अध्याय 30

अट्ठाईसवाँ उपदेश, जो चौथे अध्याय पर पाँचवाँ भी है — गलातियों 4:15-20

Sermons upon Galatians · John Calvin

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अट्ठाईसवाँ उपदेश, जो चौथे अध्याय पर पाँचवाँ भी है — गलातियों 4:15-20

जो चौथे अध्याय पर पाँचवाँ भी है।

15 तो फिर तुम्हारा वह धन्य होना कहाँ गया? क्योंकि मैं तुम्हारा गवाह हूँ कि यदि हो सकता तो तुम अपनी आँखें भी निकालकर मुझे दे देते।

16 तो क्या तुम से सच बोलने के कारण मैं तुम्हारा बैरी हो गया हूँ?

17 वे तुम्हारे विषय में धुन तो रखते हैं, पर भली मनसा से नहीं; वरन् तुम्हें अलग कर देना चाहते हैं कि तुम उन्हीं में धुन रखो।

18 भली बात में सदा धुन रखना अच्छा है, और केवल उसी समय नहीं जब मैं तुम्हारे साथ रहता हूँ।

19 हे मेरे बालको, जब तक तुम में मसीह का रूप न बन जाए, तब तक मैं तुम्हारे लिये फिर जच्चा की सी पीड़ाएँ सहता हूँ।

20 मैं चाहता हूँ कि अब तुम्हारे पास आकर और ही प्रकार से बोलूँ, क्योंकि तुम्हारे विषय में मैं अत्यन्त संदेह में हूँ।

जिस वस्तु को हम अपने लिये भली और लाभदायक समझते हैं उसे ढूँढ़ने के लिये हमें किसी शिक्षा की आवश्यकता नहीं; क्योंकि हर मनुष्य स्वभाव से उसी की ओर झुका हुआ है, वरन् उसमें अत्यधिक लगा रहता है। पर बुराई यह है कि हम सच्चे लाभ को हानिकारक वस्तु से पहचान नहीं पाते, वरन् अकसर अपनी मूर्ख अभिलाषाओं से ऐसे अन्धे हो जाते हैं कि हम में से हर एक जानबूझकर अपना ही विनाश कर लेता है। ऐसा नहीं कि जो बात मैंने कही कि हमारे हृदयों में अंकित है उसे हम भूल जाते हैं; पर इसलिये कि हम अपनी बेलगाम अभिलाषाओं से बहा लिये जाते हैं, या फिर इस संसार की व्यर्थताओं से ऐसे धुँधले हो जाते हैं कि सही परखने का हम में कुछ भी विवेक नहीं रहता। इसलिये हमें निरन्तर और भी अधिक परमेश्वर की ओर भागना चाहिए कि वह हमें यह समझ दे कि हमारे लिये क्या भला है, ताकि हम उसकी सेवा करें, और हमारा मन पूरी रीति से उसी पर ऐसा लगा रहे कि हम कभी डिगाए न जा सकें; विशेषकर इसलिये कि अकसर ऐसा होता है कि जो लोग संसार की दृष्टि में बहुत बुद्धिमान माने जाते हैं, वे अपनी इच्छाओं के बदलने के साथ छोटे बच्चों के समान हो जाते हैं, और जिन वस्तुओं को वे बहुत मूल्यवान मानते थे उन्हें छोड़ देते हैं, और जो भी तुच्छ बात उनकी दृष्टि में आ जाए उसके पीछे भटकने लगते हैं, ऐसे कि उनमें कुछ भी स्थिरता नहीं रहती।

कभी हम देखेंगे कि एक बालक एक साथ तीन-चार वस्तुओं के पीछे दौड़ता है, और जो वस्तु वह चाहता था यदि वह आ जाए तो तुरन्त उसी को पकड़ लेता है; और फिर थोड़ी ही देर बाद यदि उसे कोई सेब या चेरी, या और कोई ऐसी वस्तु दिखाई दे जो उसे भाए, तो बाकी सब कुछ छोड़कर उसी के पीछे दौड़ पड़ता है। हम भी ऐसा ही करते हैं: निःसन्देह हम सदा अपने आप को पर्याप्त बुद्धिमान समझते हैं, और किसी के हाथ से शिक्षा पाना, या यह चेतावनी पाना कि हमारे लिये क्या भला है, हमें तुच्छ लगता है, क्योंकि हमें यह अपने साथ अन्याय करना जान पड़ता है; फिर भी अनुभव दिखाता है कि हम में बुद्धि और विवेक दोनों की कमी है।

क्योंकि इसका क्या कारण है कि मनुष्य सीमा से बाहर अपने आप को इतना दौड़ाते-भगाते हैं, और फिर भी जीवन भर भटकते ही रहते हैं? जैसा मैंने पहले कहा, हम सब एक ही स्वर में इस सिद्धान्त को मानते हैं कि हम अपना ही लाभ ढूँढ़ना चाहते हैं; कोई छोटा या बड़ा नहीं जो उसकी ओर झुका हुआ न हो। पर आओ देखें कि मनुष्य अपना मन किन बातों में लगाते हैं: ऐसा कोई मनुष्य नहीं जिसकी भावनाएँ उसके भीतर उबलती न हों, यहाँ तक कि तुम अधिकांश को देखोगे कि (जैसे कोई कहे) वे अपने आप को यातना देते हैं, और उनका मन दिन-रात उन्हीं वस्तुओं के पीछे दौड़ता रहता है जो उनके सामने आती हैं और जिनसे उन्हें किसी लाभ की आशा होती है। और जब वे अपने आप को भली-भाँति सता चुके होते हैं, तब हज़ार में से मुश्किल से एक ऐसा मिलेगा जिसकी भावनाएँ ठीक व्यवस्था में हों; यहाँ तक कि उनके लिये यही कहीं अच्छा होता कि वे अपने जीवन भर सोते रहते, बजाय इसके कि बिना यह जाने कि क्यों और किसलिये इतना परिश्रम करें।

अब जब कि यह सिद्ध हो गया कि हम में से अधिकांश भले और बुरे में उतना भेद नहीं कर पाते जितना आवश्यक और उचित है, तो हमें अपने आप को परमेश्वर के अधीन करना चाहिए, और उससे प्रार्थना करनी चाहिए कि वह अपने पवित्र आत्मा से हमारी अगुवाई करे। और विशेषकर जब परम सुख या कल्याण का प्रश्न उठता है, तो निश्चय जहाँ हमें उसके प्रेम में खिंच जाना और मोहित हो जाना चाहिए, वहाँ हम दूसरी ओर घसीटे जाते हैं, और इधर-उधर उछल-कूद करने के सिवा कुछ नहीं करते, और हम में ऐसी बड़ी चंचलता और हलकापन है कि जिस वस्तु को हम आज अपने प्राण से भी अधिक प्रिय मानते हैं, वह कल लगभग तुच्छ ठहरेगी।

और यही कारण है कि पौलुस इस पद में गलातियों को उनके अपने सौभाग्य को भूल जाने का उलाहना देता है। क्योंकि हमारे प्रभु यीशु मसीह का यह कथन कि जहाँ किसी का धन है वहीं उसका मन भी लगा रहेगा, प्रकृति के सामान्य क्रम से लिया गया है। वह उस वस्तु को हमारा धन कहता है जिसे हम सबसे अधिक मूल्यवान मानते हैं और जिस पर हम पूरी रीति से भरोसा रखते हैं: क्योंकि बहुत सी वस्तुएँ हैं जो मनुष्यों को अच्छी तो लगती हैं, तौभी वे उनके बिना सहज ही रह सकते हैं। मनुष्य कोई सुन्दर और बहुमूल्य वस्तु देखे, तौभी यदि उसके पास अपना निर्वाह करने के साधन हों तो वह अपनी दशा में चुपचाप सन्तुष्ट रह सकता है। पर यदि हम किसी भी कल्याण को पाए बिना अपने जीवन को अभागा या दुर्भाग्यपूर्ण समझें, तो निश्चय हम निरन्तर अशान्ति से उछाले जाएँगे, जब तक उसे पा न लें: और यह सामान्य अनुभव भली-भाँति दिखा देता है।

तो जब कि हमारे हृदय अवश्य उसी वस्तु से बँधे रहेंगे जिसे हम अपने परम सुख के लिये आवश्यक समझते हैं, तो आओ अब देखें कि हर एक मनुष्य कैसा व्यवहार करता है। जो इस संसार की उड़ जानेवाली सम्पत्ति में लगे हैं, या महत्वाकांक्षा और सम्मान की लालसा से ऐसे भड़के हुए हैं कि वे अपनी बड़ाई करने और किसी ऊँचे पद और बड़े ओहदे पर होने के सिवा और कुछ नहीं ढूँढ़ते, ताकि उनका आदर हो: वे सदा उसी के लिये परिश्रम करेंगे। जिन पर लोभ सवार है वे धन बटोरना कभी न छोड़ेंगे, और किसी भी वस्तु से कभी तृप्त न होंगे। वे भूख और प्यास, गर्मी और सर्दी सहते हैं, और आधा पेट भी न खाने-पीने का साहस करते हैं, और यह सब इसलिये कि सीमा से बाहर ढेर लगा लें। देखो, वे किस दशा में हैं।

फिर, जो संसार की दृष्टि में आदर पाने और ऊँचे किए जाने की लालसा करते हैं, वे ऐसी ही बड़ी दुर्दशा सहते हैं मानो जल्लाद के हाथ में हों: वरन् जल्लाद भी उन्हें इतनी क्रूरता से यातना न देगा जितनी वे अपने आप को देते हैं: और फिर भी वे ऐसे हठीले हैं कि किसी रीति से उससे फेरे नहीं जा सकते। पर जब परमेश्वर ऐसा अनुग्रहकारी है कि हमें दिखाता है कि हमारा कल्याण कहाँ है, अर्थात् स्वर्ग के राज्य में: तो यद्यपि हमें चेताया जाता है कि हमारा जीवन स्थिर नहीं और हम हाथों से फिसल जाते हैं, तौभी हम अपनी व्यर्थताओं के प्रेम में ऐसे मोहित हैं कि जिस अनमोल आनन्द के लिये परमेश्वर हमें बुलाता है उसे त्याग देते हैं, और इन सांसारिक वस्तुओं की तुलना में जो सचमुच कुछ भी नहीं हैं, स्वर्ग की मीरास को हलका जानते हैं।

इसलिये आओ विचार करें कि जब पौलुस गलातियों से पूछकर उन्हें उलाहना देता है कि उनका सौभाग्य कहाँ गया, तो यह आज हमें भी छूता और हम से भी सम्बन्ध रखता है। क्योंकि वह मानकर चलता है कि गलातियों को मालूम था कि इस संसार में परमेश्वर उनका इससे बड़ा कोई उपकार नहीं कर सकता था कि अपने सुसमाचार के ज्ञान से उन्हें प्रकाशित करे, जिससे वे पूरी रीति से कायल और निश्चित हो गए थे कि संसार में छल के सिवा कुछ नहीं, क्योंकि वह हमें स्वर्ग की मीरास से दूर कर देता है, जैसा कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने भी वही दृष्टान्त दिया, कि सुसमाचार और उसमें समाए हुए भण्डार और धन एक बहुमूल्य मोती है, और यदि हम उन सब वस्तुओं को जिन्हें हम इस संसार में मूल्यवान समझते हैं और जो हमें सबसे अधिक भाती हैं, छोड़ दें, तो इस सौदे में हमारी कुछ हानि न होगी, और न पछताने का कोई कारण होगा।

पर अब हम दुगने दोषी हैं, क्योंकि हम यह जान लेने के बाद भी फिर जाते हैं कि परमेश्वर ने हमें नीचे से खींचकर अपनी स्वर्गीय महिमा का भागी बनाया, और उस अनमोल उपकार को, जैसा कहते हैं, आँखों के आगे से मक्खी के उड़ जाने भर के लिये अपनी स्मृति से निकाल देते हैं। तो जब कि परमेश्वर को यह अच्छा लगा कि हमारी आँखें खोले, और हमें उस कीचड़ में से निकाले जिसमें हम अविश्वासियों और अज्ञानियों के साथ डूबे हुए थे, न केवल दूसरों की नाईं अन्धविश्वासों और मूर्तिपूजाओं के पीछे चलने में, वरन् अपने आप को अपनी शारीरिक रुचियों और दुष्ट अभिलाषाओं के वश में कर देने में भी: और जब कि परमेश्वर ने हमें यह समझा दिया है कि हमारा सच्चा आनन्द कहाँ है, और उसका ऐसा स्वाद चखाया है कि हमें पूरी रीति से उसी पर टिक जाना चाहिए: तो आओ हम भली-भाँति सावधान रहें कि अपना संकल्प कभी न बदलें, और न आगे अपना मन पलटें। और यदि हम पलटें: तो विचार करें कि परमेश्वर का आत्मा यहाँ पौलुस के मुख से हम पर कृतघ्नता का दोष कैसे लगाता है, कि "तुम्हारा सौभाग्य कहाँ गया?" क्योंकि यदि हम पशुओं के समान सदा यों ही छोड़ दिए गए होते और यह न जानते कि हमारा कल्याण और आनन्द किसमें है, तो यदि हम अपनी पुरानी लीक पर ही चलते रहते तो कोई आश्चर्य न होता।

पर जब कि परमेश्वर ने हमें दिखा दिया है कि हमें अपना सारा कल्याण हमारे प्रभु यीशु मसीह में ढूँढ़ना है, और कि वही पूर्ण सिद्धता है जिसमें हमें पूरी रीति से विश्राम करना है: तो यदि हम फिर भी इधर-उधर डोलते और कभी इस ओर, कभी उस ओर हिलाए जाते हैं: तो निश्चय है कि हम अब अज्ञानता का बहाना नहीं कर सकते। तो तुम देखते हो कि इस पद में हमें यह बात स्मरण रखनी है, कि जब एक बार हमें सुसमाचार की शिक्षा मिल चुकी, तो जिन वस्तुओं को हम पहले बहुत बड़ा मानते थे, और जिन्हें मनुष्य बिना अन्त या सीमा के चाहते हैं, उन्हें हम हलका जानें: अर्थात् शैतान और संसार के लुभावनों को, और उन सब क्षणभंगुर और उड़ जानेवाली वस्तुओं को जिनमें कोई ठोसपन नहीं है, और निरन्तर अपने प्रभु यीशु मसीह को ढूँढ़ते रहें, जब तक उन सब उपकारों का पूरा आनन्द न पा लें जो वह हमारे लिये लाया है।

और अब इसी पर पौलुस गलातियों को और आगे दोषी ठहराता है कि वह उनका बैरी हो ही नहीं सकता, सिवाय इसके कि उसने उन्हें सच कहा। क्योंकि यह बहुत बड़ी दुष्टता है कि हम अपने मित्र से केवल इसलिये झगड़ें कि वह हमारे प्रति विश्वासयोग्य निकला। एक मित्र में हमें सबसे अधिक क्या चाहना चाहिए, सिवाय इसके कि वह हम से खरा व्यवहार करे, और एक ही टोपी में दो मुख न रखे, और हमारे साथ कोई चालाकी या झूठ न बरते? हर कोई इसे भली-भाँति जानता है, और यह स्वभाव की ऐसी शिक्षा है जो हम बिना पाठशाला के जानते हैं: तौभी हम उन से दुःखी और अप्रसन्न होते हैं जो हमें सच बताते हैं और इस रीति से हमारा भला करते हैं: तो क्या अवश्य नहीं कि हम शैतान से मोहित किए गए हैं, यदि हम उनके विरुद्ध खड़े होते और उनके बैरी बन जाते हैं? तब पौलुस अपने भय का कारण बताता है कि वे उससे दूर हो जाएँगे, और उन्हें दोषी ठहराता है कि वे उसके बैरी बन गए थे, और इसका और कोई कारण नहीं था सिवाय इसके कि उसने उनसे सीधा और खरा व्यवहार किया था।

अब यद्यपि यह दोष भयानक है और सब मनुष्य इसकी निन्दा करते हैं: तौभी आजकल संसार में यह किसी अन्य दोष के समान ही सामान्य है। क्योंकि झूठ, चापलूसी, छिपाव, बनावट, और ऐसी ही अन्य बातों के सिवा मित्रता को और क्या बनाए रखता है? यहाँ तक कि यदि कोई खरा काम करे, तो वह चारों ओर से अपने लिये घृणा और द्वेष मोल लेगा। और आजकल संसार में जो सबसे बड़े झगड़े और विवाद हैं उनका ठीक यही कारण है कि मनुष्य सब सत्य और तर्क के विरुद्ध अपने कान बन्द कर लेते हैं: क्योंकि हम चाहेंगे कि वह सब कुछ गाड़ दिया जाए जो हमें अप्रिय लगे: इसलिये यह केवल गलातियों के लिये नहीं लिखा गया, वरन् आज भी उन सब की सामान्य शिक्षा के लिये लागू होना चाहिए जो यह सहन नहीं कर सकते कि मनुष्य उनसे विश्वासयोग्यता और सच्चाई से व्यवहार करें।

क्योंकि हम में से हर एक अपने ऊपर दृष्टि करे और अपने आप को भली-भाँति जाँचे, तो वह पाएगा कि हम सब इस दोष से कलंकित हैं, जब तक परमेश्वर हमें इससे शुद्ध न कर दे। इसलिये आओ हम निश्चय जान लें कि यदि हम उन्हें दुःख देते हैं जो हमें सच बताते हैं, तो ऐसा करने में हम परमेश्वर को तुच्छ जानते हैं, और मनुष्यों से नहीं वरन् उसी से बैर करते हैं। हम इसके ठीक उलट घोषणा करेंगे: तौभी हम केवल झूठ बोलते हैं, जब हम यह सहन नहीं कर सकते कि परमेश्वर उस बात को प्रगट करे जिसे हम छिपाए रखना चाहते थे, अर्थात् कि वह हमारे दोषों को प्रगट करे, और उन्हें डाँटे, और हमें भय में रखे, और ऐसी किसी बात को सहन न करे जो हमारे लिये उचित नहीं। इस प्रकार तुम सार रूप में देखते हो कि इस पद पर हमें क्या ध्यान देना है।

अब इसी पर पौलुस बड़ी कोमलता से गलातियों को जीतने का प्रयत्न करता है। वह कहता है, "हे मेरे नन्हे बालको, जिनके लिये मैं फिर जच्चा की सी पीड़ाएँ सहता हूँ, जब तक हमारे प्रभु यीशु मसीह का रूप तुम में न बन जाए।" तौभी, यद्यपि उसके शब्द कुछ मीठे हैं, फिर भी वह उन्हें जगाने के लिये उनमें थोड़ा चटपटापन डालने से नहीं चूकता, उन्हें नन्हे बालक कहकर, यह बताकर कि जब कि उन्हें बहुत पहले रूप पा चुकना और जन्म ले चुकना चाहिए था, वरन् यीशु मसीह में पूरे मनुष्य की अवस्था तक बढ़ चुका होना चाहिए था, तब वह नहीं जानता कि उनका क्या करे। वह कहता है, "क्योंकि तुम मुझे ऐसे उपायों की ओर धकेलते हो कि अब मैं नहीं जानता कि तुम से कौन सी बात कहूँ: और इसलिये जब कि तुम ऐसे अपरिचित और हठीले, और ऐसे चंचल हो कि मैं नहीं जानता कि तुम्हें कैसे सँभालूँ, तो मुझे अपने आप को एक नया मनुष्य बना लेना पड़ेगा।" देखो वह कैसे कठोरता और बड़े स्नेह से मिली हुई बोली बोलता है। और वह केवल पिता का रूप धारण करके सन्तुष्ट नहीं, जिसका प्रेम फिर भी अपने बच्चों के प्रति कोमल ही होता है: वरन् अपने आप को उस माता के समान भी बताता है जो प्रसव के निकट है और पीड़ा से भरी है, जो (सारी पीड़ा के होते हुए भी) उस बच्चे की जो उसके गर्भ से निकलनेवाला है अपनी आँतों और प्राण से भी अधिक चिन्ता करती है। जब पौलुस ने यह उपमा दी, तो निश्चय है कि उसे नहीं सूझा कि वह उनके प्रति और कैसे अधिक स्नेह दिखाए, ताकि उन लोगों की कठोरता को, जिनसे वह बोल रहा था, तोड़े, या कम से कम नरम करे।

पर फिर भी, परिणाम चाहे जो हो, वह उनकी दुष्टता का उलाहना देने में उनसे साफ-साफ बोलता है, कि उन्होंने उस माता को नहीं पहचाना जिसने उन्हें जन्म दिया और अपने ही लहू के सार से उन्हें पाला, वरन् उसकी सारी कोमलता के होते हुए भी वे ऐसे जंगली पशु बन गए जो पालतू नहीं बनाए जा सकते: और यह घोर कृतघ्नता थी। और इस प्रकार हम देखते हैं कि पौलुस निरन्तर उसी मार्ग पर चलता है जो मैंने आज तुम्हें बताया: अर्थात् वह अपनी पूरी शक्ति से उन्हें जो मार्ग से बाहर चले गए थे प्रेम के द्वारा फिर लौटा लाने का प्रयत्न करता है। और इसी लिये वह उन्हें बताता है कि उसे उनके कल्याण की चिन्ता उनके सोचने से भी अधिक है। पर चाहे जैसी भी स्थिति हो, वह उनके तेल में तीखा सिरका मिला देता है, जो आवश्यकता के अनुसार उन्हें जगा दे, ऐसा न हो कि वे अपने पापों में सो जाएँ। क्योंकि जिन्होंने परमेश्वर को अप्रसन्न किया है, और मानो विष खा चुके हैं या कहो शैतान से मोहित किए गए हैं ऐसे कि अपनी ही मलिनता नहीं देखते, उन्हें पुचकारना कोई भलाई नहीं: ऐसी सब वस्तुएँ जड़ से मिटा दी जानी चाहिए। और इसलिये, चाहे जो हो जाए, वह ऐसा सन्तुलित हाथ रखता है कि वे अवश्य देख लें कि वह उनका कल्याण चाहता है, और उसका सारा प्रयत्न उन्हें परमेश्वर के पास लाने का है। सार रूप में यही बात है जो हमें इस पद पर ध्यान देनी है।

तौभी हमें विशेष रूप से यह भी ध्यान देना है कि जब पौलुस उन्हें नन्हे बालक कहता है, तो वह चुपके से उन्हें यह उलाहना देता है कि वे उन्नति में इतने पीछे रहे। क्योंकि सुसमाचार प्रतिदिन हमें किसलिये सुनाया जाता है? कहा गया है कि वह अविनाशी बीज है जिसके द्वारा हम फिर से उत्पन्न होकर परमेश्वर की सन्तान बनते हैं। अब जब हम संसार में आते हैं, तो दूध के पोषण से बढ़ते हैं, और समय-समय पर बलवन्त होते जाते हैं, ऐसे कि अन्त में हम दूध पर नहीं पलते, वरन् अधिक ठोस भोजन खाते हैं, जिससे हम अधिकाधिक बल और शक्ति पाते जाते हैं, जब तक कि पूरे मनुष्य की अवस्था को न पहुँच जाएँ। तो फिर यह कैसी बात होगी कि सुसमाचार के द्वारा नई सृष्टि बन जाने के बाद भी हम अब तक स्तन से ही लटके रहना चाहें, और इतनी कम उन्नति करें कि हमें अब तक गोद में झुलाना पड़े, और रोटी का एक टुकड़ा निगल न सकें, वरन् अब तक चूची ही चूसते रहना चाहें? क्या यह सुसमाचार के स्वभाव से होता है? निश्चय नहीं: और इसलिये हमें मानना चाहिए कि दोष हमारा ही है।

तो जब पौलुस गलातियों को नन्हे बालक कहता है, तो यद्यपि इसमें वह उनके प्रति गहरा प्रेम दिखाता है: फिर भी वह उन्हें डंक भी मारता है, जैसा कि हम देखते हैं कि प्रेरित इब्रानियों की पत्री में कहता है: "यह क्या? इतने दिन से पाठशाला में जाने के कारण तो तुम्हें बड़े विद्वान हो जाना चाहिए था: क्योंकि तुम्हें सुसमाचार सुनाया जाते हुए यह पहला दिन नहीं है, और तौभी तुम अब तक अपनी वर्णमाला ही में हो: और यह कितनी लज्जा की बात है? क्योंकि परमेश्वर ने तुम्हारे प्रति एक भले गुरु का काम किया और तुम्हें भली-भाँति सिखाया: और तुम ने अपनी ओर से पाठशाला से भागनेवाले लड़कों का सा काम किया: तो अब तुम्हारा क्या होगा?" क्योंकि पौलुस बहुत समय से यीशु मसीह में गलातियों को जन्म दे चुका था, और उन्हें सुसमाचार के विश्वास में बलवन्त हो जाना चाहिए था। पर देखो, वे अब तक नौसिखिए और कच्चे विद्यार्थी हैं, वरन् ऐसे मूढ़ कि वे नहीं जानते कि किस पर टिकें, और किसके पीछे चलें। यह पहली बात है।

और अब आगे वह यह जोड़ता है: कि वह उनके लिये नए सिरे से जच्चा की पीड़ाएँ सहता है। वह पहले उन्हें जन्म दे चुका था: तौभी वह मानो उनके समय से पहले था। ऐसा नहीं कि उसने उनकी शिक्षा के लिये जो कुछ आवश्यक था वह सब उन्हें न दिया हो: पर इसलिये कि वे उसे ग्रहण करने के योग्य न थे, क्योंकि वे अब तक अपनी सांसारिक अभिलाषाओं और रुचियों में बहुत लगे हुए थे। अब हम जानते हैं कि शारीरिक मनुष्य परमेश्वर के भेदों को नहीं समझता। इसलिये आवश्यक है कि हम अपने स्वभाव से छुड़ाए जाएँ, कि परमेश्वर में नए बनाए जाएँ: और जिसे हम नया जन्म कहते हैं, अर्थात् नवजन्म या दूसरा जन्म, वह हमें यह बताता है कि हम में जो पुराना मनुष्यत्व है वह मारा जाए और मानो बदल दिया जाए। तो जब कि गलातियों ने सुसमाचार की शिक्षा को स्थान न दिया: इसलिये पौलुस कहता है कि उसे फिर उनसे गर्भवती होना पड़ेगा, वरन् तब तक जब तक कि तुम में यीशु मसीह का रूप न बन जाए, वह कहता है। यह वचन उस बात को मीठा करने के लिये जोड़ा गया है जो अपने आप में कुछ कड़वी थी। क्योंकि कितनी लज्जा की बात थी कि जिन्होंने अपने उद्धार की बयाना बपतिस्मा में और प्रभु भोज में पाई थी, (क्योंकि उनमें से बहुत से पुरुष और स्त्रियाँ थे जिन्हें बीस, तीस, पचास, या साठ वर्ष की आयु में शिक्षा मिली थी), वे परमेश्वर के सामने यह प्रतिज्ञा करने के बाद कि वे यीशु मसीह में पूरी रीति से नए हो गए हैं, उन्हें मानो फिर से पिघलाया, ढाला और रूप दिया जाना पड़े? और इसी कारण पौलुस कहता है, जब तक कि तुम में यीशु मसीह का रूप न बन जाए। मानो वह कहे, मुझे आश्चर्य है कि तुम अब तक नन्हे बालक ही हो, और मुझे (जैसा कोई कहे) तुम्हें फिर अपने गर्भ और अन्तड़ियों में ग्रहण करना पड़े, जब तक वह समय न आए कि तुम अब तक से अधिक पके हो जाओ: और फिर भी मैं डरता हूँ कि कहीं वह पीड़ा और परिश्रम जो मैंने तुम्हारे बीच किया है व्यर्थ और बर्बाद न हो जाए, और तुम वैसे सुगठित और रूपवान न बनो जैसा चाहिए।

इस प्रकार तुम संक्षेप में देखते हो कि पौलुस उस कठोरता को कैसे हलका करता है जो बहुत अधिक हो सकती थी और गलातियों को बहुत गहरा घायल कर सकती थी, जब उसने उनसे कहा, क्या? तुम मानो समय से पहले जन्मे हो: मैंने सोचा था कि मैंने तुम्हें गर्भ में धारण किया, पाला, जन्म दिया, और यीशु मसीह में बड़ा किया, और अब मैं देखता हूँ कि तुम में जीवन नहीं, कम से कम आत्मिक जीवन नहीं, और सब कुछ फिसल गया और लोप हो गया। यदि पौलुस वहीं रुक जाता: तो निश्चय वे अभागे लोग घबराहट और पूरी निराशा में धकेल दिए जाते।

इसलिये उन्हें लौटने का साहस देने के लिये वह कहता है: चलो, सच है कि तुम ने अब तक बहुत बुरी उन्नति की है: पर नए सिरे से फिर सच्चे मार्ग में प्रवेश करो, और जो बिलकुल मरा हुआ दिखाई देता है उसे फिर से नया फल लाने दो, और देखा जाए कि पहले तुम्हारा यह घोषणा करना कि तुम सुसमाचार के अनुसार चलोगे व्यर्थ नहीं था। क्योंकि जैसे यदि कोई वृक्ष मरा हुआ सा हो और बिलकुल सूखा जान पड़े, तो भी यदि कोई उसकी जड़ में नई मिट्टी डाले और उसे सँभाले तो वह फिर फूट निकलेगा: वैसे ही यह होगा कि जो मनुष्य सुसमाचार से बिलकुल भटक गया हो, वह यदि मार्ग में फिर लौटा लिया जाए, तो न केवल मानो तुरन्त फिर नया उत्पन्न होगा: वरन् जो उसने पहले पाया था वह भी उसके काम आएगा, जैसा कि हर उस स्थान पर देखा जाता है जहाँ परमेश्वर उन्हें जो सच्चे मार्ग से भटक गए थे, फिर उसमें लौटा लाने का अनुग्रह देता है।

पर निश्चय यह सब मनुष्यों के साथ नहीं होता: और इसलिये आओ सावधान रहें कि परमेश्वर की भलाई का दुरुपयोग न करें, जैसा इन ठट्ठा करनेवालों में से बहुत से करते हैं, जो ऐसे फिर जाते हैं मानो उन्होंने शैतान से गठबन्धन कर लिया हो, जिसके उदाहरण हम इन लोगों में देखते हैं जो अपने आप को अशुद्ध और अपवित्र करते हैं, और अपनी पूरी शक्ति से परमेश्वर के सत्य को बिगाड़ते हैं। और यदि कोई चंचलता के कारण फिर जाए, तो ऐसा लगता है कि सब कुछ बिगड़ गया, और कुछ कहेंगे कि उन्हें सिखाने से क्या मिलेगा? देखो, वह तो खोया हुआ लड़का है: और इस प्रकार वे यह निष्कर्ष निकालेंगे कि उनमें भले ज्ञान की एक बूँद भी नहीं।

पर यदि परमेश्वर उन्हें फिर बुलाए, जैसा कि ऐसे बहुत से उदाहरण देखे जा सकते हैं: तो मनुष्य पाएगा कि जो वस्तु पहले मानो दबा और कुचल दी गई थी वह फिर अंकुरित होती है, जैसे भली-भाँति जोती हुई भूमि पर खाद डाली जाए, या उस पर धूल और ऐसी ही अन्य वस्तुएँ बिखेरी जाएँ, तो जो उसके नीचे है वह कुछ समय के लिये छिपी रहेगी, पर बाद में फिर फूट निकलेगी। सार रूप में यही बात है जो पौलुस हमें यहाँ बताना चाहता था।

पर प्रसंगवश हमें यह ध्यान देना है कि जब वह कहता है कि यीशु मसीह उनमें नए सिरे से रूप धारण करेगा, तो इसका अर्थ सशर्त है कि वे उसकी आज्ञाकारिता में लौट आएँ। निश्चय यह वचन पहली दृष्टि में कुछ कठोर जान पड़ सकता है: क्योंकि हम यीशु मसीह में रूप धारण करते हैं, न कि वह हम में। इसका प्रमाण देखो: यीशु मसीह हमारी पूर्ण और सम्पूर्ण सिद्धता है। अब यह कहना कि वह हम में नन्हे बालक के समान पाला जाता है, या वह बढ़ता है या आगे बढ़ाया जाता है: उसके व्यक्तित्व के योग्य नहीं। तौभी पौलुस ऐसा कहता है: परन्तु यह केवल उस एकता को दिखाने के लिये है जो हमारे और हमारे सिर यीशु मसीह के बीच है।

तो यद्यपि यीशु मसीह अपने आप में न बढ़ सकता है न घट सकता है: तौभी वह हमारे सब दोष और निर्बलताएँ अपने ऊपर ले लेता है। मैं तुम्हें पहले बता चुका हूँ कि हम तब उसमें जन्म लेते हैं जब हम सुसमाचार की शिक्षा के द्वारा उद्धार की आशा के लिये बुलाए जाते हैं: क्योंकि हम सब आदम में मरे हुए और दण्ड के योग्य ठहरे हैं। जीवन का केवल एक ही उपाय है, कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के साथ एक किए जाएँ, जो वह सोता है जिसमें सारी परिपूर्णता भरी है, और जिसमें से हमें खींचना उचित है।

तब हम यीशु मसीह में जन्म लेते हैं (जैसा मैंने पहले कहा): तो वह हमें अपने सुसमाचार की शिक्षा से दूध पिलाता है, जब तक हम अधिक सिद्ध शिक्षा ग्रहण करने के योग्य न हों, और जब तक हमारा विश्वास इतना आगे न बढ़ जाए कि हम फिर नन्हे बालकों के समान न रहें, वरन् अधिकाधिक उन्नति में बढ़ते जाएँ, जब तक हम पूरी आयु के मनुष्य न हो जाएँ, जैसा पौलुस इफिसियों के चौथे अध्याय में कहता है। और आगे, कि हम जानें कि हमारा प्रभु यीशु मसीह हम से अलग नहीं होना चाहता, वरन् वह और हम सब एक हैं: वह कहता है कि वह हमारे दोष अपने ऊपर लेता है, और हम में नन्हे बालक के समान बन जाता है।

यह कैसे? क्या यीशु मसीह निर्बल हो सकता है? नहीं, अपने विषय में नहीं: पर जब कि हम उसकी देह के अंग हैं, तो वह कहता है कि हमें उसका जो थोड़ा ज्ञान है उसके अनुसार वह हम में छोटा है। और जब कि हम आगे और आगे बढ़ते जाते हैं: तो वह यह भी कहता है कि वह हम में बढ़ता और बड़ा होता है। देखो यहाँ परमेश्वर के पुत्र की उत्तम भलाई का, वरन् अनन्त भलाई का प्रमाण है, कि उसे यह अच्छा लगा कि अपने आप को ऐसा नीचा करे, कि न केवल हमारी निर्बलताओं पर तरस और दया खाकर उन्हें दूर करे और उनका उपाय करे: वरन् अपने आप को रूपान्तरित भी करे, और यह कहने में सन्तुष्ट हो कि वह मानो अधूरा है, और नन्हे बालक के समान है, और हमारे विश्वास की निरन्तर बढ़ती के अनुसार वह बड़ा और बड़ा होता जाता है।

और यहाँ तुम यह भी देखते हो कि पौलुस दूसरे स्थान में कलीसिया को परमेश्वर की और उसके पुत्र हमारे प्रभु यीशु मसीह की परिपूर्णता क्यों कहता है। पर निश्चय यदि हम यह कल्पना करें कि परमेश्वर अपने आप में पूरी रीति से परिपूर्ण और सिद्ध नहीं, वरन् उसे हम से उधार लेने की आवश्यकता है: तो यह घोर विश्वासघात है: क्योंकि हम उसे क्या दे सकते हैं? जब वह हम सब को अपने सामने इकट्ठा कर लेगा, तो हम में पूरी दुर्दशा के सिवा वह और क्या पाएगा? क्योंकि हम उसमें डूबे हैं, वरन् पूरी तरह उसमें सने हैं।

तौभी वह पौलुस के मुख से हमें बताता है कि हम उसकी पूर्णता हैं, और इस दृष्टि से वह एक प्रकार से अधूरा है। ऐसा नहीं कि वह हमारे बिना नहीं रह सकता: क्योंकि वह सदा से अनन्तकाल से है, उसके संसार को सिरजने से पहले भी। और यद्यपि न आकाश होता न पृथ्वी, तो क्या परमेश्वर अपने आप से सन्तुष्ट नहीं हो सकता था? क्या वह अपनी ही महिमा से धनी नहीं था? हाँ निश्चय: पर वह तब तक सिद्ध और पूर्ण रूप से सन्तुष्ट न होना चाहेगा जब तक कि हमें अपने साथ एक न कर ले। इस प्रकार तुम देखते हो कि इस पद पर हमें क्या ध्यान देना है। और इस शब्द "रूप" से हमें चेताया जाता है कि हमारे लिये यह पर्याप्त नहीं कि हमें अपने प्रभु यीशु मसीह का कुछ थोड़ा सा ज्ञान हो: वरन् वह हम में ऐसा जीवित और पूर्ण रूप से बने कि उसकी सामर्थ्य की, उसके सब अनुग्रहों की, और उसके सब उपकारों की ऐसी छाप हमारे हृदयों में खुदी हो जो कभी मिटाई या बिगाड़ी न जा सके।

उसने पहले कहा था कि जब सुसमाचार उस प्रभाव के साथ प्रचारित किया जाता है जो उसका अधिकार है, तो यीशु मसीह एक प्रकार से हमारे बीच क्रूस पर चढ़ाया जाता है: ऐसे कि हम न केवल उसे अपने सामने जीवन्त रूप में चित्रित देखते हैं, वरन् यह वैसा ही है मानो हम उसे क्रूस पर देखते हों, उसके लहू की धाराएँ बहती हुई, मानो वह उसी समय परमेश्वर अपने पिता को अनन्त बलिदान चढ़ा रहा हो, कि हमारे सब अपराध और कुकर्म धो डाले। अब जैसे परमेश्वर हमें यह अनुग्रह दिखाता है: वैसे ही हम अपनी ओर से सावधान रहें कि जो हमारे सामने रखा गया है उसे हाथ से न जाने दें, जैसा बहुत लोग करते हैं, जो सुसमाचार के दो-तीन शब्दों की समझ पाकर बड़ी-बड़ी बातें करने लगते हैं, और समझते हैं कि उन्हें बहुत है, जब कि उनके पास केवल एक धुँधली कल्पना होती है।

इसलिये यह आश्चर्य की बात नहीं कि वे हर परीक्षा में, चाहे वह कितनी ही छोटी क्यों न हो, बिलकुल हार मान लेते हैं, ऐसे कि जो कुछ वे समझते थे कि उन्होंने सीखा है वह किसी काम नहीं आता: क्योंकि परमेश्वर इस रीति से उनकी लापरवाही का दण्ड देता है। इसलिये, जब कि परमेश्वर ने हमें अपने पुत्र को जानने का अनुग्रह दिया है: तो जितनी बार हम किसी उपदेश में आएँ उतनी बार पूर्वोक्त चित्रण हम में अंकित हो, और हम ज्ञान और स्मरण में नए किए जाएँ: कि जब शैतान उस विश्वास को जो हम ग्रहण करेंगे अन्धेरा करने और अन्त में बिगाड़ने का प्रयत्न करे, तो वह हम से कुछ भी प्राप्त न कर सके, क्योंकि [मसीह के बलिदान] की जीवन्त छाप हमारे हृदयों में ऐसी गहरी खुदी हुई है कि भली-भाँति कहा जा सकता है कि वह सचमुच और पूरी रीति से हम में रूप धारण कर चुका है।

और इसी में देखा जाता है कि पोप-भक्तों ने हमारे प्रभु यीशु मसीह को पूरी तरह त्याग दिया है: क्योंकि वे संसार को पुचकारते हैं, यह कहकर कि धुँधला विश्वास रखना ही पर्याप्त है, और मनुष्यों को अधिक पूछताछ नहीं करनी चाहिए, और यह कि मनुष्यों के लिये सुसमाचार में उन्नति करने का प्रयत्न करना जोखिम की बात है। देखो उनकी निन्दाएँ। पर यहाँ हम देखते हैं कि पौलुस गलातियों से कैसे कहता है कि उनके लिये यह बड़ी लज्जा की बात है कि यीशु मसीह उनमें नए सिरे से रूप धारण करे, यह कहकर कि यह वैसा ही है मानो वे सठिया गए हों, और उस शिक्षा को जैसी ग्रहण करनी चाहिए थी ग्रहण न किया हो जो उनके बीच प्रचारित की गई थी।

इसलिये यदि हम अपना कर्तव्य करें और परमेश्वर के प्रति वैसे ही भले विद्यार्थी हों जैसे वह हमारे प्रति भला और विश्वासयोग्य गुरु है: तो निश्चय हमारा विश्वास किसी धुँधली कल्पना का उलझा हुआ विश्वास न होगा, वरन् हम परमेश्वर के पुत्र को वैसा ही देखेंगे जैसा कुरिन्थियों के वचन में उसकी चर्चा हुई है, जहाँ कहा गया है कि सुसमाचार सच्चा दर्पण है जिसमें हम यीशु मसीह को मानो मुख देखते हुए देखते हैं। ऐसा नहीं कि हम उसे आँखों से देखते हैं, क्योंकि यह अन्तिम दिन के लिये रखा गया है, जब हम परमेश्वर के समान होंगे। तब उसकी महिमा हम पर पूरी रीति से प्रगट होगी: पर अभी हम अपने प्रभु यीशु मसीह को सुसमाचार में उतना ही देखते हैं जितना हमारे लिये उचित है, और जितना हमारी निर्बलता और अनगढ़ता सह सकती है, कि हम उसके समान रूपान्तरित और रूपवान बनें।

और जब कि पौलुस यह जोड़ता है कि वह गलातियों के पास रहना और अपनी बोली बदलना चाहता है क्योंकि वह उनके विषय में खेदित है: तो उसमें वह फिर प्रगट करता है कि उनका दोष कितना स्थूल और असह्य है, क्योंकि वह नहीं जानता कि उनके साथ किस सिरे से आरम्भ करे, और यद्यपि उसने उन्हें यीशु मसीह में पाला और सुसमाचार की शिक्षा से खिलाया है, तौभी वह नहीं जानता कि अब उन्हें कैसे सँभाले, जब कि फिर भी माता को अपने बच्चे की प्रकृति और स्वभाव जानना चाहिए। तो अवश्य वे मनुष्य बिलकुल हठीले और दुष्ट मन के होंगे जिनके पिता और माताएँ हार मान बैठे हैं और नहीं जानते कि कैसे बर्ताव करें: और जब उनकी सन्तान या तो विष से भरे साँप, या घमण्ड और हठ से भरे सिंह बन गई हो, ऐसे कि सिखाने या सँभालने से परे हो: तो अवश्य है कि वे पिशाच बन गए हैं। और फिर भी पौलुस गलातियों को इसका उलाहना देता है।

तौभी उन्हें दोष देने के बदले आओ देखें कि क्या ऐसा ही दोष हम में नहीं पाया जाता: अर्थात् जब परमेश्वर हमें सिखाने के लिये अपना मुँह खोलता है, तो वह हमें ऐसा चंचल मन पाता है कि उसे बार-बार अपनी बोली बदलनी पड़ती है। यह सच है कि जब उसे भाए तब वह हमारे हृदयों को भली-भाँति वश में कर सकता है । पर हम यहाँ उसकी उस गुप्त सामर्थ्य की चर्चा नहीं करते जिससे वह अपने चुने हुओं में काम करता है। हम यहाँ केवल अपने स्वभाव की चर्चा करते हैं, कि यदि उसे अपने आप में देखा जाए तो वह कितना पशु-समान है, और सुसमाचार के प्रचार की।

क्या जो लोग हमारे प्रभु यीशु मसीह की शिक्षा को विश्वासयोग्यता से प्रचार करना चाहते हैं, वे यह देखकर कि मनुष्य जैसे पशु-समान दिखाई देते हैं निरन्तर शोक में नहीं डूबे रहते? क्योंकि हमारे परमेश्वर की भलाई का हमारा स्वाद हमें वश में करे। निश्चय हमें उसकी शिक्षा पर भली-भाँति कान लगाना चाहिए: और यदि हम कोमलता से उसकी ओर खींचे जा सकते, या उसकी उँगली के हर छोटे संकेत से चेताए जाते, उस बच्चे के समान जो अपने पिता को प्रसन्न करना चाहता है, जो पिता के केवल एक शब्द कहते ही तुरन्त अपने पाँव तैयार रखता है कि जहाँ भी उसका पिता भेजे दौड़ जाए, और अपने दोनों हाथ तैयार रखता है कि जो भी वह आज्ञा दे वह करे: तो उसे हम पर लम्बी प्रक्रिया की आवश्यकता न होती।

पर जब परमेश्वर हम से बोलता है, तो हम ऐसे मन्द-बुद्धि हैं कि नहीं जानते कि उसका क्या अर्थ है: या फिर हम अपने कान बन्द कर लेते हैं, कि वह कितना ही ऊँचा पुकारे, कुछ लाभ नहीं, क्योंकि हम सदा एक ही स्थान पर अड़े रहते हैं। इसलिये जो बात पौलुस ने इस पद में कही है, वह किसी एक ही जाति के लिये नहीं है: वरन् यह वैसा ही है मानो वह सब युगों के सारे संसार को कृतघ्नता का दोष देता हो, यह कहकर कि परमेश्वर एक प्रकार से हम से खेदित है कि हम ऐसे टेढ़े और हठीले हैं, और हम में छिपने के स्थानों और कपट की ऐसी बहुतायत है: ऐसे कि यदि वह हम से कोमलता से बर्ताव करे, तो हम और भी अकड़ जाते हैं: और यदि वह कठोरता से व्यवहार करे, तो हम अंकुश पर लात मारते हैं।

और सचमुच हम देखते हैं कि उसकी कोमलता और कठोरता हमें क्या लाभ देती है: अर्थात् इतना कम, कि हमारी दुष्टता अवश्य बहुत बड़ी होगी, क्योंकि वह न इससे हमें जीत सकता है न उससे। इसलिये आओ हम भली-भाँति विचार करें। आगे, जब कि परमेश्वर चाहता है कि अपने वचन से हमें उत्पन्न करे, कि हम उसकी सन्तान हों, और अन्त में उस मीरास को पाएँ जिसके लिये उसने हमें अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा गोद लिया है, और जिसे उसने उसकी मृत्यु और दुःखभोग से हमारे लिये मोल लिया है जो सच्चा और एकमात्र वारिस है: तो जितनी बार हम उपदेशों में आएँ, या हम में से कोई पवित्र शास्त्र पढ़े, आओ हम विचार करें कि यह किस उद्देश्य के लिये है।

और इसके अतिरिक्त, यदि हम परमेश्वर के वचन को सुनते या पढ़ते समय उसमें ऐसी सामर्थ्य और प्रभाव न पाएँ: तो आओ इसके लिये अपनी ही दुष्टता या मन्दता को दोष दें, यह निश्चय जानकर कि संसार अब भी हमें बहुत रोके हुए और हमारे मार्ग में बाधा डाल रहा है: और आओ परमेश्वर से प्रार्थना करें कि उसका वचन हमारे लिये निष्फल न हो।

इसके सिवा, जब हम उसके द्वारा एक बार सुधारे जाएँ, ऐसे कि उसकी सन्तान बन जाएँ: तो आओ प्रतिदिन उसी पर पलें, यह निश्चय जानकर कि हमें अपने जीवन भर उसकी आवश्यकता है, और हम अब तक उस सिद्धता को नहीं पहुँचे जिसकी ओर हमें बढ़ना है। इसलिये यही हमें उभारे, और आओ सदा आगे बढ़ने के लिये गम्भीर मन रखें, जब तक कि अपने प्रभु यीशु मसीह से दृढ़ता से जुड़ न जाएँ, और भली-भाँति चौकस रहें कि वह मार्ग जो उसे हमारी ओर रखना है, कि हमारी अगुवाई और संचालन करके हमें उद्धार तक पहुँचाए, उसे हम रोक या बन्द न कर दें।

और यह वही बात है जिसके लिये हम ने पौलुस को कुरिन्थियों को उलाहना देते देखा, अर्थात् कि वह उनके पास पहुँच नहीं पाता था: और क्यों? वह कहता है, यह मेरी ओर से नहीं था। तो किसकी ओर से? तुम्हारी ही अत्यधिक संकीर्णता और पीछे हटने के कारण: और इसलिये कि तुम अपने आप को परमेश्वर के अधीन नहीं करते, वरन् उससे खिंचते हो, या अपने छिपने के स्थानों में सिकुड़ जाते हो: मुझे तुम से कभी इस बोली में, कभी उस बोली में बात करनी पड़ती है।

तो वहाँ कुरिन्थियों को और यहाँ अब तक गलातियों को उसके उलाहने के अनुसार, आओ सावधान रहें कि हम वैसे संकीर्ण न रहें जैसे अपने स्वभाव से हैं: वरन् परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह हमें अपने वचन तक पहुँच दे। और जब कि हमारी सब अभिलाषाएँ, हमारी पापमय व्यर्थताएँ, और हमारी हठीली भावनाएँ मार्ग में डाले गए अर्गलाओं, फाटकों, और ऐसी ही अन्य वस्तुओं के समान हैं, कि परमेश्वर का वचन आगे न बढ़े: तो आओ उनसे लड़ें, वह हम में केवल किसी दरार से होकर न घुसे, वरन् फाटक को पूरा खुला पाए, और जब भी परमेश्वर बोले, हम भली-भाँति कान लगाएँ, और अपने हृदय और मन खोल दें, कि उस शिक्षा को ठीक और खरी रीति से ग्रहण करें जिससे हमें शुद्ध किया जाना है, जब तक कि हम सब शुद्धता के सोते तक न पहुँच जाएँ।

पर अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने दोषों को मानते हुए गिर पड़ें, उससे प्रार्थना करते हुए कि वह हमें उन्हें ऐसा अनुभव कराए कि हम न केवल अपने मुँह से, वरन् सच्चे और निष्कपट हृदय से अपने आप को दोषी ठहराएँ, और अपने सब दोषों से साहस के साथ लड़ें, अपने आप का अधिकाधिक इन्कार करते हुए, और उनसे, और अपने भीतर की सब भ्रष्टता और पापमयता से अपने आप को पूरी तरह छुड़ाने का परिश्रम करते हुए, जब तक कि वह हमें पूरी रीति से अपनी ओर न खींच ले, और हम उसके स्वरूप की समानता में ऐसे रूपान्तरित न हो जाएँ कि उसकी अविनाशी महिमा का आनन्द लें, जिसके लिये वह अब हमें लुभाता है, और जिसे हम अन्तिम दिन तक केवल आशा में ही पा सकते हैं। कि वह यह अनुग्रह न केवल हमें, वरन् पृथ्वी के सब लोगों और जातियों को भी देने की कृपा करे, सब अज्ञानी प्राणियों को भ्रम और अन्धकार की दयनीय दासता से उद्धार के सच्चे मार्ग पर लौटाते हुए। इत्यादि।

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