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तैंतीसवाँ उपदेश, जो पाँचवें अध्याय पर तीसरा है - गलातियों 5:7-10
जो पाँचवें अध्याय पर तीसरा है।
7 तुम तो भली भाँति दौड़ रहे थे; अब किस ने तुम्हें रोक दिया कि तुम सत्य को न मानो?
8 यह समझाना उसकी ओर से नहीं जिसने तुम्हें बुलाया।
9 थोड़ा-सा ख़मीर सारे गूँधे हुए आटे को ख़मीर कर देता है।
10 मुझे प्रभु में तुम पर भरोसा है कि तुम और कोई दूसरा विचार न रखोगे; पर जो तुम्हें घबरा देता है, वह कोई क्यों न हो, दण्ड पाएगा।
हम जानते हैं कि परमेश्वर ने हमारे जीने के लिए ऐसा नियम ठहराया है कि यदि हम उसके वचन पर कान लगाएँ, तो हमें इधर-उधर भटकना न पड़ेगा, वरन् हम निश्चय के साथ सीधा मार्ग पकड़े रहेंगे। और यही वह बात है जिसमें विश्वासी और अविश्वासी एक-दूसरे से भिन्न हैं। क्योंकि जो लोग अपने आपको परमेश्वर के वचन के अधीन करते हैं, वे अपने मन में इस विषय में किसी सन्देह या तर्क-वितर्क में नहीं पड़ते कि उनके कार्य उचित हैं या नहीं; क्योंकि इस बात का न्याय करने का अधिकार परमेश्वर को छोड़ और किसे है? और उसने तो अपना निर्णय पहले ही सुना दिया है। इसलिए जब मनुष्य के जीवन की उपमा एक दौड़ से दी गई है, तो आओ, हम सीखें कि जिधर भी परमेश्वर हमें बुलाए उधर ही चलें, और तब हम उन अभागे भटकनेवालों के समान न भटकेंगे जो बहुत अधिक दौड़-भाग करके बिना किसी लाभ के थक जाते हैं।
और इसी कारण सन्त पौलुस भी इस पद में दो प्रकार की दौड़ बताता है: एक भली, जिसकी दिशा सीधी है, और दूसरी भटकनेवाली और अनिश्चित। अब मनुष्यों के लिए केवल बहुत परिश्रम करना ही काफ़ी नहीं है; उन्हें एक निश्चित लक्ष्य की ओर भी ताकना चाहिए। इसके साथ हम यहाँ यह भी देखते हैं कि जो दौड़ भली गिनी जानी चाहिए और जो दौड़ मनुष्यों को केवल व्यर्थ थकाती है, उन दोनों में सच्चा भेद क्या है। क्योंकि सन्त पौलुस उन्हें निश्चय और अचूकता के साथ बताता है, जब वह कहता है कि जो सब सत्य को मानते हैं, वे भली भाँति दौड़ते हैं। देखो, यह कितना भारी वचन है! क्योंकि इससे हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जब मनुष्य अपनी ही कल्पनाओं के पीछे चलते हैं, या केवल अटकल से चलते हैं, या जो कुछ उनसे कहा जाए उसे बिना विवेक और समझ के ग्रहण कर लेते हैं, तो वे चाहे बहुत तेज़ दौड़ें, पर परमेश्वर के कुछ भी निकट नहीं पहुँचेंगे। जब वे अपना सारा जीवन यात्रा में बिता चुकेंगे, तो अपने आपको आरम्भ से भी अधिक दूर पाएँगे। इसलिए आओ, हम इसी बात से आरम्भ करना सीखें, अर्थात् उस परमेश्वर की सुनना जो हमें शिक्षा देने की कृपा और प्रतिष्ठा देता है, और यह निश्चय जानना कि उसी से निकले हुए सत्य के सिवा और कोई सत्य नहीं है, और जब मनुष्य अपने मस्तिष्क की कल्पनाओं के पीछे चलते हैं, तो वह केवल असत्य और झूठ ही होता है।
तो देखो, सन्त पौलुस के इस वचन से हमारी भलाई होने का मार्ग यह है कि पहले हम यह विचार करें कि वे सब भक्ति-क्रियाएँ जो मनुष्य अपने ही मन से गढ़ लेते हैं, शैतान के छलावों के सिवा और कुछ नहीं हैं, और जो लोग वही करते हैं जो उन्हें स्वयं सबसे अच्छा लगता है, वे चाहे बहुत तेज़ दौड़ें, तौभी सही मार्ग पर एक पग भी आगे नहीं बढ़ेंगे, वरन् और पीछे हट जाएँगे। इसलिए उस आज्ञाकारिता को छोड़, जो हम परमेश्वर के सत्य के प्रति दिखाते हैं, और किसी बात को अच्छी चाल या दौड़ मानकर स्वीकार नहीं करना चाहिए। यदि आज का संसार यह बात भली-भाँति जानता होता, तो इतना झगड़ा और विवाद न दिखाई देता जितना अब दिखाई देता है। क्योंकि इसका क्या कारण है कि हम सब एक ही रेखा पर नहीं चलते, और हम में से हर एक अपने पड़ोसी की ओर हाथ नहीं बढ़ाता? कारण यह है कि अधिकांश लोग परमेश्वर की आज्ञा मानने के लिए राज़ी नहीं किए जा सकते। इसीलिए भविष्यद्वक्ता यशायाह हमें विश्वासियों की सच्ची दौड़ भली-भाँति दिखाता है, जब वह कहता है कि हर एक अपने साथी का हाथ पकड़कर कहेगा, "आओ, हम यहोवा के पर्वत पर चढ़ें, और वह हमें अपने मार्ग सिखाएगा।" अब यदि हम इस बात पर पूरी तरह दृढ़ हो जाएँ, और परमेश्वर के अधीन होने के लिए सर्वथा इच्छुक और अभिलाषी हों, तो निश्चय है कि हम सब साथ-साथ दौड़ेंगे, आगे चलनेवाला पीछे रह जानेवाले की सहायता करेगा, और निर्बल लोग अपने अगुवों से ईर्ष्या न करेंगे, वरन् इससे उन्हें आगे बढ़ने का साहस मिलेगा।
परन्तु यद्यपि हम संसार को हठ से भरा और हर एक को अपनी ही रुचि के पीछे चलनेवाला देखते हैं, तौभी हमें इस शिक्षा से लाभ उठाना चाहिए; अर्थात् अपनी इन्द्रियों को वश में रखें, कि जो जी चाहे वह करने की उच्छृंखल स्वतंत्रता न लें, परन्तु सत्य के आज्ञाकारी बनें, और निश्चय जानें कि जिस नींव पर हमें निर्माण करना है, वह परमेश्वर के वचन के प्रति हमारी वही सच्ची आज्ञाकारिता है। और सन्त पौलुस जो "सत्य" शब्द का प्रयोग करता है, वह विशेष रूप से सब मूर्खतापूर्ण धृष्टता और अभिमान को गिराने के लिए है, क्योंकि मनुष्य अपने आपको यह समझाते हैं कि वे अपना जीवन चलाने के लिए पर्याप्त बुद्धिमान हैं। और इसी अतिसाहस से सब अन्धविश्वासों की जड़ भी फूटी। क्योंकि यदि मनुष्य अपने आपको वैसा जानते जैसे वे वास्तव में हैं, अर्थात् दीन, अन्धे और अज्ञानी, तो निश्चय है कि वे पूरी दीनता के साथ परमेश्वर की सुनते, और तब इतने दल और सम्प्रदाय न होते जितने हैं। पर क्या करें? जैसा मैंने पहले कहा, मनुष्य अत्यन्त बुद्धिमान बनना ही चाहते हैं। अब सन्त पौलुस सब ऊँचाई को गिराने और हमें सब घमण्ड और धृष्टता से छुड़ाने के लिए कहता है कि सत्य उसी शिक्षा में मिलता है जो परमेश्वर की ओर से आती है, और हम अपने आपको कितना ही निश्चित क्यों न समझें, हम में निरी मूर्खता के सिवा और कुछ नहीं है, जब तक परमेश्वर हम पर शासन न करे और परमेश्वर का वचन हम पर पूरी रीति से राज्य न करे।
इसके अतिरिक्त, हम यह भी समझें कि अपने आपको सीखने के योग्य बनाना, बिना किसी तुलना के, उन बातों पर वाद-विवाद करने और उनकी खोज-बीन करने से कहीं बड़ा गुण है जो हमसे सम्बन्ध नहीं रखतीं और हमारे लिए उचित भी नहीं हैं। यह सच है कि विश्वास कोई सनक या मूढ़ता नहीं है कि जो कुछ हमसे कहा जाए उसे बिना कोई आपत्ति किए मान और ग्रहण कर लें; परन्तु फिर भी जब परमेश्वर बोलता है, तो हमारा कर्तव्य है कि उसे इतना आदर दें कि अपने मुँह बन्द रखें, और अपने कान खोलकर उसकी बात को ध्यान से सुनें, और सीधाई से अपने आपको उसके अनुसार ढालें।
तो देखो, वह भली दौड़, जिसमें हम कभी भूल नहीं कर सकते और न इधर-उधर बहकाए जा सकते हैं, यही है कि उस मार्ग पर चलें जो परमेश्वर अपने वचन के द्वारा हमें दिखाता है। नहीं तो (जैसा मैंने कहा) हम केवल भटकते ही रहेंगे, जैसा कि सन्त पौलुस भी इसी उपमा का प्रयोग करके उन सब बातों का उपहास करता है जो अज्ञानी और अविश्वासी परमेश्वर की सेवा के लिए करते हैं। क्योंकि चाहे वे कितना ही परिश्रम करें, तौभी वे अपना परिश्रम व्यर्थ ही गँवाते हैं।
परन्तु इसी प्रसंग में हम यह भी ध्यान दें कि वह गलातियों को उनकी दौड़ के बीच में मुड़ जाने के लिए किस प्रकार दोषी ठहराता है, और कहता है कि उनका अपराध इसलिए और भी अधिक अक्षम्य है कि उन्होंने अच्छा आरम्भ किया था, परन्तु अन्त तक वैसे ही स्थिर न रहे। यह सच है कि संसार के सबसे अज्ञानी लोग भी, यदि वे परमेश्वर के वचन को न मानें, तो दोषी ठहराए जाने से न बचेंगे; पर चाहे उनका जो हाल हो, हम कहीं अधिक घोर अपराध करते हैं जब परमेश्वर ने एक बार हम पर ऐसी कृपा की कि हमें अपने पास बुलाया और अपनी इच्छा हम पर प्रगट की। तब यदि हम परमेश्वर की पाठशाला में शिक्षा पाने और मार्ग में प्रवेश कर लेने के बाद पीठ फेरें और स्वर्ग की अपनी पवित्र बुलाहट को छोड़ दें, तो निश्चय ही हमारा अपराध दुगुना है और हम कहीं कठोर दण्ड के योग्य हैं। सन्त पौलुस का इस पद में "क्यों, तुम तो भली भाँति दौड़ रहे थे," कहने का यही अर्थ है। निश्चय ही विश्वास की यह तत्परता बड़ा गुण है, अर्थात् जब परमेश्वर हमसे बात कहे, तो हम तुरन्त उसे उत्तर देने को तैयार हों; परन्तु अन्त तक डटे रहे बिना वह कुछ भी मूल्य नहीं रखती। इसलिए यदि हम ऐसे चंचल और अस्थिर हैं कि एक-दो पग आगे बढ़कर फिर पीछे दौड़ने को तैयार हो जाते हैं, या एक ओर या दूसरी ओर छिटक जाते हैं, तो ऐसी अकृतज्ञता उस दशा से कहीं अधिक लज्जाजनक है जिसमें हमने परमेश्वर की कभी सुनी ही न होती: क्योंकि हम अज्ञानता की आड़ उस प्रकार नहीं ले सकते जैसे वे लोग लेते हैं जो भ्रम और अज्ञान में जन्मे और पले हैं, और जो कह सकते हैं कि यदि हम जानते कि सत्य क्या है तो हम ऐसा न करते जिससे हमारे कान खींचने की आवश्यकता पड़े: पर हम तो सन्देह में हैं और नहीं जानते कि किधर मुड़ें।
तब यदि वे लोग, जिन्होंने परमेश्वर के पीछे चलना आरम्भ किया है, वरन् उसके वचन के द्वारा कुछ निश्चित और अचूक शिक्षा भी पाई है, बाद में एक ओर छिटक जाएँ या फिर पीछे लौट जाएँ, तो क्या वे यह नहीं दिखाते कि वे यह अज्ञानता से नहीं, परन्तु जानबूझकर और हठ से करते हैं, मानो वे जान-बूझकर परमेश्वर को चिढ़ाना चाहते हों? अब हमें इस बात पर विशेष ध्यान देना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर हम पर ऐसा कृपालु है कि हमें उद्धार का मार्ग दिखाता है, जो वह शेष संसार को नहीं करता। क्योंकि हम बहुत से अन्धे अभागों को इधर-उधर दौड़ते-भागते देखते हैं जो नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं; फिर भी वे परमेश्वर की सेवा करने की कुछ इच्छा दिखाते हैं। यदि कोई उनसे पूछे कि क्या वे समझते हैं कि वे भला कर रहे हैं या नहीं, तो वे उत्तर देते हैं, हाँ; परन्तु यह केवल अनुमान है, उन्हें इसका निश्चय नहीं। परन्तु हमारे पास पवित्र आत्मा की गवाही है, जो हमारे हृदयों में मुहर की जानी चाहिए, कि जो शिक्षा हमें सुनाई जाती है वह मनुष्यों की गढ़ी हुई नहीं, परन्तु परमेश्वर ही उसका कर्ता है। पवित्रशास्त्र की प्रामाणिकता पर्याप्त रूप से सिद्ध हो चुकी है: हम बिना कुछ और जोड़े जानते हैं कि परमेश्वर हमारा मार्गदर्शक है, इसलिए आज कोई ऐसा निपट मूर्ख या जड़बुद्धि नहीं जो उचित रीति से दोषी न ठहरे, यदि वह उस शिक्षा को ग्रहण न करे जो सुनाई और प्रकट की जाती है, और अपने ही ज्ञान से जान सकता है कि वह स्पष्टतः परमेश्वर के विरुद्ध जान-बूझकर युद्ध कर रहा है।
यह देखते हुए कि हमारे प्रभु ने हमें यह विशेषाधिकार दिया है कि हमें अपने पास बुलाए, और अब भी प्रतिदिन हमें फुसलाता और आगे बढ़ने को उत्साहित करता है, जब तक कि हम अपनी दौड़ के अन्त तक न पहुँच जाएँ: यदि हम उसकी सुनने से थक जाएँ, और हम में से हर एक अपनी छूट लेकर जो अपनी वासना को भाए उसी के पीछे चलना चाहे, तो हम क्या बहाना या उपाय सोच सकते हैं कि गलातियों के साथ दोषी न ठहराए जाएँ, जो भली भाँति दौड़ने और मार्ग में अच्छी तरह आगे बढ़ चुकने के बाद अपनी ही झुकाव के पीछे चले गए? हाँ, और हमें सन्त पौलुस का यह बीच में डाला हुआ वचन भी ध्यान में रखना चाहिए, "किस ने तुम्हें रोक दिया?" वह केवल इतना कह सकता था, जैसा उसने पत्री के आरम्भ में कहा, कि वे बिलकुल हट गए, वरन् धर्मत्यागियों या पीछे हटनेवालों के समान पूरी तरह विद्रोह कर बैठे। परन्तु वह "रोकना" शब्द इसलिए प्रयोग करता है कि दिखाए कि हमारे लिए केवल इतना ही काफ़ी नहीं कि हम परमेश्वर से पूरी तरह न मुड़ जाएँ, परन्तु यदि हम केवल रुकें या ढीले पड़ें, और सीधे आगे न बढ़ते रहें, और परमेश्वर के अधिक से अधिक निकट आने में सदा दृढ़ता से लगे न रहें, तो यह भी पहले से ही बहुत भयानक बात है। इसलिए आओ, हम शैतान की चालों से सावधान रहें, और परमेश्वर की आज्ञाकारिता से पूरी तरह विद्रोह कर देने से ही न डरें, वरन् यह भी भली-भाँति मन में रखें कि जब शैतान एक बार हमें ठण्डा कर दे और हमारी चाल ढीली कर दे, ऐसा कि हम चलने में आलस्य करने लगें, तो वह हमसे बहुत अधिक पा चुका होगा।
इस प्रकार तुम देखते हो कि इस पद से हमें सार रूप में क्या सीखना है। अब गलातियों की अकृतज्ञता को और अच्छी रीति से दोषी ठहराने के लिए वह जोड़ता है कि यह समझाना उसकी ओर से नहीं था जिसने उन्हें बुलाया। पहले अध्याय में उसने कहा था, "मुझे आश्चर्य होता है कि जिसने तुम्हें मसीह के अनुग्रह से बुलाया उससे तुम इतनी जल्दी फिरकर और ही प्रकार के सुसमाचार की ओर झुकने लगे।" क्योंकि यह उचित ही है कि जब परमेश्वर हमें सिखाने के लिए अपना पवित्र मुँह खोले, तो उसकी सुनी जाए। हम क्या हैं? पृथ्वी के अभागे कीड़े और सड़ाहट; तौभी हमारा प्रभु स्वर्ग से अपनी वाणी गुँजाता है, कि हमें निश्चय दिलाए कि यदि वह हमें प्रकाश दे और मार्ग दिखाए, तो हम भूल नहीं कर सकते, और इसलिए हमें पूरी तरह उसी पर निर्भर रहना और उसके सत्य पर विश्राम करना चाहिए।
परन्तु यदि हम इसकी और उसकी सुनें, और जब परमेश्वर बोलता है तब हम हवा में उड़ते फिरें, और एक की सीटी और दूसरे के गीत पर कान लगाएँ: तो क्या यह बहुत ही लज्जाजनक अकृतज्ञता नहीं? यदि कोई शिक्षक देखे कि उसके विद्यार्थी, जब वह उनसे बात कर रहा है, आपस में बकबक कर रहे हैं, या हवाई क़िले बना रहे हैं, ऐसा कि वे सुन ही नहीं रहे कि वह क्या कह रहा है: तो छड़ी को उनके बीच चलना ही पड़ेगा, और उचित भी यही है। निश्चय कोई मनुष्य यह सह नहीं सकता कि जब वह अपने साथी या संगी से बात कर रहा हो तब वह दूसरी बातों के ध्यान में खोया रहे, वरन् वह इसे अपमान और उपहास समझेगा। परन्तु देखो, परमेश्वर हमें बुलाता है, और फिर भी यदि कोई धोखेबाज़ हमारे कान में फुसफुसाने आए, तो हम उसकी सुनते और उसकी सलाह पर चलते हैं: जो इस बात का चिह्न है कि हमारे भीतर कभी वह ज्ञान था ही नहीं कि हम अपने परमेश्वर की महिमा को पहचानें और उसे वह श्रद्धा दें जिसका वह अधिकारी है।
हम जानते हैं कि वह हमसे जो मुख्य आदर माँगता है वह यह है कि हमारी बुद्धि और मन इस बात को समझने में लगे रहें कि वह क्या आज्ञा देता और ठहराता है। इसी कारण सन्त पौलुस कहता है कि वह समझाना परमेश्वर की ओर से नहीं था जिसने गलातियों को बुलाया था। अब यह निश्चय है कि उसने उन्हें उस समय से बहुत पहले बुलाया था: तौभी वह यह नहीं मानता कि एक ही बार हमें बता देना काफ़ी है कि हमें कैसे चलना चाहिए, परन्तु वह लगातार कहता रहता है, जैसा कि हमें भी आवश्यकता है कि उस शिक्षा की याद हमारे लिए प्रतिदिन नई की जाए।
इसलिए जब ऐसा है कि परमेश्वर सदा हमारे पास रहता है, वरन् (जैसा भविष्यद्वक्ता यशायाह कहता है) भोर और साँझ दोनों, अर्थात् वह हमें अपने तक लाने और अधिक से अधिक निकट खींचने की निरन्तर चिन्ता रखता है: तो निश्चय है कि हमारा अपराध उतना ही अधिक घोर है यदि हमारा एक कान खेत में और दूसरा नगर में हो, जैसा कि कहावत है, और हम पूरी तरह उसके और उसके वचन के न हों। संक्षेप में, हम यहाँ देखते हैं कि परमेश्वर की सन्तानों की सच्ची सिद्धता यह है कि वे अपने आपको पूरी तरह उसे अर्पित करें, और पूरी सीखने की तत्परता के साथ शान्त भाव से अपने आपको उससे चलने दें, ऐसा कि उनमें से कोई यह न कहे, यह मेरी राय है, यह मेरी धारणा है, यह मैंने मनुष्यों से सीखा है: वरन् सदा विश्वास की आज्ञाकारिता को सब बातों से ऊपर रखें। क्योंकि हमें ठीक मार्ग दिखाने के लिए परमेश्वर के वचन के सिवा और कोई दीपक नहीं। इसे एक बात के रूप में स्मरण रखो।
अब सन्त पौलुस ऐसा कहने के बाद जोड़ता है कि थोड़ा-सा ख़मीर सारे गूँधे हुए आटे को बिगाड़ देता है। यह उस बात की पुष्टि करता है जिसे मैंने अभी थोड़ी देर पहले छुआ था: अर्थात् हमारे लिए यही काफ़ी नहीं कि हम परमेश्वर से पूरी तरह विद्रोह न करें, उसे सर्वथा न छोड़ दें और उसके सारे वचन का इनकार न करें, परन्तु हमें शुद्ध और खरे भी बने रहना है, और मानो कमर कसकर अपने आपको और अधिक आगे बढ़ाना है, और यद्यपि शैतान हमारे मार्ग में रोड़े और अड़चनें डालने की युक्तियाँ और प्रयत्न करे, तौभी हमें आगे बढ़ते रहने से न रुकना चाहिए। और इसे और भी अच्छी तरह ध्यान में रखना चाहिए, क्योंकि शैतान आरम्भ में (जैसा कहते हैं) अपने सींग नहीं दिखाता कि हमें परमेश्वर से दूर खींचे, परन्तु अपने आपको ज्योतिर्मय स्वर्गदूत का रूप बना लेता है, और पगडण्डियों और भूमि के नीचे की सुरंगों से हम पर रेंगता आता है। और इसी प्रकार हम धोखा खाते हैं। क्योंकि हमें लगता है कि यह या वह कोई बड़ी बात नहीं, जिससे हम उसे सहज ही लाँघ जाते हैं और, जैसा कहते हैं, पाल उतार देते हैं। परन्तु जब शैतान हमें अपने जालों में नक़ाब पहनाकर थामे रखता है, तब हम सर्वथा भौंचक्के रह जाते हैं।
संक्षेप में, सन्त पौलुस यहाँ यह कहना चाहता था कि जब मनुष्यों ने सुसमाचार सीख लिया है, तो उनके लिए केवल इतना ही काफ़ी नहीं कि वे उसमें निहित शिक्षा को ग्रहण करने का दावा करें, परन्तु उनका विश्वास शुद्ध, खरा और ठोस भी होना चाहिए, और वे न दाहिने न बाएँ मुड़ें, न किसी भूल से बिगाड़े जाएँ, न किसी मिलावट को स्वीकार करें, परन्तु उस शुद्ध सत्य को दृढ़ता से थामे रहें जो परमेश्वर हमें दिखाता है। यही उस बात का सार है जो हमें इस पद से लेनी है।
परन्तु यदि कभी यह चेतावनी आवश्यक थी, तो आज के दिन आवश्यक है। क्योंकि शैतान अपनी पूरी शक्ति लगाता है कि परमेश्वर के वचन को उलझाए, वरन् उसे गले लगा ले, जिससे मनुष्य सफ़ेद और काले का भेद न पहचान सकें, और जो-जो धर्म मनुष्य चाहें वे सब अच्छे माने जाएँ। और जो लोग यह चतुराई करते हैं, वे शैतान की सेवा करते हैं, और उन्हें परमेश्वर या धर्म का उतना भी भय नहीं जितना कुत्तों को होता है। आज पोप के जो सबसे अच्छे समर्थक हैं, वे यह भली-भाँति देखकर कि उनकी बुराइयाँ इतनी घोर और सब मर्यादा से बाहर रही हैं कि उनका बचाव करना असम्भव है, कहते हैं, ठीक है, तौभी तुम्हें ऐसा सुधार नहीं चाहना चाहिए कि, जैसा कहते हैं, बाम मछली को कमर से तोड़ दिया जाए: मनुष्यों को किसी भले बीच के मार्ग से सन्तुष्ट होना चाहिए। और यह सब केवल उनकी गन्दगी को ढाँपने के लिए है, मानो कोई मनुष्य जो किसी विषैले पौधे को उखाड़ना चाहे, उसकी कुछ पत्तियाँ ही तोड़ दे और कहे, देखो, अब तो यह कटे हुए के बराबर है। हाँ, पर जड़ तो बाकी सब भाग के साथ पीछे रह गई, जो बहुत हानि पहुँचा सकती है, और वह वैसा ही है मानो उसे छुआ ही न गया हो। तौभी आज का संसार ऐसे कीड़े-मकोड़ों और सड़ाहट से भरा है: क्योंकि हम देखते हैं कि ये झगड़ालू और तटस्थ लोग, जो दो धाराओं के बीच नाव खेते हैं, हमारे प्रभु यीशु मसीह को इस प्रकार बहरूपिया बनाना चाहते हैं कि वह बेकार पद-हीन ठहरे और फिर कोई उसे न पहचाने, और सुसमाचार की शिक्षा खिचड़ी की तरह मिला दी जाए। इसलिए हमारे लिए और भी आवश्यक है कि हम उस बात को भली-भाँति ध्यान में रखें जो पवित्र आत्मा यहाँ हमें बताता है, अर्थात् यह कि थोड़ा-सा ख़मीर सारे गूँधे हुए आटे को खट्टा कर देता है। कभी-कभी यह उपमा मनुष्यों पर लगाई जाती है: क्योंकि, जैसा कहते हैं, एक खुजलीवाली भेड़ पूरे झुण्ड को संक्रमित करने के लिए काफ़ी है। परन्तु सन्त पौलुस अब शिक्षा के विषय में बोल रहा है, मानो वह कहता हो कि हमें अपनी बात पर डटे रहना चाहिए और परमेश्वर के शुद्ध वचन में कुछ भी जोड़ने नहीं देना चाहिए, जैसा हमने कुरिन्थियों के नाम दूसरी पत्री में देखा, कि वह कहता है कि जो शैतान के छलावों की ओर कान लगाते हैं, वे उस स्त्री के समान हैं जो किसी दलाल की सुनती है, जिसका आना उसे धोखा देने और बिगाड़ने के लिए होता है।
अब जैसे ही हम अपने विश्वास में इस प्रकार बिगड़ जाते हैं: तुरन्त हम अपने प्रभु यीशु मसीह से पराए हो जाते हैं, और उस विवाह की प्रतिज्ञा को तोड़ देते हैं जो उसके और हमारे बीच बाँधी गई है, जैसे ही हम सुसमाचार की सीधाई से एक ओर हट जाते हैं। और जैसे उस स्थान में उसने "सीधाई" शब्द जानबूझकर प्रयोग किया, वैसे ही इस स्थान में वह कहता है कि यदि हम आटे में ज़रा-सा भी ख़मीर मिला दें, तो तुरन्त सब खट्टा हो जाता है। तब हमें क्या करना चाहिए? जब परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था के द्वारा यहूदियों को वह सच्चा उपाय दिखाना चाहा कि वे इस प्रकार चलें कि इधर-उधर सताए-भटकाए न जाएँ, तो सुसमाचार में उसने हमें और भी अधिक सिद्धता के साथ सिखाया है, क्योंकि वहाँ उसने सब भविष्यवाणियों का अन्त कर दिया है। तो जब ऐसा है: तो आओ अब हम अपने आपको उसी के अनुसार ढालें। और यद्यपि शैतान दोनों ओर से हमारे कान में फुसफुसाए, तौभी हम उन सरकण्डों के समान न हों जो हर हवा से हिलते हैं, परन्तु अपने प्रभु यीशु मसीह में ऐसे जड़ पकड़े हुए हों कि वह हमें विश्वास की सामर्थ्य से सब आँधी-पानी और सब आक्रमणों को, जो हम पर आ सकते हैं, सहने के योग्य बनाए।
संक्षेप में, यदि हम चाहते हैं कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के चेले गिने जाएँ: तो आओ हम उसके सिवा और किसी स्वामी या शिक्षक की न सुनें: क्योंकि जो कुछ वह हमारे लिए लाता है उसमें कुछ जोड़ने से बढ़कर हम उसका और कोई अनिष्ट नहीं कर सकते। क्योंकि कहा गया है कि वही है जिसे पिता ने पूर्ण प्रधानता के साथ हम पर ठहराया है, और जो अच्छा चरवाहा है, और जो उसके झुण्ड के हैं वे उसकी आवाज़ सुनेंगे और परायों की आवाज़ से भागेंगे। संसार का जो भी हाल हो, हमें उसी आधार पर दृढ़ रहना है, और बिना विरोध किए जिधर भी परमेश्वर बुलाए उधर चलना है, और अपने आपको इस प्रकार मोड़े-घुमाए जाने देना है कि हम उसके वचन के अधीन होने के सिवा और कुछ न चाहें, जैसा मैं पहले बता चुका हूँ। और इसलिए यद्यपि समय-समय पर लोग अपनी मिलावटों पर रंग-रोगन चढ़ाने के लिए सुन्दर आवरण ढूँढ़ लेते हैं: तौभी हम उसी पर टिके रहें जो यहाँ कहा गया है, अर्थात् यह कि थोड़ा-सा ख़मीर सारे गूँधे हुए आटे को बिगाड़ने के लिए काफ़ी है: जैसा कि हम बहुतों को देखेंगे, जो हमें भटकाने के लिए यह दलील देंगे, क्या? यह यीशु मसीह का इनकार नहीं है, जब तक हम सुसमाचार की नींव थामे रहें, कि हम परमेश्वर की सेंतमेंत की भलाई से धर्मी ठहराए जाते हैं, और कि हम उसे उसके नाम से पुकार सकते हैं जिसने हमारा मध्यस्थ होने की प्रतिज्ञा की है। जब हम से कोई भूल हो जाती है तो हम हमारे प्रभु यीशु मसीह के एकमात्र और सनातन बलिदान की शरण लेते हैं; और यदि इसके अतिरिक्त कुछ छोटे धब्बे या कीड़े हों, तो उन्हें सहना और उनकी ओर से आँख मूँद लेना चाहिए। और विशेषकर वे लोग जो अपने घमण्ड से जीतना चाहते हैं, कहेंगे, हाँ महाशय, और हम मेल-मिलाप के सिवा और क्या चाहते हैं? क्योंकि हम इससे सन्तुष्ट हैं कि हर कोई सुसमाचार की शिक्षा में चले: पर यह कोई इतनी बड़ी महत्त्व की बात नहीं कि उस पर इतना अड़ा जाए।
इसलिए जब शैतान ऐसे चारों से हमें धोखा देने चले, तो हम सदा उसके विरुद्ध यह ढाल उठाएँ कि थोड़ा-सा ख़मीर सारे गूँधे हुए आटे को खट्टा कर देता है। और सचमुच अनुभव ने भी (जिसे मूर्खों की गुरु कहा जाता है) हमारे समय में भली-भाँति दिखा दिया है कि सन्त पौलुस का यह वचन कितना सच है। क्योंकि हम आज देखते हैं कि जहाँ सुसमाचार शुद्धता से प्रचार किया गया है, वहाँ इतने भिन्न-भिन्न मत हैं कि सोचकर भी भय लगता है, ऐसा कि प्रतिदिन लगता है कि सब कुछ नष्ट हो जाएगा, और परमेश्वर का सत्य मानो टुकड़े-टुकड़े किया जा रहा है। और इसका कारण क्या है, सिवा इसके कि मनुष्य आलसी हैं, कि वे अपने आपको चैन में रखना चाहते हैं, और अपनी सुविधाएँ और आराम मनचाहे पाना, और सब जगह अपना सुख भोगना चाहते हैं, और इस कारण उनके साथ सहमत हो गए जो सुसमाचार की शुद्धता को ढाँपने आए? इसलिए परमेश्वर ने उन्हें उनका उचित बदला दे दिया है। तो जब हम ऐसे उदाहरण देखते हैं, तो हम उतने ही अधिक सावधान हों, और सुसमाचार की शुद्धता में इस प्रकार चलें कि हर प्रकार की मिलावट को ठुकराएँ और उससे पूरी तरह घृणा करें। अब इस पर सन्त पौलुस आगे जोड़ता है कि उसे गलातियों के विषय में भरोसा है कि वे और कोई दूसरा विचार न रखेंगे।
हमने देखा है कि जो डाँट उसने अब तक कही, वह कठोर और तीखी थी। अब जब मनुष्य मर्यादा से बढ़ जाते हैं, तो यह सदा ही जोखिम भरा होता है, कि लोग हतोत्साहित हो जाएँ और उदासी में डूब जाएँ। इसी कारण सन्त पौलुस अपने आपको संयत करता है, और गलातियों से फिर मेल करने का यत्न करता है। और सचमुच यही वह रीति है जिसे उन सब को निभाना चाहिए जो परमेश्वर की कलीसिया की उन्नति करने के अभिलाषी हैं। यह सच है कि मनुष्यों के दोषों को बख़्शना नहीं चाहिए, और विशेषकर जब शुद्ध शिक्षा में कोई बाधा या विश्वास के गिराए जाने का कोई संकट दिखाई दे: तब हमें आग जैसा जोश रखना चाहिए कि पुरुषार्थ के साथ लड़ें और अपने परमेश्वर के पक्ष का समर्थन करें। तौभी हमें अपनी पूरी शक्ति से यत्न करना चाहिए कि जो भटक गए हैं उन्हें लौटा लाएँ, और जो अभी अच्छे मार्ग में हैं उन्हें थामे रखें, चाहे वे निर्बल हों और उस बल और साहस के साथ आगे न बढ़ें जैसा आवश्यक और वांछित है।
तो देखो, उन लोगों का कर्तव्य क्या है जिन्हें परमेश्वर का वचन फैलाने का भार सौंपा गया है: अर्थात् यह कि जो भटक गए हैं उन्हें डाँटने में उनकी कठोरता और सख़्ती ऐसी हो कि तौभी वे कुछ अच्छी आशा दिखाएँ, ताकि उनके सुननेवाले पूरी तरह दुखी होकर हठ में न पड़ जाएँ और सारी भली शिक्षा को झटक न दें। परन्तु हम में से हर एक को इसे अपने ही लिए लागू करना चाहिए। क्योंकि जब परमेश्वर हमें डाँटता है तो हम समय-समय पर दाँत पीसने क्यों लगते हैं, और ऐसे हठ से पहले ही भरे क्यों रहते हैं कि उसके विरुद्ध बलवा करते हैं? इसका कारण यह है कि हम आशा छोड़ बैठे हैं, और इसलिए, जैसा कहते हैं, दुगुना दाँव लगा देते हैं। इसलिए हमारा प्रभु हमें ऐसी निराशा में, वरन् विनाश के मार्ग में, देखकर हमें लौटा लाने का यत्न करता है, और फिर भी हमें अपने पास जीत लेना चाहता है, यद्यपि इस बीच हम उस अन्त और उद्देश्य को नहीं जानते जिसकी ओर वह लक्ष्य करता है। इसी कारण हम उसके लिए द्वार बन्द कर देते हैं, ऐसा कि वह किसी रीति से हमें पा नहीं सकता।
इसलिए सन्त पौलुस हमें यहाँ जो बात दिखाता है, उस पर हमें और भी अधिक मन लगाना चाहिए, अर्थात् यह कि यदि हमारे घाव छुए जाएँ, तो यद्यपि कड़ी डाँट से हमें दुख और चुभन होती है, तौभी हमें उसे धीरज से सहना नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर हमें सिर के बल अथाह गड्ढे में नहीं फेंकना चाहता, वरन् हमें अपने घर बुला रहा है। और अब इसी के अनुसार ध्यान दें कि हमारे सब दोषों का और कोई उपाय नहीं सिवा इसके कि हम अपने आपको उसके अधीन करें जो परमेश्वर हमसे कहता है। क्योंकि सन्त पौलुस वह बात पहले से मानकर चलता है जो सच थी: अर्थात् यह कि उसने सुसमाचार की शिक्षा शुद्धता से सुनाई थी, और अपने ही स्वप्न और बकवाद सुनाने के लिए स्वयं को घुसेड़ा नहीं था, परन्तु अपना कर्तव्य और जो आज्ञा उसे सौंपी गई थी उसे शुद्धता से निभाया था। अब वह कहता है कि गलाती यह सब ऐसा ही मानेंगे। और इस प्रकार वह हमें सामान्य रूप से दिखाता है कि यदि हमसे चूक हुई हो और शैतान ने हमारे मन को व्याकुल किया हो, और धोखेबाज़ों ने भी हमें मार्ग से बाहर धकेल दिया हो: तो और कोई सहारा नहीं सिवा इसके कि हम चुप रहें और अपने परमेश्वर को आमीन कहें, और अपने आपको उसके वचन से चलने दें, उसकी सच्ची आज्ञाकारिता करना न छोड़ें, चाहे वह दिखाई देनेवाले रूप में स्वर्ग से न उतरे, और न अपनी महिमा के चिह्न लिए हुए अपने स्वर्गदूतों में से किसी को भेजे, परन्तु हमसे दुर्बल मनुष्यों के द्वारा बोले, जिनकी कोई बड़ी प्रतिष्ठा नहीं। देखो, सार रूप में हमें यह स्मरण रखना है।
अब इस पर सन्त पौलुस सबसे कठोर बातें उन बहकानेवालों की ओर मोड़ता है जिन्होंने गलातियों की कलीसिया में अपना जंगली दाना बोया था। वह कहता है, "जो तुम्हें घबरा देता है, वह कोई क्यों न हो, दण्ड पाएगा।" इससे वह प्रगट करता है कि यदि कोई ऐसे हों जिन्हें शैतान ने इतना विषैला कर दिया है कि वे जान-बूझकर परमेश्वर का क्रोध अपने सिर पर भड़काते हैं: तो हमें उससे डगमगाना या विचलित नहीं होना चाहिए। यह चेतावनी अत्यन्त आवश्यक है। क्योंकि यद्यपि हम उन बातों पर विश्वास करने में कठोर और धीमे हैं जो परमेश्वर हमसे कहता है: तौभी इसके विपरीत जब हम कोई भूल देखते हैं, तो उसके पीछे दौड़ पड़ने को तैयार रहते हैं, और इसलिए तुम देखते हो कि यह कैसा हठीला झुकाव है, जो लगभग सब कहीं सामान्य है और साधारण से बढ़कर दोष है। इसके अतिरिक्त, हमें लगता है कि हम बहुत सुख से हैं यदि हमें कोई आड़ मिल जाए, और शैतान को हमें धोखा देने दें, यद्यपि वह हमारे विनाश के सिवा और कुछ नहीं चाहता। इसलिए हमें और भी अधिक ध्यान देना चाहिए कि यहाँ कैसे कहा गया है कि जो कलीसिया को घबराते हैं वे अपना ही दण्ड भोगेंगे। क्योंकि इससे सन्त पौलुस हमें समझाता है कि बहुत से परमेश्वर का तिरस्कार करनेवाले हैं, जिन्हें सब कुछ बिगाड़ने में कोई विवेक की चुभन नहीं होती: बस इतना हो कि वे संसार में अपने लिए प्रतिष्ठा कमा लें और साख बना लें; उनके लिए सब बराबर है, क्योंकि उन्हें अपने आपको ऊँचा उठाने के सिवा किसी बात की परवाह नहीं। ऐसे लोग कलीसिया को हज़ार प्रकार से घबराते हैं। कुछ और हैं जो थोथे घमण्ड के कारण और कुशल और तीक्ष्णबुद्धि दिखने के लिए नई शिक्षाएँ गढ़ते हैं। यह बहकानेवालों की एक और जाति है। और कुछ और हैं जो इतने द्वेषी और विषैले हैं कि कोई शान्ति और मेल नहीं सह सकते, जैसा कहा गया है कि इश्माएल का हाथ सब के विरुद्ध होगा और सब के हाथ उसके विरुद्ध। फिर कुछ ऐसे हैं जो फूट और झगड़े के सिवा और कुछ नहीं चाहते। तो जब हम देखते हैं कि शैतानों के पास हमें सही मार्ग से हटाने के लिए इतने सहारे देनेवाले हैं: तो क्या हर एक को अपने बारे में भली-भाँति देखना आवश्यक नहीं कि कहीं वह डगमगा न जाए: और जिस बात को वह जानता है कि हमारे परमेश्वर की है, उसमें सदा दृढ़ बना रहे, चाहे यह या वह मनुष्य कुछ भी बकवाद करे?
तो देखो, सन्त पौलुस का आशय यह है कि हम में से कोई दूसरे की ओर न ताके, उन भेड़ों के समान जो एक के नदी या गड्ढे में कूद जाने पर उसके पीछे एक-एक करके कूद पड़ती हैं, या सारस और अन्य पक्षियों के समान जो एक के पीछे एक पंक्ति में उड़ते हैं, नहीं, हमें ऐसा नहीं करना चाहिए: परन्तु हमें सदा परमेश्वर के वचन से इधर-उधर हटे बिना स्थिर रहना चाहिए। इसे एक बात के रूप में स्मरण रखो। परन्तु सब से बढ़कर सन्त पौलुस हमें बताता है कि जब मनुष्य अपनी चतुराई के बहाने परमेश्वर के शुद्ध सत्य को बिगाड़ते हैं, तो हमें उनके चमकीले दिखावों से चौंधिया नहीं जाना चाहिए: परन्तु जब हम उन्हें देखें कि उन्हें किसी बात की, न धर्म की, परवाह है, न परमेश्वर का भय, न श्रद्धा, वरन् वे कभी-कभी निर्लज्जता से भी बढ़कर निकलते हैं, ऐसा कि यदि वे एक बार इतने आगे बढ़ें कि व्यवस्था को अपने हाथ में ले लें, तो वे किसी की परवाह नहीं करते, वरन् एक प्रकार से परमेश्वर के मुँह पर भी थूक देते हैं: मैं कहता हूँ कि जब हम उन्हें ऐसे राक्षस बनते देखें, तो हमें प्रतीक्षा करनी चाहिए कि परमेश्वर उन पर अपना न्याय निष्पादित करे, और दिखाए कि वह उन प्राणों का कितना मूल्य आँकता है जिन्हें उसने इतने महँगे दाम पर मोल लिया है। और इसी कारण वह जान-बूझकर जोड़ता है "वह कोई क्यों न हो।" क्योंकि यहाँ उसका आशय उन सब चमकीली उपाधियों को मिटाना था जिन पर मनुष्य घमण्ड करते हैं, जब वे परमेश्वर के विरुद्ध अपने रोएँ खड़े करते हैं। जैसा आज के दिन, जहाँ पोप परमेश्वर के सत्य को उलट देता है, और शैतानी घमण्ड से सब कुछ मिला-जुला कर बिगाड़ देता है: तौभी वह अपने आपको परमेश्वर के सेवकों का सेवक, यीशु मसीह का उत्तराधिकारी और सन्त पतरस का प्रतिनिधि कहना नहीं छोड़ता। बिशप भी अपने आपको प्रीलेट कहकर सत्य के सब ज्ञान को दबाने का बहुत ही वैध अधिकार रखनेवाला समझते हैं। परन्तु सन्त पौलुस हमें यहाँ बताता है कि जब मनुष्य इस प्रकार स्वाँग रचते हैं, तो वे इतने पर भी मूर्तियाँ ही हैं, और परमेश्वर अपरिवर्तनीय है और न अपना स्वभाव बदलता है न अपना मन। तो जब ऐसा है: चाहे मनुष्य तीसरे स्वर्ग तक भी ऊँचे उठाए जाएँ, तौभी यदि वे परमेश्वर के वचन की शुद्ध सीधाई में अपनी गढ़ी हुई किसी भी बात को मिलाने का प्रयत्न करें, तो हमें उन्हें निरे शैतान ही समझना चाहिए।
संक्षेप में, हम यहाँ देखते हैं कि जब विश्वास की आज्ञाकारिता सामने आती है तो मनुष्य की सारी तुच्छता ढह जाती है। यह सच है कि नागरिक मामलों में सदा बड़ाई-छुटाई रही है: तौभी परमेश्वर को अपने वचन से शासन करते रहना है, और उसकी सेवा उसी के अनुसार नियन्त्रित होनी चाहिए, ताकि हमारा विश्वास पूरी तरह उसके अनुरूप हो: और यदि सारा संसार उसके विरुद्ध खड़ा हो जाए, और सबसे उत्कृष्ट उपाधियों के कितने ही विशाल और ऊँचे पहाड़ बादलों तक ढेर कर दे, तौभी सब कुछ धुएँ के समान, वरन् मैल और गोबर के समान गिना जाना चाहिए।
इस प्रकार तुम देखते हो कि सन्त पौलुस का कहने का आशय सार रूप में क्या था। तौभी वह यह गलातियों की उनके अविवेकपूर्ण अतिरेक के लिए क्षमा-याचना करने को नहीं कहता, वरन् उन्हें परमेश्वर की ओर लौटने का साहस देने को कहता है। आज बहुत से दिखाई देते हैं जो समझते हैं कि वे परमेश्वर के हाथों से बच निकले हैं और पूरी तरह दोषमुक्त हो गए हैं, जब वे कह सकते हैं कि उनके प्रीलेटों और चरवाहों ने उन्हें ऐसा सिखाया है। परन्तु सन्त पौलुस ऐसा कोई बहाना नहीं मानता, वरन् कहता है कि बहकानेवालों के लिए जो दण्ड तैयार है उससे बचने का उनका मार्ग यह है कि परमेश्वर के शुद्ध सत्य की ओर लौट आएँ, और लौटाए जाने से इनकार न करें, चाहे वे कुछ समय के लिए उससे हट गए हों। और इसके साथ ही समापन में वह हमें समझाता है कि हमारा उद्धार परमेश्वर को कितना प्रिय है, और वह उसे कितना मूल्यवान ठहराता है। क्योंकि सन्त पौलुस का यहाँ यह कहना कि जो भी कलीसिया को घबराते हैं वे इसका लेखा देंगे और परमेश्वर के हाथ से कुचले जाएँगे, इसका कारण क्या है, सिवा इसके कि हम उसकी विरासत हैं, और वह हम में अपनी सारी प्रसन्नता रखता है, उनके समान जिन्हें उसने चुना और गोद लिया है, और इसलिए कि हम मानो उसकी परिपूर्णता हैं, जैसा सन्त पौलुस हमें कहता है? तो जब ऐसा है: तो आओ हम परमेश्वर पर भरोसा रखना सीखें, क्योंकि उसे हमारे उद्धार की ऐसी पितृवत् चिन्ता है। और इस प्रकार हम सब झूठी शिक्षा को दृढ़ता से और उस साहस से अपने से दूर करना सीखें जैसा हमें करना चाहिए। क्योंकि हम देखते हैं कि परमेश्वर कुपित और क्रोधित होकर हमसे कहता है कि जिन्होंने उसके लोगों को इस प्रकार घबराया है उन्हें वह कभी क्षमा न करेगा। तो जब हम देखते हैं कि परमेश्वर उन पर अपना क्रोध उँडेलता है जिन्होंने उसकी कलीसिया को घबराया है: तो हम में भी उसके अनुरूप जोश हो, और हम सब झूठी शिक्षाओं से घृणा करें। और जब हम मनुष्यों को देखें कि वे कुछ उपद्रव बोने के सिवा और कुछ नहीं चाहते: तो हम उन्हें अपने प्राणघातक शत्रु समझें, उनके विरुद्ध पुरुषार्थ से युद्ध करें, और अपने परमेश्वर के सत्य के लिए अन्त तक लड़ें, यह निश्चय जानकर कि वही वह बात है जिसमें हमारा सारा सुख है।
इस प्रकार तुम देखते हो कि इस प्रसंग पर हमें सार रूप में क्या सीखना है। और इसलिए कि परमेश्वर ने एक बार हमें अपने पास बुला लिया है, और प्रतिदिन उपदेशों के द्वारा हमें आगे बढ़ाना नहीं छोड़ता: तो आओ हम उसकी आज्ञाकारिता के अधीन बने रहें। और यद्यपि हम संसार में बहुत से उपद्रव, फूट और विवाद देखते हैं: तौभी हम सदा उस सत्य से दृढ़ता से जुड़े रहें जो हमें धोखा नहीं दे सकता। और इसलिए कि हम सहज ही बहकाए और धोखा दिए जा सकते हैं: तो आओ हम परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह हमें बुद्धि और विवेक दे: और साथ ही उसके वचन पर परिश्रम से कान लगाएँ, क्योंकि वह हमें शैतान के सब छलावों के विरुद्ध दृढ़ कर सकता है, और हम फिर दूसरों की बाँसुरी पर नाचने के लिए न बहकाए जाएँ, जैसा सन्त पौलुस हमें इस पत्री के अन्त में चिताता है। तो जब हमारे पास वे साधन हैं जो परमेश्वर ने ठहराए हैं कि हम सदा उसके घराने और कलीसिया के बने रहें: तो आओ हम उसमें दृढ़ रहें। और यदि हम अपने शरीर की मूर्खता और अविवेक से भटक जाएँ: तो तुरन्त उन चेतावनियों को सुनें जो हमें यहाँ दी गई हैं, अपने दोषों पर शोक करें, और शोक करके अपने परमेश्वर की सेवा करें, यह जानकर कि वह सदा हमें ग्रहण करने को तैयार है। और यद्यपि हम तिरस्कार करनेवालों और संसारी लोगों की कितनी ही बड़ी संख्या देखें जो सुसमाचार की शिक्षा को बिगाड़ने और उलटने से नहीं रुकते, वरन् अपनी भ्रष्टता में पूरी तरह डूबे हुए हैं: यद्यपि (मैं कहता हूँ) हम ऐसे ठोकर के पत्थर देखें: तौभी हम भली-भाँति सावधान रहें कि उनकी आड़ में हम दुष्टता की ओर न मोड़ दिए जाएँ, और उनके पदचिह्नों पर चलने के कारण उन्हीं के साथ एक ही दण्ड में न लपेटे जाएँ: परन्तु उस उद्धार की ओर आगे बढ़ें जो हमारे सामने रखा गया है, और जिसकी ओर परमेश्वर हमें प्रतिदिन आने को बुलाता है।
अब आओ, हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने दोषों को मानते हुए गिर पड़ें, उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उनका और अधिक बोध कराए, और साथ ही हमारी निर्बलताओं को तब तक सहता रहे जब तक वह हमें उनसे पूरी तरह छुड़ा न दे, और हमें अपनी धार्मिकता की शुद्धता से फिर ओढ़ा न दे, जो हम में तब तक बढ़नी चाहिए जब तक वह पूर्ण रूप से सिद्ध न हो जाए। और इस प्रकार हम सब कहें, सर्वशक्तिमान परमेश्वर, हमारे स्वर्गीय पिता, इत्यादि।
