अध्याय 25

तेईसवाँ उपदेश, जो तीसरे अध्याय पर नौवाँ है - गलातियों 3:26-29

Sermons upon Galatians · John Calvin

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तेईसवाँ उपदेश, जो तीसरे अध्याय पर नौवाँ है - गलातियों 3:26-29

जो तीसरे अध्याय पर नौवाँ है।

26 क्योंकि तुम सब उस विश्वास के द्वारा जो मसीह यीशु पर है, परमेश्वर की सन्तान हो।

27 क्योंकि तुम में से जितनों ने बपतिस्मा लिया, उन सब ने मसीह को पहिन लिया है।

28 अब न कोई यहूदी रहा, न यूनानी; न कोई दास, न स्वतंत्र; न कोई नर, न नारी, क्योंकि तुम सब मसीह यीशु में एक हो।

29 और यदि तुम मसीह के हो, तो इब्राहीम के वंश और प्रतिज्ञा के अनुसार वारिस हो।

हम पहले देख चुके हैं कि सुसमाचार के द्वारा हम किस प्रतिष्ठा तक उठाए गए हैं। क्योंकि हम न केवल उन पवित्र पुरखों की संगति और मण्डली में गिने जाने के लिए बुलाए गए हैं जिन्हें परमेश्वर ने इतना सम्मान दिया, वरन हमारी दशा उनसे भी अधिक योग्य और उत्तम है, क्योंकि हम उस व्यवस्था की दासता से छुड़ाए गए हैं जिसमें वे रखे गए थे।

और इस शिक्षा को और भी दृढ़ करने के लिए सन्त पौलुस यह जोड़ता है कि हम सब हमारे प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करने से परमेश्वर की सन्तान बनाए गए हैं, जैसा सन्त यूहन्ना के सुसमाचार के पहले अध्याय में भी कहा गया है। क्योंकि वहाँ यह प्रतिष्ठा हमारे सामने उसी रूप में सराही गई है जैसी वह है, अर्थात् यह कि हमें विश्वास के द्वारा परमेश्वर की सन्तान गिने जाने का अग्रपद और अधिकार मिला है, और वह भी हमारे प्रभु यीशु मसीह के कारण, जो उसका एकलौता और स्वाभाविक पुत्र है। क्योंकि यह उपाधि केवल उसी की है अधिकार से, और हमें केवल अनुग्रह से दी जाती है, इस कारण कि परमेश्वर ने उसके निमित्त हमें गोद लेना उचित जाना।

सो यीशु मसीह कलीसिया का सिर है; तौभी उसी के निमित्त परमेश्वर हमें अपनी सन्तान मानता और स्वीकार करता है। और यहाँ हम देखते हैं कि "विश्वास" शब्द का अर्थ उससे कहीं अधिक है जितना लोग साधारणतः समझते हैं, जैसा मैं पहले भी बता चुका हूँ। क्योंकि जो लोग पवित्र शास्त्र में अभ्यस्त नहीं हैं, वे इसे अनोखा समझते हैं कि परमेश्वर विश्वास करने भर के कारण हमें इतना सम्मान दे, और (उनके विचार में) विश्वास ऐसा बड़ा गुण नहीं कि इतना बड़ा लाभ पाने के योग्य ठहरे। परन्तु मैं तुम्हें पहले दिखा चुका हूँ कि यीशु मसीह पर हमारा विश्वास करना किसी कथा को सुनकर या पढ़कर सच मान लेने के समान नहीं है, वरन उसे भीतर से पूर्ण निश्चय के साथ ग्रहण करना और अपने हृदय में धारण करना है, जैसा वह हमें परमेश्वर पिता की ओर से दिया जाता है।

इसलिए जब हम अपने प्रभु यीशु मसीह को ऐसे जन के रूप में अपनाते हैं जिसने हमारे पापों का प्रायश्चित किया कि हमें परमेश्वर से मिला दे, और अपने कल्याण का सारा भरोसा उसी पर रखते हैं, इसमें तनिक भी सन्देह न करते हुए कि स्वर्ग का उत्तराधिकार पाने के लिए जो कुछ चाहिए वह सब उसने हमारे लिए जुटा दिया है, तो मैं कहता हूँ कि यदि हमें इसका निश्चय हो जाए, तो यह आश्चर्य की बात नहीं कि परमेश्वर हमारे विश्वास के कारण हमें अपनी सन्तान माने। फिर भी साथ ही हमें वह स्मरण रखना चाहिए जिस पर हम पहले विचार कर चुके हैं, अर्थात् यह कि यह [हमें अपनी सन्तान स्वीकार करने का परमेश्वर का उपकार] विश्वास के किसी पुण्य से नहीं मिलता, और न यहाँ हमें तराजू में तौलना चाहिए कि वह किस प्रकार का गुण है: क्योंकि हम परमेश्वर की सन्तान सेंतमेंत के गोद लिए जाने से बनाए गए हैं। यदि कोई कारण पूछे, तो मैं उत्तर देता हूँ कि इसका सोता और नींव परमेश्वर की एकमात्र भलाई को छोड़ और कहीं ढूँढ़ना ठीक नहीं, क्योंकि उसकी यही इच्छा हुई कि हम पर दया करे। तौभी यह विश्वास के साधन से सिद्ध होता है (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ), क्योंकि सब मूर्खतापूर्ण अभिमान से छूटकर, और यह मानकर कि हम अपने स्वभाव में दण्ड के योग्य ठहरे हैं, हम अपने प्रभु यीशु मसीह की शरण में भाग जाते हैं।

इस प्रकार तुम देखते हो कि सन्त पौलुस का आशय वस्तुतः क्या था। और वह इस विषय को आगे बढ़ाता जाता है, ताकि हम जान लें कि उद्धार पाने के लिए केवल विश्वास ही हमारे लिए पर्याप्त होना चाहिए, और हमें इधर-उधर कोई और साधन ढूँढ़ने की आवश्यकता नहीं जो हमारी सहायता करे। इससे अधिक हम और क्या चाहें कि परमेश्वर हमें अपनी सन्तान माने? क्या ऐसे अनमोल उपकार के ऊपर और कुछ बढ़ाने की हमें आवश्यकता होगी? तुम देखते हो कि हमारा पूर्ण सुख और सिद्ध महिमा यही है कि हमें परमेश्वर को पिता कहकर पुकारने की छूट है, और इसमें सन्देह नहीं कि जब उसने हमें अपने अनुग्रह में ग्रहण कर लिया है, तो वह हमारे साथ अपनी निज सन्तान का सा व्यवहार भी करेगा।

परन्तु हम इसे कैसे पाएँ? सन्त पौलुस कहता है कि केवल विश्वास ही हमें उस प्रतिष्ठा का भागी बनाता है। तो हम यह निष्कर्ष निकालें कि व्यवस्था से हमें कुछ लाभ नहीं, नहीं तो हमें अवश्य ही अद्भुत लोभी, वरन लगभग बुद्धि खोए हुए होना चाहिए कि परमेश्वर की सन्तान होने से अधिक कुछ चाहें। पवित्र शास्त्र में स्वर्गदूतों का बड़ा आदर किया गया है, फिर भी उन्हें जो सबसे बड़ी उपाधि दी गई है वह यही है कि वे परमेश्वर की सन्तान हैं। अब जब हम, हम (मैं कहता हूँ) पृथ्वी के तुच्छ कीड़े, जिनमें मलिनता के सिवाय कुछ नहीं, वरन पाप की भ्रष्टता के सिवाय और कुछ नहीं, स्वर्गदूतों के बराबर ठहराए गए हैं, यहाँ तक कि परमेश्वर हमारे लिए स्वर्ग का राज्य खोलता है, और चाहता है कि हम उनके संगी हों जो सामर्थ्य हैं और उसके निकट रहते हैं, तो जब (मैं कहता हूँ) हमें उस महिमा का भागी बनाया गया है, क्या हम ऐसे ढीठ होंगे कि इसके अतिरिक्त न जाने और क्या ढूँढ़ें? निश्चय ही यह उपकार हमें केवल विश्वास से ही मिलता है।

इसलिए हम सीखें कि हमारे सामने रखे जानेवाले अन्य सब साधनों को त्याग दें: क्योंकि जब लोग हमें और सहायताएँ सुझाते हैं मानो उस पर जो विश्वास हमें है वह पर्याप्त न हो, तो यह हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह से फेर देना ही है। सन्त पौलुस का आशय यही है। परन्तु हम इस पाठ में निहित फल को कभी न समझ पाएँगे, जब तक यह सदा मन में न रखें कि "विश्वास" शब्द से सन्त पौलुस उस सब योग्यता और पात्रता को निकाल देना चाहता है जिसे मनुष्य सोचते या कल्पना करते हैं कि वे परमेश्वर के पास अपने साथ ला सकते हैं। जब वे अपनी ही शक्ति और गुणों से काम पूरा करने पर अड़ जाते हैं, तो यह ऐसा ही है मानो वे हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह का एक टुकड़ा काट लेना चाहते हों। परन्तु वह टुकड़े-टुकड़े नहीं किया जा सकता, न बाँटा जा सकता। इसलिए हमारे उद्धार का सारा कार्य उसी अकेले से होना चाहिए, और हमें यहाँ-वहाँ छिपते नहीं फिरना, न पगडण्डियाँ ढूँढ़नी हैं, वरन विश्वास के सीधे मार्ग से सीधे उसी के पास आना है।

इस पर सन्त पौलुस यह जोड़ता है कि यीशु मसीह में बपतिस्मा लेकर हमने उसे पहिन लिया है। और यह इसलिए कि यहाँ यह सन्देह उठ सकता था कि हम परमेश्वर की सन्तान कैसे बन सकते हैं, जब कि यह प्रतिष्ठा हमारे प्रभु यीशु मसीह की ही निज है। क्योंकि जब उसे परमेश्वर का पुत्र कहा जाता है, तो प्रेरित दिखाता है कि यह उपाधि स्वर्ग के स्वर्गदूतों पर भी सच्चाई से घटित नहीं हो सकती। यह सच है (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) कि वे परमेश्वर की सन्तान कहलाते हैं; तौभी यह किसी विशेषण के बिना नहीं। अतः इसमें सन्देह नहीं कि कोई सृष्टि ऐसी नहीं जिसकी यह प्रतिष्ठा हो। पर अब जब यीशु मसीह ही परमेश्वर का एकमात्र पुत्र है, तो यह हम तक कैसे पहुँचती है? सन्त पौलुस घोषणा करता है कि यह उस एकता के कारण है जो उसके और हमारे बीच है, जैसा सन्त यूहन्ना के 17वें अध्याय में कहा गया है।

तब यदि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के साथ एक न होते, तो निश्चय हमारा परमेश्वर से कोई परिचय ही न होता: क्योंकि पाप के कारण हम जीवन की सारी आशा से कट चुके हैं। वरन जब तक वह हमें बदलकर नया न कर दे, तब तक हम अवश्य ही उसके प्राणघातक शत्रु होंगे और वह हमारा। संसार चाहे जैसा चले, यीशु मसीह से अलग होकर और अपने स्वभाव में देखे जाने पर हम मनुष्य कहलाने के भी योग्य नहीं, इसलिए यह घमण्ड तो हम और भी कम कर सकते हैं कि परमेश्वर हमारा पिता है। परन्तु यहाँ (जैसा मैंने कहा) सन्त पौलुस इस प्रश्न को सुलझाना चाहता था, यह कहकर कि बपतिस्मा से हम अपने प्रभु यीशु मसीह के वस्त्र पहनाए गए हैं।

और वस्त्र पहनने की यह उपमा पवित्र शास्त्र में बहुत प्रचलित है, और इसका वास्तविक अर्थ यह है कि यीशु मसीह हमारा पहनावा या वस्त्र है, जिससे वह सब ढँक जाता और गाड़ दिया जाता है जो हमें परमेश्वर के हाथ से ठुकराए जाने का कारण बन सकता था, और हमारे लिए अनुग्रह मोल लिया जाता है, ताकि वह हमें अपने आप में फिर न छाने और न जाँचे, वरन हमें ऐसे ग्रहण करे मानो हम उसके निज पुत्र की पूरी हैसियत में आए हों। संक्षेप में, सन्त पौलुस यहाँ उस एकता को दिखाना चाहता था जो हमारे प्रभु यीशु मसीह और सब विश्वासियों के बीच है, जो उसकी देह के अंग हैं।

और जैसे वृक्ष का सारा सार जड़ से आता है, और स्वाभाविक देह की सारी शक्तियाँ और सामर्थ्य सिर से आती हैं, वैसे ही परमेश्वर के पुत्र और हमारे बीच भी है। क्योंकि (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) स्वर्गीय जीवन की एक बूँद भी हमारे पास नहीं, केवल वही जो वह हम में फूँकता या साँस के रूप में डालता है। इसलिए यदि हम परमेश्वर के पास आना, और पवित्र आत्मा तथा अनन्त जीवन के वरदानों के भागी होना चाहते हैं, तो हम यीशु मसीह में हों, और अपने आप को अपने आप में कुछ या किसी मोल का न समझें।

और इसी कारण हमारे प्रभु यीशु मसीह ने सन्त यूहन्ना के 17वें अध्याय के उसी पाठ में, जिसका मैंने हवाला दिया, अपने लोगों के सच्चे और सिद्ध सुख का वर्णन करते हुए कहा: हे पिता, मैं तुझ से विनती करता हूँ कि वे हम में एक हों। तुम देखते हो कि मृत्यु के उस अन्धकूप से, जिसमें हम डूबे थे, निकलने का हमारा मार्ग यही है कि हम विश्वास की डोर से अपने प्रभु यीशु मसीह के साथ जुड़ जाएँ। अब सन्त पौलुस कहता है कि यह बपतिस्मा में होता है।

इसका यह अर्थ नहीं कि जितनों ने बपतिस्मा लिया है वे सब सचमुच यीशु मसीह के सच्चे अंग हैं: क्योंकि हम इसके ठीक विपरीत देखते हैं, यहाँ तक कि कुछ ऐसे हैं जो बपतिस्मा की सारी पवित्रता को अपवित्र और दूषित करते हैं, और परमेश्वर के विरुद्ध राजद्रोह के दोषी हैं, क्योंकि वे यीशु मसीह के होने का दावा करते हुए भी उसे तुच्छ जानते और उसका अपमान करते हैं, और मैला और गन्दगी बनकर सब कुछ बिगाड़ते हैं। अतः बपतिस्मा हम सब को मसीही नहीं बना देता, और फिर हम जानते हैं कि परमेश्वर की सन्तान बनाया जाना इतना बड़ा उपकार है कि उसे एक नाशवान तत्त्व के सिर नहीं मढ़ा जा सकता। जल क्या है? यह कहना कि जल हमें जन्म देता या नया जन्म देता है, और उसी से हम मृत्यु से छुड़ाए जाते और उस महिमा को पाते हैं जिसमें परमेश्वर हमें अपने तक उठाता है: यह (मैं कहता हूँ) सारी व्यवस्था को उलट देना है।

परन्तु सबसे पहले हम यहाँ यह ध्यान दें कि जब सन्त पौलुस बपतिस्मा की चर्चा करता है, तो वह यह मानकर चलता है कि जो वस्तु उसमें हमें दी जाती है उसे हम पाते हैं। बपतिस्मा पानेवाले बहुत से लोग परमेश्वर के अनुग्रह को मिटा डालते हैं; और यद्यपि वह उन्हें दिया जाता है, तौभी वे अपने अविश्वास, दुराचार और विद्रोह के द्वारा अपने को उसके अयोग्य बना लेते हैं। इस प्रकार तुम देखते हो कि बहुत से मनुष्यों में बपतिस्मा की सामर्थ्य निष्फल हो जाती है। परन्तु जब परमेश्वर और हमारे बीच परस्पर मेल और सुर मिलता है, तब बपतिस्मा वह प्रभाव उत्पन्न करता है जिसकी चर्चा और वर्णन सन्त पौलुस इस पाठ में करता है।

और इस प्रकार जो बात हमें परमेश्वर की सन्तान बनाती और यीशु मसीह के वस्त्र पहनाती है, वह यह है कि परमेश्वर हमें उस भ्रष्टता से खींच निकालता है जिसमें हम स्वभाव से पड़े थे, और चाहता है कि यीशु मसीह हमारा सिर हो और हम उसमें कलम लगाए जाएँ कि उसकी सम्पत्ति के भागी हों। इसलिए जब हम यह पा लेते हैं, तब वह सब पूरा हो जाता है जिसका चित्रण बपतिस्मा में है। यदि कपटी लोग अपने बपतिस्मा की डींग मारें, तो सन्त पौलुस उन्हें दिखाता है कि यह तो व्यर्थ और भ्रम है, यह कहकर कि अक्षर का खतना कुछ नहीं: अर्थात् यदि हम केवल बाहरी और दृश्य संस्कार को ही देखें, तो उसका कोई मूल्य नहीं। बपतिस्मा के विषय में भी यही है: जो अपने मुँह से मसीही और कलीसिया के बड़े खम्भे होने का दावा करते हैं, उन्हें इससे कुछ लाभ न होगा, क्योंकि वे उस वस्तु को अशुद्ध करते हैं जिसे परमेश्वर ने इतने उत्तम प्रयोजन के लिए ठहराया था, जैसा मैं तुम्हें पहले बता चुका हूँ। इसलिए हम भली भाँति ध्यान दें कि सन्त पौलुस यह वचन उन सब से नहीं कहता जो बिना किसी अपवाद के बाहरी रूप से [बपतिस्मा का] चिह्न और छाप धारण करते हैं: वरन उन से कहता है जिन्हें अपने बपतिस्मा से लाभ पहुँचता है।

फिर, सन्त पौलुस का यह अर्थ नहीं कि बपतिस्मा, अर्थात् जल, में हमें ऐसा बदल देने की सामर्थ्य है कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के वस्त्र पहन लें: क्योंकि इस प्रकार तो परमेश्वर से वह स्तुति छिन जाएगी जो अकेले उसी की है। परन्तु वह यहाँ वह साधन दिखाता है जिससे हमें निश्चय कराया जाता है कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह की देह के अंग हैं। मैं तुम्हें पहले बता चुका हूँ कि इसका कारण परमेश्वर की निरी भलाई को छोड़ और कहीं न ढूँढ़ना चाहिए: क्योंकि यदि हम इधर-उधर घिरनियाँ लगाएँ, तो यह ऐसा ही है जैसे कोई प्यासा हो और सोते की ओर पीठ फेरकर [जल ढूँढ़ने] चले। इसलिए हम सीखें कि केवल परमेश्वर ही अपनी निरी भलाई से हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह से जोड़ता है, और वह यह अपने पवित्र आत्मा की गुप्त सामर्थ्य से करता है, तौभी बपतिस्मा के द्वारा भी, मानो एक निचले साधन के द्वारा, काम करने से नहीं रुकता, जैसे हम देखते हैं कि सारा प्रकाश उसी से आता है, यहाँ तक कि संसार में प्रकाश था, उस समय भी जब न सूर्य था न चन्द्रमा। तौभी परमेश्वर ने सूर्य को ठहराया है जिससे हमें आज तक यहाँ नीचे प्रकाश मिलता है। पर इससे सूर्य उस सामर्थ्य को घटाता नहीं जो अकेले परमेश्वर में है।

फिर कहा गया है कि मनुष्य केवल रोटी से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुँह से निकलता है जीवित रहता है। और सचमुच रोटी तो स्वयं निर्जीव वस्तु है। उसे हमें कौन देता है? परमेश्वर ही हम में जीवन फूँकता है: क्योंकि हम उसी में जीवित रहते हैं, जैसा सन्त पौलुस प्रेरितों के काम के 17वें अध्याय में कहता है। तौभी उसकी इच्छा है कि वह रोटी के द्वारा यह करे, और वह नित्य उसे हमारे काम में लाता है, ताकि हम उससे पोषित हों। सो इसमें कोई असंगति नहीं कि हम बपतिस्मा के द्वारा अपने प्रभु यीशु मसीह के वस्त्र पहनें, और फिर भी यह परमेश्वर के निरे अनुग्रह से हो, और पवित्र आत्मा के गुप्त कार्य से हो, जो प्रकृति की सारी व्यवस्था से ऊपर है, और जिसका निश्चय बपतिस्मा हमें कराता है, क्योंकि हम मोटी बुद्धि और मिट्टी के हैं। इसलिए परमेश्वर को हमारी दुर्बलता के कारण थोड़ा-थोड़ा करके हमें खींचना पड़ता है, कि हम उन बातों को समझें जो अन्यथा हमारे लिए बहुत ऊँची हैं। क्योंकि स्वर्गों के ऊपर उड़ने के लिए हमारे पंख कहाँ हैं? हमें तो यहाँ नीचे पृथ्वी पर रेंगना ही कठिन है, इसलिए परमेश्वर को हमारे पास उतर आना पड़ता है, और यह वह अपने संस्कारों के द्वारा करता है।

इस प्रकार हम बपतिस्मा के द्वारा अपने प्रभु यीशु मसीह के वस्त्र पहनाए जाते हैं, जैसा सन्त पौलुस रोमियों के छठे अध्याय में एक और उपमा से भी दिखाता है। क्योंकि वह कहता है कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःख-भोग में कलम लगाए गए हैं, कि उसके पुनरुत्थान और जीवन के भी भागी बनें। कलम लगाने की यह उपमा वस्त्र पहनने की उपमा जितनी ही उपयुक्त है। क्योंकि किसी वृक्ष की कोई कलम लो, और उसे दूसरे वृक्ष के सिर या किसी डाल में लगा दो, जो दूसरे से ली गई थी, और तुम देखते हो कि दोनों एक होकर बढ़ते हैं, यहाँ तक कि दोनों एक ही सार बन जाते हैं, और जड़ अपना रस उस छोटी टहनी को देती है जो दूसरे वृक्ष से ली गई थी। ठीक इसी रीति से हम अपने प्रभु यीशु मसीह में कलम लगाए गए हैं (सन्त पौलुस कहता है), और यह इसलिए कि हमारा पुराना मनुष्यत्व उसमें क्रूस पर चढ़ाया जाए, और हम नए जीवन में फिर जिलाए जाएँ।

परन्तु यहाँ सबसे पहले हमें यह ध्यान देना है कि परमेश्वर ने हम पर कैसी कृपा और उदारता दिखाई है, और अब भी दिखाता है, कि उसे यह भाया कि हमें अपने निज पुत्र से जोड़े: क्योंकि यह उन सब उपकारों से बढ़कर है जिनकी हम कल्पना कर सकते हैं। और इसीलिए सन्त पौलुस प्रमाणित करता है कि जो कुछ परमेश्वर का है वह सब हमारा है, और जब हम उसके पुत्र के स्वामी हो जाते हैं तो हम उसका भोग करते हैं। जब (वह कहता है) परमेश्वर ने अपने निज पुत्र को भी न रख छोड़ा, तो वह उसके साथ हमें सब कुछ क्यों न देगा। संक्षेप में, परमेश्वर अपने अनन्त भण्डारों को इससे उत्तम रीति से प्रकट नहीं कर सकता था कि हमें इस प्रकार अपने एकलौते पुत्र से जोड़ दे। यह तो उससे भी बढ़कर है कि वह हमें आकाश और पृथ्वी दे देता: क्योंकि निश्चय यदि हम यीशु मसीह की तुलना संसार की सारी सम्पत्ति से करें, वरन उस सारी सम्पत्ति से भी जो पार्थिव संसार के ऊपर है, तो वह उन सब से कहीं बढ़कर है। इसे एक बात के रूप में ध्यान में रखो।

फिर, हम यह समझें कि परमेश्वर ने हमें अपने प्रभु यीशु मसीह से ऐसा जोड़ा है कि हमें अपना सारा जीवन उसी में पाना पड़ेगा। और यह हमें और अधिक दीन करने के काम आता है, और यह जताने के लिए भी कि आदम के श्राप में लिपटे रहना कैसी भयानक बात है। क्योंकि यदि पवित्र शास्त्र हमें यह न बताता कि परमेश्वर के अनुग्रह में आने से पहले हमें अपने प्रभु यीशु मसीह से जुड़ना अवश्य है, तो हम उस दुर्दशा का जिसमें हम स्वभाव से पड़े हैं, यथेष्ट अनुभव न करते, और न अपने पापों से उतनी घृणा करते जितनी करनी चाहिए।

परन्तु अब जब हमें बताया गया है कि यह कैसे असम्भव है, (चाहे सब स्वर्गदूत हमारी सहायता को आ जाएँ, और सारा संसार इस कार्य में हाथ बँटाए): और संक्षेप में, कि चाहे और किसी बात की कमी न हो तौभी हमारे लिए परमेश्वर के निकट आना, या उसका हम पर पिता की सी दृष्टि डालना, वरन उसका हमें अपनी सृष्टि के रूप में भी स्वीकार करना, तब तक असम्भव है जब तक हम अपने प्रभु यीशु मसीह के वस्त्र न पहन लें: तो यही हमें अपने आप से घृणा कराने के लिए बहुत है। और अवश्य है कि हम घिनौने से भी बढ़कर हों, क्योंकि हम पर परमेश्वर का क्रोध शान्त करने और हमें फिर उसके अनुग्रह में स्थापित करने का इसके सिवाय और कोई उपाय नहीं कि वह हमारे पापों को ढाँपे, और हमें हमारी सारी मलिनता और संक्रमण से शुद्ध करे, और हमारी सारी दुष्टता को मिटा दे: और यह यीशु मसीह को पहिनने से ही हो, जिसका प्रतीक हम याकूब में देखते हैं, जब परमेश्वर ने उसे उसके पिता के हाथ और माध्यम से आशीष दी।

यह सच है कि याकूब याकूब के रूप में चुना गया था: तौभी उसे एसाव के वस्त्र पहनने पड़े। इस प्रकार वह स्वयं वही था जब परमेश्वर ने उसे मीरास या पहिलौठे के अधिकार के लिए बुलाया: और जब उसने अपने भाई के वस्त्र उधार लिए तब वह दूसरा मनुष्य था। ठीक वैसे ही हम भी परमेश्वर के चुने हुए और उसकी प्रतिज्ञा पाए हुए के रूप में आते हैं, जिससे वह हमें निश्चय दिलाता है कि वह हम पर दया करके हमें ग्रहण करने को तैयार है: तौभी हमें सबसे पहले अपने प्रभु यीशु मसीह के वस्त्र पहनने होंगे। क्योंकि यदि हम अपने ही रूप में प्रकट हों, तो परमेश्वर अवश्य हम से घृणा और अरुचि करेगा, जैसा हम योग्य हैं। हमें इसी बात की चेतावनी दी जाती है। परन्तु इस बीच बपतिस्मा में जो प्रतिभूति हमें दी गई है उससे हम लाभ उठाएँ, कि हम उन सब परीक्षाओं और अविश्वासों से लड़ सकें जिन्हें शैतान हमारे विश्वास को हिलाने के लिए हमारी आँखों के सामने रखता है। यदि हम ऐसे मूढ़ हों कि अपने दोषों को न देखें, वरन उन्हीं में मानो सड़ चुके हों, तो हम पर हाय। परन्तु यदि हम जाग उठें कि यह सोचें कि परमेश्वर के सामने लेखा देना क्या है, कि साँझ और भोर हमें यह स्मरण आता रहे कि वह संसार का न्यायी है और अपना पद छोड़ नहीं सकता: यदि हम अपने भीतर जाकर अपने पापों की जाँच करें, तो निश्चय हम अवश्य भयभीत और मानो आपे से बाहर हो जाएँगे: और यदि हमें राहत देने के लिए कोई सहायता न होती, तो हम निराशा में डूब जाते।

परन्तु हम अपने बपतिस्मा की शरण लें, और निश्चय जानें कि परमेश्वर ने हमें व्यर्थ ही अपने एकलौते पुत्र की पवित्रता का भागी होने को नहीं बुलाया, और हमें उसके साथ एक नहीं किया: तब उसका बहाया हुआ लहू हमें हमारे सब दागों से शुद्ध करने में ऐसा प्रभावी होगा कि हम सिर उठाकर परमेश्वर के सामने आ सकें: ऐसे घमण्ड से नहीं जैसा कपटियों में होता है जो अपने ही ऊपर भरोसा रखते हैं: परन्तु उसकी अनमोल भलाई के भरोसे से, क्योंकि उसने हमें बताया है कि जो कुछ हमारे प्रभु यीशु मसीह का है वह सब हमारे साथ साझा है। फिर यदि हम देखें कि हम से इतने अपराध हुए हैं कि परमेश्वर का क्रोध हम पर भड़क उठा है: तो देखो, यीशु मसीह ने बलिदान चढ़ाया है, जिससे हम जानते हैं कि परमेश्वर और हमारे बीच प्रायश्चित हो चुका है। जब परमेश्वर ने हमारे प्रति अपना प्रेम इस प्रकार प्रमाणित किया है: तो हम यह अविश्वास न करें कि जब कभी हम सच्चे विश्वास से उसे ढूँढ़ेंगे, तो वह हम से पहले आ मिलेगा, अर्थात् ऐसी दृढ़ता से कि हम इसमें सन्देह न करें कि जब वह हमारे प्रति इतना उदार दिखाई देता था, तो वह हमें निराश करना चाहता था। इस प्रकार तुम देखते हो कि अपने बपतिस्मा को अपने लिए लाभदायक बनाने की रीति यह है कि उसे ढाल के समान काम में लाएँ, उन सब अविश्वासों को पीछे हटाने के लिए जो हम पर आते हैं कि हमें परमेश्वर से प्रार्थना करने से और अपना सारा सहारा उसी में लेने से रोकें, यदि हम उसके पास यह कहते हुए [मन ही मन] न जाएँ: निश्चय यह सच है कि मुझ में पापों का ऐसा भण्डार है कि उनकी गिनती ही परमेश्वर को मुझ से घिन करा दे: इसलिए मैं अपने निज रूप में उसके पास न जाऊँगा: मैं अपने आप को और अपने स्वभाव को त्यागता हूँ, जिसमें लज्जा और घबराहट के सिवाय कुछ नहीं: और मैं हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम से उसके पास जाता हूँ, वरन वह मेरे आगे-आगे चलता है, वह मानो अपना वस्त्र मुझे देता है, वह मेरे लिए बोलता है, और उसी के नाम से मैं अपने आप को प्रस्तुत करता हूँ मानो मैं स्वयं वही हूँ, क्योंकि उसे यह भाया कि मुझ पर ऐसा अनुग्रह करे कि मुझे अपने साथ एक कर ले। इस प्रकार तुम देखते हो कि जब हम परमेश्वर के सामने आते हैं तो हमें अपने आप को पीछे छोड़ना है, और अपने प्रभु यीशु मसीह की हैसियत धारण करनी है, हाँ, हम अपने आप को पीछे छोड़ दें। इसलिए नहीं कि हम अपने कुकर्मों को न देखें और उनके लिए ठीक रीति से दीन और खेदित न हों: तौभी इसे पूर्ण और अटल निश्चय मान लो कि जब हम परमेश्वर के पास उसके एकलौते पुत्र की हैसियत में आते हैं तो वह हमें ग्रहण करता है।

परन्तु बहुत थोड़े हैं जो इस पर ध्यान करते हैं। और सचमुच, यद्यपि हम सब सुसमाचार को मानने का दावा करते हैं, तौभी हम बहुतों को पाएँगे जो बपतिस्मा का सच्चा उपयोग नहीं जानते, न यह कि वह किस काम आता है, न यह कि किस उद्देश्य से ठहराया गया था। परन्तु ऐसे लोग परमेश्वर के हाथ से ऐसी प्रतिभूति लेने का भारी दण्ड भोगेंगे। वह दिखाएगा कि यह इतनी बहुमूल्य वस्तु है कि इसका दुरुपयोग नहीं किया जा सकता, क्योंकि कहा गया है कि यही वह साधन है जिससे हम अपने प्रभु यीशु मसीह से जोड़े जाते और उसकी मृत्यु और पुनरुत्थान में कलम लगाए जाते हैं। तो जब बहुतों ने बचपन में बपतिस्मा पाया है, और चालीस या पचास वर्ष संसार में यह जाने बिना बिता दिए हैं कि वे किस उद्देश्य से बपतिस्मा पाए थे: तो उनके लिए अच्छा होता कि वे मरे हुए ही जन्मते, और सौ बार भूमि में धँस जाते, बजाय इसके कि ऐसी पवित्र वस्तु को अपवित्र करते। इसलिए हम और भली भाँति विचार करें, और सीखें कि यद्यपि हमारे सिरों पर थोड़ा सा ही जल डाला जाता है, तौभी वह कोई व्यर्थ चित्र नहीं: क्योंकि परमेश्वर उसमें मानो स्वर्ग से बोलता है, और यीशु मसीह वहाँ संस्कार के प्रयोग और प्रभाव का साक्षी होकर उपस्थित है, और विशेष करके उसकी मृत्यु और पुनरुत्थान की हमें उसके द्वारा प्रतिभूति दी जाती है। हम इन बातों पर भली भाँति विचार करें, और सोचें कि हम किस उद्देश्य से बपतिस्मा पाए हैं और उससे हमें क्या लाभ मिलता है: यह हमारे हृदयों में भली भाँति जड़ पकड़ ले, और जब कभी छोटे बच्चों को बपतिस्मा दिया जाए, तब हम और भली भाँति ध्यान दें: क्योंकि विश्वासियों की संगति [या मण्डली] में बपतिस्मा किस उद्देश्य से किया जाता है? निश्चय इसलिए कि वह शिशु परमेश्वर को सौंपा जाए। फिर यह स्वर्गीय नगर में उसका एक प्रकार का नागरिक बनाया जाना है, इसलिए इसे गड़बड़ी में नहीं करना चाहिए: वरन यह ऐसा उत्तम कार्य है कि इसे सांसारिक शासन-सम्बन्धी किसी भी बात से अधिक व्यवस्थित और गम्भीर रीति से करना चाहिए। क्योंकि इसमें हमें उस उपकार का दर्पण मिलता है जो पहले हम पर किया गया था, ताकि हम अन्त तक उसमें आनन्दित रहें।

परन्तु हम देखते हैं कि अविश्वासी अपनी ही कृतघ्नता से अपने आप को परमेश्वर के इस लेपालकपन से वंचित कर लेते हैं, और अपने आप को उससे पूरी तरह निकाल देते हैं। इसलिए ताकि हम और अधिक दृढ़ किए जाएँ, हमें भली भाँति विचार करना चाहिए कि जब बपतिस्मा मनाया जाता है, तब वह हमें बहुत निकट से छूता है, और परमेश्वर हमें अपने पास बुलाता है, कि हमें दूसरे की हैसियत में दिखाए कि हम स्वयं स्वभाव से निराश्रित और दण्ड के योग्य हैं। तौभी, क्योंकि उसने हमें अपने प्रभु यीशु मसीह की देह में जोड़ दिया है, इसलिए अब हम अपने निज रूप में नहीं गिने जाते, और न परमेश्वर यह देखता है कि हम अपने आप में क्या हैं, या हमने क्या कमाया है: वरन हमें ऐसे ग्रहण करता है मानो यीशु मसीह हम में हो, जैसा वास्तव में हमें उससे अलग नहीं होना चाहिए। इस पाठ पर हमें वस्तुतः यही विचार करना है।

अब इस पर सन्त पौलुस यह निष्कर्ष निकालता है कि न यूनानी रहा न यहूदी, न दास न स्वतंत्र, न नर न नारी, परन्तु यीशु मसीह हम सब में एक है, और हम सब उसमें एक हैं। और इस वचन से सन्त पौलुस का आशय और भी भली भाँति प्रकट करना था कि केवल विश्वास ही हमारे लिए पर्याप्त होना चाहिए, और हमें अन्य सब साधनों को निकाल देना चाहिए: नहीं तो यह हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह और उसके पवित्र आत्मा के कार्य दोनों का अनादर होगा। यदि कोई यह कहे कि खतना पुरखों के लिए सदा उसी बात का अभिलेख रहा है जो आज हमारे पास बपतिस्मा में है: तो इस सन्देह का समाधान कुलुस्सियों के दूसरे अध्याय में है, जहाँ सन्त पौलुस कहता है कि बपतिस्मा लेने में हमारा खतना हुआ है: [तौभी] मनुष्य के हाथ से नहीं, और न दृश्य खतने से: परन्तु हमारे लिए यही बहुत है कि परमेश्वर हमें आत्मिक खतने का भागी स्वीकार करता है, अर्थात् इस कारण कि आजकल बपतिस्मा उसी उद्देश्य के लिए ठहराया गया है। और यह ध्यान दें कि खतना यहूदियों और अन्यजातियों के बीच भेद करने के काम आता था। वह (जैसा शास्त्र उसे कहता है) उनके बीच एक दीवार था, कि यहूदियों को उन लोगों के रूप में घेर रखे जिन्हें परमेश्वर ने चुना था।

परन्तु अब आशीष सब कहीं सुनाई जाती है, यहाँ तक कि कोई भेद नहीं रहा। अब बपतिस्मा इन दिनों खतने के स्थान पर आकर उस पुराने चिह्न की घटी पूरी करता है, जो आनेवाली बातों का चित्र और छाया था। और यह आवश्यक न होता, यदि हमारा प्रभु यीशु मसीह दूर न होता। परन्तु अब जब वह हम पर प्रकट हो चुका है, तो उसके बदले हमारे लिए बपतिस्मा ठहराया गया है। तौभी हम ध्यान दें (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) कि परमेश्वर के सामने अनुग्रह मोल लेने के लिए हम अपना कुछ भी नहीं ला सकते: हम जो कुछ कर सकते हैं वह केवल सीधे-सीधे अपना पाप मान लेना है, जो हमें निराशा में डुबाने के लिए बहुत है। फिर, हमारे पास विश्वास है, जिससे हम वह पुनः पाते हैं जो हमारे उद्धार के लिए आवश्यक है। मैं कहता हूँ कि हम उसे पुनः पाते हैं, उसे अपने प्रभु यीशु मसीह में ढूँढ़कर। अब यदि हम कहें, हाँ, पर हम दुर्बल और मोटी बुद्धि के हैं, हम स्वर्ग के भेदों तक इतना ऊँचा नहीं चढ़ सकते: तो हम उस बपतिस्मा को देखें जो हमें दिया गया है, मानो परमेश्वर हमारी ओर हाथ बढ़ाता हो। वहाँ वह हमें आँखों से दिखाता है कि किस प्रकार वह हमें उस श्राप में से जिसमें हम डूबे थे, खींच निकालता है, और हमें अपने प्रभु यीशु मसीह से ढाँपता है, ताकि हमारे सब कुकर्म उसकी धार्मिकता की सिद्धता से गाड़ दिए जाएँ। क्योंकि हम जानते हैं कि उसने परमेश्वर अपने पिता की ऐसी आज्ञाकारिता की कि यदि हम उसी की नींव पर आएँ, तो उसके हाथ से अनुग्रह पाए बिना नहीं रह सकते। इस प्रकार तुम देखते हो कि एक ओर परमेश्वर चाहता है कि हम उस पर और उसके पुत्र हमारे प्रभु यीशु मसीह पर टिके रहें, कि उस सोते की परिपूर्णता में से भर लें, और अपने उद्धार की सारी स्तुति उसके पवित्र आत्मा के कार्य को दें: और दूसरी ओर हमारी मोटी बुद्धि और दुर्बलता की सहायता के लिए हमें बपतिस्मा देता है। जब हमारे पास यह सब है, तो और क्या ढूँढ़ें? क्या यह जान-बूझकर परमेश्वर को लूटना नहीं, यदि हम और सहायताएँ चाहें, और जैसे-जैसे हमारे मन में आएँ और मत और कल्पनाएँ मिलाते जाएँ? इन सब का क्या काम? परन्तु ऐसे मेल-मिलाप शैतानी भ्रष्टताएँ हैं।

इसलिए सन्त पौलुस हमें बताता है कि हमें अपने प्रभु यीशु मसीह से ऐसा जुड़ना है कि हम में से कोई अपने आप को अपने संगियों से अधिक मूल्यवान समझकर ऊँचा न उठाए, वरन सब बातों के लिए अपने आप को परमेश्वर के निरे अनुग्रह का ऋणी माने, और बड़े-छोटे सब मिलकर एक ही प्रयत्न करें, और एक मन होकर मान लें कि हमारे प्रभु यीशु मसीह में उनके पास वह सब है जो चाहने योग्य है, और इसलिए अपने ही मस्तिष्क में आनेवाली सब युक्तियाँ और उपाय छोड़ दें। फिर भी सन्त पौलुस का यह कहने का आशय नहीं कि सांसारिक शासन के विचार से पदों के भेद नहीं हैं। क्योंकि हम जानते हैं कि स्वामी और दास हैं, हाकिम और प्रजा हैं: घर में गृहपति है जो सिर है, और गृहिणी है जिसे अधीन रहना चाहिए। हम जानते हैं कि यह क्रम अटल है, और हमारा प्रभु यीशु मसीह संसार में ऐसी गड़बड़ी मचाने नहीं आया कि उसे मिटा दे जो परमेश्वर उसके पिता ने ठहराया था। परन्तु जब सन्त पौलुस कहता है कि न स्वामी रहा न दास, न नर न नारी: तो उसका अर्थ यह है कि अपने उद्धार के निश्चय के लिए मनुष्य मोरों की तरह पूँछ न फैलाएँ, और अपने ही पंखों को ताकते न खड़े रहें: वरन हम अपने आप में जो भी योग्यता मानते हों, उसे पोंछ डालें और पाँव तले फेंक दें, और मान लें कि वह सब केवल बाधाएँ हैं जो हमें अपने प्रभु यीशु मसीह के पास आने से भटकाती हैं।

इसलिए जब बड़े-छोटे दोनों मान लें कि वे अपने पास से कुछ नहीं ला सकते, वरन सब कुछ परमेश्वर की एकमात्र सेंतमेंत की भलाई से पाना है: तब हमारा प्रभु यीशु मसीह स्वयं अकेला हम में सब कुछ है: अर्थात् हम उस अनुग्रह में कुछ जोड़ने का यत्न न करेंगे जो उसने हमारे लिए मोल लिया है, और जो वह नित्य हमें अपने सुसमाचार के द्वारा देता है, कि हम उसके भागी हों और उसे अपने उद्धार के लिए भोगें। इस प्रकार तुम देखते हो कि वस्तुतः एक ओर हमें इस संसार के नागरिक क्रम को बनाए रखना है। जो बड़े लोग हैं, और दूसरों के ऊपर अधिकार रखते हैं, वे जान लें कि परमेश्वर चाहता है कि उसकी सेवा उस पद पर रहकर उनके द्वारा हो। उदाहरणार्थ, हाकिम यह विचार करें कि वे अपना कर्तव्य निभाने को उतने ही अधिक बाध्य हैं, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें इस प्रकार दूसरों से ऊपर उठाकर उनका आदर किया है। फिर, जो साधारण जन हैं और जिन्हें हाकिमों की आज्ञा माननी चाहिए, वे देखें कि अपने आप को अधीन करें, जब तक कि वे परमेश्वर से झगड़ने और उसके विरुद्ध युद्ध करने का इरादा न रखते हों। तुम देखते हो कि सन्त पौलुस हमें संयम और नम्रता में, और ऐसी लगाम के नीचे रखता है जो मनुष्यों की गढ़ी हुई नहीं, वरन परमेश्वर की ठहराई हुई है, हमारे काम के लिए, क्योंकि उसके बिना मनुष्य जाति टिक नहीं सकती। और सचमुच हमें शासन की व्यवस्था का, प्रभु की ठहराई हुई वस्तु के रूप में, आदर और सम्मान करना चाहिए। तौभी इस सब के होते हुए, जब हम स्वर्गीय जीवन की बात पर आएँ, तो निश्चय जानें कि सब सांसारिक वस्तुएँ बीत जाती और लोप हो जाती हैं, क्योंकि संसार और उसका रूप बदलता जाता है, सन्त पौलुस कहता है: परन्तु परमेश्वर का राज्य सदा बना रहता है।

फिर जहाँ तक परमेश्वर की सन्तान होने और उसके वारिस होने का सम्बन्ध है, हम इसे धन, कुलीनता, या प्रतिष्ठा से, या अपनी किसी शक्ति या गुण से नहीं पाते। तो कैसे? परमेश्वर के निरे अनुग्रह और भलाई से। क्योंकि बड़ों को झुकना और अपने आप को दीन करना पड़ता है, और छोटों को परमेश्वर की ऐसी अनमोल भलाई को देखकर चकित होना चाहिए जिसने उन्हें इस रीति से आकाशों के ऊपर उठाना उचित जाना, जब कि वे पृथ्वी पर बसने के योग्य भी बड़ी कठिनाई से गिने जाते हैं। फिर, हम इससे लाभ उठाने की कुशलता रखें। निश्चय मुख्य बात यह है कि हम आगे बढ़ते और स्वर्गीय राज्य की मीरास की ओर चलते रहें, और हमारा अध्ययन, विचार और लालसाएँ मुख्यतः उसी में लगी रहें। परन्तु साथ ही इस संसार में से होकर जाते हुए हमें उन श्रेणियों का भी ध्यान रखना है जिन्हें हमारे प्रभु ने बनाए रखने को ठहराया है। और जब किसी को शासन के पद के लिए चुनना हो, कि परमेश्वर की तलवार थामे और न्याय के आसन पर बैठे: तो हर एक भली भाँति विचार करे, और जो चुने जाने को हैं उनके लिए परमेश्वर से प्रार्थना करे, कि वे भले और विश्वासयोग्य हाकिम ठहरें, और अपना कर्तव्य निभाने में लगे रहें। और हम अपनी ओर से शान्ति से उनकी आज्ञाकारिता और अधीनता में चलें: उसमें हम मानो स्वर्ग के राज्य के पहले फल का अनुभव करें: और यह विचार करें कि हमारा प्रभु यीशु मसीह उस चिह्न के द्वारा हमें पहले से दिखाता है कि उसे हमारी चिन्ता है, वह हमारी देखरेख करता है और हम पर चौकसी रखता है, जब तक कि हम उसे पूरी रीति से अनुभव न करें, जब वह हमें अपने पास इकट्ठा कर लेगा। और ताकि हम उस जूए को जो उसने ठहराया है, और भी आनन्द और अच्छे साहस से उठा सकें: हम समझें कि वह उसे भाता है, और ऐसा बलिदान है जिससे वह प्रसन्न होता है, जब हम उस क्रम के अनुसार चलते हैं जो उसने स्थापित किया है, और जब हम न केवल किसी पर अन्याय किए बिना, या हिंसा या छल किए बिना जीवन बिताते हैं: वरन (जैसा सन्त पौलुस कहता है) सब भक्ति और गरिमा के साथ चलते हैं, अर्थात् जब हम पहले सब से बढ़कर परमेश्वर का भय और आदर मानते हैं, और अपने आप को पूर्ण रूप से उसके लिए समर्पित करने का परिश्रम करते हैं: और दूसरे ऐसे संयम से जीते हैं कि भली भाँति दिखा दें कि यद्यपि हम संसार में रहते हैं, तौभी हम उसके हो नहीं गए हैं: वरन उसे परदेश मानते हैं, जिसमें से होकर हम निरन्तर स्वर्गीय विश्राम की ओर यात्रा करते हैं, जब तक कि हम वास्तव में वह न देख लें जो हमें यहाँ सिखाया जाता है, अर्थात् यह कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह से व्यर्थ नहीं जोड़े गए।

और अब हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने पापों को मानकर गिर पड़ें, उससे प्रार्थना करते हुए कि वह हमें उन्हें ऐसा समझाए कि हम निरन्तर उसे ढूँढ़ते रहें, जितनी सम्भव हो उतनी उत्कट लगन से, और अपने आप को पूरी रीति से अपने प्रभु यीशु मसीह को दे दें, ताकि उससे जुड़कर हम इस संसार की सब चिन्ताएँ छोड़ दें, और स्वर्गीय राज्य के सुख की ओर और भी आगे बढ़ते जाएँ, जब तक कि वहाँ पूरी रीति से न पहुँच जाएँ। और इसलिए हम सब कहें, हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता। इत्यादि।

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