अध्याय 36

चौंतीसवाँ उपदेश, जो पाँचवें अध्याय पर चौथा है - गलातियों 5:11-14

Sermons upon Galatians · John Calvin

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चौंतीसवाँ उपदेश, जो पाँचवें अध्याय पर चौथा है - गलातियों 5:11-14

जो पाँचवें अध्याय पर चौथा है।

11 हे मेरे भाइयो, यदि मैं अब भी खतना का प्रचार करता हूँ, तो अब तक सताया क्यों जाता हूँ? [क्योंकि] ऐसा होने से तो क्रूस की ठोकर जाती रही।

12 भला होता कि जो तुम्हें घबरा देते हैं, वे काट डाले जाते।

13 हे मेरे भाइयो, तुम स्वतंत्र होने के लिये बुलाए गए हो; परन्तु ऐसा न हो कि यह स्वतंत्रता शरीर के लिये अवसर बने, वरन् प्रेम से एक दूसरे के दास बनो।

14 क्योंकि सारी व्यवस्था इस एक ही वचन में पूरी हो जाती है, और वह यह है, “तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।”

देखा जाता है कि मनुष्य अपने सब कामों में अपने लाभ के ऐसे वशीभूत हैं कि वे सदा न्याय और खरेपन का विचार किए बिना टेढ़े-मेढ़े और आड़े-तिरछे झुक जाते हैं। क्योंकि मनुष्यों का लोभ, और अपने लाभ या अपने सुख-चैन का जो ध्यान उन्हें रहता है, उनकी आँखों को ऐसा अन्धा कर देता है कि उन्हें कुछ सूझता ही नहीं। विशेषकर जब परमेश्वर का वचन दूर-दूर तक पहुँचाया जाना हो, तब यदि कोई मनुष्य अपने आप को न भूले, और उन बातों के विरुद्ध अपनी आँखें बन्द न कर ले जो इस संसार में उसे परमेश्वर के सम्मुख शुद्धता से चलने से फेर सकती हैं, तो वह निश्चय ही अपनी राह पर कभी स्थिर नहीं रहेगा, वरन् सदा कभी इधर और कभी उधर भटकता रहेगा। इसी कारण परमेश्वर की शिक्षा प्रायः बिगाड़ दी जाती है, क्योंकि जिन्हें उसे दूर-दूर तक पहुँचाना चाहिए, वे या तो बैर की ओर या पक्षपात की ओर झुके रहते हैं, और अपने लिए कुछ अप्रसन्नता मोल लेने या अपने विरुद्ध कुछ क्रोध भड़काने से डरते हैं।

इसलिए अपनी बुलाहट की अवस्था में परमेश्वर की शुद्ध सेवा करना असम्भव है, जब तक कि हम पूरी तरह, वरन् अजेय दृढ़ता के साथ यह निश्चय न कर लें कि जिस शिक्षा को हम दूर-दूर तक पहुँचाते हैं उसके लिए यदि हमें दुःख उठाना पड़े तो हम खेद न करेंगे; परन्तु अपने सेनापति यीशु मसीह के झण्डे के नीचे साहस के साथ लड़ेंगे, यह जानते हुए कि हम उसके पुनरुत्थान की महिमा तक नहीं पहुँच सकते, जब तक उसके उदाहरण के अनुसार पहले उसके साथ दुःख न उठाएँ। विश्वासियों को अपने आप को इसी के अनुसार ढालना पड़ता है। परन्तु उन लोगों की स्थिति जिन्हें शिक्षा देनी है और जिनके पास परमेश्वर का वचन सुनाने का काम है, और भी विशेष है; क्योंकि निश्चय है कि शैतान सदा हमारा हियाव तोड़ने का यत्न करता रहता है, और इस संसार में उसे सहायक भी बहुत मिल जाएँगे, क्योंकि बहुत से ऐसे हैं जो यह सह नहीं सकते कि परमेश्वर का वचन शुद्धता और बिना मिलावट के सुनाया जाए। वे खुले मुँह से तो यह नहीं कहेंगे कि परमेश्वर के नाम को गाड़ देना चाहिए; परन्तु फिर भी वे अपनी रुचि के अनुसार शिक्षा का कोई ढंग गढ़ लेना चाहेंगे। अतः अब हमारे लिए आवश्यक है कि हम सीधे-सादे मन से केवल उसी पर दृष्टि रखें जिसकी परमेश्वर आज्ञा देता है, और उसके लिए अपने आप को भली-भाँति कठोर बना लें: जैसा कि हम देखते हैं कि यिर्मयाह को लड़ने की आज्ञा दी गई, और परमेश्वर ने उसे पीतल का माथा देने की प्रतिज्ञा की, ताकि वह उन पर टक्कर मारे जो उस पर चढ़ाई करने आएँ। और इसी कारण सन्त पौलुस अब कहता है कि यदि वह खतना का प्रचार करना चाहता, और वैसी खिचड़ी बना लेता जैसी धोखा देनेवाले बनाने का यत्न कर रहे थे, तो वह सब कष्टों से अपना पिण्ड छुड़ा लेता, और हर एक मनुष्य से अपने लिए तालियाँ बजवा लेता, या कम से कम इतना तो कर ही लेता कि कोई उसे न सताता और न उसे तंग करता। क्योंकि यहूदी इस बात को सहज ही मान लेते कि यीशु मसीह का प्रचार किया जाए, यदि वे प्राचीनों की व्यवस्था को बनाए रख पाते, और रीतियाँ पहले की तरह चलती रहतीं, और अन्यजाति के लोग असमय जन्मे हुए बच्चों के समान उनके पीछे-पीछे पंक्ति बाँधकर चले आते। तो देखिए कि यहूदियों की इच्छा क्या थी। सन्त पौलुस ऐसा करके उन्हें भली-भाँति प्रसन्न कर सकता था, परन्तु वह तो विश्वासयोग्यता और सच्चाई से परमेश्वर की सेवा करना चाहता था।

परन्तु इसके विपरीत सन्त पौलुस दिखाता है कि जो लोग उस शिक्षा को उलट देने का परिश्रम कर रहे थे जिसका उसने प्रचार किया था, वे अपना कर्तव्य निभाने की अपेक्षा मनुष्यों की कृपा और मित्रता को अधिक खोजते थे। अब हम देखते हैं कि इस वचन का क्या अर्थ है जहाँ वह कहता है, “हे मेरे भाइयो, यदि मैं अब भी खतना का प्रचार करता हूँ,” अर्थात् यदि मैं खिचड़ी बनाने के लिए सहमत हो जाता, कि यीशु मसीह को छिपा दिया जाए और हर एक मनुष्य को वही मिल जाए जो वह माँगे: तो कोई मुझ से और अप्रसन्न न होता, मैं सब कहीं स्वागत पाता, और इससे मेरी साख बनती। परन्तु अब, क्या यह सम्भव है कि मैं सारे संसार से ठनाठनी करूँ, और वह भी इस उद्देश्य से कि मुझे यातना दी जाए? तो एक ही बात में देख लो कि मैं अपना लाभ नहीं खोजता। क्योंकि इन भले-भले उपदेशकों को ऐसी खिचड़ी बनाने के लिए और किस बात ने उभारा है, जैसी तुम देखते हो, सिवाय इसके कि वे हर मनुष्य को प्रसन्न करना चाहते हैं, और नहीं चाहते कि कोई किसी रीति से उन्हें तंग करे? जब उनकी खोज सुख-चैन और सुविधा की है, तो तुम्हें उन पर सन्देह करना उचित ही है।

अब हम यहाँ एक ओर वह बात देखते हैं जिसे मैंने अभी थोड़ी देर पहले छुआ था: अर्थात् जितने लोग परमेश्वर के वचन के प्रचार के लिए उसकी ओर से बुलाए गए हैं, उन सब को इस पर पूरी तरह दृढ़ निश्चय कर लेना चाहिए कि चाहे सारा संसार उनके विरुद्ध उठ खड़ा हो, तौभी वे न झुकेंगे, वरन् सब आक्रमण सह लेंगे, भली-भाँति निश्चित जानते हुए कि परमेश्वर आवश्यकता के समय उन्हें संभालेगा, और सदा उन्हें जय देगा, यदि वे खरे सीधेपन के साथ अपनी बुलाहट पर चलते रहें।

क्योंकि हम परमेश्वर का इससे बड़ा अपमान और अनादर नहीं कर सकते कि उसके वचन से दाएँ या बाएँ मुड़कर अपने आप को मनुष्यों की रुचि के अधीन कर दें। और न हमारे लिए यह उचित है कि अपने कर्तव्य का कोई अंश अधूरा छोड़ दें, वरन् हमें परमेश्वर की सच्चाई को, जो अपरिवर्तनीय है और जिसे किसी भी रीति से बदलना नहीं चाहिए, दृढ़ता से थामे रहना चाहिए, चाहे मनुष्य कितने ही चंचल और अस्थिर क्यों न हों।

और यह बात भली-भाँति ध्यान देने योग्य है, क्योंकि यद्यपि मनुष्यों में कुछ भली इच्छा होती है कि परमेश्वर जाना जाए, और उसकी सच्चाई तदनुसार सुनाई जाए, तौभी अधिकांश लोग प्रायः तब झुक जाते हैं जब वे अपने ऊपर उठाई गई निन्दाएँ देखते हैं, और अपने विरुद्ध मनुष्यों की बड़बड़ाहट और कुड़कुड़ाहट सुनते हैं, विशेषकर जब कभी ऐसे बड़े झगड़े उठ खड़े होते हैं कि सब कुछ बिगड़ जाने को हो जाता है।

क्योंकि यदि हम परमेश्वर के मुकद्दमे का पक्ष वैसे लें जैसे हमें लेना चाहिए, तो निन्दक तुरन्त यह प्रचार कर देंगे कि हम हठी हैं। जैसे आज के दिन पोप-भक्त हम पर पहले तो बड़ी उतावली का दोष लगाते हैं कि हम (जो उनकी तुलना में मुट्ठी भर हैं, जबकि वे इतनी बड़ी भीड़ हैं, वरन् इतने अनुभवी लोग हैं जिन्होंने इतना कुछ देखा है, और जिनकी इतनी प्रतिष्ठा और सम्मान है) संसार की सब अवस्थाओं पर अधिकार जताने का साहस करते हैं; और दूसरे यह कि हम अति कठोर, वरन् अति ढीठ हैं, क्योंकि हम सब मनुष्यों के सिर अपनी कमरबन्द के नीचे रखना चाहते हैं, और इसके सिवा कुछ नहीं खोजते कि सब पर प्रभुता जमाएँ, और हर एक को अपने फन्दे के आगे झुका दें।

देखिए हम पर कैसी अन्यायपूर्ण निन्दा की जाती है। तौभी हमें इस निन्दा को निगल जाना चाहिए, परन्तु अपने कर्तव्य का कोई अंश छोड़ना नहीं चाहिए। क्यों? क्योंकि इस विषय में हमारे लिए ऐसा कोई समझौता करना उचित नहीं जैसा मनुष्य और मनुष्य के बीच किया जाता है। क्योंकि यदि दो पक्षों में किसी धनराशि या किसी भूमि के विषय में विवाद हो, तो पंच उस मामले को दोनों ओर इस प्रकार सुलझा सकता है कि उनके बीच शीघ्र मेल हो जाए।

परन्तु यदि हम परमेश्वर के शत्रुओं को उनकी माँग के अनुसार दे दें, विशेषकर उसकी हानि पर जो चाहता है कि उसका अपना अधिकार पूरी तरह बना रहे (जैसा कि उचित भी है), तो यह कैसी बात होगी? इसलिए हमारे लिए और भी आवश्यक है कि हम इस शिक्षा को भली-भाँति ध्यान में रखें, जहाँ सन्त पौलुस हमें बताता है कि परमेश्वर की सेवा करने के लिए हमें न कष्ट से, न तंग किए जाने से, न कुड़कुड़ाहट से, न निन्दाओं से, न किसी और बात से कतराना चाहिए, यहाँ तक कि यदि बात प्राण को जोखिम में डालने की आ पड़े, तौभी हमें उसे पूरा करना चाहिए।

और यद्यपि हम में बड़ी दुर्बलता है, तौभी यह विचार करें कि परमेश्वर हमें अपनी ओर बुलाता है, और वह हमारी सारी निर्बलता का उपाय करने में समर्थ है, और अन्त तक टिके रहने के लिए हमें पर्याप्त बल देने में भी। जैसी भी स्थिति हो, जब वह हमें अपनी सेवा में लगाता है (हमें, मैं कहता हूँ, जो अपने आप में कुछ भी नहीं हैं), तो हमें उसका इतना अनादर नहीं करना चाहिए कि उसे मनुष्यों की अभिलाषाओं के अधीन कर दें।

तो देखिए, पहले स्थान पर हमें क्या विचार करना है। इसके अतिरिक्त हमें यह भी चेतावनी दी जाती है कि उन सब पर सन्देह करें जो अपना ही लाभ और स्वार्थ खोजते हैं, और उन सब पर भी जो अपना रूप बदलते हैं, दो धाराओं के बीच नाव खेते हैं, और मनुष्यों को प्रसन्न करने के लिए बात-बात पर परमेश्वर की शुद्ध सच्चाई में मिलावट करते हैं। क्योंकि जैसा मैं आपसे पहले कह चुका हूँ, यदि हम सीधाई से परमेश्वर की सेवा करना चाहते हैं, तो हमें बहुत सी लड़ाइयों के लिए अपने आप को तैयार करना होगा।

और हमें इस वचन को स्मरण करना चाहिए जहाँ सन्त पौलुस ने कहा कि यदि उसका मन मनुष्यों को प्रसन्न करने का होता, तो उसे अनिवार्य रूप से अपने स्वामी प्रभु यीशु मसीह की सेवा छोड़नी पड़ती। क्योंकि जैसा मैं आपसे पहले कह चुका हूँ, शैतान चारों ओर से हम पर युद्ध करना नहीं छोड़ेगा; और फिर मनुष्य स्वभाव से ही इसके प्रति झुके हुए हैं: हर एक चाहता है कि उसे पुचकारा और सहारा दिया जाए, और उसके सब दोषों पर परदा डाला जाए।

संक्षेप में, ऐसा कोई नहीं जो यह न चाहे कि उसकी लापरवाही को पोषा और बनाए रखा जाए। इसलिए यदि हम मनुष्यों के मित्र बनकर अपने आप को उनकी इच्छाओं और अभिलाषाओं के अनुसार ढालें, तो यीशु मसीह का हम पर और कोई प्रभुत्व न रहेगा, और हम न केवल उसके लिए निकम्मे हो जाएँगे, वरन् सब कुछ के पूरे बिगाड़नेवाले भी बन जाएँगे।

अब इसलिए, जब हम देखते हैं कि जो लोग मसीही धर्म के लिए बड़ा उत्साह जताते हैं वे अपना ही लाभ खोजते हैं, तो आइए हम साहस के साथ यह निष्कर्ष निकालें कि वे किसी अधिकार के योग्य नहीं हैं। इसी प्रकार के वे लोग हैं जो आजकल पोपीय कुरीतियों को बनाए रखने के लिए भौंकते रहते हैं और सुसमाचार की शिक्षा की निन्दा करना नहीं छोड़ते, वरन् अन्धों और अज्ञानियों के बीच उसे बदनाम करने का परिश्रम करते हैं; और फिर भी उनमें से अधिकांश वास्तव में क्या खोजते हैं?

कुछ तो अपनी लाल टोपियों, सींगदार टोपों और क्रूसों के साथ अपनी पदवी को बनाए रखने के लिए; दूसरे शिकार के पीछे कुत्तों की भाँति उनके पीछे दौड़ते हैं, और ये बेचारे भूखे-नंगे उनकी चापलूसी में लगे रहते हैं ताकि उन्हें अपनी मज़दूरी मिले। इसके अतिरिक्त, इन तुच्छ कपटियों का, और मुण्डे सिरवालों की इस सारी डंक मारनेवाली और दुर्गन्धभरी टोली का जो कुछ भी किया जाता है (वे चाहे कोई भी बहाना बनाएँ), वह किसी और उद्देश्य की ओर नहीं जाता, केवल इसकी ओर कि उनकी थालियाँ सदा भरी रहें; सो उनकी सारी लड़ाई केवल उनके पेट के लिए है।

और बहुत से तटस्थ लोग भी हैं, जो इसमें सन्तुष्ट हैं कि सुसमाचार आधा-अधूरा सुनाया जाए, परन्तु उसे इतनी कठोरता और कड़ाई से अपनाया जाए, “अरे (वे कहते हैं) यह तो बिलकुल उचित नहीं, क्योंकि संसार इसे सह नहीं सकता। और क्यों न मनुष्य रीतियों को बहुत महत्त्व दें (वे कहते हैं)? यद्यपि वे अन्धविश्वासों और कुरीतियों से उपजी थीं, तौभी हमें इतने रूखेपन से काम नहीं लेना चाहिए: क्योंकि यह तो बहुत अड़ियलपन का व्यवहार होगा।”

इसलिए वे सब जो पोपवाद की गन्दी तलछट और बिगाड़ को जड़ तक कटते हुए सह नहीं सकते, वे निश्चय ही और किसी लक्ष्य पर नहीं, केवल इस पर दृष्टि रखते हैं कि उत्पीड़न से बचें और उससे दुबककर निकल जाएँ। और परमेश्वर करे कि इसके उदाहरण इतने अधिक न होते।

परन्तु आजकल तुम ऐसे असंख्य लोगों को देखोगे जो सब बातों में सुसमाचार का विरोध करने में लज्जित होते, और हमारे साथ यह कहने में भली-भाँति सहमत हो जाते हैं, “वास्तव में यह सच है, परन्तु फिर भी बहुत सी बातें सहन करनी पड़ेंगी, और हमें इस काम में कोमलता और नम्रता के साथ चलना चाहिए।” और उन्हें इस पर किस बात ने उभारा है? उनकी नींव क्या है? कृपया देखिए कि वे क्या तर्क देते हैं।

“अरे (वे कहते हैं) हम तो चारों ओर आग जलती देखते हैं: और यदि हम और झगड़े उठाएँ जो उन्हें और बढ़ा दें, तो यह कैसी बात होगी? ऐसा प्रतीत होगा कि हम जान-बूझकर उन्हें उकसाने पर तुले हैं जो पहले ही सुसमाचार के शत्रु हैं, और जिनके हाथ में तलवार है, और जो सब कुछ जड़ से उखाड़ फेंकने में समर्थ हैं: क्या यह अच्छा न होता कि कुछ समय तक बातों को सह लिया जाता, जब तक परमेश्वर अपनी कलीसिया को कुछ विश्राम न दे दे?”

इसलिए निश्चय है कि जो लोग उनसे युद्धविराम करना चाहते हैं जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के विरुद्ध खुलेआम लड़ते हैं, वे विश्वासघात से भरे हैं। और इस प्रकार इस पद पर ध्यान देने योग्य दूसरी चेतावनी तुम देख चुके।

इसके अतिरिक्त जब सन्त पौलुस कहता है कि क्रूस की ठोकर जाती रहेगी, तो उसका अर्थ यह है कि संसार सुसमाचार की शिक्षा को ठुकराने के लिए फिर इतना भड़केगा नहीं: क्योंकि जब हम क्रूस पर चढ़ाए गए यीशु मसीह का प्रचार बिना किसी मिलावट के सीधाई से करते हैं, तभी वह जान-बूझकर उसे क्रूस का प्रचार कहता है।

अब संसार सदा आडम्बर चाहता है, और सबसे पहले हम देखते हैं कि बहुत से मनुष्यों के कान खुजलाते हैं, और वे बस यही चाहते हैं कि लोग अलंकार-शास्त्र और रंगी-पुती बोली और ऐसी ही अन्य बातों में चमकें। फिर हम देखते हैं कि बहुत से लोग सुसमाचार की सादगी से लज्जित होते हैं, क्योंकि यदि बड़े और छोटे को एक साथ जोड़ दिया जाए, तो ऐसा प्रतीत हो सकता है कि वह सारी ऊँचाई को गिरा देने की ओर ले जाता है। और [वे सोचते हैं?] क्या मनुष्य इस रीति से अपनी सारी महिमा से लुटेरे जाएँ और छीन लिए जाएँ? इसलिए बहुत से लोग इससे लज्जित होते हैं।

अब इसी कारण सन्त पौलुस कहता है, “चलो, यह तो फाँसी के तख्ते या फन्दे का प्रचार है।” यह सच है: क्योंकि हमारे लिए स्वर्ग का राज्य खोलने के लिए परमेश्वर के पुत्र को हमारा श्राप सहना पड़ा, और वह मृत्यु भोगनी पड़ी जो मनुष्यों के सामने इतनी अपमानजनक है, वरन् व्यवस्था के वचन के अनुसार स्वयं परमेश्वर के मुँह से श्रापित भी होना पड़ा, “जो काठ पर लटकाया जाता है वह श्रापित है।”

तब हमारे प्रभु यीशु मसीह को उस स्थिति तक आना पड़ा, ताकि वह हमारा जमानतदार हो सके। संक्षेप में, वह मानो पूरी तरह कुचल दिया गया। और हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता यशायाह उसके विषय में कैसे कहता है, कि वह किसी बेचारे कोढ़ी के समान बिगड़ा हुआ रूप का था, यहाँ तक कि मनुष्य उसकी ओर देखना या उसे मनुष्यों की गिनती में गिनना भी स्वीकार नहीं करते थे। और हम यह भी देखते हैं कि 22वाँ भजन कैसे कहता है, “मैं तो कीड़ा हूँ, मनुष्य नहीं; मैं निम्नतम श्रेणी के लोगों तक के लिए भी ठट्ठा हूँ: यहाँ तक कि चोर ने भी उसका तिरस्कार और उपहास किया।”

तो फिर, पहली दृष्टि में यह शिक्षा ग्रहण करने के योग्य नहीं दिखती। परन्तु हमें स्मरण करना चाहिए कि सन्त पौलुस एक और पद में क्या कहता है: अर्थात् यह कि संसार ने सच्ची बुद्धि से परमेश्वर को नहीं जाना, और इसलिए उसे शिक्षा का दूसरा ढंग अपनाना पड़ा, जो मूर्खता के द्वारा है। क्योंकि यदि हम सचमुच बुद्धिमान होते, जैसा कि हम समझे जाना चाहते हैं, तो आकाश और पृथ्वी को देखने में ही हमारे पास जितनी अच्छी शिक्षा हो सकती है, उतनी है। वहाँ हम एक दर्पण देखते हैं जिसमें परमेश्वर हमें अपनी अपार भलाई, सामर्थ्य, धार्मिकता, दया और बुद्धि दिखाता है। और इस प्रकार हम वहाँ परमेश्वर की बुद्धि के बड़े भण्डार देखते हैं, जिन्हें देखकर हमारी बुद्धि आश्चर्य से मोहित हो जानी चाहिए।

परन्तु इससे किसका भला होता है? वरन् इसके विपरीत हम देखते हैं कि मनुष्य परमेश्वर के उपकारों को जोड़-तोड़कर उनसे अपने पेट भर लेते हैं, और उसके विषय में बिलकुल नहीं सोचते, और केवल इतना ही नहीं, वरन् उसी के विरुद्ध लात भी मारते हैं जिसने उन्हें पाला-पोसा है। और जब वे समझते हैं कि परमेश्वर की सेवा कर रहे हैं, तब वे उस आदर को छीन लेते हैं जो उसका है, और अपनी कल्पना के अनुसार मूरतें खड़ी करते हैं।

इसलिए जब संसार ने सच्ची बुद्धि से और प्रकृति के क्रम से परमेश्वर को नहीं जाना, तो परमेश्वर को दूसरा मार्ग आज़माना पड़ा, जैसा उसने किया भी। क्योंकि यदि हम अपनी स्वाभाविक बुद्धि के अनुसार न्याय करें, तो यह कहना एकदम मूर्खता है कि परमेश्वर का पुत्र, जो स्वर्गदूतों का सिरमौर, महिमा का प्रभु, जीवन का सोता, और वह जन है जिसकी सारी प्रभुता है, न केवल मरणशील मनुष्य बना और हमारी दशा पहन ली, परन्तु (जैसा सन्त पौलुस फिलिप्पियों के दूसरे अध्याय में कहता है) पूरी तरह दीन भी किया गया, वरन् हमारे श्राप के अधीन हुआ, और पाप का नाम उठाया, जो इससे भी बढ़कर है।

जब कोई मनुष्य हम से ऐसी भाषा में बात करता है, तो वह हमें अवश्य अनोखी लगेगी, जैसी वह वास्तव में है। परन्तु हमें पूरी दीनता से अपने आप को अधीन करना और यह विचार करना चाहिए कि क्योंकि हमने उन बातों से लाभ नहीं उठाया जो परमेश्वर ने आरम्भ से स्वर्ग और पृथ्वी दोनों में हमें दिखाईं, इसलिए हमें इस दूसरी पाठशाला में आना पड़ा।

इस प्रकार इस प्रसंग के विषय में इतना, जहाँ सन्त पौलुस कहता है, “ऐसा होने से तो क्रूस की ठोकर जाती रही।” परन्तु संक्षेप में, हमें इस पाठ से यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि यदि हमारी समझ के अनुसार सुसमाचार में कोई बेतुकापन हो, तो उससे हमारा उसके प्रति स्वाद नहीं बिगड़ना चाहिए, वरन् हमें विचार करना चाहिए कि परमेश्वर हमारी आज्ञाकारिता को परखना चाहता है, हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु की ओर भेजकर, और यह कि वहाँ हम मानो नरक की खाई देखते हैं, क्योंकि परमेश्वर का पुत्र वहाँ हमारा दण्ड उठाता है, और वहाँ हमारा ज़ामिन बनकर हमारे सब ऋण चुकाता है।

फिर आगे यह भी विचार करें कि मृत्यु से महिमा की ओर एक भला मार्ग था, जो उसके पुनरुत्थान में प्रकट हुआ। क्योंकि परमेश्वर के पुत्र ने निर्बलता में दुःख उठाया (अर्थात् अपने पिता परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार, और अपनी भली इच्छा के अनुसार भी, जिससे उसने ऐसी दासता के अधीन होना स्वीकार किया) और ऐसे दुःख उठाया कि अपने पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से मृत्यु पर जय पाई: उसने ऐसी जय प्राप्त की कि अब सब घुटने उसके आगे झुकेंगे, और उसे वह नाम मिला है जो सब नामों से श्रेष्ठ है, और मनुष्यों को जान लेना चाहिए कि परमेश्वर की सारी महिमा उसके व्यक्तित्व में प्रकट हुई और चमक उठी।

इस प्रकार तुम देखते हो कि हमें सुसमाचार से लज्जित होने की आवश्यकता नहीं। और सबसे बढ़कर हम उसे थामे रहें जिसे सन्त पौलुस रोमियों के पहले अध्याय में सब विश्वास करनेवालों के उद्धार के लिए परमेश्वर की सामर्थ्य कहता है।

फिर संसारी लोग और जो मेंढकों की भाँति घमण्ड और अहंकार से फूले हुए हैं, वे जितना चाहें सुसमाचार को तुच्छ जानें, और अपने ही श्राप में नाश हो जाएँ: और इस बीच हम विश्वास की सारी दीनता के साथ परमेश्वर के पुत्र को ग्रहण करें, जो जान-बूझकर अपने आप को हमारे सामने प्रस्तुत करता है, ताकि हमें स्वर्ग के राज्य की महिमा तक उठा ले।

परन्तु यहाँ एक बात और है: अर्थात् सन्त पौलुस ठोकर और सुसमाचार के प्रचार को अविभाज्य बातों के रूप में साथ-साथ रखता है। यह सच है कि हमें जहाँ तक हो सके सब ठोकरों से बचना चाहिए: क्योंकि हाय उस पर जिसके द्वारा ठोकरें आती हैं। परन्तु फिर भी यीशु मसीह को राज्य करना और पूरी स्वतन्त्रता पाना है, चाहे सारा संसार उस पर ठोकर खाए।

ठोकर शब्द का अर्थ रुकावट, बाधा या अड़चन है, जैसे कोई ऊबड़-खाबड़ और पथरीला मार्ग हो जिसमें काँटे और झाड़ियाँ या कोई और अड़चनें हों, तो वही मनुष्यों के ठोकर खाने का कारण होता है। अब यह चाहने योग्य बात थी कि यीशु मसीह स्वतन्त्रता से आगे बढ़े, और सारा संसार उसे ग्रहण करे, और कुछ भी सुसमाचार के प्रचार को संसार के एक छोर से दूसरे छोर तक न रोके। मैं कहता हूँ कि जहाँ तक हमारे वश में है हमें यह चाहना चाहिए। तौभी हम यह सीखें कि परमेश्वर हमारे विश्वास की आज्ञाकारिता को परखना चाहता है, शैतान को लगाम देकर, जो हमारे मार्गों में बहुत सी ठोकरें और अड़चनें डालता है।

संक्षेप में, हमारा प्रभु यीशु मसीह बिना कारण ठोकर खाने का पत्थर और सब मनुष्यों के टकराने और इस प्रकार अपनी गर्दनें तोड़ने की रुकावट नहीं कहलाता। और अन्त में (जैसा लूका में कहा गया है) वे उसी पत्थर से कुचले जाएँगे, क्योंकि वह उनके हठ के लिए बहुत कठोर है। और यह हमारे बहुत ही लाभ की बात है। क्योंकि हम बहुत से मनुष्यों को ऐसा नाज़ुक देखते हैं कि यदि लोग तुरन्त सुसमाचार से सहमत न हों, तो वे समझ लेते हैं कि अब हम परमेश्वर के सामने पूरी तरह छूट गए और मुक्त हो गए हैं, कि उसके मुकद्दमे या उसकी बात का और पक्ष लें।

यदि सब राजा और हाकिम तुरही के शब्द के साथ यह घोषणा करवा देते कि परमेश्वर की सच्चाई के विरुद्ध और कोई लड़ाई न हो: तो हर एक मनुष्य यह दिखावा करता कि वह भी इसी मत का है। परन्तु आजकल तुम बड़ी क्रूरता, अत्याचार, द्वेष, धमकियाँ और ऐसी ही अन्य बातें देखोगे। फिर तुम देखोगे कि अधिकांश शत्रु भूखे भेड़ियों के समान हैं जो सब कुछ निगल जाना चाहते हैं, और निर्दोष का लहू बहाना चाहते हैं, ताकि उनकी सम्पत्ति उन्हें मिल जाए। दूसरों में उन्मत्त उत्साह है, यहाँ तक कि वे परमेश्वर के नाम को पूरी तरह मिटा देना और सुसमाचार की शिक्षा को बिलकुल बुझा देना चाहते हैं।

जब मनुष्य यह देखते हैं, तो कहते हैं, अरे मैं इसमें हाथ नहीं डालूँगा। क्या? क्या मैं सारे संसार को अपने सिर पर ले आऊँ? क्या यह प्रकट नहीं कि जिन्होंने इस शिक्षा का स्वाद चखा है वे मुट्ठी भर लोग हैं, और बाकी सब या तो उनके शत्रु हैं, या उन्हें ठुकराते या उन पर हँसते हैं, या कम से कम उनके विरुद्ध विषैला और बैरी मन रखते हैं? तो तुम देखते हो कि बहुत कम लोग इतने सामर्थी हैं कि सुसमाचार की ठोकरों को सह लें, जब वे देखते हैं कि मानो उनके मार्गों में लट्ठे डाल दिए गए हैं, और यीशु मसीह शैतान के द्वारा और उसके चेलों की चालों से रोका जाता है।

अरे (वे कहते हैं) हमें अवश्य पीछे हटना चाहिए। और आज के दिन कितने ही ऐसे दिखाई देते हैं जो कहेंगे कि इस शिक्षा से ठोकरों का भण्डार उत्पन्न होता है? फिर, कृपया देखिए (वे कहते हैं) कि इसमें कैसी भिन्न-भिन्न मतभिन्नताएँ हैं। देखो, अमुक यह कहता है, और अमुक वह। इसके अतिरिक्त जब वे दुष्ट लोग, जो वेश्यालय की वेश्याओं की भाँति अपनी जीभ बेचते हैं, और परमेश्वर और उसके वचन के विरुद्ध निन्दाएँ उगलते हैं, सुसमाचार को तुच्छ जानने या ठुकराने के लिए कोई बहाना पा लेते हैं: तो तुरन्त बहुत से अभागे लोगों की जीभ यह कहने को तेज हो जाती है, हाय, हम देखते हैं कि इस शिक्षा के साथ बड़ी ठोकरें आती हैं। वरन् यदि सुसमाचार से बहुत सी ठोकरें न लगतीं, तो यीशु मसीह वह न ठहरता जो पवित्रशास्त्र उसके विषय में बताता है।

परन्तु फिर भी हमें उनसे घबराना नहीं चाहिए: वरन् उन पर जय पानी चाहिए। तो देखिए, इस प्रसंग से हमें क्या निष्कर्ष निकालना है, जहाँ सन्त पौलुस कहता है कि हम सुसमाचार के विश्वास में कभी स्थिर नहीं रहेंगे, जब तक हम ऐसी दृढ़ता से सज्जित न हों कि मार्ग से न मुड़ें, चाहे शैतान जो कर सके करे। निश्चय (जैसा मैंने पहले कहा) हमें जहाँ तक हो सके सब ठोकरों से बचना, और आगे बढ़ना, और उन्हें एक ओर हटा देना चाहिए। हम पहले देख चुके हैं कि हम में से हर एक को कैसा व्यवहार करना चाहिए, यहाँ तक कि भविष्यद्वक्ता यशायाह सुसमाचार के प्रचार के विषय में कहता है कि मार्ग को समतल किया जाना चाहिए, और जो वस्तु पहले ऊबड़-खाबड़ और टेढ़ी थी वह अब चिकनी और सीधी की जानी चाहिए।

तो फिर, हमें वह सब करना चाहिए जो हमसे हो सके कि ऐसा हो। तौभी, क्योंकि परमेश्वर चाहता है कि हम दीन किए जाएँ, और ठोकरें और अड़चनें अवश्य होंगी, और यह हो ही नहीं सकता कि यीशु मसीह अपने शत्रुओं के बीच में राज्य न करे: आइए हम आगे बढ़ें और शैतान की सब चालों को ललकारें, और सुसमाचार से इस कारण अरुचि न करें, चाहे हम संसार में कितनी ही ठोकरें और ठोकर के कारण क्यों न देखें।

अब सन्त पौलुस यह कहकर आगे जोड़ता है, “भला होता कि वे सब जो तुम्हें घबरा देते हैं काट डाले जाते।” पहली दृष्टि में ऐसा लग सकता है कि सन्त पौलुस यहाँ अत्यधिक क्रोध से भर गया है, जब वह चाहता है कि वे सब जो परमेश्वर की शुद्ध शिक्षा को बिगाड़ने के लिए अपने जंगली दाने और भ्रम फैलाते हैं, नष्ट कर दिए जाएँ, कि शैतान उन्हें अपने वश में कर ले, और वे परमेश्वर के हाथ से कभी दया न पाएँ। क्योंकि “काट डाले जाते” शब्द का यही अर्थ है। परन्तु हमें ध्यान देना चाहिए कि परमेश्वर की महिमा के लिए जो उत्साह हमें रखना चाहिए, वह सब सांसारिक बातों को भूल जाता है जब वे दोनों तराज़ू में एक साथ रखी जाती हैं।

तौभी आगे बढ़ने से पहले, आइए पहले यह ध्यान दें कि “काट डाले जाते” इस शब्द में सन्त पौलुस ने उपमा के रूप में बात कही है। क्योंकि जिन तुच्छ लोगों ने सुसमाचार की शिक्षा को बिगाड़ा और उसमें मिलावट की थी, वे खतना के लिए झगड़ते थे। वह कहता है, “तो फिर, जितना चाहो छाँटो और काटो, फिर भी तुम्हारी सारी खोज बस यही है कि और लोग भी तुम्हारी ही तरह ऐसी तुच्छ बातों में लगे रहें। परन्तु जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है, मैं चाहता हूँ कि ऐसे सब धोखा देनेवाले पूरी तरह काट डाले जाएँ, और परमेश्वर उन्हें डुबो दे या जड़ से उखाड़ दे, और इस प्रकार उन्हें त्याग दे और दोषी ठहरा दे, कि उन्हें उद्धार की कोई आशा न रहे।”

अब आइए उस बात पर आएँ जिसे मैंने छुआ है। मैंने आपसे संक्षेप में कहा था कि जब मनुष्य परमेश्वर के विरुद्ध युद्ध करते हैं, तब हमें उनके ऐसे घोर शत्रु बन जाना चाहिए कि हम सब कुटुम्ब-सम्बन्ध और मित्रता, और जो कुछ और है, पूरी तरह भुला दें: क्योंकि अन्यथा हम अपने परमेश्वर के प्रति किसी रीति से अपना कर्तव्य नहीं निभाते, जो हमारे पिता का नाम धारण करता है, और हमें यह सम्मान देता है कि हमें अपनी सन्तान मान लेता है, और कम से कम इतना तो उसका अधिकार है कि हम उसकी महिमा को सब वस्तुओं से ऊपर मानें।

परन्तु हमें और आगे जाना चाहिए। क्योंकि परमेश्वर की प्रभुता क्या है? फिर, उसकी सच्चाई हमारे लिए कितनी बहुमूल्य होनी चाहिए? इसके अतिरिक्त, जब वह अपनी महिमा को हमारे कल्याण के साथ ऐसा जोड़ता है कि हम एक को दूसरे के बिना प्राप्त नहीं कर सकते: वरन् हम न उसे लाभ पहुँचा सकते हैं न हानि, चाहे हम उसके मुकद्दमे का पक्ष लेने में कितने ही उत्साही क्यों न हों, क्योंकि उसे हमारी आवश्यकता नहीं, और न उसे हमारा सहायक हाथ उधार लेना पड़ता है, तौभी वह हमें अपने प्रतिनिधि या कारिन्दे बनाता है, और इसका और कोई उद्देश्य नहीं सिवाय इसके कि हम में से हर एक अपना ही लाभ खोजे, परन्तु इस संसार का नहीं, न इन नाशमान वस्तुओं में, वरन् अपनी आत्माओं के अनन्त उद्धार में: जब परमेश्वर (मैं कहता हूँ) हमें ऐसी रीति से काम में लगाता है, और हम फिर भी लापरवाह और ठण्डे रहते हैं: तो क्या हमारा यह विश्वासघात क्षमा के योग्य है? नहीं, हमें उस पर आना चाहिए जो भजन संहिता में कहा गया है, “तेरे भवन की धुन में मैं जल गया, और जो तेरी निन्दा करते हैं, उनकी निन्दाओं को मैंने अपने ऊपर ले लिया।”

निश्चय, यह कलीसिया के सिर के रूप में हमारे प्रभु यीशु मसीह के व्यक्तित्व में पूरी तरह पूरा हुआ। और सन्त पौलुस दिखाता है कि हमें उसी के आदर्श के अनुसार ढलना चाहिए, कि जब कभी हम देखें कि मनुष्यों के द्वारा परमेश्वर का आदर बिगाड़ा जा रहा है, तब हम में से हर एक साहस के साथ उसके विरुद्ध खड़ा हो। तो देखिए, संक्षेप में वह नियम जो हमें यहाँ से निकालना है, यह है कि हमें परमेश्वर के आदर को सब बातों से पहले, वरन् यदि हमारे पास लाखों प्राण होते तो उन सब से भी पहले रखना चाहिए।

तब जब मनुष्य अपनी पूरी शक्ति लगाकर परमेश्वर के नाम को पाँव तले रौंदने, उद्धार की शिक्षा को उथल-पुथल करने, यह करवाने में कि हमें फिर यह पता न रहे कि किस धर्म से चिपके रहें, और कलीसिया में से सारी शान्ति को बिलकुल भगा देने का यत्न करते हैं, तो उन्हें छोड़ देना हमारे लिए उचित नहीं। इसलिए यदि हम देखें कि मनुष्य उसी ओर अपना परिश्रम लगाते हैं, तो क्या यह उचित नहीं कि हम उनके विरोधी हों?

सच है कि यदि सम्भव हो, तो हमें सब मनुष्यों के साथ मित्रता और मेल-मिलाप करना चाहिए, वरन् अपनी ओर से भी, और जहाँ तक हमारे वश में है, जैसा सन्त पौलुस रोमियों से कहता है। परन्तु जब हम इन निकम्मों को परमेश्वर के विरुद्ध अपने आप को ऊँचा उठाते, और उस पर धक्का मारने के लिए अपने सींग निकालते देखते हैं: तब यह बहुत उचित है कि हम में से हर एक आगे बढ़े, और सचमुच दिखा दे कि हम अब अपने नहीं रहे, वरन् क्योंकि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमें इतने महँगे दाम से मोल लिया और चुकाया है, इसलिए उचित रीति से वही हमारे जीवन का भी और हमारी मृत्यु का भी प्रभु हो।

तो देखिए सन्त पौलुस यहाँ ऐसी तीखी कामना क्यों करता है, अर्थात् कि जिन्होंने गलातियों को घबरा दिया था वे परमेश्वर से पूरी तरह पराए हो जाएँ, और दण्ड की खाई में डूब जाएँ।

अब यदि यह आपत्ति उठाई जाए कि यह कामना प्रेम के नियम के विरुद्ध है, तो उत्तर सरल ही है। क्योंकि हम पर अपने शत्रुओं से प्रेम रखना अनिवार्य है, चाहे वे हमें सताएँ और तंग करें: और यद्यपि वे हमारे नाश के सिवा कुछ नहीं चाहते, तौभी हमें अपनी पूरी शक्ति से उनके कल्याण और उद्धार का यत्न करना चाहिए, और उन्हें शैतान के हाथ यों सौंपा हुआ देखकर उन पर तरस और दया खानी चाहिए। तो देखिए प्रेम का अर्थ क्या है। परन्तु फिर भी इस सब के होते हुए, जैसा मैं पहले बता चुका हूँ, परमेश्वर को सब से ऊपर होना चाहिए। इसलिए प्रेम मनुष्य और मनुष्य के बीच है। जब किसी ने मेरे साथ अन्याय किया हो, तो मुझे उसे भूल जाना चाहिए। चाहे वह मुझ से बैर रखे, तौभी मुझे उसके कल्याण का यत्न करना चाहिए। परन्तु जब बात परमेश्वर के मुकद्दमे का पक्ष लेने की आए, तब मनुष्यों को शून्य से भी कम समझा जाना चाहिए, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ।

तौभी हम बिलकुल उलटा करते हैं। क्योंकि जब परमेश्वर के साथ बुरा व्यवहार किया जाता है तब झुक जाने और पाल उतार लेने के सिवा सामान्य चलन और क्या है? और फिर भी इस बीच हर एक मनुष्य अपने अधिकार के लिए अन्त तक लड़ेगा। उदाहरण के लिए: कोई मनुष्य है जिसने बहुत घोर अपराध किया है, वह दण्ड पाने के योग्य है: और यदि उसे ताड़ना न दी जाए तो बिगाड़ के घुस आने के लिए एक बुरा द्वार खुल जाता है। कोई अधिकारी मनुष्य है, और (बहुत दूर न जाएँ तो) जिन्हें उद्धार का मार्ग दिखाना चाहिए, जो परमेश्वर का वचन सुनाते हैं, वे ही, मैं कहता हूँ, दुष्टता से जीते दिखाई देते हैं, वे लुच्चे और दुराचारी लोग हैं जो उलझन और झगड़ा खड़ा करने के सिवा किसी काम के नहीं। और फिर भी इस सब के होते हुए, कुछ लोग कहेंगे कि उन्हें काट डालना नहीं चाहिए, उनके साथ कठोरता नहीं बरतनी चाहिए। शराबी, व्यभिचारी, बदमाश का पक्ष लिया जाएगा। संक्षेप में, सब जगह परमेश्वर का तिरस्कार ही होगा, और सुसमाचार की कहीं गिनती न होगी, और फिर भी यह सब इस बहाने सहा जाना चाहिए कि कुछ नरमी बरतनी चाहिए: हाँ भई, और इस बीच परमेश्वर का आदर भाग्य के भरोसे छोड़ दिया जाए।

परन्तु यदि तुम इन मनुष्यों को, जो इतने कोमल हैं, या कम से कम इतने कोमल बनने का ढोंग करते हैं, ज़रा भी छेड़ो: तो वे तुरन्त घोर ललकार में फट पड़ते हैं, कहते हैं: क्यों नहीं? अमुक मनुष्य ने मेरे साथ ऐसा अन्याय किया है। वे अन्त तक लड़ाई लड़ते हैं। तो फिर, वे शैतान के चेलों के हाथ से जो कुछ भी हो सकता है सब सह लेते हैं, वरन् उनसे पूरी लज्जा के साथ थप्पड़ और घूँसे खाना भी, जैसा सन्त पौलुस 2 कुरिन्थियों में कहता है: और फिर भी इस बीच वे यह सह नहीं सकते कि परमेश्वर को उसके अपमान का बदला मिले जो उसके साथ किया गया है।

तो अब हम देखते हैं कि सन्त पौलुस का उत्साह भली-भाँति नियन्त्रित था, और यदि किसी मनुष्य ने उसके अपने व्यक्ति के साथ अन्याय किया होता, तो हम जानते हैं कि वह उस विषय में धीरजवन्त रहता। परन्तु अब जब वह परमेश्वर के सुसमाचार पर ऐसी चोट आती देखता है: तो वह उसे सह नहीं सकता: वरन् उसके विरुद्ध खड़ा होता है, चाहता है कि ऐसे मनुष्य दोषी ठहराए जाएँ। हाँ सचमुच: क्योंकि उसे अपना कोई ध्यान न था, वरन् (जैसा मैंने पहले कहा) उसने परमेश्वर के आदर को सारे संसार से ऊपर रखा। तो देखिए हम भटकने से कैसे सुरक्षित रह सकते हैं: अर्थात् यदि हम सीधाई से परमेश्वर की ओर देखें, और अपनी भावनाओं की ओर ध्यान न दें, वरन् खरेपन और विवेक की आत्मा से चलाए जाएँ, ताकि परमेश्वर हमें परखना सिखाए कि कहाँ तक हमें लड़ना और कहाँ तक विरोध करना है।

तब यदि हम में एक बार ऐसा विवेक हो, और हम पवित्र आत्मा से चलाए जाएँ, तो हम सन्त पौलुस, दाऊद, और शेष पवित्र भविष्यद्वक्ताओं के साथ मनुष्यों को ललकार सकते हैं जब वे हमें ज्ञात शिक्षा की शुद्धता से फेरना चाहें: वरन् आवश्यकता पड़ने पर हम स्वर्गदूतों तक को श्राप दे सकते हैं, जैसा सन्त पौलुस ने पहले कहा है, जहाँ उसने स्वर्ग के स्वर्गदूतों को ललकारा, यदि वे उस सुसमाचार की शिक्षा के विरुद्ध खड़े हों जिसका उसने प्रचार किया था। इसलिए नहीं कि स्वर्गदूत कभी उसके विरुद्ध खड़े होते हैं: परन्तु यह कि यदि उनके लिए ऐसा करना सम्भव होता। मानो वह कहता: मान लो कोई स्वर्गदूत तुम्हारे विश्वास को उलटने का यत्न करे: तो भी तुम्हें उसे नरक भेजना, और उसे दुष्टात्मा जानना, और उसे श्राप देना चाहिए, इसकी अपेक्षा कि उसके द्वारा सही मार्ग से भटक जाओ।

तो तुम देखते हो कि हमें सब बातों में पूरी तरह परमेश्वर पर टिके रहना चाहिए: और इसके अतिरिक्त, आइए हम उस वचन से डरें, मानो हम उसे उन सब के विरुद्ध जो कलीसिया को घबराते हैं, स्वर्ग से गरजते हुए सुनते हों। क्योंकि यद्यपि वह केवल पौलुस ही है जिसने इसे कहा, तौभी पवित्र आत्मा ने उसकी जीभ को चलाया और संभाला। इसलिए जब वह इस वचन को उच्चारित करने के लिए परमेश्वर का साधन था: तो यह वैसा ही है मानो उन सब के विरुद्ध अपरिवर्तनीय दण्डाज्ञा पहले ही सुनाई जा चुकी हो जो विश्वास की एकता को, और उस भाईचारे के मेल को, जो परमेश्वर की सब सन्तानों के बीच होना चाहिए, तोड़ने का यत्न करते हैं, और भ्रम और झूठी शिक्षाएँ बोकर शुद्ध सच्चाई में मिलावट करते हैं।

इसके अतिरिक्त, परमेश्वर दिखाता है कि वह हम से कितना प्रेम रखता है, (जैसा आज सवेरे बताया गया था) कि वह हमें उस पितृवत् चिन्ता का निश्चय देता है जो वह हमारे उद्धार के लिए रखता है, इस रूप में कि वह उन सब से ऐसा बदला लेता है जो उसे विफल करना चाहते हैं। और अन्त में वह कहता है, “हे भाइयो, तुम स्वतन्त्र होने के लिये बुलाए गए हो: केवल इसे शारीरिकता के लिए अवसर न बनाओ, वरन् प्रेम से एक दूसरे के दास बनो, क्योंकि यही व्यवस्था की सच्ची पूर्ति है, और वही सच्ची कसौटी भी है जिससे हमें अपने सब कामों को नापना चाहिए।”

यहाँ सन्त पौलुस पहले यह दिखाता है कि उसकी लड़ाई इसके लिए नहीं कि मनुष्य अपने सुख-चैन से जीएँ, और हर कोई जैसा चाहे वैसा मौज करे: वरन् इसके लिए कि हम परमेश्वर के सामने स्वतन्त्र हों। और यह भली-भाँति ध्यान देने योग्य है। क्योंकि जैसे ही स्वतन्त्रता या छूट शब्द कहा जाता है, हम में से हर एक अपनी शारीरिक अभिलाषाओं की ओर इतना झुका हुआ है कि तुरन्त अपने मन में सोचने लगता है, ठीक है, तो मैं जो चाहूँ कर सकता हूँ, अब मुझ पर कोई रोक नहीं, अब मुझे अपने आप को इतना बँधा हुआ समझने की आवश्यकता नहीं, न विवेक का इतना संकोच करने की, जितना मैंने अब तक किया है। तो देखिए कि स्वतन्त्रता के बहाने हम में से हर एक अपने आप को अपनी ही भावनाओं का दास बना लेता है। क्योंकि यह शैतानों की चाल है कि जो बातें भली दिखती हैं उनमें हमें धोखा दे और बहका ले, वरन् उन्हें बिलकुल उलटा कर दे।

क्योंकि (जैसा मैं पहले बता चुका हूँ) निश्चय है कि वे सब जो अपनी ही रुचि के अनुसार जीना चाहते हैं, अभागे दास बन जाते हैं, और उनसे भी कड़े बन्धन में रखे जाते हैं जो काठ में ठोंके या हथकड़ियों में जकड़े गए हैं। और क्यों? ज़रा विचार करें कि हमारी अभिलाषाओं और वासनाओं में कैसा अत्याचार है। यदि कोई मनुष्य अपनी अभिलाषाओं के पीछे चले, तो निश्चय उसे सारी लज्जा झाड़ देनी होगी, और अपने आप को भूल जाना होगा, और पूरा पशु बन जाना होगा। देखो वह भली स्वतन्त्रता, जिसे सब मनुष्य स्वभाव से सामान्यतः खोजते हैं।

परन्तु मैं आपको बता चुका हूँ कि जिस स्वतन्त्रता के लिए सन्त पौलुस हमें उभारता है, वह कोई और ही वस्तु है। वह यह नहीं कि हम आवारों की भाँति दौड़ें, और कोई लगाम न हो जो हमें भय में रखे: परन्तु यह कि हम विचार करें कि परमेश्वर हम से क्या चाहता है, और उसके पवित्र वचन से चलाए जाएँ, और हम में से कोई इतना प्रभुता जमानेवाला न बने कि कहे, यह या वह करना ही होगा। क्योंकि जब मनुष्य अपने ही बनाए नियमों और विधियों से हम पर शासन करने का बीड़ा उठाते हैं, तो निश्चय है कि वे (जैसा तुम कहोगे) बेचारी आत्माओं का गला घोंटने के लिए असंख्य रस्सियाँ ही बनाते हैं। तब सन्त पौलुस दिखाता है कि जिस स्वतन्त्रता का उसने प्रचार किया, और जिसके बचाव के लिए वह धोखा देनेवालों के विरुद्ध इतनी दृढ़ता से खड़ा हुआ, वह यह नहीं कि मनुष्य सीमा लाँघ जाएँ और जो चाहें करने की छूट ले लें, परन्तु यह कि वे स्वतन्त्रता से परमेश्वर की सेवा कर सकें, और अशान्ति से फिर सताए और पीड़ित न किए जाएँ, जैसा हम बेचारी अज्ञानी आत्माओं को देखते हैं, जो अन्धविश्वास में जकड़ी हुई सदा सन्देह और विवेक की कचोट में रहती हैं, हर बात पर प्रश्न उठाती हैं, और किसी एक भी बात पर कभी निश्चय नहीं पातीं। इसी प्रकार के पोप-भक्त भी हैं, जिनके बीच असंख्य सन्देह हैं। और इसमें कोई आश्चर्य नहीं: क्योंकि वे नहीं जानते कि किस स्वामी को अपना लेखा देना है। उनमें से हर एक अपने ही मस्तिष्क की प्रवृत्ति के अनुसार बोलता है: [एक कहता है] मुझे तो ऐसा करना भला लगता है: [दूसरा कहता है] देखो मेरी भक्ति मुझ से यह कहती है: [और तीसरा कहता है] अब भी यह या वह और किया जाए तो भला होगा।

अब जब वे एक बार ऐसी भूलभुलैया में घुस जाते हैं, तब अन्त में वे इस सन्देह में पड़ जाते हैं कि सिर में कंघी करें या नहीं, और इसका संकोच करने लगते हैं कि किस उँगली से खाना खाएँ, और हर बात का। संक्षेप में, उनकी मूर्खता का न अन्त है न सीमा। जब सन्त पौलुस दिखाना चाहता है कि मनुष्यों की परम्पराओं में जकड़े जाने का क्या अर्थ है, तो वह कहता है कि जब वे एक बार माँस खाने से मना कर देते हैं, तो शीघ्र ही उसे चखने से मना करते हैं: और जब चखने से मना कर चुकते हैं, तो शीघ्र ही उसे छूने से मना करते हैं। तो तुम देखते हो कि उस स्वतन्त्रता को बनाए रखने का हमारा मार्ग, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग के द्वारा हमारे लिए मोल ली गई है, यह है कि पहले जान लें कि परमेश्वर किस रीति से सेवा और आदर पाना चाहता है, ताकि भले और बुरे को न पहचानने के कारण हम इतने विवेक-संकोचों से इधर-उधर न उछाले जाएँ, परन्तु अपने मन में पूरी तरह और निश्चय के साथ ठान लें कि परमेश्वर के वचन के पीछे चलेंगे, और यह भी निश्चित जानें कि ऐसा करने में हम कोई भूल नहीं कर सकते।

और दूसरे, एक दूसरे के काम आएँ, कि हम में से कोई अपने आप में इतना मग्न न हो कि अपने साथियों को दबाए, परन्तु ऐसा कोमल और दयालु हो कि हम में से हर एक यह देखता रहे कि किस बात में अपने पड़ोसी को लाभ या सहायता पहुँचा सकता है: हर ठोकर देने से बचते हुए, ऐसा न हो कि यह कहा जाए, “मुझे अमुक या अमुक की कोई परवाह नहीं, मुझे इसकी चिन्ता नहीं कि वह डूबे या तैरे:” परन्तु (क्योंकि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमें अपनी कलीसिया के अंग होने के लिए एक साथ जोड़ा है) हम उसी शिक्षा को थामे रहें, अर्थात् पहले यह कि परमेश्वर का आदर और सेवा हमारे बीच वैसी हो जैसी वह आज्ञा देता है, और दूसरे यह कि हम आपस में ऐसे एक मन हों कि नम्रता के द्वारा अपने आप को एक दूसरे के साथ मिलाने और एक दूसरे के काम आने का परिश्रम करें, इस बात के होते हुए भी कि अपने विवेक के विषय में हम परमेश्वर की ओर स्वतन्त्र बने रहें।

और अब आइए हम अपने भले परमेश्वर की प्रभुता के सामने अपने पापों को मानते हुए गिर पड़ें, उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उन्हें ऐसा अनुभव कराए कि वह हमें उसके सामने दीन करे, और सच्चे पश्चाताप की ओर खींचे, और हम उसमें और अधिक आगे बढ़ते जाएँ, अपने पाप के बोझ तले निरन्तर कराहते हुए, जब तक हम पूरी तरह शुद्ध और उससे मुक्त न हो जाएँ: और यह कि वही भला परमेश्वर हम पर सहनशील हो, और हमारे साथ उतनी कठोरता से व्यवहार न करे जितनी वह कर सकता है, परन्तु अपने पवित्र आत्मा से हमारी ऐसी अगुवाई करे कि वह हमारे पापों को क्षमा भी करे और भुला भी दे, जब तक हम उनसे पूरी तरह शुद्ध न हो जाएँ। कि वह यह अनुग्रह न केवल हमें, वरन् पृथ्वी के सब लोगों और जातियों को भी देने की कृपा करे। इत्यादि।

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