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दूसरे अध्याय पर सातवाँ उपदेश, जो तेरहवाँ उपदेश है — गलातियों 2:17-18
तेरहवाँ उपदेश,
जो दूसरे अध्याय पर सातवाँ है।
17 परन्तु यदि हम, जो मसीह के द्वारा धर्मी ठहरना चाहते हैं, पापी पाए जाएँ, तो क्या मसीह पाप का सेवक ठहरा? कदापि नहीं।
18 क्योंकि यदि मैं उन बातों को जिन्हें मैंने ढा दिया था, फिर बनाऊँ, तो अपने आप को अपराधी ठहराता हूँ।
हम पहले देख चुके हैं कि मनुष्य अपने कामों और योग्यताओं पर जो घमण्ड और भरोसा रखते हैं, उस सबको ढा देने के लिए पौलुस ने यह बात सामने रखी कि यहूदी, जिन्हें अन्य मनुष्यों की तुलना में बड़ा विशेषाधिकार प्राप्त था, फिर भी सुसमाचार पर विश्वास किए बिना परमेश्वर का अनुग्रह नहीं पा सकते थे। फिर भी यह मान लेना उचित ही था कि यहूदियों में अपनी कुछ धार्मिकता थी, जिसके द्वारा वे परमेश्वर का अनुग्रह पा सकते थे, क्योंकि उन्हें व्यवस्था इस प्रतिज्ञा के साथ दी गई थी कि जो मनुष्य उन बातों को करेगा, वह उनके द्वारा जीवित रहेगा। इसलिए कोई यह समझ सकता था कि यहूदी, मसीह के बिना केवल अपने ही विषय में, परमेश्वर के सामने कुछ-न-कुछ धर्मी ठहर सकते थे; नहीं तो व्यवस्था निरर्थक प्रतीत होती। परन्तु जब वे हमारे प्रभु यीशु मसीह के पास आते हैं, तब वहाँ वे अपने आप को अभागे, खोए हुए और दोषी ठहराए हुए पापी जान लेते हैं। तब तो ऐसा प्रतीत होना चाहिए कि यीशु मसीह पाप लाता है, क्योंकि उसके आने से पहले यहूदी परमेश्वर की सन्तान गिने जाते थे। वे अपनी देह में पवित्रता का चिह्न लिए हुए थे, और इसके अतिरिक्त उनसे कहा गया था कि वे अपने परमेश्वर की पवित्र और चुनी हुई प्रजा हैं। अब जब वे अभागे पापियों के बराबर हो जाते हैं, और उनमें शापित दशा के सिवा कुछ नहीं पाया जाता, और इस प्रकार उन्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह के केवल अनुग्रह की शरण में भागने को विवश होना पड़ता है, तो ऐसा लगता है कि यीशु मसीह संसार में पाप ले आया। सच है, मनुष्य अपनी ही समझ के अनुसार उसके विषय में ऐसा ही निर्णय करेंगे, यद्यपि वह मूर्खता की बात है।
क्योंकि हमें यह ध्यान देना चाहिए कि हमारा प्रभु यीशु मसीह पाप लाता नहीं, वरन् पाप को प्रकट करता है। क्योंकि यद्यपि यहूदी व्यवस्था के पालन में लगे रहते थे, तौभी इससे उन पर अधिकाधिक यही प्रमाणित होता था कि परमेश्वर उद्धारकर्ता के माध्यम के बिना उन पर कभी दया न करेगा। इसमें सन्देह नहीं कि पवित्रता और संयम से जीवन बिताने में, और इसके अतिरिक्त परमेश्वर की आज्ञा मानने में, उनमें धार्मिकता का कुछ आभास था; परन्तु वह सब का सब अनुग्रह से था, और जो परमेश्वर का है उसे हमें मनुष्यों का नहीं ठहराना चाहिए, क्योंकि इस प्रकार परमेश्वर अपनी महिमा से वंचित हो जाता। तब यदि परमेश्वर के आत्मा से चलाए जाते हुए यहूदियों में पवित्र जीवन बिताने की कुछ इच्छा और चाह थी, तो यह नहीं गिना जाना चाहिए कि परमेश्वर उनका कर्ज़दार था; इसके विपरीत वे परमेश्वर के कहीं अधिक ऋणी हैं। परन्तु दूसरी ओर हमें यह भी ध्यान देना है (जैसा कि हम यथासमय और यथास्थान और भी विस्तार से देखेंगे) कि आज तक कोई मनुष्य ऐसा सिद्ध नहीं हुआ जिसमें दोष देने योग्य बहुत कुछ न रहा हो। इसलिए हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि यहूदी परमेश्वर को इतने ग्रहणयोग्य नहीं थे कि उन्हें उसकी दया की आवश्यकता न रहे, और उनका उद्धार अनिवार्य रूप से उनके पापों की क्षमा पर ही पूरी रीति से आधारित होना था। फिर जहाँ तक रीतियों का सम्बन्ध है, वे मानते थे कि उनमें बड़ी पवित्रता है, जिन्हें कपटी लोग सदा अपना आड़ बनाते आए हैं। परन्तु चाहे जैसी भी दशा रही हो, यह निश्चित है कि यहूदी अन्य सब मनुष्यों से अधिक दण्ड के योग्य थे। और क्यों? क्योंकि (जैसा सन्त पौलुस कहता है) व्यवस्था के बिना पाप मनुष्यों को नहीं फटकारता, यहाँ तक कि जब उनके पास वह बुलाने वाला नहीं होता जो उन्हें परमेश्वर के न्यायासन के सामने बुलाए, तब वे सो जाते हैं और अपने दोषों में अपनी ही चापलूसी करते हैं।
फिर, जबकि अभागे अन्यजातियों के पास कुछ बचाव और बहाना हो सकता था, कम से कम यह कि वे परमेश्वर के सामने इतने दोषी नहीं हैं, तब यहूदियों ने अपनी बलियाँ चढ़ाते हुए अपने मुँह के सामने यह गवाही पाई कि वे सब के सब अनन्त मृत्यु के योग्य हैं, और इस कारण अन्यजातियों की तुलना में वे दोहरे दोषी हैं। और इसीलिए कुलुस्सियों की दूसरी पत्री में सन्त पौलुस यह उपमा देता है कि व्यवस्था की रीतियाँ मनुष्य को और कसकर बाँधने वाले दस्तावेज़ों के समान थीं। सचमुच, जैसे कोई ऋणी मनुष्य, यद्यपि व्यवस्था की विधि से दोषी नहीं ठहराया गया, न उसने किसी लेखक के सामने अपने आप को बाँधा है, न अपने हाथ और मुहर से लिखित प्रतिभूति दी है, तौभी इस कारण वह अपना ऋण चुकाने के लिए [विवेक में] बँधा रहना नहीं छोड़ता; वैसे ही अन्यजातियों के पास यद्यपि ऐसा कोई प्रामाणिक अभिलेख नहीं था जिससे वे दोषी ठहराए जाते, तौभी वे मृत्यु के योग्य बने ही रहे। परन्तु जिस मनुष्य ने व्यवस्था की विधि से बन्धपत्र लिखा है और अपना ऋण सार्वजनिक अभिलेखों में दर्ज कराया है, वह और क्या कहेगा? उसके लिए बच निकलने का कोई मार्ग नहीं; उसे तुरन्त [ऋण का] उत्तर देना ही होगा। अब यहूदी भी ऐसी ही दशा में थे। क्योंकि मन्दिर में जाते समय, और अपने घरों में, और हर कहीं, अपने आप को धोना इस बात का अंगीकार था कि उनमें अशुद्धता के सिवा कुछ नहीं है। फिर, जब वे पशुओं को मारते और उन्हें अपने सामने वध होते देखते थे, तब वह निश्चय ही उनकी अपनी मृत्यु और शापित दशा का सजीव चित्र था। तौभी न तो वे मूक पशु और न उनके लहू का बहाया जाना उन्हें शुद्ध कर सकता था, और न ही जल, जो नाशमान तत्त्व है और आत्मा तक नहीं पहुँच सकता। इसलिए जो धोना वे करते थे, वह मूर्खता की बात होती यदि वह उन्हें उस आत्मिक धोने की ओर न ले जाता जो हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह में प्राप्त है। इसी प्रकार आज बपतिस्मे में, यदि हम समझें कि हम जल से शुद्ध किए जाते हैं, तो यह कैसा दुरुपयोग है? ये सब बातें हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह के लहू तक पहुँचाने के लिए होनी चाहिए। इसलिए मैं यह निष्कर्ष निकालता हूँ कि जबकि यहूदी व्यवस्था में लगे रहते थे, वही उनके विरुद्ध और बड़ा प्रमाण था, और उसने उन्हें अन्यजातियों की अपेक्षा परमेश्वर के न्याय और अनन्त मृत्यु की अधीनता में और भी कसकर बाँध रखा था।
और इस प्रकार हम देखते हैं कि यीशु मसीह पाप का लाने वाला नहीं, वरन् पाप का प्रकट करने वाला था। क्योंकि यहूदी अपने आप को रीतियों की आड़ में भली-भाँति सुरक्षित समझते थे, और उन्हें ढाल बनाकर परमेश्वर के क्रोध से अपना बचाव करते थे, और अन्य सब जातियों को अपवित्र मानते थे, इस धारणा में कि संसार में और सब जगह अशुद्धता ही अशुद्धता है और सारी पवित्रता उन्हीं में है। देखो उनका अहंकार कैसा था। तौभी जब यीशु मसीह आया और उसने सब बातों को व्यवस्थित किया, तब उसने उन्हें दिखाया कि उन्हें अपने उदाहरण से अन्य मनुष्यों को यह दिखाना चाहिए कि उनका उद्धार उनकी अपनी योग्यताओं से बाहर कहीं और खोजा जाना है, और उन्हें उसके पास ऐसी दीनता से आना चाहिए कि वे मान लें कि वे अपने साथ पूरी शापित दशा के सिवा कुछ नहीं लाए। और इस रीति से हमारे प्रभु यीशु मसीह ने उस बुराई को प्रकट कर दिया जो पहले छिपी हुई थी, जैसे रोगी लोग प्रायः किसी ऐसे फोड़े के सड़ने को नहीं पहचानते जो किसी प्राणघातक रोग को उत्पन्न करेगा, जब तक कि शल्य-चिकित्सक उसे ढूँढ न निकाले, जो उसे चंगा करने का अपना काम तब तक नहीं कर सकता जब तक वह उस फोड़े की, जो पहले अज्ञात था, तह तक जाँच न कर ले। ठीक वैसे ही हमारे प्रभु यीशु मसीह को यहूदियों में जो दुर्दशा थी उसे प्रकट करना पड़ा, ताकि वे उसके पास लौट आएँ और मान लें कि उनमें ऐसा कुछ नहीं जो परमेश्वर की कृपा के योग्य हो, और उसकी केवल दया के सिवा उनके लिए कोई और शरण नहीं। इस प्रकार तुम देखते हो कि सन्त पौलुस ने यहाँ जो प्रश्न और सन्देह उठाया है, उसके समाधान के लिए सार रूप में हमें क्या विचारना है।
इसी प्रकार आज भी, यदि कोई उन लोगों से सुसमाचार की बात कहे जो समझते हैं कि वे परमेश्वर की सेवा करते हैं और अपनी ही योग्यता से स्वर्ग जीतने की आशा रखते हैं, तो वे इससे चिढ़ते हैं, क्योंकि पहले से बनाई हुई अपनी धारणा के कारण वह द्वार उनके लिए बन्द है; वे कहते हैं: “क्या? बताओ तो! क्या मैंने अपना समय व्यर्थ गँवाया, जब मैं जीवन भर इतना भक्त रहा?” जिसने एक-दो मिस्सा सुन ली हो, या प्रार्थनाओं का एक समूह बड़बड़ा लिया हो, या तीर्थयात्रा कर ली हो, या अपना धन और सम्पत्ति (बिना कोई कसर रखे) क्षमापत्रों, भोग-पत्रों और ऐसी ही अन्य वस्तुओं पर लुटा दी हो: यदि उससे कहा जाए कि हम सब अभागे हैं और हमारे टेकने के लिए हमारे प्रभु यीशु मसीह के केवल अनुग्रह के सिवा और कुछ नहीं, और जो कुछ हम परमेश्वर के पास ला सकते हैं वह सब मैला और घृणित ही है, तो वह क्रोध से भड़ककर कहेगा, “क्या यह सम्भव है कि परमेश्वर उसकी सेवा के लिए मेरे उठाए हुए इतने कष्ट का कुछ विचार न करे? क्या यह सब मेरे लेखे में नहीं जाना चाहिए और मेरे उद्धार के लिए नहीं गिना जाना चाहिए?” वे परमेश्वर पर दोष लगाने को तैयार हैं, हाँ, हम बहुतों को देखेंगे जो खुले मुँह उसे कोसने से भी नहीं हिचकेंगे, क्योंकि जो उन्होंने किया है उसे खोना उन्हें अच्छा नहीं लगता। यद्यपि कपटी लोग अपने में बहुत दुष्टता देखते हैं, तौभी वे सब कुछ अपने चोगों के नीचे छिपाना चाहते हैं। क्योंकि वे इस रीति से फूट पड़ते हैं: कोई कहता है, “मैं ऊनी वस्त्र पहने नंगे बदन फिरा हूँ”; दूसरा, “मैं आधी रात को उठकर परमेश्वर की सेवा करता रहा हूँ”; तीसरा, “मैंने मांस खाने से परहेज़ किया है”; और एक और, “मैं किसी बन्दीगृह के समान मठ में बन्द रहा हूँ, और अन्त में मैं संसार के प्रति मर चुका हूँ, तो क्या यह सब मेरे लिए व्यर्थ होगा, कि परमेश्वर इसका कुछ विचार न करे?” ऐसी बड़बड़ाहटें हम प्रतिदिन सुनेंगे। परन्तु आओ देखें कि क्या वे अपने सारे उत्तर देने पर भी अपना पक्ष और अच्छा बना सकते हैं। क्योंकि जब वे अच्छी तरह जाँच लेंगे कि उनमें क्या है, तब पाएँगे कि उनके सारे कार्य केवल चित्रकारी के समान हैं जिससे बातों को ढाँपा जाता है, उस मनुष्य के समान जो अपना घर मरम्मत करना नहीं चाहता, भीतर के छेदों को बिना भरे छोड़ देता है और केवल बाहर से उन्हें लीप देता है कि वे दिखाई न दें, और फिर उस पर चूना पोत देता है, ताकि अन्त में वह लिपाई-पुताई के सिवा और कुछ न हो, ठीक जैसे हमारे प्रभु यीशु मसीह ने उन कपटियों के विरुद्ध, जो केवल चीज़ों को सफ़ेद करते थे, यही उपमा काम में ली है। परन्तु इस बीच परमेश्वर बाहरी रूप को नहीं देखता, जैसा कि शमूएल की पहली पुस्तक में कहा गया है, वरन् मनुष्यों के हृदयों और सच्चाई को जाँचता है, और जो बातें पहले छिपी थीं उन्हें खोलकर रख देता है, जैसा कि यिर्मयाह में भी कहा गया है। जब ऐसा है, तो वे सब जो अपनी ही भक्ति को सामने रखते या गिनाते हैं, सम्भव है मनुष्यों के सामने उनका कुछ सुन्दर दिखावा हो, पर निश्चय ही परमेश्वर के सामने सब झूठ है। और ज्यों ही परमेश्वर उनकी चित्रकारी और कलफ़ पर फूँक मारेगा, वह उतर जाएगी, जैसे वेश्याओं की चित्रकारी जो अपने मुखों पर कलफ़ लगाने में बड़ा परिश्रम करती हैं, पर सूर्य के उन पर चमकते ही मनुष्य देखता है कि घिनौनी पपड़ियाँ झड़ गईं, और उनकी कुरूपता उनकी लज्जा के लिए प्रकट हो गई। सब कपटियों की भी वैसी ही दशा होती है जब वे परमेश्वर के सामने उसी रीति से बातों पर रंग चढ़ाना चाहते हैं; उनकी लज्जाजनक दुष्टता को प्रकाश में लाया ही जाएगा।
इसलिए ध्यान दें कि हमारा प्रभु यीशु मसीह सारे संसार को दोषी ठहराते हुए, यह दिखाकर कि परमेश्वर अपने पिता की उस सेंतमेंत भलाई के बिना, जो वह हमें देता और बाँटता है, कोई उद्धार नहीं पा सकता, पाप को नहीं लाता (क्योंकि वह तो हम में पहले से है) परन्तु उसे प्रकट और उजागर करता है, ताकि हम उसके दोषी ठहरें, और वह सारा घमण्ड जिससे हम पहले मतवाले हो रहे थे, ढा दिया जाए, और हम में दीनता के सिवा कुछ न रहे कि हम निष्कपट मान लें कि हम नष्ट हो चुके हैं, और हमारे लिए कोई और उपाय नहीं सिवाय इसके कि परमेश्वर अपनी दया के अनन्त भण्डार हम पर उण्डेले। तो तुम देखते हो कि सब के मुँह बन्द किए जाएँगे, और मनुष्यों को अब अपने में कोई धार्मिकता पाने की कल्पना करके अपने आप को नहीं बहकाना चाहिए।
इसके अतिरिक्त, सन्त पौलुस यहाँ यह दिखाने के लिए दोहरा उत्तर देता है कि बात बिलकुल ऐसी नहीं है। परन्तु उत्तर देने से पहले वह एक स्पष्ट शब्द कहता है: “कदापि नहीं।” मानो वह कहता है कि हमारे पापों का दोष हमारे प्रभु यीशु मसीह पर लगाना चाहना एक भयानक निन्दा है। क्योंकि (वह कहता है) यदि मैं उस वस्तु को ढा दूँ जो मैंने बनाई है, तो मुझमें विरोधाभास होगा। और ऐसा कहकर वह हमें सुसमाचार की सर्वसाधारण शिक्षा की ओर लौटा लाता है। क्योंकि हमारा यह प्रचार करना कि परमेश्वर ने अपने एकलौते पुत्र को किस उद्देश्य से भेजा, यही दिखाना है कि वह हमारे लिए धार्मिकता लाया है और उस पाप को दूर करने आया है जो हमें मानो अत्याचार के अधीन रखता है, जब तक हम परमेश्वर के पुत्र की मृत्यु और दुःखभोग में हमारे लिए मोल लिए गए अनुग्रह के द्वारा उससे छुड़ाए और स्वतन्त्र न किए जाएँ।
अब जब ऐसा है, तो हम देखते हैं कि हमारा प्रभु यीशु मसीह पाप का लाने वाला नहीं, वरन् पाप को नष्ट करने आया है (जैसा सन्त यूहन्ना अपनी सार्वजनीन पत्री में कहता है), और हम स्वयं भी देखते हैं कि ऐसा ही है। क्योंकि सुसमाचार हमें और क्या सिखाता है सिवाय इसके कि हम सब प्रकार की दुष्टता से भरे हैं, और हमें उसके द्वारा शुद्ध किया जाना चाहिए जो निष्कलंक मेम्ना ठहरा, और यह भी कि वह हमारे लिए पवित्रता का आत्मा लाया है? क्योंकि मनुष्य जब तक मसीह से कटे हुए हैं, उनमें शाप के सिवा कुछ नहीं, यहाँ तक कि वे पूरी तरह सड़े हुए और अपने पापों में डूबे हुए हैं, और यीशु मसीह वही है जो उन्हें अपने लहू के बहाए जाने से धोकर पवित्र और शुद्ध करता है, और हमें नया करने के लिए [नया जन्म देने वाला] आत्मा लाता है, ताकि हम अपने आप को परमेश्वर की सेवा में लगाएँ, हम में उसका स्वरूप फिर बनाया जाए, और हम सत्य और खराई से चलें।
क्योंकि जब ऐसा कहा गया है: तो हम देखते हैं कि हमारा प्रभु यीशु मसीह पाप का लाने वाला नहीं है। और ऐसा क्यों? क्योंकि आओ विचारें कि हम क्या हैं, तो हम पाएँगे कि हम में से हर एक में, और सारी मानवजाति में, हर प्रकार की दुष्टता की खाई है। परन्तु हमारा प्रभु यीशु मसीह उसका उपचार करने आता है। तो तुम देखते हो कि पाप तो पहले से हम में था: परन्तु हमारे प्रभु यीशु मसीह को उसे उघाड़ना पड़ता है। वैद्य लहू निकालकर क्या हानि करता है? देखो, एक अभागे मनुष्य को ऐसा रोग है जो दिखाई नहीं देता: उसका लहू सर्वथा बिगड़ चुका है, फिर भी जब तक वह नसों के भीतर है, तब तक ऐसा दिखाई नहीं देता। परन्तु एक बार उसका लहू निकाला जाए, तो प्रकट होगा कि वह लहू नहीं, वरन् गन्दा सड़ा हुआ पदार्थ था। फिर, जब किसी रोग के लिए मनुष्य के शरीर का शोधन किया जाता है तो उसमें से कैसी गन्दगी निकलती है? अब क्या इसके लिए वैद्य को दोष दिया जाएगा, या उस औषधि को जो उसे दी गई? यह भली-भाँति जानी हुई बात है कि शोधन उस शरीर को छुड़ाने के काम आता है जो पहले से आधा सड़ चुका था।
तो यदि हमारा प्रभु यीशु मसीह अपने सुसमाचार की ज्योति से उन आत्मिक रोगों को प्रकट करता है जो हम में थे, और उस गन्दी अशुद्धता को जो परमेश्वर के सामने घृणित और मनुष्यों के सामने लज्जाजनक है, और हमें उससे पूरी तरह शुद्ध और स्वच्छ कर देता है: तो क्या अपने इस परिश्रम के लिए वह किसी दोष या निन्दा का भागी ठहराया जाना चाहिए? यह कैसी कृतघ्नता होगी? इसलिए सुसमाचार के उन शत्रुओं की निन्दाओं और कुड़कुड़ाहटों को पीछे हटाने के लिए, जो अभिमान से फटे जाते हैं और वश में किया जाना सह नहीं सकते, यह पर्याप्त उत्तर है।
वे जो चाहें कहें कि उनमें कुछ धार्मिकता और पवित्रता है: तौभी सदा यही पाया जाएगा कि उनमें अशुद्धता के सिवा कुछ नहीं, जिसकी उन्हें सुध भी नहीं, फिर भी वह निरन्तर प्रकट होती रहती है। इसे एक बात के रूप में ध्यान में रखो।
दूसरे, सन्त पौलुस और भी विस्तृत और सरल व्याख्या जोड़ता है जब वह कहता है कि वह व्यवस्था के द्वारा व्यवस्था के प्रति मर गया है: और कि वह मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया है, कि परमेश्वर के लिए जीवित रहे। अब जब वह कहता है कि वह व्यवस्था के द्वारा व्यवस्था के प्रति मर गया: तो यह उन लोगों का उपहास करने के लिए है जो व्यवस्था के पालन से धर्मी ठहरने का दिखावा करते हैं। क्योंकि मैं तुम्हें पहले बता चुका हूँ कि उसका सारा वाद-विवाद और संघर्ष इसी प्रकार के लोगों के विरुद्ध था। वे धोखा देने वाले ही थे जो यीशु मसीह को मूसा की व्यवस्था के साथ मिलाने चले थे, यहाँ तक कि धार्मिकता पाने के लिए भी। क्योंकि यह निश्चित है कि हमारा प्रभु यीशु मसीह व्यवस्था के विरुद्ध नहीं है, वरन् उसका सुसमाचार व्यवस्था की गवाही लेता है, जैसा रोमियों के पहले अध्याय में दिखाया गया है।
तौभी जब बात धर्मी ठहराए जाने की हो, अर्थात् जब मनुष्य यह जाँचने और जानने लगते हैं कि परमेश्वर किस प्रकार और किस उपाय से उन्हें निर्दोष, शुद्ध और निष्कलंक मानकर ग्रहण करता है, तब व्यवस्था को यीशु मसीह से अलग करना ही होगा। और क्यों? क्योंकि व्यवस्था अपने में शाप के सिवा कुछ नहीं लाती: और यीशु मसीह उसका उपचार लाता है। इसलिए सुसमाचार के शत्रु, जिनके विरुद्ध सन्त पौलुस अब वाद-विवाद कर रहा है, व्यवस्था को उसके साथ मिला देते, और मनुष्यों को यह विश्वास दिला देते कि यद्यपि वे हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा धर्मी ठहराए जाते हैं, तौभी उन्हें रीतियों को उसके साथ अपने उद्धार के एक अंश के रूप में मिलाना चाहिए, और उनके द्वारा वे परमेश्वर के सामने अनुग्रह और कृपा मोल ले लेंगे।
परन्तु सन्त पौलुस यह सारा साज-सामान काट डालता है, और कहता है कि केवल यीशु मसीह ही है [जो यह कर सकता है], और कि इस विषय में मनुष्यों को न इस प्रकार न उस प्रकार कोई और सहायता खोजनी चाहिए, वरन् केवल उसके अनुग्रह में सन्तुष्ट रहना चाहिए, और इस विषय में व्यवस्था को कोई स्थान नहीं देना चाहिए। क्योंकि वह कहता है, जहाँ तक मेरी बात है, मैं सुसमाचार के द्वारा नहीं मरा। मानो वह कहता है, क्या तुम मुझे विश्वास दिलाओगे कि मैं व्यवस्था के द्वारा परमेश्वर की कृपा पा सकता हूँ? नहीं, मैं तुमसे इसके विपरीत कहता हूँ कि सुसमाचार ने मुझे दोषी नहीं ठहराया, सुसमाचार ने मुझे मेरी मलिनता नहीं दिखाई कि मैं उससे लज्जित होऊँ, सुसमाचार ने मुझे उद्धार की सारी आशा से वंचित नहीं किया: परन्तु यह तो व्यवस्था है जिसने मुझे दिखाया कि मैं बिलकुल मरा हुआ हूँ, कि मैं परमेश्वर के सामने दण्ड के योग्य हूँ, कि मैं नष्ट और दोषी ठहराया गया हूँ: यह और कहीं से नहीं, व्यवस्था ही से आता है। और क्या तुम चाहते हो कि मैं वहाँ धार्मिकता ढूँढूँ? यह तो ऐसा ही है जैसे तुम मुझे खाने को विष दो, कि मैं उससे पोषण पाऊँ। फिर भी (सच कहें तो) यह असुविधा व्यवस्था के सिर नहीं मढ़ी जानी चाहिए, क्योंकि ऐसा करना परमेश्वर के अपमान की ओर ले जाएगा, कि वह व्यवस्था से आई।
परन्तु चाहे जो हो, हम में जो भ्रष्टता है उसे देखते हुए व्यवस्था हमें मारे बिना नहीं रह सकती, जैसा हमने कुरिन्थियों की दूसरी पत्री में देखा है, और जैसा सन्त पौलुस रोमियों के सातवें अध्याय में और भी विस्तार से बताता है। क्योंकि वह कहता है कि जब मनुष्य अपने आप को जीवित समझते हैं, अर्थात् जब वे अपने आप को धर्मी और परमेश्वर के अनुग्रह और कृपा में स्थिर मानते हैं, तो यह इस बात का चिह्न है कि व्यवस्था उनके लिए मरी हुई है, अर्थात् उसमें वह सामर्थ्य और बल नहीं रहा कि वह उन्हें वह दिखाए जो उसे अन्यथा दिखाना चाहिए। क्योंकि व्यवस्था किसलिए दी गई थी? इसलिए कि भले जीवन का नियम हमारी आँखों के सामने रखे, और उस नियम को धार्मिकता कहा जाता है जिसे परमेश्वर स्वीकार करता है।
दूसरे, व्यवस्था हमारे लिए दर्पण के समान होनी चाहिए, जिसमें हम अपनी कुरूपताओं, कलंकों, मलिनताओं, गन्दगियों और अधर्मों को, जो सब व्यवस्था से इतनी दूर हैं, देखें, ऐसा कि उन्हें देखकर हम मानो निराशा में निगल लिए जाएँ। अब व्यवस्था के पास आने से पहले हम इन सब बातों में से कुछ भी नहीं देखते: अर्थात् हम नहीं जानते कि हम कैसे हैं, और हम में क्या बुराई है। परन्तु जब परमेश्वर अपनी माँगें हमारे सामने रखता है, और हम उन्हें भली-भाँति समझ लेते हैं: तब हम हक्के-बक्के रह जाते हैं और सर्वथा निराश हो जाते हैं। तब व्यवस्था मरी हुई है: अर्थात् वह मानो पाँव तले रौंदी हुई और लगभग गाड़ी हुई है, जब तक हम अपने आप को जीवित समझते हैं, और अपने भले कामों से धर्मी होने और स्वर्ग पाने की कोई मूर्खतापूर्ण कल्पना रखते हैं। परन्तु जब व्यवस्था जीवित होती है: अर्थात् जब परमेश्वर उसे हमें छूने की सामर्थ्य देता है, तब हम मर जाते हैं, तब वह तलवार के समान हमारे हृदय को बेध डालती है।
इसलिए जैसे ही हमने जान लिया कि व्यवस्था में क्या है, हमें प्राणघातक घाव अवश्य लगेगा। सन्त पौलुस उस पाठ में, जिसका मैंने हवाला दिया है, इसी रीति से बोलता है। और अब उसी विषय को आगे बढ़ाते हुए वह कहता है कि वह व्यवस्था के द्वारा व्यवस्था के प्रति मर गया: मानो उसने कहा हो, “यहाँ सुसमाचार की निन्दा करने मत आओ, मानो वह हमारे दोषी ठहरने का कारण हो, या हम में हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह का ज्ञान होना परमेश्वर के सामने शापित होने का प्रवेश-द्वार हो। नहीं, नहीं। परन्तु यह निश्चित है कि व्यवस्था (जब वह अपना काम करती है, और हम उसे वैसे पढ़ते हैं जैसा हमें पढ़ना चाहिए) सदा हमें मारती ही है, और हम मानो निराशा में डूबे पड़े रहते हैं, जब तक हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें उसमें से निकालने के लिए अपना हाथ न बढ़ाए। इस प्रकार मैं व्यवस्था के प्रति मरा हुआ हूँ, अर्थात् मुझे कोई जीवन नहीं मिल सकता, मुझे प्राण की कुशलता का कोई निश्चय नहीं मिल सकता, मुझे कोई शान्ति, विश्राम या सन्तोष नहीं मिल सकता, और संक्षेप में, व्यवस्था में ऐसा कुछ नहीं जिससे मैं परमेश्वर के पास आ सकूँ: वरन् ठीक इसके विपरीत वह मुझे झटक देती है, पीछे धकेल देती है, स्वर्ग के राज्य से निर्वासित कर देती है, उद्धार की आशा से मुझे पूरी तरह काट डालती है, मुझे दीन, शापित और अभागा प्राणी बना देती है, और संक्षेप में, मुझे नरक की तलहटी में भेज देती है। तो तुम देखते हो कि व्यवस्था में बने रहने से मैंने क्या पाया।” और सन्त पौलुस किसी और की अपेक्षा अपने ही विषय में बोलता है, ताकि जो बातें वह कहता है वे अनुभवी मनुष्य की बातों के रूप में अधिक ग्रहण की जाएँ।
और वह इसी रीति से पूर्वोक्त रोमियों के सातवें अध्याय में बोलता है। क्योंकि वहाँ वह किसी इस या उस मनुष्य को उदाहरण के लिए सामने नहीं रखता, परन्तु कहता है, “मैं आप किसी समय जीवित था”: अर्थात् उस समय जब वह फरीसी था, और पवित्र मनुष्य गिना जाता था, हाँ, सारे यहूदिया में सबसे उत्तम लोगों में से एक, यहाँ तक कि वह सारी सिद्धता का दर्पण और मानो एक छोटा स्वर्गदूत था: तब (वह कहता है) मैं जीवित था, परन्तु केवल कपट के द्वारा। क्योंकि उसने अपने आप को अद्भुत बातों का विश्वास दिला रखा था, और वह घमण्ड से इतना फूला हुआ था कि यीशु मसीह को तुच्छ जानता था। देखो, सन्त पौलुस अपने आप को कैसे अन्धेपन में रहा मानता है। और वह तुरन्त आगे जोड़ता है कि वह नहीं जानता था कि “तू लालच न करना” का क्या अर्थ है। यह अचम्भे की बात लग सकती है कि जो मनुष्य न केवल पाठशाला में पढ़ चुका था, वरन् दूसरों का बड़ा शिक्षक भी था, और इसके अतिरिक्त, जैसा वह स्वयं कहता है, बड़ा उत्साही भी, वह अपने ही दोषों को न जानने के लिए इतना मन्दबुद्धि हो गया। परन्तु सन्त पौलुस इसका कारण बताता है। क्योंकि (वह कहता है) मैंने बाहरी भलाई से आगे नहीं देखा, ताकि संसार के सामने मुझ में कोई दोष न पाया जाए, और कोई मनुष्य मुझ में कोई बुराई न जाने। परन्तु जब मैंने समझा कि इस वचन, “तू लालच न करना,” का क्या अर्थ है, और देखा कि परमेश्वर मनुष्यों की सब भावनाओं और विचारों को दोषी ठहराता है: तब मैंने जाना कि सबसे बुरी बात तो पीछे रह गई है, जैसा कि लोकोक्ति कहती है: क्योंकि यह व्यवस्था की अन्तिम आज्ञा है, जिसमें परमेश्वर ऐसी सजीव और गहरी जाँच करता है कि उससे कोई बात बच नहीं सकती।
जहाँ व्यवस्था में कहा गया है, “तू मेरे सिवा किसी और को ईश्वर करके न मानना: तू अपने लिए कोई मूर्ति बनाकर उसकी पूजा न करना: तू अपने परमेश्वर यहोवा का नाम व्यर्थ न लेना: तू विश्राम के दिन को पवित्र मानना: तू अपने पिता और अपनी माता का आदर करना: तू खून न करना: तू व्यभिचार न करना: तू चोरी न करना”: यह सब ठीक है (हम सोचेंगे), हमें सब व्यभिचार, हिंसा और जबरन वसूली से दूर रहना है: हमें छल और लूट से दूर रहना है: हमें संयम से जीवन बिताना है। यहाँ भी हमें निन्दा से दूर रहना है, और परमेश्वर का आदर करना है। यह सब तो सहज ही मान लिया जाएगा। परन्तु एक पीछे की ओर देखना है जिसे हमने नहीं समझा, वह यह है, “तू लालच न करना” या लालसा न करना: वह एक गुप्त चुटकी है। सच है कि वह बहुत बड़ी या भारी नहीं लगती: फिर भी वह ऐसा डंक है जो काटने में सब से बढ़कर है। क्योंकि अपनी व्यवस्था की समाप्ति और उपसंहार के द्वारा परमेश्वर मनुष्य में जो कुछ है, सब खोज निकालता है। वह उस आज्ञा को इसलिए रखता है कि छिपी हुई बातों को परखे: और जब वह कहता है, “तू लालच न करना,” तो वह मनुष्यों की हड्डियों के गूदे तक बेध देता है। इसलिए सन्त पौलुस मानता है कि वह नहीं जानता था कि पाप क्या है, जब तक उसने न समझा कि उस आज्ञा का क्या अर्थ है जो मनुष्यों को लालच या लालसा करने से रोकती है। और इसलिए इस पाठ में वह इसका दोष सुसमाचार पर नहीं, वरन् व्यवस्था पर लगाता है। इसलिए इस पाठ पर हम स्मरण रखें कि जो भी अपनी योग्यताओं की किसी धारणा से अपने आप को धोखा देते हैं, उन्होंने कभी नहीं चखा कि परमेश्वर की व्यवस्था क्या है, और उसका क्या अर्थ है: मैं उन सबसे बड़े आचार्यों की बात कहता हूँ जो सबसे अधिक मान्य हैं, जैसा (सच्चाई से कहें तो) पोपतन्त्र में देखा जा सकता है। क्योंकि जो कलीसिया के खम्भे समझे जाते हैं, वे भी (यद्यपि वे ईश्वरविज्ञान का दावा करते हैं) परमेश्वर की व्यवस्था का एक शब्द भी नहीं जानते कि उसे उसके सच्चे और स्वाभाविक उपयोग में लाएँ। क्योंकि उनमें कपट के सिवा कुछ नहीं है, और वे अपने आप को यह विश्वास दिलाते हैं कि वे परमेश्वर को झुनझुने से प्रसन्न कर लेंगे, मानो वह कोई नन्हा बच्चा हो। वे उसके साथ केवल खिलवाड़ करते हैं, फिर भी तुम उन्हें अपनी ही धारणाओं में इतने अड़े हुए देखोगे कि वे दोषी ठहराया जाना सह नहीं सकते। और यदि कोई उनसे कहे कि हमें अपना उद्धार यीशु मसीह में ढूँढ़ना चाहिए: हाँ, वे कहते हैं? तो फिर हमारी स्वतन्त्र इच्छा का क्या होगा? हमारी अपनी योग्यताओं और प्रायश्चित्तों का क्या होगा? उनके विचार में तो सूर्य को आकाश से, हाँ और परमेश्वर को भी उसके सिंहासन से, उखाड़ फेंकना उत्तम होगा, बजाय इसके कि मनुष्य को उस विशेषाधिकार से, या उस वस्तु से, जो वह परमेश्वर से समझौता करने के लिए अपने आप से ला सकता है, वंचित किया जाए और फिर भी निश्चय है कि उनमें निरी मलिनता के सिवा कुछ नहीं। क्योंकि लोग देखते हैं कि उनके जीवन में न परमेश्वर का भय है, न खराई, न न्याय, न कोई और [भली] बात। वे घमण्ड से ऐसे भरे हैं कि फटने को तैयार हैं, और वे डाह, कड़वाहट और सब प्रकार की उच्छृंखलता से भरे हैं। फिर भी वे परमेश्वर को अपने प्रति बँधा हुआ ठहराना चाहते हैं: पर इसका कारण यह है कि उन्होंने व्यवस्था को कभी जाना ही नहीं।
इसलिए जब हमारा प्रभु हमें सिखाता और दिखाता है कि हमें इस संसार में कैसे चलना चाहिए, तो आओ हम सीखें कि जो शिक्षा वह सामने रखता है और अपने जीवन को साथ-साथ रखकर देखें, और वहाँ हम व्यवस्था की सच्ची सिद्धता पाएँगे, और यह भी कि हम में भयानक गड़बड़ के सिवा कुछ नहीं: हम नरक को अपने लिए तैयार देखेंगे। इस रीति से हमारे लिए यह सहज हो जाएगा कि हम वह सारी योग्यता छोड़ दें जो हमने अपने में कल्पित कर रखी थी, ताकि वह शीघ्र ही गिरा दी जाए, और हमारे मुँह बन्द कर दिए जाएँ, और हम बिना साँस के बेचारे मरे हुए लोगों के समान हो जाएँ, क्योंकि हम भली-भाँति देख लेंगे कि हम परमेश्वर के पास नहीं आ सकते, वरन् यदि हम अपनी योग्यताओं की कोई मूर्खतापूर्ण कल्पना लाएँ तो वह हम पर अवश्य गरजेगा। देखो, व्यवस्था हमें कैसे मार डालती है। परन्तु जब हम ऐसी मृत्यु से होकर निकल चुके हों, अर्थात् जब हम ठीक रीति से दीन हो चुके हों और पूरी तरह घबरा गए हों: तब यहाँ एक उपाय है जो सन्त पौलुस बताता है, जब वह कहता है: “मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ, कि परमेश्वर के लिए जीवित रहूँ।” अब वह यहाँ दिखाता है कि हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें न केवल हमारे पापों की क्षमा देता है, वरन् अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें पवित्र भी करता और नया जन्म भी देता है, यहाँ तक कि जहाँ पहले हम में हठ के सिवा कुछ नहीं था, अब हमें परमेश्वर की सेवा करने और उसे प्रसन्न करने की लगन दी जाती है। और जो कुछ सन्त पौलुस हमें बताता है उसे और भली-भाँति समझने के लिए, आओ ध्यान दें कि हमें अपने प्रभु यीशु मसीह से दो मुख्य अनुग्रह मिलते हैं: एक है हमारे पापों की क्षमा, जिससे हमें अपने उद्धार का निश्चय होता है, और हमारे विवेक को शान्ति मिलती है, और जिस पर हमें दृढ़ किया जाना चाहिए, ताकि हम परमेश्वर को अपना पिता कहकर पुकारें। कौन हमें यह साहस देता है कि हम अपने सिर स्वर्ग की ओर उठाएँ, और परमेश्वर को अपना पिता कहें? फिर, कौन हमें इतना निडर बनाता है कि हम इस बात पर घमण्ड करें कि हम स्वर्गदूतों के साथी और भाई हैं? यह इसलिए है कि हमारे पाप लेखे में नहीं आते: क्योंकि हमें सदा उनके धुल जाने की ओर लौटना है, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग से हुआ। तो तुम देखते हो कि हमारी धार्मिकता यह है कि परमेश्वर हमें ग्रहण करता है, यद्यपि हमारी अपनी योग्यता के कारण नहीं, परन्तु हमारे प्रभु यीशु मसीह की आज्ञाकारिता के कारण, जिसके द्वारा हमारे सारे कुकर्म मिटा दिए जाते हैं। यह वह पहला लाभ है जो हमें अपने प्रभु यीशु मसीह से मिलता है।
दूसरा यह है कि जबकि हम अपने स्वभाव से हठीले हैं, और जिसे पोपवादी स्वतन्त्र इच्छा के नाम से पुकारते हैं वह केवल उन्माद है, और मनुष्य अपने विषय में चाहे जितना बड़ा मूल्य रखें, सब निकम्मापन ही है, और हम दुर्गुण और भ्रष्टता से भरे हैं: वैसा रहने के बजाय हमारा प्रभु यीशु मसीह हमें यह अनुग्रह देता है कि हम अपने पापों पर शोक करें, और भलाई करने का परिश्रम करें: क्योंकि जब तक हम अपने स्वभाव में बने रहते हैं, हम में से हर एक अपनी बुराई में अपने आप को सहलाता और फुसलाता है। परन्तु जब हम एक बार अपने परमेश्वर के अथाह प्रेम का स्वाद चख लेते हैं, और जान लेते हैं कि हमारा प्रभु यीशु मसीह कौन है: तब हम उसके पवित्र आत्मा से ऐसे छू जाते हैं कि हम बुराई को दोषी ठहराते हैं, और परमेश्वर के निकट आना और अपने आप को उसकी पवित्र इच्छा के अनुसार ढालना चाहते हैं। हम एक बार इस बात के निश्चित हो जाते हैं, और यद्यपि हम लंगड़ाते हुए चलते हैं, तौभी हम निरन्तर अपनी अपूर्णताओं और निर्बलताओं को देखकर आहें भरते हैं, और भली-भाँति जान लेते हैं कि परमेश्वर का आत्मा ही हमें इसके लिए प्रेरित करता है, जब हमारी मुख्य इच्छा यह होती है कि हम उस पापमयता को छोड़ दें जो हम में है और हमारे शरीर से आती है, ऐसा कि हम और कुछ नहीं चाहते सिवाय इसके कि हमारे सारे जीवन में परमेश्वर की महिमा हो, और सब बातों में विश्वासयोग्यता से उसकी आज्ञा मानी जाए। यह दूसरा लाभ है जो हमारा प्रभु यीशु मसीह हमारे लिए लाता है: और ये दोनों बातें ऐसे अटूट बन्धन से जुड़ी हैं कि जैसे सूर्य का प्रकाश उसकी गर्मी से अलग नहीं किया जा सकता: वैसे ही ये दोनों अनुग्रह (अर्थात् हमारी धार्मिकता और हमारे पापों की क्षमा) हमारे नए किए जाने से, जो पवित्र करने वाले आत्मा के द्वारा होता है, अटूट रीति से जुड़े हैं। इस प्रकार तुम दो अटूट अनुग्रह देखते हो: और जैसे जब हम कहते हैं कि सूर्य गर्म है, तब भी वह चमकना नहीं छोड़ता, और फिर भी सूर्य का प्रकाश गर्मी नहीं है: वैसे ही जब हम कहते हैं कि हम पापों की क्षमा से धर्मी ठहराए जाते हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि हमारा प्रभु यीशु मसीह उसके बाद अपना उपहास और अनादर होने देता है, परन्तु यह कि हमें भली-भाँति शुद्ध किए जाने की आवश्यकता है, ताकि हम संसार और अपने आप को त्यागना सीखें, और सच्ची आज्ञाकारिता के साथ उससे लगे रहें। संसार चाहे जैसा चले, जो बात सन्त पौलुस इस पाठ में कहता है वह सदा सच पाई जाएगी, अर्थात् कि वह मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया, कि परमेश्वर के लिए जीवित रहे। तो यदि कोई सुसमाचार पर यह दोष लगाए कि वह बुराई और पाप करने की स्वतन्त्रता देता है: तो हम सदा यह उत्तर दे सकते हैं, कैसे? व्यवस्था के द्वारा तो हम सदा मरे हुए हैं, क्योंकि वहाँ हम अपनी शापित दशा देखते हैं जो हमें निराशा में घबराया हुआ छोड़ देगी। परन्तु सुसमाचार में, यद्यपि हम क्रूस पर चढ़ाए जाते हैं, अर्थात् यद्यपि सुसमाचार में मृत्यु का कुछ अंश है, तौभी वह मृत्यु जिलाने वाली मृत्यु और जीवन का कारण है। क्योंकि जब तक मनुष्य अपने लिए जीते हैं, वे परमेश्वर के लिए मरे हुए हैं: वे सड़न से भरी अभागी लाशें हैं। परन्तु जब वे अपने में मरते हैं, तब वे परमेश्वर के लिए जीते हैं।
और इसी कारण सन्त पौलुस रोमियों के बारहवें अध्याय में हमें जीवित बलिदान कहता है, जहाँ वह हमसे कहता है कि हमें रूपान्तरित होना है और अपनी बुद्धि और अपनी इच्छा को पूरी तरह छोड़कर परमेश्वर को वैसी सेवा देनी है जैसी उसे मिलनी उचित है। वह कहता है, “अपने आप को जीवित बलिदान करके चढ़ाओ।” इसलिए व्यवस्था में तो अवश्य प्राणघातक मृत्यु है, ऐसी मृत्यु जो हमें पूरी तरह दबा और नरक तक डुबा छोड़ती है। परन्तु सुसमाचार में जिलाने वाली मृत्यु है। और क्यों? क्योंकि हम मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाए गए हैं, कि परमेश्वर के लिए जीवित रहें, अर्थात् हमारा पुराना मनुष्यत्व (जैसा सन्त पौलुस उसे रोमियों के छठे अध्याय में कहता है) और जो कुछ हम में अपने स्वभाव का है, वह मिटा दिया जाता है, यद्यपि पहले ही दिन नहीं, वरन् थोड़ा-थोड़ा करके। परन्तु चाहे जैसी दशा हो, हम देखेंगे कि हमारा प्रभु यीशु मसीह वह सब मार डालता है जो हम में अपना था, या संसार का था, ऐसा कि हम यहाँ नीचे घर बसाने में इतने लगे नहीं रहते, क्योंकि हम देखते हैं कि यहाँ जीना दुःख की दशा है, और हमारी अपनी चिन्ता परमेश्वर से लगे रहने की होती है। इस प्रकार तुम देखते हो कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के साथ कैसे क्रूस पर चढ़ाए जा सकते हैं।
परन्तु उस क्रूस पर चढ़ाए जाने का अर्थ क्या है? निश्चय ही यह एक प्रकार की मृत्यु है। फिर भी वह मृत्यु हमें जीवन में पहुँचाती है, जो वह मृत्यु नहीं करती जो व्यवस्था लाती है। अब हम सन्त पौलुस का सच्चा अभिप्राय और इस पाठ का स्वाभाविक अर्थ देखते हैं। इसलिए आजकल जब सत्य के शत्रु सुसमाचार की निन्दा करते हैं, तो उनके मुँह बन्द करने के लिए हमारे पास यहाँ उत्तर है। और यदि वे फिर भी लगे रहें, तो कुत्तों के समान भौंकते रहें, पर वे जो भी करें काट नहीं सकेंगे। देखो, जब हम प्रचार करते हैं कि मनुष्य परमेश्वर की सेंतमेंत भलाई से धर्मी ठहराए जाते हैं, तब पोपवादी क्या उगलते हैं। वे कहते हैं, “अरे! क्या ऐसा है? तो यह तो हर मनुष्य को अपनी इच्छा के अनुसार जीने की लगाम देने और ऐसा करने का सबसे निकट मार्ग होगा कि विवेक में न कोई पछतावा रहे न कोई खटका, ताकि हर मनुष्य को जो जी में आए वह करने की छूट हो।” यह पोपवादियों की सर्वसाधारण निन्दा है।
फिर, जब हम उन्हें दिखाते हैं कि वे हमें अपनी परम्पराओं से नहीं बाँध सकते, और कि यह तो वह अत्याचार है जो उन्होंने परमेश्वर को उसके अधिकार से लूटकर हथिया लिया है, और कि वह स्वतन्त्रता हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमारे लिए मोल ली, ताकि हम उन बातों से बँधे न रहें जो मनुष्य हमारी आत्माओं के आत्मिक शासन के विषय में व्यवस्था और आवश्यकता के रूप में हम पर लादना चाहते हैं। तो वे कहते हैं, “अरे! देखो इसका परिणाम क्या निकलता है: इनकी चाह तो सब सुख-भोगों में लोटने और उच्छृंखल जीवन बिताने के सिवा और कुछ नहीं।” निश्चय ही, हम इन सब का उत्तर सहज ही दे सकते हैं। क्योंकि जो शिक्षा हम लाते हैं वह मनुष्यों की अभिलाषाओं को उभारने, या उन्हें बहुत बड़ी और निरंकुश स्वतन्त्रता देने के लिए नहीं, वरन् ठीक इसके विपरीत है।
परन्तु चाहे जो हो, हमारे लिए यह पर्याप्त होना चाहिए कि यदि हम पोपवादियों के दलदल में पड़े रहें, तो निश्चय हमारे लिए मृत्यु के सिवा कुछ न होता। क्योंकि यदि वे इतनी गहरी नींद में सोए और पूरी तरह मन्दबुद्धि न होते, तो निःसन्देह वे ऐसी बेचैनी और हृदय की कचोट से झकझोरे जाते कि उन्हें देखना पड़ता कि वह ऐसी वस्तु नहीं जिस पर हम विश्राम करें। परन्तु देखो, वे अपनी अज्ञानता में ऐसे सड़ चुके हैं कि उन्हें परमेश्वर के न्याय का कुछ भी बोध नहीं। परन्तु जहाँ तक हमारी बात है, क्योंकि हम जानते हैं कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमारे लिए ऐसी स्वतन्त्रता मोल ली है, और अपने उद्धार के विषय में निश्चित हैं क्योंकि परमेश्वर हमारे सब दोष सेंतमेंत क्षमा करता है, और परमेश्वर के पवित्र आत्मा के कार्य से अभी अनुभव करते हैं कि वह हमें अपनी ओर खींचता है, और उसके लिए जीने को मरे हुए किए गए हैं: आओ हम प्रफुल्ल हृदय से आगे बढ़ें।
और यद्यपि हमारे स्वभाव में कितनी ही निर्बलताएँ क्यों न हों, तौभी आओ हम सन्देह न करें कि परमेश्वर हमारी सब अपूर्णताओं के होते हुए भी हमें ग्रहण करता है। परन्तु पोपवादियों में परमेश्वर की सेवा करने का एक भी भला संकल्प नहीं हो सकता, सिवाय इसके कि वे व्यर्थ आत्म-भरोसे के द्वारा [ऐसा मानने के लिए] पूरी तरह मोहित हैं। और क्यों? क्योंकि वे अपनी ही योग्यताओं पर टिके हैं, और (उनके विचार में) अनुग्रह मोल लेने का यही उपाय है। परन्तु वे कर ही क्या सकते हैं? मान लो कि वे जितना उनके पास है उससे सौ गुना अधिक लाते, और परमेश्वर उन्हें अपने पवित्र आत्मा से चलाता, ऐसा कि उन्हें सुसमाचार का कुछ अनुभव होता, चाहे वह आधा ही अनुभव होता: तौभी वे परमेश्वर के प्रति अपना कर्तव्य पूरा करने से, हाँ उसके सौवें अंश से भी, बहुत पीछे रह जाते। परन्तु इस बीच यह भली-भाँति जाना हुआ है कि वे जो कुछ करते हैं वह निरा तुच्छ कूड़ा है: और जहाँ तक परमेश्वर की व्यवस्था की बात है, उनके यहाँ उसका कोई मूल्य नहीं, और फिर भी इस बीच वे अपनी ही गढ़ी हुई बातों में अपने सिर खपाते हैं।
फिर भी, मान लो कि उन्होंने परमेश्वर के भय में चलने का यत्न किया, और ठीक रीति से सीख लिया कि परमेश्वर उन्हें क्या करने की आज्ञा देता है: तौभी वे यह घमण्ड नहीं कर सकते कि वे उस धार्मिकता की सिद्धता तक पहुँच गए हैं जो परमेश्वर हम से चाहता है। और जब वे अपने आप को कितना ही सता चुके हों, तब भी वे परमेश्वर की सेवा प्रफुल्ल साहस से कैसे कर सकेंगे, जब तक वे यह न जानें कि वे उसकी कृपा में हैं, इस पर भी कि वे उसके सामने इतने दोषी हैं? परन्तु जहाँ तक हमारी बात है, हम अपनी ओर से परमेश्वर की सेवा स्वतन्त्र हृदय से कर सकते हैं, यद्यपि हमारे विवेक हम पर दोष लगाते हैं, और हम जानते हैं कि हम में बहुत पाप हैं। और क्यों? क्योंकि हम अपनी योग्यताओं पर नहीं, वरन् परमेश्वर की केवल दया पर टिके हैं: और उसी से हमें सिखाया जाता है कि परमेश्वर हमारे कामों को ग्रहण करता है यद्यपि उनमें बहुत दोष हैं, और कि हम उसकी कृपा में हैं यद्यपि हम में बहुत दुर्गुण और कलंक हैं।
और इसी कारण वह अपने भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहता है कि जो सेवा हम उसकी करते हैं उसे वह ऐसे ग्रहण करेगा जैसे पिता अपने बच्चे की सेवा ग्रहण करता है। तुम देखते हो कि बच्चा अपने पिता की आज्ञा मानने को तैयार रहता है: और जब उसका पिता उससे कहता है, यह करो: तो पिता उसके किए को भला मानता है, यद्यपि बच्चा नहीं जानता कि वह क्या कर रहा है, हाँ और कभी-कभी वह कोई वस्तु बिगाड़ भी दे, तौभी पिता उस वस्तु की हानि सह लेने में सन्तुष्ट रहता है जब वह देखता है कि बच्चा उसकी सेवा करने को इच्छुक और उत्सुक था। परन्तु यदि कोई मनुष्य वेतन पर नौकर रखता है, तो वह चाहेगा कि वह अपना काम पूरा करे। और क्यों? क्योंकि वह अपने वेतन की आशा रखता है: और कोई मनुष्य यह सहना नहीं चाहेगा कि उसके हाथ में सौंपा हुआ काम बिगाड़ दिया जाए: हाँ और यदि वह भली-भाँति न किया गया हो, तो वह उससे सन्तुष्ट न होगा। अब हमारा प्रभु सुसमाचार के अनुग्रह की चर्चा करते हुए कहता है कि वह हमारी सेवाओं को ऐसे ग्रहण करेगा जैसे पिता अपने बच्चे की आज्ञाकारिता ग्रहण करता है, चाहे वह जो कुछ भी करे उसका कुछ मूल्य न हो: अर्थात् वह उनमें जो सिद्धता है उसकी रत्ती भर परवाह नहीं करता, क्योंकि उनमें वह कोई सिद्धता पाएगा ही नहीं: परन्तु वह अपनी भलाई से हमें सह लेता है। वह हम पर ऐसा कृपालु और उदार हृदय दिखाता है कि हम जो कुछ भी करें, वह उसे भला मानकर ग्रहण करता है, यद्यपि वह इस योग्य नहीं, और न उसके योग्य ठहरता है। तो तुम देखते हो कि परमेश्वर की सेवा करने के लिए स्वतन्त्र साहस पाने का हमारे लिए यही मार्ग है कि हम अपने आप को निश्चय दिला लें कि वह हमारे सब कामों को आशीष देता है, क्योंकि उनमें जो कुछ भी दाग है, वह हमारे प्रभु यीशु मसीह के लहू से धो डाला जाता है।
संक्षेप में, जबकि परमेश्वर हम पर दयालु ठहरता है और अथाह दया करता है: तो आओ समझें कि वह यह इसलिए नहीं करता कि हम में से हर कोई इधर-उधर उछलता-कूदता फिरे, और लगाम दाँतों में दबा ले, और छूटे हुए घोड़े का सा खेल खेले: नहीं, नहीं, वरन् इसके विपरीत यह इसलिए है कि परमेश्वर के वचन की तलवार हमारे हृदय को बेधे, और वहाँ ऐसी जाँच करे कि हम ठीक रीति से दीन होकर परमेश्वर से क्षमा माँगें। इसलिए नहीं कि हम में वह हृदय की कचोट हो जो पोपवादियों में है, जो हमें पीछे खींचती और परमेश्वर के पास आने से रोकती, और हमसे कहलवाती कि अभागे प्राणी, तू क्या कर रहा है? तू कैसे जान सकता है कि परमेश्वर तुझ से प्रेम रखता है या नहीं? हम में ऐसी चुटकियाँ न हों, वरन् हम पूरी रीति से निश्चित हों कि परमेश्वर हमें दया की दृष्टि से देखता है, और हमारे कामों को भला मानकर ग्रहण करता है: इसलिए नहीं कि उनमें उसे कोई योग्यता या मूल्य मिलता है, परन्तु इसलिए कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह से जुड़े हैं।
अब इसलिए हम देखते हैं कि सन्त पौलुस का कहने का क्या अभिप्राय था। हम यह भी देखते हैं कि वह शिक्षा केवल उसी समय के लिए नहीं थी: वरन् वही आज हमारे लिए उतनी ही लाभदायक और आवश्यक है जितनी [किसी के लिए पहले] कभी रही। क्योंकि जब परमेश्वर के शत्रु सुसमाचार से लड़ते हैं और अपनी निन्दाएँ उगलते हैं: तो हमारे लिए आवश्यक है कि हमारे पास उनका सामना करने के साधन हों: और केवल उनका ही नहीं, वरन् शैतान का भी, जिसे सदा से यह चाल आती रही है कि वह हमें मनुष्यों की यह बात मनवाए कि वे अपने आप से और अपनी ही योग्यताओं से जी सकते हैं: परन्तु यह तो हमें मृत्यु में सुला देना मात्र है।
और इसलिए आओ हम अपने आप को निश्चय दिला लें कि हमारे लिए व्यवस्था के प्रति मरना उसके लिए जीने से उत्तम है: अर्थात् आओ हम निश्चय जान लें कि यदि परमेश्वर हम से लेखा लेने बैठे, तो हम सर्वथा नष्ट और दोषी ठहरेंगे। और ऐसे घबराए हुए होकर, आओ हम अपने आप को अपने प्रभु यीशु मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ने दें: और क्योंकि हम जानते हैं कि उसने अपने चढ़ाए हुए बलिदान के द्वारा हमें अपने पिता परमेश्वर से मिला दिया है, आओ हम अपने आप को उसके पवित्र आत्मा से शासित होने दें, और उसके द्वारा ऐसे नए किए जाने दें कि अपने में मरे हुए होकर हम सच्चाई से परमेश्वर के लिए जीवित रहें, अपनी धार्मिकता के सारे घमण्ड को छोड़कर, और अपने शरीर की सब अभिलाषाओं से लड़ते हुए, और अपने आप को संसार से अलग करते हुए।
और अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने पापों को मानते हुए गिर पड़ें, उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उनका ऐसा बोध कराए कि वह हमें उस मलिनता से, जिसमें हम डूबे हैं, पीछे खींच ले, और हमें अपने प्रभु यीशु मसीह से ऐसा जोड़े कि वह हमें परमेश्वर अपने पिता की ओर खींचे, और हमें उसके और निकट, और निकट आने दे, जब तक हम पूरी तरह उससे जुड़ न जाएँ। और इस प्रकार हम सब कहें, सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता, इत्यादि।
