अध्याय 4

गलातियों 1:3-5 पर पहले अध्याय का दूसरा उपदेश

Sermons upon Galatians · John Calvin

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गलातियों 1:3-5 पर पहले अध्याय का दूसरा उपदेश

3 परमेश्वर पिता और हमारे प्रभु यीशु मसीह की ओर से तुम्हें अनुग्रह और शान्ति मिलती रहे।

4 जिसने अपने आप को हमारे पापों के लिये दे दिया, ताकि हमारे पिता परमेश्वर की इच्छा के अनुसार हमें इस वर्तमान बुरे संसार से छुड़ाए।

5 उसकी महिमा युगानुयुग होती रहे। आमीन।

ऐसा कोई मनुष्य नहीं जो अपना कल्याण न चाहता हो, और स्वभाव से हम इसी ओर झुके हुए हैं। तौभी इस विषय में हम बहुत दूर भटके हुए हैं; हम नहीं जानते कि सारा कल्याण कहाँ से उत्पन्न होता है, और हमारे सुख का सच्चा कारण तो और भी कम जानते हैं, अर्थात् यह कि परमेश्वर हमसे प्रेम रखता है और हमें इस बात का निश्चय है कि वह हमें अपनी सन्तान गिनता है। क्योंकि इसके बिना संसार की सारी समृद्धि कुछ भी नहीं है; वरन् वह सदा हमारी हानि का ही कारण ठहरेगी, क्योंकि जब तक परमेश्वर हमें अपने अनुग्रह में ग्रहण नहीं कर लेता, तब तक हम सब शापित हैं, और जो वस्तुएँ हम उसके हाथ से पाते हैं वे हमें बहुत महँगी पड़ेंगी, क्योंकि जब तक हम उसकी सन्तान की संगति में नहीं आ जाते, तब तक वे हमारी नहीं होतीं। इसलिए हमें सब बातों से पहले यह खोजना चाहिए कि हम अपने परमेश्वर के अनुग्रह में रहें, और अपने मन में भली भाँति निश्चित हों कि वह हमें अपने घराने और कलीसिया का सदस्य होने के लिये ग्रहण करता है। और यही कारण है कि जब भविष्यद्वक्ता ने मनुष्यों की सांसारिक अभिलाषाओं को डाँटा, कि कोई तो अधिक दाखमधु चाहता है, कोई अधिक अनाज, और हर एक अपने ही सुख-चैन पर दृष्टि लगाए है, तब भजन में कहा गया है कि इससे उत्तम और इससे बढ़कर चाहने योग्य कुछ नहीं कि परमेश्वर हमें अपने मुख का प्रकाश दिखाए; अर्थात् यह कि हम उसके अनुग्रह को थाम लें और इसमें सन्देह न करें कि वह हमें अपनी सन्तान करके स्वीकार करेगा, जैसा कि मैंने पहले कहा।

और यही कारण भी है कि एक सौ छठवें भजन में भविष्यद्वक्ता सब बातों से बढ़कर यह माँगता है कि परमेश्वर उस अनुग्रह के साथ उसे स्मरण करे जो वह अपनी प्रजा पर रखता है। वह भली भाँति जानता था कि उसके पास बहुत सी वस्तुओं की घटी है, तौभी उसने और सब बातों को अनदेखा कर दिया, क्योंकि उसका मन उसे दूसरी ओर खींचे लिए जा रहा था, अर्थात् इस ओर कि वह परमेश्वर के चुने हुओं की गिनती में गिना जाए। इसलिए एक प्रकार का प्रेम तो वह है जो परमेश्वर सब मनुष्यों से रखता है, क्योंकि उसने उन्हें अपने ही स्वरूप में रचा है; इसी कारण वह सूर्य को सब पर चमकाता है, और उनका पालन-पोषण करता तथा उनके जीवन की चिन्ता करता है। परन्तु यह सब उस विशेष भलाई की तुलना में कुछ भी नहीं जो वह अपने चुने हुओं और अपने झुण्ड के लोगों के लिये रख छोड़ता है। फिर भी यह इस कारण नहीं कि वह उनमें कोई योग्यता पाता है, पर इस कारण कि उन्हें अपना ठहराकर ग्रहण करना उसे भाया। अब देखो कि सन्त पौलुस अपनी सब पत्रियों में हमें परमेश्वर के अनुग्रह और उस प्रेम की ओर क्यों लौटा ले जाता है जो वह विश्वासियों पर रखता है, जब वह कहता है, "तुम्हें अनुग्रह और शान्ति मिलती रहे।" जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, "शान्ति" शब्द के अन्तर्गत वह सब प्रकार की समृद्धि को समेट लेता है, मानो वह परमेश्वर से बिनती करता हो कि वह हमें वे सब वस्तुएँ दे जो वह जानता है कि हमारे लिये उचित हैं, कि वह अपना धन हम पर उण्डेले, और हम पर ऐसा उदार प्रकट हो कि हमें उसकी भलाई की बड़ाई करने का कारण मिले।

तौभी, क्योंकि जब तक हम परमेश्वर के अनुग्रह में नहीं हैं तब तक संसार की सारी वस्तुएँ हमारी हानि का ही कारण ठहरती हैं, इसलिए सन्त पौलुस इस क्रम को बनाए रखता है कि जो उपकार परमेश्वर हम पर करता है उनसे पहले वह निरन्तर परमेश्वर के अनुग्रह, अर्थात् उसकी सेंतमेंत की कृपा को रखता है। इसलिए यद्यपि हमें परमेश्वर से यह चाहना चाहिए कि वह उन सब बातों में, जिन्हें वह हमारे लिये उचित जानता है, अपनी भलाई का अनुभव हमें कराए, तौभी हमें मुख्य बात को नहीं भूलना चाहिए, अर्थात् यह कि वह हमें अपनी कलीसिया में ले ले और हमारे हृदयों में हमें निश्चय दिलाए कि वह हम पर भली इच्छा रखता है। जब हम उस ज्योति को एक बार देख लें, तो जैसा भजन में कहा गया है, वह हमारे लिये पर्याप्त हो और उसी से हम सन्तुष्ट रहें। फिर भी, यद्यपि परमेश्वर हमें छूट देता है कि जो कुछ हमारे लिये भला है उसकी इच्छा करें, तौभी हमें अपने आप को ऐसा थामे रखना चाहिए कि यदि वह हमें बहुत सी विपत्तियों से दुःख देना चाहे, तो भी हम उसके अनुग्रह को इतना मूल्यवान समझें कि केवल उसी से सन्तुष्ट रहें, चाहे और सब कुछ हमसे छीन लिया जाए। मैं तुमसे पहले कह चुका हूँ कि यदि हम सब सुख और आनन्द में चैन से भी रहते, तब भी हम अभागे ही रहते, जब तक कि हम अपने विवेक में पूरी रीति से निश्चित न हो जाएँ कि परमेश्वर हमसे प्रेम रखता है और हम उसके अनुग्रह में हैं।

तो तुम देखते हो कि जब तक परमेश्वर का प्रेम पहले न आए, तब तक हमें किसी भी सांसारिक वस्तु पर मन नहीं लगाना चाहिए। इसके विपरीत, यदि परमेश्वर हमसे प्रेम रखता है और फिर भी इस बीच हमारे धीरज को परखना चाहता है, कि हमें इस संसार में टिकाए रखे और बहुत से क्लेशों के अधीन करे, तो हमें फिर भी उसके अनुग्रह को इतना मूल्यवान समझना चाहिए कि सब कुछ धीरज से सह लें, चाहे वह हमारे बिलकुल विरुद्ध ही क्यों न दिखाई दे। और इस शिक्षा को स्मरण रखना हमारे लिये और भी आवश्यक है, क्योंकि हम देखते हैं कि लोग अपनी ही अभिलाषाओं के पीछे भटकते फिरते हैं। अधिकांश लोग ऐसे पशु-तुल्य हो गए हैं कि वे और कुछ नहीं चाहते, केवल वही वस्तुएँ चाहते हैं जिन्हें स्वभाव उन्हें पसन्द करना सिखाता है। उन्हें परमेश्वर का कुछ भी ध्यान नहीं। कोई खाना चाहता है, कोई पीना, और तीसरा वस्त्र पाना; और ये ऐसी अभिलाषाएँ हैं जो हवा में ही मँडराती रहती हैं। परन्तु जहाँ से हमें आरम्भ करना चाहिए वह यह जानना है कि परमेश्वर ही हमारे सारे कल्याण का आदिकारण है, और इस संसार में जो भी सुख-सामग्री हमारे पास है और जो भी सहारे हमें सहायता देने को मिले हैं, वे सब उसी के हाथ से आनेवाले उपकार हैं।

तब यदि हम अपनी अभिलाषाओं को परमेश्वर की ओर न लगा सकें, तो यह बहुत ही विकृत, वरन् बहुत ही पशुओं जैसी बात है; और फिर भी संसार का अधिकांश भाग इसी दशा में है। कुछ और लोग हैं जो अच्छा मार्ग और नियम अपनाते दिखाई देते हैं, परन्तु वे भी सब कुछ बिगाड़ देते हैं। वे चाहते हैं कि परमेश्वर उन्हें वे वस्तुएँ भेजे जिन्हें वह उनके लिये भली और लाभदायक जानता है, परन्तु इस बीच वे उस सोते की ओर दृष्टि नहीं करते जहाँ से उन्हें पहला जल भरना चाहिए, अर्थात् परमेश्वर से मेल-मिलाप करना। क्योंकि जब तक परमेश्वर उन्हें छोड़े रहता है और उन पर अपनी कठोरता नहीं चलाता, तब तक उनके लिये सब बराबर है। उसका प्रेम हो या बैर, इसकी उन्हें अधिक चिन्ता नहीं, जब तक कि वह उनके शरीर की अभिलाषाओं और वासनाओं के अनुसार उनसे व्यवहार करता रहे। अब यद्यपि इस प्रकार के लोग परमेश्वर को ढूँढ़ते तो हैं, तौभी वे गाड़ी को घोड़े के आगे जोतते हैं। क्योंकि उन्हें परमेश्वर के प्रेम को पहले और सबसे मुख्य स्थान पर रखना चाहिए, और तब उन असंख्य उपकारों तक उतरना चाहिए जो वह हम पर करता है और जिनके द्वारा वह हम पर अपनी भलाई की गवाही देता है।

इसलिए यद्यपि बहुत से मनुष्य उक्त मर्यादा के भीतर नहीं रहते, वरन् परमेश्वर से ऐसी उच्छृंखल बिनतियाँ करते हैं जैसी कोई मनुष्य दूसरे से न करता, कि कोई धन माँगता है, कोई प्रतिष्ठा, और जो कुछ परमेश्वर भेजता है उससे कोई सन्तुष्ट नहीं होता; तौभी यदि मनुष्य अपनी इच्छाओं में सुविचारी होते और केवल उसी की कामना करने में सावधान रहते जिसकी उन्हें आवश्यकता है, फिर भी यदि वे परमेश्वर के अनुग्रह को भूल जाएँ, तो इसी बात में वे दिखा देते हैं कि उन्हें कुछ भी लाभ नहीं हुआ। इसलिए हम ध्यान दें कि सन्त पौलुस ने यहाँ दो बातों को एक साथ क्यों रखा है, यह बिना कारण नहीं है: अर्थात् यह कि परमेश्वर पहले हमें अपने अनुग्रह में ग्रहण करे, कि हम भी उसे सचमुच अपना पिता अनुभव करें और वह हमें अपनी सन्तान करके स्वीकार करे, और तब उसके बाद वह हमें समृद्ध करे। अब इस प्रकार की समृद्धि के लिये (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) भली रीति से कामना की जा सकती है, परन्तु इस बीच परमेश्वर की भलाई ही हमारी एकमात्र शान्ति होनी चाहिए। और जब इस संसार में हमें बहुत से दुःख सहने पड़ें, और बातें हमारी इच्छा के अनुसार न निकलें, तब भी हमें इसी से सन्तुष्ट रहना चाहिए कि परमेश्वर हमें ग्रहण करता है। और इसके साथ-साथ वह हमारे प्रभु यीशु मसीह का नाम भी रखता है, क्योंकि यह हो नहीं सकता कि परमेश्वर अपने ही पुत्र के कारण को छोड़ किसी और कारण से हम पर अनुग्रह करे, जिसमें उसकी सारी प्रसन्नता है, जैसा मत्ती के सोलहवें अध्याय में और इफिसियों के पहले अध्याय में कहा गया है।

फिर यदि हमारे सामने परमेश्वर की महिमा के सिवाय और कुछ न होता, तो वह हमें भयभीत कर देती, और हम उसके पास किसी रीति से जा न सकते, क्योंकि हम निर्बल प्राणी हैं, वरन् सर्वथा पापी हैं, जो पृथ्वी पर रेंगते फिरते हैं और जो पाताल की तह में निगल लिये जाने के योग्य हैं। इसलिए बहुत आवश्यक है कि मसीह अपने आप को हम पर प्रकट करे और हम उसकी ओर देखें, ताकि परमेश्वर के प्रेम का स्वाद चखें और उन सब उपकारों का आनन्द उठाएँ जो वह हम पर करता है। क्योंकि वे उसके एकलौते पुत्र को छोड़ किसी और के नहीं हैं, जो सब वस्तुओं का वारिस है, जैसा प्रेरित ने इब्रानियों की पत्री के पहले अध्याय में उसके विषय में कहा है। इसलिए जब परमेश्वर हमारे लिये जो भी भलाई करता है वह विशेष रीति से हमारे प्रभु यीशु मसीह की है, तो हमारा कर्तव्य है कि हम उसके साथ सहभागी हों और उसी के द्वारा उनके भागी बनाए जाएँ। इसलिए सन्त पौलुस का यहाँ यह कहना, "परमेश्वर पिता और हमारे प्रभु यीशु मसीह की ओर से," बिना कारण नहीं है। वरन् इसलिए भी कि यदि हम सच्चाई और निष्कपट मन से उसे खोजें तो परमेश्वर हमें अपने अनुग्रह में ले लेगा, इसका हमें और भी अधिक निश्चय हो, यद्यपि वह उसके एकलौते पुत्र के द्वारा होगा, वह कहता है कि यीशु मसीह ने हमारे पापों के लिये अपने आप को दे दिया।

अब यह निश्चित है कि हमारे अपने पाप के सिवाय और कोई वस्तु हमें परमेश्वर के अनुग्रह से बाहर नहीं करती। क्योंकि हम देखते हैं कि उसकी दया आकाश में उड़नेवाली गौरैयों और पशुओं तक पहुँचती है। जब परमेश्वर पहाड़ों पर घास उगाता है और पशुओं के लिये और चारा उपजाता है, तो यह इस बात का चिह्न है कि उसे उनकी चिन्ता है। और सच ही वे उसकी भलाई के चिह्न हैं, जैसा भजनों में कहा गया है। फिर वह उनसे प्रेम कैसे न रखेगा जिन्हें उसने अपने ही स्वरूप में रचा है और जो उसके और उसके स्वभाव के बहुत निकट हैं, अर्थात् मनुष्यों से?

इसलिए परमेश्वर हमारी सृष्टि करने के कारण हमें ग्रहण करता और अपना मानता है। परन्तु जहाँ तक हम भ्रष्ट हो गए हैं और हमारा स्वभाव पापमय हो गया है, इसी कारण परमेश्वर हमसे घृणा करता और हमें अपना शत्रु ठहराता है, यहाँ तक कि उसके और हमारे बीच मानो प्राणघातक बैर है, जब तक कि वह हमारे प्रभु यीशु मसीह के कारण हमें फिर अपने अनुग्रह में नहीं ले लेता। इसलिए, ताकि परमेश्वर के प्रेम में सन्देह करने का हमारे पास कोई कारण न रहे, सन्त पौलुस यहाँ हमारे सामने वह बलिदान रखता है जिससे हमारे अपराधों का स्मरण मिटा दिया गया है, ताकि परमेश्वर हमारी सारी दुर्दशा को अब भूलकर हमें अपना जानकर, और उन लोगों के रूप में जिन पर उसने अपनी छाप लगाई है, और संक्षेप में उनके रूप में देखे जिन्हें उसने अपनी सन्तान और वारिस होने के लिये रचा है।

और इससे हमें चेतावनी मिलती है कि अपने विवेक को शान्त करने और अपने आप को पूर्ण स्वतंत्रता से परमेश्वर को पुकारने के योग्य बनाने का और कोई उपाय नहीं, केवल यही कि हम उस बलिदान को अपने ऊपर लागू करें जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने चढ़ाया, जिसमें उसने हमारे लिये पूरा दण्ड चुका दिया, ताकि अब से परमेश्वर हमें अपनी सन्तान करके ग्रहण करे। और यहाँ सबसे पहले हम अपने प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग की सामर्थ्य को देखते हैं, कि उसी में हमें परमेश्वर और अपने बीच प्रायश्चित मिलता है, ताकि जहाँ हम पहले उससे विरोध में थे, और वह, जैसा कहा जाए, हमसे घृणा करने को विवश था, वहाँ अब वह हमें अपने अनुग्रह में लेने की कृपा करता है। और क्यों? इसलिए कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने उस आज्ञाकारिता के द्वारा जो उसने अपनी मृत्यु और दुःखभोग में दिखाई, हमारे सब दोषों और कुकर्मों की भरपाई कर दी, इस प्रकार कि जो बलिदान उसने चढ़ाया वह हमारे सब पापों का पूरा दण्ड था, और उसका बहाया हुआ लहू हमारे लिये शुद्धि भी ठहरा, और उसने हमें हमारे पापों के सब धब्बों से धोकर स्वच्छ कर दिया।

इस प्रकार तुम देखते हो कि हम कैसे निश्चित हो सकते हैं कि परमेश्वर हमें ग्रहण करता है। और हमें उसे पुकारने और उसके पास जाने का साहस कैसे हो? उसी बलिदान पर दृष्टि जमाने से जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने चढ़ाया। क्योंकि यदि हमारे पास वह न हो, तो निश्चय है कि जब-जब हम परमेश्वर की महिमा का विचार करेंगे तब-तब सदा डरते रहेंगे। क्योंकि जब हम अभागे अपराधी हैं, तो हम अपने उस न्यायी से कैसे न डरें, जो हमारे योग्य दण्ड देने के लिये शस्त्र बाँधे खड़ा है? तौभी, इसलिए कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमारे दोषों को गाड़ दिया है, हम परमेश्वर के पास साहस के साथ और बिना किसी रुकावट के आ सकते हैं। परन्तु इसके साथ यह भी ध्यान में रखना हमारा कर्तव्य है कि वह बलिदान जिसके द्वारा हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमें अपने पिता परमेश्वर से मिलाया, ऐसा पर्याप्त है कि हमें अपना सारा भरोसा उसी में रखना चाहिए और कोई दूसरा उपाय नहीं ढूँढ़ना चाहिए। जैसा कि सन्त पौलुस का यहाँ अभिप्राय भी गलातियों को उस शुद्ध सत्य की ओर लौटा लाना है जिससे वे बहकाए और फुसलाए गए थे—इसलिए नहीं कि उन्होंने यीशु मसीह को पूरी रीति से त्याग दिया था, परन्तु इसलिए कि उन्होंने पापों की क्षमा पाने के लिये व्यवस्था की विधियों को मिला लिया था, मानो इसके लिये और सहायताओं की आवश्यकता हो: जैसे पोप-मत में यह तो भली भाँति मान लिया जाता है कि यीशु मसीह जगत का छुड़ानेवाला है, पर फिर भी हर एक मनुष्य परमेश्वर से समझौता करने और अपनी ओर से भरपाई करने का यत्न करता है। अब गलातियों को पहले ही ऐसी ही भूल की घुट्टी पिलाई जा चुकी थी। इसी कारण सन्त पौलुस उन्हें दिखाता है कि पाप हमारे प्रभु यीशु मसीह के बलिदान के सिवाय और किसी रीति से नहीं मिटते, ताकि हमारा विश्वास पूरी रीति से वहीं ठहरे। इसलिए यदि हम इतने बड़े उपकार के भागी होना चाहते हैं, तो हमें अपनी सब व्यर्थ आशाओं को और उन सब भ्रमों को छोड़ देना चाहिए जो शैतान हमारे मन में डालता है जब वह हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह से और उसके एकमात्र अनुग्रह से दूर हटाता है, यह विश्वास दिलाकर कि यदि हम अपने साथ कुछ भरपाई ले जाएँ तो परमेश्वर के पास जा सकते हैं। संक्षेप में, जब तक हमें यह निश्चय न हो कि हमारे अधर्म के धब्बों को माँजकर छुड़ाने के लिये उस लहू के सिवाय और कोई धोवन नहीं जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने बहाया और जिससे हम पवित्र आत्मा के द्वारा धोए जाते हैं, तब तक निश्चय है कि हम कभी स्वतंत्रता से परमेश्वर के पास नहीं आ सकते, न उसके अनुग्रह और प्रेम पर विश्राम कर सकते हैं, वरन् सदा अपनी ही कल्पनाओं में भटकते रहेंगे; और यही हमारे अविश्वास का उचित दण्ड होगा, कि हमने अपने प्रभु यीशु मसीह को वह आदर नहीं दिया जिसका वह योग्य था।

इस प्रकार तुम देखते हो कि सन्त पौलुस जब हमारे सामने हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग को रखता है तब वास्तव में हमें यहाँ क्या ध्यान में रखना है; वह हमें बताता है कि यही वह बात है जिसमें हमें हमारे सब दोषों की भरपाई मिलेगी, ऐसी कि वे परमेश्वर के सामने फिर कभी लेखे में न लाए जाएँ। और वह जानबूझकर कहता है कि यीशु मसीह ने अपने आप को दे दिया, ताकि हम उसके प्रेम को और भी साहस के साथ थाम लें। क्योंकि हम यहाँ देखते हैं कि जब हमारे प्रभु यीशु मसीह ने परमेश्वर और हमारे बीच प्रायश्चित करने के लिये अपने आप को आगे किया, तब उसने अपने देह और प्राण को बचा न रखा, यहाँ तक कि उसने अपने प्राण में अत्यन्त वेदना सही, क्योंकि वह उसमें हमारा प्रतिनिधि था, और उसने हमारी ओर से परमेश्वर का क्रोध सहा। और अपनी देह में भी उसने सब निन्दा और लज्जा सही, और साथ ही वे घोर से घोर यातनाएँ भी जो सोची जा सकती थीं। और यह सब, जैसा मैंने पहले कहा, भली भाँति दिखाता है कि जो प्रेम उसने हमसे रखा वह अनमोल था, क्योंकि उसने हमारे लिये अपने आप को इस प्रकार भुला दिया।

परन्तु फिर भी इसके साथ सन्त पौलुस हमें सदा परमेश्वर की इच्छा की ओर लौटा ले जाता है, यह दिखाने के लिये कि जब हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमारे उद्धार के लिये जो कुछ आवश्यक था वह सब इस रीति से पूरा किया, तब यह इसमें बाधा न हुई कि परमेश्वर ने इस बीच उसी में अपनी दया प्रकट की, जैसा एक और पद में कहा गया है कि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपने एकलौते पुत्र को भी न रख छोड़ा, वरन् उसे हमारे लिये मृत्यु के हाथ सौंप दिया। इसलिए ताकि हम यह न समझें कि हमारे प्रभु यीशु मसीह का आना अपने पिता परमेश्वर को शान्त करने के लिये ऐसी रीति से था कि उसने उसे अपना अभिप्राय बदलने को मना लिया (क्योंकि मनुष्य ऐसी स्थूल और सांसारिक कल्पनाओं की ओर झुकते हैं), सन्त पौलुस (हमें यह दिखाने के लिये कि परमेश्वर हमसे मनुष्यों की रीति पर मेल-मिलाप नहीं करता) हमें स्पष्ट बताता है कि यीशु मसीह हमारे पापों के लिये इसलिए सौंपा गया कि परमेश्वर ने ऐसा ही ठहराया था। क्योंकि यदि कोई मनुष्य अपने बच्चे पर क्रोधित हो, तो कोई दूसरा मनुष्य बीच में पड़कर उसका क्रोध शान्त कर सकता है, और ऐसा व्यक्ति किसी तीसरे का स्थान ले लेता है। परन्तु हमारे प्रभु यीशु मसीह के विषय में ऐसा नहीं था जब उसने अपने आप को बलिदान करके चढ़ाया, ताकि हमारे सब पापों को दूर करे और परमेश्वर तक, जिससे हम पहले बाहर कर दिए गए थे, पहुँचने का मार्ग बनाए। वह ऐसे नहीं आया कि अपनी ही ओर से बीच में कूद पड़ा हो, मानो परमेश्वर ने इस विषय में कुछ हाथ ही न डाला हो। फिर कैसे? परमेश्वर ने (जैसा अभी थोड़ी देर पहले कहा गया) मेल-मिलाप होने से पहले हमसे घृणा भी की और प्रेम भी। और उसने हमसे प्रेम क्यों किया? क्योंकि हम उसकी सृष्टि हैं। और फिर, यद्यपि उसने देखा कि हम पाप के कारण ऐसे अभागे और सर्वथा खोए हुए और दण्ड के योग्य लोग हैं, तौभी उसे हम पर तरस आया और वह नहीं चाहता था कि मनुष्य जाति पूरी रीति से नष्ट हो जाए। इस प्रकार तुम देखते हो कि परमेश्वर ने हमसे कैसा प्रेम किया, इस पर भी कि आदम में हम उससे दूर हो गए थे और पूरी रीति से भ्रष्ट हो चुके थे। साथ ही उसने हमसे घृणा भी की क्योंकि वह सारी धार्मिकता का सोता है। इसलिए उसने उस दुष्टता से घृणा की जो हममें थी, जिसके कारण हमारे प्रभु यीशु मसीह के लहू में और उस बलिदान के द्वारा जो उसने चढ़ाया, प्रायश्चित का होना आवश्यक हुआ।

परन्तु फिर भी यह उपकार परमेश्वर को छोड़ किसी और के नाम नहीं लगाया जाना चाहिए। तो तुम देखते हो कि अपने एकलौते पुत्र को भेजना और हमारे लिये उसे मृत्यु के हाथ सौंप देना परमेश्वर ही का काम था। और क्यों? इसलिए कि उसके और हमारे बीच का सारा बैर मिट जाए। सन्त पौलुस के इन शब्दों से, जब वह कहता है कि यीशु मसीह ने हमारे पापों के लिये अपने आप को मृत्यु को दे दिया, और तौभी यह परमेश्वर की इच्छा के बिना नहीं हुआ, जिसने इसे अपने अनन्त संकल्प में पहले से ठहरा रखा था, वास्तव में यही समझना चाहिए। यहाँ सबसे पहले हमें उस दया की बड़ाई करनी है जो हम पर हमारे प्रभु यीशु मसीह के व्यक्तित्व में दिखाई गई। क्योंकि यदि परमेश्वर क्षमा की घोषणा करता और हमें बताता कि वह हमें अयोग्य होते हुए भी दया में ले लेगा, तो यह बहुत था, वरन् ऐसी अनुग्रहपूर्ण भलाई की जैसी वह योग्य है वैसी बड़ाई करना हमारे लिये असम्भव होता। परन्तु जब उसने अपने प्रेम की ऐसी धरोहर, अर्थात् अपना ही पुत्र, हमें सौंप दी, और अपने उसी व्यक्तित्व में स्वयं को हमें दे देता है, और इस प्रकार अपने आप को हमारा पिता दिखाता है, तो यह हमारे कहे हुए सब कुछ से इतना बढ़कर है कि यदि हम अपनी सारी बुद्धि ऐसी भलाई पर आश्चर्य करने में लगा दें, तौभी हम उसकी परिपूर्णता तक कभी नहीं पहुँचेंगे। इस प्रकार तुम देखते हो कि जब सन्त पौलुस हमसे परमेश्वर की इच्छा की बात करता है तो हमें पहले क्या ध्यान में रखना है।

तौभी हम यह समझ लें कि जिस समय से परमेश्वर के पास हमसे घृणा करने और हमसे बैर रखने का उचित कारण था, वरन् जिस समय से हम उसके शत्रु थे (जैसा पवित्र शास्त्र कहता है), वास्तव में उसने हमारी कुछ न कुछ सुधि लेना कभी न छोड़ा और अपनी दया को इतनी दूर तक बढ़ाए रखा कि वह हमें हमारे विनाश में पड़े रहने देना नहीं चाहता था; यहाँ तक कि उसने केवल मुँह की बात से इसे प्रकट करना पर्याप्त न समझा, वरन् हमें ऐसी गिरवी भी दी जैसी हम देखते हैं, अर्थात् उसका अपना पुत्र इसका उत्तरदायी ठहरा। अब जब परमेश्वर ने हमारे उससे मेल-मिलाप होने से पहले ही अपने आप को ऐसा अनुग्रहकारी और दयालु दिखाया, तो अब जब हमारे पास ऐसी पक्की प्रतिज्ञा है, और सुसमाचार भी हमें सुनाया जाता है कि हमें निश्चय दिलाए कि हम विश्वास के द्वारा अपने प्रभु यीशु मसीह के साथ उसकी देह के अंगों के रूप में जुड़े हैं, तो वह क्या न करेगा? क्या अब हम परमेश्वर के प्रेम पर सन्देह करेंगे जब हमारे पास उसकी ऐसी अच्छी पुष्टि है, जैसा सन्त पौलुस रोमियों के पाँचवें अध्याय में कहता है? यदि यीशु मसीह (वह कहता है) ऐसे समय हमारे सब पापों को दूर करने आया जब परमेश्वर और हमारे बीच अब तक प्राणघातक बैर था: तो क्या सब सन्देह को पैरों तले नहीं रौंद देना चाहिए, और क्या हमें किसी भी रीति से अपने परमेश्वर को पुकारने से नहीं डरना चाहिए, वरन् अपने ही उद्धार का निश्चय नहीं रखना चाहिए, अब जब परमेश्वर ने उसे हमारे लिये ऐसा पक्का कर दिया है, जब उसने हमें अपने अनुग्रह में ले लिया है, जब वह हमें जितनी कोमलता से हो सके बुलाता और खींचता है, और जब वह हमें दिखाता और निश्चय दिलाता है कि जब कभी हम उसके पास आना चाहें तब वह मानो हमें गले लगाने के लिये अपनी बाँहें खोले रखता है? तो तुम देखते हो कि इस विषय में हमें क्या स्मरण रखना है।

इसके अतिरिक्त हम अपने प्रभु यीशु मसीह के प्रेम पर भी ध्यान दें, कि जब उसने हमारे पापों के लिये अपने आप को इस रीति से दे दिया, तो वह अपनी मृत्यु और दुःखभोग को निष्फल न होने देगा, और न उस बलिदान को, जो उसने एक ही बार चढ़ाया, व्यर्थ और निष्प्रभाव होने देगा कि वह हममें फल उत्पन्न न करे। परन्तु जैसे उसने अपने आप को एक ही बार सदा के लिये चढ़ा दिया, वैसे ही वह हमारा निरन्तर मध्यस्थ और सहायक भी बना रहेगा, ताकि हम उस शुद्धता के भागी हों जो उसने हमारे लिये मोल ली है, कि अपनी सारी मलिनता से छूटकर हम परमेश्वर के सामने स्वच्छ ठहरें और उससे खुले मुँह बात कर सकें। देखो, हमें उन सब बातों को, जो यहाँ हमें दिखाई जाती हैं, अपने विश्वास को दृढ़ करने के लिये कैसे एकत्र करना चाहिए, कि हम स्वतंत्रता से अपने परमेश्वर के पास जा सकें, उसके लिये परदेशी बनकर नहीं, वरन् उसकी अपनी सन्तान और घनिष्ठ मित्रों के रूप में।

और इसके साथ हम यह भी सीखें कि शैतान के सब भ्रमों और कल्पनाओं को झटक दें, जो हर उपाय से हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह से दूर हटाना चाहता है, या फिर उस अनुग्रह को धुँधला करना चाहता है जो हमें उसमें मिलना चाहिए; और जब वह उसे पूरी रीति से मिटा नहीं सकता, तो हमें उलझा देता है और हमारे सिर में नए उपाय डालता है कि परमेश्वर के हाथ से अनुग्रह मोल ले लें।

परन्तु हम ऐसी सब बातों को काट डालें, और अपनी सारी बुद्धि को अपने प्रभु यीशु मसीह पर ऐसा जमा दें कि वही अकेला हमारे लिये पर्याप्त हो, और जो कुछ भी हमारे मन में अनुग्रह और कृपा मोल लेने के लिये आए उससे हम सर्वथा घृणा करें, और अपने आप को निश्चय दिलाएँ कि परमेश्वर के हमें दया में ग्रहण करने का और कोई कारण नहीं, सिवाय उस बलिदान के जिससे हमारे लिये सारी धार्मिकता और शुद्धता मोल ली गई।

इसके अतिरिक्त परमेश्वर की इच्छा के इन शब्दों के अन्तर्गत हमें एक सेंतमेंत की भलाई को समझना चाहिए, ताकि वह सब बाहर हो जाए जो मनुष्य अपनी योग्यताओं के विषय में अपने आप को विश्वास दिलाने के अभ्यस्त हैं; क्योंकि पवित्र शास्त्र में भी इन शब्दों का अर्थ इसी रीति से लिया गया है, इसलिए (जैसा मैं तुमसे पहले कह चुका हूँ) जिसे यहाँ "इच्छा" नाम से कहा गया है उसे अन्यत्र "भली इच्छा" नाम से कहा गया है। इसलिए सन्त पौलुस न केवल यह दिखाता है कि हमारे छुटकारे और उद्धार का सोता परमेश्वर पिता की आज्ञा और अनन्त संकल्प में है, वरन् सारा घमण्ड और अहंकार भी चूर करना चाहता है, यह दिखाकर कि हमें अपनी धार्मिकता की सारी स्तुति परमेश्वर की सेंतमेंत की कृपा को देनी चाहिए, जिसने हमारी योग्यताओं का कुछ भी विचार नहीं किया। क्योंकि हम अपने आप को जाँचें: परमेश्वर हममें सर्वथा दुर्दशा को छोड़ और क्या पाएगा? और यही वह कारण है कि परमेश्वर हम पर अपनी दया करने की कृपा करता है। इसलिए हम अपने आप को निश्चय दिलाएँ कि अब से हम स्वतंत्रता से अपनी आँखें स्वर्ग की ओर उठा सकते हैं, और अपनी प्रार्थनाएँ और बिनतियाँ परमेश्वर के सामने रख सकते हैं, क्योंकि उसने हम से पहले पहल की, जैसा यूहन्ना में कहा गया है कि उसने इस बात की प्रतीक्षा नहीं की कि हम उससे प्रेम करें (क्योंकि यह असम्भव था, इसलिए कि हम सर्वथा बुराई की ओर झुके हुए और पूरी रीति से उसी के वश में हैं), वरन् उसने हमसे प्रेम रखा, जबकि हम उसके शत्रु थे। और इस प्रकार तुम देखते हो कि हमारे प्रभु यीशु मसीह का प्रकट होना इसलिए था कि हमें परमेश्वर अपने पिता से मिला दे, जैसा हम पहले दिखा चुके हैं। इसलिए वास्तव में यही वह बात है जो हमें ध्यान में रखनी है। अब सन्त पौलुस तुरन्त यह जोड़ता है कि यह इसलिए था कि हमें इस बुरे संसार से छुड़ाए। यहाँ वह दिखाता है कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के ज्ञान के लिये क्यों बुलाए गए हैं: और यह भी कि उसने हमारा इतना मूल्य क्यों समझा कि हमें वैसे छुड़ाया जैसे उसने छुड़ाया; अर्थात् इसलिए कि हम अपनी गन्दगी और मलिनता में न पड़े रहें, वरन् उसके द्वारा उससे निकाल लिये जाएँ। सचमुच यह हमारे उद्धार का कारण नहीं, वरन् वह लक्ष्य और उद्देश्य है जिसे परमेश्वर ने हमें उद्धार के लिये ठहराते समय देखा। इसलिए जब हमारे छुटकारे की बात की जाती है, तो जिस पर दृष्टि रखना हमारे लिये आवश्यक है वह यह कि हमें उस सेंतमेंत की कृपा से आरम्भ करना चाहिए जो परमेश्वर ने हम पर रखी, जब उसने अपने अनन्त संकल्प में ठहराया कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हम फिर उसके पास लौटा लाए जाएँ। और इस प्रकार वही मुख्य कारण था। इसका दूसरा कारण यीशु मसीह है, जिसमें हमें अपने निश्चय के लिये जो कुछ आवश्यक है वह सब मिलता है। क्योंकि वहाँ हम अपने पापों को मिटाया हुआ देखते हैं, क्योंकि वह हमारा जमानती ठहराया गया है और उसने हमारे लिये ऐसी भरपाई की है कि कोई बात हमें परमेश्वर के पास आने से रोक नहीं सकती।

यह दूसरी बात है जो हमें यहाँ स्मरण रखनी है। अब वह साधन जिससे हम अपने प्रभु यीशु मसीह के भागी बनाए जाते हैं, सच्चे विश्वास के द्वारा सुसमाचार की प्रतिज्ञाओं को ग्रहण करना है। क्योंकि अविश्वासियों को हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग से कुछ भी लाभ नहीं होता, वरन् वे और भी अधिक दण्ड के योग्य ठहरते हैं, क्योंकि वे उस साधन को ठुकराते हैं जो परमेश्वर ने ठहराया था, और उनकी कृतघ्नता का दण्ड और भी कठोर होगा, क्योंकि उन्होंने हमारे प्रभु यीशु मसीह के उस लहू को पैरों तले रौंदा जो उनके प्राणों का छुड़ौती-मूल्य था। इसलिए यदि हम चाहते हैं कि यीशु मसीह अपने आप को हमारे साथ साझा करे, और हमें उन उपकारों के अधिकार और आनन्द में पहुँचाए जो उसने हमारे लिये मोल लिए हैं, तो हमारे लिये आवश्यक है कि विश्वास के द्वारा सुसमाचार की प्रतिज्ञाओं को ग्रहण करें: क्योंकि वे उन्हीं के हैं जो उसकी देह के अंग हैं, और उसमें कलम लगाए गए हैं, और उसे विश्वास से ग्रहण करते हैं, जैसा सन्त यूहन्ना के पहले अध्याय में कहा गया है कि परमेश्वर उन्हें अपनी सन्तान करके स्वीकार करता और मानता है जो उसके एकलौते पुत्र पर विश्वास करते हैं।

इस प्रकार तुम देखते हो कि जब हम अपने उद्धार की जाँच पर आते हैं तो तीसरे स्थान पर हमें क्या स्मरण रखना है। अब यह शेष है कि परमेश्वर की महिमा हममें हो, जैसा उचित भी है। और इसी दृष्टि से सन्त पौलुस रोमियों के तीसरे अध्याय में कहता है कि जब परमेश्वर ने हमें अपने प्रभु यीशु मसीह में पापों की क्षमा के द्वारा अपने अनुग्रह को पाने का साधन दिया, और साथ ही हमें उसी उपकार के अधिकार में पहुँचाने के लिये सुसमाचार भेजा: तो ऐसा करने में उसका उद्देश्य यह है कि केवल वही धर्मी प्रकट हो और इसके लिये उसकी महिमा हो, ताकि हम उसे सारी स्तुति दें और सब बातों के लिये अपने को उसका ऋणी मानें। तौभी परमेश्वर की महिमा केवल इतने में नहीं कि हम अपने मुँह से मान लें कि वही हमारे उद्धार का कर्ता है, और यह कि वह उसी से, और केवल उसकी निरी भलाई और सेंतमेंत के अनुग्रह से होता है, वरन् इसमें भी कि उसके पवित्र आत्मा के द्वारा हम नए मनुष्य बनें, ताकि उसका स्वरूप हममें चमक उठे, और हम अपने आप को पूरी रीति से उसकी सेवा में समर्पित करने का यत्न करें। कहा गया है कि परमेश्वर ने हमें अशुद्धता और मलिनता के लिये नहीं बुलाया, वरन् उसका अभिप्राय है कि हमें अपने लिये पवित्र करे। अब जब बात ऐसी है, तो सन्त पौलुस का यहाँ यह जोड़ना बिना कारण नहीं कि यीशु मसीह ने हमारे लिये अपने आप को चढ़ाकर हमें इस बुरे संसार से छुड़ाया, और उसने परमेश्वर अपने पिता के सामने हमारे पापों का स्मरण मिटा दिया, इसलिए कि हम अपनी ही गन्दगी और मलिनता में और पड़े न रहें, वरन् मानो संसार से अलग किए जाएँ, ताकि परमेश्वर की निज सम्पत्ति बनें, और अपना सारा जीवन ऐसी आज्ञाकारिता में लगा दें कि देखा जाए कि जैसे उसने हमें अपनी सन्तान ठहराकर ग्रहण किया है, वैसे ही हमने भी उससे अपने पिता के समान प्रेम और उसका आदर किया है।

और निःसन्देह जब कहा गया है कि हमें इस बुरे संसार से निकाला जाना है, तो यह ऐसा उपकार है जिस पर हमें लज्जित होना चाहिए। क्योंकि "संसार" शब्द के अन्तर्गत वह सब आ जाता है जो मनुष्य का अपने स्वभाव में है। संसार अपने आप में न कोई दोष रखता है न भ्रष्टता: परन्तु उसकी सारी बुराई उस पाप से है जो हममें बसा है। इसलिए जब कहा गया है कि संसार बुरा है, जैसा सन्त यूहन्ना अपनी सामान्य पत्री में भी कहता है कि सारा संसार दुष्टता में डूबा और पड़ा हुआ है: तो वह बुराई न सूर्य में है, न चन्द्रमा में, न पृथ्वी में, न जल में, न उनमें समाई हुई किसी वस्तु में: परन्तु इस बात में है कि हम ऐसे बिगड़ गए हैं कि हमने यहाँ नीचे की सब वस्तुओं को अपनी अशुद्धता से दूषित कर दिया है: और जब तक मनुष्य अपने आप में और अपने स्वभाव में बने रहते हैं, तब तक वे केवल मलिनता ही हैं, इसलिए अनिवार्य रूप से परमेश्वर को अप्रिय हैं।

क्योंकि निश्चय ही धार्मिकता और अधर्म के बीच कोई मेल नहीं हो सकता। परन्तु हममें अधर्म के सिवाय और कुछ नहीं पाया जाता। इसलिए या तो हमें अपने आप से निकाल लिया जाना चाहिए, नहीं तो हम परमेश्वर के निकट कभी नहीं आ सकेंगे।

फिर उन सब अन्धे अभागों का क्या होगा जो अपने आप को यह समझाते हैं कि वे अपनी स्वतंत्र इच्छा, अपने गुणों, अपनी बुद्धि, और न जाने किस-किस के बल पर अद्भुत काम कर सकते हैं? जैसा हम देखते हैं कि मनुष्य सदा अपने आप से प्रसन्न रहते हैं, और यद्यपि उन्हें दोषी ठहराया जाता है कि उनमें मलिनता के सिवाय कुछ नहीं और वे ऐसे घिनौने हैं कि देखकर तरस आता है और उन्हें स्वयं इस पर लज्जित होना चाहिए: तौभी वे अपने लिये कुछ न कुछ दावा करते ही रहते हैं, और अपनी ही मूर्खतापूर्ण कल्पनाओं से सदा अपने आप को धोखा देते रहते हैं। तौभी जब मनुष्य अपने आप को भली भाँति जाँच चुके हैं, तब जो कुछ वे अपने में पाएँ वह सब "दुष्टता" या "बुराई" के नाम से दोषी ठहराया जाएगा: यहाँ तक कि इससे दिखाया जाता है कि हममें भ्रष्टता के सिवाय कुछ नहीं, और यदि हम जैसे अपने आप में हैं वैसे ही परमेश्वर के पास जाने का साहस करें, तो उसे हमें बहुत दूर भगाना ही पड़ेगा।

इसलिए इसे नींव समझकर ध्यान में रखो कि यहाँ सारा घमण्ड चूर किया गया है, ताकि मनुष्य परमेश्वर की सेंतमेंत की भलाई को छोड़ और किसी बात पर घमण्ड करना छोड़ना सीखें, और अपनी लज्जा का विचार करके ऐसे लज्जित हों कि अपने ही मुँह से अपने आप को दोषी ठहराएँ, और इसकी प्रतीक्षा न करें कि परमेश्वर उन पर दण्ड की आज्ञा सुनाए, वरन् आप ही अपने न्यायी बनें। वास्तव में यही वह बात है जो हमें ध्यान में रखनी है। और अब हम देखते हैं कि हमें कैसी सावधानी और चौकसी से चलना चाहिए; ताकि हमें निश्चय हो कि हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग हमारे लिये हैं। क्योंकि यदि हम अपनी अभिलाषाओं की लगाम ढीली छोड़ने पर अड़े रहें, तो निश्चय है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह हमें अस्वीकार कर देगा। सच है कि हमारा उद्धार सदा परमेश्वर की एकमात्र भलाई पर टिका है, और जब हम विश्वास का निश्चय पाना चाहें तब हमें अपने कर्मों को बीच में नहीं लाना चाहिए, वरन् अपने आप का इन्कार करना चाहिए। तौभी, बात जैसी भी हो, हमारे प्रभु यीशु मसीह इसलिए नहीं आया कि हमें उस अनुग्रह का दुरुपयोग करने का अवसर दे जो उसने हमारे लिये मोल लिया है, क्योंकि यह तो उसके मुँह पर उसका उपहास करना होगा। यदि उसके हमें अपने लहू में धोने के बाद हम फिर अपनी ही मलिनता में लोटने जाएँ, तो क्या यह उस वस्तु को, जो सबसे पवित्र है, वरन् जो सारे संसार को पवित्र करती है, जानबूझकर अशुद्ध करना न होगा? अब जब हम सब भ्रष्ट हैं, और सारा संसार शाप के अधीन है, और हम सब दोषी ठहरे हैं: तो हमें फिर पवित्र करनेवाली कोई वस्तु नहीं, केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह का लहू। और यह कितना बड़ा और असह्य विश्वासघात होगा, यदि हम, जहाँ तक हमसे हो सके, फिर अपनी ही मलिनता में अपने आप को गन्दा करने लगें? इसलिए हम भली भाँति ध्यान दें कि हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग के फल का आनन्द उठाने के लिये हमें बुराई करने की छूट नहीं लेनी चाहिए, और न अपनी ही अभिलाषाओं और वासनाओं के अनुसार जीना चाहिए: वरन् हमें सदा उस अलग किए जाने तक पहुँचना चाहिए जिसकी बात सन्त पौलुस यहाँ करता है, अर्थात् इस बुरे संसार से निकाल लिया जाना, और जो बातें ऐसे पवित्र बन्धन से बाँधी गई हैं उन्हें अलग-अलग न तोड़ना, न परमेश्वर की व्यवस्था को रद्द करना। इसलिए विश्वासियों को सब प्रकार के शुद्ध जीवन में लग जाना चाहिए, और यह विचार करना चाहिए कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा और उसकी मृत्यु और दुःखभोग के बलिदान के द्वारा उनका छुड़ाया जाना इस शर्त पर है कि वे अपने आप को त्याग दें, जैसा हम सुनते भी हैं कि हमारे प्रभु यीशु मसीह हमसे कहता है कि जो उसके चेले होना चाहते हैं उन्हें अपने आप को दीन करके उसके पीछे चलना होगा। तो हमें क्या करना है, और हमारे जीवन भर हमारा परिश्रम क्या होना चाहिए? हमें यत्न करना चाहिए कि इस संसार की अशुद्धताओं से अपने आप को अलग करें, कि शुद्ध जीवन में अपने परमेश्वर से लिपटे रहें। सच है कि यह बात हममें तब तक सिद्ध नहीं होती जब तक हम संसार से पूरी रीति से निकाल न लिये जाएँ: परन्तु फिर भी यही वह लक्ष्य है जिसकी ओर हमें ताकना है, और जिसकी ओर हमें अधिकाधिक बढ़ना चाहिए। तब जैसे विश्वासी निरन्तर परमेश्वर की दया की शरण लेते हैं, और उसी पर अपने आप को स्थिर करते हैं, और अपने पापों की क्षमा के सिवाय और किसी रीति से धर्मी नहीं हैं: वैसे ही उन्हें उस लक्ष्य तक भी बढ़ते जाना चाहिए जो सन्त पौलुस यहाँ हमारे सामने रखता है, अर्थात् संसार से अलग होना। और ये दोनों बातें भली भाँति ध्यान देने योग्य हैं। कुछ कल्पनाशील लोगों ने ऐसी सिद्धता गढ़ ली है कि जब हम अपने प्रभु यीशु मसीह में एक बार नया जन्म पा लें, तो हमें अपने पापों की क्षमा की फिर आवश्यकता नहीं रहती; यहाँ तक कि वे कहते हैं कि जब हम प्रचार करते हैं कि हम विश्वास के सिवाय धर्मी नहीं बन सकते, और परमेश्वर के अनुग्रह में उसके हमारे पापों को क्षमा करने और अपनी ही भलाई से उन्हें ढाँप देने के सिवाय नहीं आ सकते, तो हम संसार को अब भी उनके बन्दरों की-सी नकल में रखते हैं। परन्तु वह तो शैतानी घमण्ड है; और तौभी पोप-मतवादियों में परमेश्वर की भलाई को इससे अधिक कोई स्तुति नहीं दी जाती।

इसलिए हम ऐसे सिरफिरों और उनकी सब निन्दाओं से घृणा करें, जब वे हमें यहाँ तक मोहित करने का यत्न करते हैं कि हम यह मान लें कि अब हमें परमेश्वर से दया की आवश्यकता नहीं, और न यह कि हमारे पाप क्षमा किए जाएँ। परन्तु हम इस पर भरोसा रखें कि हमारे लिये आवश्यक है कि जीवन भर आहें भरें और कराहें, और हमारे उद्धार का निश्चय दिलानेवाली और कोई आशा नहीं, केवल यही कि पहले अपने आप को दोषी मान लें, और फिर इसमें सब सन्देहों से परे हों कि हमारे प्रभु यीशु मसीह का लहू हमें निरन्तर धोकर शुद्ध और स्वच्छ करता रहता है। इसे एक बात जानो। और इसके साथ हमारा प्रयत्न सदा यह हो कि इस बुरे संसार से अलग किए जाएँ। और कैसे? परमेश्वर से प्रार्थना करके कि वह पहले हमें अपने पवित्र आत्मा से छुए, और फिर हममें अपने वरदान बढ़ाए, और शरीर की अभिलाषाओं को मार डाले। और जब हम ऐसा संघर्ष अनुभव करते हैं कि हमें अपने आप पर बल लगाना पड़ता है, या फिर परमेश्वर की ओर जाने में हम केवल लँगड़ाते और डगमगाते हैं, यहाँ तक कि बहुत से गलत कदम रखते और प्रायः लड़खड़ाकर गिर पड़ते हैं: तो हम सब प्रयासों में चूक जाते देखकर निरन्तर शोक करें। इस प्रकार तुम देखते हो कि हम इस बुरे संसार से कैसे छुड़ाए जा सकते हैं। अर्थात् पाप से सर्वथा स्वतंत्र किए जाने के द्वारा नहीं; जैसे जब सन्त पौलुस कहता है कि परमेश्वर ने हमें हमारे पापों से इसलिए छुड़ाया कि हम उसके सामने सिद्धता और निष्कलंकता से जीएँ, तो इसका अर्थ यह नहीं कि जब तक मनुष्य इस संसार में है तब तक किसी में ऐसी शुद्धता पाई जा सकती है: क्योंकि हमारे सब विचार निरन्तर परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करते रहते हैं, वरन् सब से धर्मी मनुष्य भी सदा अपने आप को पीछे पड़ा पाएँगे और जानेंगे कि वे अब भी अपने पाँव घसीट रहे हैं।

परन्तु फिर भी, संसार की जो भी दशा हो, दूसरी ओर हम देखते हैं कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमें विश्वास के द्वारा शैतान की दासता से पहले ही छुड़ा लिया है, और सब आक्रमणों के विरुद्ध हमें थामे रखेगा। यदि हम जाँचने लगें और हर एक अपने भीतर क्या है यह परखे, तो हम पाएँगे कि जब एक ओर हममें कोई भली अभिलाषा होती है, कि हम परमेश्वर का आदर करना चाहते हैं, तब दूसरी ओर हमारा अपना स्वभाव हमें उलटी दिशा में ले जाता है, कि हम उससे दूर ही रहना चाहें: यहाँ तक कि विश्वासियों को अपने भीतर ये दोनों हलचलें अनिवार्य रूप से अनुभव होती हैं, अर्थात् जब एक ओर (जैसा सन्त पतरस हमें उत्साहित करता है) पवित्र आत्मा हमें सब प्रकार के पवित्र जीवन में लगने की सम्मति देता है, तब दूसरी ओर हम अनुभव करते हैं कि बहुत सी बुरी वासनाएँ हमें पीछे खींच रही हैं, कि हम परमेश्वर के निकट वैसे नहीं आ सकते जैसे हम चाहते हैं। और यही कारण है कि सन्त पौलुस रोमियों के सातवें अध्याय में आहें भरता और मानता है कि वह अभागा है, क्योंकि वह वह भला काम नहीं कर पाता जो वह करना चाहता है, और उस बुराई से जिससे वह घृणा और बैर रखता है पूरी रीति से बच नहीं पाता। इस प्रकार तुम देखते हो कि यहाँ जिस छुटकारे का उल्लेख है उसके विषय में हमें यह ध्यान में रखना है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने अब तक हमें अपने पवित्र आत्मा से ऐसा नया जन्म नहीं दिया कि हमें पूर्ण स्वतंत्रता में अपनी इच्छा के अनुसार चलने और उतनी तेजी और उतने आनन्दित साहस से दौड़ने के योग्य कर दे जितना आवश्यक है। परन्तु उसका हमें छुड़ाना इसलिए है कि हम अपने लक्ष्य की ओर अपने मार्ग पर बने रहें, अर्थात् अपने आप को पूरी रीति से परमेश्वर की आज्ञाकारिता में समर्पित करें, और अपनी भ्रष्टताओं से अपने को अलग करें और उन्हें अधिकाधिक त्यागते जाएँ, जब तक पूर्ण सिद्धता का समय न आ जाए, जो तब होगा जब हमारे प्रभु परमेश्वर हममें अपने स्वरूप की पूरी मरम्मत कर चुकेगा।

अब प्रसंगवश, यद्यपि गलातियों में से कुछ फिसल गए थे, और उन व्यस्त हस्तक्षेपियों की बात सुन ली थी जिन्होंने सुसमाचार का भेष बदल दिया था और उसकी ऐसी खिचड़ी बना दी थी कि यीशु मसीह मानो दबा और गाड़ दिया गया था: तौभी सन्त पौलुस उन्हें अब भी उन विश्वासियों के साथ गिनता है जिनके लिये बलिदान चढ़ाया गया, जैसे वह उन्हें परमेश्वर की कलीसिया में भी रखता है। वह उन भगोड़ों से बात नहीं करता जिन्होंने यीशु मसीह को छोड़ दिया था। सच है कि वह शीघ्र ही उन्हें उनका दोष दिखाएगा: परन्तु फिर भी वह उन्हें उद्धार की आशा से पूरी रीति से बाहर करने का अभिप्राय नहीं रखता। क्योंकि उसके पास उन्हें लिखने का कोई कारण न होता, यदि यह उन्हें फिर लौटा लाने, उन्हें जीत लेने और उन्हें फिर भले मार्ग पर लाने के लिये न होता। इसलिए जब सन्त पौलुस गलातियों को उद्धार के मार्ग पर लौटा लाने का परिश्रम करता है (जैसा आवश्यक था:) तब वह उन्हें अब भी उस अनमोल उपकार में सम्मिलित करता है जो परमेश्वर के पुत्र के द्वारा हमारे लिये मोल लिया गया है, और उन्हें अब भी संसार से अलग किए हुए गिनता है, और उन्हें उन लोगों की संगति में जोड़ता है जिन्हें परमेश्वर ग्रहण करता और अपनी सन्तान मानता है। और यह इसलिए कि उनमें अब भी सुसमाचार का कुछ बीज था, और यद्यपि वे कुछ भूलों में उलझ गए थे, तौभी उन्होंने परमेश्वर को पूरी रीति से नहीं छोड़ा था, और न सुसमाचार से बिलकुल दूर निकल गए थे। इसी विचार से सन्त पौलुस उन्हें थामे रखता है, और अब भी विश्वासियों की गिनती में गिनता है। और इसी प्रकार यद्यपि हम इसके योग्य नहीं, तौभी परमेश्वर अपने वचन के कारण, जो हमारे बीच प्रचार किया जाता है, हमें अपने घराने का गिनेगा। निःसन्देह यह हमारे और भी कठोर दण्ड का कारण होगा, यदि परमेश्वर हमें बुलाए और हम उसे उत्तर न दें। परन्तु यदि हममें उसके पास आने की कोई भली अभिलाषा है, और फिर भी हममें अब तक बहुत से दोष और निर्बलताएँ हैं: तो वह अपने वचन के कारण हमें अपना ही मानकर ग्रहण करता है। और हम उसकी कलीसिया कहलाते हैं, इसलिए नहीं कि हम उस पदवी के योग्य हैं, परन्तु इसलिए कि जैसे यरूशलेम नगर प्रतिज्ञाओं के कारण पवित्र नगर कहलाया, अर्थात् इस कारण कि सुसमाचार वहीं से निकलेगा और जगत का छुड़ानेवाला वहीं प्रकट होगा: वैसे ही उसी कारण हम विश्वासी और परमेश्वर की सन्तान कहलाते हैं और उसकी कलीसिया की पंक्ति में गिने जाते हैं, जब हमारे बीच सुसमाचार का प्रचार होता है और लोग उससे सहमत होते हैं, चाहे वह उतनी श्रद्धा और सिद्धता से न हो जितनी उचित है।

तौभी, बात जैसी भी हो, सन्त पौलुस का गलातियों के प्रति ऐसी कोमलता बरतना उन्हें उनके दोषों में चापलूसी करना नहीं है, और न बहुत से मनुष्यों की रीति पर, जिन्हें हम इसी प्रकार प्रशंसा सुनने के लालायित देखते हैं, उन्हें मूर्खतापूर्ण चापलूसी से बहलाना है: परन्तु हम शीघ्र ही देखेंगे कि वह उन्हें जितनी कड़ाई से हो सके डाँटता है, यहाँ तक कि उन्हें निर्बुद्धि कहता है। और ये बातें एक साथ कैसे मेल खाती हैं? इस प्रकार कि एक ओर वह परमेश्वर के उस अनुग्रह को बढ़ाना चाहता था जो उस कलीसिया में प्रकट हुआ था: और दूसरी ओर उसे उन दोषों को, जो उसमें थे, जैसी आवश्यकता थी, माँजकर छुड़ाना पड़ा। इससे हम देखते हैं कि जब परमेश्वर ने किसी स्थान में अपनी कलीसिया लगाई हो, तो इससे तुरन्त यह नहीं निकलता कि वहाँ सब कुछ सराहने योग्य है, और उसमें सब कुछ भक्ति ही भक्ति है, जैसा पोप-मतवादी कल्पना करते हैं, जो कलीसिया के नाम के नीचे अपनी सब घृणित बातों को, वरन् सारे संसार की सबसे भयंकर और शैतानी घृणित बातों को भी ढाँपना चाहते हैं। कैसे? वे कहते हैं कि कलीसिया चूक नहीं सकती: वह यीशु मसीह की दुल्हन है: वह सत्य का खम्भा है। हाँ, परन्तु इस बीच गलातिया की कलीसियाओं को देखो। पवित्र आत्मा सन्त पौलुस के मुँह से उनके विषय में क्या कहता है? उनमें भगोड़े थे जिन्होंने सुसमाचार को छोड़ दिया था: उनमें जितनी घृणित और उग्र विधर्मी बातें हो सकती थीं उतनी थीं। इसलिए हम यह समझ लें कि हमें मनुष्यों से कभी इतना बँधा नहीं रहना चाहिए कि जब उनकी जाँच का समय आए तब उनके दोषों को दोषी न ठहराएँ: परन्तु सब बातें परमेश्वर के वचन के अधीन की जानी चाहिए, और जो कुछ उसके अनुकूल न हो वह सब दोषी ठहराया जाए, ताकि कोई बात परमेश्वर को निरन्तर अपना अधिकार रखने से और उन सब बातों को पैरों तले रौंदने से न रोके जो उसके वचन के अनुकूल नहीं, वरन् मनुष्य उन्हें दोषी ठहराएँ और उनसे पूरी रीति से घृणा करें। इसके अतिरिक्त हम उन्हें, जिनका प्रवेश अब तक हो चुका है, निरन्तर परमेश्वर की ओर खींचने से न रुकें। और यद्यपि हम उन्हें निर्बल या मार्ग से भटका हुआ देखें: तौभी हम सदा परमेश्वर के अनुग्रह को प्रस्तुत करते रहें, कि वह उनमें अधिकाधिक बढ़े और दृढ़ हो, जब तक कि हम सब वहाँ इकट्ठे न हो जाएँ जहाँ हम प्रतिदिन बुलाए जाते हैं, अर्थात् अपने प्रभु यीशु मसीह के पास।

अब आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने अपने दोषों को मानते हुए गिर पड़ें, और उससे प्रार्थना करें कि वह हमें उन्हें अधिकाधिक समझाए, और हम ऐसे मर्म तक छुए जाएँ कि उनसे घृणा करें, और उसके अनुग्रह को ऐसा ग्रहण करें कि वह हममें अधिकाधिक बढ़ता जाए, और हम अपनी निर्बलता में उसके हाथ से थामे और सँभाले जाएँ, जब तक कि वह हमें स्वर्गीय राज्य की उस पवित्र सिद्धता तक न पहुँचा दे जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमारे लिये मोल ली गई है। और इसलिए हम सब कहें, हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, हमारे स्वर्गीय पिता। इत्यादि।

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