अध्याय 34

बत्तीसवाँ उपदेश, जो पाँचवें अध्याय पर दूसरा है - गलातियों 5:4-6

Sermons upon Galatians · John Calvin

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बत्तीसवाँ उपदेश, जो पाँचवें अध्याय पर दूसरा है - गलातियों 5:4-6

जो पाँचवें अध्याय पर दूसरा है।

4 मसीह तुम्हारे लिए निष्फल हो गया, तुम सब के लिए जो व्यवस्था के द्वारा धर्मी ठहराए जाते हो, और तुम अनुग्रह से गिर गए हो।

5 क्योंकि हम आत्मा में विश्वास के द्वारा धार्मिकता की आशा की बाट जोहते हैं।

6 क्योंकि मसीह यीशु में न खतना, न खतनारहित होना किसी काम का है, परन्तु वह विश्वास जो प्रेम के द्वारा कार्य करता है।

हम पहले देख चुके हैं कि जो लोग अपने कर्मों और परमेश्वर के अनुग्रह के बीच साझेदारी स्थापित करना चाहते हैं, वे अपने आप को बहुत बड़ा धोखा देते हैं। क्योंकि जब हिसाब चुकाने का समय आता है, तब परमेश्वर को हमारा न्याय कठोरता से करना ही होगा। इसलिए यदि हम अपने कर्मों के द्वारा उसकी कृपा प्राप्त करने और अपना उद्धार मोल लेने का प्रयत्न करें, तो हमें व्यवस्था को बिना किसी कमी के पूर्ण रीति से पूरा करना होगा। परन्तु आइए, विचार करें कि क्या कभी किसी मनुष्य ने अपने आप को इतनी सिद्धता से निभाया है। निश्चय ही हम उससे बहुत दूर रह जाते हैं। इसलिए हमें खाली हाथ परमेश्वर के पास आना चाहिए, कि वह दया करके हमें ग्रहण करे और हमारे प्रभु यीशु मसीह की आज्ञाकारिता हमारे लेखे में गिन दे। हमें अपनी सारी योग्यताओं का त्याग करना चाहिए और व्यवस्था की कोई वस्तु अपने साथ नहीं लानी चाहिए, केवल इस सरल और शुद्ध अंगीकार के सिवा कि जब तक परमेश्वर हम पर तरस न खाए, तब तक हम दण्ड के योग्य और निराश्रित हैं। हमें अपने सब दोषों और अपराधों को गाड़ देना चाहिए और अपने आप को फिर से उसके पुत्र, हमारे प्रभु यीशु मसीह की धार्मिकता का वस्त्र पहनाना चाहिए।

इसी कारण सन्त पौलुस यहाँ यह निष्कर्ष निकालता है कि जो व्यवस्था के द्वारा अपने आप को धर्मी ठहराना चाहते हैं, वे अनुग्रह से गिर गए हैं, और यीशु मसीह उनके लिए कुछ भी लाभदायक न होगा। वह इस रीति से बिना कारण नहीं बोलता। जिन झूठे शिक्षकों ने गलातिया की कलीसिया में सुसमाचार की शिक्षा को आंशिक रूप से बिगाड़ दिया था, वे एक को दूसरे में मिलाना चाहते थे; अर्थात् वे यह तो मानते थे कि यीशु मसीह हमारी घटियों को पूरा करने के लिए दिया गया है, फिर भी उनका विश्वास यह था कि हमें भलाई करने का यत्न करके अपने आप भी कुछ अंश में धर्मी बनने का प्रयास करते रहना चाहिए। उन्होंने हमारे प्रभु यीशु मसीह का पूरी तरह त्याग नहीं किया, और न यह कहा कि वे सब प्रतिज्ञाएँ, जिनमें परमेश्वर हमें बताता है कि वह अपनी भलाई से विश्वासियों के पाप क्षमा करेगा, छल और ठट्ठा हैं। परन्तु उनका अभिप्राय यह था कि मनुष्य अपने आप को धर्मी ठहराने के लिए परिश्रम करें, अर्थात् अपने ही कर्मों से परमेश्वर की कृपा मोल लें। और चूँकि हम सिद्धता से बहुत दूर हैं, इसलिए उनका आशय यह था कि यीशु मसीह उसे दूसरे उपाय के रूप में पूरा करे। उसी प्रकार आज पोप-तन्त्र में वे खुल्लमखुल्ला यह निन्दा नहीं बोलते कि यीशु मसीह का हमारे लिए और कोई प्रयोजन नहीं, केवल इतना कि वह हमें अपने पिता परमेश्वर की इच्छा सिखाए। वे यह कहने को तैयार हैं कि उसने हमें छुड़ाया है और हमारे लिए पुण्य कमाने की भूमि तैयार की है, क्योंकि उसने हमारे लिए स्वर्ग का द्वार खोल दिया कि हम भीतर जाएँ, और यह भी कि उसकी मृत्यु और दुःखभोग प्रतिदिन हमारे काम आते हैं, कि जब हम परमेश्वर को अप्रसन्न कर दें तब प्रतिदिन उससे हमारा मेल कराएँ। तथापि वे यह आग्रह करते हैं कि स्वर्ग का राज्य हमें अंश-अंश करके अर्जित या कमाना चाहिए, और अपने पापों का मोल नाना उपायों से चुकाना चाहिए। इसी से उनके सारे प्रायश्चित्त निकले हैं और यह धारणा कि यदि मनुष्य अपने जीवन-काल में सब कुछ पूरा न कर सके, तो शेष शुद्धिस्थान में पूरा किया जाएगा।

देखो, इस प्रकार उनके यहाँ हमें परमेश्वर के पास ग्रहण कराने में यीशु मसीह का स्थान केवल आधा रह गया है। इस बीच वे उसे इस प्रकार कन्धे पर लादते हैं कि स्वतन्त्र इच्छा, पुण्य, अतिरिक्त या अधिक-शेष कर्म, जैसा वे उन्हें कहते हैं, और ऐसी ही वस्तुएँ हमारे उद्धार का कम से कम आधा भाग ले जाती हैं। परन्तु सन्त पौलुस हमें बताता है कि परमेश्वर ऐसी साझेदारी को पसन्द नहीं करता। क्योंकि या तो हमें व्यवस्था का ऐसा पूर्ण पालन ले आना होगा जिससे परमेश्वर सन्तुष्ट हो जाए, नहीं तो अपने आप को दोषी मान लेना होगा। यदि छोटे से छोटा दोष भी हो, तो शेष सब कुछ किसी काम का नहीं। क्योंकि परमेश्वर उद्धार की प्रतिज्ञा उनसे नहीं करता जो आधे मन से उसकी सेवा करते हैं, या जो किसी प्रकार दिखावे के लिए उसकी सेवा करते हैं, परन्तु उनसे जो उसकी व्यवस्था को आदि से अन्त तक मानते हैं। "जो इन सब बातों को करेगा वह इनसे जीवित रहेगा," और इसके विपरीत, "जो सब को न करे वह श्रापित है।"

परन्तु कोई मनुष्य वह सब नहीं करता जो व्यवस्था में माँगा और आज्ञा किया गया है। क्योंकि परमेश्वर की सेवा करने के लिए हममें जितनी भी भली उत्सुकता या इच्छा हो, फिर भी हममें सदा बहुत दुर्बलता रहती है, और हम लँगड़ाते हुए उसके पास जाते हैं और बहुत सी चूक करते हैं। बहुत बार ऐसा होता है कि हम एक ओर मुड़कर भटक जाते हैं; और इस प्रकार अपने कर्मों के विषय में हम सब उद्धार की प्रतिज्ञा से बाहर कर दिए गए हैं, और श्राप हमारी घात में है, जिससे हम बच नहीं सकते। क्योंकि ऐसा मूर्ख कौन है जो यह दावा करे कि उसने सारी व्यवस्था पूरी कर दी है? इसलिए यदि हम सब परमेश्वर के विरुद्ध अपराधों में दोषी पाए जाते हैं, तो जब तक हमारा प्रभु यीशु मसीह अपना हाथ न बढ़ाए, हम पूरी तरह नष्ट हुए के समान हैं।

इसलिए यह निष्कर्ष निकलता है कि हमें व्यवस्था की धार्मिकता को भूल जाना और उसे पाँव तले रौंद देना चाहिए, कि वह पूरी तरह मिट जाए। तब हमें उपाय के लिए नंगे होकर अपने प्रभु यीशु मसीह के पास जाना चाहिए, अपनी निर्धनता का अंगीकार करते हुए, और परमेश्वर के सामने सब प्रकार की निन्दा से कलंकित होने में लज्जित न होते हुए, कि हम फिर उसकी महिमा से ढाँपे जाएँ। देखो, वास्तव में हमें इस पाठ से यही बटोरना है, जहाँ सन्त पौलुस कहता है कि यदि मनुष्य व्यवस्था के द्वारा अपने आप को धर्मी ठहराने की आशा रखें, तो यीशु मसीह निष्फल कर दिया जाता है। सब युगों में यह एक साधारण भूल रही है कि आरम्भ में, पहले ही वेग में, मनुष्य परमेश्वर को वह सब चुका देना चाहेगा जो उसका देय है। अन्त में जब वे देखते हैं कि उसे करने की कोई सामर्थ्य या क्षमता उनमें नहीं है, तो बच निकलने के रास्ते ढूँढ़ते हैं। वे कहते हैं, "अच्छा, हम सब कुछ तो नहीं कर सकते, फिर भी कुछ तो करेंगे ही।" परन्तु इस विषय में हमारा काम अपनी कल्पनाओं के पीछे चलना नहीं है, क्योंकि परमेश्वर हमारा न्याय अपने ही वचन के अनुसार करेगा। इसलिए, जैसी कहावत है, हम मेज़बान को छोड़कर हिसाब न लगाएँ, कि अपने आप को यह विश्वास दिला लें कि परमेश्वर वही ग्रहण करेगा जो हमें अच्छा लगता है। इसके बदले हम यह समझें कि यीशु मसीह हमें कुछ भी लाभ नहीं पहुँचा सकता, जब तक हम अपने उद्धार की सम्पूर्णता उसी में न ढूँढ़ें।

क्योंकि पवित्रशास्त्र में यह नहीं कहा गया कि पिता ने उसे हमें इसलिए दिया है कि वह हमारे उद्धार पाने में सहायक हो, परन्तु यह कि वह हमें दिया गया है कि हमारी धार्मिकता और जीवन हो। तब यह निष्कर्ष निकलता है कि हममें अपने आप में दुष्टता और अनन्त मृत्यु के सिवा और कुछ नहीं है, जब तक हम यीशु मसीह में वह वस्तु फिर प्राप्त न कर लें जो हमने आदम में खो दी और जिससे हम पूरी तरह वंचित हो गए थे। और ये दो बातें यहाँ एक साथ जोड़ी गई हैं: अर्थात् यह कि यीशु मसीह हमारे लिए बिलकुल निष्फल है, और यह कि हम अनुग्रह से गिर गए हैं। सचमुच, वह सारा अनुग्रह या कृपा जो हमें परमेश्वर के हाथ से पानी है, हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमें दी जाती है। यह बहुत ध्यान देने योग्य बात है। क्योंकि हर कोई सहर्ष मानेगा कि हमें परमेश्वर की ओर फिरना चाहिए, क्योंकि वह सब कल्याण का सोता है। परन्तु इस बीच अधिकांश लोग अपनी ही कल्पनाओं में भटकते हैं, और परमेश्वर के पास आने के बदले उससे दूर चले जाते हैं। यह पोप-तन्त्र में देखा जा सकता है, जहाँ अभागे कपटी और अज्ञानी लोग कहते हैं कि अपने सन्तों और पुतलों के पीछे उनका भटकना, और अपनी मूर्खतापूर्ण भक्तियों में अपने आप को यातना देना, परमेश्वर की कृपा पाने के लिए है। परन्तु इस बीच यीशु मसीह अकेला छोड़ दिया जाता है और कोई उसकी गिनती नहीं करता। इसके बदले वे परमेश्वर के पुत्र की ओर जाने के बजाय किसी लकड़ी या पत्थर की ओर दौड़ते हैं जिसे वे अपनी स्वामिनी कहते हैं। और यह कहाँ से आता है? इस कारण कि वे नहीं जानते कि परमेश्वर ने हमें अपना अनुग्रह किस प्रकार दिया है, न यह कि वह हमसे उसे किस रीति से ढूँढ़वाना चाहता है, न यह कि हमें कौन सा मार्ग और क्रम अपनाना उचित है।

इसलिए जब हम पूरी तरह निश्चय कर लें कि परमेश्वर हमारा पिता है, और यह भी भली-भाँति जान लें कि हमें जिस किसी वस्तु की आवश्यकता है, उसे वह चाहता है कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह से लें, जो उस सोते के समान है जो पृथ्वी के नीचे छिपा था और फिर खोला गया और बह निकला कि हर मनुष्य उसमें से तृप्त होकर पी सके, तब हम जानते हैं कि परमेश्वर का अनुग्रह कभी सूख नहीं सकता। फिर भी वह हमारे पास हमारे प्रभु यीशु मसीह के माध्यम के सिवा नहीं आता। संक्षेप में, हम यह समझें कि हमारे उद्धार से सम्बन्ध रखनेवाली सारी बातें परमेश्वर के एकलौते पुत्र के व्यक्तित्व में ऐसी रखी गई हैं कि हमारे लिए वही अकेला पर्याप्त होना चाहिए, और हम सीधे उसी के पास जाएँ और वहीं अपना सारा सन्तोष पाएँ।

जैसा मैंने पहले कहा, आइए हम अपने आप को इस कल्पना से बचाए रखें कि हम अपनी योग्यताओं से कुछ मोल ले लेंगे, क्योंकि यह हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह से बिलकुल अलग कर देती है। अब सन्त पौलुस यहाँ यह जोड़ता है कि हम आत्मा में विश्वास के द्वारा धार्मिकता की आशा की बाट जोहते हैं। यह उस बात की पुष्टि करता है जो उसने पहले हममें और व्यवस्था के अधीन जीनेवाले पूर्वजों में पाए जानेवाले भेद के विषय में कही है। क्योंकि अब्राहम विश्वास के सिवा और किस रीति से कृपा में ग्रहण किया गया? फिर भी वह एक बात में हमसे भिन्न था। क्योंकि यीशु मसीह अभी प्रकट नहीं हुआ था, इसलिए उसे रीतियाँ दी गईं, और व्यवस्था के प्रकाशित किए जाने के समय उन लोगों की आवश्यकता के अनुसार, जिन्हें इस प्रकार चलाया और सँभाला जाना था, और भी बहुत सी रीतियाँ जोड़ दी गईं।

संक्षेप में, सब युगों के विश्वासियों ने सदा अपनी सारी धार्मिकता परमेश्वर के अनुग्रह में ढूँढ़ी है। फिर भी उन्हें रीतियों और छायाओं से सहायता मिलती थी, क्योंकि सुसमाचार उन पर अभी उतना प्रकट नहीं हुआ था जितना हम पर हुआ है, न यीशु मसीह (जो धार्मिकता का सच्चा बयाना है) अभी उतना स्पष्ट किया गया था। परन्तु अब आइए उस पर आएँ जो सन्त पौलुस कहता है। वह आज मसीहियों के बीच आत्मा को इसलिए रखता है कि सब आकृतियों और छायाओं को निकाल दे। मानो वह कहे कि हमारे लिए यही पर्याप्त होना चाहिए कि परमेश्वर का पुत्र हमारी धार्मिकता के लिए हम पर प्रकट हो गया है। इसलिए हमें रीतियों को छोड़ देना चाहिए, क्योंकि छायाएँ आज अनावश्यक हैं। और केवल इसी पाठ में नहीं, सन्त पौलुस "आत्मा" शब्द को व्यवस्था की छायाओं के सामने रखता है। सच है कि जब परमेश्वर ने प्राचीन काल में खतना, बलिदान और ऐसी अन्य बातें ठहराईं, तो उसका उद्देश्य यह नहीं था कि लोग यहीं नीचे टकटकी लगाए रहें। क्योंकि व्यवस्था में जो कुछ समाया हुआ है, वह सब वास्तव में आत्मिक है। उनका नमूना मूसा को पहाड़ पर दिखाया गया था।

तो यह निश्चित है कि पूर्वजों का विश्वास हमारी ही तरह आत्मिक था, इसलिए वे जानते थे कि वे पानी की तीन-चार बूँदों से धोए और शुद्ध नहीं किए गए, और न किसी बछड़े या किसी अन्य पशु के बलिदान से परमेश्वर से मेल पाए। इसके बदले हमारा प्रभु यीशु मसीह ही उनका एकमात्र धोनेवाला और शुद्ध करनेवाला था, और यह कि उसने अपनी मृत्यु के बलिदान से उन्हें पूरी तरह छुड़ा दिया था, या कम से कम छुड़ा देगा, क्योंकि वह कार्य अभी हुआ नहीं था, पर पूर्वज उस वस्तु को दूर से निहारते थे जो अभी प्रकट नहीं हुई थी।

फिर, यह बात बिना कारण नहीं कही गई कि यहाँ "आत्मा" शब्द इसलिए रखा गया है कि दिखाए कि पूर्वज हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह को उन्हीं साधनों के बिना नहीं पकड़ सकते थे जो प्रभु ने उस समय के लिए ठहराए थे। इसलिए जब किसी मनुष्य से चूक हो जाती, तो वह बलिदान लेकर आता कि परमेश्वर के सम्मुख अपने आप को मृत्यु के योग्य स्वीकार करे, न कि बछड़े, भेड़ या किसी ऐसी अन्य वस्तु में अपना प्रायश्चित ढूँढ़े, क्योंकि वह तो यीशु मसीह में पाना था। फिर भी आवश्यक था कि उसकी आकृति पहले आए। यही बात धोने की रीतियों और उन अन्य वस्तुओं के विषय में भी कही जानी चाहिए। सन्त पौलुस कहता है, आज हमारे पास देह है, इसलिए छायाएँ अब आवश्यक नहीं रहीं। यदि कोई मनुष्य मेरी आँखों के सामने उपस्थित हो, तो क्या मैं उसकी छाया से उसे पहचानना चाहूँगा? यह तो बहुत अँधेरे का व्यवहार होगा। और यदि मैं उसका मुँह देख सकूँ, तो उससे मुँह फेरकर उसे पहचानने के लिए कुछ चिह्न ढूँढ़ने जाना मेरी कैसी मूढ़ता होगी? ठीक ऐसा ही आज उनके साथ है जो पुरानी आकृतियों की ओर फिर लौटते हैं। वे यीशु मसीह की ओर पीठ करते हैं, यह न जानते हुए कि उसकी मृत्यु के समय मन्दिर के परदे का फट जाना इस बात का चिह्न था कि सब प्राचीन आकृतियाँ मिटा दी गईं, और आज हम स्वर्गीय पवित्रस्थान में प्रवेश कर सकते हैं, जिससे हम पहले लगभग परदेशी ही थे।

संक्षेप में, सन्त पौलुस यहाँ यह बताना चाहता था कि व्यवस्था की रीतियों को दोषी ठहराने से उसका अभिप्राय न उन पूर्वजों को दोषी ठहराना है जिन्होंने उन्हें बरता, न परमेश्वर को जो उनका रचयिता था, परन्तु यह दिखाना है कि हमें आज उनका सत्य और सार प्राप्त है। फलस्वरूप, जो वस्तुएँ पहले छाया में थीं, वे अब वैसी नहीं रहीं, और इसलिए हमें यीशु मसीह से सन्तुष्ट रहना चाहिए, जो अपने साथ सब सिद्धता ले आया है। व्यवस्था की रीतियों के विषय में इतना ही।

अब, जो सन्त पौलुस कहता है कि हम आत्मा में धार्मिकता की आशा की बाट जोहते हैं, उसमें वह ऐसी बोली बोलता है जो अनोखी लग सकती है। क्योंकि धार्मिकता की आशा की बाट जोहने का क्या अर्थ है? ध्यान दें कि यहाँ सन्त पौलुस हमें उन सब वस्तुओं से खींच लेना चाहता था जो इस संसार में दिखाई देती हैं। क्योंकि जब हमारी इन्द्रियों को टिकने के लिए कुछ मिल जाता है, तब हम यहीं नीचे चिपक जाने की ओर बहुत झुके और प्रवृत्त होते हैं, इसलिए अपने मन को ऊपर नहीं उठा पाते। और क्योंकि मनुष्य बहुत शारीरिक हैं, वे सदा चाहते हैं कि सब कुछ उनकी आँखों के सामने खुला रहे। परन्तु परमेश्वर हमें अपने शुद्ध और अकेले वचन की ओर भेजकर हमारी आज्ञाकारिता को परखना चाहता है। और हम तब उसका सच्चा आदर करते हैं जब इन सब बाहरी वस्तुओं की ओर अपनी आँखें मूँद लेते हैं और परमेश्वर की उस इच्छा से सन्तुष्ट रहते हैं जो उसने हम पर प्रकट की है, और जब वह हमारे पास हो, तब यह समझते हैं कि हमें किसी वस्तु की घटी नहीं। क्योंकि "बाट जोहना" शब्द सूचित करता है कि जिस वस्तु की हम बाट जोहते हैं, उसे हम आँखों से नहीं देखते (जैसा रोमियों के आठवें अध्याय में कहा गया है)। और इस बात को "आशा" शब्द और भी बढ़ा देता है, जो उसमें जोड़ा गया है। इसलिए यह ऐसा ही है मानो सन्त पौलुस ने कहा हो: निश्चय, मेरे मित्रो, यदि कोई मनुष्य मसीहियों की धार्मिकता को जानने चले (अर्थात् यह कि वे परमेश्वर की सन्तान हैं, कि वे स्वर्गीय जीवन के वारिस हैं, और परमेश्वर उन्हें ऐसे ग्रहण करता है मानो वे निष्कलंक और निर्दोष स्वर्गदूत हों), मैं कहता हूँ, यदि कोई इसे संसारी रीति से जानना चाहे, तो वह अपने आप को धोखा देगा।

क्योंकि हम देखते हैं कि विश्वासी तुच्छ समझे जानेवाले लोग हैं, मनुष्य उन्हें सीधी दृष्टि से देखना भी उचित नहीं समझते, वे संसार की ओर नीचा पाल रखते हैं, और संक्षेप में, उस धार्मिकता में जो हमें अपने प्रभु यीशु मसीह से मिलती है, न कोई ठाठ है न बाहरी दिखावा। क्योंकि जब हम कहते हैं कि परमेश्वर के सामने हम उसकी केवल दया को छोड़ किसी वस्तु पर भरोसा नहीं रख सकते, और हमारी सारी योग्यताएँ उसके केवल अनुग्रह पर टिकी हैं, और यह कि हमें अपने से बाहर निकलना चाहिए कि यीशु मसीह हमारे लिए सब भलाई और कल्याण की पूर्ण सिद्धता हो, तब हम मान-सम्मान नहीं खोजते। जब हम इस प्रकार बोलते हैं, तो अपनी बड़ाई करने के लिए नहीं, परन्तु यह अंगीकार करने के लिए कि हम सब प्रकार की निन्दा से भरे हैं, इसलिए हमारी सारी योग्यता कूड़ा और गन्दगी ही है, और हमारे सब कर्म अशुद्धता हैं, और यदि हमारे प्रभु यीशु मसीह के लहू से हम ऐसे धोए और शुद्ध न किए गए होते कि परमेश्वर उसके द्वारा हमसे प्रसन्न हो, तो हम परमेश्वर की दृष्टि में घिनौने कोढ़ियों के समान होते, जो घावों और फोड़ों से भरे हैं।

अब वह धार्मिकता जो विश्वासियों में राज्य करनी चाहिए, ठाठ-बाट से भरी वस्तु नहीं है, न ऐसी वस्तु जिसे संसार बहुत ताके और सराहे। नहीं, वह तो सरासर दीनता है। और इसलिए सन्त पौलुस यहाँ कहता है कि जब संसार हमारी सादगी पर हँसता है, क्योंकि वह हमें अपने प्रभु यीशु मसीह में इस रीति से आशा रखते देखता है, और हममें से हर एक नम्रता से अपने आप को पाताल के बन्दीगृह तक नीचा करता है, कि हम परमेश्वर के अनुग्रह से उठाए जाकर स्वर्ग के राज्य में पहुँचें, तो यद्यपि संसारी लोग इसके कारण हमारा ठट्ठा और अनादर करें, फिर भी हमें दृढ़ता से डटे रहना चाहिए, और अपने आप को निश्चय दिलाना चाहिए कि हम निराश न होंगे।

क्योंकि हम जानते हैं कि हमने अपनी धरोहर किसके पास रखवाली के लिए छोड़ी है, अर्थात् उसी के पास जिसने हमें उद्धार के लिए बुलाने की प्रतिज्ञा की है। इसलिए आइए हम उसी विश्वास में आगे बढ़ते जाएँ और यीशु मसीह को थामे रहें, और जब वह हमारे पास हो, तब बाकी सब को तुच्छ जानें। हम उसका ऐसा अनादर और अन्याय न करें कि उससे दुबककर किसी कोने में चले जाएँ और उसे केवल आंशिक रूप से अपने काम में लाएँ, परन्तु यह मानें कि हम पूरी तरह और सब बातों में उसी के द्वारा धर्मी ठहराए गए हैं।

अब इस पर कोई मनुष्य फिर प्रश्न उठा सकता है और कह सकता है: कृपया बताइए, क्या व्यवस्था में रीतियों की आज्ञा बिना कारण दी गई थी? सच तो यह है कि सन्त पौलुस इस विषय का उत्तर पहले ही पर्याप्त रूप से दे चुका है।

तथापि, क्योंकि मनुष्य उन बातों का निर्णय करने में धीमे हैं जो परमेश्वर के शुद्ध सत्य को थामे रखने से सम्बन्ध रखती हैं, इसलिए वह फिर से दिखाता है कि हममें और उनमें, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने से पहले जीए, भेद है। साथ ही, उसने बहुत से निन्दकों का मुँह बन्द करने का भी ध्यान रखा। क्योंकि यदि कोई मनुष्य यीशु मसीह में परमेश्वर की केवल दया का प्रचार करे, तो तुरन्त कुछ कुत्ते-जैसे लोग भौंकने लगते हैं और बहुत सी निन्दाएँ उगलते हैं, जैसा आज भी देखा जाता है। क्योंकि यदि हम उस शैतानी आत्मविश्वास की निन्दा करें जिससे मनुष्य अपने आप को भरमाते हैं, कि अपनी योग्यताओं से उद्धार पा लेंगे, तो वे कहते हैं, ओह, यह कैसे? यह तो सब भले कर्मों को दोषी ठहराना हुआ। और इसी प्रकार आज कपटी लोग उस सुसमाचार की शिक्षा की निन्दा करते हैं जिसे हम फैलाते हैं, मानो हम बुराई करने की छूट और अनुमति दे रहे हों, कि फिर पाप और पुण्य में कोई भेद न रहे।

फिर, यदि हम उनसे कहें कि उनकी रीतियाँ तो केवल तुच्छ कूड़ा-कबाड़ हैं, और वे जितना उन पर घमण्ड करते हैं उतना ही वे परमेश्वर के सामने घृणित हैं, तो वे कहते हैं, ओह, यह कैसे हो सकता है? देखो, ये लोग तो सारा धर्म ही मिटा डालेंगे, और यह कैसी बात होगी? क्या परमेश्वर की सेवा और आदर फिर न होगा? आज उन कुत्तों की यही बोली और बातचीत है, जो यह सहन नहीं कर सकते कि हमारा प्रभु यीशु मसीह ही वह एकमात्र नींव हो जिस पर हम अपने उद्धार का भरोसा टिकाएँ, और न यह सहन कर सकते हैं कि हम परमेश्वर के शुद्ध और अकेले वचन से चलाए जाएँ। और इसी कारण सन्त पौलुस यहाँ कहता है कि यीशु मसीह में न खतना है न खतनारहित होना, परन्तु वह विश्वास जो प्रेम के द्वारा कार्य करता है।

यह कहने में कि यीशु मसीह में न खतना है न खतनारहित होना, उसका अर्थ है कि परमेश्वर का रीतियों की आज्ञा देना केवल एक समय के लिए था, और हमें सदा यह देखना चाहिए कि उसका लक्ष्य क्या था, अर्थात् यह कि वह लोगों को आशा में थामे रखना चाहता था, क्योंकि यीशु मसीह अभी संसार में प्रकट नहीं हुआ था। क्योंकि यदि उनके पास धोने की रीतियाँ, बलिदान और ऐसी अन्य वस्तुएँ न होतीं, तो वे निराश हो जाते, और मनुष्य की निर्बलता ऐसी है कि वे लाख बार हिम्मत हार बैठते। और इसलिए, यद्यपि वे अभी पूरी तरह नहीं देखते थे कि उनका उद्धार कैसे होगा, तथापि उनमें उन्हें मानो जीवित चित्र और दर्पण मिले थे जिनमें वे परमेश्वर का अनुग्रह देख सकते थे। देखो, इस प्रकार छायाएँ और आकृतियाँ केवल एक समय के लिए काम आईं।

इसलिए सन्त पौलुस घोषणा करता है कि वह किसी भी बात में परमेश्वर के उस अधिकार को घटाना नहीं चाहता जिसने यहूदियों के बीच वह व्यवस्था स्थापित की थी, और न यह कहना चाहता है कि वे सब वस्तुएँ निष्फल और व्यर्थ थीं, परन्तु यह कि हम, अब जब हमारा प्रभु यीशु मसीह प्रकट हो चुका है, समय की पूर्णता में आ पहुँचे हैं, और इसलिए अब हमारे पास कोई परदे न रहें जो हमें उसे आमने-सामने देखने से रोकें, जैसा वह सुसमाचार में हमारे सामने रखा गया है। क्योंकि जब कभी हमें सुसमाचार सुनाया जाता है, तो यह ऐसा ही है मानो हम परमेश्वर के पुत्र को अभी अपने सामने क्रूस पर चढ़ा देखें, या उसका लहू बहता देखें, क्योंकि पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से हम उससे छिड़के जाते हैं, जैसा सन्त पतरस अपनी पहली पत्री में कहता है।

तो, जब हमारे प्रभु यीशु मसीह ने अपनी मृत्यु और दुःखभोग से हमारे लिए वह मार्ग खोल दिया है जिससे हम उसके पिता परमेश्वर के पास आ सकें, तो हमारा काम नहीं कि हम उन वस्तुओं में अब और व्यस्त रहें जो उसकी अनुपस्थिति के समय के लिए ठहराई गई थीं। यह सच है कि वह आज संसार में नहीं रहता, फिर भी हमारे पास उसका सुसमाचार है, जो हमारे उद्धार के लिए आवश्यक सब बातों की पूर्ति है। इसलिए यह ऐसा ही है मानो वह हमारे बीच क्रूस पर चढ़ाया गया हो, जैसा सन्त पौलुस पहले कह चुका है। अब जब हमें "यीशु मसीह में" इन शब्दों की समझ मिल गई, अर्थात् यह कि सुसमाचार का प्रचार होता है, तो आइए उसके इस जोड़ पर आएँ कि न खतना है न खतनारहित होना, अर्थात् ये बातें अब से बन्द हो जानी चाहिए, और मनुष्य केवल प्रेम पर ठहरें।

और सन्त पौलुस "प्रेम" शब्द क्यों जोड़ता है? यह दिखाने के लिए कि मसीही लोग निठल्ले नहीं रहेंगे, और व्यवस्था की आकृतियों को न मानने पर भी उनके पास अपने आप को लगाए रखने के लिए बहुत कुछ है।

क्योंकि यद्यपि बलिदान, खतना और शेष सब बातें ठहराने में परमेश्वर का अभिप्राय लोगों को यीशु मसीह की ओर ले जाना था, तथापि मनुष्य स्वयं भ्रष्ट होने के कारण सब कुछ बिगाड़ देते थे। और सचमुच यहूदियों की यह धारणा थी कि बलिदान चढ़ाने से वे परमेश्वर को अपने से बाँध लेते हैं, पर बात इसके बिलकुल उलटी थी। क्योंकि जो बलिदान चढ़ाता था, वह वहाँ एक अंगीकार करता था कि अपने आप को गम्भीरता से श्राप में बाँधे, मानो वह कहता, "मैं मृत्यु के योग्य हूँ," जिसके चिह्न में एक बेचारा पशु यहाँ मारा जाता और उसका गला काटा जाता है, तो क्या यह दण्ड उस पशु ने कमाया है? नहीं, मैंने कमाया है। तो देखो कि मनुष्य वहाँ अपनी पापमयता देख सकता था, जैसे उसे यह भी उचित था कि वह अपना उद्धार अपने से बाहर कहीं और ढूँढ़े। देखो, मैं तुमसे कहता हूँ, आकृतियों को लोगों को ऐसी दीनता तक पहुँचाना चाहिए था कि बड़े से लेकर छोटे तक सब अपने आप को दोषी ठहराएँ, और तब हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह को ग्रहण करके उसी पर पूरी तरह टिक जाएँ।

परन्तु आज पोप-तन्त्र में ऐसा ही छल बरता जाता है, यहाँ तक कि मनुष्य उस सब में मिलावट कर देते हैं जो परमेश्वर ने ठहराया था। कैसे? बपतिस्मा को देखो, प्रभु-भोज को देखो, जो इसलिए ठहराए गए थे कि हम परमेश्वर के सामने आकर यह अंगीकार करें कि हमारे पास जो कुछ है, उसी से है। बपतिस्मा में क्या है? वहाँ हमें दिखाया जाता है कि हमें अपने आप में मरना होगा। और क्यों? इसी कारण कि हममें हठ और श्राप के सिवा कुछ नहीं, इसलिए हम क्रोध की सन्तान और परमेश्वर के लिए पूरे अजनबी हैं। तो देखो, बपतिस्मा में मनुष्य अपने आप पर के सारे भरोसे से पूरी तरह छुड़ाया जाता है। प्रभु-भोज में हम अपना जीवन यीशु मसीह में ढूँढ़ने आते हैं, और इस प्रकार हम दोनों रीतियों से पूरी तरह मरे हुए हैं। फिर भी इन सब के होते हुए पोप के अनुयायी इन बातों को पुण्य कमानेवाले कर्म समझते हैं। और इसी कारण उन्होंने अपनी हानिकारक मिस्सा की नारकीय घृणित रीति से, हमारे प्रभु यीशु मसीह की ठहराई हुई सब बातों में मिलावट कर दी है, वरन् उन्हें पूरी तरह विकृत कर डाला है।

क्योंकि ऐसा कर्म, जैसा वह मनुष्य के द्वारा किया जाता है, अर्थात् स्वयं कर्म का किया जाना, यानी उसका वैसे करना जैसे वह मनुष्य से निकलता और चलता है, वे कहते हैं कि अनिवार्य रूप से पुण्यदायक होना चाहिए। परन्तु इसमें हम स्पष्ट झूठ देखते हैं। तथापि सन्त पौलुस और आगे जाना चाहता था, उन लोगों के कपट को डाँटते हुए जो इन बाहरी बातों में इतने लगे रहते हैं; जिसके समान आज भी पोप-तन्त्र में है। यह सच है कि ये अभागे लोग परमेश्वर की सेवा के लिए बहुत कष्ट उठाते हैं: वे बिना हद और माप के इधर-उधर दौड़ते रहते हैं। परन्तु वे करते क्या हैं? वे व्यर्थ बातों में अपने आप को यातना देते हैं, ऐसी बातें जिनकी परमेश्वर ने कभी माँग नहीं की, वरन् जो उसे सर्वथा अप्रिय हैं। और फिर भी इस बीच उनके सारे कामों में कपट के सिवा कुछ नहीं। क्योंकि उनमें जो सबसे भक्त है, वह भी बहुत बड़बड़ाने और बुदबुदाने के सिवा और क्या करता है? उसे रात में मातिन्स सुनना होगा, और दिन में दो-तीन मिस्सा। उसे तीर्थयात्रा पर भटकना होगा, और लेंट तथा सन्तों के पर्वों की पूर्व-सन्ध्याओं पर उपवास रखना होगा। उसे वे सारे बन्दरों के खेल-तमाशे मानने होंगे जो मनुष्यों की युक्ति से ठहराए गए हैं। और ये सब क्या हैं? निश्चय, यदि मनुष्य इन पर भरोसा रखें, तो ये शैतानी युक्तियाँ हैं। परन्तु यदि इनमें और कोई हानि न भी हो, सिवा इसके कि हर कोई अपनी ही कल्पनाओं के पीछे चलता है, तो भी ये परमेश्वर के सामने खिलौने और बन्दरों के तमाशे ही हैं। और क्यों? क्योंकि वह सब बलिदानों से बढ़कर आज्ञाकारिता को चाहता है।

परन्तु यदि हम परमेश्वर की आज्ञा मानना चाहें, तो हमें आत्मिक रीति से उसकी सेवा करनी होगी, न कि इन बचकाने खिलौनों से। अब आइए उस पर आएँ जो सन्त पौलुस कहता है, "खतना कुछ नहीं, परन्तु वह विश्वास जो प्रेम के द्वारा कार्य करता है।" इससे वह सूचित करता है कि यद्यपि रीतियाँ एक ओर रख दी जाएँ, तो भी हमारे पास उन बातों को करने में, जिनकी परमेश्वर आज्ञा देता है, लगे रहने को बहुत कुछ है: अर्थात् विश्वासियों की सारी सिद्धता और पवित्रता प्रेम में है। यही व्यवस्था की पूर्ति है, यही वह लक्ष्य और अन्तिम ठिकाना है जहाँ परमेश्वर हमें पहुँचाता है। इसलिए यदि हममें प्रेम है, तो यह न समझें कि हम निठल्ले हैं। परन्तु आज यदि कोई पोप-तन्त्र के अन्धविश्वासों को डाँटे और उनका उपहास करे, और कहे, "अजी, तुम्हारे बीच बहुत कूड़ा-कबाड़ है: जब तुम कलीसिया में आते हो तो अपने ऊपर पवित्र जल छिड़कते हो, पुतले के सामने घुटने टेकते हो, एक वेदी से दूसरी वेदी की ओर भागते फिरते हो, यह करते हो और वह करते हो, और संक्षेप में तुम्हारे बीच सब प्रकार के खिलौनों की अन्तहीन खिचड़ी है: और तुम बेचारे लोग क्या सोचते हो कि ये बातें चुकारे में गिनी जाएँगी?" नहीं, क्योंकि परमेश्वर इनमें से किसी को भी स्वीकार नहीं करेगा।

वे उसके उत्तर में फिर कहते हैं, "क्यों नहीं? क्या परमेश्वर की सेवा फिर न होगी? हम उसके लिए क्या करें?" सचमुच उन्हें लगता है कि जब तक वे मिस्सा में न जाएँ, पाप-स्वीकार न करें, कुछ दण्ड-मोल न चुकाएँ, और कुछ न कुछ न करें, तब तक कुछ किया ही नहीं गया। और सचमुच हम देखते हैं कि वे प्रधान बात को अधूरा छोड़ देते हैं। क्योंकि उनमें जो सबसे भक्त हैं, वे भी कोई तो वेश्याएँ रखने से, कोई परमेश्वर की निन्दा करने से, और कोई दूसरे मनुष्यों को लूटने और उजाड़ने से बिलकुल नहीं हिचकते, यहाँ तक कि जो सबसे अधिक पवित्रता का दिखावा करते हैं, वे भी यदि अपने पड़ोसियों को नोचने-खसोटने का अवसर पा जाएँ, तो उन्हें हड्डियों तक काट खाएँगे।

उनकी क्रूरता इतनी अति की होगी कि वे मनुष्य नहीं, पशु ठहरेंगे। इसके अतिरिक्त वे चालाकी और कपट से भरे हैं। यदि वे झूठी शपथ खाकर किसी को धोखा दे सकें, तो उनके लिए यह कुछ बात ही नहीं। क्योंकि वे सब प्रकार की कुकर्मिता में अपना घोंसला बनाते हैं, और अपने आप को यह दिलासा देते हैं कि जब वे सुन्दर मुखौटा लगा लेंगे, तब परमेश्वर को उनके विषय में ओट का काम देना ही पड़ेगा, कि लोग कहें कि वे भक्त या पवित्र जन हैं। तो देखो, यह कपट डाकुओं की गुफा के समान है, जैसा हमारा प्रभु यीशु मसीह स्वयं उसे कहता है। और यह साधारण सी बात है कि मनुष्य जब रीतियों में लग जाते हैं, तो प्रधान बात को भूल जाते हैं, जैसा हमारा प्रभु यीशु भी उन्हें उलाहना देते हुए कहता है: "तुमने अपनी ही परम्पराओं के कारण मेरे पिता की व्यवस्था को रद्द कर दिया है।" और इसी कारण पाँचवें भजन में कहा गया है, "क्या तू समझता है कि मैं पशुओं का लहू पीऊँगा? यदि मैं भूखा होता (परमेश्वर कहता है) तो क्या तू सोचता है कि सब कुछ मेरा नहीं है? जो वस्तु मैं चाहता हूँ कि तू मुझे चढ़ाए, वह यह है, अर्थात् स्तुति का बलिदान।"

अब हम पौलुस का अभिप्राय देखते हैं। वह उन कपटियों का उपहास करता है जो समझते हैं कि जब मनुष्य परमेश्वर के पास जाएँ, तो यदि बहुत सा साज-सिंगार और खिलौने न हों, तो सब कुछ बिगड़ गया, और कि वे मानो झण्डा फहराते हुए ही उसके पास न जा पाएँगे। इसी के अनुसार हम देखते हैं कि वे चीज़ों को दीपकों, इत्रों और मोमबत्तियों, रंग-बिरंगे स्वांग के चोगों, पुतलों और ऐसी ही अन्य वस्तुओं की धूमधाम से कैसे सजाते हैं। जब उनके पास यह सामान हो जाता है, तो अपने ही विचार में वे ऐसे अच्छे ढँके होते हैं कि परमेश्वर को अब पता ही नहीं चलता कि वे क्या करते हैं, और कि उनके दोष ऐसी छाया में भली-भाँति आश्रय पाते हैं, और फिर भी इस सब के होते हुए वे उसे खुले आम चिढ़ाते ही हैं।

अब सन्त पौलुस उस राय का ठट्ठा उड़ाता है, कहता है कि यद्यपि हमारे पास उन ठाठों में से कुछ भी नहीं, फिर भी परमेश्वर के लिए हमें लगाए रखने को इसके अतिरिक्त बहुत कुछ है, और वह है प्रेम। परन्तु संक्षेप में, सन्त पौलुस यहाँ हमें यह बताना चाहता था कि परमेश्वर की सेवा आत्मिक है। क्योंकि जब हम अपने पड़ोसियों से प्रेम करते हैं, तो यह इस बात का चिह्न है कि हम परमेश्वर से प्रेम करते हैं, मेरा आशय है जब हम उनसे परमेश्वर की विधि के अनुसार प्रेम करते हैं। क्योंकि अपने लाभ के लिए किसी मनुष्य से प्रेम करना प्रेम नहीं है, परन्तु अपने शत्रुओं से भी प्रेम करना, इस रीति से कि हम अपने साथ किए गए अन्यायों को धीरज से सह लें, इस रीति से कि जिन्हें हमारी सहायता चाहिए उनकी भलाई करने में हम अपने आप को खींचकर लगाएँ, और इस रीति से कि हममें से कोई अपने ही लिए या अपने निजी लाभ के लिए न जिए, परन्तु हम एक देह के अंगों के समान जितना सम्भव हो एक दूसरे की सहायता का यत्न करें। यदि हम एक बार इस बिन्दु पर पहुँच जाएँ, तो हमारा जीवन हमारी ओर से पर्याप्त उत्तर देता है, और गवाही देता है कि हम परमेश्वर से प्रेम करते हैं। परन्तु उसे जानने से पहले हम उससे प्रेम नहीं कर सकते। इसलिए प्रेम एक अचूक चिह्न और लक्षण है कि हम परमेश्वर की सेवा करने को तैयार हैं, इस प्रकार नहीं कि उसे अनाज के बदले भूसा चुकाएँ, परन्तु अपने पड़ोसी से सच्चा और निष्कपट प्रेम करके।

और इसलिए पोप के अनुयायी अपने खिलौनों और रंग-बिरंगे तमाशों पर, जिनसे वे समझते हैं कि परमेश्वर को ठग लेंगे, मानो उसे हँसी का पात्र बना लेंगे, जितनी चाहें डींग मारें, फिर भी जो बात सन्त पौलुस के मुँह से यहाँ कही गई है, वह सदा अटल रहेगी, अर्थात् यह कि ऐसी बातें परमेश्वर के सामने कुछ भी मूल्य की नहीं हैं। और क्यों? क्योंकि यदि खतना, जब उसका समय और अवधि पूरी हो गई, मिटा दिया गया, तो उन वस्तुओं का क्या होगा जो मनुष्यों की अपनी कल्पनाओं की दुकानों में मूर्खता और ढिठाई से गढ़ी गई हैं, जिन्होंने वह अपने ऊपर ले लिया जो उनका नहीं था, और जिसे करना उनके लिए किसी रीति से उचित नहीं था? तो देखो, हमें क्या मन में रखना है।

परन्तु आगे बढ़ने से पहले हमें एक सन्देह का समाधान करना होगा जो पोप के अनुयायी यहाँ उठाते हैं। क्योंकि उनके विचार में यह पूरी तरह उनके पक्ष में जाता है कि सन्त पौलुस कहता है कि वह विश्वास जो प्रेम के द्वारा कार्य करता है, वही सब विश्वासियों को सिद्ध बनाता है। और इस पर वे निष्कर्ष निकालते हैं कि केवल विश्वास हमारे लिए अनुग्रह नहीं कमाता, परन्तु विश्वास और प्रेम दोनों मिलकर। मान लीजिए ऐसा ही हो, तो इससे उन्हें क्या लाभ? क्योंकि वे अपने पुण्यों की नींव बचकाने खिलौनों के सिवा और किस पर रखते हैं? मानो वे परमेश्वर को झुनझुने से मनाएँगे। परन्तु सन्त पौलुस का अभिप्राय बिलकुल और है। क्योंकि यद्यपि उसने अब तक परमेश्वर की कृपा में रहने का सच्चा मार्ग दिखाया है, तथापि वह हमारी धार्मिकता या उद्धार की आशा की नींव प्रेम पर नहीं रखना चाहता।

तो फिर क्या? उसके लिए यह दिखाना पर्याप्त है कि परमेश्वर के पास विश्वासियों को लगाए रखने के बहुत उपाय हैं, चाहे उनके पास वे रीतियाँ न हों जिनसे कपटी लोग उन्हें प्रधान बनाकर अपने आप को भरमाते हैं। संक्षेप में, हम देखते हैं कि सन्त पौलुस पोप के अनुयायियों का किसी प्रकार पक्ष लेने से इतनी दूर है कि वह सीधे उनसे लड़ता है। अब यहाँ जो कहा गया है उसके बहाने उन्होंने कल्पना कर ली है कि विश्वास केवल एक सादा ज्ञान है कि परमेश्वर है, और उसका एकलौता पुत्र यीशु मसीह मनुष्य जाति को छुड़ाने और बचाने के लिए जगत में आया है, चाहे वह ज्ञान किसी भावना के बिना हो, उससे अधिक नहीं जैसे कोई मनुष्य हमें कोई कहानी सुनाए, और हम उस पर विश्वास करें और उसे निश्चित मानें। पोप के अनुयायी विश्वास के विषय में इसी रीति से बोलते हैं, और कहते हैं कि जब विश्वास अकेला होता है, तब परमेश्वर के सामने उसका पूरा रूप नहीं बनता, परन्तु जब वह हृदय की भली इच्छा और परमेश्वर के प्रेम से जुड़ जाता है, तब, वे कहते हैं, वह पूरी तरह आकार पाता है।

परन्तु जब पवित्रशास्त्र हमसे विश्वास की बात करता है, तो उसका अर्थ वह ज्ञान है जो हमें पवित्र आत्मा से दिया जाता है: वह नहीं जो हमारे अपने मस्तिष्क में फड़फड़ाता है, परन्तु वह जो हमारे हृदयों में मुहरबन्द किया जाता है, इस रीति से कि हमारे विश्वास में प्रकाशित होने और ढलने से पहले परमेश्वर को हममें अवश्य आश्चर्यजनक कार्य करना पड़ा है, क्योंकि हमारे मनों में अन्धकार के सिवा कुछ नहीं। प्रकाश ऊपर से आना चाहिए। फिर, हम पूरी तरह अविश्वास की ओर झुके हुए हैं, और इसलिए पवित्र आत्मा को हम पर यह मुहर लगानी पड़ती है कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा पूरी तरह उद्धार पाए हैं।

इसके अतिरिक्त, यह जान लेना पर्याप्त नहीं कि सामान्य रूप से मसीह हमारा छुड़ानेवाला है, परन्तु विश्वास का अर्थ है कि हममें से हर एक उसे अपना छुड़ानेवाला माने। और क्या यह तब तक सम्भव है जब तक हमारा प्रभु यीशु हममें वास न करे और हममें राज्य न करे, और हम उसके प्रेम से ऐसे प्रज्वलित न हों कि अपने आप को पूरी तरह उसे सौंप दें? इसलिए पोप के अनुयायी कभी नहीं जान पाए कि विश्वास का क्या अर्थ है, यद्यपि वे उसके विषय में बकबक करते हैं, पर पिंजरे की मैनाओं जितना भी अच्छा नहीं, जो फिर भी इधर-उधर के कुछ शब्द समझती हैं, परन्तु वे ऐसी लज्जाजनक पशुता दिखाते हैं कि परमेश्वर के भयानक प्रतिशोध के तमाशा बन सकें, क्योंकि वे पवित्र आत्मा की सारी बोली को भूल गए हैं, और पवित्रशास्त्र की उन्हें उतनी भी समझ नहीं जितनी किसी अन्यजाति या तुर्क को होती है जो सदा मूर्तिपूजा में रहा और जिसने हमारे प्रभु यीशु मसीह के पिता परमेश्वर के विषय में कभी सुना ही नहीं। देखो, पोप के अनुयायी किस दशा में हैं।

अब आइए भली-भाँति ध्यान दें कि सन्त पौलुस ने यहाँ उनकी तरह कोई आकारहीन या अनगढ़ विश्वास नहीं गढ़ा, न प्रेम को हमारी धार्मिकता का कारण ठहराना चाहा, परन्तु केवल यह दिखाना चाहा कि हमारे पास परमेश्वर की सेवा करने को बहुत कुछ है, तुच्छ बातों के ढेर में अपने आप को उलझाए बिना। तथापि, कि हम इस पाठ से और अच्छा लाभ उठाएँ, (क्योंकि अब हमें समाप्त करना है, और समय हमें आगे बढ़ने नहीं देगा) यदि आज पोप के अनुयायी यह डींग मारते हैं कि उनके पास हमसे अधिक प्रत्यक्ष परमेश्वर की सेवा है, और ऐसी सेवा जिसकी चमक अधिक रंगीन है, तो हम अपनी ओर से भली-भाँति सचेत रहें कि हम उसके एक-एक अंश को तुच्छ जानें। क्यों? क्योंकि परमेश्वर मनुष्यों की पसन्द के अनुसार अपनी सेवा नहीं करवाएगा। इसे एक बात के रूप में ध्यान रखें। इसके अतिरिक्त, जिन बातों को पोप के अनुयायी परमेश्वर की सेवा कहते हैं, वे उनके अपने मस्तिष्क में कल्पित और गढ़ी हुई तुच्छ बातें हैं, इसलिए वह सब ठुकरा दिया गया है, चाहे मनुष्य उनमें बहुत आनन्दित हों और उन्हें बहुत पसन्द करें।

और इसलिए आइए हम ध्यान रखें कि परमेश्वर की सेवा वैसे करें जैसी वह आज्ञा देता है। वह हमें किसमें लगा हुआ देखना चाहता है? अनावश्यक बातों में नहीं, परन्तु वह हमारी सच्ची परीक्षा लेना चाहता है, जो धोखा नहीं देती। और वह क्या होगी? अपने पड़ोसियों के साथ सीधाई और विश्वासयोग्यता से चलना, हममें से हर एक का अपनी सामर्थ्य के अनुसार जहाँ आवश्यकता हो सहायता करना, कि कोई मनुष्य पूरी तरह अपने ही में न रमा रहे, कि हम भरोसे के योग्य हों, कि हम खरा और विश्वासयोग्य व्यवहार करें, कि हम मेल-मिलाप से जीएँ, और यदि हम किसी को सहायता से वंचित और अपनी सहायता का मोहताज देखें, तो उस अवस्था में हम मानो परमेश्वर को बलिदान चढ़ाएँ, यह जानते हुए कि वह हमें उसके लिए बुलाता है, कि हम दिखाएँ कि हम उससे कितना प्रेम रखते हैं। क्योंकि यदि हम अपने पड़ोसियों से, जो मानो भलाई करने के दृश्य आधार हैं, प्रेम नहीं रखते, तो हम परमेश्वर से, जिसे हम नहीं देखते, कैसे प्रेम रखेंगे (जैसा सन्त यूहन्ना अपनी पत्री में कहता है), जो हमसे अनुपस्थित है और जिसे किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं? इसलिए यदि हम परमेश्वर की सेवा भली-भाँति करना चाहें, तो आइए हम उसे वह आज्ञाकारिता देना सीखें जो उसे भाती है, अर्थात् हम ऐसी विश्वासयोग्यता और मित्रता में चलें कि हममें से कोई अपने पड़ोसी को न ठगे, न लूटे, न उस पर दाँव चलाए।

और इसके अतिरिक्त हम केवल सब अन्यायपूर्ण या दुष्ट व्यवहार से ही न बचें, परन्तु वे सब भी जो मसीही कहलाते हैं, हमारे प्रभु यीशु मसीह के उस वचन पर भली-भाँति विचार करें, जो यह है: "तुम पर हाय जो अपनी-अपनी अलग भक्तियाँ अकेले-अकेले रखते हो, और छोटी-छोटी तुच्छ बातों में अपने सिर खपाते हो, हर बात में विवेक का दिखावा करते हो, और इस बीच व्यवस्था की प्रधान बातें, अर्थात् विश्वासयोग्यता, न्याय, धार्मिकता और दया को अधूरा छोड़ देते हो।" मानो वह कहे, क्या यह अनोखी बात नहीं कि मनुष्य परमेश्वर से ऐसा ठट्ठा करें, उसका आदर करने का दिखावा करें, मानो वे उसे बच्चा ही समझते हैं? परमेश्वर चाहता है कि मनुष्य विश्वासयोग्यता और सीधाई से चलें, वह चाहता है कि हर मनुष्य दीन-दुखी पर तरस खाए और उसकी सहायता करे, वह चाहता है कि कोई अपने भाई के साथ अन्याय न करे, और देखो, वे इसके उलट पानी में चाँदनी जैसी बातों और निकम्मी वस्तुओं में अपने आप को व्यस्त रखना चाहते हैं। वे क्रूरता, चालाकी और द्वेष से भरे होंगे, और फिर भी समझते हैं कि निकम्मी वस्तुओं से परमेश्वर को मना लेंगे। इसलिए आइए हम प्रेम के साथ परमेश्वर की सेवा करना सीखें, अर्थात् उन बातों में लगना सीखें जिनके लिए वह हमें बुलाता है, और उस नियम पर, जो वह अपने वचन से हमें देता है, मानो अटल बने रहें।

इसके अतिरिक्त, जब हम इस रीति से सीधाई से चलें, तो मनुष्यों के कारण परमेश्वर को न भूलें। क्योंकि (जैसा मैंने पहले कहा) यही वह बात है जिसमें वह हमारे प्रेम को परखता है, और इसी से हम उसके प्रति अपना आदर और प्रेम दिखाते हैं। और इसलिए जब हम अपने पड़ोसियों से प्रेम करते हैं, तब भी परमेश्वर को पुकारना नहीं छोड़ते, और न उनकी सेवा के बहाने परमेश्वर को अप्रसन्न करने का इरादा रखते हैं, परन्तु वह सदा हमारा लक्ष्य रहता है जिस पर हमारी आँखें लगी हैं। तथापि, अन्त में, जैसे हम यत्न करते हैं कि उसके वचन के अनुसार, जैसा परमेश्वर आज्ञा देता है, जीएँ, और कपटियों के रंग-बिरंगे साज-सामान, खिलौनों और रीतियों की परवाह न करें, परन्तु जीवन की शुद्धता में और सब विश्वासयोग्यता और सीधे व्यवहार में (जैसा मैंने पहले कहा) ठीक-ठीक चलें, यह जानते हुए भी कि जब हम सब कुछ कर चुकें, तब भी वह हमें धर्मी ठहराने या उसकी दृष्टि में हमारी कृपा मोल लेने के काम नहीं आता, और यद्यपि हम निश्चित हैं कि उसका आदर करने की जो इच्छा हममें है, उसे वह भला मानकर ग्रहण करता है, फिर भी उसका ऐसा करना केवल इसलिए है कि वह हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह में ग्रहण करता है (जैसा मैं पहले बता चुका हूँ) और इसलिए कि हम अपने उद्धार का भरोसा उसी में रखते हैं।

ठीक इसी प्रकार हम प्रेम में भी चलेंगे और अपना कर्तव्य निभाने का परिश्रम करेंगे, यह जानते हुए कि अपनी निर्बलता के कारण हम उस लक्ष्य के निकट भी नहीं पहुँच सकते जिसकी ओर परमेश्वर हमें संकेत करता है, फिर भी हम उसी ओर के मार्ग पर हैं, और उसे हम पर दया करके हमें ग्रहण करना ही पड़ेगा, जिस पर हमें सन्देह नहीं कि हमारे सब कर्म उसे भाते हैं जब वे हमारे प्रभु यीशु मसीह के लहू के द्वारा उसे ऐसे समर्पित किए जाएँ, क्योंकि वही सच्चा याजक है जो हमारी भेंटें चढ़ाता है और उन्हें परमेश्वर को ग्रहणयोग्य बनाता है, और उसे आगे आकर हमारे कर्मों को उसके पिता परमेश्वर को प्रिय बनाना ही पड़ेगा, विशेषकर यह देखते हुए कि हमारी प्रार्थनाएँ भी और वे स्तुतियाँ भी जो हम उसे चढ़ाते हैं, यदि हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा शुद्ध न की जाएँ तो गन्दगी ही ठहरेंगी, जैसा प्रेरित भी कहता है कि उसी के द्वारा हम परमेश्वर को अपने होठों के बछड़े चढ़ाते हैं, अर्थात् स्तुति के वे बलिदान जिनसे वह महिमा पाता है।

अब आइए हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने दोषों को स्वीकार करते हुए गिर पड़ें, उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उन्हें और अधिक समझाए, और हम उनसे ऐसे छुए जाएँ कि वे हमें सच्चे पश्चाताप तक पहुँचाएँ, और हम अपनी सब घटियाँ हमारे प्रभु यीशु मसीह में ढूँढ़ें, और हममें ऐसी दीनता हो कि पूरी तरह नीचे गिराए जाकर, और सब झूठे घमण्ड को, जिससे हम धोखा खा सकते हैं, दूर करके, हम और किसी लक्ष्य की ओर न बढ़ें सिवा इसके कि हमारे परमेश्वर की केवल दया से ग्रहण किए जाएँ, कि हम अनन्त मीरास तक पहुँचें, और इस बीच उसकी आज्ञाओं में ऐसे चलने का यत्न करें कि उसे भाए कि हमारी निर्बलता को सहे, जब तक वह उसे हमसे पूरी तरह दूर न कर दे। और इसलिए आइए हम सब कहें, "हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता..."

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