अध्याय 23

इक्कीसवाँ उपदेश, जो तीसरे अध्याय पर सातवाँ है — गलातियों 3:19-20

Sermons upon Galatians · John Calvin

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इक्कीसवाँ उपदेश, जो तीसरे अध्याय पर सातवाँ है — गलातियों 3:19-20

जो तीसरे अध्याय पर सातवाँ है।

19 तब फिर व्यवस्था क्यों दी गई? वह अपराधों के कारण बाद में दी गई, कि उस वंश के आने तक रहे जिसे प्रतिज्ञा दी गई थी; और वह स्वर्गदूतों के द्वारा एक मध्यस्थ के हाथ ठहराई गई।

20 मध्यस्थ तो एक का नहीं होता, परन्तु परमेश्वर एक ही है।

हम पहले देख चुके हैं कि व्यवस्था के दिए जाने से पहले ही परमेश्वर ने इब्राहीम के वंश में अपनी भलाई, हाँ, अपनी सेंतमेंत की भलाई प्रकट कर दी थी, ताकि यहूदियों के पास अपने उद्धार के लिए उस प्रतिज्ञा को छोड़ और कोई टेक न रहे कि परमेश्वर उन पर तरस खाएगा और उन पर दया करेगा, और उनके पास एक उद्धारकर्ता भेजेगा, जिसके द्वारा उन्हें अपने पापों की क्षमा मिले। इसी पर सन्त पौलुस यह निष्कर्ष निकालता है कि प्रतिज्ञा के बाद आनेवाली व्यवस्था उसको रद्द न कर दे जिसे परमेश्वर पहले ही ठहरा चुका और पक्का कर चुका था; तो भी इस बीच ऐसा प्रतीत हो सकता था कि व्यवस्था प्रतिज्ञा की सहायता के लिए जोड़ी गई, मानो प्रतिज्ञा अपने आप में निर्बल थी।

क्योंकि प्रेरित इब्रानियों की पत्री में भी इसी रीति से तर्क करता है; और क्योंकि भविष्यद्वक्ता यिर्मयाह के द्वारा कहा गया है कि परमेश्वर एक नई व्यवस्था देगा, अर्थात् सुसमाचार, इसलिए प्रेरित यह निष्कर्ष निकालता है कि तब अवश्य ही यह मानना पड़ेगा कि जो व्यवस्था मूसा के द्वारा दी गई वह निर्बल थी और उसमें ऐसी सिद्धता न थी कि मनुष्य उस पर भरोसा रख सके। पहली दृष्टि में ऐसा लग सकता है कि कोई इसके उलट पक्ष में भी यही कह सकता है: अर्थात् चूँकि व्यवस्था प्रतिज्ञा के बाद दी गई, इसलिए वह किसी पूर्ति के लिए की गई, क्योंकि प्रतिज्ञा अपने आप में पर्याप्त न थी, जब तक कि वह कहीं और से सिद्धता उधार न ले; नहीं तो व्यवस्था अनावश्यक प्रतीत होती। परन्तु यह सर्वथा विवेक के विरुद्ध होता कि परमेश्वर कोई अनावश्यक शिक्षा देता। इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हम जानें कि व्यवस्था किस काम की है और किस उद्देश्य से दी गई, नहीं तो हम सदा यही सोचते रहेंगे कि प्रतिज्ञा अपर्याप्त थी और हमें केवल आंशिक रूप से ही बचा सकती थी।

इस पर सन्त पौलुस घोषित करता है कि व्यवस्था देने में परमेश्वर का अभिप्राय और आशय उन लोगों की कल्पना से बिलकुल भिन्न था जो उसमें अपनी धार्मिकता ढूँढ़ते हैं और उसे अपने उद्धार का साधन बनाते हैं। क्योंकि वह (वह कहता है) अपराधों के कारण दी गई: इसलिए नहीं कि संसार दुष्ट और हठीला था अतः लगाम की आवश्यकता थी: क्योंकि हम जानते हैं कि मनुष्यों के बीच भी जिन दोषों को सुधारना आवश्यक था, उन्हीं के अनुसार व्यवस्थाएँ और विधियाँ बनाई गईं।

यदि सब मनुष्य स्वर्गदूत होते, ऐसे कि कुछ भी टेढ़ा न होता, और हर एक अपनी ही इच्छा से भली चाल चलता, जिससे किसी सुधार की आवश्यकता न रहती, तब तो व्यवस्थाएँ निरर्थक ही होतीं। तो फिर क्या कारण है कि हमें इतनी व्यवस्थाओं और विधियों की आवश्यकता पड़ती है? मनुष्यों की दुष्टता, क्योंकि वे सब प्रकार की बुराई में दौड़ पड़ने से नहीं रुकते, और इसलिए उसका उपाय करना पड़ता है: जैसे यदि कोई रोग न होते तो किसी औषधि की आवश्यकता न होती; परन्तु मनुष्यों की उच्छृंखलता रोग उत्पन्न करती है, और इसलिए उपचार जुटाने ही पड़ते हैं।

तो फिर, जब मनुष्यों को लगाम देने और मानो रोक रखने की आवश्यकता है, तब यह इस बात का पक्का प्रमाण है कि वे सब बुराई की ओर झुके हुए हैं और अपने स्वभाव से सर्वथा हठीले हैं। परन्तु सन्त पौलुस का अपने उपर्युक्त कथन में ऐसा अर्थ नहीं था: उसका आशय इससे आगे जाने का था: अर्थात् यह कि परमेश्वर ने व्यवस्था के द्वारा मनुष्यों की दुष्टता को प्रकट करना ठहराया। और यह तर्क इस बात को दिखाने के लिए निर्णायक है कि हम धार्मिकता प्राप्त करने में समर्थ नहीं हैं: क्योंकि गर्मी और ठण्ड एक ही सोते से नहीं निकलतीं। यदि सोता मीठा है तो उसमें कड़वाहट ढूँढ़ना व्यर्थ है; परन्तु इसके उलट, यदि सोता कड़वा या खारा है, तो मीठा जल किसी और सोते में ढूँढ़ना पड़ता है।

व्यवस्था का भी यही हाल है। और वह क्यों दी गई? इसलिए कि मनुष्यों को परमेश्वर के सामने दुगुना दोषी ठहराया जाए, ताकि उनका कपट उनके किसी काम न आए, और वे अब अपने आप को और न बहला सकें, और न अपने व्यर्थ बहानों की आड़ ले सकें जैसा वे करते आए हैं। और इसी कारण सन्त पौलुस रोमियों के चौथे अध्याय में तर्क करता है कि मनुष्य व्यवस्था से धर्मी नहीं ठहराया जा सकता। क्योंकि (वह कहता है) व्यवस्था तो क्रोध ही उत्पन्न करती है। और "क्रोध" शब्द से उसका अर्थ परमेश्वर का दण्ड है।

जीवन और मृत्यु दोनों व्यवस्था से नहीं आ सकते, सिवाय भिन्न-भिन्न दृष्टियों से। अब व्यवस्था हम सब के लिए मृत्युदायक है, क्योंकि वह हमें दोषी ठहराती है और दिखाती है कि हम सब परमेश्वर के सामने शापित और घृणित हैं: इसलिए उसके द्वारा धार्मिकता ढूँढ़ना कैसी मूर्खता है, मानो परमेश्वर को उसके पालन के कारण हमें अपनी कृपा में ले लेना चाहिए? परन्तु वह इस विषय को रोमियों के सातवें अध्याय में और अधिक सरल रीति से समझाता है जब कहता है कि व्यवस्था के द्वारा पाप अत्यन्त पापमय ठहरता है।

क्योंकि यदि कोई व्यवस्था होती ही नहीं, तब भी हमें दोषी ठहराने के लिए बहुत कुछ है, जैसा कहा गया है कि जिन्होंने बिना व्यवस्था पाप किया वे बिना व्यवस्था नष्ट भी होंगे; अर्थात् यद्यपि अन्यजातियों के पास कोई ऐसी शिक्षा न थी जिससे उन्हें डाँटा जाता, तो भी उनके विवेकों में एक साक्षी खुदी हुई थी, जो उन्हें दोषी पाती थी। तो तुम देखते हो कि मनुष्य दोषी ठहराए जाने के योग्य पर्याप्त रूप से हैं, चाहे परमेश्वर न्याय-सिंहासन पर न बैठे, न उन्हें बुलाए, न उनकी जाँच करे, यद्यपि जो परमेश्वर के विरुद्ध पाप और अपराध करते हैं वे अपने दोषों को अपने ऊपर नहीं लेते। क्योंकि हम अपने आप को सहलाने में ऐसे लगे रहते हैं कि हम में से हर एक अपनी ही गन्दगी में लोटता और सोता रहता है, यहाँ तक कि जब तक व्यवस्था हमें मर्म में न छुए, हमारे विवेक मानो सुन्न पड़े रहते हैं; और संक्षेप में, हर कोई अपने आप को छूट दे देता है और बुराई करने की अनुमति ले लेता है। परन्तु जब व्यवस्था सामने आती है, तब पाप पहचाना जाता है, और हर एक को चाहे-अनचाहे परमेश्वर के सामने झुकना पड़ता है, नहीं तो वह विद्रोही की नाईं उस पर दाँत पीसता है। तो भी परमेश्वर व्यवस्था के द्वारा हमें अपने शाप की पहचान कराकर अपनी ओर इकट्ठा करता है।

संक्षेप में यह ऐसा है मानो किसी मनुष्य का मुँह कालिख से पुता हो: हर कोई उस पर हँस सकता है, पर वह स्वयं उसे नहीं देखता। परन्तु यदि कोई उसे दर्पण ला दे, तो वह अपने आप से लज्जित होकर अपना मुँह छिपा लेता है, और अपना चेहरा मैल से ऐसा बिगड़ा देखकर उसे धोने चला जाता है। या यदि कोई मनुष्य ऐसा कुरूप हो कि अपनी सूरत से लोगों को डरा दे: तो वह नहीं सोचता कि यह दोष उसी की देह का है, जब तक उसके सामने दर्पण न रखा जाए। हमारा हाल भी ऐसा ही है। क्योंकि यद्यपि हम सब दुष्टता और पाप में डूबे हुए हैं, यहाँ तक कि आकाश और पृथ्वी हम से लज्जित हैं, और परमेश्वर हमारे लिए भयंकर दण्ड-आज्ञा तैयार करता है, तो भी हम अपनी दौड़ चलते रहने और निश्चिन्त बने रहने से नहीं रुकते। और ऐसा क्यों? क्योंकि हमारी पापमयता हमें अज्ञात है, और कपट हमारी आँखों को ऐसा अन्धा कर देता है कि हम अपना शापित होना नहीं देखते। परन्तु व्यवस्था हमें दिखाती है कि हम क्या हैं, और साथ ही परमेश्वर का न्याय हमारे सामने रखती है।

क्योंकि एक ओर वह कहती है, "तुम ये सब काम करो, नहीं तो शाप के भागी होगे।" और ये कैसे काम हैं? यह काफी नहीं है कि हम केवल अपने पाँवों, हाथों, आँखों और कानों से बचे रहें: हमें सब लालसाओं से शुद्ध और निर्मल होना है: हम में ऐसी निर्दोषता होनी चाहिए कि हमारी सारी इन्द्रियाँ, विचार और भावनाएँ परमेश्वर ही की ओर लगी रहें, ताकि संसार का कोई लोभ हमें पीछे न खींच सके। और यह कहाँ मिलता है? इसके सिवा देखो, परमेश्वर न्यायी बनकर अपने सिंहासन पर बैठा है, और जैसे ही हम अपराधी पाए जाते हैं, जैसे कि हम हैं, वह हम पर शाप का दण्ड-वचन पहले ही सुना चुका है। तो तुम देखते हो कि मनुष्य जाति कैसी दयनीय दशा में है।

और सन्त पौलुस का इस पद में यही अभिप्राय था जब उसने कहा कि व्यवस्था अपराधों के कारण जोड़ी गई। यह सच है कि व्यवस्था और भी उद्देश्यों की पूर्ति करती है: अर्थात् सबसे पहले, हमें परमेश्वर की सेवा का मार्ग दिखाना। परन्तु हम जानते हैं कि वह आज्ञाकारिता से सम्मानित होना चाहता है, न कि यह कि हम में से हर कोई अपनी इच्छा के अनुसार चले। इसलिए व्यवस्था हमें भले और बुरे का भेद सिखाती है। क्योंकि वह बुद्धिसंगत सेवा क्या है जो हम पर परमेश्वर की ओर है? सन्त पौलुस कहता है, वह यह है कि हम अपने आप को उसकी इच्छा के अधीन कर दें। जब ऐसा है, तो तुम समझते हो कि व्यवस्था उत्तम काम की है: अर्थात् जबकि हम अपनी ही कल्पना के अनुसार परमेश्वर की सेवा करने में व्यर्थ परिश्रम करते हैं, वह हमें ऐसा मार्ग दिखाती है कि हम चूक न सकें, और हमें वह नियम देती है जिस पर हमें चलना चाहिए।

फिर, जब सन्त पौलुस ने कहा कि व्यवस्था अपराधों के कारण दी गई, तब उसके मन में यह न था कि वह उस सारे फल और लाभ को गिनाए जो व्यवस्था अपने साथ लाती है: क्योंकि (जैसा मैं कह चुका हूँ) वह हमारी शिक्षा के भी काम आती है, ताकि हम भले और बुरे में भेद करना सीखें: और फिर वह हमें जगाती भी है, मानो परमेश्वर हमें एड़ी से ठोकर देता हो, कि हम और भी लगन से उसकी ओर लगें। परन्तु उसने इस समय के विषय के अनुसार और उस पाठ की नींव के अनुसार कहा जिसकी वह चर्चा कर रहा है। अब वह दिखाता है कि व्यवस्था निरर्थक नहीं है, तो भी वह हमें धार्मिकता तक पहुँचाने के लिए नहीं है, वरन् उसके बदले हमें ऐसी घबराहट में ले जाती है कि हम अवश्य दुगुने पापी ठहरते हैं, और पहले से अधिक दोषी और कम निरुत्तर हो जाते हैं, ऐसे कि हमारे सामने अथाह गड्ढे को छोड़ और कुछ नहीं रहता।

देखो, व्यवस्था हमें किस उद्देश्य से दी गई। परन्तु वह कहता है कि वह प्रतिज्ञा के साथ जोड़ी गई, जिससे हमें समझाया जाता है कि उसका जोड़ा जाना इसलिए नहीं था कि प्रतिज्ञा अपने आप में निर्बल थी और मनुष्यों को उद्धार तक नहीं पहुँचा सकती थी, ऐसे कि किसी और आमदनी की आवश्यकता होती: सन्त पौलुस कहता है, ऐसा बिलकुल नहीं था: परन्तु वह इसलिए जोड़ी गई कि मनुष्य जान लें कि परमेश्वर ने उन सब को उचित ही दोषी ठहराया है, और उन्हें कोई राहत न मिलेगी, वरन् वे निरन्तर ऐसी बेचैनी से सताए जाएँगे कि सदा निराश रहें, जब तक कि वे उसी प्रतिज्ञा पर भरोसा न करें। अब यदि कहा जाए कि प्रतिज्ञा तो पहले ही यह काम कर सकती थी: तो उत्तर और समाधान बहुत सरल है। क्योंकि यद्यपि परमेश्वर हमारा उद्धारकर्ता होने को प्रस्तुत होकर यह दिखाता है कि जब तक वह हम पर तरस न खाए हम सब अपने आप में दोषी हैं, तो भी जैसी सहायता चाहिए वैसी हमें तब तक नहीं मिल सकती जब तक वह हमें डरा न दे। अपनी प्रतिज्ञा के द्वारा वह हमें कोमलता से और पिता की रीति से बुलाता है: और निःसन्देह उसे हमें हमारी दुर्दशा का बोध कराना और उसके लिए हमें शोक कराना चाहिए: परन्तु हम अपने पापों में ऐसे गहरी नींद सोए हैं कि जब तक विवश न किए जाएँ उनके विषय में कभी सोचते ही नहीं। इसलिए यद्यपि परमेश्वर के प्रतिज्ञा करते ही मनुष्यों के पास अपने पापों पर विलाप करने का कारण था, ताकि वे पूरी रीति से हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह पर भरोसा रखें, तो भी उन्होंने ऐसा नहीं किया, जब तक कि परमेश्वर ने उनके सिर पर मानो मुग्दर के अनेक प्रहार न किए, जो उसने व्यवस्था के द्वारा किया।

फिर, सन्त पौलुस दिखाता है कि हम अपनी कृतघ्नता के द्वारा अपने परमेश्वर की कोमलता का दुरुपयोग करते हैं, क्योंकि वह हम पर जितनी दयालुता दिखाता है, उतना ही हम उससे अपने आप को बहलाने का अवसर लेते हैं। इसलिए उसे विवश होकर हमें जगाना पड़ता है, और हमें यह अनुभव कराना पड़ता है कि हम क्या हैं, कि इस प्रकार हमें डराकर सच्चे मन से उसकी कृपा ढूँढ़ने पर विवश करे। इस प्रकार तुम देखते हो कि "जोड़ी गई" शब्द का क्या अर्थ है। यह वैसा ही है मानो सन्त पौलुस हमें इस बात का दोषी ठहराए कि हम परमेश्वर की भलाई से लाभ नहीं उठाते, जबकि वह हमें अपनी ओर इतनी कोमलता से खींचता है और जितना हो सके उतना सौम्य बनकर दिखाता है: वरन् उसे खिजाते हैं, और एक प्रकार से उसे विवश करते हैं कि हमारे विरुद्ध कठोरता बरते, और इस रीति से हमें गिराए, और इस प्रकार हमें अपने अनुग्रह के ढूँढ़ने के लिए तैयार करे, जिसे हम अपने प्रभु यीशु मसीह में जब चाहें पा लेंगे। और इसके साथ सन्त पौलुस यह भी जोड़ता है कि व्यवस्था केवल उस वंश के आने तक रही जिसे प्रतिज्ञा दी गई थी।

यह विशेष रूप से रीति-विधियों के विषय में है, नहीं तो हमें इसे व्यवस्था के विषय में उसके सब सम्बन्धों, परिस्थितियों और जोड़ों समेत कहा गया समझना होगा, जैसा लोग कहते हैं। यदि हम व्यवस्था को केवल दस आज्ञाएँ ही मानें, तो सन्त पौलुस की बात ठीक नहीं बैठेगी। क्योंकि आज के दिन भी व्यवस्था का हम पर ऐसा बल होना चाहिए कि वह हमारे भले जीवन का नियम हो और हमें परमेश्वर की इच्छा दिखाए, कि हम आवारा की नाईं इधर-उधर भटकते न फिरें, वरन् हमारा मार्ग हमारे सामने स्पष्ट हो। इसलिए भला क्या है यह दिखाने के विषय में व्यवस्था क्षणिक नहीं है, क्योंकि वह जगत के अन्त तक बनी रहेगी। परन्तु हमें सन्त पौलुस की चर्चा पर ध्यान देना चाहिए: क्योंकि वह व्यवस्था को ऐसा मानता है जिसमें प्रतिज्ञाएँ और चेतावनियाँ, और रीति-विधियाँ भी सम्मिलित हैं। तब एक ओर यह प्रतिज्ञा है, "जो इन्हें करेगा वह इनसे जीवित रहेगा," जैसा हम पहले देख चुके हैं। और दूसरी ओर यह चेतावनी है, "श्रापित है वह जो इसमें लिखी सब बातों को पूरा न करे।" अब व्यवस्था (जैसा हम देखते हैं) केवल उन्हीं को उद्धार की प्रतिज्ञा देती है जो शुद्धता और निर्दोषता से जीवन बिताते हैं: परन्तु हम सब उससे चूक जाते हैं, और इसलिए व्यवस्था की प्रतिज्ञा किसी काम की नहीं। इसे एक बात के रूप में ध्यान में रखो। यदि कोई यह कहे, क्यों रे! क्या परमेश्वर का अभिप्राय मनुष्यों का उपहास करना था? मैं कहता हूँ, नहीं: परन्तु वे सदा अपने आप को मिथ्या अहंकार और अभिमान से छलते रहे हैं, यह मानते हुए कि वे अपना उद्धार आप ही कमा सकते हैं इसलिए परमेश्वर को उनसे कहना पड़ता है, "अच्छा, यदि तुम ऐसे समर्थ पुरुष हो जैसा समझते हो, तो दिखाओ: मैं तुम्हें अपनी व्यवस्था देता हूँ, और इसलिए कि तुम यह न समझो कि मेरी सेवा करने में तुम्हारे साथ अन्याय हुआ, तुम्हारी मजदूरी तैयार है यदि तुम उसे पूरा करो। देखो, मैं तुम्हें तुरन्त अनन्त जीवन का निश्चय देता हूँ: अब मैं जरा देखूँ कि तुम क्या कर सकते हो, अपने काम में कमर कस लो।" परन्तु जब मनुष्य अपने भीतर की पूरी शक्ति आज़मा चुकेंगे, तब निश्चय ही वे अपनी उस निर्बलता को पहचान लेंगे जो पहले छिपी हुई थी। इस प्रकार तुम देखते हो कि व्यवस्था की प्रतिज्ञा हमारे लिए कुछ फल नहीं ला सकती, तो भी वह छलपूर्ण नहीं है, क्योंकि वह हमारे लिए दूसरे उद्देश्य के काम आती है।

जहाँ तक उसकी चेतावनियों का सम्बन्ध है, वे अचूक हैं, क्योंकि हम सब इस चेतावनी से दोषी ठहरे हैं, "श्रापित है वह जो सब को पूरा न करे।" परन्तु हम सब को पूरा करने से इतनी दूर रह जाते हैं कि कोई एक बात भी नहीं जिसमें हम चूकते न हों। यदि हम परमेश्वर की सेवा आधी-अधूरी करने की सोचें, तो वह कुछ नहीं: क्योंकि उसने एक अंश को दूसरे से अलग नहीं किया, वरन् चाहता है कि जो पवित्रता में चलता है वह चोरी, लूट, छल, जबरदस्ती वसूली और अन्य सब पापों से भी दूर रहे। जब ऐसा है, तो ध्यान दें कि चेतावनी सब को अपने अधीन बन्द किए हुए है, और सन्त पौलुस की दृष्टि इसी पर थी।

जहाँ तक रीति-विधियों का सम्बन्ध है, वे इस बात की पुष्टि थीं कि हम सब शापित हैं, जैसा मैंने तुम्हें बताया है कि सन्त पौलुस कुलुस्सियों की पत्री में उन्हें ऋण-पत्रों और प्रामाणिक दस्तावेज़ों के समान बताता है जो मनुष्य को अत्यन्त कड़ाई से बाँधे रखने के काम आते हैं। यदि किसी ने कुछ धन उधार लिया है, तो वह कर्जदार है, और उसके लिए अपने हाथ की हुण्डी लिख देता है। परन्तु यदि वह अपनी सम्पत्ति या देह को इसके लिए इकरारनामे या विधि-पत्र द्वारा बन्धक रखे, ऐसे कि उसका कार्य सार्वजनिक अभिलेख में दर्ज हो जाए: तो वह पहले से अधिक कड़ाई से बँध जाता है। रीति-विधियों का भी यही हाल है। व्यवस्था अपने आप में मनुष्यों को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त थी क्योंकि वे सब अपराधी हैं: तो भी, क्योंकि परमेश्वर ने उस अहंकार को देखा जो हमारे स्वभाव में जड़ पकड़े हुए है, उसने अधिक के रूप में रीति-विधियाँ जोड़ दीं, कि वे हमारे विरुद्ध एक गम्भीर बन्धन ठहरें। परन्तु अब सन्त पौलुस कहता है कि यह सब सामग्री केवल प्रतिज्ञा किए हुए वंश के आने तक काम आई: अर्थात् व्यवस्था उन्हें दासत्व और बन्धन में रखने के लिए नहीं थी जो हमारे प्रभु यीशु मसीह पर भरोसा रखते हैं, वरन् उन्हें उसके पास पहुँचाने के लिए थी, कि वहाँ वे वह पा लें जिसकी उन्हें व्यवस्था में घटी थी। तो हम देखते हैं कि हमें दोषी ठहराने में परमेश्वर का कठोरता बरतना हमारा कल्याण सिद्ध करता है, और उसका इस रीति से हम पर गरजना हमारे प्रति उसकी अनुपम भलाई का साक्षी है। और ऐसा क्यों? मैं तुम्हें पहले बता चुका हूँ, और अनुभव भी इसे बहुत दिखाता है, कि हम उसकी कोमलता का दुरुपयोग करने से नहीं रुकते, और उसे उसके अभिप्राय के बिलकुल विपरीत खींच लेते हैं। इसलिए उसे विवश होकर हमें जगाना पड़ता है, और अपने आप को हमारा न्यायी दिखाना पड़ता है, और हमें यह भयानक दण्ड-वचन सुनाना पड़ता है, जो हमें निराशा में डाल दे कि हमारे लिए अनन्त मृत्यु को छोड़ और कुछ ताकने को नहीं: और अन्त में उसी वचन को बार-बार पक्का और दृढ़ करना पड़ता है।

हाँ, परन्तु यह सब केवल हमें झुकाने के लिए है, कि हम अपनी बुद्धि के अन्त पर पहुँचकर सच्ची और निष्कपट लगन से अपने प्रभु यीशु मसीह की ओर भागें, और जब हम बेचैनी और अन्तःकरण की पीड़ा से व्याकुल हों तब उस पर भरोसा रखना सीखें। इस प्रकार तुम देखते हो कि सन्त पौलुस ने स्पष्ट क्यों कहा कि व्यवस्था प्रतिज्ञा किए हुए वंश के आने तक ही बनी रहनेवाली दी गई थी। अब यदि कोई पूछे, तो फिर पूर्वजों ने उद्धार कैसे पाया? मैं उत्तर देता हूँ कि व्यवस्था हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने से पहले बाहरी व्यवस्था के विषय में राज करती थी और अपनी पूरी सीमा तक चलती थी: तो भी इस सब के होते हुए पूर्वज उस अनुग्रह की शरण लेने से नहीं चूके जिसकी उनसे प्रतिज्ञा की गई थी, यद्यपि उन्होंने उसे देखा नहीं, जैसा हम आगे और स्पष्ट रीति से देखेंगे।

तब यह बात सब सन्देह से परे है कि व्यवस्था ने प्रतिज्ञा की कुछ हानि नहीं की, और न वह उसकी सहायता के लिए जोड़ी गई, मानो प्रतिज्ञा उद्धार के लिए अपने आप में पर्याप्त न थी: परन्तु वह मनुष्यों के अभिमान और ढिठाई को सुधारने के काम आई, कि वे पूरी दीनता से उस दया को ढूँढ़ें जो उन्हें यीशु मसीह में दी जाती है, और उसके द्वारा उसे ग्रहण कर सकें और उसका सुख भोग सकें। और इस पर सन्त पौलुस जोड़ता है कि व्यवस्था स्वर्गदूतों के द्वारा, और एक मध्यस्थ के हाथ ठहराई या दी गई। यहाँ वह व्यवस्था को अधिकार देता है, यह दिखाने के लिए कि वह पूरे आदर के साथ ग्रहण की जानी चाहिए, परन्तु उसे किसी ऐसे उद्देश्य में न लगाया जाए जो परमेश्वर ने ठहराया नहीं। इसके प्रमाण में वह स्वर्गदूतों की बात करता है, मानो कह रहा हो कि परमेश्वर के पास अपनी व्यवस्था को अधिकार देने के लिए पर्याप्त साक्षी थे, और साथ ही यह दिखाया कि उसे कैसे लिया और सुना जाना चाहिए। परन्तु मुख्य बात उसका मध्यस्थ को बताना है: अर्थात् हमारे प्रभु यीशु मसीह को।

यह सच है कि बहुतों ने इस कथन का अर्थ मूसा के विषय में लिया है, मानो उसे शिक्षा के विषय में परमेश्वर और मनुष्यों के बीच मध्यस्थ कहा गया हो: परन्तु यह किसी रीति से ठीक नहीं बैठ सकता। क्योंकि पौलुस पहले स्वर्गदूतों को रखता है, और फिर मध्यस्थ को प्रधान के रूप में जोड़ता है, और वह यहाँ उनसे ऊँचे पद पर है, जो मूसा के व्यक्ति के विषय में सत्य नहीं ठहर सकता। फिर, हम देखते हैं कि सन्त पौलुस क्या कह रहा है। वह दिखाता है कि उद्धार की सेंतमेंत प्रतिज्ञा में व्यवस्था और सुसमाचार के बीच कोई भेद नहीं था। इसकी पुष्टि के लिए वह हमारे प्रभु यीशु मसीह को लाता है और कहता है कि जब व्यवस्था दी गई, तब वह उसी के हाथ और निर्देशन से हुआ। सच है कि पवित्रशास्त्र में यह शब्द "हाथ" प्रायः बल, सामर्थ्य या शक्ति का अर्थ देता है: परन्तु यहाँ हम देखते हैं कि सन्त पौलुस यीशु मसीह और स्वर्गदूतों की तुलना कैसे करता है। वह उन स्वर्गदूतों को रखता है जो वहाँ इकट्ठे हुए थे कि उसकी व्यवस्था मनुष्यों में सुनाई जाए और बिना विरोध ग्रहण की जाए। इसलिए वे परमेश्वर की महिमा के साक्षी के समान थे: परन्तु वह मध्यस्थ को बड़ा करके रखता है। इसलिए "हाथ" का अर्थ निर्देशन है, मानो वह कह रहा हो कि उसका स्थान सबसे ऊँचा था, और वह व्यवस्था के प्रकाशन में प्रधान आयुक्त था। और हमें इसे अनोखा नहीं समझना चाहिए: क्योंकि जब स्वर्गदूत मूसा को दिखाई दिया, तब उसने कहा, "मैं सनातन हूँ।" वहाँ वह स्वर्गदूत कहलाया है। इसलिए वह परमेश्वर का दूत है जैसा शब्द सूचित करता है: तो भी वह कहता है, "मैं सनातन हूँ, जो अपने आप से हूँ": यह कथन किसी सृजे हुए प्राणी के विषय में सत्य नहीं ठहर सकता: और स्वर्गदूत तो हमारी नाईं शून्य से बनाए गए थे। तब किसी स्वर्गदूत का वह उपाधि अपने ऊपर ले लेना घोर राजद्रोह होता जो केवल परमेश्वर ही को शोभा देती है।

इसलिए हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि वह स्वर्गदूत यीशु मसीह था, जो पहले ही से मध्यस्थ का काम करता था, जैसा सन्त पौलुस कुरिन्थियों की पहली पत्री में इसकी चर्चा करता है, जहाँ वह यहूदियों की बलवाई प्रकृति की, और उनके कुड़कुड़ाने और दुष्ट लालसाओं से परमेश्वर को अप्रसन्न करने की बात कहता है। वह कहता है कि उन्होंने यीशु मसीह की परीक्षा की जो जंगल में उनकी अगुवाई और मार्गदर्शन करता था। इसलिए निःसन्देह हमारा प्रभु यीशु मसीह उस समय भी मध्यस्थ था, हाँ, मनुष्यों को अपने पिता परमेश्वर से अनेक रीतियों से मिलाने के लिए।

और यहाँ तुम देखते हो कि प्रेरित इब्रानियों की पत्री में क्यों कहता है कि वही यीशु मसीह जो आज है, कल भी था, और कल भी, जगत के अन्त तक वैसा ही रहेगा, इस अभिप्राय से कि मनुष्य उसी से लगे रहें, और अब अनोखी शिक्षाओं में न भटकें। परन्तु अब वह जोड़ता है, यीशु मसीह तब परमेश्वर और मनुष्यों के बीच बिचवई था, इस अभिप्राय से कि बेचारे पापियों को कुछ राहत मिले, और यद्यपि परमेश्वर के न्याय-दण्डों से व्याकुल होकर उनके मन में कुछ पीड़ा रही हो, तो भी उन्हें सान्त्वना भी मिले, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें एक मध्यस्थ दिया जिसके द्वारा वे अनुग्रह पाकर उसके पास आ सकें।

तो भी यीशु मसीह एक और रीति से भी हमारा मध्यस्थ है, अर्थात् यह कि उसी के द्वारा परमेश्वर सदा से अपने आप को मनुष्यों पर प्रकट करता आया है। क्योंकि जब तक हम पाप के द्वारा उससे दूर हैं, तब तक परमेश्वर और हमारे बीच ऐसी दूरी है कि हम उस तक नहीं पहुँच सकते। और वह अपनी ओर से भी मध्यस्थ के बिना हमारे पास नहीं उतरेगा, जैसा उत्पत्ति में याकूब के दर्शन में भी दिखाया गया है। क्योंकि वहाँ कहा गया है कि याकूब ने एक सीढ़ी देखी, जिसके ऊपर परमेश्वर अपनी महिमा में विराजमान था, और स्वर्गदूत उस सीढ़ी पर चढ़ते-उतरते थे।

और निःसन्देह उस आकार या प्रतिमा में हमारा प्रभु यीशु मसीह याकूब को दिखाया गया, यह प्रगट करने के लिए कि मनुष्य परमेश्वर के राज्य से निकाले हुए हैं जब तक कि नीचे से ऊपर पहुँचानेवाला कोई साधन न हो, जैसा हमारा प्रभु यीशु मसीह है, जो एक ओर प्रकट हुआ परमेश्वर होकर सब आकाशों से ऊपर है, और दूसरी ओर हमारे साथ जुड़ा हुआ है क्योंकि उसने हमारा स्वभाव धारण किया और मनुष्य बन गया (हाँ, निर्बल और मरणशील मनुष्य, पाप को छोड़), और यद्यपि वह स्वयं निष्कलंक था, उसने हमारी निर्बलताओं को अपने ऊपर लिया और उठाया।

तो तुम देखते हो कि व्यवस्था बहुत पहले हमारे प्रभु यीशु मसीह के हाथ से कैसे दी गई। इससे यह निकलता है कि व्यवस्था और सुसमाचार में कोई विरोध नहीं। क्योंकि यीशु मसीह सदा एक ही है, उसमें कोई परिवर्तन नहीं। अब देखें सन्त पौलुस आगे क्या जोड़ता है, अर्थात् यह कि मध्यस्थ एक का नहीं, परन्तु परमेश्वर एक ही है।

यह कहने में कि मध्यस्थ एक का नहीं, उसका अर्थ है कि हमारा प्रभु यीशु मसीह स्वर्ग और पृथ्वी की सब बिखरी हुई वस्तुओं को फिर इकट्ठा करने आया, जैसा वह कुलुस्सियों के पहले अध्याय में भी इसकी चर्चा करता है। सच है कि कुछ ने इस पद का अर्थ यह लिया है कि यीशु मसीह एक से अधिक स्वभाव का था, या यह कि यद्यपि वह परमेश्वर और मनुष्यों के बीच मध्यस्थ था, तो भी इससे यह नहीं निकलता कि व्यवस्था और सुसमाचार में भेद था। परन्तु निःसन्देह यहाँ सन्त पौलुस का अर्थ यहूदियों और अन्यजातियों को फिर इकट्ठा करना है: मानो वह कह रहा हो कि यीशु मसीह व्यवस्था देने में मध्यस्थ था, उस व्यक्ति के रूप में जिसके द्वारा परमेश्वर मनुष्यों को दीन करना चाहता था, कि वे उसके अनुग्रह के भागी हों।

तो भी ध्यान दें कि हमारे प्रभु यीशु मसीह को, जो यहूदियों को व्यवस्था देने में निरन्तर मध्यस्थ था, साथ ही एक ऐसा अधिकार मिला हुआ था जो और आगे तक फैला था: अर्थात् अन्यजातियों को, जो परमेश्वर से दूर हो गए थे, फिर इकट्ठा करना और जोड़ना। क्योंकि यद्यपि परमेश्वर ने कुछ समय के लिए इब्रानी वंश को सारे संसार से ऊपर रखा, तो भी अन्त में हमारे प्रभु ने हमें उस उद्धार का भागी बनाया जिससे हम अपरिचित थे, और हम जो दूर थे हमें फिर इकट्ठा होना ही था, उनकी नाईं जो पहले निकट के पड़ोसी रहे हों। और इसलिए सन्त पौलुस एक और पद में यीशु मसीह को हमारा मेल कहकर कहता है कि उसने हमें परमेश्वर से जोड़ा और बाँधा है, उन्हें भी जो पहले उसके निकट थे, अर्थात् व्यवस्था रखनेवाले यहूदी, और उन्हें भी जो उनसे सर्वथा अलग थे। जिनकी परमेश्वर से पहले कोई जान-पहचान न थी, वे अभिषिक्त के आने पर अन्त में कलीसिया की देह में फिर इकट्ठे कर लिए गए, और वे भी जो पहले न केवल परमेश्वर से, वरन् एक-दूसरे से भी बहुत दूर अलग थे।

अब हम सन्त पौलुस का अर्थ देख चुके। तो भी, इस पद से हम और भली रीति से लाभ उठा सकें, इसके लिए ध्यान दें कि जैसे परमेश्वर ने हमें अपनी व्यवस्था स्वर्गदूतों के द्वारा दी, वैसे ही यदि व्यवस्था का हम पर कोई प्रभाव न हो, और हम उसे कुछ न गिनें, वरन् मानो अपने पाँवों तले रौंदें, तो वे हमारे विरुद्ध गवाही देंगे। तब स्वर्गदूत भी हमारी दुष्टता और बलवा के विरुद्ध परमेश्वर से बदला माँगने के लिए सशस्त्र होंगे। क्योंकि कोई बच्चों का खेल न था जब परमेश्वर ने चाहा कि उसके स्वर्गदूत उसकी व्यवस्था के प्रकाशन में उपस्थित और सहायक हों। इसलिए यह इस उद्देश्य से था कि वह पूरे आदर के साथ ग्रहण की जाए।

अब यह सच है कि जो कुछ व्यवस्था आज्ञा देती है वह सब हम पूरा नहीं कर सकते, और यदि हम इसी बात पर अड़ें, तो हम अनन्त मृत्यु में डूब जाएँगे और निराशा में पूरी तरह दब जाएँगे। परन्तु पहले तो, जब परमेश्वर हम पर इतना अनुग्रहकारी है कि हमें अपनी इच्छा सिखाता है, ताकि हम भले और बुरे में भेद कर सकें: तो हम अपनी गर्दन झुकाएँ, और वह जूआ ग्रहण करें जो परमेश्वर हम पर रखता है, कि हम उसके अधीन हों। इसे एक बात के रूप में ध्यान रखें।

और क्योंकि व्यवस्था हमें जगाती है, और जब हमारे मन ठण्डे पड़ जाते हैं और हम में ऐसी सुस्ती और मन्दता आ जाती है कि हम परमेश्वर के पास नहीं आ सकते, तब हमें उत्साह देती है: इसलिए हम में से हर एक अपने आप पर भली रीति से दृष्टि रखे, और सुबह-शाम परमेश्वर की आज्ञाओं को स्मरण करे, कि उनसे अपने आप को डाँटे। तब हम और अच्छी रीति से सोचें, क्योंकि स्वर्गदूत हमारे चारों ओर पहरा देते और चौकसी करते हैं, और अब जब परमेश्वर ने उन्हें अपनी व्यवस्था को अधिकार देने का काम सौंपा है, तो वे हमें उसे तुच्छ जानने और ऐसे दुरुपयोग करने न देंगे मानो वह कुछ भी न हो।

फिर, जहाँ तक इस बात का सम्बन्ध है कि व्यवस्था हमें शाप देती है: हम निश्चय जानें कि यद्यपि मनुष्य हमारी प्रशंसा करें और आनन्द से हम पर ताली बजाएँ, तो भी हम स्वर्ग के स्वर्गदूतों के सामने लज्जित किए जाएँगे। तब यदि सारा संसार हम पर कृपा करे, तो वह कुछ नहीं।

परमेश्वर की इच्छा थी कि उसके सब स्वर्गदूत उसकी व्यवस्था के प्रकाशन के समय एक साथ प्रकट हों, तो किस उद्देश्य से? इसके सिवा कि हमें अपने पापों से लज्जित होना सिखाए, और इस प्रकार सचमुच हमें दीन करे, कि हम अपना सारा कल्याण अपने प्रभु यीशु मसीह में ढूँढ़ें? और फिर, जबकि कहा गया है कि हमारा प्रभु यीशु मसीह व्यवस्था का मध्यस्थ था: हम निश्चय जानें कि यदि हम पूरी रीति से उसके अनुग्रह की शरण लें, तो हमें यह डर न रहेगा कि व्यवस्था को अब हमें दोषी ठहराने की, हाँ, या हमारे पाप पर राज करने की कोई शक्ति होगी। क्योंकि हमें स्मरण रखना चाहिए कि सन्त पौलुस कुरिन्थियों की पहली पत्री में कहता है कि व्यवस्था पाप का बल है, और पाप को ऐसा तीखा कर देती है कि वह हमें घातक घाव देता है। जब ऐसा है, तो निश्चय यदि हमारे पास वह बात न होती जो यहाँ हमारी सान्त्वना के लिए दिखाई गई है, तो हम ऐसे भय से ग्रस्त होते कि हम अपने उद्धार के विषय में निश्चिन्त न हो सकते, चाहे प्रतिज्ञाएँ हमारे प्रभु यीशु मसीह में हमें दी जातीं। क्योंकि हम सदा उनके विरुद्ध उलटी बातें खड़ी करते, और व्यवस्था को उनके साथ तराजू में रखते, यह कहते हुए: क्या? क्या व्यवस्था परमेश्वर की दी हुई न थी? परन्तु परमेश्वर उसके द्वारा हमें दोषी ठहराता है। इसलिए यद्यपि हमारा प्रभु यीशु मसीह इस मामले में सहायता के लिए आगे आता है, तो भी ऐसा नहीं लगता कि हम बच निकले। इस प्रकार हम सदा संकट में रहेंगे।

परन्तु यदि हम इस पर विचार करें कि हमारा प्रभु यीशु व्यवस्था के प्रकाशन में मध्यस्थ कैसे था: तो यह हमें दिखाता है कि यदि वह आज के दिन हमारा वकील है, तो यह हमारे लिए भली और पर्याप्त छुटकारे की बात होगी: यहाँ तक कि यद्यपि परमेश्वर ने हमारे विरुद्ध शाप का दण्ड-वचन सुना दिया है, तो भी हमें उससे घबराना नहीं चाहिए, और न मन की पीड़ा और व्यथा से ऐसे दब जाना चाहिए, मानो हानि असाध्य हो: परन्तु निश्चय जानें कि हमारा प्रभु यीशु मसीह दोनों बातों के लिए भली रीति से सहमत होगा, अर्थात् हमें लज्जित भी करेगा कि हम नम्रता सीखें, और साथ ही हमें अपने उद्धार का निश्चय भी देगा।

और इसलिए आओ हम सीखें कि जब कभी हम गिराए जाएँ, तो हमें फिर उठाने का और कोई उपाय नहीं, सिवाय यह जानने के कि वही व्यक्ति जो व्यवस्था के प्रकाशन के लिए मध्यस्थ ठहराया गया था, आज उसी अधिकार के साथ हम पर प्रकट हुआ है, और हमें अनुभव के द्वारा इसका बोध कराएगा। फिर यह भी ध्यान दें कि वह केवल एक जाति का नहीं, परन्तु सारे संसार का मध्यस्थ है, क्योंकि हम सब परमेश्वर के सृजे हुए प्राणी हैं। सच है कि हम आदम के पाप के कारण एक प्रकार से उससे अलग कर दिए गए थे। परन्तु हमारा प्रभु यीशु मसीह उस दरार को फिर भरने आया है जो स्वर्ग और पृथ्वी दोनों में थी, जैसा मैं कुलुस्सियों के पहले अध्याय से पहले ही कह चुका हूँ।

जब ऐसा है, तो हम सन्देह न करें कि परमेश्वर हमें अपनी प्रतिज्ञा के वारिस मानकर ग्रहण करता है, क्योंकि वह हमें इब्राहीम की आत्मिक सन्तान स्वीकार करता है। और यद्यपि [हमारे दिनों और] रीति-विधियों के उस समय के बीच जो एक को दूसरे से अलग करने के काम आती थीं बड़ा भेद है: तो भी यह हमें परमेश्वर के पास आने से न रोके। क्योंकि क्यों? परमेश्वर एक है। यद्यपि यहूदी भी हैं और अन्यजाति भी, यद्यपि मनुष्यों में अनेक भिन्न-भिन्न जातियाँ हैं, उनकी भाषाएँ भिन्न हैं, उनके आचार और जीविका के ढंग विपरीत हैं, और हम में से हर एक में इतनी विविधता और अस्थिरता है कि हमारा अपने ऊपर कोई वश नहीं: तो भी हम परमेश्वर पर भरोसा रखें, क्योंकि वह [सदा] एक है। उसने हमें अपनी व्यवस्था दी है, उसने हमें अपना सुसमाचार दिया है: और हम यह न सोचें कि इस विषय में कोई विरोध है, परन्तु सब कुछ भली रीति से मेल खाता है। केवल हम अपने आप को उसके शासन में रहने दें, कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के पास आ सकें। और यह कैसे हो सकता है? सब अभिमान से पूरी रीति से छूटकर, लज्जित और शर्मिन्दा होकर, अपने आप से असन्तुष्ट होकर, और यह जानकर कि हम में मृत्यु को छोड़ और कुछ नहीं।

तब यदि हम उस मार्ग पर बने रहें, तो हम अपने प्रभु यीशु मसीह के पास आएँगे, यह जानते हुए कि पिता परमेश्वर हमें ग्रहण करता है। क्यों? क्योंकि वह सदा एक ही है: और उसका व्यवस्था देना उस प्रतिज्ञा को रद्द करना या बाधित करना नहीं था जो उसने पहले की थी। वैसे ही उसका अपने सुसमाचार में हम पर अपना अनुग्रह और अधिक पूर्णता से प्रकट करना इसलिए न था कि वह नहीं जानता था कि अपनी व्यवस्था को हम पर कैसे प्रभावी करे और उसे उसके ठीक उपयोग और उद्देश्य में लगाए, कि हमारे पास भली रीति से जीने का नियम हो: परन्तु इसलिए कि जबकि हम उसके द्वारा शापित थे, हम जानें कि हमारे लिए और कोई उपाय नहीं, सिवाय उस वंश में फिर से आशीषित होने के जिसकी प्रतिज्ञा समय-समय पर की गई थी, जिसके हाथ में हमारा कल्याण स्थापित था, अर्थात् हमारे प्रभु यीशु मसीह के पास आकर, जो सब आशीष का सोता और स्रोत है।

अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने दोषों को मानते हुए गिर पड़ें, और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उनका और अधिक बोध कराए, कि हम उनसे असन्तुष्ट हों, और केवल अपने मुँह से ही उन्हें न मानें, वरन् अपने मन को भी उसके सामने खोल दें, और अपने आप को पूरी रीति से उसके पवित्र वचन के अधीन कर दें, और ऐसे कि हम उसकी सेंतमेंत की भलाई से, जैसी वह हमारे प्रभु यीशु मसीह में हमें दिखाई गई है, सान्त्वना पाएँ, और वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें सुधारे भी, कि जबकि हम अपने आप में बलवा से भरे हैं, उसके शासन से हम सीखने योग्य और उसकी पवित्र इच्छा पर चलने को तत्पर हो जाएँ, और अपने आप को पूरी रीति से उसके हवाले कर दें। और आओ हम इन सब बातों के लिए उससे प्रार्थना करें, यह कहते हुए: हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता। &c.

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