अध्याय 39

सैंतीसवाँ उपदेश, जो पाँचवें अध्याय पर सातवाँ है - गलातियों 5:22-26

Sermons upon Galatians · John Calvin

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सैंतीसवाँ उपदेश, जो पाँचवें अध्याय पर सातवाँ है - गलातियों 5:22-26

जो पाँचवें अध्याय पर सातवाँ है।

22 पर आत्मा का फल प्रेम, आनन्द, शान्ति, धीरज, कृपा, भलाई, विश्वास,

23 नम्रता, संयम है; ऐसे ऐसे कामों के विरुद्ध कोई व्यवस्था नहीं।

24 और जो मसीह यीशु के हैं, उन्होंने शरीर को उसकी लालसाओं और अभिलाषाओं समेत क्रूस पर चढ़ा दिया है।

25 यदि हम आत्मा के द्वारा जीवित हैं, तो आत्मा के अनुसार चलें भी।

26 हम घमण्डी होकर न एक दूसरे को छेड़ें, न एक दूसरे से डाह करें।

हम पहले देख चुके हैं कि यदि हम परमेश्वर की सेवा करने को तैयार हों, तो अपने दोषों को ताड़ना देने में ही हमें करने के लिए बहुत कुछ मिल जाएगा, यदि हम में से हर एक यह विचार करे कि वह कितनी भ्रष्टता और पापमयता के वश में है। और सन्त पौलुस ने जान-बूझकर हमारे सामने वे पाप रखे हैं जो स्वभाव से हम में राज्य करते हैं, कि हम जानें कि परमेश्वर की आज्ञाकारिता के लिए अपने आपको ठीक ढालने में हमें अपना मन किस बात पर लगाना चाहिए। क्योंकि हम देखते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने की इच्छा दिखाने में मनुष्य तुच्छ बातों में कैसे लगे रहते हैं; वे एक सीमा तक दौड़-धूप भी करते हैं। फिर भी वह सब व्यर्थ और निष्फल परिश्रम ही है, जैसा हम पोप-तन्त्र में देखते हैं, जहाँ लोग उन खिलौनों जैसी बातों को, जिन्हें उन्होंने अपनी ही बुद्धि से गढ़ लिया है, परमेश्वर की सेवा का नाम देते हैं। तौभी उन सब बातों में, चाहे वे उन्हें कितना ही भाएँ और वे उन पर कितना ही घमण्ड करें, व्यर्थता के सिवाय और कुछ नहीं है, और इस बीच वे मुख्य बात तक पहुँचने की कभी परवाह नहीं करते; क्योंकि संसार सदा बहाने ही ढूँढ़ता रहता है। परन्तु परमेश्वर अपनी व्यवस्था में हमारे सामने सीधा मार्ग रखता है; और यदि हम निष्कपट होकर सच्ची सिद्धता की ओर आगे बढ़ना चाहते हैं, तो हमें अपने आपको त्यागने से आरम्भ करना होगा, क्योंकि हम में ऐसी कोई बुद्धि नहीं जो शापित न हो, ऐसा कोई विचार नहीं जो दुष्ट न हो, और ऐसी कोई इच्छा नहीं जो हठीली और भ्रष्ट न हो।

इसी कारण सन्त पौलुस ने हमें पहले ही बता दिया कि यदि मनुष्य अपने जीवन को भली रीति से चलाना चाहें, तो पहले तो उन्हें करने को बहुत कुछ मिलेगा, यदि हर एक यह विचार करे कि उसके भीतर कितनी उलझी हुई और दुष्ट लालसाएँ हैं जिन्हें काट डालना है; और यह काम तुरन्त नहीं होगा। और सन्त पौलुस ने ये बातें विशेष रूप से उन लोगों से कही जो व्यवस्था की विधियों में लगे हुए थे। क्योंकि यद्यपि वे सामान्य रूप से कहते थे कि जो कुछ परमेश्वर ने आज्ञा दी है उसे पूरा करना चाहिए, तौभी जिन बातों को वे मुख्य गिनते थे वे खतना और विधियाँ थीं। अब इस पर सन्त पौलुस हमें बताता है कि परमेश्वर चाहता है कि हम बड़ी बातों में लगे रहें; अर्थात् वह चाहता है कि जो अनगिनत बातें हमें सीधे मार्ग से भटकाती हैं, उनके विरुद्ध हम पुरुषार्थ से लड़ें।

और अब वह इसके विपरीत पक्ष में यह जोड़ता है कि आत्मा के फल प्रेममयता, नम्रता, कोमलता, दीनता, स्थिरता और ऐसी ही अन्य बातें हैं, और जब सब कुछ इस प्रकार भली रीति से व्यवस्थित हो जाता है, तब व्यवस्था का हम पर कोई अधिकार नहीं रह जाता, क्योंकि हम उससे छूट गए हैं, इसलिए कि हमारा प्रभु यीशु मसीह, जिसने हमें उससे छुड़ाया है, हमारा संचालन करता है। संक्षेप में, उसका लक्ष्य यह है कि मसीही लोग व्यवस्था की दासता से स्वतंत्र हों; वे सब नहीं जिनके मुँह में मसीही नाम है या जो उस पर डींग मारते हैं, परन्तु वे जो अपने कामों से दिखाते हैं कि वे हमारे प्रभु यीशु मसीह के अंग हैं, क्योंकि वे उसके पवित्र आत्मा से नया जन्म पा चुके हैं। क्योंकि मनुष्यों का जीवन इसके अनुरूप होना चाहिए, नहीं तो उनके सब दावे किसी काम के नहीं, वरन् वे झूठे ठहरेंगे, जब तक कि उनके कामों से यह प्रकट न हो कि वे सच्चाई और निष्कपटता से बोलते हैं।

इसके अतिरिक्त, जब सन्त पौलुस सब प्रकार की भलाई को और सब सराहनीय बातों को आत्मा के फल कहकर ऊँचा ठहराता है, तब वह उस बात की पुष्टि करता है जो मैंने तुम्हें पहले बताई थी: कि यदि हम में भलाई की एक बूँद भी है, तो वह हमारी अपनी उपजाई हुई नहीं है, और उसकी प्रशंसा का दावा हम परमेश्वर के साथ अन्याय और अपमान किए बिना नहीं कर सकते। क्योंकि वे सब उसके अनुग्रह के फल हैं, और उसे अपने पवित्र आत्मा के द्वारा उन्हें हम में डालना पड़ता है। तो देखो, यहाँ फिर हमें दीन किया जाता है, कि हम में से कोई अपने आपको यह सोचकर धोखा न दे कि उसके पास अपनी कोई सद्गुण या स्थिरता या प्रेममयता या ऐसी कोई और बात है।

क्योंकि जब तक परमेश्वर हमें फिर से नया नहीं गढ़ता, तब तक हम बंजर भूमि के टुकड़े के समान हैं, वरन् सर्वथा निकम्मे हैं। क्योंकि हम न केवल कोई भली वस्तु नहीं उपजाते, वरन् बहुत ही अधिक बुराई उत्पन्न करते हैं, जब तक कि हमारा प्रभु हमें उससे छुड़ा न दे; जैसे कोई बुरी भूमि, जो स्वामी के किसी काम की नहीं होती, क्योंकि वह न अन्न देती है, न दाखरस, न कोई और आवश्यक वस्तु, वरन् ऊँटकटारे, काँटे और बुरे खरपतवार उपजाती है। ठीक यही दशा हमारी है।

और अब हमें यह ध्यान देना है (जैसा सन्त पौलुस ने पहले भी बताया है) कि प्रेम व्यवस्था का सार और सारांश है; इसे उसने यहाँ सबसे पहले स्थान पर रखा है, इसलिए नहीं कि हम परमेश्वर को पुकारना भूल जाएँ, या उन सब प्रतिज्ञाओं पर जो भरोसा हमें रखना चाहिए उसे, और उस सारी सेवा को जो व्यवस्था की पहली तख़्ती में समाई है। सन्त पौलुस उन बातों को तुच्छ नहीं जानता, और न चाहता है कि वे ठुकराई जाएँ; परन्तु जिस विषय की वह चर्चा कर रहा है वह यह है कि मनुष्य संसार के सामने कैसे निश्चित प्रमाण दे सकते हैं कि वे परमेश्वर की आज्ञा मानने की सही मनसा रखते हैं या नहीं। और मैं तुम्हें पहले ही बता चुका हूँ कि ऐसा प्रमाण हमारे पड़ोसियों से प्रेम करने में दिखाई देता है, जब हम में से हर एक केवल अपने ही लाभ में नहीं लगा रहता, परन्तु भली शान्ति और एकता को बनाए रखने के लिए मिलकर परिश्रम करता है, और जहाँ तक परमेश्वर हमें सामर्थ्य और साधन देता है, उनकी भलाई करने में अपना हाथ भी बढ़ाता है जिनके प्रति हम उसके वचन के द्वारा बँधे हैं।

तो देखो, सन्त पौलुस ने "प्रेम" शब्द को पहले स्थान पर क्यों रखा है। इसलिए नहीं कि हम अपने पड़ोसियों से ऐसा प्रेम करें कि परमेश्वर हमारे पीछे धकेल दिया जाए; परन्तु इसलिए कि एक दूसरे के प्रति परस्पर प्रेम और मित्रता रखने में हम दिखाते हैं कि हम परमेश्वर के प्रति सही रीति से समर्पित हैं; और यह न तो उस पर भरोसा किए बिना हो सकता है, न प्रार्थना और विनती के द्वारा उसके पास गए बिना।

इसके अतिरिक्त, जब वे सब बातें जो सद्गुण कहलाती हैं और जिनकी मनुष्यों में उचित रूप से प्रशंसा होती है, आत्मा के फल कही जाती हैं, तो निश्चय ही यह कहीं अधिक सम्भव है कि जब हमें परमेश्वर के पास आना हो, सब परीक्षाओं के विरुद्ध हथियार बाँधने हों, और विश्वास के द्वारा लगन से प्रार्थना करनी हो, तब यदि पवित्र आत्मा हम में कार्य न करे तो हम उसके लिए तैयार नहीं होते। तब स्वाभाविक झुकाव से हम में ऐसा कुछ नहीं है जिससे हम सुसमाचार की शिक्षा को ग्रहण करें; और न हम इतने हल्के हैं कि परमेश्वर तक ऊपर चढ़ें और प्रार्थना और विनती के द्वारा उससे आत्मीयता से बातें करें, परन्तु पवित्र आत्मा को ही हमें इसके योग्य बनाना होगा, हमारे हृदयों को अपने अनुग्रह से प्रकाशित करके और उन्हें अपने को पुकारने के लिए प्रेरित करके। देखो, यहाँ हमें क्या स्मरण रखना है।

अब जब सन्त पौलुस प्रेम के साथ आनन्द को जोड़ता है, तो वह केवल यह समझाने के लिए नहीं कि जब परमेश्वर हमें दया से ग्रहण करेगा और हम पर अपनी कृपा दिखाएगा तब हम परमेश्वर की ओर से निश्चिन्त और प्रसन्न-चित्त होंगे; परन्तु वह एक और प्रकार के आनन्द की बात करता है, अर्थात् यह कि हमारे बीच कोई ऐसी जलन न हो जो हमें एक दूसरे को नीचा दिखाने को उभारे, और न कोई द्वेष जो हमें अपने पड़ोसियों से दूर खींचे; परन्तु हम कोमल और मिलनसार हों, वरन् जब हम उनकी सहायता और सहारा दे सकें जिन्हें हमारी आवश्यकता है, तब हम आनन्दित हों। रोमियों के 14वें अध्याय में सन्त पौलुस कहता है कि स्वर्ग का राज्य पवित्र आत्मा में आनन्द है; तौभी वह उस शब्द को दूसरे अर्थ में लेता है। क्योंकि हम परमेश्वर में तब आनन्दित हो सकते हैं जब वह हमें गवाही देता है कि वह हमारे प्रभु यीशु मसीह के कारण हमें ग्रहण करता है, और इसके बिना हम अवश्य ही ऐसी बेचैनी से व्याकुल और अशान्त रहेंगे कि निरन्तर संकट में जीवन बिताएँगे।

यह सच है कि परमेश्वर को तुच्छ जाननेवाले अपनी रंगरलियों में यथासम्भव खेलते-कूदते हैं; तौभी उन्हें कभी चैन या आनन्द नहीं मिलता, क्योंकि उन्हें भीतर ही भीतर बहुत जलन सहनी पड़ती है, और परमेश्वर उन्हें नाना प्रकार की भीतरी कचोटों से ऐसा डसता है कि वे सदा उदास और व्याकुल रहते हैं; यहाँ तक कि जब वे प्रसन्न होना चाहते हैं, तब उन्हें पशुओं के समान बन जाना और सारी समझ को झटक देना पड़ता है, ऐसा कि भले और बुरे का भेद करने की शक्ति उनमें बिलकुल दब जाती है। अब यह शापित आनन्द है जब मनुष्य इस रीति से परमेश्वर से भटक जाते हैं और भूल जाते हैं कि वे क्या हैं।

परन्तु (जैसा मैं पहले बता चुका हूँ) सन्त पौलुस यहाँ उस आनन्द की बात करता है जो हमें अपने पड़ोसियों के साथ व्यवहार करने में मिलता है। और इसी प्रकार "विश्वास" शब्द भी है, जिसका अर्थ है विश्वासयोग्यता और हृदय की खराई। वह विश्वास जो परमेश्वर से सम्बन्ध रखता है, उसकी प्रतिज्ञाओं पर वह निश्चित भरोसा है जो हमें होता है, जिसके अनुसार कहा जाता है कि हम विश्वास से धर्मी ठहराए जाते हैं, क्योंकि यह प्रकट होता है कि परमेश्वर हम में जो कुछ हमारे अपने स्वभाव का है, उसे मिटाता और मार डालता है।

इसलिए [उस विश्वास में] हमें परमेश्वर की केवल उसी दया पर स्थापित होना है जो हमारे प्रभु यीशु मसीह में हम पर प्रकट हुई है। परन्तु हम इतने बड़े उपकार के अधिकारी कैसे होते हैं? परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर भरोसा करके, और पूरी आज्ञाकारिता से उन्हें ग्रहण करके, अपने आपको दोषी और खोया हुआ मानकर, और केवल उसी पर टिककर। तो देखो, हमारा वह विश्वास जो परमेश्वर से सम्बन्ध रखता है, उसकी भलाई और हमारे प्रति उसके प्रेम पर वह निश्चयता है जो हम पाते हैं, इसलिए कि हम बिना किसी सन्देह के उसके निकट जाएँ कि वह हमारी सुनता है। और इसी कारण सन्त पौलुस कहता है कि जिनमें ऐसा विश्वास है, वे परमेश्वर पर साहस से भरोसा रखते हैं और साथ ही उससे स्वतन्त्रता और साहस के साथ प्रार्थना भी करते हैं।

परन्तु इस वर्तमान पाठ में सन्त पौलुस "विश्वास" को उस विश्वासयोग्यता के अर्थ में लेता है जो हम सीधाई से चलते हुए एक दूसरे के प्रति निभाते हैं, कि हम दुष्टता या चतुराई से अपने पड़ोसी को धोखा देने का यत्न न करें, न कोई दोहरा व्यवहार करें, न सीधे-सादे लोगों को फँसाने के लिए कोई कपट रचें, परन्तु दूसरों के साथ वही करें जो हम चाहते हैं कि वे हमारे साथ करें। तो देखो, सन्त पौलुस का यही अर्थ है कि विश्वास आत्मा का फल है।

अब वह नम्रता और कोमलता को जोड़ता है, क्योंकि इनके बिना हमारे बीच एकता या मेल का होना असम्भव है। क्योंकि यदि हर एक मनुष्य भयानक और कोमलता से रहित हो, तो हमारे लिए यही कहीं अच्छा होता कि हम जंगली पशु होते। इसलिए जिनसे परमेश्वर ने हमें जोड़ा है, उनके साथ मिल-जुलकर रहने की इच्छा हमें दिखानी चाहिए। संक्षेप में, प्रेम इसी नम्रता, भलाई और कोमलता से बना रहता है जिसकी चर्चा सन्त पौलुस यहाँ करता है।

और अब तुरन्त वह संयम [या स्थिरता] को जोड़ता है, जो केवल दूसरों की वस्तुओं से दूर रहना ही नहीं, परन्तु संयत आचरण भी है, और अपने आपको सब प्रकार की उच्छृंखलता, अति और अत्याचार से बचाए रखना भी। संक्षेप में, सन्त पौलुस ने जिन गुणों का वर्णन किया है, उन्हें मसीहियों के लिए ठहराया है, मानो वह यह कह रहा हो कि यदि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के आत्मा से संचालित होते हैं, तो वह हमारे जीवन से भली-भाँति प्रकट होगा, क्योंकि हम ऐसे भय में रखे जाएँगे कि इन उच्छृंखल जीवन जीनेवालों की तरह इधर-उधर नहीं भागेंगे, परन्तु एक दूसरे के प्रति उदार और दयालु होंगे, ऐसा कि हम में न झगड़ा होगा, न छल, न जबरन वसूली, वरन् हम में से हर एक अपने ही पर सन्तुष्ट रहेगा और एक दूसरे के काम आने का यत्न करेगा।

तौभी हम देखते हैं कि सब भलाई परमेश्वर के आत्मा से आती है। फिर भी हम यह भी देखते हैं कि हमारा प्रभु यीशु मसीह वह सोता है जिससे हमें भरना है। और यदि हम उसके हैं और उसकी देह के अंगों के रूप में उससे सम्बन्ध रखते हैं, तो वह हमारे सारे जीवन में दिखाएगा कि उसका हमें ग्रहण करना और हमें अपनी सन्तान ठहराना व्यर्थ नहीं है।

इस पर सन्त पौलुस यह निष्कर्ष निकालता है कि ऐसे गुणों के विरुद्ध (या जो मनुष्य उनसे सम्पन्न हैं उनके विरुद्ध) व्यवस्था का कोई अधिकार या बल नहीं है। और इसी कारण वह 1 तीमुथियुस में कहता है कि व्यवस्था धर्मियों के लिए नहीं, परन्तु अधर्मियों के लिए और उनके लिए ठहराई गई है जो अपराधों और कुकर्मों में दौड़ पड़ते हैं।

तो यदि वे भरमानेवाले जो उस समय कलीसिया को सता रहे थे, भली भाँति जानते कि व्यवस्था और सुसमाचार का उद्देश्य क्या है, तो वे विश्वासियों को इस प्रकार दासता में लाने का साहस न करते। और इसलिए सन्त पौलुस उनके कपट का, जो निर्लज्जता से मिला हुआ था, उपहास करते हुए दिखाता है कि वे व्यवस्था के लिए बड़ी धुन का दिखावा करते थे, फिर भी अपने जीवन में हर प्रकार की दुष्टता और परमेश्वर के प्रति तिरस्कार प्रकट करते थे; जैसे आजकल पोप-तन्त्र के कपटी हमारे विरुद्ध ऊँचे स्वर में चिल्लाते हैं कि हम सब भले कर्मों को उलट देते हैं, और सब प्रकार की बुराई की स्वच्छन्दता लाना और परमेश्वर की सेवा की सारी इच्छा को निकाल देना चाहते हैं। और क्यों? इसलिए कि हम मनुष्यों को उनके सारे मूर्खतापूर्ण अहंकार और आत्म-सम्मान के आवरण से उघाड़ देते हैं, और उन्हें दिखाते हैं कि परमेश्वर पर भरोसा रखने का और कोई उपाय नहीं, सिवाय इसके कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम में हम उसकी केवल भलाई पर टिके रहें।

हम साफ़ कहते हैं कि जो कुछ भी पुण्य या योग्यता के नाम से कहा जाता है, वह परमेश्वर के सामने निरा घृणित है। क्योंकि वे अपने आपको यह समझाते हैं कि वे स्वयं अपने उद्धारकर्ता हैं। तो देखो, हमारी शिक्षा से मनुष्य का सारा घमण्ड गिरा दिया जाता है। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि हर एक को दुष्टता करने की छूट मिल जाए, और परमेश्वर की सेवा करने या उसका भय मानने की कोई चिन्ता न रहे। इसके विपरीत हम कहते हैं कि यीशु मसीह हमें इसलिए दिया गया है कि न केवल उसके द्वारा परमेश्वर के हाथ से हमारे पापों की क्षमा मिले, परन्तु इसलिए भी कि उसके पवित्र आत्मा से नया जन्म पाकर हम नए जीवन की सी चाल चलें।

और अब सचमुच वे कैसे मनुष्य हैं जो भले कर्मों के पुण्य का इतने हठ से पक्ष लेते हैं? हम देखते हैं कि उनके सारे जीवन में हर प्रकार की शापित अशुद्धता के सिवाय और कुछ नहीं है। क्योंकि यदि कोई ऐसे ठट्ठा करनेवालों को ढूँढ़े जो पूरी तरह अपवित्र हैं, और जिन्हें कभी इसका थोड़ा-सा भी बोध नहीं हुआ कि उन्हें लेखा देना पड़ेगा, परन्तु जो शैतान के द्वारा सर्वथा बहका दिए गए हैं, तो निश्चय ही वे यही हैं।

फिर, जब वे भले कर्मों की बड़ाई करते हैं, तो वे किन बातों में मनुष्यों को लगाना चाहते हैं? बहुत बड़बड़ाने में, प्रातःकाल और सायंकाल की प्रार्थनाओं में जाने में, एक वेदी से दूसरी वेदी तक भागदौड़ करने में, कठपुतलियों की पूजा करने में, अपने आपको सजाने-सँवारने में, क्षमा-पत्रों का भण्डार खरीदने में, तीर्थयात्रा पर भटकने में, और (संक्षेप में) परमेश्वर के मुँह पर ही उसका उपहास करने में, मानो परमेश्वर की सारी सेवा बच्चों का खेल मात्र हो। यह सच है कि वे यह कहने का साहस नहीं करते कि विवेकी, पवित्र, संयमी और इसी प्रकार का होना अच्छी और सराहनीय बात नहीं है; तौभी वे उन सब बातों के बिना सहज ही काम चला सकते हैं, यदि मनुष्य उनके अन्धविश्वासों का पालन करता रहे। संक्षेप में, परमेश्वर की सब आज्ञाएँ पैरों तले रौंदी जाती हैं, मानो कुचल दी जाती हैं, और उनकी दृष्टि में वह कोई भक्ति या पवित्रता नहीं जब तक मनुष्य उनके सब चमकीले खिलौने और निकम्मी बातें न करे।

तो देखो, जो विवाद सन्त पौलुस का अपने समय में था, वह आज भी बना हुआ है। और इसी कारण वह कहता है कि यदि उसके विरोधी, जिनके विरुद्ध वह तर्क करता है, परमेश्वर की व्यवस्था का पक्ष लेना चाहते हैं, तो उन्हें भली भाँति विचार करना चाहिए कि वह किससे बोलती है, और उन्हें अपने आप से आरम्भ करना चाहिए; और यदि वे अच्छे शिष्य बनाना चाहते हैं, तो उन्हें संयम, नम्रता, पवित्रता, धीरज और ऐसी ही अन्य बातें सिखानी चाहिए, और इसके अतिरिक्त अपनी सब दुष्ट लालसाओं को त्यागना भी। ये ही (सन्त पौलुस कहता है) सच्चे अभ्यास हैं जिनमें हमें अपना सारा परिश्रम लगाना उचित है। और इस बीच हम परमेश्वर की सन्तान के लिए द्वार बन्द न करें, उन्हें उस विशेषाधिकार से वंचित करके जो परमेश्वर ने उन्हें दिया है। क्योंकि जब वह उन्हें अपने पवित्र आत्मा से संचालित करता है, तब वह नहीं चाहता कि वे फिर व्यवस्था के जूए के अधीन रहें।

अब इस पर सन्त पौलुस जोड़ता है कि वे सब जो यीशु मसीह में हैं, उन्होंने अपने शरीर को उसकी लालसाओं समेत क्रूस पर चढ़ा दिया है। यहाँ वह दिखाता है कि वह शारीरिक स्वतन्त्रता नहीं चाहता, और ऐसी स्वतन्त्रता नहीं जैसी परमेश्वर को तुच्छ जाननेवाले मान बैठते हैं कि वह मुख्य रूप से चाहता है; परन्तु वह चाहता है कि जो मसीही स्वतन्त्रता की बात करते हैं, वे कर्म से दिखाएँ कि उन्होंने अपनी सब लालसाओं और अभिलाषाओं को क्रूस पर चढ़ा दिया है, ताकि इसके द्वारा अपने आपको हमारे प्रभु यीशु मसीह के सच्चे अंग प्रमाणित करें। और यह हमारे लिए आवश्यक है: ताकि जब हम जानना चाहें कि सच्ची स्वतन्त्रता क्या है, तब हम उस वैध क्रम और लक्ष्य को थामे रहें जिसकी ओर परमेश्वर हमें संकेत करता है।

आजकल बहुत से मसीही केवल दाँतों तक के हैं, अर्थात् शुक्रवार और उपवास के दिनों में मांस खाने तक की बात में: वे पोप-तन्त्र की तुच्छ खिलौनों जैसी बातों का भली भाँति उपहास कर सकते हैं; वे भली भाँति कह सकते हैं कि यदि घातक पाप के दण्ड की धमकी देकर किसी एक या दूसरी बात पर रोक लगाई जाए तो वह केवल दुरुपयोग और उपहास है: और वे सच कहते हैं, क्योंकि वे अच्छी और पक्की नींव पर बनाते हैं। परन्तु क्या? जो इतने बड़े बोलनेवाले हैं, वे हमारे प्रभु यीशु मसीह के कार्य और सामर्थ्य के विषय में कुछ भी नहीं जानते: वे नहीं जानते कि वह संसार में क्यों उतरा, और अपने सुसमाचार के द्वारा हमें कौन-सा अनुग्रह देता है: वे न विश्वास को जानते हैं, न प्रार्थना को: और इतने पर भी वे चाहते हैं कि उन्हें जो जी चाहे करने की छूट मिले और लोग उनकी गर्दन पर से लगाम ढीली छोड़ दें। ऐसे जंगली मसीही आजकल बहुत हैं। इस बीच उन्हीं के कारण परमेश्वर की शिक्षा पर दोष लगाया जाता है। क्योंकि सत्य के शत्रु आजकल के उन सब उच्छृंखल जीवन जीनेवालों को हमारे सामने रखकर हमें ताना मारते हैं, और कहते हैं कि यह हमारे प्रचार से ही उपजा है।

इसी कारण सन्त पौलुस ने अपने विरोधियों को उत्तर दिया, और हमें भी उन्हें उत्तर देने के लिए हथियारबन्द और सुरक्षित किया, ताकि सब निन्दकों के, और उन सब के जो सुसमाचार की शिक्षा पर झूठी निन्दा करते हैं, मुँह बन्द किए जाएँ। इसलिए सबसे पहले, जब दुष्ट लोग कहते हैं कि हम उन सब को अनुचित स्वतन्त्रता देते हैं जो केवल दुष्टता करना चाहते हैं: तो हम सन्त पौलुस की ओर देखें, जो उनसे कहता है कि जिस स्वतन्त्रता की हम बात करते हैं, वह उन्हीं के काम की है जो अपने लिए आप ही व्यवस्था हैं, अर्थात् हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग के कार्य के द्वारा।

परन्तु तौभी यह उन सब के लिए चेतावनी का काम करे जो अपनी ही रुचि की स्वतन्त्रता की कल्पना करते हैं। इसलिए वे समझ लें कि पहले उन्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह के अंग बनना है। तो क्या हम बिना किसी झंझट के चैन से खाना चाहेंगे? क्या हम उन सब रोक-टोकों से छूटना चाहेंगे जो आजकल पोप-तन्त्र में सीधे-सादे और अनजान लोगों को सताती हैं? आओ हम समझें कि यीशु मसीह कौन है, और पूरी तरह उसी के हो जाएँ। वही हमारा संचालन करे, और उसकी मृत्यु और दुःखभोग हमारे सारे जीवन में अपनी सामर्थ्य और प्रभाव दिखाएँ।

तो देखो, इस पाठ में हमें क्या मन में रखना है। और यहाँ सन्त पौलुस फिर दिखाता है कि परमेश्वर की सन्तान की सच्ची सिद्धता अपने आपको दीन करने में है, ऐसा कि वे अपनी ही बुद्धि और भावनाओं की रीति पर न चलें: क्योंकि हम सर्वथा भ्रष्ट हैं। तब हम अपने जीवन के सारे समय परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोही ही रह सकते हैं, जब तक कि हम अपने स्वभाव की सारी पापमयता को मार न डालें। इसे एक बात के रूप में ध्यान में रखो कि हमारा जीवन कभी परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप नहीं ढलेगा, जब तक कि हम अपने विचारों और अपनी भावनाओं, दोनों में सर्वथा बदल न जाएँ।

दूसरे, सन्त पौलुस दिखाता है कि यह हमारे प्रभु यीशु मसीह की सहभागिता के बिना नहीं हो सकता: क्योंकि "क्रूस पर चढ़ा दिया" शब्द का वह बिना कारण प्रयोग नहीं करता। इसके द्वारा वह घोषित करता है कि जब तक हम अपने प्रभु यीशु मसीह से अलग हैं, और उससे दूर किए गए हैं, और विश्वास के द्वारा उससे जुड़े नहीं हैं, तब तक हमारा स्वभाव अपने ही फल उपजाता रहेगा, अर्थात् हर प्रकार की दुष्टता और बुराई के सिवाय और कुछ नहीं। तो देखो, पहले तो स्वतन्त्र इच्छा गिरा दी जाती है। दूसरे, हमें दिखाया जाता है कि हम परमेश्वर के किसी भी दान के, या उसके पवित्र आत्मा के भागी नहीं हो सकते, सिवाय हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा, जैसा मैं तुम्हें पहले ही बता चुका हूँ कि हम सब को उसकी परिपूर्णता में से लेना है, क्योंकि वही एकमात्र सोता है जो हमारे लिए पर्याप्त हो सकता है। और यदि हम कहीं और कितनी ही दूर ढूँढ़ें, तो हमें सूखेपन के सिवाय और कुछ नहीं मिलेगा, और हम प्यासे ही बने रहेंगे: और यदि हम सोचें कि अपने आपको भर लेंगे, तो वह केवल हवा और भ्रम होगा, जिससे हम फूल जाएँगे, फिर भी कोई भला पोषण या सार नहीं पाएँगे।

अब इस पर सन्त पौलुस यह निष्कर्ष निकालता है कि यदि हम आत्मा के द्वारा जीवित हैं, तो हमें आत्मा के अनुसार चलना भी चाहिए। और यह उस बात की अधिक सरल व्याख्या है जिसे मैं पहले छू चुका हूँ। यह कहना पर्याप्त होता कि हम तब तक स्वतन्त्र नहीं हो सकते जब तक अपनी सब दुष्ट लालसाओं को क्रूस पर न चढ़ा दें: तौभी कपट इतना बड़ा है कि वे सदा ओट के छेद ढूँढ़ लेते हैं, और हर एक मनुष्य स्वर्गदूत के समान माना जाना चाहता है, चाहे उसका जीवन बिगड़ा हुआ ही क्यों न हो: इसलिए सन्त पौलुस ने पुष्टि के लिए यह वचन जोड़ना चाहा कि यदि हम आत्मा के द्वारा जीवित हैं, तो हमें उसके साथ ही आत्मा के अनुसार चलना भी चाहिए। मानो वह यह कह रहा हो कि मनुष्यों के लिए केवल यह दावा करना पर्याप्त नहीं कि परमेश्वर का आत्मा उनके हृदय में बसता है: उन्हें दिखाना चाहिए कि वह वहाँ है: क्योंकि वह निष्क्रिय नहीं है।

इसलिए यदि कोई जानना चाहे कि परमेश्वर का आत्मा हम में बसता है या नहीं, तो उसे हमारे कामों और हमारे जीवन को देखना होगा: और जैसा हमारा आचरण है, उसी के अनुसार वह देख सकता है कि हम क्या हैं और हमारे भीतर क्या है, और हमारे प्रकट बाहरी कामों से निर्णय कर सकता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई मुझे यह समझाए कि देखने में एक कुन्दा जीवित मनुष्य है: वह न सिर हिलाता है न पाँव: उसे ठेलो, उसे धक्का दो, तौभी उसमें जीवन दिखाई नहीं देता: तो क्या वह मुझे विश्वास दिलाएगा कि पत्थर का टुकड़ा एक स्थान से दूसरे स्थान को हटता है, या उसमें कोई सामर्थ्य है, या वह प्राणवाला प्राणी है? ठीक ऐसा ही उनके साथ है जो अपने आपको आत्मिक होने का घमण्ड करते हैं।

क्योंकि यद्यपि अविश्वासी और परमेश्वर के शत्रु शरीर के विषय में जीवित हैं, तौभी स्वर्गीय जीवन के विषय में वे मरे हुए हैं, क्योंकि उनकी आत्मा सर्वथा भ्रष्ट हो गई है: परन्तु हम परमेश्वर के प्रति उसके पवित्र आत्मा के अनुग्रह से जीवित हैं। और यदि यह अनुग्रह हम में है, तो वह निष्क्रिय नहीं रह सकता, जैसा मैंने पहले कहा। और यही कारण है कि सन्त पौलुस कहता है कि हमारा आचरण दिखा देगा कि हम आत्मा में जीवित हैं या नहीं।

"चलना" शब्द पवित्रशास्त्र में बहुत प्रचलित है, जहाँ हमारे जीवन के सारे चाल-चलन का वर्णन होता है: तौभी यहाँ केवल चलना ही नहीं है। जो शब्द सन्त पौलुस प्रयोग करता है, उसका अर्थ इससे अधिक है: अर्थात् व्यवस्थित रीति से चलना, मानो वह यह कह रहा हो कि हमें अपने आपको उस बात के अनुरूप ढालना है जो परमेश्वर और उसके पवित्र आत्मा की इच्छा के अनुकूल है, और हमारा जीवन ऐसा भली भाँति संचालित हो कि जाना जा सके कि परमेश्वर सचमुच हमारा संचालन करता है, और हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें अपनी देह के अंगों के रूप में अपने साथ थामे रखता है, और उसने सच्चाई से गवाही दी है कि वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हम में बसता है। इसलिए एक शब्द में, यह बात अवश्य प्रकट होनी चाहिए।

अब संक्षेप में, सन्त पौलुस का यहाँ अभिप्राय उन सब का कपट खोलना था जो मुँह से बड़े-बड़े दावे करते हैं, और चाहते हैं कि लोग उनकी धुन के विषय में अद्भुत विश्वास करें: फिर भी अपने सारे जीवन में न तो परमेश्वर के निकट आने की कोई इच्छा दिखाते हैं, न उसके वचन का कोई स्वाद। ऐसे सब लोग यहाँ झूठ और विश्वासघात के दोषी ठहराए जाते हैं। इसलिए ताकि हम पहचान सकें कि परमेश्वर की सन्तान कौन हैं, आओ हम अपने जीवन की जाँच करने पर आएँ।

यह सच है (जैसा मैं पहले छू चुका हूँ) कि कभी-कभी अनजान बेचारों में, और उनमें जिन्हें व्यवस्था की कभी कोई शिक्षा नहीं मिली, सद्गुण का कुछ दिखावा होता है। परन्तु यदि कोई उन्हें भली भाँति टटोले, तो पाएगा कि वह केवल छाया है, और वे न तो अपने पड़ोसियों से प्रेम करने की ओर, न परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलने की ओर ठीक झुके हुए हैं। संक्षेप में, हमारे जीवन की जाँच झूठ नहीं बोल सकती। और इसके साथ सन्त पौलुस ने उस बात की भी पुष्टि करनी चाही जो उसने पहले कही थी: अर्थात् यदि हमारा जीवन परमेश्वर के आत्मा से संचालित होना है, तो हमें उसी मार्ग पर लगन से परिश्रम करना चाहिए, न कि उन तुच्छ बातों में जो परमेश्वर के सामने न इधर की हैं न उधर की: जैसा मैं पहले बता चुका हूँ कि जो सबसे अधिक भक्त बनना चाहते हैं, उनके अन्धविश्वासों का न अन्त है न सीमा: और जब सन्ध्या होती है तो वे सोचते हैं कि इधर-उधर भागदौड़ के कारण परमेश्वर उनका बहुत ऋणी है, और फिर भी सब कुछ खोया हुआ परिश्रम ही है। इसलिए सन्त पौलुस हमें बताता है कि जब हम जानते हैं कि हमारा जीवन आत्मिक है (जो सच भी है) और परमेश्वर भी आत्मा है: तो हमें यह भी समझना चाहिए कि वह चाहता है कि उसकी सेवा विश्वासयोग्यता से की जाए, और मनुष्य उन छोटी तुच्छ बातों में न लगें जो बच्चों के खिलौनों जैसी हैं: परन्तु वह चाहता है कि हम एक दूसरे के साथ विश्वासयोग्यता, प्रेम, शान्ति और मेल से व्यवहार करें, ऐसा कि हम में न छल हो, न द्वेष, न लूट-खसोट।

तो यदि हम जानते हैं कि जो जीवन परमेश्वर को स्वीकार्य है और जिसके द्वारा हम उससे जुड़ते हैं, वह आत्मिक जीवन है: तो (वह कहता है) हम तुरन्त आत्मा में चलें, अर्थात् हम अपने आपको निश्चय दिलाएँ कि परमेश्वर उसके सिवाय कुछ भी स्वीकार नहीं करता जो उसकी व्यवस्था के अनुकूल हो (जिसे इसी कारण सन्त पौलुस रोमियों के सातवें अध्याय में आत्मिक कहता है) और उसी शिक्षा का प्रमाण हमारे आचरण में दिखाई दे। इसलिए जब दूसरे लोग तीर्थयात्रा पर दौड़ते हैं, तो हम परमेश्वर और अपने पड़ोसियों की सेवा में लगे रहें। जब ये बेचारे कपटी अपनी सारी सम्पत्ति मूर्तिपूजा में उड़ा देते हैं, तो हम यह विचार करें कि सच्चे बलिदान और पवित्र भेंटें ये [हैं] कि हम देह और आत्मा दोनों से उसके प्रति समर्पित हों, [और दूसरे] कि जो सम्पत्ति उसने हमें दी है और हमारे हाथों में रखी है, उसका ऐसा प्रबन्ध करें कि हम दिखा सकें। इस प्रकार वही बात परमेश्वर की महिमा के बड़ाई करने में, और [हमारे प्रभु यीशु मसीह के राज्य को बढ़ाने] में काम आए। सब उसी की ओर देखें, सब उसी से लगे रहें, और सब जानें कि वही है जिससे सारी भलाई निकलती है। देखो, सन्त पौलुस हमें कहाँ तक पहुँचाना चाहता था। अब इसलिए कि हम परमेश्वर के विरुद्ध सब घमण्ड और अभिमान से, और मनुष्यों के बीच साख पाने की उस लालसा से और अधिक घृणा करें: वह कहता है कि हमें एक दूसरे को काटना नहीं चाहिए, और न एक दूसरे से बैर रखना चाहिए। यह ऐसा ही है मानो वह कहता कि महत्वाकांक्षा या घमण्ड हम में राज्य नहीं कर सकते, पर तुरन्त जलन उत्पन्न होगी, और हर एक अपने पड़ोसी को छेड़ेगा। क्योंकि यदि हम इस प्रकार घमण्ड में पड़े हों, तो हम में से हर एक सबसे बड़ा होना चाहेगा, और उसे अपने ही मन में ऐसा लगेगा कि उसे उसका अधिकार नहीं मिला, जब तक वह अपने पड़ोसी को तिरस्कार में पड़ा न देख ले।

तो देखो, अभिमान क्या फल लाता है। वह केवल मनुष्य को परमेश्वर के विरुद्ध बढ़ाने की ओर नहीं, परन्तु उन्हें गिराने की ओर भी ले जाता है जिनका हमें आदर करना चाहिए, कम से कम यदि वे हमसे छोटे हों। क्योंकि जब हम सब को भली भाँति देख चुके हों, तब यह निश्चित है कि छोटे से छोटे भी हमारी दृष्टि में आदरणीय होने चाहिए। इसलिए यदि हम महत्वाकांक्षा से चलाए जाएँ (जैसा मैंने पहले कहा) तो हम में से हर एक और ऊँचे, और ऊँचे चढ़ता जाएगा। अब इससे अवश्य ही झगड़ा और विवाद, जलन, कलह और विरोध, और अन्त में घातक शत्रुता उत्पन्न होती है। संक्षेप में, जब तक महत्वाकांक्षा को पूरी छूट है और उसे बिना लगाम छोड़ दिया गया है, तब तक हम अवश्य ही युद्ध में रहेंगे, जैसा अनुभव बहुत अधिक दिखाता है; और परमेश्वर करे कि हमें उसके उदाहरण ढूँढ़ने के लिए बहुत दूर जाना पड़ता। परन्तु जैसे ही मनुष्य अपने आपको दिखाना चाहते हैं, महत्वाकांक्षा उन्हें अवश्य ही इस प्रकार बहा ले जाती है कि वे अपने पड़ोसियों के शत्रु बन जाते हैं। और इसी से डाह भी उत्पन्न होती है। क्योंकि कहा गया है कि प्रेम दूसरों की भलाई से आनन्दित होता है। क्या हमारे पास आनन्दित होने का कारण नहीं, जब हम देखते हैं कि परमेश्वर अपने अनुग्रह के दान हमारे पड़ोसियों पर उण्डेलता है? हाँ है: नहीं तो हम उन सब के लिए जिन्हें उनकी आवश्यकता है, निष्कपट प्रार्थना नहीं करते। क्योंकि यदि यह देखकर कि परमेश्वर उन्हें सुख-चैन से जीने देता है, हमें दुःख होता है: तो क्या हम इसी में नहीं दिखाते कि हम में कपट और दिखावे के सिवाय कुछ न था? और यदि परमेश्वर किसी मनुष्य को अपने पवित्र आत्मा का अनुग्रह-दान देता है, तो वह अपनी कलीसिया की सामूहिक भलाई और उन्नति के लिए है। इसलिए सब बातों में हमारे लिए आनन्दित होने का कारण है, और यदि हम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सही रीति से ढले हों, तो हम इसके साथ अपने पड़ोसियों के लाभ और उन्नति से भी प्रेम करेंगे। इसके विपरीत जब हर एक अपने ही में डूबा हो, और हम इस दुष्ट महत्वाकांक्षा और अभिमान से हाँके जाएँ: तो हम अपने पड़ोसियों के लाभ और भलाई को कभी तिरछी दृष्टि से ही देख सकते हैं। हमारे हृदयों में सदा कुढ़न और द्वेष रहेगा, जब परमेश्वर उन पर उदारता दिखाता है जिन्हें हम पैरों तले दबाए रखना चाहते हैं।

तो देखो, इस पूरे भाग में जो बात हमें सार रूप में स्मरण रखनी है वह यह है कि हम सीखें कि हमारे प्रभु यीशु मसीह का होना क्या है, ताकि हम उसका नाम व्यर्थ न लें, और मनुष्यों के सामने अपने आपको इतनी मूर्खता से बड़ा ठहराने के कारण परमेश्वर और उसके स्वर्गदूतों के सामने झूठ और मिथ्या के दोषी न ठहराए जाएँ। क्योंकि हम यीशु मसीह के हो सकें, इसके लिए हमें अपनी लालसाओं और भावनाओं को मार डालना होगा, यह जानते हुए कि अपने आप से हम सब बुराई की ओर अत्यधिक झुके हुए हैं, और हमारा स्वभाव पूरी तरह उसी ओर प्रवृत्त है। इसलिए हमें नया पन्ना पलटना आवश्यक है। और सचमुच यह हमारी अपनी सामर्थ्य से नहीं हो सकता: परन्तु परमेश्वर का पुत्र याजक है और हमारी सहायता के लिए तैयार है। हमें परमेश्वर के पवित्र आत्मा के दानों का भागी होने से, कि हम अपने जीवन से प्रमाणित कर सकें कि हमें उस पर सच्चा विश्वास है, कौन रोकता है? वह हमारा अपनी ही दुर्दशा में अपने आपको चापलूसी देना है। तब जब कि हम में भ्रष्टता के सिवाय कुछ नहीं, आओ हम विलाप करना सीखें, और अपने आपको हमारे प्रभु यीशु मसीह को सौंप दें, कि वह अपनी मृत्यु और दुःखभोग की सामर्थ्य से हम में सब दुष्ट लालसाओं और अनियन्त्रित भावनाओं को मार डाले।

और इसके साथ हम उस अनुग्रह पर विचार करें जो परमेश्वर हमें इसमें देता है कि वह चाहता है कि हम उसकी सेवा स्वतन्त्रता से करें, ऐसा कि हम फिर व्यवस्था के जूए के अधीन न रहें कि वह हमें चरम सीमा तक दबाए (क्योंकि वह हमारे लिए असहनीय बोझ होता), परन्तु उसके पवित्र आत्मा से संचालित हों, यह जानते हुए कि जब हमारा जीवन उसके वचन के अनुसार ढला हो, तब वह उसे स्वीकार करता है और हमारी सेवा ग्रहण करता है, चाहे हमारी धुन उतनी बड़ी या उतनी ठोस न हो जितनी होनी चाहिए थी: हम यह जानें: और इसके साथ हम ऐसी रीति से चलें कि हमारे पाँव, हाथ और हमारे अन्य सब अंग और इन्द्रियाँ कर्म से प्रकट करें कि जैसे हम हमारे प्रभु यीशु मसीह की पाठशाला में प्रशिक्षित हुए हैं, वैसे ही हम उसकी शिक्षा को साथ भी ले गए हैं, और वह हम में जड़ पकड़ चुकी है, इसलिए नहीं कि छिपी पड़ी रहे, परन्तु इसलिए कि फल दे, ऐसी रीति से कि परमेश्वर के नाम का आदर हो, और हम दिखाएँ कि हम निष्क्रिय और निकम्मे दास नहीं हैं, परन्तु हमारे प्रभु यीशु मसीह के आत्मा ने हमें जिलाया है, और वही हमारा संचालन करता है, जिसके कारण उसका फल तुरन्त हमारे पड़ोसियों तक पहुँचता है, यहाँ तक कि जब हमारे द्वारा परमेश्वर के नाम की इस प्रकार महिमा होती है, और हम अपने मसीही होने का सच्चा प्रमाण दे चुके होते हैं, तब मनुष्य जान लेते हैं कि हमें जो शिक्षा दी गई थी वह इसलिए थी कि सब दूसरे उससे लाभ उठाएँ। क्योंकि परमेश्वर की दृष्टि अपनी कलीसिया की सारी देह पर रहती है, और जैसे वह अपना सूर्य भले और बुरे दोनों पर चमकाता है: वैसे ही वह चाहता है कि विश्वासी उनका भी भला करें जो उसके योग्य नहीं हैं। इसलिए आओ हम इससे परिचित हों, और इसके अतिरिक्त यह स्वीकार करें कि हम कुछ नहीं हैं, और जो भी भलाई हम में है वह हमारी अपनी नहीं, परन्तु हमने उसे परमेश्वर के केवल अनुग्रह से पाया है। और क्योंकि हम अभी उस सिद्धता तक नहीं पहुँचे जो आवश्यक होती, हम अपने आपको किसी और कारण से परमेश्वर की कृपा में न समझें, सिवाय इसके कि वह तब तक हमें सहता है जब तक हम उसके राज्य में न पहुँच जाएँ, जहाँ हमें सारी पवित्रता की परिपूर्णता मिलेगी।

अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने दोषों को स्वीकार करते हुए दण्डवत् करें, और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उन्हें ऐसा अनुभव कराए कि हम उसके सामने उनके लिए दुःखी हों, वरन् सच्चे पश्चाताप के साथ, और उनसे अधिकाधिक छूटने की इच्छा करें, और जो शिक्षा हमने सुनी है उसका पालन करें, कि जहाँ अन्धे और अनजान बेचारे आजकल अपनी मूर्खतापूर्ण भक्ति की अति में अपने आपको बहुत सताते और थकाते हैं, वहाँ हम उसके वचन की शुद्ध सरलता में बने रहना सीखें, यह जानते हुए कि उसके सिवाय और कोई नियम नहीं, और यही वह है जिसमें वह चाहता है कि हम अपने आपको अभ्यास कराएँ, और जिसमें हमें अपना सारा अध्ययन लगाना उचित है: और इसके द्वारा दिखाएँ कि यही वह साधन है जिससे हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें अपने समान गढ़ना चाहता है: इसलिए आओ हम आगे बढ़ें और उसकी ओर परिश्रम करें जब तक हम पूरी तरह उससे जुड़ न जाएँ, और अन्त में उस समय तक न पहुँच जाएँ जब वह हम पर पूर्ण रीति से प्रकट होगा, और हमें न केवल इस पृथ्वी की यात्रा से, परन्तु सब भ्रष्टता से और अन्य सब बातों से भी छुड़ाएगा जो हमें स्वर्गीय निज भाग का पूरा आनन्द लेने से रोकती हैं। कि वह यह अनुग्रह न केवल हम पर, परन्तु सब लोगों पर भी करे, इत्यादि।

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