अध्याय 40

अड़तीसवाँ उपदेश, जो छठवें अध्याय पर पहला है — गलातियों 6:1-2

Sermons upon Galatians · John Calvin

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अड़तीसवाँ उपदेश, जो छठवें अध्याय पर पहला है — गलातियों 6:1-2

जो छठवें अध्याय पर पहला है।

1 हे भाइयो, यदि कोई मनुष्य किसी अपराध में पकड़ा जाए, तो तुम जो आत्मिक हो, नम्रता के आत्मा से ऐसे को सम्भालो; और अपनी भी चौकसी रखो, कि तू भी परीक्षा में न पड़े।

2 तुम एक दूसरे के भार उठाओ, और इस प्रकार मसीह की व्यवस्था को पूरी करो।

मैं पहले बता चुका हूँ कि महत्त्वाकांक्षा से अधिक प्राणघातक महामारी कोई नहीं, जब हर मनुष्य अपने ही में मग्न होकर अपने पड़ोसियों को तुच्छ जानते हुए अपने आपको ऊँचा उठाना चाहता है; क्योंकि तब न समता रहती है, न मर्यादा।

अब यहाँ एक और दोष है जो उसका बहुत निकट का कुटुम्बी है: अर्थात् जब हम उन लोगों को, जिनसे चूक हुई है, इसलिए धर दबोचते हैं कि उनकी तुलना में अपने आपको बढ़ा लें; और हम देखते हैं कि संसार में यह एक सामान्य दोष है। क्योंकि हमारी समझ में दूसरों के गुण हमारे लिए बाधा हैं, कि हम उतनी प्रतिष्ठा नहीं पा सकते जितनी हम व्यर्थ ही चाहते हैं। यही कारण है कि हम में से हर एक अपने साथी की ताक-झाँक में लगा रहता है, इस मनसा से कि उसे ऐसा अपमानित करे कि अकेला वही बाज़ी न मार ले जाए, और इस प्रकार प्रमुख स्तुति और प्रशंसा पा ले।

और यदि ऐसा न भी हो, तो भी प्रायः ऐसा होगा कि हम उत्साह के बहाने अत्यन्त कठोर हो जाएँगे। इसी कारण सन्त पौलुस यहाँ विश्वासियों को उपदेश देता है कि जब कोई मनुष्य चूक जाए तो वे पूरी कोमलता के साथ उसे सुधारने का यत्न करें। और वह जान-बूझकर यहाँ यह बात हमारे सामने रखता है। क्योंकि उस सामान्य दुर्बलता का विचार, जो हम सब में है, हमें करुणा की ओर प्रेरित करे, जैसा कि वह आगे इसी बात को विस्तार से छुएगा।

तथापि स्वभाव से हमारी दुर्बलता का स्मरण दिलाने का उसका प्रयोजन यह है कि हम में से कोई बहुत ऊँचा न चढ़ जाए। और इसके अतिरिक्त वह "पकड़ा जाए" शब्द जोड़ता है, जिससे वह यह जताता है कि जब हम किसी मनुष्य को शैतान की चालाकी में फँसा हुआ देखें, तो वह सदा हमारी ओर से कोमलता का अधिकारी है। क्योंकि पौलुस यहाँ उनकी बात नहीं कर रहा जिनके हृदय में द्वेष जड़ पकड़ चुका है, जो परमेश्वर को सर्वथा तुच्छ जाननेवाले हैं, जो पूरे अन्यजातीय हैं, और जो सिर से पाँव तक विष से ऐसे भरे हैं कि अपने पक्ष में यह भी नहीं कह सकते कि वे भूल से गिरते हैं: क्योंकि वे तो पागल पशु हैं, जो जान-बूझकर परमेश्वर पर टूट पड़ते हैं, जैसे हम बहुतों को देखेंगे जो प्रत्यक्ष ही सब व्यवस्था को तुच्छ जानते हैं और चाहते हैं कि सारा संसार गड़बड़ में पड़ जाए।

इस प्रकार के लोग उन में गिने नहीं जाते जिनकी बात सन्त पौलुस यहाँ करता है। परन्तु चाहे कोई मनुष्य परमेश्वर का भय माने और अपने आपको उसकी सेवा में लगाने को तैयार हो, तो भी शैतान ने अपने फन्दे बिछा रखे हैं और हमें प्रायः हमारे सोचने से पहले ही पकड़ लेता है। देखो, इसी प्रकार हम "पकड़े जाते" या अचानक फँस जाते हैं। अब सन्त पौलुस हमसे कहता है कि ऐसी चूकों में भी हमें दयावन्त ही रहना है, और नम्रता के आत्मा से ऐसे मनुष्य की सह लेनी है।

फिर भी, यहाँ जो जो शब्द रखे गए हैं उन सब पर हमें भली-भाँति ध्यान देना चाहिए; और उसी से हम प्रेरित का आशय समझेंगे। क्योंकि सचमुच यहाँ कुछ भी निरर्थक नहीं, वरन् हर शब्द का अपना भार है। क्योंकि यह कहकर कि जो गिर गया है उसे फिर सुधारने का यत्न करना चाहिए, वह दिखाता है कि वह कोमलता जो बहुत लोग चूकनेवालों की चापलूसी करने में बरतते हैं, उसमें मसीही भाव की गन्ध तक नहीं। इसलिए मनुष्यों के दोषों को डाँटना चाहिए, और जो मार्ग से भटक गया है उसे फिर सही मार्ग पर लाने का परिश्रम करना चाहिए।

क्योंकि यदि कोई किसी की दुष्टता में उसका पक्ष ले और उसमें उसकी चापलूसी करे, तो वह उसके साथ विश्वासघात करता है, क्योंकि वह उसे लोरी देकर सुला देता है और इस रीति से उसे विनाश में और गहरा डुबो देता है। इसलिए तुम देखते हो कि सन्त पौलुस ने जो उपाय ठहराया है वह यह है कि यदि कोई चूक गया हो तो उसे सुधारा जाए, परन्तु वह भी कोमलता और नम्रता के आत्मा से किया जाए।

वह "नम्रता" शब्द को "आत्मा" शब्द के बिना भी भली-भाँति प्रयोग कर सकता था; परन्तु उसने इसे इसलिए चुना कि हमें जता दे कि जिन्हें अपराध करने पर चेतावनी और समझाइश की आवश्यकता है, उनके कल्याण और उद्धार की हमें हार्दिक अभिलाषा होनी चाहिए; और साथ ही वह यह भी प्रकट करना चाहता था कि यह परमेश्वर की ओर से आता है। क्योंकि जैसे वह सारी भलाई का सोता है, वैसे ही वह अपने बच्चों को कुछ नम्रता भी देता है, कि वे उसका अनुसरण करें और उसके उदाहरण के अनुसार अपने आपको ढालें।

हम जानते हैं कि पवित्रशास्त्र की रीति है कि पवित्र आत्मा के वरदानों को सत्य का आत्मा, परमेश्वर के भय का आत्मा, बुद्धि का आत्मा, और ऐसे ही अन्य नाम दे, क्योंकि सारी भलाई की परिपूर्णता उसी में है। तो तुम देखते हो कि जो कुछ पौलुस यहाँ सिखाता है उसका सार यह है कि हम न केवल सद्गुण से प्रेम करें और उन्हें भला जानें जो सिद्धता में चलते हैं और जिनमें हम कोई दोष नहीं पा सकते; वरन् उनकी चूकों को सहने में भी कोमल हों जो परमेश्वर के भय में अभी उतने दृढ़ नहीं हुए जितना अपेक्षित है, कि हम उन्हें, जो मुड़ गए हैं या मार्ग से धकेल दिए गए हैं, फिर सही मार्ग पर ला सकें।

क्योंकि यदि हम में कोई नम्रता या कोमलता न हो, तो जैसे ही किसी से कोई चूक हो, हम उसे मानो निराशा में डुबो दें; और यह बात बहुत देखने में आती है। इसलिए सन्त पौलुस हमें बताता है कि परमेश्वर की सन्तानों की नम्रता या कोमलता अपने आपको इस रीति से परखे कि जो दुर्बलता के कारण गिर पड़े हैं उन्हें सम्भाले, हाँ ऐसी रीति से कि प्रकट हो कि उनके उद्धार की चिन्ता की जा रही है। अब मैंने तुमसे कहा है कि दो अति या दो दोष हैं जिनसे हमें सावधान रहना है। एक यह कि जब हमारे मित्रों में से कोई परमेश्वर के विरुद्ध अपराध करे तो हम आँख मूँद लें, यहाँ तक कि जब उसने ठोकर का कुछ कारण भी दिया हो तब भी हम उसे जाने दें, क्योंकि हम उसे डाँटकर उसकी अप्रसन्नता मोल लेना नहीं चाहते।

और आजकल तुम देखते हो कि संसार में मित्रता निभाने की सामान्य रीति यही है कि हर प्रकार की बुराई को छूट और अनुमति दी जाए, शैतानी छल-कपट के द्वारा। क्योंकि कोई नहीं सह सकता कि उसकी छिली हुई पीठ को सहलाया जाए, और चेतावनियों को भला जानकर वे ही ग्रहण करते हैं जिन्हें परमेश्वर ने छुआ है और जिन्हें उसने आज्ञाकारिता का आत्मा दिया है कि वे अपने आपको सिखाए जाने योग्य बनाएँ। इसलिए इस प्रकार के लोग दाऊद के साथ कहेंगे कि वे कड़ाई के साथ भी डाँटे जाना अधिक चाहेंगे, बजाय इसके कि चापलूस के वे मलहम पाएँ जो केवल मनुष्यों को उनके पापों में लोरी देकर सुलाने का काम करते हैं।

तथापि तुम प्रायः देखोगे कि सब मनुष्य चाहते हैं कि उनकी सह ली जाए, और वे चाहे जो करें उनसे कुछ न कहा जाए, और उनके दोषों और बुराइयों से उनका सिर न खपाया जाए। हर कोई इसकी पुष्टि करता है, यहाँ तक कि परमेश्वर भुला दिया गया है, और (जैसा यशायाह भविष्यद्वक्ता कहता है) कहीं कोई ऐसा रक्षक नहीं जो सत्य का पक्ष ले, क्योंकि जितनी हो सकती है उतनी गड़बड़ी और अव्यवस्था है, फिर भी मनुष्य सब कुछ जाने देते हैं। यह सच है कि यदि किसी मनुष्य के साथ अन्याय हो, तो वह यह कहने में नहीं हिचकिचाएगा कि ऐसी उच्छृंखलता का निवारण होना चाहिए; परन्तु वह यह परमेश्वर की महिमा बनाए रखने के किसी उत्साह के कारण नहीं कहता, वह केवल अपने निजी लाभ के लिए और अपने ही विषय में जो चिन्ता है उसी के कारण कहता है।

इस प्रकार तुम देखते हो कि परमेश्वर के पास अपना मुकद्दमा लड़नेवाले कोई वकील या पैरोकार नहीं, परन्तु हर मनुष्य अपने ही लिए है। इसलिए जब हम किसी को बुराई करते देखें, तो सीखें कि उसके बुरे कामों को ढाँप देना, कि हम उन्हें छिपा लें और उन पर कोई ध्यान ही न दें, न प्रेम है न दया; परन्तु यदि हमें उसकी चिन्ता है जो इस प्रकार गिरा है, तो हमें उसे उस मार्ग से फेरना होगा। यदि कोई कीचड़ में हो, तो हम उसे सहारा देने को हाथ बढ़ाएँगे कि वह बाहर निकल आए; और यदि हम उसके पास से निकल जाएँ और उसे देखना ही न चाहें, तो क्या वह न कहेगा कि यह बहुत लज्जाजनक निर्दयता है?

ठीक यही दशा है जब हम किसी मनुष्य को उसके पापों में सो जाने देते हैं: क्योंकि इस रीति से वह विनाश की तली तक डूब जाता है। तब यह बहुत बड़ा विश्वासघात है, यदि हम जान-बूझकर किसी मनुष्य को अपना सर्वनाश करने देते हैं; और साथ ही हम यह भी दिखाते हैं कि हम में परमेश्वर के लिए कोई उत्साह नहीं। क्योंकि यदि वह हमारा पिता है, तो क्या कम से कम हमें दुःख और खेद न होना चाहिए जब हम उसके साथ अन्याय और अपमान होते देखें?

तो फिर, यदि वे प्राण जिन्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह ने इतने मूल्य से मोल लिया है हमें प्रिय हैं, या यदि हम परमेश्वर के आदर को उतना मूल्य देते हैं जितना उसका अधिकार है, तो निश्चय है कि हम मनुष्यों की चूकों को इस प्रकार न सहेंगे, वरन् उन्हें सुधारने का यत्न करेंगे। इसे एक बात के रूप में ध्यान में रखो। परन्तु इसका एक विपरीत दोष भी है: अर्थात् अत्यधिक कठोरता। क्योंकि कपटियों का यह लक्षण है कि यदि वे अपने पड़ोसी की आँख में तिनका देखें, तो उस पर दुहाई मचा देते हैं, और उसे हो-हल्ले के साथ खदेड़ना आवश्यक समझते हैं, जबकि इस बीच उनकी अपनी आँखों में बड़ा लट्ठा है, जैसा हमारा प्रभु यीशु उनके विषय में कहता है।

क्योंकि जैसे बहुत से लोग अपने विवेक को इतना चौड़ा कर लेते हैं कि [अपने मामलों में] पूरा बैल निगल जाएँ, और इस बीच जब मच्छर दूसरे लोगों को छूता है तो उसे छानते हैं; इसलिए हमें सावधान रहना चाहिए कि अपने भाई को डाँटने में हम अधिक कर्कश और तीखे न हों। इसके अतिरिक्त ऐसे भी हैं जिनमें अविवेकी उत्साह है, कि वे बहुत खट्टे और कड़वे हैं, और उनका मत है कि जब तक वे मनुष्यों के दोषों को मानो तुरही बजाकर ऊँचे स्वर में घोषित न करें, तब तक वे अपने कर्तव्य से मुक्त नहीं होते। और आजकल कितनी चेतावनियाँ सच्ची चिन्ता के साथ दी जाती हैं?

यदि कोई अपने पड़ोसियों में से किसी को बुराई में गिरते देखे, तो उसे चाहिए (यदि उस तक उसकी पहुँच हो सके) कि उसे उसका दोष बता दे; परन्तु हम यह नहीं चाहते। क्योंकि (जैसा मैंने कहा) हर कोई दूसरे को हेय जानता है, और जासूस के समान उसकी घात में रहता है कि देखे उसमें कुछ बुरा मिलता है या नहीं, और तब पूरी कठोरता बरतता है। यह सच है कि जिनके साथ इस रीति से अत्यन्त रूखा व्यवहार किया जाता है, वे इसकी शिकायत नहीं कर सकते। क्योंकि आजकल मनुष्यों में जो बुराई उठती है वह कहाँ से आती है, कि किसी को गुप्त में चेतावनी नहीं दी जाती कि वह परमेश्वर की ओर लौटाया जाए, वरन् जो दोष छिपकर किए गए थे वे ढोल पीटकर फैलाए जाते हैं, यहाँ तक कि उस व्यक्ति की बदनामी तक हो जाती है?

इसका कारण यह है कि हम में से हर एक द्वार बन्द कर लेता है, क्योंकि हमारे कान बहुत खुजलाते हैं, और हम सच्ची बात सुनना नहीं सह सकते, वरन् सब बुराई पर अपना अधिकार बनाए रखना चाहते हैं, मानो परमेश्वर अपने अधिकार से हटा दिया गया हो और उसे हम पर न्याय करने का कोई विशेषाधिकार न रहा हो। इसलिए जब हर मनुष्य अपने आपको ताड़ना से मुक्त रखना चाहता है, तो सब इसी रीति से कड़ाई से बरते जाने के योग्य हैं, और उनके साथ भाइयों के समान नहीं वरन् शत्रुओं के समान व्यवहार किया जाना चाहिए। क्योंकि हम में भाईचारा हो ही नहीं सकता जब तक ताड़ना का स्थान न हो, ऐसा कि हर कोई उसके अधीन हो, हाँ अपनी इच्छा से भी।

और क्योंकि हम किसी भी रीति से डाँटे जाना नहीं चाहते, इसलिए हम भली-भाँति योग्य हैं कि हमारे साथ ऐसी अत्यधिक कठोरता बरती जाए। इसी कारण सन्त पौलुस वह मध्य मार्ग ठहराता है, अर्थात् यह कि हम एक दूसरे की चिन्ता रखें, ताकि यदि कोई ठोकर खाए तो उसे फिर उठाया जा सके। और कैसे? भली चेतावनियों से। क्योंकि यही वह उपाय है जो परमेश्वर ने अपने वचन के द्वारा हमारे लिए ठहराया है; फिर भी इस बीच ... दूसरों के दोषों को डाँटने में इतना उत्सुक न हो कि भूल जाए ... अर्थात् उसी नम्रता के आत्मा को बरते।

क्योंकि यह बहुत ही व्यर्थ होगा कि हमारे मुँह में चीनी हो, जैसी बहुतों के होती है, और इस बीच हृदय में विष लिए फिरें। इसलिए सन्त पौलुस यहाँ केवल जीभ की बात नहीं करता, न यह कहता है कि हमारे पास लुभानेवाले शब्द हों: वरन् यह कि मनुष्यों के दोषों को डाँटते समय हमें सदा अपने पड़ोसी के उद्धार की सच्ची अभिलाषा से चलाया और प्रेरित किया जाना चाहिए। क्योंकि निश्चय है कि यदि हम चूकनेवालों के प्राण का कल्याण चाहें, तो हम संयम से व्यवहार करेंगे, और वह संयम अपने साथ वह मर्यादा लाएगा जिसकी बात पौलुस करता है, कि हम न अति उत्सुक हों, और न उस सोते से हटें, जो यह है कि हम बिना जाने कि क्यों और किस प्रयोजन से दोष निकालने में उतावले न हों, वरन् उसे जो बुरी चाल में पड़ा है फिर लौटा लाने की चिन्ता रखें, और उसे अपने साथ परमेश्वर के पास लाने की अभिलाषा करें।

संक्षेप में, हमें चाहना चाहिए कि वह हमारा भाई हो, ताकि हम सब से परमेश्वर की सेवा हो और वह अपनी स्थिति में बनाए रखा जाए। यदि हमारा मन ऐसा हो, तो निश्चय ही शेष सब कुछ पीछे-पीछे आएगा। परन्तु "आत्मा" शब्द के अधीन हमें यह भी चेतावनी मिलती है (जैसा मैंने अभी कहा) कि हमें परमेश्वर के समान ढलना है, क्योंकि उसने हमें अपनी सन्तान होने के लिए चुनना उचित जाना, जैसा हमारा प्रभु यीशु मसीह हमसे कहता है: तुम अपने स्वर्गीय पिता के समान बनो, जो उन पर भी दया करता है जो उसके योग्य नहीं।

इसलिए यदि हम परमेश्वर की सन्तान गिने और माने जाना चाहते हैं, तो उसके स्वभाव पर दृष्टि रखें जो हमें अपने स्वरूप की समानता में बुलाता है, और वह यह है कि हम नम्र और कोमल हों। अब परमेश्वर अपनी कोमलता में चूकनेवालों की चापलूसी नहीं करता। क्योंकि वह अधर्म से घृणा करता है, और उसे सदा उसका शत्रु ही दिखाई देना है। परन्तु हम वह बात देखते हैं जो कही गई है, अर्थात् कि परमेश्वर अपनी सन्तानों को इस रीति से ताड़ना देता है कि जो दण्ड वह देता है वे उसी के घर से, और उसी के घराने के लोगों से आरम्भ होते हैं। फिर भी वह बेचारे पापियों पर गरजता नहीं, वरन् धीरज से उनकी बाट जोहता है, उन्हें प्रोत्साहित करता है, खींचता है, सहता है, अपना अनुग्रह उनके सामने रखता है, और उन्हें दिखाता है कि वह उन्हें ग्रहण करने को तैयार है, और यदि वे उसके पास आएँ तो उसकी बाँहें उन्हें गले लगाने को फैली हुई हैं।

इसलिए तुम देखते हो कि पहली बात जो हमें विचारनी है वह यह कि हम अपने आपको अपने परमेश्वर के ... उदाहरण के अनुसार ढालें, ऐसा कि हम ... जिनमें हम कोई दुर्बलता देखें उन्हें पहले ही झटके में कुचल न दें, वरन् उन्हें जीतने का परिश्रम करें, क्योंकि वे खोए हुए प्राणों के समान हैं। और इसी से हम यह भी निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जो आजकल चाहते हैं कि दोष ढाँपे जाएँ, हाँ इस बहाने उनका पक्ष भी लिया जाए कि परमेश्वर धीरजवन्त और कोमल है, वे पवित्रशास्त्र को झूठे रूप से बिगाड़ते हैं।

क्योंकि आजकल, यदि कितने ही घृणित अपराध किए जाएँ, तो तुरन्त वे दया की दुहाई देते हैं, "अरे, उन पर तरस खाना चाहिए": हाँ, परन्तु ऐसे लोग परमेश्वर की निन्दा करते हैं, क्योंकि वे चाहते हैं कि हम उससे भी अधिक दयावन्त हों जितना वह है। निश्चय हम जानते हैं कि वह सारी भलाई का सोता है, और हमारे लिए यही बहुत है कि हम दूर ही से उसका अनुसरण कर सकें, और यह बहुत वांछनीय बात होती कि हम उसके अधिकाधिक निकट आ सकें। परन्तु जब हम अपनी पूरी शक्ति लगा चुकते हैं, तब भी यह बहुत है यदि हम में उस दया की कोई छोटी-सी चिंगारी भी हो जो परमेश्वर में अनन्त है।

तथापि परमेश्वर अपना अनुग्रह उन्हीं से प्रतिज्ञा करता है जो उसकी ओर फिरते हैं। यह सच है कि वह उन्हें अपने पवित्र आत्मा से छूता है और उनका मन बदल देता है; परन्तु फिर भी पश्चात्ताप सदा पापों की क्षमा के साथ जुड़ा रहना चाहिए। अब मनुष्य किस रीति से दयावन्त होना चाहते हैं? इस रीति से कि वे परमेश्वर का उसके मुँह पर उपहास करें, कि लोग उनके दुराचार की ओर से आँख मूँद लें, हाँ उसमें उन्हें पुचकारें, कि परमेश्वर को ठुकरा दिया जाए, और जो और भी बुरे से बुरे होने को तत्पर हैं उन्हें सहा जाए और उनका पक्ष लिया जाए। परन्तु मैंने तुमसे कहा है कि यह बहुत ही शापित निन्दा है, जब मनुष्य इस रीति से भले को बुरा बना देते हैं।

तो सन्त पौलुस के उपदेश के अनुसार हम ऐसी नम्रता लाना सीखें जो परमेश्वर के आत्मा की हो, बुराई को स्वीकार करने या भलाई को मिटाने के लिए नहीं, वरन् विवेक के साथ मर्यादा से बातों को सुधारने के लिए। साथ ही यह भी सीखें कि जब हमें अपने पड़ोसियों को ताड़ना देना आवश्यक हो तो परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह हमें चलाए, और अपने मन में निश्चय रखें कि अपने स्वभाव से हम इसे कभी नहीं कर सकेंगे।

हम जानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने और इस विषय में विश्वासयोग्यता से लगे रहने के लिए पहले हमें उसी से वह प्राप्त करना होगा जिसकी हमें घटी है। अब मनुष्य जितना चाहे अपने आपको खींचे, वह अपने में से भलाई की एक बूँद भी निकालने में समर्थ न पाएगा।

परन्तु जब हम ताड़ना देने पर आते हैं, तब हम डाँटते हैं ... परमेश्वर: और यदि मैं किसी मनुष्य को उसका दोष बताना चाहूँ, तो मैं उसके पास ... अपने निजी नाम से उसके बड़े के रूप में नहीं आता: वरन् परमेश्वर के नाम से।

अब जब ऐसा है कि चूकनेवालों को डाँटने में हम परमेश्वर का काम पूरा करते हैं, तो जब तक वह हमें इस काम के लिए न चलाए और न बताए तब तक हम इसके योग्य कैसे होंगे? इसलिए जब कभी कोई चेतावनी देनी हो, कि जो सही मार्ग से निकल गए हैं उन्हें फिर लौटा लाएँ, तो हम सीखें कि उससे विनती करें कि वह अपने पवित्र आत्मा से हमें चलाए और हम पर राज्य करे। और इसी के साथ हमें यह भी ध्यान रखना है (जैसा मैंने पहले कहा) कि सन्त पौलुस यहाँ उनकी बात नहीं करता जो दुष्टता में, परमेश्वर की तुच्छता में और विद्रोह में डूबे हैं, वरन् उनकी जो "पकड़े गए" हैं, ऐसे कि उनमें भला करने की कुछ इच्छा है, फिर भी वे दुर्बलता के कारण गिर पड़ते हैं।

इसलिए इस विषय को बहुत कुशलता और विवेक से सँभालना चाहिए। क्योंकि यदि हम सब के साथ एक-सा व्यवहार करें, तो निश्चय है कि हम प्रायः उनके साथ अन्याय करेंगे जिन्हें सहा जाना आवश्यक है, और इस बीच परमेश्वर को तुच्छ जाननेवालों को केवल भड़काएँगे और उन्हें पहले से भी अधिक ढीठ बना देंगे। इसलिए (जैसा मैंने कहा) हमें एक और दूसरे में भेद करना चाहिए।

क्योंकि जब यहेजकेल भविष्यद्वक्ता भले चरवाहे की बात करता है, तो कहता है कि उसे दुर्बल भेड़ों को सहना है, और यदि उनमें से कोई रोगग्रस्त हो, तो उसे अच्छी औषधियों से चंगा करना है। परन्तु यदि वह एक और दूसरे में भेद किए बिना एक ही रीति बरतता रहे, तो ऐसा करने में वह अपने आपको चरवाहा कैसे दिखाएगा? उन सब का भी यही हाल है जो अपने पड़ोसियों की चूकों को डाँटने का काम करते हैं।

उदाहरण के लिए, यदि कोई निर्लज्ज दुष्ट है, जो प्रतिदिन सब प्रकार की बुराई में सिर के बल दौड़ता है, जो परमेश्वर के वचन को कुछ नहीं गिनता, और दूसरों को बिगाड़ने के सिवा कुछ नहीं करता, उस खुजली-ग्रस्त मेढ़े के समान जो अपना रोग सारे झुण्ड में फैला देता है: या यदि कोई लुच्चा है जो सब प्रकार की दुष्टता के वश में छोड़ दिया गया है: ऐसा मनुष्य पाप में "पकड़ा गया" नहीं है। और क्यों? क्योंकि वह तो परमेश्वर की सेवा पहले ही छोड़ चुका है, उसने उसका जूआ पूरी तरह उतार फेंका है, और (जैसा मैंने पहले कहा) वह पागल पशु बन गया है जो अपने सींगों से आकाश को सींग मारता है।

इस प्रकार के लोग इस योग्य नहीं कि कोमलता से उनकी सही जाए: और इस पाठ में सन्त पौलुस उन्हें बिलकुल काट देता है और द्वार से बाहर कर देता है। परन्तु जब ... दुर्बलता से गिरा दिया गया, और ... ने उसे अचानक आ पकड़ा, और फिर भी परमेश्वर के भय का वह अच्छा बीज जो उसमें था उसमें सर्वथा डूब नहीं गया: तब हमें उस पर तरस और करुणा करना शोभा देता है।

और क्योंकि हम हर घड़ी फिसल सकते हैं, हम सीखें कि गम्भीरता से परमेश्वर को पुकारते रहें कि वह हमें चलाए; और यह भी भली-भाँति मन में रखें कि सन्त पौलुस कैसे जोड़ता है, अपनी चौकसी रख कि तू भी परीक्षा में न पड़े। यहाँ वह वचन बदल देता है। उसने कहा था, हे भाइयो, यदि कोई मनुष्य पकड़ा जाए, तो उसे सुधारने में सहायता करो। और अब वह अपनी बात हर एक मनुष्य की ओर अलग-अलग मोड़ता है, कहते हुए: अपनी चौकसी रख: और यह इसलिए कि यह चेतावनी और अधिक तीव्र हो और हमें और निकट से छुए।

क्योंकि हम देखते हैं कि जब कोई सामान्य रूप में बोलता है, तो हर मनुष्य समझता है कि यह दूसरों से कहा जा रहा है, और हम में से कोई नहीं जो जहाँ तक हो सके अपने आपको उससे बचा न निकाले। फिर यदि कहा जाए, देखो, सब किसी न किसी बात की ओर झुके हैं? बहुत अच्छा, वह सारी मण्डली से बोलता है, परन्तु इस बीच कोई उससे उस प्रकार नहीं छुआ जाता जैसा छुआ जाना चाहिए। इसलिए सन्त पौलुस यहाँ जान-बूझकर वचन बदलता है, और वह नहीं समझता कि सब विश्वासियों और सारी कलीसिया की मण्डली को सामूहिक रूप से चिताना पर्याप्त है: वरन् वह हर मनुष्य को अलग ले जाकर कहता है, अपनी चौकसी रख, और जाँच कि तुझ में क्या है: क्योंकि तू भी परीक्षा में पड़ सकता है।

सच तो यह है कि चूकनेवालों के प्रति कोमल होने के लिए हमें मनवाने को कोई कारण इससे शीघ्र नहीं हो सकता कि हम जानें कि हमें भी सहे जाने की आवश्यकता है। और स्वयं अन्यजातियों ने भी यही बात कही है। क्योंकि उन्होंने कहा है कि यह मनुष्य में बड़ी क्रूरता है यदि वह अपने मन में अपने साथियों की दुर्बलताओं को सहने की बात न पाए, जबकि ऐसा कोई मनुष्य नहीं जो स्वयं दुर्बल न हो।

यह असम्भव होता कि कोई दो मनुष्य संसार में एक साथ रह सकें, यदि वे एक दूसरे की सहने में धीरजवन्त न हों। तब दो ही मनुष्य सारे संसार में झगड़ा खड़ा कर देने को बहुत होते, यदि वे एक दूसरे की न सहें। और जो अपने आपको सबसे सिद्ध समझते हैं, वे भी पाएँगे कि उन्हें स्वयं सहे जाने की आवश्यकता है।

क्योंकि निश्चय यदि हम सर्वथा जड़बुद्धि न हों, तो हम अपने भीतर की बुराई से घृणा करेंगे। और हमें किसी की आवश्यकता नहीं जो हमें सताए और दुःख दे: हर ... अपने आप में अपनी ही अपूर्णताओं पर खेद करके। और ऐसा ही है: तब यही बात हमें क्यों न प्रेरित करे कि जो दुर्बलता से गिर पड़े हैं उनके साथ मृदुता और कोमलता से व्यवहार करें?

इस प्रकार तुम देखते हो कि यहाँ हमें क्या भली-भाँति ध्यान में रखना है। और सच पूछो तो यदि हम भली-भाँति खोजें कि बहुत लोग ऐसे अनियन्त्रित उत्साह से क्यों भड़क उठते हैं और छोटी-छोटी चूकों पर इतना भयंकर बिगड़ते हैं, तो कारण यह है कि वे अपने विषय में नहीं सोचते। अब इस विषय में जो क्रम हमें रखना है वह यह कि पहले बुराई को, चाहे वह कुछ भी हो, दोषी ठहराएँ: इसे एक बात के रूप में ध्यान में रखो। क्योंकि यदि हम बुराई को इस या उस मनुष्य में तो दोषी ठहराएँ, और औरों में उसे टाल जाएँ, तो यह चिह्न है कि हम सच्चे मन से इस उद्देश्य से नहीं चलाए जा रहे कि परमेश्वर की सेवा और आदर हो, वरन् हम में द्वेष की कोई गुप्त जड़ है,* जैसा सुलैमान कहता है कि बैर दोषों को खोल देता है, और हर कोई उसी में दोष निकालता है जिस पर उसका कोई द्वेष हो। तो तुम देखते हो कि पहला नियम जो हमें रखना है वह यह कि बुराई को, जहाँ कहीं पाई जाए, दोषी ठहराएँ, इसी कारण कि वह परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध है। यह एक बात है। दूसरी यह कि हम में से हर एक अपने आपको जाँचे। क्योंकि निश्चय कोई बुराई जितनी हमारे निकट हो, उतना ही अधिक हमें उससे बैर होना चाहिए। यदि मैं परमेश्वर के तुच्छ जाननेवाले को देखूँ, तो यह मुझे उससे अधिक खेद देगा जितना तब देता यदि वह मुझसे दस कोस दूर होता और मैं उसके दोष न जानता। तब हमारा कर्तव्य है कि अपनी ओर ध्यान रखें। क्योंकि इस उपमा को लें, हम जितने निकट पड़ोसी हों और मनुष्यों में जितनी घनिष्ठता हो, उतना ही अधिक हमें वह बात व्यवहार में लानी है जिसकी मैंने चर्चा की: अर्थात् जब कोई चूके, तो हम में से हर एक दूसरे को उसके दोष और अधिक बताए। क्योंकि परमेश्वर ने हमें इस शर्त पर आपस में बाँधा है कि यदि मेरा कोई मित्र हो, तो मुझे किसी परदेशी की अपेक्षा उसे अधिक सुधारना है।

परन्तु अब जब बुराई को दोषी ठहराना है, तो मेरे लिए मुझसे निकट कौन है? तो तुम देखते हो कि मनुष्य कहाँ से जान सकता है कि हम परमेश्वर का आदर और पाप की शुद्धि चाहते हैं या नहीं: अर्थात् यदि हम अपने आपको लगाम देने में कठोर और तीखे हों, और जब दूसरों को डाँटें तो पहले अपने सारे दोषों को दोषी ठहराएँ, और दिखाएँ कि वे हमें बुरे लगते हैं, और जितना हम से हो सके उन्हें सुधारने का यत्न करें। तो तुम देखते हो कि अपने पड़ोसियों पर न्याय करने की हमारी रीति यही है कि पहले अपने आपको दोषी ठहराएँ। और यह चेतावनी केवल बीती बातों के लिए नहीं, वरन् आगे की बातों के लिए भी है। इसलिए सन्त पौलुस यह नहीं कहता, ... ने पहले अपराध किया है: परन्तु कहता है ... कि तू ... आगे परीक्षा में पड़े। और निश्चय हमें निरन्तर भय और सावधानी में चलना चाहिए, इसलिए नहीं कि हम परमेश्वर के अनुग्रह और कृपा पर सदा भरोसा न रखें, वरन् इसलिए कि हमें असावधान न होना है।

क्योंकि विश्वास का अर्थ यह नहीं कि हम सब बातों में निश्चिन्त रहें: वरन् (जैसा सन्त पौलुस फिलिप्पियों के दूसरे अध्याय में हमें दिखाता है) यह कि जब हम अपने आप से कुछ भी करने में समर्थ नहीं हैं, तो परमेश्वर को अपने आत्मा से हमें चलाना पड़ता है, और जब वह हमें इच्छा दे चुका, तो उसे उसे पूरा करने की सामर्थ्य भी देनी पड़ती है। इसलिए जब हम सब कुछ परमेश्वर से ही पाते हैं, तो हमें भय और सावधानी में चलना ही शोभा देता है। और इस प्रकार जब हम अपनी बीती चूकों पर विचार करें और अपनी वर्तमान दशा को भली-भाँति देखें, तो हमारे पास निरन्तर कारण है कि अपनी आँखें नीची रखें।

निश्चय जब परमेश्वर हमें भलाई को थामे रखने और बुराई को दोषी ठहराने का साहस देना उचित जानता है, तो वह हमें न्यायी ठहराकर बड़ा अनुग्रह देता है, यद्यपि हम इसके योग्य हैं कि हमारे मुँह बन्द कर दिए जाएँ। फिर भी हमें [दूसरे मनुष्यों की] उन चूकों को डाँटने में, जिन्हें हम पहले ही अपने में दोषी ठहरा चुके हैं, दीन मन के होना सीखना चाहिए, क्योंकि हम स्वयं प्रतिदिन और प्रतिघड़ी, हाँ घड़ी के हर क्षण गिर सकते हैं। तब जब बात ऐसी है: तो हम चूकनेवालों पर तरस खाएँ, क्योंकि वे सब हमारी अपनी दुर्बलता के दर्पण हैं, क्योंकि वहाँ हम देखते हैं कि हम स्वयं क्या हैं, जहाँ तक परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा के अनुग्रह से हमें थामे न रखे। इसके अतिरिक्त, चूकनेवालों को चिताने में भी हम (जैसा मैंने पहले तुमसे कहा) बहुत उतावले, बहुत कठोर और बहुत निर्दय होकर परमेश्वर के विरुद्ध अपराध कर सकते हैं।

यद्यपि अपने पड़ोसियों को चिताना सराहने योग्य सद्गुण है, तो भी यदि हम अति उदार हो जाएँ, तो सब कुछ दोष में बदल जाएगा, जब तक हमारा प्रभु हमें ऐसा न रोके कि हम सन्तुलित हाथ रखें और जिन दो दोषों की मैंने पहले चर्चा की उनमें से किसी की ओर न मुड़ें। इस प्रकार तुम देखते हो कि सन्त पौलुस के इस वचन के विषय में हमें क्या स्मरण रखना है। अब वह स्पष्ट कहता है, तुम जो आत्मिक हो: यह जताने को कि जब परमेश्वर ने हमें अपनी सामर्थ्य से दृढ़ किया है, तब हम और अधिक बाध्य हैं कि निर्बलों को सहें, जैसा रोमियों के चौदहवें अध्याय में भी बताया गया है। और सचमुच यदि परमेश्वर अपना अनुग्रह एक मनुष्य को दूसरे से अधिक बाँटता है: तो यह इसलिए नहीं कि ... या उस मनुष्य ... सब के साथ, वरन् उन्हें थामे रखने के लिए जो ... चलने में समर्थ नहीं: जैसे यदि दो मनुष्य एक साथ यात्रा पर जाएँ, और उनमें से एक अपने आपको थका हुआ पाए, ऐसा कि वह अपने पाँव घसीटने में भी समर्थ न हो: तो निश्चय है कि जो बलवन्त और सशक्त है वह उसे चिढ़ाने को मानो उससे आगे नहीं भागेगा, वरन् अपने साथी के लिए अपने आपको रोक लेगा, हाँ और उसे आगे बढ़ने को फुसलाएगा, कहेगा, चल भाई, हियाव बाँध, और मुझे स्वयं तेरी सहायता करने दे। संक्षेप में, वह जो कुछ उससे हो सकेगा करेगा कि अपने उस साथी को जो इतना निढाल है उत्साहित करे।

उसी रीति से हमें भी एक दूसरे की सहनी चाहिए, क्योंकि हम देखते हैं कि परमेश्वर ने हम सब को सामूहिक रूप से बुलाया है, और इस शर्त पर चुना है कि हम सब मिलकर एक मन से चलें, और हर मनुष्य अपने पड़ोसी की ओर हाथ बढ़ाए (जैसा यशायाह भविष्यद्वक्ता इसकी चर्चा करता है) और कहे, "आओ, हम यहोवा के पर्वत पर चढ़ें।" तब यह उचित नहीं कि जिन्होंने परमेश्वर के वरदानों का बड़ा भाग पाया है, वे औरों को दबाने का यत्न करें: वरन् उचित यह है कि वे उनकी दुर्बलताओं को सहें और उस नम्रता से द्रवित हों जिसकी हमने चर्चा की। इस प्रकार तुम देखते हो कि सन्त पौलुस स्पष्ट कहता है कि हमारे प्रभु ने हमें जितना आगे बढ़ाया है, उतना ही हमें औरों को अपने पीछे खींचना चाहिए। और इसी पर वह निष्कर्ष के रूप में जोड़ता है, "तुम एक दूसरे के भार उठाओ, और इस प्रकार मसीह की व्यवस्था को पूरी करो।" जब वह कहता है कि हमें [अपने पड़ोसियों के] भार उठाने हैं, तो वह उस बात को जो मैंने तुमसे पहले कही और भी अच्छी रीति से प्रकट करता है: अर्थात् वह यहाँ परमेश्वर को तुच्छ जाननेवालों की बात नहीं करता, जो सब प्रकार की उच्छृंखलता में दौड़ते हैं और द्वेष और हठ में डूबे हैं: परन्तु उनकी जो परिश्रम करते और सब भलाई में आगे बढ़ते हैं, और उसे पाने की सच्ची इच्छा रखते हैं, और जो अपने पापों के नीचे ऐसे कराहते हैं जैसे ऐसे भार के नीचे जो उनके लिए बहुत भारी है। इसे भली-भाँति समझने के लिए हम उस उपमा के विपरीत एक उपमा रखेंगे जो सन्त पौलुस यहाँ रखता है। वह कहता है कि जो अपने पापों में पकड़े जाते हैं, वे मानो भार के नीचे झुका दिए जाते हैं। और क्यों? क्योंकि वे अपने आप से क्रोधित हैं। इसलिए नहीं कि वे घमण्ड और घृणा से परमेश्वर के विरुद्ध झल्लाते और कुढ़ते हैं: वरन् इसलिए कि वे शैतान का सामना उतनी दृढ़ता और साहस से नहीं कर पाते जितना वे चाहते हैं। परन्तु जहाँ तक उन उपद्रवियों का सम्बन्ध है जो सब बुराई के वश में हैं, वे अपने भार के नीचे झुकने से इतनी दूर हैं कि वे उलटे ... ऊपर सवार होकर विजय का उत्सव मनाते और डींग मारते हैं, मानो वे परमेश्वर को सर्वथा ललकारना चाहते हों। इस प्रकार तुम उस भेद को देखते हो जो उनके बीच है जिनकी सही जानी चाहिए, और उनके बीच जिनके विरुद्ध सब कठोरता बरती जा सकती है। क्योंकि एक प्रकार के लोग भार के बोझ से झुके हैं, जो मानो उन्हें दबा देता है: और ये वही हैं जिन्हें हमारा प्रभु यीशु मसीह अपने पास बुलाता है, कहते हुए: "हे सब परिश्रम करनेवालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा, और तुम अपने प्राणों के लिए चैन पाओगे।" हमारा प्रभु यीशु सब मनुष्यों को बिना अपवाद अपने पास नहीं बुलाता, वरन् उनको जिन्हें कृपा पाने की पहुँच हो एक चिह्न देता है, अर्थात् कि वे लदे हुए हों: अर्थात् वे अपने पापों में लोटते नहीं, न उनमें आनन्द लेते हैं, न निर्लज्ज लोगों की नाईं उन पर घमण्ड करते हैं: वरन् वे चैन चाहते हैं, और अपने में उसे नहीं पाते। इसलिए वह कहता है कि वह उनके साथ कोमलता से व्यवहार करने को तैयार है। और इसी कारण सन्त पौलुस भी रोमियों के सातवें अध्याय में कहता है कि जो भलाई वह चाहता है वह नहीं, परन्तु जो बुराई नहीं चाहता वही करता है। अब सन्त पौलुस वहाँ अपने विषय में कहता है: यहाँ तक कि यद्यपि वह इस संसार में अपने चाल-चलन के विषय में परमेश्वर के स्वर्गदूत के समान और सारी पवित्रता का दर्पण था: तो भी वह विलाप करता और कहता है कि मैं शापित हूँ। और ऐसा क्यों? क्योंकि वह बन्दीगृह में बन्दी के समान रखा गया था, ऐसा कि वह अपने आपको पूरी रीति से परमेश्वर को देने के लिए स्वतन्त्र न था: क्योंकि अपनी ही पापमयता से रुका हुआ था। अब यदि सन्त पौलुस ऐसी दशा में था: तो हम क्या करें? इसी बीच हम देखते हैं कि "भार" शब्द का क्या अर्थ समझना है, जहाँ कहा गया है कि हमें एक दूसरे के भार उठाने हैं। इसमें सन्त पौलुस हमें उपदेश देता है कि हम एक दूसरे को थामे रखें: और यदि कोई अपने कर्तव्य में चूक जाए, तो हम उसे इस कारण छोड़ न दें, वरन् दया की ओर झुके रहें और पूर्वोक्त नम्रता बरतें। संक्षेप में, वह कहता है कि हम इस शर्त पर आपस में बाँधे गए हैं कि यदि हम में से कोई लदा हुआ हो या निढाल हो जाए, तो शेष उसकी घटी और दुर्बलता को पूरा करें (जैसा मैंने कहा) यहाँ तक कि स्वभाव से ही उस ओर झुके हुए, परमेश्वर के वचन से प्रोत्साहित हुए बिना।

यदि हम एक दल में यात्रा पर जा रहे हों और देखें कि ... में से कोई ... हम में से हर एक उसका हियाव बढ़ाने में सहायता करेगा: और ... करने के लिए, ... उसका बोझ उतारें, और हर मनुष्य उसके भार का एक भाग ले ले। उसी रीति से हम विचार करें कि जो पाप हम दुर्बलता से करते हैं वे भार हैं, और ऐसे अवसरों पर हमें अपने कन्धे लगाना शोभा देता है, कि जो उनसे लगभग दब चुके हैं उन्हें हलका करें। इसलिए नहीं कि हम कोई चापलूसी करें, जैसा मैंने पहले कहा है: वरन् इसलिए कि हम उन्हें सुधारने में सहायता करें। और इसके प्रमाण में, यदि कोई परमेश्वर के विरुद्ध अपराध करे और मैं उसे अनदेखा कर दूँ, ऐसा कि वह अपनी दुष्टता में बना रहे: तो भार ऐसा बढ़ जाता है कि उसकी गर्दन तोड़ने को पर्याप्त है। क्योंकि जहाँ उसका एक ही भार था: देखो अब बहुत से और जुड़ गए हैं जो उसे भूमि पर दबा दें, केवल चेतावनी के अभाव के कारण। यहाँ तक कि यदि उसे आरम्भ में ही चिताया गया होता, तो उसका बोझ हलका हो गया होता: जबकि अब उसके दोषों को ढाँपने से हम इसके कारण हैं कि बेचारा अभागा कभी राहत नहीं पा सकता। और इसलिए हमें पूर्वोक्त उपाय बरतना शोभा देता है: अर्थात् निर्बलों की सहने में हम उन्हें मर्म तक छूने में चूकें नहीं, कि वे अपने दोषों को मान लें और उन्हें सुधारें।

अब निष्कर्ष के रूप में सन्त पौलुस कहता है कि हमें इसी उपाय से मसीह की व्यवस्था को पूरी करना है। इसमें सन्देह नहीं कि सन्त पौलुस का यहाँ आशय गुप्त रीति से उन्हें चुटकी काटना था जिनके विरुद्ध उसने पहले तर्क किया। क्योंकि हम देख चुके हैं कि उन दिनों बहुत थे जो चाहते थे कि मनुष्य व्यवस्था की रीतियों का पालन करें: क्योंकि यही उनकी सारी पवित्रता और सिद्धता थी। इसलिए क्योंकि "व्यवस्था" शब्द सदा उनके मुँह में रहता था, और वे मनुष्यों को समझाते थे कि वे रीतियों के द्वारा परमेश्वर के प्रति अपने आपको निर्दोष कर लें: सन्त पौलुस उनसे कहता है, "अच्छा, हमारे पास यीशु मसीह की व्यवस्था है, जो अपने पिता परमेश्वर की इच्छा का विश्वासयोग्य प्रकटकर्ता है।" तब यदि हम व्यवस्था की सच्ची व्याख्या चाहें, तो उसे यीशु मसीह के सिवा कहीं और न खोजें, जो परमेश्वर की सनातन बुद्धि है और हमें बुद्धि की सारी सिद्धता देने को भेजा गया था। जब ऐसा है, तो सबसे बढ़कर देखें कि वह हमें क्या आज्ञा देता है, और विचारें कि वह हमारी पीठ या गर्दन पर कौन-सा जूआ रखता है: और वह यह है कि हम एक दूसरे से प्रेम रखें, जैसा यूहन्ना के तेरहवें अध्याय में कहा गया है, "मैं तुम्हें एक आज्ञा देता हूँ जो नई भी है और पुरानी भी:" अर्थात् यह कि तुम एक दूसरे से प्रेम रखो ... हमें अपना सारा मन लगाना चाहिए, अर्थात् जिन्हें आवश्यकता है उन्हें सहने में, और जो लदे हुए हैं उनकी ओर हाथ बढ़ाने में, कि उन्हें हलका करें। इस रीति से हम मसीह की व्यवस्था को पूरी करेंगे: और जब हम उसे इस प्रकार पूरी कर चुके, तो उन सब को ललकार सकते हैं जो हमें दोषी ठहराते हैं। इसलिए जो मसीह की व्यवस्था को पूरी करते हैं, वे उस रीति-सम्बन्धी व्यवस्था के अधीन फिर न रहेंगे, जैसा वे उसे कहते हैं। यह सच है कि हम हमारे प्रभु यीशु मसीह की व्यवस्था को न इस विषय में कभी पूरी करेंगे, न [किसी] और में। परन्तु सन्त पौलुस हमें वह लक्ष्य दिखाता है जिस तक पहुँचने का हमें परिश्रम करना है। इसलिए यद्यपि जब तक हम इस संसार में हैं तब तक हम निरन्तर मार्ग में हैं: तो भी हमें बिना जाने कि कहाँ जा रहे हैं, अन्धाधुन्ध नहीं दौड़ना है। क्योंकि हमारे सामने हमारा लक्ष्य खड़ा किया गया है, और वहीं हमें अपने आपको लगाना है। तो फिर, कि हम परमेश्वर की सेवा उसी की इच्छा के अनुसार करें, हम सीखें कि अपने आपको पूरी रीति से उसे दे दें: और इसलिए कि प्रकट हो कि उसकी इच्छा हमें एक दूसरे के साथ ऐसी एकता में थामे रखने की है: जैसे उसने हमें अटूट बन्धन में बाँधा है, वैसे ही हम अपने पड़ोसियों को उसकी ओर खींचने का यत्न करें, और साथ ही जब कुछ सुधारना हो तो धीरजवन्त और नम्र रहें: फिर भी न चाहें कि चापलूसी और छल-कपट से दोष पोसा जाए।

अब आओ, हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सम्मुख अपने दोषों को मानते हुए घुटने टेकें, उससे विनती करें कि वह हमें उन्हें और अधिक अनुभव कराए, जिससे हम उसके सामने सच्चे पश्चात्ताप से विलाप करें, और उससे उनकी क्षमा माँगें, और सदा उससे जुड़े रहने और अपने शरीर की सब भ्रष्टताओं से छूटने और उसकी धार्मिकता का वस्त्र पहनने का यत्न करें: और इस बीच वह हमारी दुर्बलता को सहे, जब तक वह हमें पूरी रीति से छुड़ा न ले। और इस प्रकार हम सब कहें, हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, स्वर्गीय पिता। इत्यादि।

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