकते हैं।

सच तो यह है कि यदि हम भ्रष्ट न होते, और हमारी बुद्धि पाप से अन्धी न हो गई होती, तो परमेश्वर तब भी हमें अपनी ओर खींचता। परन्तु क्योंकि हममें परमेश्वर का स्वरूप बिगड़ गया है, इसलिए अन्धकार ही अन्धकार है, और वह ऐसा भयानक है कि जब हमें ऊपर उठकर परमेश्वर को ढूँढ़ना चाहिए, तब हम अभागे पशुओं के समान अपने थूथन भूमि की ओर गड़ाए रहते हैं। इसलिए जब तक परमेश्वर अपने आपको हम पर प्रकट न करे, तब तक हमारे लिए कोई सच्चा धर्म रखना असम्भव है, और हम सदा कुरीतियों और निरी मूर्खताओं के पीछे चलते रहेंगे।

इससे हम जानते हैं कि मनुष्यों की व्यर्थता कैसी है, कि हर मनुष्य अपने आपको यह विश्वास दिलाता है कि अपने आप पर शासन करने के लिए उसमें यथेष्ट कुशलता है। हाँ, और हम देखते हैं कि मूर्ख तक अपनी बुद्धि की डींग मारते हैं; और जिन्होंने मनुष्यों में कुछ नाम पा लिया है, वे घमण्ड से इतने फूल जाते हैं कि न तो कोई सुधार सह सकते हैं, न यह सुन सकते हैं कि उनमें कोई दोष है। परन्तु यदि मनुष्यों में सुबुद्धि की एक बूँद भी होती, तो क्या यह उचित न होता कि पहली बात जिससे वे आरम्भ करें यह जानना हो कि किस परमेश्वर की उन्हें उपासना करनी चाहिए? यही वह बात है जिसमें वे चूकते हैं, यहाँ तक कि वे सत्य के स्थान पर शैतान के झूठ ढूँढ़ते हैं, और जीवित परमेश्वर के स्थान पर मूरतों की उपासना करते हैं, जब तक कि परमेश्वर उन्हें अपने पास न बुला ले।

तो हम देखते हैं कि परमेश्वर को प्रसन्न करने और उसकी ग्रहणयोग्य सेवा करने के लिए यह हमारे हाथ में नहीं कि अपनी ही कल्पना के अनुसार चलें, परन्तु हमें अपने आपको उसके वचन और पवित्र आत्मा से चलाए और शासित होने देना चाहिए। फिर यदि हम इस मनुष्य या उस मनुष्य की सम्मति के पीछे चलें, तो यह पाठ केवल दो-तीन जनों की बात नहीं करता, परन्तु हम देखते हैं कि जब तक परमेश्वर हमारा भार अपने ऊपर लेकर हमें अपनी ओर न खींच ले, तब तक कोई भली व्यवस्था रखना, या सीधा मार्ग थामे रहना असम्भव है। इसलिए जो अपने पूर्वजों के पदचिह्नों पर चलते हैं और रीति तथा प्राचीनता को वह नियम बनाते हैं जिसके अनुसार अपने आपको ढालें, वे दिखाते हैं कि वे परमेश्वर को तुच्छ जानते हैं। और क्यों? क्योंकि वे जान-बूझकर जीवते जल के सोते को छोड़कर गड्ढों का पानी ढूँढ़ने जाते हैं, मानो उनमें सफ़ेद और काले में भेद करने की बुद्धि ही न हो।

सो जब कि सन्त पौलुस का अभिप्राय यहाँ हमें मानो एक जीवित चित्र में यह दिखाना है कि जब तक परमेश्वर मनुष्यों को उद्धार के मार्ग पर न ले आए, तब तक वे भटके बिना और बिगड़े बिना रह ही नहीं सकते: तो आओ हम अपने स्वभाव का त्याग करें, और जो कुछ हम जानते हैं कि मनुष्य से आया है, उस सब को सर्वथा पाँवों तले रौंद डालें, और परमेश्वर के शुद्ध सत्य से सीधे-सादे रूप में लगे रहना सीखें। मैं कहता हूँ, सन्त पौलुस के उन शब्दों पर हमें यही स्मरण रखना है, जहाँ वह कहता है कि जो परमेश्वर को नहीं जानते थे, वे उनकी सेवा करते थे जो मूरतें ही थीं।

इसके सिवा, हम अपने आपको गलातियों से अधिक बुद्धिमान न समझें: परन्तु (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) यह समझ लें कि इस स्थान पर पवित्र आत्मा का अभिप्राय सब घमण्ड को गिरा देना था, ताकि मनुष्य अपनी बुद्धि और कुशलता के भरोसे अपनी इच्छा के अनुसार करने का साहस न करें, वरन यह जानें कि जब तक परमेश्वर अपने अनुग्रह से हमें प्रकाशित न करे, तब तक हममें पशुता के सिवा कुछ नहीं है। फिर जब सन्त पौलुस कहता है कि मूरतें स्वभाव से देवता नहीं हैं, तो उसका अर्थ यह है कि हम बड़े मन्दबुद्धि हैं, जब हम सब वस्तुओं के रचनेवाले के पास नहीं पहुँच पाते, जो ऊपर भी और नीचे भी अपने आपको प्रकट करता है, ताकि हम उसे जानकर उसकी उपासना और सेवा करें। क्योंकि हम अपने हाथों और अपने पाँवों को देखें और परमेश्वर की अद्भुत बुद्धि, सामर्थ्य और भलाई को खुले रूप में न देखें, यह हो ही नहीं सकता; और जब हम आकाश और तारागण को निहारते हैं, तो वहाँ हमारे पास इसका यथेष्ट प्रमाण है कि कोई सर्वोच्च प्रभु है जो उन्हें सम्भाले हुए है।

जब हम ऋतुओं के परिवर्तन पर विचार करते हैं, और हिम, वर्षा, पवन या गर्मी को देखते हैं: तो देखो, उन्हीं में परमेश्वर अपने आपको दिखाता है। जब पृथ्वी अपने फल उत्पन्न करती है, या मानो मरी और सूखी पड़ी होती है: इन सब बातों में हम निरन्तर परमेश्वर को जानते हैं, या कम से कम इतना तो हम पर प्रमाणित होता है कि वह वहाँ अपने आपको दिखाता है। और यदि हम अब उसे न पहचानें, तो अन्तिम दिन जब पुस्तकें खोली जाएँगी, तब हमें इसे मानना पड़ेगा।

अब इसी बीच यदि हम उनकी उपासना करें जो स्वभाव से देवता नहीं हैं: तो यह वैसा ही है मानो हम इतने प्रमाणों और दर्पणों के सामने, जो परमेश्वर हमें अपनी ओर लाने को हमारे आगे रखता है, जान-बूझकर अपनी आँखें मूँद लें। संसार चाहे जैसा चले, जितनी उपासना मनुष्य गढ़ सकते हैं वह सब एक व्यर्थ कल्पना ही है, जब तक वे भले मार्ग पर न लाए जाएँ। क्योंकि अपनी स्वाभाविक बुद्धि से वे सब प्रकार की भूल और छल में पड़े बिना रह ही नहीं सकते।

वह आगे कहता है, "अब जब कि तुमने परमेश्वर को जान लिया है, वरन परमेश्वर ने तुम्हें जाना।" कुछ लोग इसका अनुवाद यों करते हैं, "अब जब कि तुम्हें परमेश्वर के ज्ञान में शिक्षा मिल चुकी है": परन्तु सब एक ही बात है। फिर भी पहले भाग में (जैसा मैं छू चुका हूँ) वह दिखाता है कि जो शुद्ध सत्य में सधाए गए हैं, वे परमेश्वर के प्रति शपथ-भंग के दोषी हैं। और इसी से वे निरुत्तर हैं: क्योंकि अब यह अज्ञान नहीं रहा: उनकी दशा ऐसी नहीं मानो उन्होंने सच्चे धर्म का स्वाद कभी चखा ही न हो: परन्तु यह खुला झूठ है, जैसे कोई प्रजाजन, यह भली-भाँति जानते हुए कि उनका राजा कौन है, उससे बलवा करें, और जो राजभक्ति की प्रतिज्ञा उसे दी थी उसे तोड़ दें, और उसके प्राणघातक शत्रु से मिल जाएँ।

सो तुम देखते हो कि हमारी दशा क्या है: अर्थात् यह कि जिन्होंने परमेश्वर के सत्य को जान लिया है, वे अपनी अन्धविश्वासी रीतियों और भूलों की ओर एक पग भी नहीं हट सकते, नहीं तो वे शपथ तोड़नेवाले और झूठे विश्वासघाती ठहरेंगे। क्योंकि यह बात बिना कारण नहीं कही गई कि जब परमेश्वर की उसकी प्रभुता में महिमा होनी है, तब सब मूरतों को गिर पड़ना होगा: और जब उसकी महिमा प्रकट होगी, तब सब अन्धविश्वासों को लोप हो जाना होगा।

अब यदि वह हम पर अपने आपको प्रकट करना स्वीकार करता है, तो यह ऐसा है मानो उसने हमारे बीच अपना राजसिंहासन स्थापित किया हो, इसी अभिप्राय से कि हम पर इतना भला और अनुग्रहकारी हो कि हमारा राजा बन जाए। यदि हमारा मन उसे कोई आधीनता देने को न माने, तो क्या हम उसके प्रति विश्वासघाती नीच नहीं? यदि हम उत्तर में यह कहें कि हमारा आशय ऐसा नहीं है: तो यह कपट ही है। क्योंकि हम जानते हैं कि हमारा प्रभु किसी साझीदार को सह नहीं सकता: यहाँ तक कि वह "जलन" शब्द का प्रयोग करता है, यह दिखाने को कि वह हमें इस प्रकार अपना बनाएगा कि हम पूरे के पूरे उसी के हों, अधूरे नहीं।

तब यदि हम दोनों ओर खेलें, और दो धाराओं के बीच नाव खेएँ: तो हममें छल और कपट के सिवा कुछ न होगा। परन्तु हममें ठोस खरापन होना चाहिए। और इसलिए सन्त पौलुस सीधे यह नहीं कहता कि यदि हम शैतान से बहकाए जाएँ, और सुसमाचार को पूरी तरह छोड़ दें: परन्तु यह कि यदि हम उसकी सरलता से हट जाएँ।

जैसे उदाहरण के लिए गलाती (जैसा मैं पहले दिखा चुका हूँ) न तो यीशु मसीह का त्याग कर बैठे थे, न अपने बपतिस्मा का इनकार (क्योंकि वे अब भी सुसमाचार को थामे रहने का दावा करते थे) परन्तु उन्होंने उसमें मिलावट कर दी थी, और उसने सब बिगाड़ दिया: थोड़ा-सा ख़मीर सारे गुँधे हुए आटे को खट्टा कर देता है। ठीक वैसे ही जब मनुष्य परमेश्वर के सत्य में अपने मन की न जाने क्या-क्या बातें जोड़ने पर अड़ जाते हैं, तो वह सब बिगाड़ देता है। क्योंकि संसार की सबसे उत्तम दाखरस के प्याले में कोई मनुष्य थोड़ा-सा सिरका, या कोई और घिनौनी चीज़ डाल दे, तो उसके लिए शुद्ध जल पी लेना ही अच्छा है। यही दशा तब होती है जब मनुष्य सच्चे धर्म की मरम्मत करने लगते हैं, जैसा वे सब करते हैं जो अपने सिर से न जाने क्या-क्या गढ़ने का बीड़ा उठाते हैं।

निश्चय यह कहीं अधिक अच्छा होता कि वे इससे अधिक कुछ जानते ही नहीं, केवल मोटे रूप में यह कि परमेश्वर है: इससे कि सुसमाचार की भली शिक्षा में पाले जाएँ, और फिर सब कुछ झूठा कर दें, और हमारे प्रभु यीशु मसीह को उस रीति से विकृत कर डालें। सो तुम देखते हो कि यह कितनी असह्य बात है: और पहले-पहल यही हमें ध्यान में रखना है।

दूसरी बात, सन्त पौलुस दिखाता है कि गलातियों का सुसमाचार के लिए बुलाया जाना उनकी अपनी प्रेरणा से, या उनके अपने इस बात को आगे बढ़ाने से नहीं हुआ: परन्तु परमेश्वर से हुआ, जिसने उन्हें तब ढूँढ़ निकाला जब वे भटकते हुए अभागे थे। और यह केवल उन्हीं के विषय में नहीं कहा गया: क्योंकि हम जानते हैं कि भविष्यद्वक्ता यशायाह उन सब के विषय में, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा मोल लिए गए उद्धार के भागी होंगे, सामान्य रूप से इसी प्रकार कहता है: "जो मुझे ढूँढ़ते न थे, उन्होंने मुझे पा लिया, और जो मेरे विषय में पूछताछ नहीं करते थे, उन पर मैं प्रगट हुआ: और जिन्होंने मुझे कुछ न गिना, उनसे मैंने कहा, देखो, मैं यहाँ हूँ, मैं यहाँ हूँ।"

देखो, परमेश्वर अपने अनुग्रह को कैसे बड़ा करता है, इसलिए कि मनुष्य इतनी बड़ी भूल न करें कि यह समझ बैठें कि वे अपनी बुद्धि से विश्वास तक पहुँचते हैं। नहीं, वह कहता है, तुम सब के सब विनाश के मार्ग पर हो, और तुम में से कोई ऐसा नहीं जो मेरे पास आए, जब तक मैं उसे न खींचूँ, उस दुर्दशा पर तरस खाकर जिसमें तुम डूबे हुए हो।

इसलिए मैंने ही अपने आपको प्रगट किया है, और यह सब मेरी ही निरी अनुग्रहकारी भलाई से है, क्योंकि तुम कभी मुझे नहीं ढूँढ़ते, वरन तुम में से कोई ऐसा नहीं जो मुझसे और दूर, और दूर न हटता गया हो। क्योंकि हम केवल भटके हुए पशु ही नहीं, वरन जंगली और बिगड़ैल पशु भी हैं: हम पूरी तरह बलवा करने में लगे हैं, जब तक परमेश्वर हमें वश में न कर ले, और हमें ऐसा न बदल दे कि हम उसके बाड़े की भेड़ें हों, कि वह हमारे प्रति चरवाहे का काम करे।

सो यह बिना कारण नहीं कि सन्त पौलुस अपनी इस बात को सुधारता है जब वह कहता है, "तुमने परमेश्वर को जाना, वरन परमेश्वर ने तुम्हें जाना।" मानो वह यह कहता है कि जब हम सुसमाचार के ज्ञान में आते हैं, तो हमें अपने आपको औरों से अच्छा न समझना चाहिए, परन्तु यह कि परमेश्वर ने हमसे पहल की, और यदि परमेश्वर ने हमें सर्वथा बदल न डाला होता, तो हम अपनी पशुता में सौ बार नाश हो जाते, पर किसी भली सुधार तक कभी न पहुँचते।

अब हम देखते हैं कि स्वतन्त्र इच्छा क्या कर सकती है, जिस पर अज्ञानी अभागे डींग मारते हैं और परमेश्वर के अनुग्रह को मिटाते हैं। निस्सन्देह सब मनुष्य मान लेंगे कि वे परमेश्वर के काम के बिना प्रकाशित नहीं हो सकते: परन्तु प्रायः इसके बाद वे उसे फिर घटा देते हैं, यह कहकर कि उसका काम केवल अंश में है, और उन्हें लगता है कि हर मनुष्य अपनी ओर से कुछ लाता है। परन्तु यह सारा सामान यहाँ बाहर कर दिया गया है, जब वह कहता है कि हमें कोई नहीं जानता सिवाय परमेश्वर के, जो हमें चुनता भी है, कि अपने आपको हम पर प्रगट करे और हमें अपने पास आने वाला बनाए।

तो हम सामान्य रूप से यह समझ लें कि यह हमारी अपनी योग्यता नहीं जिसने हमें इस उपकार के पाने तक पहुँचाया कि सुसमाचार हमें शुद्ध रूप में सुनाया जाए, और हम में से हर एक उसे अपने हित में लगाए: क्योंकि यदि मैं यह सोचूँ कि मुझमें कुछ भी ऐसा है जिसके कारण मुझे इस या उस मनुष्य से बढ़कर ठहराया जाना चाहिए: तो यह परमेश्वर की स्तुति को छीनना है, और उसे अपने लिए हड़प लेना है: और यह असह्य विश्वासघात होगा।

और इसलिए हमें उसी पर लौटना चाहिए जो सन्त पौलुस दूसरे पाठ में कहता है: "तुझे किसने औरों से उत्तम ठहराया?" वह उनसे कहता है जो अपनी प्रशंसा करते थे, यह विश्वास करके कि उनमें कोई गुण या उत्कृष्टता है, जैसा कि सचमुच कुरिन्थियों के पास ऐसे आत्मिक वरदान थे जो मनुष्यों में आदर के योग्य ठहर सकते थे। सन्त पौलुस यह भली-भाँति मान लेता है कि उनके पास बड़े अनुग्रह थे, और आदर के योग्य: परन्तु वह उनसे पूछता है कि वे सब कहाँ से आए, क्या वे उनके अपने कमाए हुए थे, या वे उन्हें अपने आप से ले सकते थे? यह बहुत निश्चित है कि नहीं ले सकते थे।

इसलिए हम सीखें कि हमारे लिए इतना ही काफ़ी नहीं कि परमेश्वर का वचन हमें सुनाया जाए, जब तक परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा से हममें काम न करे, जैसा अनुभव दिखाता है कि वह सब मनुष्यों को नहीं दिया जाता। और इसके सिवा कोई मनुष्य कभी ऐसा नहीं हुआ जिसे अच्छा भोजन ढूँढ़ने की सुध आई हो, जब तक परमेश्वर की ओर से वह उसे दिया न गया हो। इसलिए अपने सिर की सारी मूर्खतापूर्ण कल्पनाओं को दूर करो, और हम सब घमण्ड को त्याग दें: हम इसलिए कि हमने सुसमाचार को जाना है अपने आपको औरों से बुद्धिमान न समझें: परन्तु यह प्रशंसा परमेश्वर को दें, कि जिस समय हमने उसकी ओर पीठ फेर रखी थी, और मानो लाख बार विनाश में डूब चुके थे, उसने हम पर दृष्टि डाली, और हमें अपनी ओर खींच लिया, इसलिए कि जब हमें बताया जाए कि हम विश्वास से धर्मी ठहराए जाते हैं, और उसी से उद्धार पाते हैं: तो हम निश्चय जानें कि यह उसके निरे अनुग्रह से है, और हमारा विश्वास हमें मुफ़्त दिया गया है क्योंकि हम उसे मोल नहीं ले सकते: और हम बेचारी हाजिरा के साथ यह मान लें कि हमने उसे देखा जिसने हमें पहले ही देख लिया था।

क्योंकि वहाँ हमारे पास सारी मानव-जाति का दर्पण है। वह बेचारी स्त्री बड़े दुःख में थी, सब मनुष्यों से त्यागी हुई, और नहीं जानती थी कि कहाँ जाए: परन्तु परमेश्वर ने उस पर तरस खाया और जंगल में उसकी सुधि ली। इस पर वह मान लेती है कि परमेश्वर ने उस पर पहले ही दृष्टि की थी, इससे पहले कि उसने उसका विचार किया हो। सो हम भय और दीनता में रखे जाएँ, क्योंकि हमारे कल्याण का सोता और आरम्भ यह है कि परमेश्वर ने हमें तब जाना और चुन लिया जब हमें उसकी परवाह न थी, वरन अपने अज्ञान के साथ हम उसे तुच्छ भी जानते थे, और ऐसे पशु-समान थे कि हम में से हर एक ने अपना ही विनाश और सत्यानाश ढूँढ़ लिया होता, यदि वह अपनी अपार भलाई से हमें रोके न रखता।

सो तुम देखते हो कि सार रूप में हमें क्या ध्यान में रखना है। परन्तु अब जो बात यहाँ हमसे कही गई है उसे व्यवहार में लाएँ: वह यह कि जब परमेश्वर ने हमें अपने सुसमाचार के शुद्ध ज्ञान में बुलाया है, तो हमें उसी में दृढ़ता से बने रहना चाहिए, उस मार्ग के अनुसार जो वह हमारे आगे रखता है, जो (जैसा हम जानते हैं) सब कल्याण का जीवित सोता है, जैसा यिर्मयाह के दूसरे अध्याय में कहा गया है।

तब यदि हम ऐसे हौज़ खोदने चलें जो पानी रोक नहीं सकते: तो क्या यह उस उपकार का सर्वथा इनकार करना नहीं जो हमारे हाथ में रखा गया था? जब कोई मनुष्य अपने भोजन के लिए तैयार अच्छा आहार देखे, और जाने कि उससे उत्तम पोषण पा सकता है, फिर भी भोजन की मेज़ से उठकर चला जाए, और खाने के लिए गोबर और गन्दगी ढूँढ़े, तो क्या वह विष खाने के योग्य नहीं? ठीक वैसा ही उन सब का हाल है जो परमेश्वर की व्यवस्था और सुसमाचार की शुद्ध शिक्षा से सन्तुष्ट नहीं होते। क्योंकि देखो, सोता उनके सामने है, वे उससे भर पेट पी सकते हैं, जैसा यशायाह और सन्त यूहन्ना में कहा गया है, फिर भी वे भूखे मरना या हवा से अपना पेट भरना चाहते हैं।

अब क्या ऐसी कृतघ्नता को दुगुना दण्ड न मिलना चाहिए जैसा सन्त पौलुस यहाँ कहता है? क्या यह सम्भव है कि तुम फिर उन निष्फल और निर्बल विधियों की ओर लौटो जो तुम्हारा कुछ भी भला नहीं कर सकतीं? अब पहली दृष्टि में सन्त पौलुस व्यवस्था की विधियों के विषय में इस रीति से बोलते हुए बहुत कड़ा और रूखा लग सकता है। क्योंकि सच्चाई यह है कि यद्यपि विधियाँ आरम्भिक प्रवेश या सधाई थीं, जैसे छोटे बच्चों को सधाते समय लोग पहले उन्हें वर्णमाला पर बैठाते हैं: तो भी हमारा प्रभु यीशु मसीह उन्हीं में चित्रित किया गया था: और उनमें मनुष्यों को उद्धार तक पहुँचाने की प्रतिज्ञाएँ थीं। क्योंकि पापों की क्षमा सबसे बड़ी भली वस्तु है जो हम परमेश्वर से चाह सकते हैं, क्योंकि इसी के द्वारा हम उससे मेल-मिलाप पाते हैं। वह हमें अपने बच्चों के रूप में ग्रहण करता है, और हम खुली स्वतन्त्रता से उसे पुकार सकते हैं। इसलिए मनुष्य तभी सच्चे और सिद्ध सुख में होते हैं जब उनके पाप क्षमा कर दिए जाते हैं। और इसकी मानो एक बयाना उन्हें प्राचीन काल में अपनी बलियों में मिलती थी।

जब वे अपने आपको धोते थे, तो उन्हें पूरा निश्चय हो जाता था कि परमेश्वर उन्हें शुद्ध करता है, और उनके दाग़ अब उनके सिर नहीं लगाए जाते, वरन वे शुद्ध और सर्वथा निर्दोष ग्रहण किए गए हैं।

तो फिर सन्त पौलुस उन बातों को निष्फल विधियाँ कैसे कहता है जिनमें ऐसी शिक्षा थी? विशेषकर यह देखते हुए कि कहा गया है कि सारे पवित्रस्थान का नमूना मूसा को दिखाया गया था, वरन स्वर्ग से भी। तो क्या व्यवस्था मनुष्यों को किसी खेल में लगाए रखने के लिए थी, मानो परमेश्वर उन्हें तुच्छ बातों में व्यस्त रखना चाहता था? और न सन्त पौलुस यह देखता था कि प्राचीन काल के पुरखाओं के लिए विधियाँ किस काम की या किस उपयोग की थीं: वह केवल यह दिखाता है कि जब हमारा प्रभु यीशु मसीह एक बार आ गया, तो वे सब बातें समाप्त कर दी गईं। क्योंकि (जैसा वह कुलुस्सियों के दूसरे अध्याय में कहता है) अब हमारे पास आकृतियाँ और छायाएँ नहीं रहीं, क्योंकि आजकल हमारे पास देह और सार-वस्तु है।

जब ऐसा है: यदि कोई व्यवस्था की विधियों को आगे रखे, तो वह उन्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह से अलग कर देगा, और तब वे क्या होंगी? उनमें कोई बल न होगा। क्योंकि (जैसा मैंने पहले कहा) यदि कोई उन्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह से अलग करे, तो निश्चय वे निरी कूड़ा-करकट ही होंगी। इसलिए जब मनुष्य विधियों का पालन इस प्रकार करते थे कि वे अपने उचित प्रयोग में लगाई जाएँ: तो वे भले अभ्यास थे, और प्राचीन पुरखाओं ने अपना समय व्यर्थ नहीं गँवाया, क्योंकि उनके द्वारा वे अपने उद्धार की आशा में दृढ़ किए गए, और वे उनके लिए उनके प्रति परमेश्वर के पितृ-प्रेम की गारंटी थीं, और उन्होंने उन्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह तक पहुँचाया जो सब कल्याण का सोता है।

परन्तु यदि मनुष्य यह जाने बिना कि क्यों और किसलिए, विधियों के पालन में लगे रहें: तो निश्चय यह केवल खुला उपहास है। क्योंकि अन्यजाति लोग भी बलि चढ़ाते थे, और उनमें से कुछ के पास मूरतें न थीं, यह समझकर कि वे आकाश और पृथ्वी के रचनेवाले परमेश्वर को चढ़ाते हैं: और फिर भी उनकी सब बलियाँ उनके किस काम आईं, सिवाय उनके दण्ड के? क्योंकि उन्होंने परमेश्वर की ठहराई हुई व्यवस्था उलट दी थी, इसलिए कि उन्होंने हमारे प्रभु यीशु मसीह को लक्ष्य न बनाया।

सो सन्त पौलुस बिना कारण नहीं कहता कि जब व्यवस्था की विधियाँ हमारे सारे कल्याण को अपने प्रभु यीशु मसीह में ढूँढ़ने की ओर नहीं ले जातीं, तब वे निर्धन विधियाँ ही हैं, अर्थात् इस संसार की नाशमान वस्तुएँ, और इसलिए निर्बल और निष्फल वस्तुएँ, क्योंकि यीशु मसीह जो सब वस्तुओं का जिलानेवाला है, वहाँ नहीं है। और यह बात और भी अच्छी तरह ध्यान में रखने के योग्य है, ताकि हम बहकाए न जाएँ। कहा जाता है कि प्राचीन काल में सब मनुष्य बलि चढ़ाते थे, और समझते थे कि वे परमेश्वर की उपासना करते हैं: फिर भी उन सब की सेवा, जिनका विश्वास यीशु मसीह में स्थिर न था, ठुकरा दी गई।

क्योंकि प्रेरित इब्रानियों के ग्यारहवें अध्याय में कहता है कि केवल एक ही बात जिसने हाबिल की बलि को ग्रहणयोग्य बनाया वह विश्वास था। अब क्योंकि अन्यजाति लोग अपनी बलि चढ़ाने में परमेश्वर की कल्पना शारीरिक रूप में करते थे, और समझते थे कि ऐसे साधनों से वे उसके साथ प्रायश्चित्त कर सकते हैं, इसलिए वे बाहरी बातों में लगे रहे, और यह न सोचा कि जब हम दोषी हैं, तो हमारे लिए आवश्यक है कि हमारे पास उससे उत्कृष्ट छुटकारे का मूल्य हो जो हम में से कोई दे सके।

यदि हमारे पास देने को सौ संसार होते, तो वे उस एक ही अपराध को छुड़ाने के लिए भी पर्याप्त न होते जो हमने परमेश्वर के विरुद्ध किया है। इसलिए जो बलि हमारे सब पापों का उत्तर दे, वह अनिवार्य रूप से स्वर्गीय होनी चाहिए। अन्यजातियों ने यह नहीं सोचा: वे उसकी छाया पर ही टकटकी लगाए रहे, जैसा तुर्क और यहूदी आज भी करते हैं, जो साँझ और भोर, और दोपहर को भी बार-बार अपने आपको धोकर, और अपनी अन्य विधियों से, मान लेते हैं कि वे अशुद्ध हैं और उन्हें किसी और के द्वारा शुद्ध किए जाने की आवश्यकता है, और फिर भी हमारे प्रभु यीशु मसीह का इनकार करते हैं जो वही शुद्धता है जिसके द्वारा हमें शुद्ध किया जाना है, जैसा सचमुच वही है जिसने हमारे सब दाग़ मिटा दिए हैं।

जब ऐसा है, तो वे सब जो परमेश्वर से कोई अनुग्रह पाने की आशा में किसी विधि का पालन करते हैं, न केवल व्यर्थ और बिना किसी लाभ के अपने आपको बहकाते और सताते हैं: परन्तु निश्चय परमेश्वर के क्रोध को और भी अधिक भड़काते हैं। अब हमें अपनी ओर से यह सिखाया गया है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने अपना लहू हमारे प्राणों को धोने के लिए बहाया है। तब यदि हम इसके सिवा कोई और शुद्धि या शोधन-स्थान ढूँढ़ें, तो निश्चय यह असह्य विश्वासघात है।

और यदि सन्त पौलुस ने व्यवस्था की विधियों के विषय में ऐसा कहा: तो उन सब खिलौनों और तुच्छ सजावटों के विषय में हम क्या कहें जो आजकल पोपवाद में हैं? क्योंकि देखो, पोपवादी समझते हैं कि पवित्र जल लेने से, यह-वह बड़बड़ाने से, पर्व-दिन मनाने से, किसी तीर्थयात्रा में भटक-भटककर अपने आपको थकाने से, किसी पुतले के सामने मोम की बत्ती जलाने से, सुर-ताल में मिस्सा गाने से, और इतनी-इतनी बार अपनी माला जपने से वे बहुत कुछ पा लेंगे। मैं कहता हूँ कि वे ऐसे साधनों से परमेश्वर के साथ प्रायश्चित्त करने की अच्छी आशा रखते हैं। परन्तु यह निश्चित है कि वे इससे अपने आपको नरक में और गहरा डुबोते हैं, और शैतान के फन्दों में और आगे जा पड़ते हैं, मानो उन्होंने अपने ही विनाश के लिए उससे साँठ-गाँठ कर ली हो।

संक्षेप में, पोपवाद की सब विधियाँ हमारे प्रभु यीशु मसीह का, और उस शुद्ध सत्य का जो उसने अपनी मृत्यु और पुनरुत्थान के द्वारा हमारे लिए मोल लिया है, और उस अनुग्रह का जो आज सुसमाचार में हमें दिया जाता है, सर्वथा इनकार हैं। क्योंकि वे चाहे जितने कफ़न-वस्त्र ले आएँ, पर वे पवित्र आत्मा को झूठा नहीं ठहरा सकते, जिसने सन्त पौलुस के मुँह से यह वचन कहा है। तो हम सार रूप में देखते हैं कि यहाँ हमें क्या दिखाया गया है।

अब जहाँ तक उस विशेष बात का सम्बन्ध है जो सन्त पौलुस ने यहाँ दिनों, चन्द्रमाओं और वर्षों के विषय में कही, उसका अर्थ जाड़े और गर्मी की ऋतुओं से नहीं, न एक दिन को दूसरे दिन से अलग पहचानने से, न इससे कि मनुष्य वर्षों और चन्द्रमाओं की गिनती न करें: परन्तु वह उन पर्वों की बात करता है जो व्यवस्था में आज्ञा किए गए थे, और जिन्हें वे छलियारे अब भी अनिवार्य समझकर मनवाना चाहते थे। इस दशा में एक प्रकार का बन्धन और दासत्व था, और यह उस स्वतन्त्रता का मिटाना था जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमारे लिए मोल ली गई।

देखो, यही कारण है कि सन्त पौलुस ऐसी प्रचण्डता से बोलता है, यद्यपि उसने पूर्वोक्त झूठ को देखते हुए भी ऐसा किया: क्योंकि आवश्यक था कि हमारे प्रभु यीशु मसीह को उन सब आकृतियों में पहचाना जाए, और मनुष्य उसी लक्ष्य पर दृष्टि रखें। परन्तु जिन्होंने गलातियों को बहकाया था, उन्होंने उन्हें ठीक उलटी बात से बाँध दिया, क्योंकि फसह का पर्व और अन्य पर्व अब भी मनाने से वे उन्हें फिर उन पुरानी, घिसी हुई आकृतियों की ओर लौटाना चाहते थे, जिन्हें मिट जाना चाहिए।

प्राचीन काल में जब मनुष्य व्यवस्था के अधीन फसह का दिन मनाते थे, तो इसलिए कि लोग मिस्र की दासता से अपने छुटकारे का स्मरण करके उस बड़े छुटकारे की बाट जोहें जिसकी उनसे प्रतिज्ञा की गई थी। और इसी कारण सन्त पौलुस कहता है कि हमारा फसह का मेम्ना (अर्थात् यीशु मसीह) बलि हो चुका है। वह दिखाता है कि जो बात व्यवस्था में चढ़ाए गए फसह के मेम्ने से चित्रित की गई थी, वह अब हमारे मध्यस्थ के व्यक्तित्व में पूरी हो गई है। झोपड़ियों या तम्बुओं के पर्व का भी यही हाल था, जिसके द्वारा परमेश्वर ने यहूदियों को स्मरण दिलाया कि वे जंगल में रहे थे जहाँ न घर था, न कोई भवन, और फिर भी वे वहाँ बहुत समय तक इधर-उधर यात्रा करते हुए टिके रहे। और यह उनके लिए एक चेतावनी भी थी कि यह जीवन केवल एक यात्रा है, जिससे हमें शीघ्रता से होकर निकलना है।

पहिलौठों के विषय में भी यही कहना चाहिए, जब मनुष्य परमेश्वर के लिए अपनी पहली उपज चढ़ाने आते थे। फिर जब यहूदी अपने पापों की गम्भीर स्वीकारोक्ति करते थे, तो वह उन्हें यीशु मसीह तक पहुँचाने की एक आकृति थी जिसकी उनसे प्रतिज्ञा की गई थी। परन्तु अब जब वह आ चुका है, यदि हम उन बातों को अब भी मानने पर अड़े रहें, तो यह खिलवाड़ नहीं तो और क्या है? क्योंकि हम मुख्य बात और सार-वस्तु को हटा देते हैं, जो वैसा ही है मानो कोई रोटी, दाखरस और मांस के रंग से अपना पेट भरना चाहे, उन वस्तुओं से नहीं। और क्या कोई इससे पोषण पा सकता है?

सो जब कि हमारा प्रभु यीशु मसीह आ चुका है, व्यवस्था की आकृतियाँ अब बरतने की नहीं हैं, और यदि मनुष्य उन्हें मानने पर अड़ें, तो वे दिखाते हैं कि उन्हें परमेश्वर का कोई ज्ञान नहीं, और सब कुछ उलट-पुलट हो गया है। इसलिए हमारे लिए यह और भी आवश्यक है कि भली-भाँति ध्यान रखें कि यदि आज हम सुसमाचार की शुद्धता से तनिक भी हट जाएँ, तो हम तुरन्त अपने प्रभु यीशु मसीह से भटक गए। मैं मानता हूँ कि हम इकट्ठा होने के कुछ दिन ठहरा सकते हैं, पर यहूदियों की रीति पर नहीं। और क्यों? हम उन्हें विधियों के कारण नहीं मानते। व्यवस्था के समय में किसी मनुष्य के लिए लकड़ी के एक टुकड़े पर हथौड़ा उठाना भी, या अपना कोई और काम-काज करना भी, प्राणघातक अपराध होता। यदि कोई विश्रामदिन को आग पर हण्डी या केतली ही रख देता, तो परमेश्वर ने आज्ञा दी कि वह काट डाला जाए। फिर भी इस कठोरता का अर्थ यह नहीं था कि परमेश्वर को आलस्य भाता है: परन्तु यह एक आकृति का काम करती थी, मानो उसने कहा हो, मैंने तुम्हें अपने विश्रामदिन इसलिए ठहरा दिए हैं कि तुम जानो कि मैं ही तुम्हें पवित्र करनेवाला हूँ। यही पवित्रीकरण आज हमारे पास है, तथापि उन आकृतियों के साथ नहीं जैसे पुरखाओं के पास प्राचीन काल में था: क्योंकि यह तो हमारे प्रभु यीशु मसीह को गाड़ देना होता। यह तो फिर एक परदा लटकाना होता, इस अभिप्राय से कि हमारी आँखें ऐसी चौंधिया जाएँ कि हम सुसमाचार की ज्योति को न देखें। देखो, दिनों के इस पालन के विषय में, जिसकी बात सन्त पौलुस यहाँ करता है, हमें क्या ध्यान में रखना है। परन्तु सबसे बढ़कर यह ध्यान रखें कि उसका अभिप्राय यहाँ हमें यह दिखाना था कि जब हम उन उपकारों को जान चुके हैं जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमें दिए गए हैं, तो हमें उन्हीं से चिपके रहना और अपने आपको पूरी तरह उन्हीं पर स्थिर करना चाहिए: और यदि हम इधर-उधर डोलते रहें, तो यह हमारे प्रभु यीशु मसीह से खिसक जाना है, जिसमें हमारे पास सब जीवन, आनन्द, कल्याण और महिमा की परिपूर्णता और सिद्धता है। इसलिए, जब कि परमेश्वर इस रीति से हमारे पास आता है, वरन उस समय भी जब हम अभागे भटकते पशुओं के समान थे, उसने हमें अपने लिए इकट्ठा किया, और अपने आपको हमारा चरवाहा दिखाया, इसलिए कि हम उसके झुण्ड की भेड़ें बनें, और उसका शब्द सुनें, और उसे सब झूठी शिक्षाओं से और मनुष्यों की सब जिज्ञासु चतुराइयों से पहचानें, कि हमारा प्रभु यीशु मसीह हम पर राज्य करे, हमें भय में रखे, हमें पूरी तरह अपना ले और हम उसके हों, अंश में या शर्त के साथ नहीं, पर पूरे और सर्वथा: हम चौकस रहें कि जब सुसमाचार एक बार हमें सुनाया जा चुका है, तब हम ऐसी कृतघ्नता के दोषी न ठहरें। सो तुम देखते हो कि इस पाठ में हमारे हित के लिए हमें क्या स्मरण रखना है, ताकि अन्तिम दिन हम पर दोष न लगाया जाए कि परमेश्वर ने हमें अपने पास बुलाया, और हमने उसे छोड़ दिया और त्याग दिया, और अपनी प्रतिज्ञा झूठी कर दी, जब कि वह हमारे साथ अपना वचन निभाने को तैयार था, केवल एक-दो दिन के लिए नहीं, वरन जीवन और मृत्यु दोनों में सदा हमारा पिता और उद्धारकर्ता बना रहकर।

अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने दोषों को मानते हुए गिर पड़ें, और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उन्हें और अधिक अनुभव कराए, और इससे हम उन अनुग्रहों को और भली-भाँति पहचानें जो हमने उससे पाए हैं, और यह देखकर कि वे हमें बिना योग्यता के दिए गए, हम उनका स्वाद लेने के लिए और अधिक उत्सुक हों, ताकि इस पर हम दिन-प्रतिदिन अपनी दुष्ट अभिलाषाओं से, और उन सब दुर्गुणों से जिनमें हम डूबे होते यदि वह हम पर तरस न खाता और हमें अपना अनुग्रह अनुभव न कराता, अपने आपको छुड़ाने का यत्न करें; और वह उस अनुग्रह को इस रीति से बनाए रखे कि हम और कुछ न चाहें, केवल पूरी रीति से उसके पास घर लौट आना: और इस बीच जब तक हम उस पूर्ण ज्योति में न पहुँचें जहाँ हम उसे आमने-सामने देखेंगे और उसकी महिमा में रूपान्तरित होंगे, वह हमें उद्धार का मार्ग दिखाता रहे, और हमें उसमें अन्त तक चलाता रहे। वह यह अनुग्रह न केवल हमें, वरन पृथ्वी के सब लोगों और जातियों को भी दे, सब बेचारी अज्ञानी आत्माओं को भूलों और अन्धकार की दुखद दासता से उद्धार के सीधे मार्ग पर लौटाते हुए, और इसके लिए वह अपने वचन के सच्चे और विश्वासयोग्य सेवक उठाए जो अपना लाभ और व्यर्थ महिमा नहीं, वरन केवल उसके पवित्र नाम की उन्नति चाहते हों। आदि।

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