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सत्ताईसवाँ उपदेश, जो चौथे अध्याय पर चौथा भी है — गलातियों 4:11-14
जो चौथे अध्याय पर चौथा भी है।
11 मैं तुम्हारे विषय में डरता हूँ कि कहीं ऐसा न हो कि मैंने तुम्हारे बीच जो परिश्रम किया है वह व्यर्थ ठहरे।
12 हे भाइयो, मैं तुम से बिनती करता हूँ, तुम मेरे समान बन जाओ, क्योंकि मैं भी तुम्हारे समान बना हूँ। तुम ने मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ा।
13 तुम जानते हो कि मैं पहले शरीर की निर्बलता के कारण तुम्हें सुसमाचार सुना चुका हूँ,
14 और तुम ने मेरी उस परीक्षा को, जो मेरे शरीर में थी, न तुच्छ जाना और न उसे घृणा की दृष्टि से देखा; वरन् मुझे परमेश्वर के स्वर्गदूत की नाईं, वरन् मसीह यीशु की नाईं ग्रहण किया।
मैं पहले बता चुका हूँ कि यद्यपि सन्त पौलुस पहली दृष्टि में कोई ऐसा कारण नहीं बताता जो बहुत भारी या महत्त्वपूर्ण जान पड़े, तौभी उसका यह शंका करना व्यर्थ नहीं है कि कहीं उसका परिश्रम निष्फल न हो जाए, और गलातियों के बीच उसके श्रम का सारा फल नष्ट न हो जाए, क्योंकि वे पवित्र दिनों और व्यवस्था की अन्य रीतियों को मानने लगे थे। क्योंकि हमें स्वयं उस दिन को, या भोजन के प्रकार को, या ऐसी ही अन्य बातों को नहीं देखना चाहिए, वरन् यह विचार करना चाहिए कि मनुष्य किसी प्रकार के भोजन से क्यों परहेज़ करते हैं, या कुछ विशेष दिनों को क्यों मानते हैं, और अन्य रीतियों के विषय में भी यही बात है। अब मैं तुम्हें बता चुका हूँ कि इस प्रकार सुसमाचार की ज्योति एक प्रकार से दोषी ठहराई जाती है, या यों कहें कि बिलकुल बुझा दी जाती है। क्योंकि प्राचीन काल में वे सब बातें इसलिए ठहराई गई थीं कि पूर्वज उस छुड़ानेवाले की आशा में पोषित और स्थिर बने रहें, जो अभी उनके बीच आया नहीं था। परन्तु अब जबकि हमारे प्रभु यीशु मसीह जगत में आ चुके हैं, और मनुष्य के उद्धार के लिए जो कुछ आवश्यक था वह सब पूरा और सिद्ध कर चुके हैं, तो यदि मनुष्य अब भी प्रतीकों में उलझे रहें, तो यह उसमें जो पूर्ण सिद्धता है उसका सरासर अनादर होगा। यह वैसा ही है जैसे कोई अपने आगे परदा डाल ले कि कोई उसे वैसा न पहचान सके जैसा वह है।
इसके अतिरिक्त, इसके साथ एक बन्धन भी जुड़ा है; और जब किसी बात की आज्ञा घातक पाप के दण्ड की धमकी के साथ दी जाती है, तब मनुष्यों के विवेक ऐसे अत्याचार के अधीन कर दिए जाते हैं कि परमेश्वर हम पर से अपना अधिकार और प्रभुता खो देता है, क्योंकि वह नहीं चाहता कि हम किसी ऐसी बात का विवेक में बोझ मानें जिसकी आज्ञा उसने नहीं दी। और सचमुच जिस बात में वह अपनी सृष्टि के प्राणियों से भिन्न पहचाना जाना चाहता है, वह यह है कि हमारे जीवन के संचालन में सारी प्रभुता उसी की हो; कि जिसकी वह आज्ञा देता है उसे बिना किसी विरोध के भला और आवश्यक मान लिया जाए; कि जिसे वह मना करता है उसे छोड़ दिया जाए, और मनुष्य उसकी न कुछ गिनती करें और न उसके विषय में विवेक में कोई बोझ मानें। परन्तु रीतियों को मानने में और यह सोचने में कि ऐसा करके हम परमेश्वर के हाथ से कुछ कमा लेंगे, इससे भी बढ़कर एक बात है, अर्थात् हम उस वस्तु को त्याग देते हैं या छोड़ देते हैं जो परमेश्वर के पुत्र हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग के द्वारा हमारे लिए मोल ली गई है, जिसने हमें अपने पिता परमेश्वर के प्रति हमारे सब ऋणों से मुक्त कर दिया है। इसलिए नहीं कि हमें बुराई करने की स्वतंत्रता मिले, वरन् इसलिए कि जब हम भूल करें तो केवल उसी की शरण में भागें। यदि हम पाएँ कि हमने परमेश्वर की व्यवस्था का उल्लंघन किया है, और हमारा अपना विवेक हमें दोष दे रहा है, तो हमारे लिए इसके सिवाय और कोई उपाय नहीं कि हम अपने आप को हमारे प्रभु यीशु मसीह के हाथों में सौंप दें, कि हम परमेश्वर के सामने निर्दोष ठहरें, और उसकी मृत्यु और दुःखभोग की योग्यता से, और उसके लहू के बहाए जाने से हमारे सब दाग धुल जाएँ।
संक्षेप में, सन्त पौलुस यहाँ दिखाता है कि जब मनुष्य उद्धार के उपाय यीशु मसीह को छोड़ कहीं और खोजते हैं, तब वे भटक जाते हैं, यहाँ तक कि वे खो जाते हैं और उनके सुधरने की कोई आशा नहीं रहती। अब जबकि परमेश्वर ने हमारे सामने उद्धार का केवल एक ही मार्ग रखा है, तो जो उससे मुड़ जाते हैं वे जानबूझकर अपने आप को विनाश में डालते हैं, और परमेश्वर ने उन्हें जो अनमोल उपकार दिया था उसे तुच्छ जानने की उनकी कृतघ्नता के कारण शैतान उन पर राज्य करता है। यह कैसी उदारता है कि परमेश्वर हमें, जबकि हम उसके घोर शत्रु हैं, अपने अनुग्रह और प्रेम की ओर बुलाता और खींचता है! फिर, जबकि उसने स्वर्गदूतों को हमारा मध्यस्थ नहीं ठहराया, वरन् अपने एकलौते पुत्र के व्यक्तित्व में हमारे साथ अपने आप को जोड़ने की कृपा की: यदि हम ऐसे अभागे हैं कि यह हमारे लिए पर्याप्त नहीं, और हम शैतानी लोभ के वश होकर और उपाय ढूँढ़ने पर उतारू हैं, तो क्या यह हमारे प्रभु यीशु मसीह को झटक देना नहीं है? तो आओ हम सीखें कि सुसमाचार में भली-भाँति उन्नति करने के लिए हमें वह सब कुछ त्याग देना चाहिए जो उस भरोसे के विपरीत है जो हमें अपने प्रभु यीशु मसीह पर रखना चाहिए, और पूरी तरह उसी की धार्मिकता से चिपके रहकर सारी सिद्धता उसी में खोजनी चाहिए। यह एक बात हुई।
साथ ही हम अपने विषय में भी भली-भाँति सावधान रहें: क्योंकि कभी-कभी हमें लगेगा कि मुड़ जाने में हम बस कोई छोटा और हलका सा दोष कर रहे हैं, परन्तु अन्त में हम चकित होंगे कि परमेश्वर ने हमें कैसी ढील दे दी कि हम उससे पूरी तरह भटक गए। और यही कारण है कि बहुत कम लोग अन्त तक स्थिर रहते हैं। क्योंकि मनुष्य पूर्वोक्त बहाने की आड़ में अपने आप को सहज ही छूट दे देते हैं, और अपने आप को यह समझाते हैं कि यह कुछ नहीं है, और इस प्रकार हर कोई अपने आप को स्वतंत्रता दे देता है। परन्तु परमेश्वर ऐसी लापरवाही को दण्ड देता है, और हमें उसी के हवाले कर देता है, ऐसा कि शैतान हमें बहका ले जाता है। इसलिए आओ हम भय और सावधानी से चलें, और जब परमेश्वर हमें एक बार अपने सुसमाचार का स्वाद चखने का अनुग्रह दे चुका है, तब हम दिन-दिन उसमें दृढ़ होते जाने का यत्न करें: हम किसी भी रीति से उससे एक ओर न हटने के विषय में चौकस रहें, और हम में से हर एक इस विषय में जागता रहे, ऐसा न हो कि जब हम समझते हैं कि बस ठोकर ही खाई है, तब हम घातक रीति से गिर पड़ें: अन्ततः, आओ हम उस मार्ग पर बने रहें जो हमारे प्रभु यीशु मसीह हमें सिखाते हैं। यह सच है कि यद्यपि हम एक ओर मुड़ जाते हैं, तौभी वह हम पर तरस खाएगा, जैसा हम अनुभव से देखते हैं। क्योंकि उसे हमें अपने सारे जीवन में तीन-चार बार नहीं, वरन् प्रतिदिन सौ बार उठाना पड़ता है। क्योंकि हम चंचल हैं और इधर-उधर डगमगाने से कभी नहीं रुकते। तौभी आओ हम उसकी परीक्षा न करें, और न अपने आप को ऐसा कठोर करें कि शैतान हमें बहका ले जाए या हमें इधर या उधर खींच ले: वरन् आओ हम जीवन के बीज को अपने भीतर फलदायक बनाने का परिश्रम करें, क्योंकि परमेश्वर चाहता है कि हम अपने सब विचारों, वचनों और कामों में उसकी महिमा के लिए फल लाएँ। आओ हम चौकस रहें कि इसके लिए यत्न करें। अब इस पर सन्त पौलुस आगे कहता है कि वह चाहता है कि गलाती उसके समान बन जाएँ, क्योंकि वह स्वयं उनके अनुसार अपने आप को ढालने का परिश्रम करता है। ऐसा जान पड़ेगा कि यह कथन उससे बहुत भिन्न है जो हमने अभी सुना: क्योंकि जब उसने कहा, "मैं डरता हूँ कि कहीं मेरा परिश्रम तुम पर व्यर्थ न हो गया हो: मैं तुम्हें असुधार्य लोगों के समान छोड़ दूँगा," तब वह मानो किसी आँधी का झोंका या बिजली की कड़क थी। उसे यह देखकर दुःख हुआ कि जो शिक्षा उसने सुनाई थी वह इतनी बुरी रीति से ग्रहण की गई, और अब वह कोमल और मित्रता की भाषा बोलता है। उन्हें फिर अपनी ओर लाने के लिए वह उन्हें भाई कहता है, और फिर प्रतिज्ञा करता है कि वह उनके साथ मिल जाना चाहता है, और जहाँ तक उससे हो सके अपने आप को उनके अनुसार ढालना चाहता है, और इसके सिवाय कुछ नहीं चाहता कि वे भी उसके प्रति वैसा ही करें।
और इसमें हम देखते हैं कि जिन पर परमेश्वर का वचन सुनाने का भार है उन्हें कैसा संयम रखना चाहिए: अर्थात् उन्हें मनुष्यों के दोषों पर चापलूसी का रंग नहीं चढ़ाना चाहिए, वरन् उन्हें कड़ाई से डाँटना चाहिए, ताकि जो शैतान के भ्रमों से बहकाए गए हैं वे जाग उठें और परमेश्वर के न्याय से मानो चौंक जाएँ। क्योंकि जब मनुष्य किसी बुराई में पड़ जाते हैं, तो जब तक उन्हें मानो बलपूर्वक उसमें से खींचकर न निकाला जाए, वे उसमें लोटते ही रहते हैं। हाँ, और यदि उनके कान बहुत कसकर उमेठे जाएँ, या जहाँ खुजली नहीं थी वहाँ उन्हें खुजलाना पड़े, जैसा कि लोकोक्ति कहती है, तो वे कुढ़ते और चिढ़ते हैं। इसलिए मनुष्य अपने प्रति जितनी ढील रखते हैं, उनके दोषों को उतना ही कम बख्शना चाहिए, नहीं तो यह उनके साथ विश्वासघात होगा। यही कारण है कि सन्त पौलुस ने इतनी उग्रता से कहा कि वह बहुत डरता है कि कहीं उसका परिश्रम व्यर्थ न गया हो, और वहीं गलातियों को मानो निराशा में छोड़ देता है। तौभी इतना होने पर भी वह उन्हें फिर से प्रोत्साहित करना चाहता है कि वे मन फिराएँ। और इस प्रकार वह अपनी कड़ाई में मिठास मिलाता है और दिखाता है कि यदि वे अपने आप को परमेश्वर के अधीन कर दें तो उनके लिए द्वार अब भी खुला है।
इस प्रकार तुम देखते हो कि जब हम चाहते हैं कि हमारी समझावनी लाभदायक हो तब दो बातें आवश्यक हैं। पहली यह कि हम में ऐसी तीव्रता हो कि जिन्होंने बुरा किया है उन्हें चुभो सकें, ताकि उनके पापों के ज्ञान से उनका हृदय पूरी तरह छिद जाए, और वे परमेश्वर के सामने उनके लिए शोक और खेद करें: क्योंकि यदि उन्हें वह पीड़ा न हो, तो वे कभी परमेश्वर के पीछे चलने को नहीं झुकेंगे। यह सच है कि बाहरी दृष्टि से मनुष्य अपने दुष्ट स्वभाव को बदल सकते हैं: परन्तु चाहे वे कैसा ही दिखावा करें, जब तक वे अपने आप से लज्जित न हों और यह न जानें कि वे किस दण्ड के योग्य हैं, तब तक वे हठ और द्वेष से भरे ही रहेंगे। इसलिए मन फिराव की सच्ची तैयारी यह है कि हमें इतनी गहराई से चुभोया जाए कि हम अपने भीतर की बुराई को अनुभव करें, और उसके कारण अपने आप को दोषी ठहराएँ: हाँ, और कि हम व्याकुलता से भरे हों, और जब तक परमेश्वर हमें दया करके ग्रहण न कर ले तब तक हमें चैन न मिले। परन्तु फिर भी हमें ऐसी घबराहट में पड़े नहीं रहना चाहिए: क्योंकि यह हमें परमेश्वर की उपस्थिति से भागने, और अपने आप को उससे सदा के लिए दूर कर लेने के प्रयत्न की ओर ले जाएगा, यहाँ तक कि यदि हमें यह भली-भाँति विश्वास न होता कि वह हम पर दयालु होगा, और उसे खोजने में हमारी आशा निष्फल न होगी, तो हम चाहते कि उसे उसके सिंहासन से उतार दिया जाए, कि वह फिर हमारा न्यायी न रहे: जैसा भजन में कहा गया है कि परमेश्वर में क्षमा होनी आवश्यक है जो मनुष्यों को उसकी ओर खींचे, नहीं तो वे कभी उसका भय मानने तक नहीं पहुँचेंगे। क्योंकि अविश्वासियों का सारा भय तो केवल एक आतंक है जो उन्हें घबरा देता है, और उनसे परमेश्वर के विरुद्ध दाँत पीसवाता है, और वे खीजते, झुँझलाते और पागलों जैसा व्यवहार करते हैं। और ऐसे विवश भय में श्रद्धा तनिक भी नहीं होती। परन्तु जब हम एक बार अपने परमेश्वर की भलाई का स्वाद चख लेते हैं, और देखते हैं कि उसका सारा यत्न हमारे साथ मेल करने का है, और यह कि हम बिना कपट के उसके पास आएँ, हाँ, और यह कि हमारे हृदयों को छूने का उसका उद्देश्य यही है कि हम पक्का भरोसा रखें, और तब अपने आप को उसकी महिमा के सामने अर्पित करें, यह निश्चय रखते हुए कि हमें उससे डरना नहीं चाहिए, क्योंकि वह वही है जिसकी ओर वह हमें बुलाता है: मैं कहता हूँ, जब हमें इस प्रकार निश्चय हो, अर्थात् यह कि हमारे पाप मिटा दिए गए हैं: तब हम साहस के साथ अपने परमेश्वर के निकट जा सकते हैं, और यही वह क्रम है जो सन्त पौलुस यहाँ रखता है, और जिसे हमें अपनी सब फटकारों में रखना चाहिए। उस स्थान पर उसने गलातियों को नीचा किया, क्योंकि वे अपनी उमंग में अपने आप को ऊँचा उठा रहे थे, और मानो परमेश्वर के विरुद्ध अपने रोम खड़े कर रहे थे। और अब वह उन्हें अपना हाथ बढ़ाता है और फिर उठाता है, और उनसे कहता है कि जब उन्होंने एक बार अपने दोषों को अनुभव और पहचान लिया है, तो इतने पर भी उन्हें यह न समझ लेना चाहिए कि वे परमेश्वर से और उद्धार की सारी आशा से बिलकुल बहिष्कृत हो गए हैं।
परन्तु यह तब तक नहीं हो सकता जब तक हम में पापियों को उद्धार की ओर खींचने की चिन्ता न हो। क्योंकि बहुत से लोग काफी उग्र होंगे, और उन्हें ऐसा होने का उचित कारण भी होगा: तौभी इस बीच उनकी कठोरता इतनी अति की होगी कि वह मनुष्यों के हृदय बन्द कर देगी, और उन पर प्रयुक्त की गई कड़वाहट के विरुद्ध उन्हें इतना क्रोध दिला देगी कि वे अपने आप को बिलकुल बेकाबू कर लेंगे, हाँ, और परमेश्वर और उसके वचन के प्रति घृणा मन में बैठा लेंगे। परन्तु जो इतने अधिक तीखे हैं वे कहेंगे कि उनके पास उचित कारण है। हाँ, परन्तु इतने पर भी, जो परमेश्वर के नाम से पाप को डाँटते हैं, उनके मन में सदा यह चिन्ता और अभिलाषा होनी चाहिए कि जो विनाश के राजमार्ग पर थे उन्हें उद्धार तक पहुँचाएँ। जब वे ऐसा मन रखेंगे, तो निःसन्देह वे उन्हें जीतने का परिश्रम करेंगे जो सही मार्ग से भटक गए थे, और उन्हें जानने देंगे कि वे उनका कल्याण चाहते हैं, और यद्यपि उनकी फटकारें कठोर हैं, तौभी वे उनके हित के लिए हैं। फिर भी, दूसरी ओर, जिनके साथ ऐसी कड़ाई की जाती है वे समझें कि उन्हें ऐसी औषधियों की आवश्यकता है: क्योंकि परमेश्वर के विरुद्ध कुढ़ने से उन्हें क्या मिलेगा? तौभी हम बहुतों को देखते हैं जो बड़े प्रोटेस्टेंट होने का और सुसमाचार की धुन में जलने का दिखावा भली-भाँति कर लेते हैं, परन्तु फिर भी छुए जाने को सहन नहीं करते। जब तक उन्हें सहा जाता है, तब तक वे वह सब कुछ मान लेंगे जो चाहो और जो कुछ उनसे कहा जाए, बल्कि उससे भी अधिक। तुम सोचोगे कि सुसमाचार उन्हीं के लिए बना है: परन्तु यदि कोई उनमें दोष निकाले, तो वे जंगली पशुओं के समान उत्पात मचाने लगते हैं। और इससे उन्हें क्या मिलता है, सिवाय इसके कि पहले वे मनुष्यों के सामने अपनी कपट-भक्ति प्रकट कर देते हैं, और दूसरे अपने आप को परमेश्वर के विरुद्ध युद्ध में खड़ा कर देते हैं।
अब यह निश्चित है कि ऐसे विरोधी से लड़ने में वे प्रबल पक्ष नहीं होंगे। इसलिए जब आवश्यकता हो तब हम कड़ाई से डाँटे जाना सह लें। और यदि हम उस बुराई को नहीं जानते थे जो हम में थी, तो हमें अपने ऊपर और भी अधिक अविश्वास करना चाहिए, और अपनी रक्षा के लिए बचाव के छेद नहीं ढूँढ़ने चाहिए, वरन् अपनी जाँच में लग जाना चाहिए, और हम में से हर एक अपना ही न्यायी बन जाए, ताकि इसी रीति से हमें अपने परमेश्वर के साथ हिसाब में न पड़ना पड़े, और न उसे हमें दण्ड की आज्ञा सुनाने के लिए बुलाना पड़े।
इस प्रकार तुम देखते हो कि हमें हम पर लगाई गई ताड़नाओं को किस रीति से ग्रहण करना चाहिए, और यह कि हमें उनसे अत्यधिक दुःखी न होना चाहिए, क्योंकि वे हमें दीनता के लिए तैयार और तत्पर करती हैं, पर इस बीच हम उस मिठास के आने की बाट जोहें जो उसके बाद आती है। क्योंकि जो बात बहुतों को उन चेतावनियों को ग्रहण करने से रोकती है जो उन्हें दी जाती हैं, वह यह है कि वे उस विषय में पहले से ही पूरी तरह निश्चित हो चुके होते हैं: इसलिए यदि कोई उनसे ऐसी बात कहे जो उन्हें अच्छी न लगे, तो वे उस पर कान बन्द कर लेते हैं, या फिर उनके हृदय ऐसे कठोर और जड़ हो जाते हैं कि वे उसके बाद किसी भी रीति से यह नहीं समझ सकते कि उनके कल्याण और लाभ के लिए उनसे क्या कहा जा रहा है। कोई मनुष्य उनसे परमेश्वर की दया की बात कर सकता है, और उनके सामने भली-भाँति प्रतिज्ञा भी कर सकता है: और कोई मनुष्य (जैसा कि कहते हैं) उँगली से उन्हें दिखा भी सकता है कि उसका यत्न उन्हें उद्धार तक पहुँचाने के सिवाय और कुछ नहीं है, परन्तु वे बिलकुल बहरे हैं: और इसका कारण यह है कि वे अपने आप में परमेश्वर के वचन को ठुकराने पर पूरी तरह तुले हुए हैं।
इसलिए जब लोग अचानक हमारे पास आकर हमें हमारे दोष दिखाते हुए रूखाई से हम पर टूट पड़ें, तब हम धीरज और नम्रता रखें: उस पर चुप रहें, और जब तक वह अपनी अन्तिम बात न कह ले तब तक ठहरे रहें। और इस प्रकार आओ हम इन दो बातों को आपस में गूँथ लें और जोड़ दें: अर्थात् वह कड़ाई जिसे हमें इसलिए अपनाना है कि हमें अपने पापों का सच्चा और जीवित बोध हो, कि हम उनके लिए खेद करें, परमेश्वर से क्षमा माँगें, और अपने आप में लज्जित हों: और फिर हम निश्चय रखें कि परमेश्वर सदा हम पर दयालु रहेगा: और जब हम इस प्रकार अपने ऊपर अभियोग लगा चुके हों, तब हम यह आशा भी रखें कि उसके हाथ से हम निर्दोष ठहराए जाएँगे, और यह कि वह अपने वचन के द्वारा हमें जितना अधिक दोषी ठहराता है, उतना ही अधिक वह हमें सँभालना चाहता है, ताकि उसे हमारे विरुद्ध हथियारबन्द हाथ से और अपनी मुट्ठी में तलवार लिए हुए आना न पड़े। इस प्रकार तुम सार रूप में देखते हो कि इस पाठ में हमें क्या स्मरण रखना है, जहाँ हम सन्त पौलुस को एक ओर इतना कड़ा और उग्र देखते हैं, और फिर तुरन्त बाद वह गलातियों को अपने भाई कहता है, और उनसे बिनती करता है कि उसमें और उनमें अच्छा मेल हो, और उनके बीच एकता और सुर में सुर मिला हुआ सहमति हो।
अब जहाँ तक उसके इस कथन का सम्बन्ध है, "मैं तुम से बिनती करता हूँ कि मेरे समान बन जाओ, क्योंकि मैं भी अपने आप को तुम्हारे अनुसार ढालता हूँ": जैसा हम पहले देख चुके हैं, यह उन्हें उनके दोषों में सहलाने के लिए नहीं, न उनकी गन्दगी को ढाँपने के लिए, न किसी प्रकार की चापलूसी करने के लिए है: वरन् उन्हें परमेश्वर के लिए जीत लेने के लिए हर उपाय आजमाने के लिए है, जैसा कि हम आगे देखेंगे कि वह किस प्रकार गर्भवती स्त्री की उपमा का प्रयोग करेगा, जो अपनी सन्तान को जगत में जन्मा देखने की लालसा रखती है, और यद्यपि वह पीड़ा सहती है, तौभी अपने बच्चे का गला घोंटकर उस पर अपना क्रोध नहीं उतारेगी, वरन् अपने प्राण से भी अधिक उसका ध्यान रखेगी। सन्त पौलुस इसी उपमा का प्रयोग करेगा। इसलिए उसका यहाँ यह अर्थ नहीं कि जिन्हें डाँटे जाने की आवश्यकता थी उन्हें प्रसन्न करने के लिए (जैसा कि कहते हैं) पाल गिरा दे: वरन् उन्हें जीतने के लिए जहाँ तक हो सका वह स्वयं आगे बढ़ा, जैसा कि वह यह भी कहेगा कि उसने उनके साथ वैसे तुतलाकर बातें की हैं जैसे धाय अपने बच्चे से करती है: और यह मनुष्यों को उनके पापों में कठोर किए बिना भली-भाँति किया जा सकता था। ऐसा नहीं कि उन्हें बहुत अधिक सहा जाए: क्योंकि जब धाय अपने छोटे बच्चे को चलना सिखाने के लिए झुकती है, और उसे हाथ से थामे रखती है, तो उसका इरादा उसे गिराने का नहीं, न उसे लंगड़ाना सिखाने का, न उसे ऐसा लाड़ला बना देने का होता है कि वह बड़ा होकर चल ही न सके: वरन् इसके विपरीत, जब वह बच्चे की बाँह को सँभालना चाहती है, तब वह उसे हाथ से या उसके किसी अन्य अंग से पकड़ लेती है।
इसलिए हम देखते हैं कि निर्बलों के साथ हमें किस रीति से अपने आप को ढालना चाहिए। इसलिए नहीं कि उन्हें उनकी दुष्टता में कठोर किया जाए, वरन् उन्हें सुधारने के लिए: तौभी हमें मर्यादा के साथ चलना चाहिए, और सदा अपनी सामर्थ्य पर दृष्टि रखनी चाहिए। और सचमुच यह व्यर्थ नहीं है कि सन्त पौलुस एक और स्थान में बलवानों को और आगे बढ़े हुओं को उन लोगों के अनुसार अपने आप को ढालने का उपदेश देता है जो अभी कच्चे और निर्बल हैं।
क्योंकि यदि किसी मनुष्य में कितने ही बड़े और उत्तम गुण हों, यहाँ तक कि वह स्वर्गदूत के समान हो: तौभी निश्चय ही यदि वह इतना कठोर हो कि चाहे कि हर एक मनुष्य उसी के समान सिद्ध हो, तो उसके सब गुण धुआँ ही ठहरेंगे। क्यों? क्योंकि जिस नम्रता और कोमलता की आज्ञा परमेश्वर हमें देता है, वह सब गुणों को मानो स्वाद और सुगन्ध देती है। और मनुष्य अपने आप को जितना अच्छी तरह जानता है, उतना ही अधिक वह अपने उन दोषों का विचार करेगा जो उसमें हैं और जिन्हें सहने की आवश्यकता है, और इसलिए उसे दूसरों को भी सहना चाहिए। फिर वह इस पर भी विचार करेगा कि परमेश्वर ने उसे किस उद्देश्य से आगे बढ़ाया है, अर्थात् दूसरे मनुष्यों को मार्ग दिखाने के लिए, और अन्ततः वह अपने आप को सब मनुष्यों से कम सहेगा। और इसी से मनुष्य को अच्छी भनक मिल सकती है कि चेतावनियाँ शुद्ध प्रेम से निकलती हैं या अत्यधिक कठोरता से। क्योंकि यदि दूसरों को डाँटने में मनुष्य अपने ऊपर ध्यान नहीं देता, और अपनी चापलूसी नहीं करता, और इस या उस मनुष्य के दोष में खोट निकालने के लिए अपना क्रोध नहीं उँडेलता, परन्तु इस बीच स्वयं पूरी तरह दागी है, और उसी में सिर से पाँव तक डूब जाना चाहता है: तो निश्चित है कि यह सब कपट ही है। परन्तु जब मनुष्य अपने आप को छोटी लगाम में रखता है, और यह नहीं चाहता कि उसके साथ अपने पड़ोसियों से अधिक रियायत की जाए: तब यदि उसके साथ वह कठोर भी हो, तो मानना चाहिए कि उसमें परमेश्वर और उसके पवित्र आत्मा की धुन है, और वह सब मनुष्यों का कल्याण चाहता है।
इस प्रकार तुम सार रूप में देखते हो कि सन्त पौलुस यहाँ क्यों कहता है कि वह अपने आप को गलातियों के अनुसार ढालना चाहता था। अब वह आगे यह भी जोड़ता है कि उन्होंने उसे किसी बात में हानि या ठेस नहीं पहुँचाई, और इससे उसका अर्थ यह है कि वह उनके विरुद्ध कोई निजी झगड़ा नहीं उठा रहा। क्योंकि जब शिक्षा और चेतावनियाँ सुनाई जाती हैं, तब जो बातें सब कुछ बिगाड़ देती हैं वे ये हैं: या तो हम यह राय रखें कि बोलनेवाला सुने जाने के योग्य नहीं, या हम अपने हृदयों में उसके प्रति कोई घृणा या बैर रखें। क्योंकि जब हम उसके विषय में ऐसी कोई धारणा या कल्पना बना चुके हों, तो यह असम्भव है कि हम उसके हाथ से कुछ भी भले मन से ग्रहण करें। मैं एक मनुष्य को देखता हूँ जो स्वर्गदूत के समान बोलता है: अब यदि मैं यह अनुमान लगाऊँ कि वह मुझसे घृणा करता है, और मुझे काटना चाहता है, या मेरी लज्जा प्रकट करने के यत्न में है, तो निश्चय ही उसकी बात सुनने से मुझे कोई लाभ न होगा। परन्तु यह हमें निर्दोष नहीं ठहरा सकता: क्योंकि यह एक नीच दोष है: और यद्यपि यह सच भी हो कि कोई मनुष्य हमसे घृणा करता है, और बैर और द्वेष से हमें डाँटता है: तौभी हमें अनुकूल होना सीखना चाहिए। अन्यजाति के लोग भी भली-भाँति कह सकते थे कि हमारे शत्रु कभी-कभी हमारे मित्रों से अधिक हमारा भला करते हैं। क्योंकि जो एक दूसरे से प्रेम करते हैं वे बहुत सी बातों पर आँखें मूँद लेंगे, और बुरा सोचे बिना सब कुछ टाल जाएँगे। परन्तु उनके शत्रु उन पर, जिन्हें वे नहीं चाहते, लाभ उठाने के लिए पहरा देते रहते हैं, और जब वे कोई दोष देखते हैं, तो उसे फैला देने से नहीं चूकते, जैसा सुलैमान कहता है: हाँ, और कभी-कभी जब वे किसी मनुष्य से झगड़ना चाहते हैं, तो चेतावनी देने के बहाने उस पर ताने कसते हैं। तौभी जब हमारे शत्रु ऐसा करते हैं, तब निश्चय परमेश्वर हमें लौटा लाने का एक उपाय देता है: क्योंकि शैतान भी कभी-कभी हमारे लिए वैद्य का काम कर देता है, जैसा हमने देखा कि सन्त पौलुस कहता है कि उसे उसी दूत ने, अर्थात् शैतान के दूत ने, घूँसे मारे, और यह उसमें से सब घमण्ड को चूर करने के लिए किया गया था।
इसलिए जब हमारे शत्रु इस रीति से हमें छानने आते हैं, और हमारे दोष ढूँढ़ने के सिवाय और कुछ नहीं चाहते: तब परमेश्वर इसी के द्वारा हमें जगाता है, क्योंकि हम पहले अपनी ही चापलूसियों में सोए पड़े थे: और यदि हम बुद्धिमान और सुविचारित होते, तो निश्चय हमारे शत्रु प्रायः हमारे मित्रों से अधिक हमारा भला करते, जैसा मैंने पहले कहा, और जैसा अन्यजाति के लोग भली-भाँति जानते थे। और यह हमारे लिए बड़ी लज्जा की बात है कि वे अन्धे अभागे, जो अन्धकार में डूबे हुए थे, उनसे अधिक स्पष्ट देखें जिनके पास उद्धार की ज्योति है, और कि जो बात उन भोले धोखा खाए हुए प्राणियों ने समझ ली, उसे हम न जानें। फिर भी यह मानो हमारे स्वभाव का एक अंग है, और मनुष्य इसका साधारण नियम बना लेते हैं, कि यदि एक बार उन्होंने कोई दुष्ट धारणा बना ली कि कोई मनुष्य उनसे घृणा करता है, तो वे उससे ऐसे भरे और पूर्वाग्रही हो जाते हैं कि उसके हाथ से कोई सुधार ग्रहण करना सहन नहीं कर सकते। इसी विचार से सन्त पौलुस यहाँ प्रतिज्ञा करता है कि गलातियों को डाँटने में उसका अपना कोई मामला या झगड़ा नहीं है। "हम (वह कहता है) पहले मित्र रहे हैं: हो सकता है संसार की दृष्टि से मैं तुच्छ भी जाना जाऊँ, मैं तुम्हारे पास किसी बड़ी धूमधाम से नहीं आया, मैं कोई रंगा-पुता मनुष्य नहीं था: परन्तु मैं तुम्हारे पास सुसमाचार की शुद्ध शिक्षा लेकर आया।
और यद्यपि मैं बिना किसी बड़े लाभ का मनुष्य था, और संसार की दृष्टि से मेरी कोई गिनती न थी: तौभी तुम ने मुझे परमेश्वर के स्वर्गदूत की नाईं, वरन् स्वयं यीशु मसीह की नाईं ग्रहण किया: तो अब यह परिवर्तन कहाँ से आया? मैं अब भी अपना कर्तव्य निभाता चला आ रहा हूँ: तो फिर तुम मुझसे इतने विमुख क्यों हो गए? देखो, क्या तुम इसके सिवाय कोई और बात बता सकते हो कि तुम परमेश्वर के सत्य से घृणा करते हो और उसे सह नहीं सकते? और यह कितनी लज्जा की बात है कि तुम परमेश्वर के सत्य से इतनी घृणा करो कि मेरे व्यक्तित्व में उसे तुच्छ जानो, क्योंकि मैं उसका सेवक हूँ?" अब इस पाठ से हमें पहले यह निष्कर्ष निकालना है कि जिन पर सुसमाचार की शिक्षा सिखाने और उसे दूर-दूर पहुँचाने का भार है, उन्हें सबसे बढ़कर झगड़ों और विवादों से बचना चाहिए (कम से कम यदि वे चाहते हैं कि उनका प्रचार प्रभावी और लाभदायक हो) मैं कहता हूँ, अपने निजी मामलों के लिए झगड़ों और विवादों से। और इस प्रकार तुम देखते हो कि हमें सब झगड़ों से दूर रहना चाहिए, ऐसा न हो कि हमारे लिए द्वार बन्द हो जाए, और जब आवश्यकता हो तब मनुष्यों को डाँटने की सारी स्वतंत्रता हमसे छिन जाए, ताकि हम सन्त पौलुस के साथ प्रतिज्ञा कर सकें कि हम बदला लेने, बैर, या बुरी इच्छा के किसी लोभ से नहीं, वरन् केवल उनके कल्याण की इच्छा से उनसे व्यवहार करते हैं: इस विषय में हम निश्चित रहें, ताकि यह हमारे लिए द्वार खोल दे, और सब प्रकार की फटकारों के लिए हमें मार्ग दे। इसे एक बात के रूप में स्मरण रखो।
फिर, हम यह भी भली-भाँति सचेत रहें कि जब हमारे दोषों को छुआ जाए, तब हम अपने मन में यह झूठी धारणा बना और मान कर कि यह घृणा के कारण किया जा रहा है, मार्ग में रोड़ा न डालें: क्योंकि यह शैतान की चाल है। यद्यपि मनुष्य यह सोचने की ओर झुकते हैं कि दूसरे मनुष्य उन्हें घृणा के कारण काटते और चुटकी भरते हैं: तौभी हम यह न सोचें कि वे यह अपनी ही इच्छा से करते हैं, परन्तु शैतान के द्वारा, जो उन्हें इस रीति से हम पर गुरर्वाता है। यदि जब हमने भूल की हो तब हमें डाँटा जाए, तो चाहे वह कहीं से भी आए, निश्चय वह परमेश्वर की भेजा हुआ एक सन्देश है, क्योंकि वह नहीं चाहता कि हम नाश हों, वरन् चाहता है कि हम सही मार्ग पर लौट आएँ, चाहे हम में दोष निकालनेवाला मनुष्य भले और शुद्ध भाव से नहीं, वरन् केवल हमें चिढ़ाने या हम पर अपनी खीझ उतारने के लिए ऐसा करता हो: क्योंकि तब भी परमेश्वर अपना हाथ हमारी ओर बढ़ाता है, कि हम नाश न हों। परन्तु देखो, शैतान इसके विपरीत हमें औषधि ग्रहण करने से रोकता है, और हमारे सिर में यह बात डालता है कि हमारे दोषों की फटकार भली इच्छा से नहीं आती, वरन् घास में कोई छिपा हुआ बिछौना है, कि या तो हम बहुत छाने गए, या बहुत बुरी रीति से काटे गए, या फिर कोई और गुप्त बैर अनदेखा छिपा बैठा है। इन सब कल्पनाओं को शैतान मनुष्यों की चेतावनियों में मिला देता है, ताकि हम उनसे अप्रसन्न हो जाएँ और उन्हें ठुकरा दें, और इस रीति से परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करें। इसलिए जो यहाँ कहा गया है उसे हम भली-भाँति मन में रखें, कि जब हमें हमारे दोषों की चेतावनी मिले, तब हम विचार करें कि परमेश्वर ने, इसलिए कि वह स्वयं हमारा न्यायी न बने, मानो अपने नाम से वकील और अभियोक्ता नियुक्त किए हैं, जो आकर हमारे अपराधों का आरोप हम पर लगाएँ। जब कोई नश्वर मनुष्य मुझे मेरे कुकर्मों के लिए डाँटता है, तो परमेश्वर की यही इच्छा है कि वह ऐसा करे, और उसने उसे अपने स्थान पर ठहराया है। और किसलिए? इसलिए कि हमें उनका हिसाब देने के लिए उसकी महिमा के सामने न आना पड़े; क्योंकि हमारे लिए यह अच्छा होता कि हम एक लाख बार डुबो दिए जाएँ। तब परमेश्वर हम पर तरस खाता है, जब वह नश्वर मनुष्यों को हमारा न्यायी बनाकर भेजता है, हाँ, ऐसे न्यायी जो हमें कुछ लज्जित करें, और उसके द्वारा हमें फिर सही मार्ग पर लौटने के लिए उभारें।
इसलिए जब कभी परमेश्वर हम पर ऐसी दया करे: तो हम उस अनुग्रह से लाभ उठाएँ, और चौकस रहें कि जो धारणाएँ अचानक हमारे सिर में आ जाती हैं, जैसे कि वह मनुष्य हमसे घृणा करता है, वह हमारे पीछे पड़ा है, उसके मन में कोई जलन है, कोई बैर है, और न जाने क्या-क्या है, इनसे हम अपने आप को कड़वा न बना लें। इस सारे सामान को पाँव तले रौंद दिया जाए, और यदि उनकी चेतावनियाँ सच्ची हैं तो हम उन्हें ग्रहण करें। संक्षेप में, यदि कोई हमें दोष दे, तो इससे उत्तम और कुछ नहीं कि हम यह सोचें कि हमारा अपना विवेक इस विषय में हमसे क्या कहता है। इसे एक विशेष बात जानकर स्मरण रखो कि हमें यह नहीं देखना चाहिए कि बोलनेवाला व्यक्ति कौन है, और न इसकी परवाह करनी चाहिए कि उसमें कोई द्वेष या बैर है या नहीं: वरन् केवल यह कि हमारा अपना विवेक इस मामले के विषय में क्या ठहराता है, और तब हमें अनिवार्य रूप से यह निष्कर्ष निकालना होगा कि मुझे ठीक ही डाँटा गया है। यह आश्चर्य की बात है कि जो लोग डाँटे जाने पर इतना भड़कते, उबलते और दाँत पीसते हैं, वे यदि अपने विवेक में प्रवेश करें तो चाहे वे चाहें या न चाहें निरन्तर अपने आप को ही दोषी ठहराएँगे, और फिर भी वे अपने अपराधों को मानकर अपने आप को दीन करने से कहीं अधिक परमेश्वर के विरुद्ध पागलों की नाईं उत्पात मचाना और हर सम्भव रीति से उसे चिढ़ाना पसन्द करते हैं। तुम देखते हो, तब, कि जब हम में दोष निकाला जाए तब हमें जो मार्ग अपनाना है वह यह है कि हम उन लोगों की बात सुनें जो हमसे हिसाब ले सकते हैं, और विशेष रूप से उस पर दृष्टि रखें जो हम में है। और वह हमें कहाँ मिलेगा? ठीक हमारे विवेक में लिखा और खुदा हुआ। और यद्यपि हम उसे पूरी तरह नहीं देख पाते, तौभी हम अपने आप पर अविश्वास करें, क्योंकि जैसा कहते हैं कोई मनुष्य अपने ही मामले में योग्य न्यायी नहीं होता। यह सच है कि परमेश्वर हमें कुछ अंश में पहले ही न्यायी बनाता है: परन्तु फिर भी हमें उस दण्ड को, जो हम नहीं देख पाते, स्वीकार कर लेना चाहिए, इससे पहले कि हम भली-भाँति और पूरी तरह तौल लें कि हम दोषी हैं या नहीं, उस पर ताने कसें। परन्तु बहुत से ऐसे हैं जिन्हें अपनी आँखें बन्द करना, या यों कहें कि उन पर मुहर लगा देना भाता है, ताकि वे अपनी लज्जा न देखें: जब कोई उन्हें सुधार के लिए उकसाने आता है, तो पहले ही धक्के में वे झड़प करने लगते हैं, कि क्या उन्होंने ऐसी चूक की थी? और फिर सब निपट गया, वे इस विषय में और कुछ नहीं सुनेंगे, चाहे उनके विरुद्ध सौ बातें प्रमाणित की जाएँ, उनके लिए सब कुछ व्यर्थ है। वे बस उस पर मुँह टेढ़ा कर लेते हैं। क्योंकि वे सदा अपने आप को निर्दोष ठहराना चाहते हैं, और चाहे वे छोटे बच्चों के लिए भी हँसी का पात्र हों, उन्हें इसकी परवाह नहीं, वरन् अपनी ही दुष्टता और गन्दगी में अपने आप को कठोर करने पर अब भी घमण्ड करते हैं। इसलिए आओ हम अपने आप को ऐसे जानबूझकर किए गए हठ में पड़ने से बचाए रखें: और अपने दोषों का सच्चाई के अनुसार निष्कपट रूप से न्याय करते हुए हम दीन मन भी हों कि अपने आप को नम्र करें और अपने भीतर के सारे घमण्ड को गिरा दें, ताकि कोई बात हमें इस बात को खुलकर मानने से न रोक सके कि हमसे भूल हुई है। इस पाठ पर हमें जो स्मरण रखना है उसका सार यही है।
अब कोई यह अनोखा समझ सकता है कि सन्त पौलुस कहे कि गलातियों ने उसे परमेश्वर के स्वर्गदूत की नाईं, वरन् यीशु मसीह की नाईं ग्रहण किया था। क्योंकि उसमें पवित्रता की चाहे जितनी सिद्धता रही हो, तौभी वह स्वर्गदूतों की बराबरी नहीं कर सकता था, जैसा हम देखते हैं कि वह रोमियों के सातवें अध्याय में कैसे कहता है, जहाँ वह अपने आप को अभागा मानता है, और दिखाता है कि वह संसार का एक दीन बन्दी और पाप की दासता में दास के समान है।
यद्यपि सन्त पौलुस को परमेश्वर की सेवा करने की तीव्र लालसा थी, तौभी वह जानता था कि वह अपने पाँव घसीटता ही चल रहा है, और उसे पीछे खींचनेवाली बहुत सी निर्बलताएँ हैं। और यहाँ वह कहता है कि वह स्वर्गदूत की नाईं ग्रहण किया गया: हाँ, और वह वहीं नहीं रुकता, वरन् आगे जोड़ता है, यीशु मसीह की नाईं, जो (जैसा हम जानते हैं) परमेश्वर का वास्तविक पुत्र और सर्वोच्च राजा है, जिसे सब सृष्ट वस्तुओं पर सर्वोपरि अधिकार है।
परन्तु यहाँ प्रश्न सन्त पौलुस के जीवन का नहीं, न किसी ऐसी योग्यता का जो वह अपने में जताता हो। उसकी दृष्टि केवल शिक्षा पर है। पहले यह कहा गया है कि उसे परमेश्वर के स्वर्गदूत की नाईं ग्रहण किया गया। और क्यों नहीं? क्योंकि यही उपाधि उन सब को दी गई है जिन पर व्यवस्था की शिक्षा को दूर-दूर पहुँचाने का भार रहा है, और उचित तो यह है कि सुसमाचार के प्रचारकों को यह और भी बढ़कर दी जाए: क्योंकि वहाँ परमेश्वर अपनी महिमा और सामर्थ्य को, प्राचीन काल में व्यवस्था के अधीन जितना प्रकट करता था, उससे कहीं अधिक प्रकट करता है।
क्योंकि जब परमेश्वर नश्वर मनुष्यों को अपने नाम और अधिकार से बोलने के लिए ठहराता है: तो आवश्यक है कि वे उसके स्वर्गदूत माने जाएँ, अर्थात् दूत या राजदूत, क्योंकि स्वर्गदूत शब्द का अर्थ इसके सिवाय और कुछ नहीं है। और सच तो यह है कि जो शिक्षा हम सुनते हैं वह यदि परमेश्वर की ओर से न आए, तो उसका क्या प्रयोजन? इससे कहीं अच्छा होता कि हम [प्रचारक] गूँगे और निःशब्द होते, और सुननेवाले बहरे और अन्धे होते, बजाय इसके कि ऐसे मनुष्य की बात खड़े होकर सुनें जिसे परमेश्वर ने नहीं भेजा।
क्योंकि जो प्रधान आदर परमेश्वर हमसे चाहता है वह यह है कि हम चुप होकर उसका वचन सुनें, उसे पूरा अधिकार दें, और अपने आप को उस राजदण्ड के अधीन लगाम में बँधे और बन्दी जानें जिसके अधीन वह हमें झुकाना चाहता है। अब यदि कोई नश्वर प्राणी इसे अपने लिए हथिया ले: तो यह कैसी बात होगी? इसलिए आओ हम भली-भाँति ध्यान दें कि सन्त पौलुस अपनी शिक्षा के विषय में अपनी तुलना स्वर्गदूत से उचित ही करता है। और क्यों? क्योंकि वह भली-भाँति जानता था कि उसने इसे अपने मस्तिष्क से नहीं गढ़ा, वरन् परमेश्वर से पाया है।
और इसी कारण वह यह भी जोड़ता है, यीशु मसीह की नाईं। क्योंकि निश्चय हमारे प्रभु यीशु मसीह चाहते हैं कि जिन्हें वह अपना सेवक ठहराता है उन्हें हम ऐसे ग्रहण करें मानो वह स्वयं दृश्य रूप में हमारे बीच उपस्थित हो। वह कहता है, जो तुम्हारी सुनता है वह मेरी सुनता है। और तौभी निश्चित है कि जब उसने अपने प्रेरितों और अपने वचन के सेवकों को ठहराया तब उसका अभिप्राय मूर्तियाँ बनाने का न था।
उसका अभिप्राय यह न था कि उसके स्थान पर उनकी उपासना की जाए: क्योंकि निःसन्देह वह श्रेष्ठता तो स्वर्ग के स्वर्गदूतों को भी नहीं दी जानी चाहिए: तो फिर हम से क्या किया जाए, जो केवल गोबर और सड़न हैं? तौभी हमारे प्रभु यीशु मसीह ने यह नहीं देखा कि मनुष्य कैसे हैं, वरन् अपने ही वचन को ऊँचा करना चाहा, ताकि सब मनुष्य उसके अधीन हो जाएँ।
इसलिए यद्यपि हम भंगुर मिट्टी के पात्र ही हैं, या यों कहें कि पहले से टूटे हुए हैं, ऐसे कि हम कुछ भी मोल के नहीं: तौभी जिस सुसमाचार के खज़ाने को हम दूर-दूर पहुँचाते हैं, उसे इस कारण तुच्छ न जाना जाए। क्योंकि जब परमेश्वर का वचन हमें शुद्धता से सुनाया जाता है, तो यह वैसा ही है मानो वह हमारे बीच बसा हो, और प्रत्यक्ष हमारे सामने प्रकट हुआ हो, और हमें चाहिए कि उसके वचन को ग्रहण करके, चाहे वह नश्वर मनुष्य के मुँह से आए, उसके प्रति अपने भय, प्रेम और आज्ञाकारिता का प्रमाण दें।
और इसके अतिरिक्त, यदि हम इस बहाने सुसमाचार को तुच्छ जानें कि जो हम से बोलते हैं वे न हमारे राजा हैं न हाकिम: तो निश्चय जान लें कि हमारा यह विद्रोह हमारे प्रभु यीशु मसीह के विरुद्ध उठता है। वह कहता है, जो तुम्हें तुच्छ जानता है वह मुझे तुच्छ जानता है: और जो तुम्हें ठुकराता है वह मुझे ठुकराता है। और यह भली-भाँति ध्यान देने योग्य है।
क्योंकि हम आजकल देखते हैं कि मनुष्यों के व्यक्तित्व के बहाने परमेश्वर के वचन को इतना हलका समझा जाता है कि देखकर भय लगता है। और वे सब जो डाँटे जाने से कतराते हैं, तुरन्त उनके मुँह में यह उत्तर तैयार रहता है: महोदय, आप कौन हैं? आपको मेरा हाकिम किसने बनाया? मानो परमेश्वर का हम पर अधिकार ही न हो, या वह अपने सेवकों के मुँह से हम से बोल ही न सकता हो।
कोई हाकिम अपने अधिकारी को या ऐसे किसी मनुष्य को, जिसे वह चुनना चाहे, भली-भाँति भेज सकता है, और चाहे वह व्यक्ति कुछ भी रुतबा न रखता हो, तौभी वह चाहता है कि उसे बिना शंका के ग्रहण किया जाए, और लोग वैसा ही करते हैं। और जब परमेश्वर, जिसका हम पर सर्वोपरि अधिकार है, और जगत के सब राज्यों और प्रधानताओं पर अकेला प्रधान है, अपने सेवकों को, जिन्हें वह स्वीकार करता है, हमारे पास भेजता है, और चाहता है कि हम उनकी सुनें: तब यदि हम फिर भी उन्हें तुच्छ जानें, और उनके व्यक्तित्व के कारण उस सन्देश की कोई गिनती न करें जो वह उनके द्वारा हमें भेजता है, और साथ ही यह कहें, अरे, क्या यह आदमी शासक है: तो यह कैसी ढिठाई होगी?
यदि कोई मनुष्य परमेश्वर के वचन को विश्वासयोग्यता से सुनाए, और लोगों से कहे कि जो कोई उसे तुच्छ जानता है वह अपने आप को परमेश्वर के विरुद्ध खड़ा करता और ऊँचा उठाता है: तो वे कहते हैं, क्या? यह आदमी अपने आप को परमेश्वर बनाता है। मानो परमेश्वर उन लोगों के द्वारा बोल ही नहीं सकता जिन्हें उसने अपना साधन ठहराया है: क्योंकि जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, यदि हम अपनी गढ़ी हुई बातें लाएँ तो हम श्रापित हों।
इससे कहीं अच्छा होगा कि हम सौ बार डुबो दिए जाएँ, बजाय इसके कि कभी पुलपिट में चढ़ें, यदि हम परमेश्वर की इच्छा को विश्वासयोग्यता से न सुनाएँ, और उसी से न चिपके रहें जिसकी आज्ञा वह हमें देता है, और उसे उसके पवित्र वचन के निर्मल सोते से न खींचें। क्या ये बातें प्रकट न की जाएँ? क्या हम समझते हैं कि परमेश्वर उस वस्तु से वंचित हो सकता है जो उसी की अपनी है, अर्थात् उसके सत्य से? नहीं: वह और उसका सत्य कभी अलग नहीं किए जा सकते।
इसलिए आओ हम उन दुष्टों की निन्दाओं से घृणा करें जो कहते हैं, "अरे, जो बोलता है वह अपने आप को परमेश्वर बना लेगा।" यदि वह चाहता है कि लोग बिना विरोध के उसकी सुनें, अर्थात् जब वह अपने आप में निश्चित है कि वह कोई ऐसी बात नहीं लाता जो परमेश्वर की ओर से न हो, तो यह उचित ही है कि वह अपने स्वामी के अधिकार की प्रशंसा करे। इसलिए आओ हम इन संसारी लोगों से कोई मेल न रखें: वरन् अपने परमेश्वर का ऐसा आदर करें कि यद्यपि जो उसके नाम से बोलते हैं वे किसी गिनती के न हों, तौभी जो वे सुनाते हैं उसका पालन सच्चे और दीन विश्वास से करने से न चूकें। तौभी हमें उनके बीच भेद भी करना चाहिए जो परमेश्वर के नाम का झूठा दावा करते हैं और उसका व्यर्थ ओढ़ावा बनाते हैं, और उनके बीच जो उसके उस वचन के विश्वासयोग्य सेवक हैं जो उसने उन्हें सौंपा है।
पोप को उसके सारे झुण्ड के साथ देखो, जिन्हें यह कहते लज्जा नहीं आती कि जो कोई उनकी सुनता है वह मसीह की सुनता है, और जो उन्हें ठुकराता है वह मसीह को ठुकराता है: क्योंकि वे अपने आप को प्रामाणिक ठहराने के लिए मसीह का यह वचन सुनाते हैं, "जो तुम्हारी सुनता है वह मेरी सुनता है" इत्यादि। परन्तु जो चाहते हैं कि उन्हें स्वर्गदूतों की नाईं ग्रहण किया जाए, उन्हें स्वर्गदूतों का काम करना चाहिए, अर्थात् उन्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम से, जिसने उन्हें भेजा है, परमेश्वर के सच्चे दूत होना चाहिए, और उन्हें सब कुछ उसी से पाना चाहिए, ऐसा कि वे उसकी सच्ची सेवा करें, और अपने लिए सर्वोपरि अधिकार न चाहें, वरन् यह कि वही सदा कलीसिया का चरवाहा बना रहे, और उसके झुण्ड की भेड़ें उसका शब्द सुनें, और जहाँ कहीं वह बुलाए वहाँ उसके पीछे चलें।
और जो झूठे हैं, जो सत्य को बिगाड़ते और परमेश्वर के वचन को कलंकित करने के लिए श्रेष्ठता हथियाते हैं: उचित है कि वे वैसे ही माने जाएँ जैसे वे वास्तव में हैं: और यह उस बात से दिखाया जा चुका है जो मैंने आरम्भ में कही: अर्थात् जबकि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमसे कहा है कि वह चाहता है कि जो उसके नाम से आएँ उनकी हम ऐसे सुनें मानो वह स्वयं अपने व्यक्तित्व में बोल रहा हो: तो उसका अभिप्राय इससे उन्हें मनुष्यों के बीच मूर्तियाँ बनाना न था, कि जिन पर उसके नाम से बोलने का भार है उन्हें किसी प्रकार का अत्याचार करने के लिए ऊँचा किया जाए: परन्तु उसका अभिप्राय यह था कि उसका वचन आदर के साथ और बिना विरोध के ग्रहण किया जाए। और जहाँ सन्त पौलुस यहाँ कहता है कि उसे स्वर्गदूत की नाईं, वरन् यीशु मसीह की नाईं ग्रहण किया गया: उसका अर्थ यह है कि वह अपने नाम से नहीं आया, वरन् परमेश्वर के अनुग्रह का शुद्ध प्रचार करने, और मनुष्यों को यीशु मसीह के पीछे चलाने और अपने आप को पूरी तरह उसके अनुसार ढालने का यत्न करता रहा, ताकि उसे उसकी उचित श्रेष्ठता मिले, सुसमाचार बिना विरोध के ग्रहण किया जाए, और वह वैसा फल लाए जैसा उसे लाना चाहिए: अर्थात् वह हर एक विश्वास करनेवाले के लिए उद्धार के निमित्त परमेश्वर की सामर्थ्य हो, जैसा रोमियों की पत्री के आरम्भ में कहा गया है।
अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने दोषों को मानते हुए गिर पड़ें, और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उन्हें ऐसा अनुभव कराए कि हम अधिकाधिक सुधरने के लिए उभारे जाएँ, और वह हमारी निर्बलताओं को तब तक सहता रहे जब तक वह हमें सबसे पूरी तरह छुड़ा न ले, और हमें अपने स्वरूप के अनुसार ऐसा नया न कर दे कि हम में सब कुछ शुद्ध और निर्मल हो, और उसकी महिमा वहाँ प्रकट हो, और हम अपने ही पाप-स्वभाव से अधिकाधिक ऐसा लड़ें कि वह हम में से पूरी तरह खाली हो जाए, और वह हमें अपने पवित्र आत्मा के अनुग्रह से ऐसा भर दे कि हम औरों को भी उसकी ओर खींच सकें, ताकि हम सब एक मन होकर उसकी महिमा की सेवा करने का यत्न करें, और अपने आप को पूरी तरह उसी में लगा दें। और इस प्रकार हम सब कहें, "हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता," इत्यादि।
