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दूसरे अध्याय पर तीसरा, अर्थात् नौवाँ उपदेश — गलातियों 2:1-3
नौवाँ उपदेश,
जो दूसरे अध्याय पर तीसरा है।
6 परन्तु जो लोग प्रतिष्ठित समझे जाते थे, (वे पहले चाहे जैसे भी रहे हों, मुझे उसकी कुछ चिन्ता नहीं; क्योंकि परमेश्वर मनुष्य का बाहरी रूप नहीं देखता) निश्चय ही उन प्रतिष्ठित लोगों ने मुझे कुछ भी नहीं जोड़ा।
7 वरन् इसके विपरीत, जब उन्होंने देखा कि जैसे खतना किए हुओं के लिए सुसमाचार का प्रचार पतरस को सौंपा गया था, वैसे ही खतनारहितों के लिए सुसमाचार का प्रचार मुझे सौंपा गया है;
8 (क्योंकि जिसने पतरस से खतना किए हुओं के लिए प्रेरिताई का कार्य करवाया, उसी ने मुझसे भी अन्यजातियों के लिए करवाया।)
आज सुबह हमने देखा कि जब लोग अपनी कल्पनाओं को परमेश्वर के सत्य में मिला देते हैं, तब वहाँ बिगाड़ के सिवा कुछ नहीं रहता, और इस प्रकार सुसमाचार को झूठा ठहराया जाता है। यह बात हमें इतने भय में रखे कि जो कुछ हमें ऊपर से मिला है उसमें कुछ भी जोड़ने का साहस कोई न करे। क्योंकि परमेश्वर ने हमें ऐसी सिद्धता से सिखाया है कि हम बिना घोर निन्दा के उसमें कुछ नहीं जोड़ सकते; मानो हम गुप्त रीति से उस पर अविवेक का, अथवा कंजूसी का दोष लगा रहे हों, जैसे वह हमारे कल्याण की वस्तुएँ हमें देने में अनिच्छुक हो। अतः जब सुसमाचार की शिक्षा हमारे लिए पर्याप्त है, तो आओ हम उसी में बने रहें। और यदि कोई अपनी ओर से कुछ जोड़ने के लिए आगे बढ़े, तो हम उससे घृणा करें, चाहे उस बात में कितना ही बड़ा औचित्य क्यों न दिखाई दे; क्योंकि शैतान प्रायः इसी आड़ में छिपता है कि हमें छोटी और हल्की बातों पर अड़ना नहीं चाहिए। परन्तु परमेश्वर की सब बातों में और सब दृष्टियों से सुननी चाहिए, जैसा कि सन्त पौलुस के कार्य से समझा जाना चाहिए, जो तीतुस के खतने को छोटी बात समझकर आसानी से जाने दे सकता था, तो भी इस विषय में नहीं झुका। इसका कारण यह था कि कहीं अन्यजातियों पर वैसी अनिवार्यता न थोप दी जाए जैसी थोपी जानी थी। फिर भी हम पढ़ते हैं कि उसने तीमुथियुस का खतना करने में हिचकिचाहट नहीं की। तो भी बात एक ही-सी प्रतीत होती थी, और ऐसा लगता था कि सन्त पौलुस ने इस विषय में चंचलता और अस्थिरता दिखाई। देखो, ये दो अन्यजाति के पुरुष थे जो जन्म से मूसा की व्यवस्था में पाले-पोसे और सिखाए नहीं गए थे। और यहूदी किसी ऐसे मनुष्य को कभी ग्रहण न करते जिसका खतना न हुआ हो; क्योंकि वे उन सब को अशुद्ध समझते थे जो अपनी देह में वह चिह्न नहीं रखते थे।
अब सन्त पौलुस ने एक का खतना किया और दूसरे का करना न चाहा; कौन सोचेगा कि उसने समान व्यवहार रखा? यदि हम सब बातों को भली-भाँति विचारें, तो देखेंगे कि उसने तीतुस का खतना करने से क्यों इन्कार किया और तीमुथियुस का क्यों किया था। उस समय खतना अपने आप में वैध था। वह उन मूर्तिपूजाओं के समान नहीं था जो आजकल पोप-मत में पाई जाती हैं। यदि तुम पूछो कि पवित्र जल क्या है, तो वह बपतिस्मा को अपवित्र करना है। क्योंकि बपतिस्मा में हमें ऐसा धोना मिलता है जो जीवन और मृत्यु दोनों में हमारे लिए पर्याप्त होना चाहिए, और परमेश्वर नहीं चाहता कि उस आत्मिक शुद्धि की, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के लहू से हमारे लिए प्राप्त हुई, कोई और प्रमाण-पत्र हमारे पास हो; हमें उसी से सन्तुष्ट रहना चाहिए। परन्तु पोप-मतवादियों का पवित्र जल अपने आप को निरन्तर बपतिस्मा देते रहने के सिवा और क्या है? रही मिस्सा की बात, वह ऐसा नीच और घोर विश्वासघात है कि कोई उसके पास नहीं जा सकता जब तक कि हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु का इन्कार करके अपने आप को अशुद्ध न कर ले। परन्तु खतने की स्थिति वैसी न थी; क्योंकि जब तक वह प्रचलित रहा, तब तक वह लाभदायक था। यह सच है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने पर वह समाप्त कर दिया गया; तो भी यहूदी उसे तब तक मान सकते थे जब तक कि वे सुसमाचार की स्वतन्त्रता में पूरी रीति से शिक्षित न हो जाएँ। इसलिए सन्त पौलुस ने तीमुथियुस का खतना किया; और कारण यह था कि उसने बहुत-से निर्बल जन देखे, जो ठोकर खाते क्योंकि वे अभी सुसमाचार के ज्ञान में पूरी रीति से दृढ़ न हुए थे, वरन् समझते थे कि व्यवस्था की विधियों को बनाए रखना उनके लिए उचित है। और कहा गया है कि हमें एक-दूसरे के लिए झुकना चाहिए, क्योंकि प्रेम हमें इसके लिए बाध्य करता है। हर एक को वह नहीं करना चाहिए जो उसे स्वयं भला लगे और जिससे उसके पड़ोसी विचलित हों, वरन् हमें एक-दूसरे के साथ ऐसा बर्ताव करना चाहिए कि हमारे दोष के कारण कोई ठोकर न खाए। तब सन्त पौलुस ने उन बेचारे अज्ञानी निर्बलों का ध्यान रखते हुए संयम किया, जो फिर भी समय पाकर ज्ञान तक पहुँचाए जा सकते थे। और तीतुस के विषय में उसने देखा कि लोग अन्यजातियों पर दासत्व का जूआ डालने का यत्न कर रहे थे, और यह यहूदियों को सदा व्यवस्था के अधीन रखना होता, जो उस समय केवल अन्धविश्वास था। क्योंकि उन्हें जान लेना चाहिए था कि व्यवस्था अपना समय पूरा कर चुकी है और विधियाँ सदा बनी न रहेंगी। यदि यह बात स्पष्ट न की जाती, तो यहूदी एक झूठी धारणा में कठोर हो जाते और अन्यजातियों ने दासत्व का जूआ ग्रहण कर लिया होता; इसलिए पौलुस ने उसका विरोध किया। इस प्रकार हम देखते हैं कि जो बातें अपने स्वभाव से न अच्छी हैं न बुरी, उन्हें अलग-अलग रीति से बरतना न केवल वैध है, वरन् आवश्यक भी है। उदाहरण के लिए, यदि हम किसी मनुष्य को सुसमाचार के पास आने से पीछे हटता हुआ देखें, या इसलिए व्याकुल देखें कि वह अभी भली-भाँति दृढ़ नहीं हुआ, तो हमें वह बात छोड़ देनी चाहिए जो अन्यथा हमारे लिए वैध होती, जैसा कि हम पहले देख चुके हैं कि हमें सदा हर एक मनुष्य के उद्धार के लिए जो हितकर और उचित है उसका ध्यान रखना चाहिए।
परन्तु यदि हम देखें कि यह कहकर कि कोई बात न अच्छी है न बुरी, लोग उसमें कोई पवित्रता मिलाने और लोगों के विवेक को उसे मानने को विवश करके बाँधने का यत्न करते हैं, तो वहाँ हमें पूरी शक्ति से उनका सामना करना चाहिए। उदाहरण के लिए, मांस या मछली खाना, जैसा वे कहते हैं, एक उदासीन बात है, क्योंकि मांस खाने की न परमेश्वर ने मनाही की है न आज्ञा दी है। अब यदि कोई अज्ञानी मनुष्य उसके खाने से ठोकर खाता है और उसे मृत्युदायक पाप समझता है, क्योंकि जब तक उसे सिखाया न जाए वह नहीं जानता कि उससे परहेज़ करना पोप की परम्परा है या परमेश्वर की आज्ञा, तो हमें ठोकर से बचना चाहिए। हाँ, और जब हमें ऐसे यहूदियों से काम पड़े जो हमारे रीति-रिवाजों से परिचित नहीं हैं, और हम उन्हें जीतकर सुसमाचार की आज्ञाकारिता में लाना चाहें, तो हमें कुछ समय तक (उनके बीच रहते हुए) उन बातों से परहेज़ करना चाहिए जिन्हें वे निषिद्ध समझते हैं। क्योंकि वे परमेश्वर के अधिकार से सज्जित हैं, इसलिए वे समझेंगे कि हमें दोषी ठहराने के लिए उनके पास कुछ कारण है, यदि पहले से उन्हें यह न दिखाया जाए कि हम किस रीति से और किस प्रमाण के आधार पर सब प्रकार का भोजन बिना भेदभाव और बिना किसी अपवाद के खा सकते हैं।
परन्तु इसके विपरीत, यदि पोप-मतवादी हमें इस बात पर लाना चाहें कि हम शुक्रवार और शनिवार को, और उपवास-काल में, और उनके ठहराए हुए अन्य दिनों में निरन्तर मांस खाने से परहेज़ करें, तो हम में से जो कोई इसे मान ले वह सुसमाचार का विश्वासघाती होगा, और हमें सौ बार मर जाना अधिक उचित होगा। क्यों? क्योंकि हमें उस स्वतन्त्रता को थामे रखना है जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमारे लिए मोल ली है। यदि कहा जाए, ऐसा क्यों? क्या मांस खाने की थोड़ी-सी छूट के लिए मनुष्य को सारे संसार में उथल-पुथल मचानी और इतना हठ करना चाहिए? प्रश्न यह नहीं कि मनुष्य मांस खाए या न खाए, वरन् यह है कि परमेश्वर की आज्ञा माननी चाहिए और जिस वस्तु की उसने अनुमति दी है उसे बरतना चाहिए, या मनुष्यों की कल्पनाओं पर टिके रहना चाहिए।
अब यदि कोई बात परमेश्वर के वचन के अनुसार मेरे लिए वैध है, तो क्या इसलिए उसकी निन्दा की जाए कि मनुष्य अपने ढंग और रीति से उसका न्याय करते हैं? परन्तु हम देखते हैं कि परमेश्वर के अधिकार पर कलंक लगता है जब वह अधिकार, जो उसी का है और केवल उसी के लिए सुरक्षित है, नश्वर प्राणियों को दे दिया जाता है। फिर मनुष्यों के विवेक पर एक बोझ डाला जाता है, यहाँ तक कि हमारे प्रभु यीशु मसीह को उसका उचित आदर नहीं दिया जाता। क्योंकि यदि उसने हमारे लिए ऐसी स्वतन्त्रता मोल ली है कि हमें व्यवस्था की विधियों से छुड़ा दे, तो यह कहीं अधिक उचित है (जैसा मैंने आज सुबह तुम से कहा) कि जो बातें मनुष्यों ने गढ़ी हैं वे एक ओर रख दी जाएँ और मिटा दी जाएँ। इसलिए भली-भाँति ध्यान दें कि सब उदासीन बातों में हमें उन्नति का ध्यान रखना चाहिए, और चाहे किसी बात को बरतना या छोड़ना हमारे लिए वैध हो, फिर भी प्रेम हमें एक-दूसरे से बाँधे रखता है। जब हम अपने पड़ोसियों की उन्नति के लिए उस काम से परहेज़ करते हैं जिसे करने की हमें स्वतन्त्रता है, तो यह स्वेच्छा से की गई सेवा है। परन्तु इस बीच, शान्ति और मेल के बहाने हमें परमेश्वर के सत्य के साथ विश्वासघात नहीं करना चाहिए और उसे ऐसी खिचड़ी नहीं बना देना चाहिए कि मनुष्य यह न जानें कि यहाँ नीचे किसका शासन चलना चाहिए, और कौन-सी व्यवस्था माननी चाहिए; वरन् जिस स्वतन्त्रता की चर्चा सन्त पौलुस यहाँ करता है उसे हमें पूरी रीति से बनाए रखना चाहिए। देखो, हमें सारांश में किस बात को थामे रखना है।
अब उसने तुरन्त यह भी जोड़ा कि जो प्रेरित बड़ी प्रतिष्ठा में थे उन्होंने उसे कुछ नहीं जोड़ा (और यहाँ वह पतरस, यूहन्ना और याकूब को प्रकट करता है, जो औरों से बढ़कर खम्भे समझे जाते थे और जिनकी बड़ी ख्याति थी), वरन् उसकी पहले सिखाई हुई शिक्षा को केवल भला जानकर ग्रहण और स्वीकार किया। और साथ ही वह यह भी कहता है कि पतरस, यूहन्ना और याकूब के विषय में मनुष्यों की जो भी राय हो, उसकी उसे कुछ चिन्ता नहीं, क्योंकि परमेश्वर किसी मनुष्य का मुँह नहीं देखता; अर्थात् उसका बाहरी दिखावा या संसार की दृष्टि में उसकी प्रतिष्ठा।
यहाँ पहली दृष्टि में ऐसा प्रतीत होता है कि सन्त पौलुस अपने लिए और अपने अधिकार और साख के लिए झगड़ता है। पहले भी ऐसे कुत्ते थे जो उस पर भौंकते थे, विशेषकर वे भटके हुए लोग जिन्होंने सुसमाचार का स्वाद चखा था; जो अपने भटकने और मसीह को त्यागने को कुछ रंग देने के लिए अपने पक्ष में यों कहते थे: “अजी, यह तो भली-भाँति विदित है कि प्रेरित आपस में झगड़ते थे कि कौन सबसे बड़ा है, जो अशोभनीय बात थी, और इससे स्पष्ट प्रकट होता था कि उन्होंने अपने स्वामी की शिक्षा को बुरी रीति से ग्रहण किया था, जिसने उन्हें आज्ञा दी थी कि वे ऐसे दीन बनें कि उनमें से हर एक अपने आप को सबसे छोटा बना ले, चाहे वह सबसे बड़ा ही क्यों न हो।” परन्तु हमें यहाँ ध्यान देना है कि सन्त पौलुस का प्रेरितों के साथ कोई विवाद न था, जैसा वह स्वयं भी बताता है। इसलिए उसके अपने को इतना बड़ा ठहराने का कोई विशेष कारण है; वह यह कि वे कुत्ते, जो प्रेरितों के बीच फूट डालने और साथ ही सुसमाचार को उलट-पुलट और झूठा करने का यत्न करते थे, सदा यह दिखावा करते थे कि वे प्रेरितों के चेले हैं और उनसे घनिष्ठ हैं; जैसे आजकल हम बहुत-से भगोड़े और निर्लज्ज लोगों को देखते हैं, जो परमेश्वर के सेवकों के नामों का दुरुपयोग करते हैं और खुले गले से झूठ बोलने से नहीं चूकते, यह कहते हुए: “अहा, मैंने यह अमुक व्यक्ति से सीखा।” और फिर भी वे ऐसी बात कहते हैं जो कभी सुनी ही न गई थी, वरन् उनकी निर्लज्जता इतनी आगे बढ़ जाती है कि वे नगरों तक के नाम ले लेते हैं, जबकि यदि कोई उनकी भली-भाँति जाँच करे तो उसे ठीक उलटा मिलेगा। इसलिए सन्त पौलुस के लिए यह दिखाना आवश्यक था कि मनुष्यों का अधिकार हमारे प्रभु यीशु मसीह के सर्वोच्च अधिकार को, और उस आदर को जो मनुष्यों को उसके वचन के प्रति रखना चाहिए, मिटाने के लिए पर्याप्त नहीं। इसलिए हम पहले तो यह देखते हैं कि पौलुस यहाँ पतरस, याकूब या यूहन्ना के विरुद्ध नहीं झगड़ रहा था, क्योंकि वह उनसे भली-भाँति सहमत था। और दूसरे यह कि उसने अपने व्यक्तित्व का ध्यान नहीं किया, वरन् परमेश्वर के पक्ष की रक्षा करना चाहा; अर्थात् यह कि वह प्रेरित के पद पर ठहराया और स्थापित किया गया था। एक बात पर ध्यान दो कि वह घमण्ड से या संयोग से आगे नहीं घुस आया था, वरन् परमेश्वर ने उसे इसके लिए चुना था, और इसी कारण उसने उस शिक्षा को जो उसे सौंपी गई थी, परमेश्वर और हमारे प्रभु यीशु मसीह के शुद्ध सत्य के रूप में दूर-दूर तक पहुँचाया।
इसलिए यदि हम विचार करें कि सन्त पौलुस का लक्ष्य क्या था, तो हमारे पास न केवल सब निन्दकों के मुँह बन्द करने के साधन होंगे, वरन् उसकी शिक्षा से जिस विश्वास को हम थामे हैं उसमें हम और दृढ़ भी होंगे। और यद्यपि आजकल ऐसे निर्लज्ज लोग नहीं हैं जो उसे कलंकित करने या उसकी प्रेरिताई का अधिकार मिटाने का यत्न करें, तो भी वह शिक्षा हमारे लाभ की नहीं रह जाती, ऐसा नहीं।
वह कैसे? हम देख चुके हैं कि सन्त पौलुस ने कहा है कि यदि स्वर्ग के दूत भी खड़े होकर हमारे प्रभु यीशु मसीह के सुसमाचार से भिन्न कोई सुसमाचार सुनाएँ, तो हमें उन्हें श्रापित मानना चाहिए। और आज के दिन भी वही बात हमारे लिए हितकर है। क्योंकि हम शैतान को, और मनुष्यों के सारे अविश्वास और छल को, और उस सारे कूड़े-करकट और चतुराइयों को ललकार सकते हैं जिनसे वे हमें हमारे विश्वास की सच्चाई से हटाना चाहते हैं। मैं कहता हूँ कि हम उसके एक-एक अंश को ललकार सकते हैं। और क्यों? क्योंकि परमेश्वर के वचन में स्वयं ऐसी महिमा है कि जो कुछ उसके विरुद्ध खड़ा किया जा सकता है वह धुआँ, झूठ और गन्दगी मात्र है। अब यदि हम इसे सामान्य नियम मानें कि न पतरस और न यूहन्ना सुसमाचार की महिमा को घटा सकते हैं, तो वह हमारे लिए ढाल का काम देगा, उन सब बातों को रोकने के लिए जो आजकल हमें हिलाने को कही जा सकती हैं; जैसे हम देखते हैं कि बहुत-से निर्बल जन यह कहे जाने से मार्ग से हटा दिए जाते हैं: “अरे क्या? हम देखते हैं कि संसार के सबसे बुद्धिमान लोग, सबसे कुशल लोग, पादरी और वे जिनके हाथ में कलीसिया का शासन है, राजाओं और हाकिमों समेत, उस विश्वास से जो चिरकाल से ग्रहण किया गया है और जीवन की पुरानी चली आई रीति से लगे हुए हैं।” इस प्रकार साधारण जनों की आँखें धुँधली हो जाती हैं, उनकी बुद्धि बिलकुल कुन्द हो जाती है, और उनके मन हार मान लेते हैं; जिसके कारण परमेश्वर का सत्य त्याग दिया जाता है, यहाँ तक कि उनके बीच उसकी न कोई साख रहती है न आदर, और इस बीच ये नकाबपोश ऊपर हाथ पाते और इतराते फिरते हैं, मानो मनुष्य परमेश्वर को चिढ़ाने के लिए उन्हें मूरत बनाएँ और उनकी उपासना करें। तो जब यह ऐसा है, तो हम देखते हैं कि आजकल हमारे लिए उस शिक्षा से सज्जित होना आवश्यक है जो यहाँ सन्त पौलुस में समाई है; वह यह कि परमेश्वर चाहता है कि हम उसके वचन को बिना विरोध के ग्रहण करें; और जब हमारा प्रभु यीशु मसीह संसार में उतरा, तो वह हमारा गुरु ठहराया गया, इस शर्त पर कि हम में से हर एक उसकी सुने और जो कुछ वह कहता है उसी से लगा रहे, जो कुछ उसने प्रकट करना चाहा उसमें न कुछ जोड़े न घटाए, क्योंकि सारी बुद्धि की पूर्ण सिद्धता उसी में है।
जब हम यह एक बार जान लें, तो मनुष्य हमारे सामने जो भी तुच्छ चमक-दमक रखें उन सब को हम तुच्छ जान सकते हैं। और यदि लोग हमसे कहें कि संसार के सबसे बड़े, सबसे बुद्धिमान, सबसे धनवान और अधिकारी लोग इस या उस रीति से जीते हैं, तो हम उत्तर दे सकते हैं: हाँ, ठीक है, पर अन्त में परमेश्वर के सामने वे क्या हैं? जब सृष्ट प्राणी उसके सम्मुख आते हैं तो सब को लुप्त हो जाना पड़ता है; क्योंकि जब परमेश्वर के वचन को वह महिमा दी जाती है जिसके द्वारा वह परखना चाहता है कि हम उसका आदर करते हैं या नहीं, तब निश्चित है कि हम वह सब ग्रहण करेंगे जो उसके पवित्र मुख से निकलता है। अब वह वचन सुसमाचार में समाया है, इतना कि जब हम एक बार मान लें कि परमेश्वर की आज्ञा माननी चाहिए, तो उसकी इच्छा जानने के लिए हमें फिर समुद्र या भूमि पर दौड़ने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि व्यवस्था, भविष्यद्वक्ताओं और सुसमाचार में हमारे पास उसका निश्चित और अचूक प्रमाण है। जब बात ऐसी है, तो हम देखते हैं कि पवित्र आत्मा ने बिना कारण नहीं चाहा कि यह शिक्षा जगत के अन्त तक बनी रहे। और इसके अतिरिक्त हमें साथ ही यह चेतावनी भी दी गई है कि हम परमेश्वर पर टिके रहें और हर हवा के झोंके से डाँवाडोल न हों, जैसा कि हम देखते हैं कि शैतान बहुत-से भिन्न मत उठाता है, जो बवण्डर और आँधियों के समान हमें इधर-उधर धकेलने को हैं।
परन्तु आओ हम परमेश्वर पर स्थिर होना सीखें, तब हम अन्तिम प्रहार तक डटे रहेंगे। क्योंकि यदि हम अपना विश्वास यूहन्ना या पतरस से पाते, तो वह दुर्बल विश्वास होता, क्योंकि वे निर्बल प्राणी थे, और हम जानते हैं कि मनुष्य झूठ और व्यर्थता के अधीन है। इसलिए हमारे लिए आवश्यक है कि हमारी नींव और आधार इस संसार में मिलनेवाली सब बातों से कहीं अधिक ठोस और दृढ़ हो। और इसलिए, जब हम जानते हैं कि परमेश्वर ने हमें अपने प्रभु यीशु मसीह के व्यक्तित्व में सिखाया है, और मनुष्य उसके साधन मात्र रहे हैं, तो हमें परमेश्वर तक ऊपर चढ़ना चाहिए। अपनी शिक्षा के लिए इस उपदेश को लागू करने का यही मार्ग है, जहाँ सन्त पौलुस कहता है कि प्रेरितों ने उसे कुछ नहीं जोड़ा। तो भी इसका अर्थ यह नहीं कि वह उन्हें तुच्छ जानता है, या उनके साथ लाभ उठाना नहीं चाहता था; क्योंकि वह इसे भली-भाँति पसन्द करता था, वरन् हर प्रकार से इसमें लगा रहा, और जैसा हम देख चुके हैं, छोटे-से-छोटे जन से भी सीखने में उसे लज्जा न थी। परन्तु उसका आशय यह था कि परमेश्वर का वचन, जिसका उसने प्रचार किया था, अटल बना रहे; और इसी कारण वह सबसे बुद्धिमान लोगों को, और संसार में सबसे ऊँचे ठाठ-बाट वालों को, और उन्हें जो कलीसिया में सबसे अधिक रौब और प्रतिष्ठा रखते हैं, उसके अधीन करता है, ताकि यीशु मसीह की श्रेष्ठता बनी रहे, और मनुष्य उसी की ओर दृष्टि रखें, मनुष्यों की ओर नहीं, वरन् पूरी रीति से एक ही विश्वास पर आधारित हों, और कहें कि जब परमेश्वर का पुत्र हमारे पास इसलिए भेजा गया है कि हमें अपने पिता परमेश्वर की इच्छा दिखाए, तो जो कुछ हम उससे पाते हैं उसमें किसी भी रीति से सन्देह करना हमारे लिए उचित नहीं। देखो, आज के दिन हमें क्या करना है। और जब सन्त पौलुस कहता है कि प्रेरित जो भी थे उसकी उसे चिन्ता नहीं, क्योंकि परमेश्वर मनुष्यों का मुँह नहीं देखता, तो इससे वह दिखाता है कि उसे यूहन्ना या पतरस से कम नहीं गिना जाना चाहिए, इस कारण कि वह अविश्वासी रहा था और यीशु मसीह पर विश्वास नहीं किया था, उस समय जब दूसरे प्रेरित सुसमाचार का प्रचार कर चुके थे। क्योंकि संसार की रीति यह है कि जो पहले आता है उसकी सेवा पहले होती है। इसलिए सन्त पौलुस ने देखा कि यह बात उसकी शिक्षा के लिए कुछ हानि का कारण हो सकती है, और कहा कि मनुष्यों को यह नहीं देखना चाहिए कि वह पहले कैसा था, या वह दूसरा पहले कैसा था। फिर भी उसका आशय यह नहीं कि उसे सदा पीछे देखकर अपने आप को दीन नहीं करना चाहिए, या यह कि अनुग्रह के जो दान परमेश्वर ने यूहन्ना और पतरस को दिए थे उनका मूल्य न आँका जाए और जैसे वे प्रशंसा के योग्य थे वैसे उनकी प्रशंसा न की जाए; क्योंकि हम देखते हैं कि दूसरे स्थानों में वह अपने आप को असमय जन्मा हुआ तुच्छ जन कहता है, और स्वीकार करता है कि वह प्रेरितों की गिनती में गिने जाने के योग्य नहीं। सन्त पौलुस ने वैसा नहीं किया जैसा बहुत-से कपटी, या यों कहें निर्लज्ज, करते हैं, जो जीवन भर या तो व्यभिचारी, या पियक्कड़, या उच्छृंखल रहे और पशु-सा आचरण करते रहे, और फिर भी इस पर केवल मुँह बिचकाकर कहते हैं: “अजी, मनुष्यों को यह नहीं पूछना चाहिए कि मैं पहले क्या था।” परन्तु निश्चय ही मनुष्यों को अपने विरुद्ध अपने सिवा किसी और न्यायी की आशा नहीं रखनी चाहिए। क्योंकि हम में से हर एक को अपने आप को दोषी ठहराना चाहिए, जैसा सन्त पौलुस हमें समझाता है; और विशेष करके जब हम विचार करें कि हम कैसे अभागे अविश्वासी थे और पशुओं के समान ही थे, तो हमें अपनी लुचपन पर लज्जित होना चाहिए। इसलिए सन्त पौलुस भली-भाँति जानता था कि उसके पास अपने आप से अप्रसन्न होने और सुसमाचार के विरुद्ध अपने संघर्ष पर लज्जित होने का कारण था, और साथ ही उसने उस भलाई को तुच्छ नहीं जाना जो यूहन्ना और याकूब में थी। जिस समय पतरस और यूहन्ना सुसमाचार के कारण कोड़े और बेंत खा रहे थे, उस समय सन्त पौलुस हत्यारा था, और यह कहने से न चूका कि उनके साथ ठीक व्यवहार हुआ और इसमें कोई हानि नहीं। फिर भी उसका लक्ष्य वही था जिसकी चर्चा मैं पहले कर चुका: अर्थात् जब परमेश्वर ने थोड़े ही समय में उसे ऐसा ऊँचा उठा दिया था, तो उसका पहले का बुरा आचरण उन अनुग्रह के दानों के ग्रहण करने में बाधा न बने जो उसमें थे, ऐसा न हो कि वे कलीसिया की सामान्य उन्नति के लिए लाभदायक न ठहरें।
इस प्रकार तुम सारांश में देखते हो कि हमें यह स्मरण रखना है कि यदि हमें सुसमाचार में देर से बुलाया गया हो, तो हमें खेद होना चाहिए कि हमने अपना समय इतने बुरे ढंग से बिताया, और विशेषकर इस बात का कि हम अभागे पशुओं की भाँति जिए, यह जाने बिना कि हमारा पिता कौन है जिसकी हमें अपने जीवन के लिए और उससे पाई हुई सब वस्तुओं के लिए आराधना करनी चाहिए। इसलिए हमें इसका खेद होना चाहिए। फिर, जब हम किसी को जो भटक गया था लौटते देखें, तो हमें उस परिवर्तन को परमेश्वर का आश्चर्यकर्म मानना चाहिए। क्योंकि यदि कोई मनुष्य जंगली पशु रहा हो और उसके परमेश्वर तक लाए जाने की सब आशा जाती रही हो, और फिर भी वह आगे चलकर भेड़ के समान हो जाए और स्वेच्छा से हमारे प्रभु यीशु मसीह की आज्ञाकारिता में अपने को सौंप दे, तो यह हो ही नहीं सकता कि परमेश्वर का हाथ उस पर न फिरा हो। इसलिए हमें जानना चाहिए कि सब मनुष्य पहले कैसे रहे हैं, और इस विषय में हर एक को अपना न्यायी आप होना चाहिए; परन्तु फिर भी, जब कोई मनुष्य परमेश्वर के पास आने में धीमा रहा हो, और परमेश्वर उसमें ऐसी सामर्थ्य से कार्य करे कि दिखाई दे कि वह उसे एक दिन में उतना आगे बढ़ाना चाहता है जितना दूसरे मनुष्यों को दस वर्ष में, तो उसके ऐसा करने से हम उस जन को, जो उन्नति करने के योग्य था, पीछे नहीं खींचेंगे, जैसा लोग कभी-कभी करते हैं और कहते हैं: “दो-तीन वर्ष पहले यह जन क्या था?” ऐसी बातें किसी काम की नहीं। वरन् हम समझें कि हमारे प्रभु ने अपने आप को और अधिक प्रकट किया है, ताकि उसका आदर हो। और साथ ही, क्योंकि परमेश्वर के दान निष्फल नहीं होने चाहिए, इसलिए हम उन्हें विश्वासियों के लाभ और कल्याण के लिए काम में लाए जाने दें। तो देखो, यह देखना कि मनुष्य पहले कैसे रहे हैं, इसलिए नहीं होना चाहिए कि हम उन्हें सदा तुच्छ जानें; क्योंकि सम्भव है कि परमेश्वर ने उसे कुछ समय के लिए लगाम ढीली दी हो कि उसे नीचा दिखाए, जिससे वह उड़ाऊ बना, या अज्ञान में जिया, और भलाई को न जाना, या उसमें कोई उत्तम या प्रशंसनीय गुण न था; तो भी परमेश्वर उसे मानो मंच पर खड़ा कर देगा, और कार्य से दिखा देगा कि वह उससे अपनी सेवा करवाना चाहता है। इसलिए जो कुछ परमेश्वर हमें इस रीति से देता और प्रस्तुत करता है उसे हमें भला जानकर ग्रहण करना चाहिए।
इस प्रकार तुम देखते हो कि हमें क्या स्मरण रखना है और ऐसा करना कितना आवश्यक है; क्योंकि यहाँ ऐसी कोई बात नहीं जिसका अनुभव हमें आजकल न होता हो। जहाँ सन्त पौलुस के ये शब्द हैं कि परमेश्वर किसी मनुष्य का मुँह नहीं देखता, उसका आशय यह है मानो वह कह रहा हो कि परमेश्वर उन बातों से बँधा नहीं है जो हमें दिखाई देती हैं या जिन्हें हम मूल्यवान समझते हैं, वरन् वह स्वतन्त्र है कि जिसे चाहे और जैसे चाहे अपने दान दे। बहुत-से लोग जब “मुँह” शब्द की चर्चा सुनते हैं तो अपने आप को धोखा देते हैं और उसे पवित्र आत्मा के आशय के विरुद्ध मरोड़ते हैं। और इस कारण बहुत-से लोग समझते हैं कि परमेश्वर एक मनुष्य को दूसरे से अधिक ग्रहण नहीं करता, क्योंकि [वे सोचते हैं] तब तो वह पक्षपाती ठहरेगा। परन्तु देखो, वे परमेश्वर के स्वतन्त्र चुनाव को कैसे धुँधला करते हैं; मानो वह मनुष्यों का ऋणी हो, और यदि वह उनमें से किसी को चुने तो वह चुनाव बिना अपवाद सब के लिए सामान्य होना चाहिए, यहाँ तक कि (उनके विचार में) परमेश्वर का अनुग्रह टेनिस की गेंद की भाँति हवा में उड़ता है, और उसे पकड़ने को हाथ बढ़ाना और अपने काम में लाना हमारी शक्ति और स्वतन्त्र इच्छा में है। इस प्रकार बहुत-से लोग मोहित हैं, वरन् घोर अज्ञान में पड़े हैं, क्योंकि वे नहीं समझते कि “मुँह” शब्द का क्या अर्थ है। परन्तु पवित्र शास्त्र हमें बताता है कि जब परमेश्वर मनुष्यों को चुनने, उन्हें अधिक उत्तम दशा में रखने और अपने पवित्र आत्मा के दान उन्हें देने की कृपा करता है, तो वह उस जन में किसी भी बात पर नहीं टिकता, न इसकी परवाह करता है कि वह गोरा है या काला, बूढ़ा है या जवान, कुलीन है या अकुलीन, धनी है या निर्धन, मनुष्यों का प्रिय है या अप्रिय, सुन्दर है या कुरूप। परमेश्वर इन तुच्छ बातों में से किसी का विचार नहीं करता; क्योंकि यदि वह हम से प्रेम करने में तब तक देर करता जब तक कि हम में कोई अच्छी बात न पाता, तो वह हमें सदा उसी दशा में पड़ा रहने देता जिसमें हम हैं। इसी कारण सन्त पौलुस स्पष्ट कहता है कि परमेश्वर किसी मनुष्य का मुँह नहीं देखता। और इस प्रकार अब हम देखते हैं कि उस पाठ से हमें क्या निष्कर्ष निकालना है।
सबसे पहले (जैसा मैं कह चुका) हम परमेश्वर के दानों को ग्रहण करना और जब वे हमें दिए जाएँ तो उनसे अपना लाभ उठाना सीखें, और बहुतों की भाँति उन्हें ठुकराने का अवसर न ढूँढ़ें, जो कोई-न-कोई बात बताकर अपनी कृतघ्नता को ढाँपने का यत्न करते हैं। वे प्राचीनता का हवाला दें या कोई और बात, वह हमें उन लोगों से लाभ उठाने से न रोके जिन्हें परमेश्वर हमारे पास भेजता है; क्योंकि चाहे वे केवल तीन दिन के हों, और मनुष्यों में अपनी बड़ाई न कर सकें, और उन्होंने बहुत-से पराक्रम और साहसिक कार्य न किए हों, तो भी हमारे लिए इसमें कुछ अन्तर नहीं पड़ता, यदि हम देखें कि हमारे प्रभु ने उन्हें ऐसे दान दिए हैं जो हमारी उन्नति के काम आ सकते हैं; इसलिए हम में से हर एक झुके और सीखने को तैयार हो, यह निश्चय जानकर कि यदि हम मनुष्य के द्वारा दी गई भलाई को ठुकराएँ, तो हम उस मनुष्य का अपराध नहीं करते, वरन् इसलिए कि उसका कर्ता परमेश्वर है और हम उसके दिए हुए को ग्रहण करना तुच्छ जानते हैं, हम इस योग्य हैं कि उस वस्तु से जो वह हमें देना चाहता है, और उन आशीषों से जो उसने मानो हमारे हाथ में रख दी हैं, पूरी रीति से वंचित कर दिए जाएँ। देखो, हमें क्या सीखकर जाना है।
इसके अतिरिक्त हम यह भी सीखें कि परमेश्वर के पास आते समय अपने आप के विषय में कोई कल्पना न लाएँ। परन्तु जो संसार की दृष्टि में कुलीन, पराक्रमी या धनवान है, वह सारा आत्म-गौरव त्याग दे और स्वीकार करे कि परमेश्वर के सामने वह कुछ भी नहीं; और जो निर्धन और दुःखी है, वह निश्चय जाने कि यद्यपि मनुष्य उसे तुच्छ जानते हैं, वह बिलकुल त्यागा नहीं गया। और हम उस बात का अभ्यास भी करें जो सन्त याकूब हमें दिखाता है, अर्थात् जो भाई बड़ा और कुलीन है वह अपनी दीनता में घमण्ड करे, यह जानकर कि उसके पास सब कुछ केवल परमेश्वर की निरी भलाई से है; और जो भाई निर्धन और नीची और साधारण दशा का है, वह इसमें घमण्ड करे कि परमेश्वर ने उसे गोद लिया है और उसे ऐसी दशा दी है जो संसार के सब राज्यों से बढ़कर है, क्योंकि उसे यह भाता है कि हमें इस रीति से अपने पुत्र स्वीकार करे। यह सच है कि जहाँ मनुष्य बाहरी रूप और चीज़ों के सुन्दर दिखावे को ताकते हैं, वहाँ परमेश्वर शुद्ध विवेक को ग्रहण करता है, परमेश्वर हृदय की निर्मलता को देखता है। परन्तु उसे वह स्वयं पहले उसमें डालनी पड़ती है; क्योंकि आरम्भ में वह उसे हम में नहीं पाएगा। परमेश्वर आदम की सब सन्तानों पर दृष्टि करे, और (जैसा भजन संहिता में कहा गया है) उसे पूर्ण भ्रष्टता के सिवा कुछ न मिलेगा। वे अपनी दुष्टता में सर्वथा सड़े हुए हैं। देखो, हमारा स्वभाव क्या है। तब ऐसी कोई बात नहीं जो परमेश्वर को हमें ग्रहण करने और दूसरों से बढ़कर हमें चुनने के लिए प्रेरित कर सके; वरन् हमें उसकी भलाई के पात्र बनना और स्वीकार करना है कि उसका हमें ग्रहण करना हमारी अपनी योग्यता के कारण नहीं; वरन् जब उसने हमें अपने लिए चुना और अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें मार्ग में लगाया, तभी उसने जाना कि हम में क्या खरापन है। इसलिए नहीं कि हम में अपना कुछ है; परन्तु इसलिए कि वह मानो अपने आप को हम में देखता है। क्योंकि देखो, विश्वासियों में जितनी भलाइयाँ हैं, उतने ही परमेश्वर की भलाई के प्रमाण हैं, कि उसने उन पर अपनी उदारता प्रकट की। इसी कारण प्रेरितों के काम के दसवें अध्याय में और अन्य स्थानों में मुँह देखने का अर्थ उन आडम्बरों और मुखौटों से लिया गया है जो झूठे भ्रम हैं; जैसे धन, साख, प्रतिष्ठा, कुलीनता और ऐसी ही अन्य बातें, जो मनुष्यों को अपना मूल्य आँकने और अपनी ही कल्पनाओं में फूले रहने की ओर ले जाती हैं।
परन्तु कहा गया है कि परमेश्वर लोगों के हृदयों को देखता है, उनके बाहरी रूप को नहीं ताकता, यदि वे जैसा मैं पहले बता चुका आज्ञाकारिता से उसके अधीन हों। सारांश में हमें यही बात स्मरण रखनी है। अब सन्त पौलुस तुरन्त यह जोड़ता है कि प्रेरितों ने उसे अपना सहकर्मी स्वीकार किया और उसे अपना हाथ दिया, मानो इसकी गारंटी देने को कि जो सुसमाचार उसने सुनाया वह सब बातों में उनकी शिक्षा के अनुरूप था, और वे सब हमारे प्रभु यीशु मसीह की सेवा करते आए थे। इसमें सन्त पौलुस यह भी जोड़ता है कि सर्वसम्मति से वह अन्यजातियों का प्रेरित ग्रहण किया गया, अर्थात् उनका जो व्यवस्था के अधीन पाले नहीं गए थे, न जन्म और वंश से यहूदी थे। यहाँ हम देखते हैं कि सन्त पौलुस का संघर्ष प्रेरितों के साथ न था; क्योंकि उन्होंने उसे अपना सहकर्मी स्वीकार किया; और न उसने उन्हें तुच्छ जाना; क्योंकि हम पहले देख चुके हैं कि यद्यपि यरूशलेम में उसका आना इस निश्चित ज्ञान के साथ था कि परमेश्वर ने उसे ठहराया है, और निश्चित और अचूक प्रकाशन के आधार पर, तीसरे स्वर्ग तक उठा लिए जाने के बाद; तो भी वह घमण्ड में बह नहीं गया, और न उसने प्रेरितों से विचार-विमर्श करने के लिए यरूशलेम की वह यात्रा इस भय से की कि कहीं वह पहले ही व्यर्थ न दौड़ चुका हो या आगे न दौड़े। क्योंकि उसकी इच्छा थी कि सब मनुष्य जान लें कि वह अपने लिए कोई विशेष बात नहीं माँगता, वरन् उसकी एकमात्र खोज यह थी कि परमेश्वर के पुत्र का प्रचार सारे संसार में हो, और मनुष्य उसकी उपासना करें और उस पर भरोसा रखें; इस प्रकार वह कोई नया यीशु मसीह नहीं लाया, वरन् सब बातों में पतरस और यूहन्ना और उनके सब साथियों के अनुरूप था। यदि सन्त पौलुस अलग सिकुड़ जाता, तो कहा जाता कि उसका आशय शेष प्रेरितों के साथ शिक्षा में एकमत होना न था।
परन्तु अब, जब वह इस रीति से उनके साथ सहमत होने आता है, तो वह दिखाता है कि वह किसी घमण्ड या ढिठाई में नहीं बहा; और इसी का आशय है कि वह फिर से कहता है कि प्रेरितों ने उसे अपना सहकर्मी स्वीकार किया। तब वह अपने को उनसे ऊपर नहीं ठहराता, वरन् चाहता है कि मनुष्य जानें कि प्रेरित हमारे प्रभु यीशु मसीह की सेवा करते थे, और वह उनकी गिनती में एक था, और जो सुसमाचार उसने सुनाया उसे सन्देहजनक बात न समझा जाए, वरन् ऐसा ही निश्चित जैसे पतरस या यूहन्ना ने उसे कहा होता, इतना कि जब सन्त पौलुस उसकी चर्चा करता है, तो वह नहीं कहता, “यह मैं हूँ,” वरन् कहता है कि यह यीशु मसीह है। चाहे पतरस, यूहन्ना या याकूब बोले, हम देखें कि परमेश्वर का पुत्र सदा हम पर प्रभुता रखे, और जो कुछ उसकी ओर से आए वह ग्रहण किया जाए, चाहे मेरे द्वारा हो या किसी और के द्वारा। सन्त पौलुस नहीं चाहता कि मनुष्य उसकी ओर ताकें, उतना भी नहीं जितना संसार के सबसे तुच्छ जन की ओर। सन्त पौलुस के इस पाठ में सारांश में हमें यह स्मरण रखना है कि उसे अपनी कोई सुध न थी, न उसने अपना कुछ ढूँढ़ा, वरन् वह इसी से सन्तुष्ट था कि यीशु मसीह को वह प्रशंसा मिले जिसका वह अधिकारी है, और उसका वचन पूरे आदर के साथ ग्रहण किया जाए, और शेष सब बातों के विषय में उसे परवाह न थी कि उनका क्या हो। रही दूसरी बात कि वह अन्यजातियों का प्रेरित ग्रहण किया गया, वह उससे मेल खाती है जो सन्त लूका भी बताता है: अर्थात् कि पौलुस और बरनबास प्रेरित ठहराए गए, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें इसी उद्देश्य से अलग किया था कि अन्यजातियों के बीच सुसमाचार का प्रचार करें। इसलिए वह बात मनुष्यों की ओर से न थी; परमेश्वर ने उसके विषय में अपना अटल निर्णय सुनाया था; और सन्त पौलुस का अपने विषय में इस रीति से कहना दूसरे प्रेरितों के कार्यभार को कुछ भी घटाता नहीं।
परन्तु जब वह सचमुच परमेश्वर की ओर से भेजा गया था, और उसका बुलाया जाना मनुष्यों पर आधारित न था, न उसने बेहिसाब प्रचार किया, न किसी दिखावे में अपने आप को घुसेड़ा, वरन् परमेश्वर ने उसे इसके लिए चुना था, तो प्रेरितों ने दिखाया कि वे किसी रीति से ऐसे बुलाहट के विरुद्ध नहीं बोलेंगे, क्योंकि वह परमेश्वर की ओर से होने के कारण पर्याप्त अधिकार रखती थी। और यहाँ हम और भी अच्छी रीति से देखते हैं कि सब मनुष्यों को आज्ञाकारिता के लिए अपने आप को कैसे ढालना चाहिए, ताकि कुछ भी परमेश्वर के वचन को लगाम और जूआ बनने से न रोके, जो हमें ऐसे भय में रखे कि हम में से कोई अपनी कल्पनाओं, अभिलाषाओं और वासनाओं के पीछे न चले, वरन् अपने आप को हमारे प्रभु यीशु मसीह के हाथ से चलाए और शासित होने दे।
अब यदि प्रेरितों के लिए सन्त पौलुस को इसलिए ठुकराना उचित न था कि वह स्वर्ग से भेजा गया था, तो हम क्या करेंगे? क्या यह शैतानी घमण्ड न होगा यदि हम यह सह न सकें कि वह शासन और व्यवस्था जो परमेश्वर ने अपनी कलीसिया में स्थापित की है निर्बाध बनी रहे, वरन् अपनी इच्छा से बुलाहटों को बदलना चाहें, अपने मूर्ख मस्तिष्क की युक्ति के अनुसार खड़ा करें और गिराएँ? तब यदि हम कलीसिया में ऐसी गड़बड़ी मचाने चलें, तो क्या यह वैसा ही नहीं जैसे हम परमेश्वर को चिढ़ाने के लिए सूर्य को आकाश से नोच लेना चाहें? इसलिए तुम यहाँ देखते हो कि हमें यह स्मरण रखना है कि कलीसिया का शासन परमेश्वर का ठहराया हुआ है, और जो उसमें कुछ भी बदलने चलते हैं वे शैतानी घमण्ड से भरे हैं और इस प्रकार अपने को ऊँचा उठाने के कारण अन्त में अवश्य गिरेंगे।
अब रही यह बात कि सन्त पौलुस अन्यजातियों के बीच भेजा गया, यह उसका बदलना नहीं था जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के मुख से पहले ही कहा जा चुका था, जब उसने कहा, “तुम सारे जगत में जाकर सुसमाचार का प्रचार करो।” पहली दृष्टि में ऐसा लग सकता है कि यहाँ कुछ परिवर्तन और विरोध है, क्योंकि सन्त पौलुस एक ओर भेजा गया और सन्त पतरस दूसरी ओर। तो भी दोनों भली-भाँति साथ-साथ ठहरते हैं; क्योंकि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने प्रेरितों में से किसी एक से अलग-अलग नहीं कहा, “हे पतरस, तू सारे संसार में जाएगा, तू मेरे सुसमाचार का प्रचार करने के लिए सारी पृथ्वी में घूमेगा,” या “हे यूहन्ना, तू भी ऐसा ही करेगा,” और इसी प्रकार दूसरों से; परन्तु वह कहता है, “तुम सब जिन्हें मैंने ठहराया है, जाओ, मेरे सुसमाचार को सब जगह फैलाओ।” और इस प्रकार सामान्य शब्दों में आज्ञा देना इसमें बाधा नहीं कि कोई एक मार्ग से जाए और कोई दूसरे से, और उनमें से हर एक वहाँ अपने आप को लगाए जहाँ परमेश्वर ने उसके लिए मार्ग बनाया या प्रवेश दिया, जैसे वे उसी कार्य में अपने आप को खपाने का यत्न करते रहे, जीवन में भी और मृत्यु में भी।
परन्तु इसके अतिरिक्त पौलुस को दूर-दूर के देशों में जाने की विशेष आज्ञा मिली थी, जहाँ यहूदियों की ऐसी भीड़ न थी। यह सच है कि पौलुस जहाँ कहीं गया, वहाँ उसने यहूदियों के सब आराधनालयों में सुसमाचार की शिक्षा सुनाई, ताकि वह उचित रीति से उनका भी प्रेरित था। तो भी इसने उसे अन्यजातियों के लिए ठहराए जाने से, और सारे संसार में सुसमाचार पहुँचाने से नहीं रोका, वहाँ भी जहाँ परमेश्वर पहले जाना न गया था, और जहाँ अच्छी शिक्षा का, किसी व्यवस्था का, किसी धर्म का कोई प्रकाश न था। इसलिए सन्त पौलुस मुख्यतः उन्हीं के पास भेजा गया। और जब बात ऐसी है, तो पोप अब सर्वोच्चता का क्या दावा कर सकता है, इस बहाने से कि सन्त पतरस (जैसा वह स्वयं कहता है) रोम का बिशप था? निश्चय ही यह कहना कि पतरस रोम में था और वहाँ बिशप होकर रहा, केवल कल्पित कथा और सरासर उपहास है।
परन्तु मान लें कि ऐसा ही था। तो भी, जो मैं पहले कह चुका उसके अनुसार, पतरस की बुलाहट विशेष करके यहूदियों के लिए थी। और इसलिए यदि पोप सन्त पतरस का उत्तराधिकारी होने का दावा करता है, तो उसे यहूदियों का बिशप होना चाहिए, और उसकी सर्वोच्चता उनसे आगे नहीं बढ़नी चाहिए। रही सन्त पौलुस की बात, तो यह बिलकुल निश्चित है कि वह कभी रोम का बिशप न हुआ, और न वहाँ कभी रहा, सिवाय इसके कि जब वह वहाँ बन्दी बनाकर लाया गया; और यह नहीं जाना जाता कि वह वहाँ रहा या नहीं, तो भी बहुत सम्भव है कि उसने अपने प्राण के विषय में उत्तर दिया। तब पोप इसमें डींग नहीं मार सकता कि वह सन्त पौलुस का उत्तराधिकारी है। और रोम नगर के पास क्या प्रमाण या क्या योग्यता है कि वह कहे कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के प्रेरित वहाँ थे, सिवाय इसके कि वह डाकुओं की खोह है, और परमेश्वर के सेवक वहाँ मारे गए हैं? इसलिए इस पाठ पर भली-भाँति ध्यान दें, जहाँ सन्त पौलुस दिखाता है कि सन्त पतरस यहूदियों के लिए ठहराया गया और वह स्वयं अन्यजातियों के पास भेजा गया; क्योंकि जब यह पाठ स्पष्टतः हमारे ही काम का है, तो हमें और अधिक प्रेरित होना चाहिए कि इससे लाभ उठाएँ।
यह सच है कि दूसरे प्रेरितों की शिक्षा भी हमारी उतनी ही है जितनी यह; क्योंकि हमारा प्रभु यीशु मसीह चाहता है कि जब वह हम से बोले तो उसकी सुनी जाए, चाहे वह पतरस के मुख से हो या यूहन्ना के मुख से; क्योंकि सब उसके आत्मा के साधन हैं, और हमें व्यक्तियों में भेद नहीं करना चाहिए।
परन्तु बात जैसी भी हो, जब सन्त पौलुस की शिक्षा हमसे सम्बन्ध रखती है, तो उसे हमारे लिए ऐसी एड़ का काम करना चाहिए जो हमें भीतर तक चुभे। और जब परमेश्वर ने उसे इसलिए चुना कि अभागे अन्यजातियों को अपने पास लाए, और उसे उनके खींचने का साधन बनाया जो उसकी कलीसिया से कट गए थे, तो निश्चय ही यह हमें और साहस दे, क्योंकि उसने अभागे अविश्वासियों को अज्ञान के अन्धकार से, जिसमें वे थे, निकालने का यत्न किया (और इसी को अपना एकमात्र निशाना बनाया); अर्थात् हम को, जो शरीर के अनुसार यहूदियों की जाति के नहीं हैं। तो भी हम साथ ही यह विचारें कि यीशु मसीह की हम ऐसी रीति से सुनें कि हम न पतरस की, न पौलुस की, न याकूब की, न यूहन्ना की, न किसी और बात की, केवल उसी की ओर देखें। जो गुरु हमें परमेश्वर पिता ने सब सिद्धता और बुद्धि तक पहुँचाने के लिए दिया है, उसी से हम सन्तुष्ट रहें, और जिन साधनों से वह चाहता है उन्हीं से सिखाए जाएँ, और जो कुछ सन्त पौलुस ने लिखा है वह हमारे काम आए, वैसे ही यूहन्ना और याकूब और अन्य प्रेरितों के लेख भी; जब तक वे हमें यीशु मसीह तक ले जाएँ, उनके द्वारा जो कुछ हमारे पास लाया जाए उसे हम ग्रहण करें, और अन्य सब बातों के प्रति अपनी आँखें मूँद लें, और इसके सिवा कोई और विचार न रखें कि हमारा प्रभु यीशु मसीह उनके द्वारा हमें बुलाता है। और यद्यपि हम पतरस, यूहन्ना, याकूब और पौलुस की शिक्षा की अगुवाई में चलते हैं, तो भी हमारा लंगर सदा यही रहे कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह से जुड़े और मिले रहें, जिसमें हम सब कल्याण और आनन्द की परिपूर्णता पाएँगे, ताकि हमें उसमें पूरी रीति से घमण्ड करने का कारण हो।
परन्तु आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सम्मुख अपने दोषों को मानते हुए उपस्थित हों, और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उन्हें और अधिक अनुभव कराए, कि हम उन पर खेदित हों और सच्चे पश्चाताप के साथ उससे क्षमा माँगें, और अपने जीवन के सब दिन अपनी अभिलाषाओं से लड़ते रहें, जब तक कि हम उनसे पूरी रीति से छूट न जाएँ। और क्योंकि हम ऐसे अभागे प्राणी हैं कि उनसे पूरी तरह और सर्वथा मुक्त नहीं हो सकते, इसलिए हम उससे विनती करें कि वह हमें तब तक सहता रहे जब तक कि वह हमारे सब पापों को गाड़ न दे, और हमें फिर से अपनी ही धार्मिकता से पूरा-पूरा न ढाँप दे। वह इस अनुग्रह को न केवल हमें, वरन् सब लोगों को भी देने की कृपा करे। इत्यादि।
