अध्याय 14

बारहवाँ उपदेश, जो दूसरे अध्याय पर छठा है - गलातियों 2:15-16

Sermons upon Galatians · John Calvin

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बारहवाँ उपदेश, जो दूसरे अध्याय पर छठा है - गलातियों 2:15-16

बारहवाँ उपदेश

जो दूसरे अध्याय पर छठा है।

15 हम जन्म से यहूदी हैं, और अन्यजातियों के पापी नहीं।

16 तो भी यह जानकर कि मनुष्य व्यवस्था के कामों से नहीं, परन्तु यीशु मसीह पर विश्वास करने से धर्मी ठहरता है, हमने भी यीशु मसीह पर विश्वास किया, कि हम मसीह पर विश्वास करने से धर्मी ठहरें, न कि व्यवस्था के कामों से; क्योंकि व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी धर्मी न ठहरेगा।

हम पहले ही देख चुके हैं और बता चुके हैं कि सन्त पौलुस ने, जब उसे हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने से पहले की रीति-विधियों और छायाओं की चर्चा करनी थी, क्यों सामान्य रूप से यह निष्कर्ष निकाला कि मनुष्य परमेश्वर के सम्मुख उसकी कृपादृष्टि में खड़े होने के लिए धार्मिकता को सारी व्यवस्था का पालन करने के सिवा किसी और रीति से प्राप्त नहीं कर सकते।

अब कोई पहली दृष्टि में सोच सकता है कि ये अलग-अलग बातें थीं। तो भी (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) पौलुस के लिए आवश्यक था कि वह [रीति-विधियों के] शुद्ध प्रयोजन पर आए, ताकि दिखाए कि जब मनुष्य अपने ही पुण्य के बल पर परमेश्वर के हाथ से कृपा पाने का विचार करते हैं, तो वे अपने आपको ही धोखा देते हैं।

दूसरे, मैंने यह भी बताया कि सन्त पौलुस ने "व्यवस्था" शब्द को स्पष्ट रूप से क्यों जोड़ा। क्योंकि यद्यपि संसार में सदा यह सामान्य धारणा रही है कि भली रीति से जीने के द्वारा मनुष्य परमेश्वर को बाध्य कर सकते हैं कि वह उन पर भला हो, तो भी वे इसमें अत्यन्त घोर रूप से अपने आपको धोखा देते थे। क्योंकि हम जो कुछ कर लें, परमेश्वर हमारा तनिक भी ऋणी नहीं होगा, क्योंकि हम जो कुछ कर सकते हैं वह सब हम पर उसका ऋण है।

फिर कोई पुण्य नहीं है (यदि कहीं कोई पुण्य हो भी सके) सिवाय उस वाचा के कारण जो परमेश्वर ने बाँधी है, जब उसने कहा कि जो व्यवस्था को पूरा करेगा वह जीवन और उद्धार पाएगा। क्योंकि परमेश्वर ने यह वचन कहा है, इसलिए निःसन्देह वह उस आज्ञाकारिता को जो उसे दी जाती है ऐसा स्वीकार करता है मानो वह उद्धार के योग्य हो। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि हम कुछ भी कमा सकते हैं।

क्योंकि हम सबमें से कोई ऐसा नहीं जो अपना कर्तव्य पूरा करता हो, जैसा हम आगे देखेंगे। वह प्रतिज्ञा व्यर्थ ठहरती, या कम से कम निष्फल होती, ऐसी कि कभी पूरी न होती, यदि परमेश्वर हमें कोई और उपाय न देता, अर्थात् यदि वह हमारे अपराध क्षमा न करता और हमें धर्मी न ठहराता, जबकि हम वैसे नहीं हैं।

परन्तु बात चाहे जैसी हो, जब सन्त पौलुस कहता है कि हम व्यवस्था के कामों से धर्मी नहीं ठहरते, तो उसका अर्थ यह है कि यदि हम इस आधार पर कृपा और उद्धार का दावा करना चाहें कि परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है कि जो उसकी व्यवस्था का पालन करते हैं वे धर्मी होंगे और वैसे माने जाएँगे, तो यह हमारे काम न आएगा। क्योंकि हम में से कोई व्यवस्था को पूरा नहीं करता, परन्तु हम सब परमेश्वर के सम्मुख दोषी हैं और अपने सिर पर दण्ड की आज्ञा उठानी पड़ेगी।

इसे और भली रीति से प्रकट करने के लिए वह यहूदियों और अन्यजातियों के बीच तुलना करता है। वह कहता है, यद्यपि हम जन्म से यहूदी हैं, और अन्यजाति के लोग नहीं, तो भी हम जानते हैं कि हम परमेश्वर की कृपा हमारे प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करने के सिवा और किसी रीति से नहीं पा सकते।

अब शायद ऐसा लगे कि यद्यपि मनुष्य आदम में बिगड़ जाने के कारण कुछ भी कमा नहीं सकते, तो भी यहूदियों को एक विशेष अधिकार प्राप्त था, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें मानो अपनी सन्तान के रूप में गोद लिया था और उन्हें अपने घराने के लोग गिना था।

और यही वह बात थी जिसमें यहूदी अपने आपको धोखा देते थे। क्योंकि जब पवित्रशास्त्र खतनारहित अवस्था की चर्चा करता है, तो उसका अर्थ उस अशुद्धता से है जिससे हम आदम में घिरे हुए हैं, यहाँ तक कि कोई मनुष्य ऐसा नहीं जो अपनी माता के गर्भ से ही दण्ड के योग्य न ठहरा हो। परन्तु यहूदी समझते थे कि परमेश्वर ने उन्हें उस सामान्य श्राप से छुड़ा दिया है, और वे इस पर घमण्ड करते थे।

निश्चय ही परमेश्वर का उन्हें इस रीति से अपनी प्रजा और मीरास के रूप में चुनना बड़ी प्रतिष्ठा की बात थी, और संसार की सब वस्तुओं से बढ़कर मूल्यवान समझे जाने के योग्य थी। तो भी उन्हें पूरी दीनता से यह मानना उचित था कि उनके अपने व्यक्तित्व में कोई श्रेष्ठता नहीं थी।

क्योंकि परमेश्वर के अनुग्रहपूर्ण दानों को व्यर्थ अभिमान की ओर खींच ले जाने की हमारी पुरानी आदत के अनुसार, यहूदी प्रायः यह मानकर अपनी सीमा लाँघ जाते थे कि वे संसार के बाकी सब लोगों से ऊपर हैं; मानो परमेश्वर ने उनमें कुछ ऐसा पाया हो जिसके कारण उसे उन्हें उन लोगों से पहले चुनना चाहिए जिन्हें उसने त्याग दिया था।

इसलिए उनका यह व्यवहार बड़ा घमण्ड था, जिसके साथ लज्जाजनक कृतघ्नता भी थी, क्योंकि जो कुछ उन्हें उसके मुफ्त दान से मिला था उसे उन्होंने परमेश्वर की केवल भलाई के खाते में नहीं डाला, परन्तु अभिमान से फूल गए मानो परमेश्वर ने जान लिया हो कि वे अन्यजातियों से अच्छे हैं या अनन्त उद्धार के अधिक योग्य हैं।

परन्तु अब सन्त पौलुस सब अभिमान को दूर करने के लिए कहता है, "अच्छा, हम जन्म से यहूदी हैं।" मानो उसने कहा हो, यह सच है कि हमें उन अन्यजातियों से कुछ बढ़कर कृपा मिली है जिन्हें परमेश्वर ने अपनी कलीसिया में ग्रहण करना उचित न समझा।

जब वह इस रीति से बोलता है, तो वह यहूदियों को घमण्डी होने का अवसर देने के लिए नहीं, परन्तु उन्हें वे बातें स्मरण दिलाने के लिए बोलता है जो उन्हें परमेश्वर से मुफ्त मिली थीं, जिनमें उनके पास अपने ऊपर घमण्ड करने का कोई कारण नहीं था। जैसा हम रोमियों की पत्री में देखते हैं, वह दो ऐसी बातें कहता है जो पहली दृष्टि में एक-दूसरे के विपरीत लग सकती हैं।

क्योंकि एक ओर वह कहता है, "तो क्या हमें अन्यजातियों से कोई विशेष अधिकार नहीं? हाँ, निश्चय है, क्योंकि परमेश्वर ने हमें अपनी प्रजा होने के लिए चुना है, उसने हमें खतने की मुहर दी कि दिखाए कि वह हमें अपनी सन्तान मानता है, उसने हमारे साथ वाचा बाँधी है, उसने हमें संसार के छुड़ानेवाले की प्रतिज्ञा दी है, और (संक्षेप में) उसने हमें इस प्रकार पवित्र ठहराया है कि यदि हम उस कृपा पर विचार करें जो उसने हम पर प्रकट की है, तो हमें सारे संसार के बाकी लोगों से ऊपर उठाने और बढ़ाने के लिए बहुत कुछ था।"

इस प्रकार एक ओर पौलुस वहाँ परमेश्वर की भलाई को बड़ा करके दिखाता है, और फिर वह दोबारा प्रश्न करने लगता है और पूछता है, "तो हमें क्या लाभ हुआ? कुछ भी नहीं," वह कहता है, "क्योंकि सब मनुष्य परमेश्वर के श्राप के अधीन बन्द हैं। यदि अन्यजातियाँ दोषी ठहरें, तो हम दुगुने दोषी ठहरेंगे, क्योंकि उनके लिए तो अब भी कुछ सम्भावना हो सकती है कि अज्ञानता उनके बचाव में काम आए। फिर भी वे परमेश्वर के सम्मुख इसकी कोई सफाई नहीं दे सकते, वरन् नाश होंगे, चाहे उन्हें कभी कोई शिक्षा या उपदेश मिला ही न हो।"

वह कहता है, तब तो हमें अवश्य व्यवस्था के द्वारा दोषी ठहरना पड़ेगा, क्योंकि परमेश्वर ने हमें सिखाया है, और फिर भी हम पाप करना और उसकी आज्ञाओं का उल्लंघन करना नहीं छोड़ते, यहाँ तक कि हम अन्यजातियों और अविश्वासियों से भी अधिक बड़े और गहरे श्राप में डूबे हैं। अब वह कहता है कि यहूदी निश्चय एक प्रकार से अन्यजातियों से अलग किए गए हैं, इसलिए नहीं कि यहूदी अधिक योग्य हैं या उनमें अपनी कोई धार्मिकता है, परन्तु इसलिए कि परमेश्वर ने अपनी ही केवल भलाई से उन्हें चुनना चाहा; जैसे आज के दिन विश्वासी माता-पिताओं से उत्पन्न बच्चे उन बच्चों से अच्छे नहीं हैं जो मूर्तिपूजकों और तुर्कों से उत्पन्न होते हैं, यदि कोई दोनों को उनके अपने स्वभाव के अनुसार देखे।

क्योंकि हम सब एक बिगड़े और श्रापित पिण्ड के हैं, और परमेश्वर ने हमें ऐसा दोषी ठहराया है कि कोई मनुष्य उचित रूप से अपने आपको अपने साथियों से अधिक मूल्यवान समझकर अकड़ नहीं सकता। फिर भी सन्त पौलुस दिखाता है कि वे पवित्र किए गए हैं, और अशुद्ध नहीं हैं, जैसे वे हैं जो अविश्वासियों या मूर्तिपूजकों से उत्पन्न होते हैं।

यहाँ कुछ विरोध-सा दिखता है; तो भी सब बातें बहुत अच्छी तरह मेल खाती हैं। क्योंकि हम सब में बिना किसी अपवाद के अशुद्धता और मलिनता ही है, और यह स्वभाव से आती है। परन्तु एक अलौकिक दान भी है, अर्थात् एक उपाय जो परमेश्वर देता है, कि विश्वासियों की सन्तानें उसके लिए समर्पित हैं, और वह उन्हें अपना मानता और स्वीकार करता है।

इसलिए जैसे आजकल कलीसिया में उत्पन्न बच्चे परमेश्वर की प्रजा और चुने हुओं की मण्डली में गिने जाते हैं, वैसे ही व्यवस्था के अधीन यहूदी बाकी संसार से अलग किए गए थे। और इसी कारण सन्त पौलुस कहता है, "हम यहूदी हैं, और अन्यजातियों के पापी नहीं।"

जब वह "पापियों" की चर्चा करता है, तो उसका अर्थ उनसे है जो अपनी मलिनता में बने रहते हैं और परमेश्वर के अनुग्रह से शुद्ध नहीं किए गए। क्योंकि खतना इस बात का चिह्न और साक्षी था कि परमेश्वर ने अब्राहम की सन्तान और वंश को अपना घराना और निज प्रजा करके स्वीकार किया।

इसलिए जिस बात में यहूदी प्राचीन काल में अविश्वासियों से भिन्न थे, वह यह थी कि यद्यपि वे सब एक ही जैसे थे, क्योंकि वे सब बिना भेद के आदम की सन्तान थे, तो भी परमेश्वर ने एक दल को चुना और दूसरे दल को अपने घराने से अजनबी ही रहने दिया।

यदि कोई पूछे कि उसने ऐसा क्यों किया, तो उसकी अपनी केवल कृपा के सिवा और कोई कारण नहीं था, और फिर भी इस बीच यहूदी अधिक उत्तम नहीं थे। परन्तु अब हम उस बात का अनुसरण करें जिसकी चर्चा सन्त पौलुस यहाँ करता है। वह कहता है, "हम जानते हैं कि हम व्यवस्था के कामों से नहीं, परन्तु यीशु मसीह पर विश्वास करने से धर्मी ठहर सकते हैं।" यह कहकर वह दिखाता है कि यहूदी भी (जो भी अनुग्रह उन्हें मिला हो) न तो दूसरे मनुष्यों पर, और न अपने ऊपर भरोसा रख सकते थे, मानो उन्होंने परमेश्वर के हाथ से कुछ कमाया हो, परन्तु उन्हें विवश होकर उसकी मुफ्त भलाई की शरण लेनी पड़ेगी, यह मानते हुए कि यीशु मसीह के सिवा कोई उद्धार नहीं, जो उसे ढूँढ़ने आया जो खो गया था।

और इसी में वह बात पूरी होती है जो वह दूसरे स्थान पर कहता है, कि जो निकट थे और जो दूर थे, सब एक में इकट्ठे किए गए। यीशु मसीह वह मेल करानेवाला है कि परमेश्वर हमसे प्रेम करे और हम पर दया करके हमें ग्रहण करे: केवल उन्हें नहीं जो पहले दूर थे, अर्थात् अन्यजातियों को, परन्तु अब्राहम की सन्तान को भी, चाहे उनमें कैसी भी कुलीनता या प्रतिष्ठा हो, क्योंकि वह उनके अपने स्वभाव से नहीं आई थी।

और हम ध्यान दें कि जब सन्त पौलुस कहता है कि जो यहूदी मसीही विश्वास में फिरे थे वे जानते थे कि वे व्यवस्था के कामों से नहीं, परन्तु यीशु मसीह पर विश्वास करने से धर्मी ठहर सकते हैं, तो वह विश्वास और व्यवस्था की तुलना करता है, यह दिखाने के लिए कि हम अनुग्रह से धर्मी नहीं ठहर सकते जब तक अपने सब पुण्यों को न छोड़ दें; और यह बात ध्यान देने के भली-भाँति योग्य है।

क्योंकि पोप के अनुयायी यह तो मान ही लेते हैं कि हम विश्वास से धर्मी ठहरते हैं, परन्तु वे जोड़ते हैं कि वह केवल आंशिक रूप से है। पर यह टीका सब कुछ बिगाड़ देती है। क्योंकि यहाँ प्रमाणित होता है कि हम परमेश्वर के सम्मुख धर्मी नहीं पाए जा सकते सिवाय हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा और उस उद्धार पर भरोसा रखने से जो उसने हमारे लिए मोल लिया है। पोप के अनुयायी यह भली-भाँति देखते हैं: इसलिए दिखावे के लिए वे कहते हैं कि हम विश्वास से धर्मी ठहरते हैं, परन्तु केवल विश्वास से नहीं; वे उसे नहीं मानेंगे। यही वह बात है जिसके विरुद्ध वे लड़ते हैं: और यही मुख्य मुद्दा है जो उनके और हमारे बीच विवाद में है।

परन्तु सन्त पौलुस यहाँ उनकी पशुता प्रकट कर देता है जब वह कहता है, "परन्तु विश्वास करने से।" क्योंकि इस शब्द का अर्थ यह है कि जो कुछ मनुष्य परमेश्वर की कृपा जीतने के लिए उसके पास लाने का साहस करते हैं, वह सब पूरी तरह काट दिया गया। इसलिए तुम देखते हो कि जब सन्त पौलुस दृढ़ता से कहता है कि विश्वास के सिवा और कोई उपाय नहीं, तब सब पुण्य के लिए द्वार बन्द हो जाता है। हम आगे और स्पष्ट देखेंगे कि विश्वास की तुलना व्यवस्था से क्यों इस प्रकार की गई है, मानो वह उसके ठीक विपरीत हो।

क्योंकि व्यवस्था यह मानकर चलती है कि यदि हमने एक बार परमेश्वर की आज्ञाएँ पूरी कर दीं, तो हम अच्छे दास गिने जाएँगे, और वह हमें वह मजदूरी देगा जिसकी उसने प्रतिज्ञा की है; और विश्वास यह मानकर चलता है कि हम अभागे, दोषी और खोए हुए लोग हैं, और जिन वस्तुओं की हमें घटी है उन्हें हमें यीशु मसीह में ढूँढ़ना होगा।

उदाहरण के लिए, दो मनुष्य हैं जो भोजन और ठहरने की जगह चाहते हैं: उनमें से एक अपने साथ पैसा लाता है और अपने भली-भाँति दाम चुकाने के कारण अच्छा आतिथ्य पाने की आशा रखता है; दोनों बात चाहे जैसी हो, खाना-पीना माँगते हैं, परन्तु दूसरा मनुष्य कंगाल है, और उसके पास न पैसा है न पैसे की कोई वस्तु, और वह भिक्षा माँगता है।

इस प्रकार वे दोनों ठीक एक ही बात में समान हैं, क्योंकि वे दोनों भोजन चाहते हैं, जिसकी उन दोनों को आवश्यकता है। परन्तु पहले के पास अपने मेज़बान को सन्तुष्ट करने के लिए पैसा है, और जैसे उसने अच्छा खाया और भली-भाँति तथा शिष्टता से उसका सत्कार हुआ, वैसे ही उसका मेज़बान उससे पैसा पाएगा, और उससे सन्तुष्ट रहेगा, और अपने अतिथि को अपना कृतज्ञ या ऋणी न समझेगा। क्योंकि उसे बदला मिल गया, वरन् उससे लाभ भी हुआ।

परन्तु जो कंगाल भिक्षा माँगता है, वह अपने जीवन के लिए अपने आपको उसका कृतज्ञ समझता है जिसने उसे खिलाया और ठहराया: क्योंकि वह उसके लिए बोझ के सिवा कुछ नहीं लाता। तो यदि हम परमेश्वर के सम्मुख व्यवस्था के द्वारा धर्मी ठहरना चाहें, तो हमें उसे कमाना होगा, ऐसे कि वह हमसे पाए और हम उससे पाएँ, और हमारे बीच मानो अदला-बदली हो। और क्या यह सम्भव है? नहीं: जैसा हम आगे विस्तार से देखेंगे। इसलिए हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि हम व्यवस्था की धार्मिकता से बाहर कर दिए गए हैं, और यदि हम कुछ भी लाकर परमेश्वर को बाँधना चाहें तो हम उसके क्रोध को ही भड़काते हैं।

तब उसके पास कंगाल भिखारियों की नाईं जाने और इस प्रकार विश्वास से धर्मी ठहरने के सिवा और कोई उपाय नहीं: ऐसे नहीं कि वह कोई गुण है जो हमारा अपना है, परन्तु इसलिए कि हम पूरी दीनता से मानते हैं कि हम उसके मुफ्त दान के सिवा उद्धार नहीं पा सकते। तो तुम देखते हो कि यहाँ व्यवस्था विश्वास के ठीक विपरीत रखी गई है, मानो सन्त पौलुस हमें बता रहा हो कि जो अपने ही पुण्य से परमेश्वर की कृपा जीतने का यत्न करते हैं वे हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह को त्याग देते हैं, जैसा आगे और विस्तार से बताया जाएगा।

परन्तु अब यदि कोई कहे कि व्यवस्था परमेश्वर की ओर से दी गई थी, इसलिए उसका उस विश्वास के विरुद्ध होना सम्भव नहीं जिसका कर्ता भी परमेश्वर ही है: तो इसका उत्तर सरल है। क्योंकि परमेश्वर ने दिन और रात, आग और पानी, ठण्ड और गर्मी, सब बनाए हैं।

अब यह निश्चित है कि दिन रात का विरोधी नहीं है: परन्तु हम परमेश्वर की भलाई और बुद्धि की अद्भुत व्यवस्था देखते हैं, कि मनुष्यों के पास दिन में अपना काम करने के लिए सूर्य का प्रकाश है, और रात में विश्राम करने के लिए मानो एक आवरण के रूप में [अन्धकार] है। इसलिए यद्यपि दिन रात से भिन्न है, तो भी उनके बीच कोई विरोध नहीं, और न आग और पानी के बीच है, यदि हर सृष्ट वस्तु अपने उचित प्रयोग में लगाई जाए: परन्तु हम देखते हैं कि परमेश्वर ने आग और पानी का बहुत अच्छा मेल कराया है, तो भी यदि हम उन्हें आपस में लड़ते देखें, तो बड़ा विरोध है। ठीक वैसा ही व्यवस्था और सुसमाचार के बीच है। और यदि कोई चाहे कि मनुष्य व्यवस्था से भी और सुसमाचार से भी धर्मी ठहरे, तो वह केवल बातों को उलझाता और मिलाता है, और यह ऐसा ही है मानो वह आकाश और पृथ्वी को आपस में भिड़ा दे।

संक्षेप में, आग और पानी को मिलाना कहीं सरल होगा, इसकी अपेक्षा कि यह कहा जाए कि हम अपने ही योग्य कामों से परमेश्वर के हाथ से कोई अनुग्रह मोल ले सकते हैं, और साथ ही हमें अपने प्रभु यीशु मसीह की सहायता की भी आवश्यकता हो। परन्तु यदि कोई विचार करे कि व्यवस्था क्या है और किस उद्देश्य से दी गई थी, तो वह पाएगा कि वह सुसमाचार के बिलकुल विरुद्ध नहीं है, और इसलिए विश्वास के भी विरुद्ध नहीं, परन्तु वे भली-भाँति मेल खाते हैं। इस प्रकार तुम देखते हो कि यह कठिनाई कैसे दूर की गई: इसलिए यदि यह कहा जाए कि विश्वास भी परमेश्वर से आता है जैसे व्यवस्था, तो यह सच है। तो भी (जैसा हम आगे कहेंगे) यह विचार करना चाहिए कि परमेश्वर ने एक और दूसरी, दोनों को किस उद्देश्य से दिया।

परन्तु जो सन्त पौलुस कहता है उसकी ओर लौटें। वह कहता है कि हम हमारे प्रभु यीशु मसीह के विश्वास के सिवा धर्मी नहीं ठहरते। जब वह धर्मी ठहरने की चर्चा करता है, तो ध्यान दें कि यह परमेश्वर के सम्मुख धर्मी गिने जाने या माने जाने के समान ही है। और इस शब्द को भली-भाँति समझना आवश्यक है: क्योंकि बात इसी पर टिकी है कि हम किस रीति से उद्धार पाते हैं। परन्तु क्या हम अभागे दुखिया नहीं, यदि हम संसार में बहुत दिन जीने के बाद भी, जब कोई हमसे पूछे कि उद्धार पाने का उपाय क्या है, तो उसे बता न सकें? हम बहुत-से पशु-समान अभागे देखेंगे, जिन्होंने परमेश्वर की रोटी खाई है, और फिर भी यह नहीं बता सकते कि वे उसके सम्मुख अपने आपको कैसे प्रस्तुत करें।

और इसलिए हमारे लिए उचित है कि हम उन बातों पर और भी अच्छी तरह ध्यान दें जो सन्त पौलुस हमें यहाँ सिखाता है। वह कहता है कि हम धर्मी ठहराए जाते हैं: और कैसे? क्या इसलिए कि हम धर्मी हैं, और हममें कोई कमी नहीं? नहीं: परन्तु इसलिए कि परमेश्वर हमें स्वीकार करता है। तब "धार्मिकता" शब्द उस कृपा के लिए रखा गया है जो परमेश्वर हम पर दिखाता है, कि वह हमारा पिता होना और हमें अपनी सन्तान गिनना स्वीकार करता है।

यदि कोई पूछे कि पवित्रशास्त्र "धर्मी ठहराना" शब्द क्यों प्रयोग करता है, जबकि यह कुछ प्रयोजन की बात नहीं लगती: क्योंकि यह कहना ठीक होता कि परमेश्वर हमसे प्रेम करता है, परमेश्वर हम पर तरस खाता है, परमेश्वर हमारा पिता और उद्धारकर्ता होना स्वीकार करता है: [और इसलिए] मनुष्य यह कहने की अपेक्षा कि वह हमें धर्मी ठहराना स्वीकार करता है, यही बोलने का ढंग क्यों न अपनाएँ? [मैं उत्तर देता हूँ,] पवित्रशास्त्र बिना कारण ऐसा नहीं कहता। क्योंकि यदि हम "उद्धार" शब्द को कच्चे रूप में लें, और [इससे अधिक कुछ न] कहें कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह से उद्धार पाते हैं: तो हम भली-भाँति न समझ पाएँगे कि हमारी अपनी दशा क्या है, वह कितनी अभागी है, और उसका वह उपाय भी जो हमें उस पर लगाना है। क्योंकि इसलिए कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह पर भरोसा रख सकें, हमें समझना होगा कि हम आदम के पाप के कारण भी, और उन असंख्य अधर्मों के कारण भी जिनमें हम सने हैं, सर्वथा खोए हुए हैं: वरन् हमें इसका पूरा विश्वास भी करना होगा। परन्तु हम कभी न समझते कि हमारे पाप हमें परमेश्वर के सम्मुख दोषी और श्रापित ठहराते हैं, यदि हम न जानते कि हमें धार्मिकता की आवश्यकता है।

और दूसरी ओर हम परमेश्वर की धार्मिकता को न जानते, यदि हम केवल इतना कहें कि हम विश्वास और अनुग्रह से उद्धार पाते हैं।

क्योंकि परमेश्वर कभी अपने आपको नहीं छोड़ सकता, क्योंकि वह सर्वोच्च धार्मिकता है, और उसमें पवित्रता और सिद्धता के सिवा कुछ नहीं, जिसके कारण वह बुराई से अवश्य घृणा करता है। अब बात यह है कि हम भ्रष्टता से भरे हैं, हम में बुराई के सिवा कुछ नहीं: और इसलिए परमेश्वर को अवश्य हमसे घृणा करनी होगी। और यदि वह हमसे घृणा करता है, तो हाय हम पर: क्योंकि तब हम दोषी ठहरे हैं। तब हमारे लिए आवश्यक है कि परमेश्वर की कृपा में आने से पहले हम धर्मी बनाए जाएँ। अर्थात् हमारे लिए आवश्यक है कि हम अपने दोषों और कुकर्मों से शुद्ध किए जाएँ, क्योंकि नहीं तो (जैसा मैंने कहा) हम कभी यह समझ न पाएँगे कि परमेश्वर हम पर दया करना चाहता है।

परन्तु अपने आपको पापी मानने से हम तुरन्त समझ लेते हैं कि परमेश्वर को अवश्य पाप से घृणा करनी होगी, और यद्यपि वह पाप से घृणा करता है, तो भी वह हमें बचाने का उपाय निकालता है, जो यह है कि हमारे अपराधों को भुला दे, और उन्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह के लहू से धोकर शुद्ध करे, जो हमारा आत्मिक स्नान है। इसलिए परमेश्वर हमें इस रीति से शुद्ध करता है, कि हम उसके द्वारा ग्रहण किए जाएँ, और उसके प्रेम के भागी बनकर अपने उद्धार का निश्चय रखें। तो तुम देखते हो कि पवित्रशास्त्र "धर्मी ठहराना" शब्द क्यों प्रयोग करता है: परन्तु पोप के अनुयायी इस पर अन्धे गिद्धों की नाईं टीका करते हैं। वे कहते हैं, क्या? क्या हम विश्वास से धर्मी ठहरें? विश्वास ऐसा गुण नहीं जो मनुष्यों को सिद्ध बनाए: तो वह हमें धर्मी कैसे बनाएगा? वे यह नहीं सोचते कि यह धार्मिकता जिसकी पवित्रशास्त्र चर्चा करता है, वह परमेश्वर का हमारे पापों को ढाँप देना है (जैसा मैंने पहले बताया) और हमारे प्रभु यीशु मसीह के कारण और उसके द्वारा, और उसकी मृत्यु और दुःखभोग के बलिदान के सामर्थ्य से, उन्हें बिलकुल और पूरी तरह दूर कर देना है।

बात चाहे जैसी हो, कहा गया है कि हम परमेश्वर के सम्मुख धर्मी गिने जाते हैं, क्योंकि वह हमारे पापों को छोड़ देता और क्षमा करता है। और इसी रीति से सन्त पौलुस रोमियों के चौथे अध्याय में इसकी चर्चा करता है, जहाँ वह कहता है कि दाऊद ने सार रूप में भली-भाँति बताया है कि हम विश्वास से कैसे धर्मी ठहरते हैं, जब वह कहता है, "धन्य है वह मनुष्य जिसके अधर्म परमेश्वर ने भुला दिए, और जिसके पापों को उसने ढाँप दिया।" और दूसरे स्थान पर वह कहता है, कि हमारा प्रभु यीशु मसीह जो पाप से अनजान था, और जिसमें कोई दाग न था, हमारे लिए पाप ठहराया गया: अर्थात् उसने हमारे दोषों का सारा दण्ड अपने ऊपर ले लिया, ताकि हम उसमें परमेश्वर की धार्मिकता बन जाएँ, अर्थात् इसलिए कि उसके व्यक्तित्व में कलम की नाईं लगाए जाकर और उसके साथ एक देह बनकर हम धर्मी गिने जाएँ, क्योंकि उसकी आज्ञाकारिता में ऐसी सिद्धता थी कि हमारे पाप गाड़ दिए गए और बिलकुल दूर कर दिए गए। "धर्मी ठहराना" शब्द के विषय में इतना ही।

अब "विश्वास" शब्द के विषय में, सन्त पौलुस व्याख्या के लिए जोड़ता है कि उन्होंने यीशु मसीह पर विश्वास किया था। यदि कोई किसी अनपढ़ व्यक्ति से पूछे कि विश्वास क्या है: तो शायद वह उत्तर दे कि विश्वास करना है: परन्तु वह यह नहीं बता सकेगा कि उन दोनों में से किसी का क्या अर्थ या आशय है। तो क्या हम उनकी समझ सबसे अनाड़ी लोगों की कच्ची बुद्धि के अनुसार लें? हमें सदा ध्यान रखना चाहिए कि हमारा प्रभु यीशु मसीह हमारे विश्वास का लक्ष्य ठहराया गया है। क्या हम विश्वास से उद्धार पाते हैं? इसका अर्थ यही है कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करते हैं। परन्तु अब विचार करें कि हमारा प्रभु यीशु मसीह हमारी आँखों के सामने क्यों रखा गया है कि हमारा विश्वास उस पर निशाना लगाए और पूरी तरह उसी पर टिके। इसलिए कि हम उसमें वह सब पाएँगे जो हमें धर्मी बनाने से सम्बन्ध रखता है।

मैं तुम्हें पहले बता चुका हूँ कि हम परमेश्वर के सम्मुख धर्मी गिने जाते हैं जब वह हमारे पाप क्षमा करता है, और उन्हें फिर लेखे में नहीं लाता। और हम उसे कैसे पाएँगे, सिवाय हमारे प्रभु यीशु मसीह के लहू के, जो हमें धोने के लिए बहाया गया? क्योंकि उसने अपनी मृत्यु और दुःखभोग के द्वारा हमारे लिए पूरा प्रायश्चित्त किया है: इसलिए परमेश्वर हम पर शान्त हुआ, इस शर्त पर कि हम उसे किसी और वस्तु से चुकाना न चाहें, उस बलिदान के सिवा जो उसके एकलौते पुत्र हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा उसे चढ़ाया गया, जो परमेश्वर का प्रिय पुत्र कहलाता है, इसलिए कि हम उसमें प्रिय ठहरें: और धर्मी, इसलिए कि हम उसकी धार्मिकता के भागी बनाए जाएँ: और पवित्र, इसलिए कि हम उसमें पवित्र किए जाएँ।

तो तुम देखते हो कि जब हम जानना चाहें कि "विश्वास" शब्द का क्या अर्थ है, तो हमें अपने प्रभु यीशु मसीह की ओर क्यों दृष्टि रखनी चाहिए। परन्तु पोप के अनुयायी हठपूर्वक अपनी ही धारणा पर अड़े हैं, क्योंकि उन्होंने कभी नहीं चखा कि विश्वास करना क्या है: और यह वे अपनी दलीलों से भली-भाँति दिखाते हैं। वे कहते हैं, यह कैसे सम्भव है कि मनुष्य विश्वास करने से धर्मी ठहरे, जबकि दुष्टात्माएँ भी विश्वास करती हैं? यह सच है, और सन्त याकूब भी यही तर्क देता है। तो भी उस स्थान में वह उनका उपहास करता है जो मसीहियत और विश्वास का व्यर्थ और मूर्खतापूर्ण बहाना बनाते हैं, और इस बीच उसका कोई फल नहीं दिखाते।

परन्तु पोप के अनुयायी अपने आपको इससे भी कहीं अधिक स्थूल रीति से धोखा देते हैं, यह कहकर कि विश्वास परमेश्वर पर विश्वास करना है, और परमेश्वर वह लक्ष्य है जिस पर विश्वास निशाना लगाता है, ऐसे कि उन्हें लगता है कि विश्वास पूरा करने के लिए बस इतना ही चाहिए कि कल्पना कर लें कि कोई एक परमेश्वर है जिसने संसार बनाया और जो सब बातों पर शासन करता है। और इस प्रकार वे अपनी अज्ञानता में गहरी नींद सो जाते हैं, और फिर भी अपने आपको अच्छे मसीही और कैथोलिक समझना नहीं छोड़ते (जैसा वे स्वयं बड़बड़ाते हैं) यद्यपि वे वास्तव में बिलकुल जड़ हैं। परन्तु इसमें आश्चर्य नहीं कि वे पवित्रशास्त्र की शिक्षा से इतना लड़ते हैं, और ऐसे न सुधरनेवाले हठ से इनकार करते हैं कि मनुष्य विश्वास से उद्धार पा सकता है, क्योंकि उनमें न विवेक है न समझ: क्योंकि वे नहीं जानते कि बात का अर्थ क्या है।

इसलिए हमारे लिए और भी आवश्यक है कि जो सन्त पौलुस हमें यहाँ बताता है उस पर भली-भाँति ध्यान दें: अर्थात् यह कि यदि हम यीशु मसीह की ओर न देखें, तो हम नहीं जानते कि विश्वास क्या है। और इसका कारण यह है कि हम नहीं जानते कि पापों की क्षमा पाना, परमेश्वर के पास आना, उस पर भरोसा रख सकना और उसे पुकारना क्या है: और न यह जानते हैं कि अपने विवेक को शान्त रखना और अनन्त जीवन की आशा रखना क्या है। इन सब बातों की हमें तब तक घटी रहती है जब तक यीशु मसीह हमारे सामने न रखा जाए, और जब तक हम उस पर दृष्टि न डालें, ऐसे कि हमारी सारी इन्द्रियाँ उसी पर टिक जाएँ, और मानो वहीं बन्द हो जाएँ।

तो तुम देखते हो कि जिस विश्वास से हम अनुग्रह पाते हैं, वह यह है कि जब हम एक बार जान लें कि हम अभागे प्राणी हैं, और हम में घिनौनेपन के सिवा कुछ नहीं, तो हम उसका उपाय अपने प्रभु यीशु मसीह में ढूँढ़ें, और समझें कि वह हमारे लिए चढ़ाया गया कि हमें उस श्राप से छुड़ाए जिसमें हम डूबे थे, कि उसने हमें अपने लहू से शुद्ध किया है, कि अपनी आज्ञाकारिता से उसने हमारे सब अपराध दूर कर दिए हैं, और उसी के कारण हमें निश्चय है कि परमेश्वर हमें अपनी सन्तान करके स्वीकार करता और ग्रहण करता है। तो तुम देखते हो कि इस पाठ को कैसे समझना चाहिए।

और जब सन्त पौलुस कहता है कि वह स्वयं और सब यहूदी जो मसीही विश्वास में फिरे थे, हमारे प्रभु यीशु मसीह के विश्वास से उद्धार पाने की आशा रखते थे: तो वह इसका कारण भी जोड़ता है: अर्थात् इसलिए कि व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी धर्मी न ठहरेगा। यदि वह इस शब्द को केवल अपने देशवासियों पर लागू करता, तो भी ठीक होता: परन्तु यहाँ वह सब मनुष्यों के विषय में सामान्य रूप से बोलता है। और जब वह कहता है "कोई प्राणी नहीं": पहले तो वह यह सूचित करता है कि उद्धार पाने के उपाय में यहूदी अन्यजातियों से कुछ भी भिन्न नहीं।

इसलिए यद्यपि यहूदी खतना किए हुए होने के कारण मानो परमेश्वर की मीरास और उसके लिए पवित्र ठहराए हुए माने जाते थे: तो भी उनके पास उसकी केवल कृपा के सिवा उद्धार की कोई आशा नहीं हो सकती थी। देखो वे अन्यजातियों के साथ कैसे बराबर किए गए और उनके समान श्रेणी में रखे गए। फिर, सन्त पौलुस यहाँ उस सारे अभिमान को पूरी तरह मिटाना चाहता था जो मनुष्य अपने गुणों के विषय में रखते हैं। बहुत-से हैं जो जानते हैं कि वे इतनी दूर बहक गए हैं कि वे अपने लिए कोई महिमा नहीं माँग सकते, मानो उन्होंने परमेश्वर के हाथ से कुछ कमाया हो।

अभागे पियक्कड़, उड़ाऊ, और वे जिन्होंने अपने आपको सब प्रकार की दुष्टता में सौंप दिया है, अपने आपको बढ़ाने और यह घमण्ड करने में लज्जित होंगे कि वे अपने पुण्य और भले कामों से परमेश्वर को बाँध सकते हैं, क्योंकि मनुष्यों के सामने भी उन्हें अपनी लम्पटता के कारण छिपना पड़ता है। परन्तु जिनके पास कपट का कुछ आवरण है, और जो मनुष्यों के सामने पवित्रता का कुछ चिह्न दिखाते हैं: वे तुरन्त उसी से मतवाले हो जाते हैं, और अपने आपको ऐसा कठोर कर लेते हैं कि मानते हैं कि वे स्वर्ग के योग्य हैं, और परमेश्वर उनका बड़ा ऋणी है। इसी प्रकार के ये पोप-पवित्र जन हैं, जो यद्यपि सब मलिनता से भरे हैं, ऐसे कि उनमें महत्वाकांक्षा, लोभ, क्रूरता और इसी प्रकार की बातों के सिवा कुछ नहीं: तो भी संसार जैसा भी चले, क्योंकि उनके पास अपनी कलीसिया की सामग्री और दूसरे नकली सामान का अच्छा भण्डार है, वे अपने आपको समझाए रखते हैं कि परमेश्वर उनकी लम्पटता में तनिक भी नहीं देखता, वरन् अपने आपको मना लेते हैं कि परमेश्वर को उनके अपने पुण्य के कारण उन्हें स्वीकार करना चाहिए। और जो भक्ति से मिस्सा सुनते हैं, जो मदिरालय [या मधुशाला] से दौड़कर गिरजे में जाते हैं, विशेष रूप से जो क्षमा-पत्र मोल लेते हैं और इसी प्रकार की वस्तुएँ, और जो उपवास के दिन और पर्व मनाते हैं, वे ऐसे अभिमान से फूल जाएँगे कि सोचेंगे कि उन्होंने परमेश्वर को अपना ऋणी बना लिया है।

परन्तु सन्त पौलुस, "सब प्राणियों" का नाम लेकर, दिखाता है कि मनुष्यों को अपने आपको अलग नहीं करना चाहिए, मानो कोई धर्मी हो और दूसरा न हो: परन्तु सबको झुकना और दीन होना और दण्ड की आज्ञा के आगे सिर झुकाना चाहिए, और अपने आपको निश्चय दिलाना चाहिए कि उनके सब गुण, (वरन् सबसे उत्कृष्ट मनुष्यों के भी) परमेश्वर के सम्मुख मलिनता ही हैं। क्योंकि यद्यपि कोई हमारे विचार में पूरी तरह धर्मी हो, ऐसा कि वह किसी मनुष्य की हानि नहीं करता, परन्तु उसमें सब दुर्गुणों का सामना करने की दृढ़ता है, और वह पवित्र और संयमी है, और (संक्षेप में) स्वर्गदूत के समान माना और समझा जाता है: तो भी उसमें भ्रष्टता के सिवा कुछ नहीं। और यह कैसे हो सकता है? क्योंकि हमें बाहरी रूप पर भरोसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि (जैसा कहावत कहती है) जो चमकता है वह सब सोना नहीं होता।

हमारा काम नहीं कि हम निर्णय करें कि क्या दुर्गुण है और क्या गुण, जब तक हम मनुष्य के भीतर प्रवेश न कर सकें। क्योंकि यदि मनुष्य परमेश्वर को वह न दे जो उसका है, तो इसके विषय में क्या कहा जाए? वह मनुष्यों को नहीं लूटता, परन्तु परमेश्वर की महिमा लूटता है। फिर यद्यपि मनुष्य उसकी कितनी ही बड़ी प्रशंसा करें और उस पर तालियाँ बजाएँ: तो भी वह व्यर्थ घमण्ड और अभिमान से फटा ही जाएगा, और हमारे प्रभु यीशु मसीह को जानने के सिवा कोई बात उसे दीन नहीं बना सकेगी। इसलिए जो अपने जीवन में बाहरी रूप से सुन्दर दिखावा करते हैं, वे फिर भी परमेश्वर के सम्मुख दोषी ही ठहरेंगे।

यही वह बात है जिससे सन्त पौलुस उस सारे व्यर्थ भरोसे को पहले से ही रोकना चाहता था जो मनुष्य अपने पुण्य के विषय में बना या पाल सकते हैं। परन्तु इससे भी अधिक है। क्योंकि वह केवल उन मनुष्यों के विषय में नहीं बोलता जो एक प्रकार से परमेश्वर से त्यागे गए थे और उसके पवित्र आत्मा से नए नहीं बनाए गए थे: परन्तु जब वह "सब प्राणी" कहता है, तो उसमें विश्वासी भी आ जाते हैं। क्योंकि यद्यपि परमेश्वर का पवित्र आत्मा हम में तब वास करता है जब वह हमें अपने सुसमाचार के ज्ञान तक खींच लाया और हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह की देह में कलम की नाईं लगा दिया: यद्यपि (मैं कहता हूँ) परमेश्वर का आत्मा हम में वास करता है: तो भी जो कुछ हमारा अपना है उसके विचार से हम सब "प्राणी" शब्द के अधीन आ जाते हैं।

तब सन्त पौलुस यहाँ यह निर्णय सुनाता है कि कोई प्राणी धर्मी न ठहरेगा, क्योंकि अविश्वासी आदम में दोषी ठहरे हैं और अपने दण्ड में बने रहते हैं, और विश्वासी सदा अधूरे हैं, ऐसे कि उनमें बहुत-से दुर्गुण और दाग हैं: जिसके कारण वे दूसरों के समान दोषी ठहरते हैं, और इस प्रकार यह दण्ड सामान्य है, कि जो व्यवस्था के कामों से धर्मी ठहरना चाहे, वह सदा दोषी पाया जाएगा, वरन् वे भी जो कभी हुए सबसे पवित्र मनुष्य थे।

अब्राहम को लें जो सब सिद्धता का दर्पण था: दाऊद को लें जो सब सद्गुणों में श्रेष्ठ था: नूह, अय्यूब और दानिय्येल को लें जो भविष्यद्वक्ता यहेजकेल के द्वारा तीन धर्मी जनों में गिने गए हैं: और ऐसे ही दूसरों को लें: तो भी वे भी उसी पंक्ति में रखे गए हैं, अर्थात् वे परमेश्वर के सम्मुख धार्मिकता अनुग्रह के सिवा पा नहीं सके।

तो अब मैं तुमसे विनती करता हूँ कि हम क्या करें? क्या शैतान को उन्हें अवश्य भयंकर अभिमान में सिर के बल नहीं गिराना चाहिए जो आज भी अड़े हुए हैं कि वे अपने ही पुण्य या उन कामों से धर्मी ठहरें जिन्हें वे योग्यता के काम कहते हैं? क्योंकि कौन है जो दाऊद, नूह, अब्राहम या दानिय्येल की बराबरी कर सके? क्या मनुष्यों को परमेश्वर की पाठशाला में भली-भाँति उन्नति न करनी चाहिए, और अपने आपको पूरी तरह उसे सौंप देने के सच्चे उत्साह से प्रज्वलित न होना चाहिए, ताकि वे पूरी तरह कायल हो जाएँ कि वे उस स्थिति तक पहुँचने से अभी बहुत दूर हैं जहाँ हम दाऊद, नूह और दानिय्येल को पाते हैं? तो जब हम यह जानते हैं: तो ध्यान दें कि यहाँ पवित्र आत्मा उन्हें गिराता है जो बहुत ऊँचे चढ़ जाते हैं, ताकि हम और भी लज्जित हों कि हमारे पास महिमा के योग्य बूँद-भर भी पुण्य नहीं: और अपने उद्धार से सम्बन्ध रखनेवाली सब वस्तुओं को हमारे प्रभु यीशु मसीह के केवल अनुग्रह में ढूँढ़ें।

तो तुम देखते हो कि इस वचन को, जिसमें सन्त पौलुस दृढ़ता से कहता है कि कोई प्राणी धर्मी न ठहरेगा, इस प्रकार समझना चाहिए मानो उसने कहा हो: यदि मनुष्य अपने आपको अपने स्वभाव में देखें, तो वे सब सुन्दर दिखावों के होते हुए भी बुराई के सिवा कुछ न पाएँगे। संसार में उनकी बड़ी प्रशंसा और आदर हो सकता है, और वे व्यर्थ आत्म-सान्त्वनाओं से अपने आपको धोखा दे सकते हैं: परन्तु जब तक परमेश्वर उनमें काम करके उन्हें बदल न दे, यह निश्चित है कि उनमें मलिनता के सिवा कुछ न होगा, और वे सब गुण जिन्हें मनुष्य गिनते हैं, निरे दुर्गुण होंगे, जो उन्हें विनाश की ओर ले जाएँ और नरक में डुबो दें।

क्योंकि यद्यपि जो परमेश्वर के अनुग्रह से नए बनाए गए हैं और उसकी आज्ञाकारिता में पहले ही उन्नति कर चुके हैं, उनमें कुछ गुण हैं जिन्हें वह प्रेम करता और आदर देता है: तो भी वे ऐसा कुछ नहीं ला सकते जो उसके सम्मुख लेखे में गिना जाए: क्योंकि वे सदा अपने आपको बकाया में पाएँगे।

और जो भलाई उनमें है, वह उन्हें उसी से मिली है, और फिर भी वह भलाई भी उनके पापों और दुर्बलताओं से बिगड़ी हुई है: जिसके कारण वे अपनी धार्मिकता पर सारा भरोसा पूरी तरह खो चुके हैं: और इसलिए यदि हम अब अपनी धार्मिकता व्यवस्था में ढूँढ़ें, तो हम धोखा खाते हैं, हम उसे वहाँ न पाएँगे, हम सब बड़े से छोटे तक दोषी ठहरे हैं।

परन्तु यहाँ हम उस बात को कहीं अधिक अच्छी तरह देखते हैं जिसे मैंने पहले छुआ था: अर्थात् जब हम अनुभव से जान लेते और पाते हैं कि हमें वह सब घटी है जो हमारे प्राणों के जीवन से सम्बन्ध रखता है: तो हमें यीशु मसीह की शरण में अपने आश्रय के रूप में जाना चाहिए, इसलिए यीशु मसीह पर विश्वास करने की सच्ची तैयारी यह है कि हम अपने पापों की जीवित समझ और अनुभूति से छुए जाएँ। और इसी कारण वह यह भी कहता है, "हे सब परिश्रम करनेवालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ, मैं तुम्हें विश्राम दूँगा, और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे।" फिर स्पष्ट कहा गया है कि वह इसलिए भेजा गया कि कंगालों को आनन्द का सन्देश सुनाए, बन्दियों को छुड़ाए, और उन्हें शान्ति दे जो बिलकुल सताए हुए हैं और मानो दबे हुए हैं।

इसलिए जो अपने पापों में आनन्द लेते हैं, वे कभी हमारे प्रभु यीशु मसीह के पास नहीं आएँगे। यह सच है कि वे विश्वास पर बहुत घमण्ड करेंगे, जैसे परमेश्वर का उपहास करनेवाले बहुत-से लोग उस शब्द को अपवित्र करते हैं, चाहे वह कितना ही पवित्र है। हर कोई मसीही गिना जाना चाहेगा, और जो सब दुष्टता में सबसे अधिक बिगड़े हुए हैं, वे भी कहेंगे कि वे किसी भी और मनुष्य जितना विश्वास करते हैं। परन्तु जब मनुष्य इस रीति से बोलता है, तो यह इस बात का चिह्न है कि उसमें बूँद-भर भी विश्वास नहीं। क्योंकि विश्वासी निश्चय कहेगा, "मैं विश्वास करता हूँ, परन्तु इतनी बड़ी निर्बलता के साथ कि मैं भली-भाँति देखता हूँ कि यदि मेरा परमेश्वर मुझ पर तरस न खाए, तो जो थोड़ा मेरे पास है वह शीघ्र ही पूरी तरह लुप्त हो जाएगा।"

इसलिए जो भरे मुँह से डींग मारते हैं कि उनका विश्वास सिद्ध है, वे कुत्ते और सूअर ही हैं जिन्होंने कभी नहीं चखा कि परमेश्वर का भय या धर्म क्या है। परन्तु संसार जैसा भी चले, विश्वास का नाम उन कुत्तों से लज्जाजनक रूप से अपवित्र किया जाएगा, जो परमेश्वर का उपहास करने के सिवा कुछ नहीं करते। क्योंकि उन्हें भले और बुरे में भेद करने की कोई समझ नहीं। वे इतने जड़ हैं कि मानो अपनी मलिनता में लोटते हैं: यहाँ तक कि एक स्थूल पियक्कड़ जो सब लज्जा से परे है, और ऊपर से अधिक खा-पी भी चुका है, फिर भी अपनी उच्छृंखलता में बना रहना चाहेगा।

इसके अतिरिक्त, व्यभिचारी, झूठी शपथ खानेवाले, निन्दक और इसी प्रकार के लोग भली-भाँति दृढ़ता से कहेंगे कि उनमें विश्वास है: परन्तु फिर भी यह निश्चित है कि वे हमारे प्रभु यीशु मसीह के पास आने की किसी तैयारी में कभी नहीं थे। और क्यों? क्योंकि उन्होंने यह नहीं सोचा कि वे अनुग्रह के सिवा धर्मी नहीं ठहर सकते। तो भी ध्यान दें कि पूरी तरह इस बात के कायल होने के लिए कि हम व्यवस्था से धर्मी नहीं ठहर सकते, हमें परमेश्वर को उसके न्याय के सिंहासन पर अपने सामने रखना होगा, और हम में से हर एक अपने आपको उसके सामने बुलाए, और सुबह-शाम यह सोचे कि हमें अपने सारे जीवन का लेखा देना है।

इस पर हम समझें कि यदि परमेश्वर हम पर तरस न खाए और अपनी अपार दया से हमें सहन न करे, तो हम एक लाख बार दब जाएँगे। यही हमारे लिए जानने का मार्ग है कि हम व्यवस्था से धर्मी नहीं ठहर सकते: क्योंकि जब-जब हम परमेश्वर के सम्मुख आते हैं, हम दोषी ठहरे हुए के बराबर हैं। हमारे लिए उचित है कि हम ऐसे भय में डाले जाएँ कि जब तक हमारा प्रभु यीशु मसीह हमारी सहायता न करे तब तक हमें न छुटकारा हो, न विश्राम। तो तुम देखते हो कि हमारा परिश्रम करनेवाले और बोझ से दबे हुए होना कैसे आवश्यक है, अर्थात् अपने पापों से अप्रसन्न होना, और ऐसी वेदना से दुखी होना कि मृत्यु की पीड़ाएँ हमें चुभें, ताकि हम अपना सारा चैन परमेश्वर में ढूँढ़ें, अपने आपको निश्चय दिलाते हुए कि हम न पूरा, न अधूरा उद्धार किसी और रीति से पा सकते हैं, परन्तु हमें उसे दान में ही पाना होगा।

क्योंकि सन्त पौलुस यहाँ कोई बीच का मार्ग नहीं रखता, मानो वह कहता हो कि जो हमें घटी है वह हम यीशु मसीह में पाएँगे, और शेष अपने आपसे पा सकेंगे। परन्तु वह कहता है कि क्योंकि हम एक बार जान लें कि हम अपने पुण्य के कारण या अपने कामों के कारण धर्मी नहीं गिने जा सकते, केवल विश्वास ही हमें सन्तुष्ट करे और पर्याप्त हो। इसलिए हम समझें कि हमारे उद्धार का तनिक भी अंश यीशु मसीह से बाहर नहीं, परन्तु हमारे पास वहीं उसका आरम्भ भी है और अन्त भी, अर्थात् सारा का सारा: और हम निरन्तर उसी दीनता में बने रहें, यह जानते हुए कि हम अपने साथ दण्ड के सिवा कुछ नहीं लाते, और जो कुछ हमारे उद्धार से सम्बन्ध रखता है वह सब परमेश्वर की केवल मुफ्त दया से पाना है, ऐसे कि हम कह सकें कि हम विश्वास से उद्धार पाते हैं, अर्थात् इसलिए कि परमपिता परमेश्वर ने अपने पुत्र हमारे प्रभु यीशु मसीह को हमारे लिए ठहराया कि हम उस पर टिकें, ताकि वह हमारे उद्धार का आरम्भ भी करे और उसे पूरा भी करे, ऐसे कि सारा श्रेय उसी को दिया जाए, और हम अपने आपको त्यागना और अपने आपको पूरी तरह उसे सौंप देना सीखें।

और अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सम्मुख अपने पापों को मानते हुए गिर पड़ें, उससे प्रार्थना करते हुए कि वह हमें उन्हें ऐसा अनुभव कराए कि हम उनसे और अधिक अप्रसन्न हों, और उस सुधार में बढ़ें और आगे चलें जिसमें हमें अपना सारा जीवन बिताना चाहिए, और उसकी भलाई को उस रीति से बड़ा मानना सीखें जैसी वह हमारे प्रभु यीशु मसीह में हम पर प्रकट हुई, ऐसे कि हम उससे पूरी तरह मोहित हो जाएँ: और यह केवल मुँह से उस पर घमण्ड करना न हो, परन्तु अपना सारा भरोसा उसी पर रखना हो, ऐसे कि हम उसमें और अधिक दृढ़ होते जाएँ, जब तक हम अनन्त जीवन में इकट्ठे न कर लिए जाएँ, जहाँ हमें अपने विश्वास का प्रतिफल मिलेगा। कि वह यह अनुग्रह न केवल हमें, परन्तु सब लोगों को भी देने की कृपा करे। &c.

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